हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८७ ⇒ प्यार और कविता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार और कविता…“।)

?अभी अभी # ८८७ ⇒ आलेख – प्यार और कविता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लोग अक्सर किसी के प्यार में इतने खो जाते हैं कि उनके अंदर का कवित्व किसी निर्झर की तरह फूट पड़ता है और कविता का जन्म हो जाता है। प्यार में इंसान या तो अंधा हो जाता है,या फिर कवि। कुछ हम जैसे अभागे भी होते हैं, न घर के, न घाट के।

हमने बहुत कोशिश की, कि कवि बना जाए,कविता लिखी जाए। सुना है, कलम, दवात , काग़ज़ से ही कविता नहीं लिखी जाती,लिखने की प्रेरणा भी तो होनी चाहिए। प्रेरणा और प्रेम दोनों जब साथ होते हैं,तब किसी कविता का जन्म होता है। पहली बात, मेरा नाम प्रेम नहीं, प्रदीप है ! और दूसरी बात,कविता और प्रेरणा से मेरा दूर का भी कोई रिश्ता नहीं। स्कूल कॉलेज में भी मुझे याद नहीं, कभी किसी प्रेरणा अथवा कविता से मेरा कोई वास्ता रहा हो।।

वियोगी जी को पहला कवि माना गया है। शुक्र है,योगी जी को आखरी कवि नहीं। अटल जी तो कर्मयोगी थे और भीष्म पितामह की तरह आजन्म ब्रह्मचारी थे, फिर भी राष्ट्र प्रेम ही उनकी प्रेरणा रहा और राजनेता के साथ साथ ही, वे एक अच्छे कवि भी सिद्ध हुए।

कौन किस कारण से कवि हुआ, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हम सिर्फ अपनी बात कर रहे हैं, हममें ऐसी क्या कमी थी, जो हम एक कवि नहीं बन पाए। शायद प्यार की कमी हो। प्यार का कोई स्कूल नहीं होता। आदमी को अपने आसपास ही प्यार तलाशना चाहिए।।

मेरी मां ने मुझे बहुत प्यार किया। ईश्वर ने मुझे एक नहीं,चार चार बहनें दीं,कई ढेर सारे यार दोस्त दिए,इनसे मुझे भरपूर प्यार मिला लेकिन फिर भी कविता लिखने की प्रेरणा नहीं मिल पाई। जीवन में एक पत्नी ही काफी होती है प्यार करने के लिए,वह भी आई,उसने भी मुझे भरपूर प्यार दिया,लेकिन शायद उस प्रेरणा का फिर भी अभाव ही रहा,जिससे कविता जन्म लेती है।

संयोग और वियोग ही जीवन है। मिलना और बिछड़ना भी लगा ही रहता है,लेकिन जो इसे महसूस कर पाता है,वह शायद कवि बन जाता है। क्या कविता के लिए सफल अथवा असफल प्रेम ही जरूरी है। मुझे लगता है,बार बार सुई,प्रेम के आसपास आकर ही अटक जाती है।।

तो इससे यह सिद्ध हुआ कि या तो मुझमें प्रेम का नितांत अभाव है या फिर किसी का प्यार मुझे एक कवि बनने की प्रेरणा नहीं दे रहा। मैं नहीं मानता,कोई प्रेमिका प्रेरणा बनकर जीवन में आती है,बच्चों की तरह हमारा हाथ पकड़ती है,और एक कविता लिखकर चली जाती है। नाच ना आवे,आंगन टेढ़ा।

कविता लिखने की मैंने बहुत कोशिश की,लेकिन जब भी लिखने बैठा,कुछ और ही लिख गया। कभी कभी तो मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि,माता सरस्वती तो मुझ पर प्रसन्न हैं लेकिन कविता मुझसे नाराज़ है। यह भी सच है कि मुझे कविता से जितना प्रेम है,उतना कवियों से नहीं।।

मेरे जीवन में एकमात्र एक कवि ही ऐसे आए,जिनमें मैंने कविता की सुबह देखी और कविता की शाम देखी। वे हमारे मालवी कवि स्व. रामविलास शर्मा थे,जिनसे संयोगवश मेरे आत्मिक संबंध हो गए। वे प्रकृति के कवि थे। जीवन के संघर्ष और विषाद को उन्होंने अपने पुरुषार्थ और हंसमुख स्वभाव से परास्त कर दिया था। मुझे उनसे ही लिखने की प्रेरणा मिली।

