(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “होलिका दहन”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ ☆
🌻लघुकथा🌻 🔥 होलिका दहन🔥
मोहल्ले में होलिका रखी गई थी। साज सजावट, डीजे की धुन, आनंद उल्लास, उमंग को बढ़ा रही थी। मस्ती में झूमते सभी नजर आ रहे थे।
फूल बताशामाला, धूप, कच्चा धागा, हल्दी गाँठ लाईलावा, सुखे श्रीफल, मावा की थाली, सजा सभी महिला पुरुष होली पूजन के लिए जाने लगे।
देखते- देखते पूरा प्रांगण भर उठा सृष्टि अभी दो महिने ही हुए थे पति का स्वर्गवास हो गया था। छोड़ गए थे अपने पीछे यौवन से भरपूर सृष्टि और दो मासूम बच्चे।
बच्चों को लेकर वह भी थाल सजा होलिका पूजन में पहुंच गई। अरे यह क्या?? सभी की निगाहें सृष्टि की तरफ – – बातें बनने लगी इशारे इशारों में सभी तानों की फाग छेड़ने लगे।
गाना बज रहा था। माइक पर पंडित जी बैठे शुभ मुहूर्त का समय और होली की पौराणिक कथा बता रहे थे। सृष्टि ने हाथ जोड़ माईक हाथ में ले लिया। बड़े विनम्र भाव से सभी को प्रणाम कर कहने लगी— आप सभी मेरे आत्मिय और मार्गदर्शक है। मुझे बता दे क्या मैं अपने बच्चों के लिए जी नहीं सकती।
यदि आप में से कोई इनका भरण-पोषण भविष्य बनाने के लिए तैयार हैं, तो मैं यहीं पर आज इसी होलिका में अपने आप को दहन कर लूंगी।
परंपरा और रीत जीवंत तो उठेगी। यदि नहीं तो मुझे भी रंगों के साथ जीने दीजिए और बच्चों के लिए दोहरी भूमिका निभाने दीजिए।
पंडित जी ने माइक हाथ में ले, दूसरे हाथ से गुलाल उड़ा होली की शुभ बधाई देने लगे। देखते-देखते सृष्टि की श्वेत साड़ी गुलाबी, लाल हो चली।
बच्चे खूब ताली बजा- बजा कर नाच रहे थे। रूढ़िता, द्वेष, ईर्ष्या, होलिका में दहन हो गई। सृष्टि को जीने का रंग मिल गया।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वंदन…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९६ — वंदन —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मैंने देखा मेरी टूटी हुई वीणा ने स्वयं अपनी मरम्मत कर ली है। पर मैं तो वीणा के मामले में छलिया हूँ। मेरे पास वीणा हो सकती है, लेकिन मैं उसके तारों को झंकृत नहीं कर सकता। पर मेरी वीणा की बात कुछ और है। विशेष कर आज मेरी वीणा आकंठ जागृत थी। मैं चुप था। मेरी वीणा ने स्वयं गाया, “मॉरिशस पहुँचे उन प्रथम भारतीय मजदूरों को वंदन जिनकी कुदाल से इस देश की धरती पहली बार स्पंदित हुई थी।”
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समाधान।
लघु कथा – समाधानसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
पांचवी कक्षा में पढ़ने वाला आशीष शाम को चार बजे घर लौटता तो स्कूल बैग, यूनिफॉर्म और जूते उतारने के बाद अलमारी में से अपना मोबाइल निकालता और डाइनिंग टेबल पर पहुंच जाता.
दादी गीता उसे गर्म गर्म नाश्ता बना कर देती. वह नाश्ता खाते-खाते लगातार मोबाइल में आ रहे गेम्स खेलने लगता. गीता जी को बहुत बुरा लगता .एक दो बार उन्होंने टोक भी दिया – “बेटा खाते समय मोबाइल को कुछ देर साइड में रख दिया करो…” लेकिन वह उनकी बात को अनसुना करके अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहता.
आज फिर उसके मोबाइल देखने पर गीता ने कह दिया- ” बेटा, थोड़ी देर मोबाइल रख दो ना. मुझसे बात करो मैं भी तो यहीं बैठी हूं…” एकाएक वह गुस्से से भड़क उठा- ” मुझे दो घंटे बाद ट्यूशन पर जाना है फिर मोबाइल कब देखूंगा..? और आपके साथ मैं क्या बात करूं..? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो मोबाइल मत देखो..…आप अपना काम करो और मुझे मोबाइल देखने दो….”
और वह फिर से मोबाइल देखने में व्यस्त हो गया. अपने पोते के व्यवहार से गीता जी भीतर तक आहत हो गईं. उनकी आंखें भीग गईं.
रात को बेटे बहू को उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया तो दोनों एकदम चुप हो गए और एक दूसरे का मुंह देखने लगे.
