हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं।

आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ – ✍

(काव्य संग्रह – उजास ही उजास से )

हाँ दुख को पढ़ना भी एक कला

आजकल ये रिवाज

आम हो चला है

कि लोग

दूसरों के दुख का ढोल

अपने गले में टाँग लेते हैं

और

सूचनात्मक बाग देते हैं।

सवाल दुख-सुख का नहीं

सवाल है नियत का

अगर नियत में खोट है

तो फूल से छूना भी चोट है।

मैंने नहीं सीखा

दुख में दीन होना

शोभा नहीं देता

मनु राजा के बेटे को

कौड़ी के तीन होना/ हीन होना।

अरे, दुख आया है

केमिक

तो सहेंगे

हम भवानी कवि के वंशज

रोकर नहीं

गाकर कहेंगे।

दुख में गाना

कि

पागलपन नहीं/ कलेजे का काम है,

दुनिया है दुखदाता

है

और सुखदाता

पुरुषार्थी पुरुषोत्तम राम है।

आज के जमाने में राम का नाम

पुरानी मूर्तियों की तरह म्यूजियम में

रखा जाता है

और स्मगल के काम आता है

खैर कोई कुछ करे

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७६ – “वे अव्यक्त हुये जाते हैं …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

दिखते पिता इस तरह

बैठे अगले कमरे में ।

कभी किसी के लहजे में

तो घर के चेहरे में ॥

 

टँगी गंध है रही खूँटियों

पर वो  जिस्मानी ।

उनके कपड़ो से आती जो

जानी पहचानी ।

 

वहीं हृदय के घाव रहे

बेशक बिन मरहम के –

विवश पड़ा हो ज्यों कोई

चौपाया  कचरे में ॥

 

धुँधली हुई निगाह

पाँव में आ बैठा कम्पन ।

जिससे पता चला करता

बाकी है स्पन्दन ।

 

कभी बोलते तो ऐसा

सब लोग सुना करते –

कोई शख्स कुयें से बोले

काफी गहरे में ॥

 

छड़ी, पास की बुझी बुझी सी

दिखती कोने में ।

वे अव्यक्त हुये जाते हैं

जीवित होने में ।

 

पर कराहना उनका

जैसे बतला जाता है –

कोई कंकड़ कहीं

गिरा हो पानी ठहरे में ॥

 

रहते थे चुपचाप घरेलू

सब सम्बंधों पर ।

चले गये चुपचाप चार

लोगों के कन्धों पर ।

 

समझ न पाये उन्हें कभी

जाने अनजाने ही –

उलझे रहे निदान खोजते

भ्रम के पहरे में ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

09-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – हास्य-व्यंग्य – “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य रचना “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ ☆

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆

 मैं सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था तभी दरवाजा थपथपाते हुए पड़ोसी वर्मा जी ने आवाज लगाई – भाई साहब।

दरवाजा खोलते हुए मैंने कहा – आइए वर्माजी। आज क्या खबर लाए हैं ? वे सोफा संभालते हुए बोले – भाई साहब ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है ? मैंने वर्मा जी के लिए चाय लाने पत्नी को आवाज लगाई और फिर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेचैन वर्माजी ने पुनः प्रश्न किया – भाई साहब, ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है? मैंने नाक की नोंक पर रखे चश्मे के ऊपर से वर्मा जी पर तरछी नजर फेंकते हुए कहा – भाई जी लफड़ा ही लफड़ा है। इतालवी कलाकार लियोनार्डो दा विंची ने सोलहवीं शताब्दी में मोनालिसा की सुन्दर पेंटिंग बनाई थी। जानकारी के अनुसार मोनालिसा का असली नाम लीसा था जो फ्लोरेंस के एक कपड़ा व्यापारी फ्रांसेस्को डेल की पत्नी थी। मैं वर्मा जी को मोनालिसा के बारे में बता रहा था और वे लगातार भाई साहब, , , भाई साहब कहते हुए मुझे टोक रहे थे। मैंने कहा भाई जी, यदि मोनालिसा के बारे मैं सुनना है तो टोका टाकी मत करो। वे मेरी ओर झुकते हुए बोले – मैं इस मोनालिसा की बात नहीं कर रहा मैं तो उस बड़ी बड़ी शराबी आंखों वाली सांवली सलोनी मोनालिसा की बात कर रहा हूं जो टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से कुंभ के मेले में माला बेचते बेचते मिस इंडिया जैसी फेमस होकर युवा दिलों की धड़कन बन गई। अनेक युवा तो कुंभ नहाने के बहाने उसे देखने, उससे मिलने के लिए ही इलाहाबाद गए। उसकी झील सी गहरी आंखों में डूब कर दस गुने ज्यादा दाम देकर उससे मालाएं खरीदीं।

