(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २८३ ☆शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व… ☆
नवरात्रि की महाअष्टमी, माँ शक्ति की आराधना का वह पावन क्षण है, जब श्रद्धा केवल शब्द नहीं रहती, बल्कि जीवन का आधार बन जाती है। यह दिन हमें बाहरी पूजा के साथ-साथ अपने अंतर्मन में भी एक दीप जलाने की प्रेरणा देता है।
“शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बे” महागौरी इसी निष्कलुष भक्ति का सजीव चित्र प्रस्तुत करतीं हैं, जहाँ कोई जटिल विधि-विधान नहीं, केवल सच्चे हृदय की पुकार है—
“पूजन अर्चन कुछ नहिं जानू,
जानू तो बस प्यार…”
इन सरल शब्दों में छिपा भाव आज की पीढ़ी के लिए एक गहरा संदेश है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहाँ सब कुछ पाने की होड़ है, वहाँ यह भक्ति हमें ठहरना और अपने भीतर झाँकना सिखाती है। यह याद दिलाती है कि सच्ची शक्ति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मन की शांति, संतुलन और करुणा में निहित है।
महाअष्टमी केवल देवी पूजन का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। आज जब प्रकृति हमें संतुलन बनाए रखने का संकेत दे रही है, तब “ग्रीन सोच” को अपनाना भी हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।
जैसे हम माँ के चरणों में पुष्प अर्पित करते हैं, वैसे ही धरती माँ के प्रति भी कृतज्ञता प्रकट करें—एक पौधा लगाकर, जल और पर्यावरण की रक्षा करके।
यह पर्व हमें सिखाता है कि भक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, हमारी सोच और हमारे कर्मों में झलकना चाहिए।
महाअष्टमी पर यही संकल्प हो—
हम अपने भीतर की शक्ति को पहचानें, उसे सकारात्मक दिशा दें, और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करें जहाँ भक्ति, प्रकृति और मानवता साथ-साथ आगे बढ़ें।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०७ ☆
आलेख – साहित्य का ‘सम्मान’ बनाम ‘गुणवत्ता’ की कसौटी श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
सोशल मीडिया के इस दौर में स्थिति यह है कि लेखक बाद में पैदा होता है, सम्मानों की ‘फ़ेहरिस्त’ पहले तैयार हो जाती है। हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी ‘अकादमी’ या ‘फाउंडेशन’ का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष है और एक दूसरे को ‘शताब्दी रत्न’ घोषित कर चुका है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ये चमचमाती ट्राफियां और शॉल, रचना की साहित्यिक गुणवत्ता की गारंटी हैं?
साहित्यिक गुणवत्ता किसी प्रयोगशाला में मापी जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि यह समय की कसौटी पर कसी जाने वाली निरंतरता तथा लेखन की पाठकीय पसंद , एवं उसकी उपयोगिता है। लेकिन वर्तमान समय में ‘साहित्यिक गुणवत्ता’ और ‘पुरस्कार’ के बीच का संबंध कुछ वैसा ही हो गया है जैसा राजनीति और नैतिकता का होता है, दोनों साथ दिखते जरूर हैं, पर होते बहुत दूर हैं।
आज लेखक की लेखनी से ज्यादा उसकी ‘लॉबिंग’ महत्वपूर्ण हो गई है। गुणवत्ता घर की खिड़की से झांकती रह जाती है और ‘जुगाड़’ दरवाजे से अंदर आकर मुख्य अतिथि की कुर्सी संभाल लेता है।