अगले दिन शाम को ऑफिस से लौटने पर बहू बेटे ने गीता जी के हाथ में एक मोबाइल फोन रख दिया और बोले – ” मां,अब आप भी अपने आप को इसमें व्यस्त कर लो… हमारे पास यही एक समाधान है…”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी लघुकथा –“कारण” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४१ ☆
☆ लघुकथा – कारण☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
” लाइए मैडम ! और क्या करना है ?” सीमा ने ऑनलाइन पढ़ाई का शिक्षा रजिस्टर पूरा करते हुए पूछा तो अनीता ने कहा, ” अब घर चलते हैं । आज का काम हो गया है।”
इस पर सीमा मुँह बना कर बोली, ” घर ! वहाँ चल कर क्या करेंगे? यही स्कूल में बैठते हैं दो-तीन घंटे।”
” मगर, कोरोना की वजह से स्कूल बंद है !” अनीता ने कहा, ” यहां बैठ कर भी क्या करेंगे ?”
” दुखसुख की बातें करेंगे । और क्या ?” सीमा बोली, ” बच्चों को कुछ सिखाना होगा तो वह सिखाएंगे । मोबाइल पर कुछ देखेंगे ।”
” मगर मुझे तो घर पर बहुत काम है, ” अनीता ने कहा, ” वैसे भी ‘हमारा घर हमारा विद्यालय’ का आज का सारा काम हो चुका है। मगर सीमा तैयार नहीं हुई, ” नहीं यार। मैं पांच बजे तक ही यही रुकुँगी।”
अनीता को गाड़ी चलाना नहीं आता था। मजबूरी में उसे गांव के स्कूल में रुकना पड़ा। तब उसने कुरेदकुरेद कर सीमा से पूछा, ” तुम्हें घर जाने की इच्छा क्यों नहीं होती? जब कि तुम बहुत अच्छा काम करती हो ?” अनीता ने कहा।
उस की प्यार भरी बातें सुनकर सीमा की आंख से आंसू निकल गए, ” घर जा कर सास की जलीकटी बातें सुनने से अच्छा है यहां शकुन के दोचार घंटे बिता लिए जाए,” कह कर सीमा ने प्रसन्नता की लम्बी साँस खिंची और मोबाइल देखने लगी।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना।)
☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
कमला अपनी कहानी के रजिस्टर को लेकर पास के साइबर कैफे में गई ।
साइबर कैफे का मालिक उसके बेटे उज्जवल का परम मित्र था।
उज्जवल तो विदेश में नौकरी करने चला गया। अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़कर।
कमला जी विदेश जाना भी नहीं चाहती थी?
अकेले घर में खाली बैठे हुए बागवानी करती थी और कहानी लिखती थी, अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की।
मन में एक विचार आया कि चलो अमन से बात करते हैं।
कमल जी तैयार होकर तुरंत अमर के कैफे में पहुंची।
कमल जी को देखकर अमन ने कहा- “नमस्ते आंटी आप थोड़ी देर बैठ जाइए मैं कुछ फोटो को एडिट कर रहा हूं। बस थोड़ी देर में ही काम खत्म हो जाएगा, फिर आपकी बात सुनता हूँ।”
वे किनारे रखी कुर्सी में बैठ गई उनके बगल में एक 15 साल की लड़की नेट पर कुछ मैटर सर्च करवा रही उन्होंने देखा प्रसिद्ध हिंदी के रचनाकारों की पिक्चर थी, इसलिए उनकी जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने पूछा बिटिया “हिंदी के इन कलम के सिपाहियों के बारे में क्या जानती हो?”
“नहीं आंटी पर मैं इनके बारे में नहीं जाना चाहती स्कूल में मुझे फेमस राइटर के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को दिया है।”
कमल जी ने कहा -“बेटा यदि तुम जानना चाहो तो मेरे पास किताबें हैं तुम लेकर प्रोजेक्ट बना सकती हो।”
“हम इंटरनेट यूजर हैं, हमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं है।”
आंटी मेरा नाम खुशी है आप मुझे बिटिया न कहें, मैडम ने कहा है, प्रोजेक्ट बनाना है अंकल सभी की फोटो निकालकर बढ़िया सा एक प्रोजेक्ट मुझे बनाकर 1 घंटे में दे देंगे।
इधर-उधर भटकने की और मेहनत करने की मुझे क्या जरूरत है?
कमल जी की ओर देखकर उस लड़की ने बोला -“जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं सलाह देने के लिए?”