मैंने मुस्कुराकर चुटकी लेते हुए कहा भाई जी कुंभ मेला तो आप भी गए थे, नहाया की सिर्फ मोनालिसा से मिलकर आ गए ? वर्मा जी शर्माते हुए बोले भाई साहब अब आपको क्या बताऊं ! उसे देखकर तो मुझे फिल्म आरजू का वह गाना याद आ गया जो राजेंद्र कुमार ने साधना की आंखें देखकर गया था –

छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा

खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज्यादा

मैंने कहा भाई जी फिर तो “आंखों ही आंखों में इशारा और बैठे बैठे जीने का सहारा” हो गया होगा। मेरी बात सुनकर वर्मा जी उदास हो गए बोले – भाई साहब क्या बताऊं, वहां सौ बीमार होते तब भी मैं बाज़ी मार लेता लेकिन वहां तो एक अनार के लाख बीमार वाली स्थिति थी। आखिर उसे फिल्म में हीरोइन बनाकर मुनाफा कमाने एक निर्माता निर्देशक ले उड़ा। गंगाघाट पर खिल उठे लाखों दिल चकनाचूर हो गये। भाई साहब बचे खुचे युवा दिलों पर उस समय नश्तर चल गया जब मोनालिसा ने बड़ी उमर के एक दाढ़ी वाले से शादी कर ली। भाई साहब बताइए मोना ने ऐसा क्यों किया ? मैंने कहा वर्मा जी आपने वह गाना सुना है –

“पसंद आ गई है एक काफिर हसीना,

दाढ़ी वाले को भी वह पसंद आ गई होगी, उसकी मेहनत सफल हुई। मेरी बात सुनकर वर्मा जी के आंसू निकल आए, वे बोले – भाई साहब दाढ़ीवाले ने ऐसा क्यों किया ? मैंने वर्मा जी को सांत्वना देते हुए कहा – प्यारे भाई दुनिया के सब मर्द फिल्म “आई मिलन की बेला” के राजेंद्र कुमार जैसे नहीं हैं जो प्रेम निवेदन कर रही कम उम्र की लड़की से साफ – साफ कह दें –

अभी कमसिन हो, नाजुक हो, नादां हो, भोली हो…

सोचता हूं मैं कि तुम्हें प्यार न करूं…

वर्मा जी के चेहरे को देखकर लग रहा था कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है। मैंने कहा भाई जी मैं आपके दुख में आपके साथ खड़ा हूं। “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” कहते हुए वे बाहर निकल गए।

☆

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆ # “कविता का साया…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कविता का साया…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆

☆ # “कविता का साया…” # ☆

☆

मैं सुबह-सुबह घर से घूमने निकलता हूं

धीरे-धीरे नपे तुले कदमों से चलता हूं

तब वह भी मेरे साथ साथ चलती है

 

गार्डन में घूमते हुए

प्रकृति के नजारों को आंखों से चूमते हुए

सूर्य की कोमल किरणों से लिपटकर

कलियों को धीरे-धीरे उमलते हुए

मैं देखता हूं

कुछ देर बेंच पर बैठता हूं

वह भी बैठती हैं

जब मैं उठकर चलता हूं

वह भी मेरे साथ-साथ चलती है

 