वे जब भी मिलने आते,अपने साथ मानो बहार लेकर ही आते।

खुलकर ठहाके लगाना ही उनकी पहचान थी।

हम कभी नहीं जान पाते, उन ठहाकों के पीछे कितना दर्द छुपा है। जब भी एकांत होगा,उनका दर्द उनकी कविता में बयां हुआ होगा,प्रतीक रूप में,व्यक्ति के रूप में नहीं। प्रकृति ही उनकी प्रेरणा थी,उनकी प्रेयसी थी,उनकी हमदर्द थी। उनका एक ही गुरुमंत्र मुझे जीवन में काम आया,नियम से कागज कलम लेकर बैठ जाएं, जो आता है,आने दें,उसे रोकें मत। नहीं आता है,कोई बात नहीं,इस नित्य कर्म बनाएं,कब तक नहीं आएगा। नहीं लिखेंगे,तो कब्ज हो जाएगी।।

उनकी आत्मीयता और प्रेरणा से भले ही मैं कवि नहीं बन पाया,लेकिन एक कवि हृदय को समझ तो पाया। कोई व्यक्ति हमारा आदर्श हो सकता है,वह आपको मार्ग भी दिखला सकता है,लेकिन चलना तो आपको है।

जीवन एक चलती फिरती कविता है। प्रेम ही इसकी

प्राणवायु है। हमारी वाणी में प्रेम हो मिठास हो,बस यही तो कविता है। प्रकृति हमें प्राकृतिक बनाती है,हमारा जीवन बनावटी कागज के फूलों का ना हो। उसमें प्रेम की खुशबू हो।

जब किसी के जीवन में कोई रत्नावली आती है,वह उसे तुलसीदास बना देती है। लोग रत्नावली को भूल जाते हैं,तुलसी के राम को नहीं भूलते। काश,हमारे जीवन में भी अगर कोई विद्योत्तमा आई होती,तो हम भी कवि कालिदास बन जाते।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – स्वामी विवेकानंद : आधुनिक भारत के निर्माता, वैश्विक मानवतावाद के प्रवर्तक और भारतीय दर्शन के पुनराख्याता ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक ज्ञानवर्धक एवं विचारणीय आलेख “स्वामी विवेकानंद : आधुनिक भारत के निर्माता, वैश्विक मानवतावाद के प्रवर्तक और भारतीय दर्शन के पुनराख्याता”।

☆ आलेख ☆ स्वामी विवेकानंद : आधुनिक भारत के निर्माता, वैश्विक मानवतावाद के प्रवर्तक और भारतीय दर्शन के पुनराख्याता ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

भूमिका

उन्नीसवीं शताब्दी का भारत सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से गहरे संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर औपनिवेशिक शासन के कारण आत्मविश्वासहीनता, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक हीनता का भाव व्याप्त था, तो दूसरी ओर परंपरागत धार्मिक रूढ़ियाँ समाज की प्रगति में बाधक बनी हुई थीं। ऐसे ऐतिहासिक परिवेश में स्वामी विवेकानंद का उदय हुआ, जिन्होंने भारतीय चेतना को आत्मगौरव, आत्मविश्वास और वैश्विक दृष्टि प्रदान की। वे केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रनिर्माता, समाज-सुधारक और आधुनिक युग के सांस्कृतिक दूत थे।

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय दर्शन को आधुनिक संदर्भों में पुनर्व्याख्यायित किया और धर्म को कर्म, सेवा और मानवतावाद से जोड़ा। उनका चिंतन आज भी अकादमिक विमर्श, सामाजिक चिंतन और आध्यात्मिक साधना—तीनों स्तरों पर अत्यंत प्रासंगिक है।

  1. जन्म, पारिवारिक परिवेश एवं प्रारंभिक संस्कार

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में हुआ। उनका मूल नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे, जिनकी रुचि तर्क, दर्शन और साहित्य में थी। माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक, करुणामयी और नैतिक दृढ़ता की प्रतीक थीं।

पिता से विवेकानंद को बौद्धिक तर्कशीलता और माता से आध्यात्मिक संवेदना प्राप्त हुई। इन दोनों तत्वों के समन्वय ने उनके व्यक्तित्व को संतुलित और बहुआयामी बनाया।

  1. शिक्षा, बौद्धिक विकास और तर्कशीलता

नरेंद्र नाथ दत्त की शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ उन्होंने दर्शन, इतिहास, साहित्य और विज्ञान का गंभीर अध्ययन किया। वे प्लेटो, अरस्तू, कांट, हेगेल, स्पेंसर और मिल जैसे पाश्चात्य दार्शनिकों से प्रभावित थे।

