(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “फागुन की चिट्ठी…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी… ☆
मेरे प्रकृति-मित्रों,
मैं फागुन हूँ। हर साल चुपचाप तुम्हारे आँगन में उतर आता हूँ—कभी हल्की हवा बनकर, कभी फूलों की खुशबू बनकर, कभी किसी पेड़ की नई कोपल में छिपकर। जब तुम Holi के रंगों में भीगते हो, तब मुझे सबसे ज़्यादा आनंद होता है।
रंग उड़ते हैं, हँसी गूँजती है, और मन जैसे थोड़ी देर के लिए फिर से बच्चा हो जाता है।
पर इस बार मैं तुमसे एक छोटी-सी विनती करना चाहता हूँ।
जब तुम अपने प्रियजनों को गुलाल लगाओ, तो एक चुटकी गुलाल अपने आँगन के किसी पौधे के नाम भी रख देना। उस तुलसी के पास, उस छोटे से नीम या अमरूद के पेड़ के पास, या उस बेल के पास जो चुपचाप तुम्हारी दीवार थामे खड़ी है।
हल्के से उसके तने को छूकर कहना—
“तुम भी हमारे उत्सव के साथी हो।”
क्योंकि पौधे केवल हरियाली नहीं होते।
वे हमारी साँसों की शांति हैं,
हमारी थकान की छाया हैं,
और हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।
हमारी परंपराओं में उन्हें कभी देवता माना गया, कभी पूर्वजों का रूप। शायद इसलिए कि वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, हमें जीवन देते रहते हैं।
अगर इस होली तुम एक चुटकी गुलाल पौधों को भी लगा दोगे, तो यह केवल एक प्रतीक नहीं होगा—यह प्रकृति से दोस्ती का एक छोटा-सा वचन होगा।
और तब शायद तुम्हें महसूस होगा कि हवा भी थोड़ी और मधुर हो गई है,
पत्ते भी हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे हैं,
और तुम्हारे आँगन में खड़ा हर पेड़ मन ही मन कह रहा है—
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – “बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४२ ☆
☆ व्यंग्य – बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।
“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”
हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”
बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।
हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”
“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।
सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।
सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।
अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।
सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।
बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।
इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।
उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(पूर्वसूत्र- सगळं सुरळीत पार पडणार हेच मी गृहीत धरलं होतं आणि ते गृहितच असं चुकीचं ठरू पहात होतं. त्यामुळेच सहजसाध्य वाटणारंच आता अप्राप्य होऊन बसलं. म्हणूनच माझी चलबिचल सुरू झाली आपल्या हक्काचं कांहीतरी नाकारलं जात असल्याची रुखरुख माझं मन पोखरू लागली.
अखेर काय निष्पन्न होणार हे नेहमीप्रमाणे ‘तो’च तर ठरवणार होता!)
मी स्वतःचीच अशी समजूत घातली खरी पण तरीही त्या रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली तेव्हा पुन्हा हेच सगळे विचार मनात गर्दी करू लागले.
“आपण नंतर बोलू यावर, ठरवू काय करायचं ते.. “असं वखरेसाहेब म्हणाले होते. पण ठरवू म्हणजे कधी? अर्ज करायची मुदत तर एक एक दिवस संपत चालली होती. आणि ‘ठरवू काय ते’ म्हणजे काय? त्यांनीच ठरवायचं कां? की मी? मीच जर ठरवायचं असेल तर मी ते ठरवलं होतंच ना? पण हायर मॅनेजमेंटला फक्त
अनप्रॉडक्टिव्ह स्टाफच कमी करायचा होता म्हणे. पण उर्वरित स्टाफपैकी ज्यांचे हितसंबंध अडचणीत येतील ते लिटिगेशन्स सुरू करण्याची शक्यता गृहित धरून सदर योजनेच्या नियमावलीत ही योजना सर्वांसाठीच खुली ठेवली गेली होती. हायर ऑथाॅरिटीज् कडून त्यामुळेच सर्व झोनल व रीजनल हेडस् ना बँकेतील संपूर्ण कारकीर्द चांगली असणाऱ्या स्टाफ मेंबर्सना सदर योजनेचा लाभ घेण्यापासून परावृत्त करण्याच्या तोंडी तरीही स्पष्ट सूचना देण्यात आलेल्या होत्या!!