जब वॉकिंग से घर आता हूं

फ्रेश होकर अखबार पढ़ता हूं

चाय की चुस्कियों के संग

समाचार की सुर्ख़ियों को पढ़कर

अपने विचार अपनी सोच गढ़ता हूं

अपनी दुनिया में पहुंच जाता हूं

तब भी वह मेरे साथ-साथ वहां भी चलती है

 

दिनभर कुछ ना कुछ करते रहता हूं

कभी पढ़ते रहता हूं

कभी लिखते रहता हूं

कभी घर के कामों में व्यस्त रहता हूं

और जब मैं आराम करता हूं

तब वह भी मेरे साथ-साथ आराम करती है

 

शाम को मित्रों के साथ

“टी” पॉइंट पर

बैठकर गप्प मारते हुए

चाय पीते हुए

संसार की समस्याओं पर

आपसी विचार विमर्श

डिबेट करते हुए

शाम रात में ढलती है

तब मैं घर जाने को निकलता हूं

तब भी वह मेरे साथ साथ चलती है

 

रात में बिस्तर पर सोते हुए

जो बातें मन में उतरती है

आंखों के आगे आती है

दिल को झकझोरती है

तब भी वह मेरे साथ साथ होती है

 

फिर मैं अचानक उठकर

टेबल लैंप की रोशनी में

कुछ सोच कर

कलम उठाकर

लिखने बैठता हूं

तब वह मेरे कलम के

शब्दों के साथ-साथ चलती है

कागज पर उतरती है

नई रचना बनती है

वह मेरा साया नहीं

वह मेरी प्रिय कविता होती है

वह मेरी प्रिय कविता होती है /

 ☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०० – यही प्रेम है, प्रियवर! ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘यही प्रेम है, प्रियवर!‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १०० ☆ यही प्रेम है, प्रियवर! ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

आज सवेरे उठ कर मैने,

इंद्रधनुष जब देखा,

सात रंग चमकीले थे, पर,

रंग प्यार का ना था,

 

सोचा शायद देर हो गई,

मुझको सोते सोते,

रंग प्यार का सिमट गया है,

इंद्रधनुष के पीछे,

 

जब प्रकृति दुल्हन बनकर,

स्नेह सुधा बरसाए,

हरियाली की चादर ओढ़े,

धरती भी शरमाए

 

तब धरती पर रंगों से, रंग,

निखर कर आए,

प्रेम रंग हो सबसे निखरा,

प्रेम सदा बरसाए,

 

बदली की ओट से चंदा,

अवनी को है, झांके,

पृथ्वी पर व्याकुल चकोर,

चंदा को है ताके,

 

कांच के टुकड़े, मुट्ठी में हों,

लहू गिरे रिस कर,

पर मुस्काए, दुख में भी,

यही प्रेम है, प्रियवर!

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “सन्मान निधी…” – लेखक : अज्ञात ☆ शोभा जोशी ☆

शोभा जोशी 

? वाचताना वेचलेले ?

☆ “सन्मान निधी…” – लेखक : अज्ञात ☆ शोभा जोशी ☆

“आई,  तूपण ना! काय हे? बाबांच्या फक्त १२,००० रुपयांच्या पेन्शनसाठी इतकी धावपळ कशाला? आपण आपल्या एका कर्मचाऱ्याला यापेक्षा जास्त पगार देतो…! “

मोहित चिडून आईला म्हणाला.

 केवळ लाईफ सर्टिफिकेट देण्यासाठी स्टेट बँक ऑफ इंडियाच्या लांब रांगेत उभं राहण्यापेक्षा घरी जाऊ या,  असा तो आग्रह करू लागला.

 मोहितचं म्हणणं काही अंशी खरंच होतं.