ऐसा हर छोटे बड़े पुरस्कार तथा सम्मान में देखने मिल रहा है। सम्मान मिलते ही लेखक को लगने लगता है कि वह अब आलोचना से ऊपर है। यही आत्म-मुग्धता गुणवत्ता के क्षरण का सबसे बड़ा कारण बनती है।
इतिहास गवाह है कि प्रेमचंद को जीते-जी कोई बड़ा सरकारी सम्मान नहीं मिला, पर आज उनके बिना साहित्य अधूरा है। दूसरी ओर, ऐसे सैंकड़ों ‘पुरस्कार प्राप्त’ लेखक हैं जिनकी किताबें आज कबाड़ के भाव भी कोई नहीं पढ़ना चाहता।
साहित्यिक गुणवत्ता का अंतर्संबंध पुरस्कारों से केवल तब ही सार्थक है, जब पुरस्कार ‘सृजन’ का परिणाम हो, न कि ‘अभियान’ का। जब किसी योग्य रचना को सम्मानित किया जाता है, तो सम्मान की गरिमा बढ़ती है, रचना की नहीं।
ऐसे पुरस्कार में विवाद नहीं होते । रचना तो अपनी गुणवत्ता के कारण पहले ही कालजयी हो चुकी होती है।
समकालीन विडंबना इसके विपरीत इसलिए है, क्योंकि गुण धर्मियों की उपेक्षा कर लॉबी जनित राजनैतिक प्रभाव से पुरस्कार तय हो रहे हैं।
आज के दौर में ‘सम्मान वापसी’ से लेकर ‘सम्मान पाने की होड़’ तक, साहित्य का बाजारवाद हावी है। गुणवत्ता कहीं हाशिए पर खड़ी इस बात का इंतज़ार कर रही है कि काश कोई पाठक बिना किसी ‘प्रशस्ति पत्र’ को देखे किताब के पन्ने पलटे।”सच तो यह है कि असली पुरस्कार पाठक की वह आँखें हैं, जो आधी रात को आपकी किताब पढ़ते हुए नम हो जाती हैं। बाकी सब तो ड्राइंग रूम की धूल झाड़ने वाली निर्जीव वस्तुएं हैं।”
पुरस्कार और गुणवत्ता का अंतर्संबंध तब तक ही पवित्र है जब तक चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और रचना में ईमानदारी है। यदि पुरस्कार केवल ‘रेवड़ियां’ बनकर बंटेंगे, तो वे गुणवत्ता को निखारने के बजाय उसे दफन करने का काम करेंगे। साहित्य को पदकों की नहीं, बल्कि उस ‘दृष्टि’ की जरूरत है जो समाज के अंधेरों को चीर सके।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – मिशन विसर्जन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८७ – व्यंग्य – मिशन विसर्जन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
अरे भैया राम-राम! क्या बताएँ, हमारे मोहल्ले के झुनझुनवाला जी का जो यूरेका-यूरेका है न, वो आर्किमिडीज वाला कम और बॉर्डर वाला सर्जिकल स्ट्राइक ज्यादा लगता है। आर्किमिडीज ने तो टब में बैठ के सिद्धांत खोजा था, पर हमारे झुनझुनवाला जी जब बाथरूम से मुस्कुराते हुए, हवा में मुक्का लहरा के निकलते हैं, तो समझ लो आज उन्होंने गुरुत्वाकर्षण को पटखनी दे दी है। मोहल्ले में सन्नाटा ऐसा रहता है जैसे वर्ल्ड कप के फाइनल में आखिरी गेंद पर छह रन चाहिए हों और स्ट्राइक पर खुद झुनझुनवाला जी का पेट खड़ा हो। सस्पेंस तो देखिए, कबाड़ी भाई हाथ में सिगरेट का बंडल और कड़क चाय की प्याली लेकर ऐसे टहलते हैं जैसे किसी सुसाइड मिशन पे जा रहे हों। बोले— “अरे लल्लन भैया, जब तक ई कैफीन की मिसाइल अंदर जाके धमाका नहीं करती, तब तक नीचे का गेटवे ऑफ इंडिया खुलता ही नहीं है!” उनके पेट को भी रिश्वत चाहिए, बिना ‘पेमेंट’ के वहां का ट्रैफिक सिग्नल लाल ही रहता है। अजीब स्थिति हैं भाई, कोई नाभि के पास सरसों का तेल रगड़ रहा है, तो कोई कहता है कि जब तक हम मोहल्ले के उस काले कुत्ते को दो बार जोर से डांट न लें, तब तक विसर्जन का भाव ही नहीं जागता।