अशा सगळ्या पार्श्वभूमीवर सदर योजनेचा लाभ घेणे कायद्यानुसार मला शक्य असूनही, वखरेसाहेबांना दुखवून कांही करण्याची माझी इच्छा नव्हती. पूर्ण विचारांती मला जाणवले ते हेच की आपल्याला या संधीचा लाभ घेता येणार नाही या विचाराने नव्हे, तर वखरे साहेबांना दुखवून तो लाभ मला घ्यावा लागेल या शक्यतेचा मला त्रास होतोय. हे जाणवलं आणि मन थोडं शांत झालं. आपण फार घाई गडबड न करता एक-दोन दिवस वाट बघून, त्यांचा कल पाहून त्यांच्याशी बोलू. आपली नेमकी बाजू त्यांना पटवून देऊ. पुढं काय करायचं ते ते वेळ येईल तेव्हा ठरवू असा विचार केला आणि मी निश्चिंत झालो.
याबाबतचे विचार आणि चलबिचल वखरेसाहेबांच्या मनातही होतीच हे मला दुसऱ्या दिवशी बँकेत गेल्यानंतर लगेचच जाणवलं. कारण मी कांही कामानिमित्त त्यांच्या केबिनमधे गेलो तेव्हा माझं नेमकं काय काम आहे हे जाणून न घेता त्यांनी मी या विषयाबद्दलच बोलायला आलोय हे गृहितच धरलं असावं तसं मला विचारलं,
” मग काय ठरलं तुमचं? “
प्रश्न अनपेक्षित होता. त्यामुळे पटकन् मला काय बोलावं सुचेना. पण तरीही मला हा निर्णय घेण्यामागची कांहीतरी वेगळीच खोटी कारणं पुढे करणं किंवा अगदी हिशोबीपणाने बोलून माझ्या निर्णयाचं समर्थन करणं नको होतं. मला या निर्णयापर्यंत येण्यामागची माझी खरी भूमिका अतिशय मोकळेपणाने त्यांना सांगायची होती आणि त्यासाठी हीच वेळ योग्य आहे हे लक्षात आलं. तरीही, त्यांनी मला विचारलं म्हणून लगेच उतावीळपणाने कांही बोलण्यापेक्षा मला थोडं थांबावंसं वाटलं म्हणून मी म्हंटलं,…
“आपण नंतर सविस्तर बोलू असं म्हणाला होतात ना तसं आत्ता तुम्ही बिझी असाल तर एक-दोन दिवसांनी हवंतर बोलूया कां? “
” तसं तर कामं कधीच संपणार नाहीयत. केव्हातरी बोलायला हवंच. बसा. आधी तुम्ही कशासाठी आला होतात ते काम आवरू, मग बोलू. ” ते मनापासून म्हणाले.
” ते महत्त्वाचं असलं तरी तसं खूप अर्जंट नाहीय. आॅडिट रिपोर्टवरील क्वेरीजच्या रिप्लायचा ड्राफ्ट मी बनवलाय. तो दाखवायला आलो होतो. तुम्ही एकदा बघून घेतलात तर… “
मी पुढे केलेली फाईल त्यांनी हातात घेतली आणि टेबलवर बाजूला ठेवून दिली.
” ते मी नंतर वाचून बघतो. मग? काय ठरलं तुमचं? ” त्यांनी थेट विषयालाच हात घातला.