त्यांचा कोट्यवधींचा व्यवसाय होता. वर्षभरात लाखो रुपये पगार-भत्त्यांत जात होते.

मग फक्त १२,००० रुपयांसाठी इतका वेळ का घालवायचा?

 

मोहितचे वडील एकनाथराव गेल्या महिन्यात अल्पशा आजाराने वारले होते. ते सरकारी शाळेत शिक्षक होते आणि १२ वर्षांपूर्वी निवृत्त झाले होते. त्यांना पेन्शन मिळत होती. त्यांच्या निधनानंतर शासनाच्या नियमानुसार अर्धी पेन्शन त्यांच्या पत्नी सरला यांना मिळणार होती. त्यासाठीच आज त्या बँकेत लाईफ सर्टिफिकेटची औपचारिकता पूर्ण करण्यासाठी आल्या होत्या.

 

महिनाभरापूर्वी एके दिवशी मोहितचा मुलगा कुशाग्रचा आठवा वाढदिवस होता. त्याने आजीकडे सायकलची मागणी केली होती.

 

सरलाताईंच्या खात्यात फारसे पैसे उरले नव्हते. म्हणून त्यांनी मोहितकडे १०,००० रुपये मागितले. मोहित ऑफिसला निघायच्या तयारीत होता. थोडं आश्चर्याने पाहून त्याने पत्नी श्रेयाला आईला पैसे द्यायला सांगितले. श्रेया पैसे देताना हलकंसं पुटपूटली,

“आजकाल खूप मंदी आहे बरं का! जरा सांभाळून खर्च करा. ”

 

संध्याकाळी सरलाताईंनी त्या पैशांतून कुशाग्रसाठी सायकल घेतली आणि घरात पुन्हा हशा-आनंद पसरला.

 

पण पुढच्या आठवड्यात मोहितची मोठी बहीण माहेरी आली.

 

नवरा जिवंत असताना सरलाताईंना कधीच पैशांसाठी कुणाकडे पाहावं लागत नव्हतं. ते स्वतःच पेन्शनमधून त्यांना थोडेफार पैसे देत असत.

आता मात्र मुलीच्या निरोपासाठीही त्यांना सुनबाईकडे हात पसरावा लागणार होता.

श्रेयाचे तेच शब्द त्यांच्या मनात घुमत होते,

“ मंदी आहे… जपून खर्च करा! ”

 

मन खट्टू करून त्या मुलीला रिकाम्या हाताने निरोप देऊ लागल्या,  तेवढ्यात श्रेया स्वतः पुढे आली आणि २००० रुपये त्यांच्या हातात ठेवत म्हणाली,

“ मुलीला रिकाम्या हाताने कसं पाठवणार? ”

पण त्या शब्दांत आपलेपणा कमी आणि टोमणा जास्त होता हे सरलाताईंना जाणवलं.

 

सरलाताईंच्या आयुष्यात पैशांची खरी कमतरता नव्हती. औषधं,  रिचार्ज,  छोट्या गरजा—मोहित लगेच पैसे देत असे.

पण मंदिरात दान करायचं असो,  सणासुदीला नोकरांना काही द्यायचं असो,  नातेवाईकांना भेट द्यायची असो,  प्रत्येक वेळी मागणं त्यांच्या स्वाभिमानाला टोचत होतं.

 

अलीकडे त्यांची बहीण आली होती. तिची आर्थिक परिस्थिती बेताची होती. तिला मदतीची अपेक्षा होती. पण सरलाताई स्वतःच पैशासाठी सुनेकडे पाहताना दिसल्यावर तिने काहीच मागितलंच नाही.

 

आणि मग एक दिवस मोबाईलवर मेसेज आला — State Bank of India कडून.

 

सहा महिन्यांची पेन्शन — ७२,००० रुपये — त्यांच्या खात्यात जमा झाल्याचा संदेश होता. सरलाताई जवळच्या ATM मधून १०,००० रुपये काढून घरी येत होत्या. त्यांच्या चालण्यातला आत्मविश्वास,  चेहऱ्यावरचे तेज सांगत होतं — पेन्शनला “सन्मान निधी” का म्हणतात ते.