हमारे हेडमास्टर चौरसिया जी का पेट तो भाई साहब एकदम उसूलों वाला है। जब तक दैनिक जागरण का संपादकीय पढ़ के दो-चार भ्रष्ट नेताओं को मन ही मन सस्पेंड न कर दें, तब तक कुदरत अपनी फाइल आगे नहीं बढ़ाती। चौरसिया जी का एडिटर जब तक खुश नहीं होता, तब तक वो एक इंच नहीं हिलते। वहीं दूसरी तरफ, खन्ना जी बाथरूम में जाकर किशोर कुमार के दर्द भरे नगमे गाते हैं। उन्हें लगता है कि मेरे नैना सावन-भादो गाने से अंदर की खुश्की सावन में बदल जाएगी। संगीत का ऐसा प्रेशर-कुकर उपयोग आपने पहले कभी नहीं देखा होगा। उधर एडवोकेट साहब हैं, जो टॉयलेट की सीट पर बैठकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले और दलीलें पढ़ते हैं। उनका मानना है कि जब तक दिमाग पर लीगल प्रेशर नहीं पड़ता, तब तक कुदरत अपना फाइनल जजमेंट नहीं सुनाती। कोई सुबह-सुबह बायीं आंख मींचकर दायीं नाक से ऐसी लंबी सांस खींचता है जैसे सारा ब्रह्मांड अंदर भर लेगा, उसका दावा है कि इससे इंजन रिवर्स गियर से सीधा टॉप गियर में आ जाता है।
बात यहीं खत्म नहीं होती, हमारे मोहल्ले में तो केमिकल लोचा के उस्तादों की फौज है। चुलबुली चाची का लॉजिक है कि जब तक पेट को आधा चम्मच हींग और काला नमक का हैंड ग्रेनेड न दिया जाए, तब तक मोर्चा नहीं खुलेगा। कोई त्रिफला चूर्ण को ऐसे फांक रहा है जैसे वो अमृत हो, तो कोई रात भर भिगोई हुई इक्कीस किशमिश को सुबह ऐसे घूरता है जैसे पुराने उधार की वसूली करनी हो। एक महाशय तो दीवार के सहारे पैर ऊपर करके शीर्षासन में अपनी किस्मत ढूंढ रहे हैं, तो कोई धनुरासन में ऐसा तना है कि बस अभी तीर छूटने ही वाला है। कुछ लोग तो और भी हाई-टेक हैं, वो बाथरूम में पावर बैंक और ईयरफोन लेकर जाते हैं क्योंकि उनका कहना है कि संदीप माहेश्वरी का मोटिवेशनल पॉडकास्ट सुनने से ध्यान भटकता है और पेट को परफॉर्म करने की क्रिएटिव आजादी मिलती है। उधर मास्टर जी पुराने स्कूल के रजिस्टर खोलकर बैठ जाते हैं क्योंकि अनुपस्थित छात्रों की एब्सेंट लिस्ट देखने से पेट का पुराना स्टॉक भी प्रेजेंट हो जाता है।
जुगाड़ नंबर पच्चीस से आगे बढ़िए तो इमेजिनेशन के उस्ताद मिलते हैं। कुछ लोग आंखें बंद करके सावन की झड़ी या बहते हुए नलों की कल्पना करते हैं, इस उम्मीद में कि शायद अंदर भी लिक्विडिटी बढ़ जाए। एक प्रजाति ऐसी है जो पुराने ट्रांजिस्टर की तरह पेट के दायीं तरफ हल्के हाथ से ट्यूनिंग करती है कि शायद कोई फ्रीक्वेंसी मैच हो जाए। हमारे ताऊ जी तो कहते हैं— “बेटा, जब तक हम पड़ोसी की नई कार को देख के थोड़ा जल न लें, तब तक हमारा हाजमा दुरुस्त नहीं होता।” अब बताइए, ईर्ष्या का कब्ज से क्या रिश्ता? लेकिन यहां तो भावनाओं का गठबंधन चल रहा है। कोई पैर के नीचे स्टूल दबाकर बैठा है, तो कोई दीवार पर छिपकलियों के युद्ध का लाइव टेलीकास्ट देख रहा है। कोई सुबह-सुबह तांबे के लोटे का बासी पानी ऐसे पीता है जैसे वो गंगाजल हो, तो कोई बाथरूम की दीवार पर अपनी मुट्ठियां मार रहा है कि शायद शारीरिक कंपन से कुछ काम बन जाए।