विशेष बात यह थी कि वे किसी भी विचार को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करते थे। वे अनुभव-सिद्ध सत्य के पक्षधर थे। इसी तर्कशीलता ने उन्हें धार्मिक आस्था के प्रति भी प्रश्नाकुल बनाए रखा।

  1. आध्यात्मिक संकट और सत्य की खोज

युवावस्था में विवेकानंद गहरे आध्यात्मिक संकट से गुज़रे। ईश्वर के अस्तित्व को लेकर उनके मन में संदेह उत्पन्न हुआ। वे ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जिसने ईश्वर को प्रत्यक्ष अनुभव किया हो। यह संकट वास्तव में उनके बौद्धिक ईमानदारी का प्रमाण था, न कि नास्तिकता का। 

  1. श्रीरामकृष्ण परमहंस से भेंट : निर्णायक मोड़

1881 में दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण परमहंस से उनकी ऐतिहासिक भेंट हुई। विवेकानंद का प्रश्न—“क्या आपने ईश्वर को देखा है?” और श्रीरामकृष्ण का उत्तर—“हाँ, उतनी ही स्पष्टता से जितना तुम्हें देख रहा हूँ”—भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

यह भेंट गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श उदाहरण है। श्रीरामकृष्ण ने विवेकानंद को केवल आध्यात्मिक अनुभूति ही नहीं दी, बल्कि उन्हें मानवता के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी कराया।

  1. पारिवारिक दायित्व, संघर्ष और त्याग

1884 में पिता की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट में डूब गया। विवेकानंद ने परिवार के भरण-पोषण के लिए संघर्ष किया, परंतु नौकरी नहीं मिली। इसी समय श्रीरामकृष्ण गंभीर रूप से बीमार पड़े।

इन परिस्थितियों में विवेकानंद का जीवन त्याग, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श बन गया। उन्होंने निजी दुःखों को सामाजिक और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व में रूपांतरित किया।

  1. संन्यास और रामकृष्ण संघ का गठन

श्रीरामकृष्ण के महासमाधि (1886) के बाद विवेकानंद ने अपने गुरु-भाइयों के साथ बरानगर मठ में निवास किया। 1887 में उन्होंने औपचारिक रूप से संन्यास ग्रहण किया और ‘स्वामी विवेकानंद’ कहलाए।

यह संन्यास पलायन नहीं था, बल्कि कर्मयोग की नई परिभाषा थी—“शिव-ज्ञान से जीव-सेवा।” 

  1. भारत भ्रमण और सामाजिक यथार्थ का साक्षात्कार

स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया। उन्होंने गाँवों की दयनीय स्थिति, भूख, अशिक्षा और जातिगत शोषण को निकट से देखा। यहीं से उनके चिंतन में ‘दरिद्र नारायण’ की अवधारणा विकसित हुई।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत के पतन का कारण धर्म नहीं, बल्कि जनता की उपेक्षा है।

  1. शिक्षा-दर्शन और मानव निर्माण

विवेकानंद का शिक्षा-दर्शन अत्यंत मौलिक है। उनके अनुसार—

“शिक्षा वह है जिससे मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का प्रकटीकरण हो।”

वे चरित्र-निर्माण, आत्मविश्वास और स्वावलंबन पर आधारित शिक्षा के पक्षधर थे। उनका शिक्षा-दर्शन आज की नई शिक्षा नीति के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।

  1. विश्व धर्म संसद (1893) और वैश्विक प्रभाव

शिकागो के विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का भाषण भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का मील का पत्थर है। उन्होंने सार्वभौमिक धर्म, सहिष्णुता और मानव-एकता का संदेश दिया।

इस भाषण ने पश्चिम में भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित किया और औपनिवेशिक हीनता-बोध को तोड़ा।

  1. धर्म और विज्ञान का समन्वय

विवेकानंद ने धर्म को ‘चेतना का विज्ञान’ बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह दृष्टि उन्हें आधुनिक दार्शनिक बनाती है।

  1. रामकृष्ण मिशन : संगठित सेवा का आदर्श

1897 में स्थापित रामकृष्ण मिशन भारतीय समाज में संगठित सेवा का आदर्श बन गया। शिक्षा, चिकित्सा, आपदा-राहत और ग्रामीण विकास में इसका योगदान अकादमिक अध्ययन का विषय है।

  1. भारतीय राष्ट्रवाद में योगदान

विवेकानंद ने प्रत्यक्ष राजनीति में भाग नहीं लिया, परंतु उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को वैचारिक आधार प्रदान किया। नेहरू, सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं ने उन्हें अपनी प्रेरणा माना। 

  1. हिंदू धर्म का पुनराख्यान

उन्होंने हिंदू धर्म को एक समन्वयवादी, उदार और सार्वभौमिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने संप्रदायिक संघर्षों को ‘एक सत्य के विविध मार्ग’ बताकर सुलझाया।

  1. आधुनिक मानवतावाद और नैतिक दर्शन

विवेकानंद का मानवतावाद आध्यात्मिक आधार पर टिका है। उनका नैतिक सिद्धांत भय पर नहीं, आत्मा की पवित्रता पर आधारित है।

उपसंहार

स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत की आत्मा के शिल्पकार थे। उन्होंने अध्यात्म को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा और धर्म को मानव-कल्याण का साधन बनाया। विश्वविद्यालय स्तर पर उनका चिंतन दर्शन, समाजशास्त्र, शिक्षा और राजनीति—सभी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

निष्कर्ष्तः, स्वामी विवेकानंद केवल इतिहास की विभूति नहीं, बल्कि सतत प्रेरणा के स्रोत हैं—एक ऐसे विचारक, जिन्होंने भारत को स्वयं से परिचित कराया और विश्व को भारत से।

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६१ – देश-परदेश – झूठ के पांव नहीं होते ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६१ ☆ देश-परदेश – झूठ के पांव नहीं होते ☆ श्री राकेश कुमार ☆

ये किवदंती सुनकर भी हम लोगों ने झूठ बोलना बंद नहीं किया है। सदियों से इस बात की जानकारी होते हुए भी झूठ बोलते ही रहते हैं। ऊपर लगी समाचार पत्र की कटिंग भी शायद ये ही कुछ कह रही है।

एक व्यक्ति ने पैर दर्द के कारण अवकाश लिया था, परंतु उसी दिन उस व्यक्ति ने 16 हजार कदम भी चले। इस कारण उसकी नौकरी जाती रही।

निजी तौर से हमें ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा है। 16 हजार कदम चलने के लिए उसे पुरस्कृत किया जाना चाहिए था। हम तो विगत 16 वर्षों से 16 हजार कदम चलने की योजना तक नहीं बना पा रहें हैं। स्वास्थ्य विज्ञान के ज्ञानी लोग तो कम से कम दस हज़ार कदमों की वकालत करते आ रहें हैं। हम अभी तक एक दिन में अधिकतम आठ हजार कदम चले थे, उसकी खुशी में आठ गुलाब जामुन डाकर गए थे।

कभी कभी तो हम अपने सहायक को कदम नापने वाली घड़ी पहना देते हैं। हमारे इस एक कदम से उसके द्वारा लिए गए कदम, हमारे खाते में जुड़ जाते हैं। क्या करें हम से तो कदमताल भी नहीं की जा सकती है, फिर ये पांच अंकों के आंकड़े को एक दिन में प्राप्त करना, अत्यंत कठिन होता है।

हमारे एक शुभ चिंतक तो हमें सांत्वना देते हुए कहते हैं, दिन भर में मोबाइल पर यदि दस हजार बार उंगली भी चल जाए, तो उसको कदम के बराबर माना जाता हैं।

अच्छे स्वास्थ्य के लिए पैदल चलना ही सर्वोत्तम है। ऐसा कह देना या व्हाट्स ऐप पर लिख देने से कोई लाभ नहीं होता है। हम तो अब आज की रात्रि सैर करेंगे, आप भी अब मोबाइल बंद कर देवें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  “दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं”।

☆ आलेख/पुस्तक चर्चा ☆ दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

पुस्तक – बंद दरवाजे ( दलित-चिंतन की कविताएं)

कवि – जयपाल

समीक्षक – मनजीत सिंह

प्रकाशन – यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र

क़ीमत –150/- पेपर बैक

पिछले दिनों हरियाणा के चर्चित कवि जयपाल जी द्वारा लिखित काव्य पुस्तक-‘बन्द दरवाज़ें’–पढ़ने का अवसर मिला ।  इस पुस्तक में दलित  चिंतन की कविताएं हैं। दलित चिंतक/कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान को समर्पित “जूठी पत्तल’ की पंक्तियों में भूख का यथार्थ देखिए–