 

कोट्यवधींच्या संपत्तीपेक्षा त्यांच्या पतींच्या त्या १२,००० रुपयांच्या पेन्शनमध्ये त्यांना अधिक वजन,  अधिक आधार आणि सर्वात महत्त्वाचं — स्वाभिमान जाणवत होता.

 

आई-वडिलांचं आयुष्य आपल्या आरामासाठी झिजलेलं असतं. आणि आपण मात्र त्यांच्या गरजांकडे ‘रक्कम’ म्हणून पाहतो.

 

गोष्ट पैशांची नाही,  स्वाभिमानाची आहे.

सन्मानाची आहे, भावनांची आहे.

 

पेन्शन म्हणजे फक्त पैसे नसून ती ‘सन्मानाची सही’ आहे.

लेखक : अज्ञात 

प्रस्तुती :  शोभा जोशी

कार्यकर्ती, जनजाती कल्याण आश्रम, पुणे महानगर. 

मो ९४२२३१९९६२ 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२८ ☆ व्यंग्य – मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘मंत्री जी का हाज़मा‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

मंत्री जी लाव-लश्कर के साथ डॉक्टर के दवाखाने पहुंचे। लश्कर को बाहर छोड़कर मंत्री जी डॉक्टर के चेंबर में दाखिल हुए। डॉक्टर ने आने का कारण पूछा तो मंत्री जी ने बताया— ‘पेट में बहुत तकलीफ रहती है। कुछ भी पचता नहीं। कभी उल्टी होती है तो कभी डायरिया। बेचैनी बहुत रहती है। अचानक ही घबराहट होने लगती है। हलक सूखता रहता है।’

डॉक्टर ने पूछा, ‘खाना क्या खाते हैं? कुछ बदपरहेज़ी होती होगी।’

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘बहुत सादा खाना खाता हूं। कोई बदपरहेज़ी नहीं होती।’

डॉक्टर साहब चक्कर में पड़े, बोले, ‘पूरी जांच करनी पड़ेगी।’

मंत्री जी कुछ संकोच में बोले, ‘वैसे आप अपने तक ही रखें तो बताना चाहता हूं कि मेरी तकलीफ तभी बढ़ती है जब लोग पैसा वैसा दे जाते हैं। लोग ब्रीफकेस लेकर आते हैं और छोड़ कर चले जाते हैं। मना करता हूं तो कहते हैं रख लीजिए, नहीं तो हमारा दिल टूट जाएगा। तभी हमें घबराहट होती है और उल्टी डायरिया का सिलसिला शुरू हो जाता है। रात को नींद भी नहीं आती।’

डॉक्टर साहब हंस कर बोले, ‘समझ गया। आपकी दूसरी वाली यानी माल हज़म करने वाली पाचन-शक्ति कमज़ोर है। आपके पिताजी क्या करते थे?’ 

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘स्कूल मास्टर थे।’

डॉक्टर साहब फिर हंसे, बोले, ‘यही रोग की जड़ है। आपके खानदान में माल पचाने की परंपरा नहीं रही। इसीलिए आपको दिक्कत हो रही है।’

फिर कुछ सोच कर बोले, ‘इस मर्ज़ का इलाज आपको डॉक्टर के पास नहीं मिलेगा। आप किसी अनुभवी, तपे हुए राजनीतिज्ञ के पास जाइए। उन्हीं के पास माल पचाने का नुस्खा मिलेगा।’