अगली श्रेणी उन तेल मालिशिया लोगों की है जो नाभि में चमेली का तेल डाल के लेटे रहते हैं जैसे पेट नहीं, कोई बेशकीमती विंटेज कार का इंजन हो। एक भाई साहब तो ऐसे हैं जो सुबह-सुबह बासी मुंह अपनी पुरानी प्रेमिका की फोटो देखते हैं, उनका कहना है कि पुरानी यादों का दबाव पेट के दबाव को सक्रिय कर देता है। कुछ लोग तो बाथरूम के अंदर मल्टी-टास्किंग के चैम्पियन होते हैं—वहां बैठकर वो बच्चों का होमवर्क भी चेक कर लेते हैं और घर का पूरा बजट भी बना डालते हैं। उन्हें लगता है कि दिमागी बोझ बढ़ने से गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत ज्यादा मजबूती से काम करेगा। कोई गरम दूध में दो चम्मच शुद्ध देसी घी ऐसे मिलाता है जैसे रॉकेट में लिक्विड फ्यूल डाल रहा हो। चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे नासा का कोई सैटेलाइट ऑर्बिट में सेट करने जा रहे हों। सस्पेंस ये है कि अगर आज घी ने काम नहीं किया, तो मास्टर जी स्कूल नहीं, सीधे सीधे डिप्रेशन में चले जाएंगे।
हमारे मोहल्ले के पंडित जी कहते हैं कि जब तक सुबह उठकर सूर्य देव को जल न चढ़ाओ और अच्युतम केशवम का जाप न करो, तब तक आंतरिक शांति नहीं मिलती। वहीं पास के दुबे जी का बेटा सुबह-सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन ऐसे चबाता है जैसे वो कोई विदेशी च्युइंगम हो, पूरा घर उसकी गंध से बेहोश हो जाता है पर उसका आगमन नहीं होता। कुछ लोग तो रात को सोते समय पैरों के तलवों में विक्स लगाते हैं, उन्हें लगता है कि ठंडक नीचे से ऊपर की तरफ प्रेशर बनाएगी। एक महाशय तो ऐसे हैं जो सुबह-सुबह अपनी घड़ी के अलार्म को पांच-पांच मिनट पर सेट करते हैं, उनका मानना है कि समय की टिक-टिक पेट को याद दिलाती है कि अब उसकी शिफ्ट शुरू हो चुकी है। कोई सुबह उठकर छत पर जाकर कौओं को रोटी खिलाता है, इस उम्मीद में कि शायद दान-पुण्य से कुदरत का दिल पिघल जाए और फाइल आगे बढ़ जाए।
कुछ लोग तो बाथरूम में बैठकर पुरानी डायरियां पढ़ते हैं जिनमें उन्होंने लोगों से लेने वाले उधार की लिस्ट बनाई होती है। जैसे ही उन्हें याद आता है कि फलाने ने उनके पांच सौ रुपये नहीं दिए, वैसे ही गुस्से के मारे पेट में हलचल शुरू हो जाती है। एक भाई साहब तो ऐसे हैं जो सुबह उठकर सबसे पहले अपनी सासू मां को फोन लगाते हैं, उनका दावा है कि सासू मां की तीखी आवाज सुनते ही अंदर का सारा तंत्र डिफेंस मोड में आकर विसर्जन की प्रक्रिया तेज कर देता है। कोई दीवार पर टंगी छिपकली को घूरता है, तो कोई फर्श की टाइल्स के डिजाइन गिनने लगता है। कुछ लोग तो बाथरूम के नल की टिप-टिप आवाज के साथ अपनी धड़कनें मिलाते हैं। एक सज्जन तो ऐसे हैं जो टॉयलेट सीट पर बैठकर स्टॉक मार्केट का उतार-चढ़ाव देखते हैं, जैसे ही सेंसेक्स गिरता है, उनका प्रेशर बढ़ जाता है।
