हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०४ – कविता – ☆ … ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “रोयें कैसे…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०४ ☆

☆ रोयें कैसे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

सब के सम्मुख रोयें कैसे

मौन सिसकते सोयें कैसे।

*

खारे आँसू नमक हो गए

बिना प्रेम जल धोयें कैसे।

*

आना जाना है उस पथ से

उसमें काँटे बोयें कैसे।

*

खेत काट ले जाते कोई

घर में धान उगोयें कैसे।

*

अंतस में जो घर कर बैठी

उन यादों को खोयें कैसे।

*

एक अकेलापन अपना है

इसमें शूल चुभोयें कैसे।

*

जब निद्रा ही नहीं रही तो

सपने कहाँ सँजोएँ कैसे।

*

सबके बीच बैठकर बोलो

अपने नैन भिगोयें कैसे।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपने से ही एक युद्ध” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

वह आँखों में लिए सपने

निकल पड़ा है सड़कों पर

उसके सीने में मची हुई है हलचल

प्यार के रंग में सना हुआ

कुछ बन पाने की चाह लिए

एक उत्साह और उमंग के साथ

कि मिलेगी उसे भी मंजिल

पैरों से मिट्टी को उछालता हुआ

अपने वजूद के सामने बौना करता

दुनिया के तमाम अवरोधक

और सहसा बिखर गया वह सपना

टूट गईं उम्मीद की वे लड़ियाँ

आज वह सिर्फ़ एक चेहरा है

जो अक्सर भीड़ में खोकर भी

बहुत अकेला है

अब न उसके पास सपने हैं

और न ही वे आँखें जिन में समाई थी

सारी कायनात संपूर्ण सृष्टि

वह लड़ रहा है अपने से ही एक युद्ध

निरंतर साँसों के शेष होने तक

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२९ ☆ ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२९ ☆

✍ ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

नाम के सिर्फ ये फ़क़ीर हुए

शाह जैसे सभी वज़ीर हुए

 *

वक़्त कैसे गुज़र गया था वो

जब मैं राँझा वो मेरी हीर हुए

 *

बाँटते मुँह को देख उजियारा

लोग सूरज के यूँ सफीर हुए

 *

अपना घर फूंक राह दिखलाने

दूसरे फिर नहीं कबीर हुए

 *

काम आते नहीं गरीबों के

दिल के छोटे बहुत अमीर हुए

 *

ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी

शायरी की वो यूँ नज़ीर हुए

 *

मैं हूँ मक़तल में सर है जाने को

लोग  मुझको नहीं बशीर हुए

 *

दफ़्न कर लाश एक लाबारिस

कौन कहता है तुम हक़ीर हुए

 *

कैसे उम्मीद में वफ़ा की करूँ

आँख तुम फेरने में कीर हुए

 *

वक़्त पर काम दे दुआ हरदम

आप बेवक़्त ही अधीर हुए

 *

शायरी के कई घरानों में

कोई ग़ालिब तो कोई मीर हुए

 *

रूह सबकी अज़र अमर होती

खाक़ होने सभी शरीर हुए

 *

शौक़ ही शौक में किये जो शुरु

उस नशे के वही असीर हुए

*

शक्ल उनकी ख़ुदा बदल जाती

रूह से जिनके गुम ज़मीर हुए

* 

उनके गालों पे जो मले जाते

हम अरुण वो नहीं अबीर हुए

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३६ – लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे…।)

✍ लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

कर लेते थे दीदार बन्द आंखों से कभी

अब वो बीनाई न रही, ये उम्र का सितम होगा

 *

फिज़ा में तहलील महक का इशारा है

तू परीशाँ न हो, वो यहीं कहीं, आस-पास होगा

 *

सुना है के वो घिरा रहता है रकीबों से

जो वफ़ादार होगा वो ही ईश्क में क़ामयाब होगा

 *

लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे

किया है ईश्क, तो भरपूर भरोसा भी जताना होगा

 *

मलाल न कर ये वक्त भी गुजर जायेगा

चन्द लम्हों कि है बात, अब शम्स जलवागार होगा

 *

इतना बेबस भी न हो, कुछ कदम और चल,

यकीन कर, अगले ख़म पर वाके मयकदा खुला होगा

 *

तू खुशहाल है “हेमंत”, ये महज इत्तेफ़ाक नही

बहुत किया है धूप का सफ़र, ये उसका असर होगा

☆

बीनाई = आंखों की रोशनी, फिज़ा = वातावरण, तहलील = घुली हुई, रकीब = मुहब्बत में प्रतिद्वंदी, पोशिदा = छिपा हुआ, शम्स = सूरज, ख़म = मोड, वाके = स्थित

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४४ ☆ लघुकथा – प्रवृत्ति… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रवृत्ति… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४४ ☆

✍ लघुकथा – प्रवृत्ति… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हर नगर, महानगर में चौक होता है और हर चौक में गाड़ियाों की भीड़। जी हां भीड़। अब भीड़ आदमियों की नहीं होती वरन वाहनों की भी होती है। लेकिन पुणे महानगर के कात्रज चौक की अपनी ही बात है। पुणे को दक्षिण में सातारा, कोल्हापुर व बंगलुरु से जोड़ता है तो दूसरी ओर मुंबई से जोड़ता है। यानी मुंबई बंगलुरु हाईवे पर स्थित है कात्रज चौक। हालांकि नया हाईवे और उस पर लंबी टनल बने कई साल हो गए हैं और बंगलुरू को सीधे जाने वाले वाहन टनल होकर जाते आते हैं फिर भी कात्रज चौक पर वाहनों की भीड़ कम नहीं हुई।

मैं पत्नी के साथ जब शहर की ओर जाता हूँ तो इसी चौक से जाना होता है क्योंकि इस चौक पर हर जगह के बस मिलती है और हमें बस से ही जाना पड़ता है। मैं वृद्धावस्था में कोई गाड़ी चला नहीं पाता और हर समय टैक्सी से जाना आना हो नहीं सकता। मुंबई की ओर से आने वाले पुराने हाईवे के अलावा आंबेगांव खुर्द बुद्रुक जैन मंदिर से और विपरीत कोंढवा से वाहन आते हैं। इसके अलावा एक बड़ा चौड़ा रास्ता स्वारगेट को जाता है शहर में जाने वाला प्रमुख रोड है। मैं जब भी जाता हूँ तो पत्नी के साथ चौक के एक किनारे खड़ा होकर वाहनों के बंद होने और सड़क पार करने की गुंजाइश की तलाश में रहता हूँ परंतु क्या टूव्हीलर क्या फोर व्हीलर और बड़े ट्रक व टैंकर, हरेक को जल्दी जाने की पड़ी रहती है। टू व्हीलर वाले बसों कारों के सामने बाजू से एकदम निकल जाते हैं। हम जैसे बुजुर्गों पर कभी कोई ध्यान नहीं देता। बस छूटने के समय को देखते हुए मैं पत्नी का हाथ पकड़ कर चौक की सड़कों को पार करता हूँ और नजदीक आने वाले वाहनों की ओर हाथ उठाकर रुकने का इशारा करता जाता हूँ। कभी भी किसी वाहन से कुचले जाने का डर बना रहता है। बाहर निकलना अब बंद सा कर दिया है परंतु अस्पताल तो जाना ही पड़ता है। एक घर में हर सदस्य के पास अलग वाहन रखने की प्रवृत्ति से बढ़ते हुए वाहनों की स्थिति और हरेक की जल्दी जाने की प्रवृत्ति ने दिल में अजीब सा डर बिठा दिया है, जिससे न निजात नहीं मिल रही है और न अस्पताल घर आ सकता है। न जाने इस प्रवृत्ति का अंजाम क्या होगा।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९३ – अदृश्य तमाचा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अदृश्य तमाचा।)

☆ लघुकथा # ९३ – अदृश्य तमाचा ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

अमर ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ।

स्वाति तुम मेरे लिए पूरी सब्जी बनाई है नाश्ता क्या बना रही हो?

स्वाति ने कहा – पूरी सब्जी नाश्ते में कर लेना और वही टिफिन में लेते जाना क्योंकि आज मेरे दांत में बहुत दर्द है।

स्वाति तुम्हारे रोज-रोज के नाटक से मैं थक गया हूं।

स्वाति की आंखों से आंसू निकलते रहे और उसने नाश्ते में पोहा बनाया।

पति के ऑफिस जाते ही वह उदास होकर टीवी देखने लग गई, मन में यह सोचने लगी चलो थोड़ा मन बहल जाएगा, तभी अचानक 1:00 बजे के करीब दरवाजे पर आहट होती है, वह दरवाजा खोलती है और बोलती है – अरे! अमर आप इतनी जल्दी घर आ गए।

अमर ने कहा कि – घर आने के लिए भी तुम्हारी इजाज़त लेनी होगी।

स्वाति ने कहा- नहीं क्या हुआ?

अमर मेरे पेट में बहुत जोर से दर्द हो रहा है।

– गैस बन गई है, इंजेक्शन लगवा लिया, दवा ले लिया है थोड़ी देर आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।

अचानक 4:00 बजे उसकी तबीयत ठीक लगती है और वह कहता है – स्वामी मुझे कुछ खाने को दे दो।

उसने कहा – मैंने अपने लिए खिचड़ी बनाई है आपको दूं क्या?

हां दे दो तुम बहुत अच्छी हो धन्यवाद अब तुम्हारे दांत का दर्द कैसा है चलो मैं डॉक्टर को दिखा देता हूं।

स्वाति की आंखों से आंसू निकलने लगते हैं।

और उसने कहा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए मैं रुक गई।

मैंने अपना बैक पैक कर लिया है अब मैं मम्मी के घर जा रही हूं। अपने घर रहकर फिर आऊंगी। आप अपना ध्यान रखना आपके उठने का इंतजार कर रही थी।

अमर उसे देखता रहता है उसे रोकने की कोशिश करता है पर वह एक बात नहीं सुनती और तुरंत चली जाती है। उसे ऐसा एहसास होता है जैसे उसे कोई अदृश्य तमाचा लगा हो ।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९३ ☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९३ ?

☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆

भावनांचे चक्र येथे ना कधीही थांबते

जीवनाचा खेळ आता मी नव्याने खेळते

*

मी कशी सांगू कुणाला वेदना हृदयातली?

कसनुसे आणून हासू चेहरा सांभाळते

*

भाळले होते तुझ्यावर, हे तुला कळलेच ना ,

मी उगाचच हे जगाला सांजवेळी सांगते

*

चेहरा माझा कधीचा पाहिला ना दर्पणी

कालचे प्रतिबिंब माझे मी तुझ्यातच पाहते

*

वादळाची ना तमा, ना आसऱ्याची लालसा

मुक्त झाले या क्षणाला, ही कुडीही त्यागते

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२६ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २६ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२६ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २६ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

जहाँ घृणा के गान मिलेंगे, 

इन्सां लहूलुहान मिलेंगे, 

नफरत फैलाने वालों को 

नहीं राम-रहमान मिलेंगे।

0

बंद नफरत का अगर बाजार हो जाये, 

दुश्मनों से भी हमें यदि प्यार हो जाये, 

चमन यह राष्ट्र का सींचें मुहब्बत से, 

तो हर मौसम गुलो-गुलजार हो जाये।

0

हमारे घर पे आया हर अतिथि भगवान है यारो, 

समूचे विश्व में फैला यहाँ से ज्ञान है यारो, 

जहाँ वेदों, पुराणों ने कहा परिवार दुनिया को 

अहिंसा का पुजारी देश हिन्दुस्तान है यारो।

0

जो सूखा सहरा होता है, 

उसमें जल गहरा होता है, 

जहाँ रहें अनमोल वस्तुएँ 

उन पर ही पहरा होता है।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ ~न्यूयार्क से~ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९१ ☆ “अभिमन्यु कौन?” – लेखक – हेमन्त बावनकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है हेमन्त बावनकर द्वारा लिखित  “अभिमन्यु कौन?” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९१ ☆

☆ “अभिमन्यु कौन?” – लेखक – हेमन्त बावनकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – अभिमन्यु कौन?”