मंत्री जी डॉक्टर साहब को धन्यवाद देकर रुख़सत हो गये। एक माह बाद डॉक्टर साहब के पास उनका फोन आया, बोले, ‘धन्यवाद, डॉक्टर साहब। आपने सही रास्ता दिखाया। मुझे एक सीनियर राजनीतिज्ञ से पाचन-शक्ति बढ़ाने का मशवरा मिल गया है। अब पेट की गड़बड़, घबराहट वगैरह  कुछ नहीं होती। आपको बहुत धन्यवाद।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु व्यंग्य  # ९९ — धर्म – वृक्ष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक एक लघु व्यंग्य रचना “– धर्म – वृक्ष…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ लघु व्यंग्य  # ९९ — धर्म – वृक्ष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक अजीब अनोखा सा वृक्ष उग आया था। उसमें चंदन की सुगंध थी। उसे धर्म – वृक्ष नाम दिया गया था। पर उस पेड़ के प्रति अपमान का एक पहलू भी हुआ। लोग उस वृक्ष की टहनियाँ तोड़ कर अपने – अपने घर ले जाने लगे थे, क्योंकि उनसे चूल्हे खूब जलते थे। जिस दिन अंतिम टहनी तोड़ी गई थी उसी दिन पूरा वृक्ष सूख गया था। अब तो युग बीते। पीढ़ी दर पीढ़ी वहाँ उस वृक्ष की बात अब भी होती है। दुहाई यहाँ तक दी जाती है एक हमारा ही देश हुआ जहाँ धर्म – वृक्ष हुआ करता था। तब तो इसे विडंबना ही मानें, धर्म का क्षय सब से अधिक उसी देश में हुआ है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 – 03 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२८ – परिवर्तन का संवत्सर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२८ ☆ परिवर्तन का संवत्सर… ?

नूतन और पुरातन का अद्भुत संगम है प्रकृति। वह अगाध सम्मान देती है परिपक्वता को तो असीम प्रसन्नता से नवागत को आमंत्रित भी करती है। जो कुछ नया है स्वागत योग्य है। ओस की नयी बूँद हो, बच्चे का जन्म हो या हो नववर्ष, हर तरफ होता है उल्लास,  हर तरफ होता है हर्ष।

भारतीय संदर्भ में चर्चा करें तो हिन्दू नववर्ष देश के अलग-अलग राज्यों में स्थानीय संस्कृति एवं लोकचार के अनुसार मनाया जाता है। महाराष्ट्र तथा अनेक राज्यों में यह पर्व गुढी पाडवा के नाम से प्रचलित है। पाडवा याने प्रतिपदा और गुढी अर्थात ध्वज या ध्वजा। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था। सतयुग का आरंभ भी यही दिन माना गया है।

स्वाभाविक है कि संवत्सर आरंभ करने के लिए इसी दिन को महत्व मिला। गुढीपाडवा के दिन महाराष्ट्र में ब्रह्मध्वज या गुढी सजाने की प्रथा है। लंबे बांस के एक छोर पर हरा या पीला ज़रीदार वस्त्र बांधा जाता है। इस पर नीम की पत्तियाँ, आम की डाली, चाशनी से बनी आकृतियाँ और लाल पुष्प बांधे जाते हैं। इस पर तांबे या चांदी का कलश रखा जाता है। सूर्योदय की बेला में इस ब्रह्मध्वज को घर के आगे विधिवत पूजन कर स्थापित किया जाता है।

माना जाता है कि इस शुभ दिन वातावरण में विद्यमान प्रजापति तरंगें गुढी के माध्यम से घर में प्रवेश करती हैं। ये तरंगें घर के वातावरण को पवित्र एवं सकारात्मक बनाती हैं। आधुनिक समय में अलग-अलग सिग्नल प्राप्त करने के लिए एंटीना का इस्तेमाल करने वाला समाज इस संकल्पना को बेहतर समझ सकता है। सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा तरंगों की सिद्ध वैज्ञानिकता इस परंपरा को सहज तार्किक स्वीकृति देती है। प्रार्थना की जाती है,” हे सृष्टि के रचयिता, हे सृष्टा आपको नमन। आपकी ध्वजा के माध्यम से वातावरण में प्रवाहित होती सृजनात्मक, सकारात्मक एवं सात्विक तरंगें हम सब तक पहुँचें। इनका शुभ परिणाम पूरी मानवता पर दिखे।” सूर्योदय के समय प्रतिष्ठित की गई ध्वजा सूर्यास्त होते- होते उतार ली जाती है।