“या स्वेच्छानिवृत्ती योजनेकडे मी मला उमेदीच्या वयात मिळणारं १० वर्षांचं ‘बोनस लाईफ’ म्हणून बघतो. ” मी सांगू लागलो. या निर्णय प्रोसेसमधे माझ्या मनात येऊन गेलेले उलटसुलट विचारच निर्णयाची अंमलबजावणी करण्यापूर्वी स्वत:शीच एकदा तपासून पहावेत तशा प्रामाणिकपणाने मी बोलत राहिलो. माझं आर्थिक नियोजन, इतकी वर्षं मला मनासारखे जोपासता न आलेले माझे आवडते छंद, करायची तीव्र इच्छा असूनही केवळ वेळेअभावी करता न आलेल्या आणि दहा वर्षानंतर कदाचित सगळी उमेद/उत्साह संपून गेल्यानंतर इतक्या असोशीने पुढे कधी करता यायची शक्यताच नसलेल्या अशा कितीतरी गोष्टी, सगळं त्यांना अगदी मोकळेपणानं सांगून टाकलं.
“घरी बोललायत हे सगळं? “
” नाही. कारण बायको आणि मुलगा दोघांनाही हे सगळं माहिती आहे. आर्थिक नियोजनाबद्दल मात्र मी त्यांच्याशी मोकळेपणाने बोललोय. संपूर्ण घरखर्च आणि संसारातल्या माझ्या इतरही सगळ्याच जबाबदाऱ्या या स्वेच्छानिवृत्तीनंतर मिळणाऱ्या अतिरिक्त आर्थिक लाभातूनच व्यवस्थित मॅनेज होऊ शकतायत याचीही त्यांना कल्पना दिलीय. माझा मुलगा हुशार आहे. तो सी. ए. ची तयारी करतोय. इंजीनियरिंग किंवा मेडिकलला न गेल्यामुळे त्याच्या शिक्षणाचा खर्च तसा कांहीच नाहीय. उलट त्याने ‘स्वेच्छानिवृत्ती स्वीकारल्यानंतर तुम्ही पैसे कमावण्यासाठी दुसरीकडे कुठेही नोकरी करायची नाही’ अशी अटच घातलीय. या निवृत्तीमुळे मला न मिळू शकणारी एकच गोष्ट म्हणजे एरवी मिळण्याची शक्यता असलेली पुढची प्रमोशन्स! पण त्याचा हव्यास मला यापूर्वीही कधी नव्हताच. आजपर्यंत त्या त्या वेळी मला सगळं मिळत गेलंय आणि जे मिळालं त्यात मला समाधान आहे. एरवीही यापुढच्या उच्चाधिकार पदांपासून मिळणारं समाधान किती फसवं आहे याचा अनुभव आपल्यापैकी सर्वजण घेत आहोतच ना साहेब? त्यापेक्षा स्वेच्छानिवृत्ती नंतर मी आधी सांगितलेल्या सर्व गोष्टींमधून मला मिळणारं समाधान माझ्यासाठी अधिक मोलाचं असेल. “
वखरेसाहेब शांतपणे ऐकत होते.
” हे खरंतर योग्यच आहे, पण एम्. डीं च्या सूचनांचं काय करायचं? ते ऐकून घेण्याच्या मन:स्थितीत असणं शक्यच नाही.. ” त्यांच्या बोलण्यातली असहायता मलाही अस्वस्थ करून गेली.
” एक मार्ग आहे सर.. ” मी म्हणालो आणि अगदी ऐनवेळी आपल्याला हे नेमकं सुचलंच कसं याचं मलाच आश्चर्य वाटू लागलं.
“कोणता मार्ग? ” त्यांनी उत्सुकतेने विचारलं.