पराकाष्ठा तो तब होती है जब झुनझुनवाला जी अंदर होते हैं और बाहर पूरी पंचायत बैठी होती है। वहां चर्चा चलती है कि आज क्या नया पैंतरा अपनाया गया होगा? क्या आज उन्होंने एलोवेरा का जूस पिया है? या क्या आज उन्होंने रात को सोते समय त्रिफला की जगह कामोद चूर्ण का भारी डोज लिया है? कोई कहता है कि झुनझुनवाला जी आज सुबह-सुबह अग्निसार क्रिया कर रहे थे, जिसमें पेट को ऐसे हिलाते हैं जैसे मिक्सर ग्राइंडर चल रहा हो। दूसरा कहता है कि नहीं भाई, आज उन्होंने नीम की पत्तियां चबाई हैं। मोहल्ले का माहौल ऐसा है जैसे किसी वैज्ञानिक प्रयोग का सफल परीक्षण होने वाला हो। हर कोई अपनी-अपनी थ्योरी दे रहा है, पर असली हकीकत तो सिर्फ उस बंद दरवाजे के पीछे छिपी है। वहां सन्नाटा ऐसा है कि अगर अंदर कोई सुई भी गिर जाए, तो बाहर चौरसिया जी को सुनाई दे जाए।
तभी अचानक, एक जोरदार धमाका हुआ! नहीं भैया, कोई सिलेंडर नहीं फटा और न ही भूकंप आया। वो तो झुनझुनवाला जी के बाथरूम का दरवाजा धड़धड़ाते हुए खुला। मोहल्ले वाले जो साँसें रोके खड़े थे, एकदम सीधे हो गए। लेकिन ये क्या? झुनझुनवाला जी के चेहरे पर वो यूरेका वाली विजयी मुस्कान नहीं थी। उनके कंधे झुके हुए थे, चेहरा पीला पड़ चुका था और वो लड़खड़ाते हुए सीधे सोफे पर आकर ढह गए। हम सब भागे— “क्या हुआ झुनझुनवाला जी? आज तो आपने सैकड़ों जुगाड़ लगाए थे! घी, तेल, हींग, सिगरेट, अखबार, शीर्षासन, रील्स… कुछ तो काम आया होगा? क्या आज भी सन्नाटा ही पसरा रहा?” झुनझुनवाला जी ने एक ठंडी आह भरी, अपनी सूजी हुई आँखों से हमारी तरफ देखा और कांपते हाथों से अपना मोबाइल हमारी तरफ बढ़ा दिया। स्क्रीन पर उनकी पत्नी का व्हाट्सएप मैसेज खुला था जो उन्होंने ठीक दो मिनट पहले बाथरूम के अंदर पढ़ा था।
झुनझुनवाला जी बोले— “अरे लल्लन भैया, सारे जुगाड़ फेल हो गए! विज्ञान, योग, तंत्र-मंत्र और चूर्ण… सबने हाथ खड़े कर दिए थे। लेकिन जैसे ही मैंने मैसेज पढ़ा कि ‘अजी सुनते हो, मेरा भाई (साला) अपने चार बच्चों और पत्नी के साथ पूरे एक महीने के लिए हमारे घर रहने आ रहा है और स्टेशन पहुँच चुका है’… भाई साहब, कसम गंगा मैया की, उस ‘खौफ’ के मारे पेट ने वो ‘सरेंडर’ किया है कि सारा कब्ज पल भर में काफूर हो गया! सारा कचरा ऐसा बाहर निकला जैसे तिहाड़ जेल का गेट टूट गया हो। असली जुगाड़ तो ‘साले का आगमन’ है भैया, बाकी सब मोह-माया है! जब मौत सामने खड़ी हो और बीवी का मायका घर आ रहा हो, तो कुदरत क्या, खुद विधाता को भी रास्ता देना पड़ता है!”
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(पूर्वसूत्र- “नेमक्या कोणत्या थकीत कर्ज खात्यांमध्ये मी वसुलीसाठी आवश्यक तो पाठपुरावा योग्य पध्दतीने केलेला नाही हे त्यांनी निदर्शनास आणून द्यायला नको कां? सरसकट आरोप करून ते समाधानकारक स्पष्टीकरणाची अपेक्षाच कशी करू शकतात सर? ‘अकोला ब्रँचचा मी चार्ज घेण्यापूर्वीची तिथल्या गलथान कारभाराची नेमकी पार्श्वभूमी मी तुम्हाला सांगू कां? ‘ असं तेव्हा मी विचारलं होतं ना सर, ते यासाठीच.. ” मी म्हंटलं.
“तुम्ही जे कांही सांगणार होतात ते मला जरूर सांगा. पण या सगळ्याचं विनाकारण दडपण नका घेऊ. होईल सगळं व्यवस्थित. मी आहे ना? ” वखरेसाहेब म्हणाले.
वखरेसाहेबांच्या या शब्दांमधून जणू ‘तो’च मला आश्वस्त करतो आहे असंच वाटत राहिलं…!