प्राकृतिक कालगणना के अनुसार चलने के कारण ही भारतीय संस्कृति कालजयी हुई। इसी अमरता ने इसे सनातन संस्कृति का नाम दिया। ब्रह्मध्वज सजाने की प्रथा का भी सीधा संबंध प्रकृति से ही आता है। बांस में काँटे होते हैं, अतः इसे मेरुदंड या रीढ़ की हड्डी के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। ज़री के हरे-पीले वस्त्र याने साड़ी-चोली, नीम व आम की माला, चाशनी के पदार्थों के गहने, कलश याने मस्तक। निराकार अनंत प्रकृति का साकार स्वरूप में पूजन है गुढी पाडवा।

कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में भी नववर्ष चैत्र प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। इसे ‘उगादि’ कहा जाता है। केरल में नववर्ष ‘विशु उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। असम में भारतीय नववर्ष ‘बिहाग बिहू’ के रूप में मनाया जाता है।  बंगाल में भारतीय नववर्ष वैशाख की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इससे ‘पोहिला बैसाख’  यानी प्रथम वैशाख के नाम से जाना जाता है।

तमिलनाडु का ‘पुथांडू’ हो या नानकशाही पंचांग का ‘होला-मोहल्ला’ परोक्ष में भारतीय नववर्ष के उत्सव के समान ही मनाये जाते हैं। पंजाब की बैसाखी यानी नववर्ष के उत्साह का सोंधी माटी या खेतों में लहलहाती हरी फसल-सा अपार आनंद। सिंधी समाज में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘चेटीचंड’ के रूप में मनाने की प्रथा है। कश्मीर में भारतीय नववर्ष ‘नवरेह’ के रूप में मनाया जाता है। सिक्किम में भारतीय नववर्ष तिब्बती पंचांग के दसवें महीने के 18वें दिन मनाने की परंपरा है।

सृष्टि साक्षी है कि जब कभी, जो कुछ नया आया, पहले से अधिक विकसित एवं कालानुरूप आया। हम बनाये रखें परंपरा नवागत की, नववर्ष की, उत्सव के हर्ष की। साथ ही संकल्प लें अपने को बदलने का, खुद में बेहतर बदलाव का। इन पंक्तियों के लेखक की कविता है-

न राग बदला, न लोभ, न मत्सर,

बदला तो बदला केवल संवत्सर।

परिवर्तन का संवत्सर केवल काग़ज़ों तक सीमित न रहे। हम जीवन में केवल वर्ष ना जोड़ते रहें बल्कि वर्षों में जीवन फूँकना सीखें। मानव मात्र के प्रति प्रेम अभिव्यक्त हो, मानव स्वगत से समष्टिगत हो।

सभी पाठकों को शुभ गुढी पाडवा। नव संवत्सर आप सबके लिए शुभ हो।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७२ – लघुकथा – सार्थकता ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – लघुकथा – सार्थकता।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७२ ☆

☆ लघुकथा – सार्थकता ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

खेत में खड़े बिजूकों को देखकर हैलमेटों ने तंज कसा- “हम तो अपने मालिकों की जान बचाते हैं, तुम्हारा जीवन व्यर्थ है।”

एक बिजूका बोला- ‘तुम जरखरीद गुलाम सिर्फ अपने मालिक के काम आते हो। हम अपने और तुम्हारे मालिकों के साथ सबका पेट भरने के लिए दिन में धूप और रात में अँधेरे से जूझते हैं।’

निरुत्तर हैलमेट अगली सुबह खेतों में खड़े थे बिजूका बनकर।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१७.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares