हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना फागुन की चिट्ठी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी

मेरे प्रकृति-मित्रों,

मैं फागुन हूँ। हर साल चुपचाप तुम्हारे आँगन में उतर आता हूँ—कभी हल्की हवा बनकर, कभी फूलों की खुशबू बनकर, कभी किसी पेड़ की नई कोपल में छिपकर। जब तुम Holi के रंगों में भीगते हो, तब मुझे सबसे ज़्यादा आनंद होता है।

रंग उड़ते हैं, हँसी गूँजती है, और मन जैसे थोड़ी देर के लिए फिर से बच्चा हो जाता है।

पर इस बार मैं तुमसे एक छोटी-सी विनती करना चाहता हूँ।

जब तुम अपने प्रियजनों को गुलाल लगाओ, तो एक चुटकी गुलाल अपने आँगन के किसी पौधे के नाम भी रख देना। उस तुलसी के पास, उस छोटे से नीम या अमरूद के पेड़ के पास, या उस बेल के पास जो चुपचाप तुम्हारी दीवार थामे खड़ी है।

हल्के से उसके तने को छूकर कहना—

“तुम भी हमारे उत्सव के साथी हो।”

क्योंकि पौधे केवल हरियाली नहीं होते।

वे हमारी साँसों की शांति हैं,

हमारी थकान की छाया हैं,

और हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।

हमारी परंपराओं में उन्हें कभी देवता माना गया, कभी पूर्वजों का रूप। शायद इसलिए कि वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, हमें जीवन देते रहते हैं।

अगर इस होली तुम एक चुटकी गुलाल पौधों को भी लगा दोगे, तो यह केवल एक प्रतीक नहीं होगा—यह प्रकृति से दोस्ती का एक छोटा-सा वचन होगा।

और तब शायद तुम्हें महसूस होगा कि हवा भी थोड़ी और मधुर हो गई है,

पत्ते भी हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे हैं,

और तुम्हारे आँगन में खड़ा हर पेड़ मन ही मन कह रहा है—

“अब सच में फागुन आया है।”

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२ – व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२

☆ व्यंग्य – बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।

“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”

हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”

बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”

“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।

सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।

सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।

अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।

सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।

बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।

उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।

—– 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

29-01- 2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८८ ☆ बाल गीत – सुंदर-सुंदर लिखतीं लेख… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८८ ☆ 

बाल गीत – सुंदर-सुंदर लिखतीं लेख ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

चिड़ियाँ आईं पास अनेक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

कोई लिखती नया पहाड़ा।

नहीं सताए उनको जाड़ा।

सुख – दुख में वे रहतीं एक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

प्रकृति उनकी जीवन साथी।

भोर जगें वे करें सुप्रभाती।

सादा जीवन करता नेक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

पंखों का नित कम्बल ओढ़ें।

नहीं कभी वे रुपया जोड़ें।

करतीं हैं सबका अभिषेक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

 *

झूठ न बोलें कभी बिचारी।

सदा रखें अपनी हुशियारी।

कभी न खाएँ , चाउमीन केक।

सुंदर – सुंदर लिखतीं लेख।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८४ – सोबती…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८४ – विजय साहित्य ?

☆ सोबती…!

वेळ द्यायचा कुणाला

वैयक्तीक गोष्ट ठरे

जिवलग मित्रासाठी

पाझरती स्नेहझरे..! १

*

नसे मैत्रीत हिशोब

असे प्रेम जीवापाड

नाही लपू देत कुणा

संशयाच्या दाराआड…!२

*

मैत्री नाही व्यवहार

नाही‌ स्वार्थी देणे घेणे

निरालस अपेक्षांचे

जाते देऊनीया देणे…!३

*

शब्दाविना जिथे जिथे

काढी आवर्जून वेळ

त्याच नात्यामधे जमे

जीवलग मैत्री मेळ…!४

*

कोणत्याही अटीविना

नाते मैत्रीचे टिकेल

अविश्वास संशयाला

तिथे निरोप मिळेल…!५

*

कुणासाठी द्यावा वेळ

नाही सांगावे लागत

जिथे वाहे स्नेह झरा

तिथे येतसे धावत…!६

*

त्याच त्याच चुका जेव्हा

सवयींचा होती भाग

नाते निखळ मैत्रीचे

जाते लावूनीया आग..!७

*

नको अपेक्षांचे ओझे

करा मित्रांची कदर

वेळ वाईट‌ येताच

धरा मैत्रीचा पदर…! ८

*

समर्थन पडे थिटे

फाटे कारणांची झोळी

दोष स्वभावाचे करी

सुखी जीवनाची होळी…!९

*

आहे ताकद तोवर

पैसा खेळतो हातात

आयुष्याच्या‌ संध्याकाळी

हवा‌ सोबती दारात…!१०

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- सगळं सुरळीत पार पडणार हेच मी गृहीत धरलं होतं आणि ते गृहितच असं चुकीचं ठरू पहात होतं. त्यामुळेच सहजसाध्य वाटणारंच आता अप्राप्य होऊन बसलं. म्हणूनच माझी चलबिचल सुरू झाली आपल्या हक्काचं कांहीतरी नाकारलं जात असल्याची रुखरुख माझं मन पोखरू लागली.

 अखेर काय निष्पन्न होणार हे नेहमीप्रमाणे ‘तो’च तर ठरवणार होता!)

मी स्वतःचीच अशी समजूत घातली खरी पण तरीही त्या रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली तेव्हा पुन्हा हेच सगळे विचार मनात गर्दी करू लागले.

“आपण नंतर बोलू यावर, ठरवू काय करायचं ते.. “असं वखरेसाहेब म्हणाले होते. पण ठरवू म्हणजे कधी? अर्ज करायची मुदत तर एक एक दिवस संपत चालली होती. आणि ‘ठरवू काय ते’ म्हणजे काय? त्यांनीच ठरवायचं कां? की मी? मीच जर ठरवायचं असेल तर मी ते ठरवलं होतंच ना? पण हायर मॅनेजमेंटला फक्त

अनप्रॉडक्टिव्ह स्टाफच कमी करायचा होता म्हणे. पण उर्वरित स्टाफपैकी ज्यांचे हितसंबंध अडचणीत येतील ते लिटिगेशन्स सुरू करण्याची शक्यता गृहित धरून सदर योजनेच्या नियमावलीत ही योजना सर्वांसाठीच खुली ठेवली गेली होती. हायर ऑथाॅरिटीज् कडून त्यामुळेच सर्व झोनल व रीजनल हेडस् ना बँकेतील संपूर्ण कारकीर्द चांगली असणाऱ्या स्टाफ मेंबर्सना सदर योजनेचा लाभ घेण्यापासून परावृत्त करण्याच्या तोंडी तरीही स्पष्ट सूचना देण्यात आलेल्या होत्या!!

अशा सगळ्या पार्श्वभूमीवर सदर योजनेचा लाभ घेणे कायद्यानुसार मला शक्य असूनही, वखरेसाहेबांना दुखवून कांही करण्याची माझी इच्छा नव्हती. पूर्ण विचारांती मला जाणवले ते हेच की आपल्याला या संधीचा लाभ घेता येणार नाही या विचाराने नव्हे, तर वखरे साहेबांना दुखवून तो लाभ मला घ्यावा लागेल या शक्यतेचा मला त्रास होतोय. हे जाणवलं आणि मन थोडं शांत झालं. आपण फार घाई गडबड न करता एक-दोन दिवस वाट बघून, त्यांचा कल पाहून त्यांच्याशी बोलू. आपली नेमकी बाजू त्यांना पटवून देऊ. पुढं काय करायचं ते ते वेळ येईल तेव्हा ठरवू असा विचार केला आणि मी निश्चिंत झालो.

याबाबतचे विचार आणि चलबिचल वखरेसाहेबांच्या मनातही होतीच हे मला दुसऱ्या दिवशी बँकेत गेल्यानंतर लगेचच जाणवलं. कारण मी कांही कामानिमित्त त्यांच्या केबिनमधे गेलो तेव्हा माझं नेमकं काय काम आहे हे जाणून न घेता त्यांनी मी या विषयाबद्दलच बोलायला आलोय हे गृहितच धरलं असावं तसं मला विचारलं,

” मग काय ठरलं तुमचं? “

प्रश्न अनपेक्षित होता. त्यामुळे पटकन् मला काय बोलावं सुचेना. पण तरीही मला हा निर्णय घेण्यामागची कांहीतरी वेगळीच खोटी कारणं पुढे करणं किंवा अगदी हिशोबीपणाने बोलून माझ्या निर्णयाचं समर्थन करणं नको होतं. मला या निर्णयापर्यंत येण्यामागची माझी खरी भूमिका अतिशय मोकळेपणाने त्यांना सांगायची होती आणि त्यासाठी हीच वेळ योग्य आहे हे लक्षात आलं. तरीही, त्यांनी मला विचारलं म्हणून लगेच उतावीळपणाने कांही बोलण्यापेक्षा मला थोडं थांबावंसं वाटलं म्हणून मी म्हंटलं,…

“आपण नंतर सविस्तर बोलू असं म्हणाला होतात ना तसं आत्ता तुम्ही बिझी असाल तर एक-दोन दिवसांनी हवंतर बोलूया कां? “

” तसं तर कामं कधीच संपणार नाहीयत. केव्हातरी बोलायला हवंच. बसा. आधी तुम्ही कशासाठी आला होतात ते काम आवरू, मग बोलू. ” ते मनापासून म्हणाले.

” ते महत्त्वाचं असलं तरी तसं खूप अर्जंट नाहीय. आॅडिट रिपोर्टवरील क्वेरीजच्या रिप्लायचा ड्राफ्ट मी बनवलाय. तो दाखवायला आलो होतो. तुम्ही एकदा बघून घेतलात तर… “

मी पुढे केलेली फाईल त्यांनी हातात घेतली आणि टेबलवर बाजूला ठेवून दिली.

” ते मी नंतर वाचून बघतो. मग? काय ठरलं तुमचं? ” त्यांनी थेट विषयालाच हात घातला.

“या स्वेच्छानिवृत्ती योजनेकडे मी मला उमेदीच्या वयात मिळणारं १० वर्षांचं ‘बोनस लाईफ’ म्हणून बघतो. ” मी सांगू लागलो. या निर्णय प्रोसेसमधे माझ्या मनात येऊन गेलेले उलटसुलट विचारच निर्णयाची अंमलबजावणी करण्यापूर्वी स्वत:शीच एकदा तपासून पहावेत तशा प्रामाणिकपणाने मी बोलत राहिलो. माझं आर्थिक नियोजन, इतकी वर्षं मला मनासारखे जोपासता न आलेले माझे आवडते छंद, करायची तीव्र इच्छा असूनही केवळ वेळेअभावी करता न आलेल्या आणि दहा वर्षानंतर कदाचित सगळी उमेद/उत्साह संपून गेल्यानंतर इतक्या असोशीने पुढे कधी करता यायची शक्यताच नसलेल्या अशा कितीतरी गोष्टी, सगळं त्यांना अगदी मोकळेपणानं सांगून टाकलं.

“घरी बोललायत हे सगळं? “

” नाही. कारण बायको आणि मुलगा दोघांनाही हे सगळं माहिती आहे. आर्थिक नियोजनाबद्दल मात्र मी त्यांच्याशी मोकळेपणाने बोललोय. संपूर्ण घरखर्च आणि संसारातल्या माझ्या इतरही सगळ्याच जबाबदाऱ्या या स्वेच्छानिवृत्तीनंतर मिळणाऱ्या अतिरिक्त आर्थिक लाभातूनच व्यवस्थित मॅनेज होऊ शकतायत याचीही त्यांना कल्पना दिलीय. माझा मुलगा हुशार आहे. तो सी. ए. ची तयारी करतोय. इंजीनियरिंग किंवा मेडिकलला न गेल्यामुळे त्याच्या शिक्षणाचा खर्च तसा कांहीच नाहीय. उलट त्याने ‘स्वेच्छानिवृत्ती स्वीकारल्यानंतर तुम्ही पैसे कमावण्यासाठी दुसरीकडे कुठेही नोकरी करायची नाही’ अशी अटच घातलीय. या निवृत्तीमुळे मला न मिळू शकणारी एकच गोष्ट म्हणजे एरवी मिळण्याची शक्यता असलेली पुढची प्रमोशन्स! पण त्याचा हव्यास मला यापूर्वीही कधी नव्हताच. आजपर्यंत त्या त्या वेळी मला सगळं मिळत गेलंय आणि जे मिळालं त्यात मला समाधान आहे. एरवीही यापुढच्या उच्चाधिकार पदांपासून मिळणारं समाधान किती फसवं आहे याचा अनुभव आपल्यापैकी सर्वजण घेत आहोतच ना साहेब? त्यापेक्षा स्वेच्छानिवृत्ती नंतर मी आधी सांगितलेल्या सर्व गोष्टींमधून मला मिळणारं समाधान माझ्यासाठी अधिक मोलाचं असेल. “

वखरेसाहेब शांतपणे ऐकत होते.

” हे खरंतर योग्यच आहे, पण एम्. डीं च्या सूचनांचं काय करायचं? ते ऐकून घेण्याच्या मन:स्थितीत असणं शक्यच नाही.. ” त्यांच्या बोलण्यातली असहायता मलाही अस्वस्थ करून गेली.

” एक मार्ग आहे सर.. ” मी म्हणालो आणि अगदी ऐनवेळी आपल्याला हे नेमकं सुचलंच कसं याचं मलाच आश्चर्य वाटू लागलं.

“कोणता मार्ग? ” त्यांनी उत्सुकतेने विचारलं.

“मी सर्क्युलरनुसार योग्य मुदतीत माझा अर्ज सबमिट करतो. त्याखेरीज बँकेचं हित लक्षात घेऊन माझा स्वेच्छानिवृत्तीचा अर्ज

मॅनेजमेंटने नाकारला, तर मी बँकेचा निर्णय विनातक्रार स्वीकारेन आणि त्याविरुद्ध कोणतीही लिटिगेशन्स सुरू करणार नाही असं लेखी आश्वासनही मी तुमच्याकडे देऊन ठेवीन. “

“त्याने काय होईल? “

“मॅनेजमेंटला लिटिगेशन्सचीच भीती आहे ना? माझ्याबाबतीत तरी ती रहाणार नाही. आणि त्याचा मला फायदा एकच. उद्या माझ्यापुढे कशी वेळ येईल आज सांगता येणार नाही. कोणत्याही प्रकारचे मतभेद निर्माण झाले तर तेव्हाचे माझे वरिष्ठ “तुम्हाला बँकेने बाहेर पडायचा मार्ग खुला करून दिला होता ना? जबाबदाऱ्या झेपणार नव्हत्या तर तेव्हाच बाहेर पडायला हवं होतंत” असं मला म्हणाले तर मला मिळालेलं स्वेच्छानिवृत्ती नाकारल्याचं पत्र एखाद्या ‘सन्मानपूर्वक सर्टिफिकेट’ सारखं मी त्यांना दाखवू तरी शकेन. साहेब, इथे काही दिवसांपूर्वीच झालेल्या तुमच्या केबिनमधल्या एम्. डी. मीटिंग मधली, तुमचा कांहीही दोष नसताना तुम्हाला दिली गेलेली अपमानास्पद वागणूक आणि त्यावेळी तुमची झालेली मनोवस्था मी स्वतःच्या डोळ्यांनी पाहिली तेव्हाच आपण जसजसे वर जाऊ तसतशी तिथली हवाही कशी विरळ होत जाणाराय याचं प्रत्यंतर आपल्यापैकी सर्वांना आलेलं आहेच. आणि आज तेच मला योग्य दिशा दाखवून गेलंय. ही स्वेच्छानिवृत्ती त्यामुळेच मला आयुष्यात फक्त एकदाच उपलब्ध होणारी अमूल्य संधी वाटतेय एवढंच. “

वखरेसाहेब मंत्रमुग्ध होऊन ऐकत होते. माझं बोलणं संपलं तसं ते भानावर आले. समोरच्या ग्लासमधलं घोटभर पाणी पिऊन ते शांतपणे म्हणाले,

” खरं आहे तुमचं. माझ्याकडून तुम्हाला कोणतीच अडचण निर्माण होणार नाही. आणि ते लेखी पत्र वगैरे द्यायचीही कांही गरज नाहीय. वरून कुणी कांही विचारलंच तर त्यांना काय सांगायचं ते मी बघेन. यू गो अहेड.. “

अतिशय अनपेक्षितपणे माझ्या डोक्यावरचं ओझं त्यांनी किती अलगद उतरवून घेतलं होतं! त्यांचे आभार मानून मी जायला वळणार एवढयांत त्यांनी मला थांबवलं.

“लिमये, माझ्या घरच्या जबाबदाऱ्या अजून पूर्ण व्हायच्यात. त्या झाल्या असत्या तर आज मीही हाच निर्णय घेतला असता. सोs… यू आर आॅन राईट ट्रॅक. आॅल द बेस्ट. एंजाॅय अॅण्ड बी हॅप्पी…! “

त्याचं बोलणं हे माझ्यासाठी सदिच्छाच नव्हत्या फक्त तर त्यांच्या तोंडून ‘तो’ च देत असावा असा शभाशीर्वादही होता…!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१५ – कविता – ☆ होली की हुडदंग, मेरे देश में… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता होली की हुडदंग, मेरे देश में” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१५ 

☆ होली की हुडदंग, मेरे देश में… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

(रंगपर्व होली की शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत एक गीत)

बड़ी जोर से मची हुई है, होली की हुड़दंग

 मेरे देश में ।

 वैमनस्य, अलगाव, मज़हबी, राजनीति के रंग

 मेरे देश में।।

 

कोरोना के कहर से ज्यादा

राजनीति जहरीली

कुर्सी के कीड़े ने कर दी

सबकी गाँठें ढीली,

कभी इधर औ’ कभी उधर से

फूट रहे गुब्बारे

गुमसुम जनता मन ही मन में

हो रही काली-पीली

आवक-जावक खेल सियासी

खा कर भ्रम की भंङ्ग

मेरे देश में।।

 

 विविध रंग परिधानों में

 देखो प्रगति की बातें

 आश्वासनी पुलावों की है

 जनता को सौगातें,

 भाषण औ’आश्वासन सुन कर

 दूर करो गम अपने

 अलग अलग सुर में सब

 अपनी अपनी राग सुनाते,

 लोकतंत्र या शोकतंत्र के, कैसे-कैसे ढंग

 मेरे देश में

 भूख गरीबी वैमनस्य के भ्रष्टाचारी रंग

 मेरे देश में।

 

 रक्तचाप बढ़ गए,

 धरोहर मौन मीनारों के

 सिमट गई पावन गंगा,

 अपने ही किनारों से,

 झाँक रहे शिवलिंग,

 बिल्व फल फूल नहीं मिलते

 झुलस रहा आकाश

 फरेबी झूठे नारों से,

 बैठ कुर्सियों पर अगुआ, लड़ रहे परस्पर जंग

 मेरे देश में

 भूख गरीबी, वैमनस्य के भ्रष्टाचारी रंग

 मेरे देश में।

 

 ये भी वही और वे भी वही

 किस पर विश्वास करें

 होली पर कैसे, किससे

 क्योंकर परिहास करें,

 कहने को जनसेवक

 लेकिन मालिक ये बन बैठे

 इन सफेदपोशों पर

 कैसे हम विश्वास करें,

 मुँह खोलें या पर बंद रखें, पर पेट रहेगा तंग

 मेरे देश में

 भूख गरीबी वैमनस्य के भ्रष्टाचारी रंग

 मेरे देश में।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३६ ☆ पूछ रहे हैं यारी क्या है ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पूछ रहे हैं यारी क्या है ?” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३६ ☆ पूछ रहे हैं यारी क्या है ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

अपने दुःख से भारी क्या है

सुख की हिस्सेदारी क्या है ।

*

मज़हब अब धंधा लगता है

पूजा भजन पुजारी क्या है ।

*

नहीं जानते दाँव-पेंच हम

क्या जानें मक्कारी क्या है ।

*

उन्हें नहीं अहसास भूख का

रोटी की लाचारी क्या है ।

*

लेकर के हाथों में खंजर

पूछ रहे हैं यारी क्या है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४१ ☆ तरही ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तरही ग़ज़ल“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४१ ☆

✍ तरही ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ठसक दिखती अबध के आज भी इसमें नवाबों की

झलक मिलती नहीं है आदमी में एहतिसाबों की

लरजते होंठ नम आँखें ये बिखरे ठूठ सिगरिट के

बयाँ करते है मेरी दास्ताँ बस इज़्तिराबों की

 *

ये पूजीवाद के हामी समझ लें वक़्त की आहट

उठी है आधियाँ चारों तरफ से इंक़लाबों की

 *

ग़मों के शहर में रहकर समझ में आ गया मुझको

किताबे ज़ीस्त में कितनी कमी खुशियों के बाबों की

 *

ज़ुबाँ ख़ामोश है आँखों में है मंज़र तबाही का

मुसल्लत हैं मेरे दिल पर अभी घड़ियाँ अजाबों की

 *

कभी ज़ुल्मो सितम की टूटना तय है सिलासिल का

सदा कब तक दबाई जाएगी आखिर इताबों की

 *

मुआफ़िक ढाल कर हर हाल में है जानती चलना

बड़ी दुश्वार होती ज़िंदगी यारो सराबों की

 *

सजाए जिसके आँखों में  किया तन्हा वही मुझको

उठाये फिर रहा हूँ लाश मैं अपने ही ख़्वाबों की

*

उदासी साथ मेरे ओढ़ कर शामो-सहर बैठे

नहीं अब रास आती सुर्ख कलियाँ भी गुलाबों की

 *

न जाने गुल मेरे किस हाल में होगें जो रख भेजे

अरुण को फ़िक़्र बिलकुल भी नहीं है उन किताबों की

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४६ – ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती।)

✍ ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती… ☆ श्री हेमंत तारे  

कुछ और लफ़्फ़ाजी कर लिया करो

बस, तहम्मुल की तनकीद मत किया करो

किबला, ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती

शहद न सही, पर जहर तो न घोला करो

 *

जिस के बूते तुम इकतीदार क़ाबीज़ हुए

वो राम है जनाब, उसे याद कर लिया करो

 *

बहुत हो गयी नफ़रत की सियासत यारों

मुहब्बत की दुकान है खुली, वहां जाम टकराया करो

 *

फिर रहें है कई चाक-दामन ओढे हुए

कभी नये कपडे खरीदो, उनको पहनाया करो

 *

हिक़ारत ने उन्हें अंधा कर दिया “हेमंत”

बेनियाज़ है गुल उन्हें देखो और  दिखाया करो

लफ़्फ़ाजी = वाचालता, बकवास, ज़ैब = शोभा, क़िबला = महाशय, तनकीद = समीक्षा, तहम्मुल = सहिष्णुता, इकतीदार = सत्ता, पद, क़ाबिज़ = कब्जा, चाक- दामन= फटाआंचल, हिकारत = घृणा, बेनियाज़ = स्वतंत्र, बेपरवाह

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५५ ☆ कविता – होली… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  – “होली“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५५ ☆

✍ कविता – होली… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

*

हो  ली सो होली अब तक

आज तो प्रेम करो सबको,

जली होलिका स्वयं  ही में

प्रल्हादी जीवन दो सबको।

*

एक रंग में रँगे जो दोनों

राधा श्याम बना दो सबको,

प्रेम रंग में सब रँग जाएँ

नफ़रत से उबार दो सबको।

*

स्वागत नये अन्न  का करके

भूख विहीन कर दो सबको,

क्या बच्चा,  क्या बूढ़ा जवां

खुशियाों से भर दो सबको।

*

जात धर्म भाषाई दुराव

होली में जला दो सबको,

हिल मिल खेलो होली तब

प्रेम रंग में डुबा दो सबको।

*

यह होली का त्यौहार

भारत का संदेश हो सबको

ऐसे खेलो होली मित्रों

 चकित करा दो जगको।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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