लेखक – हेमन्त बावनकर 

प्रकाशक – किताब राइटिंग पब्लिकेशन, मुंबई 

मूल्य – रु १४९ 

☆ हेमन्त बावनकर का कथा-संग्रह ‘अभिमन्यु कौन?’ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह पुस्तक मध्यमवर्गीय जीवन की यथार्थवादी चित्रण के साथ नैतिक मूल्यों को स्थापित करने वाली आठ कहानियों का संग्रह है। यह प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा की याद दिलाता है जहाँ सामाजिक विसंगतियाँ पात्रों के संवादों से उभरती हैं तथा सकारात्मक समाधान की ओर इशारा करती हैं।

हेमन्त बावनकर

संग्रह पारिवारिक अनुशासन, कार्यालयी चालबाजियाँ, दहेज-कानून का दुरुपयोग, सोशल मीडिया की विडंबनाएँ तथा अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को सरल भाषा में कहानियों में बुनता है।

‘शुभ विवाह’ में कठोर अनुशासनप्रिय पिता के माध्यम से मध्यमवर्गीय विवाह की आर्थिक बाधाएँ चित्रित हैं। रिश्तेदार त्रिपाठी से पैसों का बजट पूछते हुए पाठक का प्रश्न समाज की दहेज को लेकर धारणाओ को उजागर करता है। अंत में विधवा गायत्री के साथ मितव्ययी विवाह तथा संयुक्त फिक्स्ड डिपॉजिट का प्रस्ताव पिता की दूरदर्शिता प्रकट करता है। यह सब मुंशी प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ जैसी कहानी में भाईचारे की याद दिलाता है।

‘हाथी की सवारी’ कार्यालयीन खानापूर्ति का व्यंग्यपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करती है। बड़े बाबू रमेश इंजीनियर के टूलकिट को छिपाकर कहते हैं कि यदि टूलकिट लाए हैं तो यहीं कहीं होगा। मैनेजर को “हाथी की सवारी” कहकर स्पष्टवादिता रेखांकित होती है। यह हरिशंकर परसाई की व्यंग्य परंपरा के समानांतर लगता है।

शीर्षक कहानी ‘अभिमन्यु कौन?’ में प्रोफेसर श्रीधर कुलकर्णी तथा पत्नी उषा जर्मनी पहुँचते ही पुत्र अरुण के गुप्त विवाह की सूचना पाते हैं। जर्मन पुत्रवधू मारिया के संस्कारपूर्ण व्यवहार से गिले-शिकवे मिट जाते हैं तथा पोते अभिमन्यु की घोषणा पारिवारिक एकता का प्रतीक बनती है। यह भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी ‘पिता’ जैसी भावुकता से युक्त वैश्विक भारतीयता को दर्शाती है।

संग्रह की संवाद-प्रधान शैली तथा सकारात्मक समाधान के साथ कहानी का समापन हिंदी कहानी के मान्य मूल्यों,  यथार्थवाद, सामाजिक सुधार तथा भावनात्मक गहराई को प्रतिबिंबित करते हैं। जो रचनात्मक साहित्य का मूल सिद्धांत है। प्रस्तावना में विजय तिवारी ‘किसलय’ तथा आमुख में शेर सिंह द्वारा सराही गई सार्थकता इस कथा संग्रह को चिंतनोद्दीपक बनाती है। कुल मिलाकर, यह संग्रह भावी पीढ़ियों के लिए धरोहर सिद्ध होगा, यह स्पष्ट है। कथाकार हेमंत जी ई अभिव्यक्ति के संस्थापक प्रधान संपादक हैं, वे नियमित विपुल  साहित्य पढ़ते और गम्भीर लेखन करते हैं, जो इस संग्रह की कहानियों में स्पष्ट दिखता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

इन दिनों न्यूयार्क में

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९९ – सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९९  – सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई ☆

(समांत—- पदांत-आना, मात्रा भार-16)

(चौपाई छंद)

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सोते को है सरल जगाना।

पर जगते को कठिन उठाना।।

*

जीवन दाँव लगाया फिर भी।

मात-पिता का लुटा खजाना।।

*

बरगद बनकर छाँव बनाई।

चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

*

उँगली थामे बड़े हुए पर।

सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

*

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।

पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

*

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।

कैसा आया नया जमाना।।

*

संस्कृति और सभ्यता रूठी।

जागो मानव क्यों पछताना।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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