कमल जी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि वे सब उनके पसंदीदा लेखक थे वे क्या करती इसीलिए चुप हो गई।
लड़की खुशी ने कहा- अमन अंकल मेरी फोटो तो आपने सब एडिट कर दिए अब एक लेख के साथ अच्छा सा प्रोजेक्ट बना दीजिएगा, वीडियो भी बना दीजिएगा बिल्कुल ऐसा लगे मैं ही बोल रही हूँ। 2 घंटे बाद में आकर ले जाऊंगी एक पेन ड्राइव में सब कर दीजिएगा, पैसे आपको पूरे मिल जाएंगे।
अमन ने कहा -“चार हजार में बढ़िया बन जाएगा।”
उस लड़की ने कहा – ठीक है और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई।
कमल जी ने कहा – “अमन बेटा आजकल बच्चे पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते तुम्हारे पास आते रहते हैं इसीलिए इतनी भीड़ है।”
अमन बोल – “हां आंटी आजकल सभी बच्चों के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट भी है सारे सवालों के जवाब पूछते हैं।”
कमल जी ने कहा- ” बेटा फिर इन बच्चों का दिमाग कैसे चलेगा जब किताब पढ़ कर प्रोजेक्ट नहीं करेंगे तो?”
अमन ने कहा – “अरे! आंटी आजकल सारे बच्चे बदल गए हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करते हैं।”
“ठीक कह रहे हो अमन” – कमल जी ने गंभीर स्वर में कहा।
कमला जी की आंखों में आंसू आ गए रोते हुए उन्होंने कहा-
“आजकल किसी के अंदर कोई भावना और इमोशन नहीं है, रिश्ते भी बदल गए हैं।”
“हाथ में एक छोटा सा जादू पकड़ लिया है मोबाइल नामक राक्षस।”
सारा कुछ इसी में देखते हैं, आजकल लोग एकाकी हो गए हैं, इसी के जरिए लोगों को उल्लू बनाकर पैसे भी मांगते हैं, कुछ दिन पहले बेटा डिजिटल क्राइम के विषय में सुना था।
क्या कोई इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इलाज नहीं करता?
अमन ने कहा -“आंटी अभी तो दुनिया इसी पर चल रही है, जाने कितने युवाओं की नौकरी भी जा रही है भविष्य में देखते हैं क्या होगा?”
कमला जी ने कहा – “बेटा अमन तुम तकनीकी के काम करते हो और हम बुजुर्गों की बात तो सुन लेते हो। भगवान इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जादू से हम सबको बचाए मैं ऐसी प्रार्थना करूंगी।”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆
🌻लघुकथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻
शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।
कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।
वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।
अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।
जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।
सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।
वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।
गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –
ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है, उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है, उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।
वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।
अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में, धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।
अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।
तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं .., आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।
☆ लघुकथा ☆ ~ एक चित्र ऐसा भी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
जरा सोचिए! अगर शब्दों में आग हो और भावना में राग हो, तो ऐसा व्यक्तित्व तो अनूठा ही होगा! एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कलम ने संवेदना को नया स्वर दिया और संघर्ष को उद्घोष के अक्षय शब्द| ऐसे हैं बहु आयामी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ – यथा नाम: तथा गुण! अपने गांव की मिट्टी से लेकर साहित्य की दुनिया में जो पहचान बनाई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी-कभी शब्द उनके आँसुओं जैसे बहे… तो कभी तीर बनकर समाज को झकझोर गए। कहते हैं, उन्होंने मात्र लिखा ही नहीं अपितु यथार्थ ज़िंदगी को काग़ज़ पर जिया भी है। हर रचना में उनकी आत्मा बोलती है, और हर पंक्ति में एक नया प्रश्न उभरता है — क्या शब्द सच में दुनिया बदल सकते हैं? हाँ क्यों नहीं? आइए, जानते हैं ऐसे विलक्षण साहित्यकार – राजेश कुमार सिंह श्रेयस की जीवंत कहानी, जिसने सिद्ध कर दिया — कलम अगर ईमानदार हो, तो वह इतिहास भी लिख देती है!
साभार – युग संवाद (यूट्यूब)
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मेरे जेहन में आज एक कहानी आ रही है। इस कहानी को मैं अक्षरश: कहना चाह रहा था , लेकिन इस कहानी को अक्षरश: कहने में स्वयं को विवश पा रहा हूँ। चलिए कहानी को कुछ आगे बढ़ा कर बताते हैं।
एक चित्रकार था उसको एक चित्र बनाने को कहा गया। जब वह चित्रकार चित्र बनाने बैठा तो उस चित्रकार की विबशता यह हुई कि चित्र बनाने के पहले ही उसके पास ढेर सारे सुझाव आने लगे। पुरानी कहानी में चित्र बनने के बाद सुझाव आये थे, लेकिन इस कहानी में तो चित्र बनने के पहले ही सुझाव आने लगे थे। यह सुझाव, खाली सुझाव नहीं थे। लोग सुझाव के साथ साथ अपने अपने रंग भी भेज रहे थे। किसी ने लाल पीला हरा, किसी ने हरा नीला लाल, किसी ने लाल सफेद काला, नाना प्रकार के रंग भेज दिये। शुरू में चित्र रंगीन हुआ। बाद में रंग इतने हो गए कि चित्रकार के ऊपर ही रंग छिटक छिटक कर पढ़ने लगा। चित्रकार को लग गया कि अब इन्हीं रंगों से सुन्दर दिखने वाला चित्र ही बदरंग होने वाला है। लेकिन चित्रकार की मजबूरी यह थी कि सुझावो के साथ भेजे रंगों को भरना ही भरना था।
चित्रकार पर दबाव बढ़ता गया, और अधिक बढ़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें क्या रंग डालूं और कौन सा रंग निकालूं। चित्रकार ने अपने चित्रकला के नीचे अपना छोटा सा नाम हस्ताक्षर स्वरूप लिखा था। लेकिन ऊपर का फरमान यह आया कि सुझाव देने वालों की भी नाम भी उसके रंग के साथ लिखना है। अब चित्रकार परेशान हुआ कि सबके भेजे गए रंगों को भरूं कि सबका नाम लिखूं। उसको तो एक खूबसूरत पेंटिंग बनानी थी। यहां तो पूरे पेंटिंग की किताब का मटेरियल आ गया। अब वह परेशान हो गया कि उसे पेंटिंग बनानी है की पूरी पेंटिंग की किताब बनानी है। खैर फरमान तो फरमान ही होता है और कहा भी गया है कि प्रभुता संपन्न व्यक्ति गलती नहीं करता है। राजा कभी गलती करता ही नहीं है। अब फरमान आया है तो फरमान को पूरा करना ही था।
सभी रंग भरे जाने लगे। रंगों को भेजने वालों के नाम भरे जाने लगे। पूरी पेंटिंग रंगीन हो उठी रंग पर रंग, रंग पर रंग। पेंटिक घना होता गया.. घना होता गया.. घना होता गया , घना होते होते पेंटिंग रंग डिब्बे का पूरा बॉक्स बन गया . अंततः चित्रकार की ब्रश ऐसी मजबूरी में फंसी कि सुझाव देने वालों के रंग और उनके नाम डालते डालते मूल चित्रकार का नाम ही है गायब गया। चित्रकार ने इतने पर भी संतोष किया। उसने यह सोचकर संतोष किया कि चलो अगर चित्र बढ़िया बन गया, तो लोग कहेंगे कि वाह क्या सुंदर सा चित्र बना है। भाई..कमाल का चित्रकार है। गजब का चित्र बनाया है। अब उस चित्र पर उसका नाम न लिखा होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा को सुनकर वह खुश होगा। यह सोचकर, उसने चित्र बनाना जारी रखा।
आखिरकार उसने एक भारी भरकम चित्र बना ही गया। जब चित्र बन गया और वह प्रदर्शित हुआ तो जितने लोगों ने ढेर सारे रंग भरे थे। अपने ही भेजें रंगों को देखकर, लोगों ने उनका नुक्स निकालना शुरू किया। अरे यार, यह छूट गया, यह भरना था,यह नहीं भरना था, यह रंग गया, यह नहीं रखता था। लेकिन सारे सुझाव भेजने वाले भूल गए कि चित्रकार की जगह नाम तो उन्हीं का लिखा है, जिन्होंने खाली सुझाव नही भेजे, बल्कि सुझावों के साथ अपने अपने रंग भी भेजें थे। और अपने ही रंग से पेंटीन को बर्बाद किया, तो चित्रकार का कहां दोषी हुआ।
उसकी चित्रकारिता का हुनर तो वहीं समाप्त हो गया जहां सुझाव देने वालों की संख्या थोड़ी नहीं एक भीड़ के सरीखे आ गई।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “मोबाइल में खोया बचपन…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २३
लघुकथा – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
स्मरण आता है, वह स्वर्णिम बचपन… l घर में जब कोई डिब्बा खाली हो जाता था, उसे लेकर हमारे साथी, हमारे भाई-बहन एक कोने में खड़े हो जाते थे, दूसरा खाली डिब्बा लेकर दूसरे कोने में हम l दोनों खाली डिब्बों को एक धागा अथवा किसी डोर से बाँध लिया जाता था l
उस कोने से हमारे साथी या हमारे भाई-बहन खाली डिब्बे में मुँह लगाकर बोलते थे, इधर हम सुनते थे….. कभी इधर से हम बोलते थे, उधर वो सुनते थे l
खाली डिब्बे का स्थान अब मोबाइल ने ले लिया है l बात तब भी होती थी, बात अब भी होती है l….. लेकिन बीच की स्नेहिल डोर न जाने कहाँ ग़ायब हो गई है l