पण पुढे घटनाच अशा घडत गेल्या की कांहीतरी विपरीत होणार असल्याच्या आशंकेने माझं मन सैरभैर होऊ लागलं..! )
इथून स्वेच्छानिवृत्ती योजनेसाठीचे अर्ज फाॅरवर्ड झाले त्याला चारसहा दिवस उलटून गेले होते. त्या अर्जांची छाननी करून अर्ज स्वीकृती, अस्वीकृती किंवा त्यांचे प्रलंबन याबाबतचे निर्णय सेंट्रल आॅफिसमधील संबंधित डिपार्टमेंटने तात्काळ म्हणजे ३१ डिसेंबर अखेर कोणत्याही परिस्थितीत घ्यायचे होते. तसे सख्त आदेश एम. डी. आॅफीस कडून त्यांना देण्यात आले होतेच. त्यानुसार तिथे युध्दपातळीवर सर्व कामे सुरूही झाली होती. त्यामुळे रोजच्या इनवर्ड मेलमधे पुणे रिजनमधील स्वेच्छानिवृत्तीसाठी अर्ज केलेल्यांची मंजूरीपत्रे रोज टप्प्याटप्याने येऊही लागली होती. अर्थात नाॅर्मल रूटीनमधे मलाही अर्ज स्वीकारल्याचं पत्र अपेक्षित होतंच. तरीही अकोला ब्रॅंचमधील थकीत कर्ज खात्यामुळे निर्माण झालेल्या प्रश्नामुळे जो अडसर निर्माण व्हायची शक्यता होती त्यामुळे फार तर चार दोन दिवस उशीरा मंजुरीपत्र येऊ शकेल असं मला वाटलं होतं. पण झालं भलतंच. मी नागपूर रिजनल आॅफीसला पाठवलेल्या सविस्तर उत्तरानंतर मला त्यांच्याकडून खरंतर पुढे कसलीही विचारणा किंवा अधिक स्पष्टीकरणाची मागणी आलेली नव्हती. तरीही एकेक दिवस उलटत चालला पण या बाबतीतली माझी प्रतीक्षा मात्र संपली नाहीच. वखरेसाहेब गेले चार दिवस ब्रॅंचेस् व्हिजीटच्या पूर्वनियोजित टूरवर होते त्यामुळे नेमकं काय करावं मला सुचेना. वाट पहाण्याशिवाय पर्यायच नव्हता. तो टूर प्रोग्राम संपवून साहेब आॅफिसला आले ते ३० डिसेंबरला. त्यांच्या अनुपस्थितीतल्या महत्त्वाच्या पेंडिंग मॅटर्सचा निपटारा करण्यात दिवसभर ते पूर्णत: व्यस्तच होते त्यामुळे त्यांना श्वास घ्यायलाही फुरसत नव्हती.
एकदा वाटलं त्याना भेटावं आणि सांगावं सगळं. निदान मनातली चलबिचल तरी कमी होईल. पण मलाच ते योग्य वाटेना. ते टूरवरून दमून आले होते. पुन्हा दिवसभर कामांचं दडपण. ते चिडले नक्कीच नसते पण तरीही..? माझ्या समोरचा प्रश्न माझ्या जीवनमरणाचा नाहीये हे मी स्वत:ला समजावलं आणि मनातले ते उलटसुलट विचार झटकून टाकले. ३० डिसेंबरचा दिवस असाच कोरडेपणाने उलटूनही गेला!
३१ डिसेंबर २००० चा दिवस उजाडला. त्यादिवशीही इनवर्ड मेलमधे माझ्यासाठी कांहीच नव्हतं!
अखेर परतीचे दोर असे पूर्णत: कापलेच गेले होते. आता यापुढे अधांतरी लटकत नाही रहायचं. जे समोर आलंय ते आहे तसं स्वीकारून पुढं जायचं आणि तेच आपल्या हिताचं असणाराय असा विचार केला आणि मन एकदम शांत झालं. आता माझा अर्ज प्रलंबित तरी रहाणार किंवा थेट नाकारला तरी जाणार हे जवळजवळ ठरल्यातच जमा होतं. यापैकी कांहीही झालं तरी ते माझ्यावर अन्याय करणारंच होतं. तरीही त्यानंतर नेमकं जे कांही होईल त्यानुसार तेव्हा काय करायचं करायचं ते वखरेसाहेबांशी बोलून ठरवता येईल असा विचार केला. वखरेसाहेबांची अशी आठवण झाली आणि सकाळपासून आपण त्यांना भेटलोच नव्हतो हेही लक्षात आलं. आज अर्जमंजूरीचा अखेरचा दिवस. त्यांना माझ्याबाबतीतल्या या अडचणीची पूर्वकल्पना असूनही त्यांनी गेल्या पंधरा दिवसांत त्याबाबत कांहीच केलं नाहीय यामागेही कांहीतरी कारण असणारच ना? त्यांच्यामागेही इतर अनेक व्यवधानं होती त्यात ते हा विषय विसरलेही असतील कदाचित. कांहीही असो पण जे व्हायचं ते आता होऊन गेलंय. आमचा लंचब्रेक झाला. मी सोबत आणलेला माझा डबा उघडला. तोंडात घास घेताना हात अडखळला. आपला इथला अन्नाचा शेर अद्याप संपलेला नाहीय असा विचार मनात आला न् मग माझं मलाच हसू आलं. आपण किती वरवरचा विचार करत असतो असंच वाटत राहीलं. जे कांही घडणार आहे ते तोच घडवणार आहे, मग आपला अन्नाचा शेर कुठं आणि किती दिवस हे ठरवणारे आपण कोण?
माझं खाणं आवरलं. शिपायाने सर्व्ह केलेला चहा घेऊन मी माझ्या टेबलावरची पुढची फाईल समोर ओढली तेव्हाच इंटरकाॅमची रिंग वाजली. फोन रिसेप्शनिस्टचा होता. ‘जस्ट अ मिनिट’ म्हणत तिने तो बंद केला. कदाचित वखरेसाहेबांनी आपल्याला बोलावलं तर नसेल? असंही वाटून गेलं पण ते तेवढंच. कारण माझी स्वेच्छानिवृत्ती आणि त्याचे मंजूरीपत्र हे विषय माझ्यापुरते मी पुसूनच तर टाकले होते! पण.. ते खोटं ठरवणारं, अचंबित करणारं वास्तव वखरेसाहेबांच्या केबिनमधे माझी वाट पहातंय याची मला पुसटशीही कल्पना नव्हती!
आज इतक्या वर्षांनंतरही त्यातला थरार मी विसरू शकलेलो नाहीय.
मी केबिनमधे जाताच वखरेसाहेबांनी माझं हसतमुखाने स्वागत केलं.
“काॅंग्रच्युलेशन्स अॅण्ड आॅल द व्हेरी बेस्ट.. ” ते म्हणाले.
त्यांचे प्रसन्नचित्ताने मला अशा शुभेच्छा देणं माझ्यासाठी त्याक्षणी वास्तव नव्हे तर स्वप्नवतच वाटत राहिलं.
“मिस्टर श्रीवास्तव, अवर नागपूर रिजनल मॅनेजर वाॅज नाॅट रेडी टू गीव्ह क्लीनचीट टू यू. तुमच्या Voluntary retirement साठी it was a big obstacle.. ” ते म्हणाले.
पण मग हा तिढा असा अचानक सुटला कसा हेच मला समजेना.
” तुम्ही नका दडपण घेऊ. होईल सगळं व्यवस्थित. मी आहे ना..? ” कांही दिवसांपूर्वीचे मला आश्वस्त करणारे वखरे साहेबांचे शब्द मला आठवले. ते केवळ माझी समजूत घालण्यासाठी बोललेले वरवरचे शब्द नव्हते याची ग्वाही आज दिवसभरात काय घडलं ते त्यांच्याकडून ऐकताना मला प्रत्येक क्षणी जाणवत होतं!
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बज रहे हम” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३९ ☆ बज रहे हम ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “एक मुफ़लिस रात भर …“)
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ।)
☆ शेष कुशल # ६१ ☆
☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…”– शांतिलाल जैन ☆
आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में. दो सांड एक तरफ, एक सांड दूसरी तरफ. जोड़ी में एक सांड अंकल सैम का, एक सांड ज़ायोनिस्टों का. दूसरी तरफ एक अकेला सांड, पर्शियन नस्ल का. ये क्या!! शुरू मेई बेईमानी! पास के वेन्यू ओमान में शांतिवार्ता चल रही थी कि जोड़ीदार सांडों ने पर्शियन सांड को अकेला पा कर अटैक कर दिया. जुबां शांति की, अंगुलियाँ मिसाईलों के ट्रिगर पे. बुल फाईट में नुकसान बागड़ का. कुवैत, बहरीन, क़तर इस बागड़ पर ज़ख्मी तो लेबनान उस बागड़ पर. नुकसान तो दूर देशों तक पसरी बागड़ का भी हो रहा है. जम्बूद्वीप जैसे देश जो दो रोज़ पहले ही जाकर ‘आ सांड मुझे मार’ कर आए थे, लहुलुहान वे भी कम नहीं है. सांड लड़ वहाँ रहे हैं, सिलेंडर की कतार में हम और आप यहाँ खड़े हैं. बाज़ार की दुनिया के सांड वाल-स्ट्रीट से दलाल-स्ट्रीट तक हर जगह दुबक गए हैं, बीयर हावी हैं. क्षत-विक्षत है बागड़ इन्वेस्टर्स की. मज़े में हैं तो बस चीन और रूस. चतुर हैं, बागड़ पर नहीं दर्शक दीर्घा में जा बैठे हैं. माल भी कमा रहे हैं और मज़े भी ले रहे हैं. उनकी कम्पनियाँ मुनाफ़े में है और तीसरी दुनिया लॉस में. आप देख रहे हैं बुल-फाईट में दुनिया की शेष बागड़ का सत्यानाश.