“मी सर्क्युलरनुसार योग्य मुदतीत माझा अर्ज सबमिट करतो. त्याखेरीज बँकेचं हित लक्षात घेऊन माझा स्वेच्छानिवृत्तीचा अर्ज
मॅनेजमेंटने नाकारला, तर मी बँकेचा निर्णय विनातक्रार स्वीकारेन आणि त्याविरुद्ध कोणतीही लिटिगेशन्स सुरू करणार नाही असं लेखी आश्वासनही मी तुमच्याकडे देऊन ठेवीन. “
“त्याने काय होईल? “
“मॅनेजमेंटला लिटिगेशन्सचीच भीती आहे ना? माझ्याबाबतीत तरी ती रहाणार नाही. आणि त्याचा मला फायदा एकच. उद्या माझ्यापुढे कशी वेळ येईल आज सांगता येणार नाही. कोणत्याही प्रकारचे मतभेद निर्माण झाले तर तेव्हाचे माझे वरिष्ठ “तुम्हाला बँकेने बाहेर पडायचा मार्ग खुला करून दिला होता ना? जबाबदाऱ्या झेपणार नव्हत्या तर तेव्हाच बाहेर पडायला हवं होतंत” असं मला म्हणाले तर मला मिळालेलं स्वेच्छानिवृत्ती नाकारल्याचं पत्र एखाद्या ‘सन्मानपूर्वक सर्टिफिकेट’ सारखं मी त्यांना दाखवू तरी शकेन. साहेब, इथे काही दिवसांपूर्वीच झालेल्या तुमच्या केबिनमधल्या एम्. डी. मीटिंग मधली, तुमचा कांहीही दोष नसताना तुम्हाला दिली गेलेली अपमानास्पद वागणूक आणि त्यावेळी तुमची झालेली मनोवस्था मी स्वतःच्या डोळ्यांनी पाहिली तेव्हाच आपण जसजसे वर जाऊ तसतशी तिथली हवाही कशी विरळ होत जाणाराय याचं प्रत्यंतर आपल्यापैकी सर्वांना आलेलं आहेच. आणि आज तेच मला योग्य दिशा दाखवून गेलंय. ही स्वेच्छानिवृत्ती त्यामुळेच मला आयुष्यात फक्त एकदाच उपलब्ध होणारी अमूल्य संधी वाटतेय एवढंच. “
वखरेसाहेब मंत्रमुग्ध होऊन ऐकत होते. माझं बोलणं संपलं तसं ते भानावर आले. समोरच्या ग्लासमधलं घोटभर पाणी पिऊन ते शांतपणे म्हणाले,
” खरं आहे तुमचं. माझ्याकडून तुम्हाला कोणतीच अडचण निर्माण होणार नाही. आणि ते लेखी पत्र वगैरे द्यायचीही कांही गरज नाहीय. वरून कुणी कांही विचारलंच तर त्यांना काय सांगायचं ते मी बघेन. यू गो अहेड.. “
अतिशय अनपेक्षितपणे माझ्या डोक्यावरचं ओझं त्यांनी किती अलगद उतरवून घेतलं होतं! त्यांचे आभार मानून मी जायला वळणार एवढयांत त्यांनी मला थांबवलं.
“लिमये, माझ्या घरच्या जबाबदाऱ्या अजून पूर्ण व्हायच्यात. त्या झाल्या असत्या तर आज मीही हाच निर्णय घेतला असता. सोs… यू आर आॅन राईट ट्रॅक. आॅल द बेस्ट. एंजाॅय अॅण्ड बी हॅप्पी…! “
त्याचं बोलणं हे माझ्यासाठी सदिच्छाच नव्हत्या फक्त तर त्यांच्या तोंडून ‘तो’ च देत असावा असा शभाशीर्वादही होता…!!
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “होली की हुडदंग, मेरे देश में…” ।)
☆ तन्मय साहित्य # ३१५☆
☆ होली की हुडदंग, मेरे देश में… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
(रंगपर्व होली की शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत एक गीत)
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पूछ रहे हैं यारी क्या है ?” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३६ ☆ पूछ रहे हैं यारी क्या है ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तरही ग़ज़ल…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती…।)
ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “होली… “।)