आगे का हाल सुनाने से पहले हम आपको बताते चलें दो सांडों की जोड़ी मान कर चल रही थी एक अकेला, दुबला-पतला, कमज़ोर सांड रमजान में क्या तो खुद को बचा पाएगा, क्या आक्रमण कर पाएगा. अनावृत्त मानकर चल रहे थे उसे. सोचा क्या तो नहाएगा, क्या तो निचोड़ेगा. पर्शियन नस्ल को वे चुटकियों में मसल देंगे. मगर ऐसा होता दीख नहीं रहा. सांडो की लडाई जलिकट्टू की लड़ाई नहीं है. ये न परंपरा के लिए है, न मनोरंजन के लिए. असल मकसद तो पर्शियन सांड के कब्ज़े वाली उस दुधारू गाय का अपहरण करना है जिसे तेल का कुआँ कहा जाता है. आँखों में सपने पेट्रो डॉलर के हैं. फाईट टफ़ है, नुकसान जबरजस्त.
और ये दांव. धोबी पछाड़. जोड़ीदार सांडों का पॉवर मूव. प्रतिबंध के सींगों में फँसा कर विचारधारा बदलने का दांव….. ओह्ह मूव फिर फेल हुआ. पर्शियन सांड फिर बच निकला. अबकि बार निज़ाम से बेदख़ल कराने डबल-लेग टेकडाउन लगाया गया है. पर्शियन सांड को सींगों की बजाए पैरों में घुसकर पकड़ने का दांव लगाया गया है. मगर ये क्या…. अधिनायकवादी निज़ाम से बेदख़ल कराने निकले अंकल सैम का अपना चेहरा अधिनायकवादी निकल आया है. पर्शियन सांड है कि लीडरान-दर-लीडरान मारे जाने के बाद भी अंकल सैम के काबू में आ नहीं रहा. अलबत्ता, ड्रोननुमा छोटे छोटे सींगों से अंकल सैम को हलाकान किए दे रहा है. अभी तक दो सांडों की जोड़ी एक भी राउंड पूरी तरह से जीत नहीं पाई है. ‘परमाणु खतरे को रोकना है और मध्यपूर्व में स्थिरता लानी है’ कहते हुए अंकल सैम का सांड एक बार फिर आगे बढ़ा, एक बार फिर मुँह की खाई. न यार मिला, न विसाले सनम. न परमाणु बम मिला न ख़तरा. जोड़ीदार सांड का हर दांव फेल हो रहा है. वे बार बार मुँह की खा रहे हैं, मगर अभी चुके नहीं हैं. अंकल सैम यूरोप से ला कर एडिशनल सांड्स उतारने के मूड में हैं. लेकिन ये क्या!! सांड-सखाओं ने मना कर दिया. बुल जर्मनी का हो, इटली का हो, फ़्रांस या ऑस्ट्रेलिया का, सबने अंकल सैम को अंगूठा दिखा दिया है. कह रहे हैं कि भांडों के लिए सांडों के सींग नहीं पकड़े जाते. अलग-थलग पड़ता जा रहा है पॉवरफुल पेयर ऑफ़ सांड्स. हारने की कगार पर दीखते तो हैं मगर मैच अभी ख़त्म नहीं हुआ है. तरकशों में तीर बाकी हैं. कुछ भी हो सकता है. जो यूरेनियम बुझा सींग मार दिया तो मनुष्यता की बागड़ का गहरे तक झुलस जाना तय है.
जंग जारी है. वैश्विक बागड़ पर बैठे अबोध, निहत्त्थे, निर्दोष नागरिकों को कभी ये सांड कुचल रहा है कभी वो. न कोई अस्पताल बख्श रहा है न स्कूल, न बीमार न अपाहिज, न औरतें न बच्चे, न गरीब न मजलूम. रहम किस चिड़िया का नाम है!!
आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – जाना था चला जाता …।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मेरे घर के सामने… “।)