जूठी-पत्तल

हम तो बस टूट पड़ते थे

मिली-जुली सतरंगी मिठाइयों पर

घुली-मिली दाल-सब्जियों पर

कटे-फटे फल-फ्रूटों पर

कभी कभार ही मिलते थे हमें ये छत्तीस व्यंजन

माँ बहुत खुश होती थी

कभी-कभी दुःखी भी होती थी

दलित साहित्य के बारे में अलग-अलग लेखक अलग-अलग राय रखते हैं। हर लेखक ने अपनी हर रचना में बदलाव और विकास को अलग-अलग तरीके से दिखाया है। कुछ दलित लेखक ऐसे भी हैं जो देवी-देवताओं को मज़ाक के साथ नकारते हैं । कुछ लेखक ऐसे हैं जो आम लोगों की लोक संस्कृति को एक नई ज़िंदगी देने वाली दुनिया के तौर पर देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मिथकों और कहानियों को समुदाय की क्रिएटिविटी से बने रूपक मानते हैं ,उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मार्क्सवाद को बहुत नफ़रत से देखते हैं, और कुछ दलित ऐसे हैं जिन्हें इस बात का अफ़सोस है कि मार्क्सवादी अभी तक हमारी मदद के लिए क्यों नहीं आए  l कुछ सोचते हैं कि मार्क्सवाद ही एकमात्र रास्ता है जो जात-पात को  सही अर्थों में समाप्त कर सकता है और  गैर-बराबरी मिटा सकता है lसभी लेखकों की अलग-अलग सोच  है लेकिन सारे लेखकों में कहीं न कहीं एक जगह जाकर समानता देखने को मिलती है कि जाति पर आधारित अमानवीय भेदभाव  और जाति समाप्त होनी चाहिए।

श्री जयपाल 

‘उसका गांव’ कविता आज के सन्दर्भ में पूर्णतया सटीक बैठती है… उदाहरणार्थ यदि मैं गांव जाता हूं तो सबसे पहले मेरा नाम पूछा जाता है फिर मोहल्ला , पाना,ठोला,ठिकाना, बाप,दादा आदि ताकि जाति का पता चल जाए। शहर में भी यही हाल है, केवल मकान नं की पहचान काफी नहीं है जाति तो शहर में भी देखी जाती है । कुछ पंक्तियां आप भी देखिये–

वे जाति नहीं पूछते

आज कल कोई किसी से जाति नहीं पूछता

जाति मिट सी गई है मानो

जैसे पढ़ लिख से गए हैं सब

इसीलिए जाति नहीं पूछते

हालांकि बाकी सब अते-पते,

आग्गा- पिच्छा गली-मौहल्ला

वे अच्छी तरह पूछ लेते हैं

बार-बार पूछते हैं

पूछते ही रहते हैं कुछ न कुछ

जब तक पानी पूरी तरह साफ ना हो जाए

और पता ना लग जाए

कौन कितने पानी में हैं!

‘हम क्या करते रहे’ कविता में कवि ने दलित वर्ग से प्रश्न पूछे हैं कि वे क्या करते रहे ?  जयपाल जी सीधे तौर पर कविता के माध्यम से अनेक सवाल कर रहे हैं–

वे गा रहे थे

हम नाच रहे थे

वो बोल रहे थे

तो हम सुन रहे थे

 

सदियां गुज़र गई

कुछ इसी तरह

पता ही नहीं चला

वे क्या कहते रहे

हम क्या करते रहे

दलितों-पिछड़ों और वंचित समाज ने कभी नहीं सोचा आखिरकार वे कर क्या रहे थे! अर्थात केवल अनुसरण कर रहे थे ! आदेश मान रहे थे!!

‘दलित बस्ती’ कविता एक बेहतरीन कविता है जिसमें दलित बस्ती स्वयं अपने बारे में कहती है कि मेरे पास तो न तो ढंग से सूर्य पहुंचा है न ही ढंग से कोई कवि । ‘आशा’ नामक कविता में दलित-स्त्री  कहती है कि बीता हुआ कल मेरा कभी नहीं हुआ और जो चल रहा है वह किसी और का है और भविष्य पहले ही तय हो चुका है।

दलित स्त्री का दुःख कवि के शब्दों में—

मैं तोड़ देना चाहती हूँ वे पैर

जो दलकर मुझे दलित बनाते हैं

दफ़न कर देना चाहती हूँ उस बचपन को

जो मेरे जख्मों पर नमक छिड़कता है

 भूल जाना चाहती हूँ वह जवानी

 जो मुझ पर बिजली बन कर गिरी थी

बंद कर देना चाहती हूं वे पवित्र कुएं

जिनमें मेरी लाश तैरती रहती है

पटक देना चाहती हूँ वे व्यवस्थाएं

जो मेरा सिर सबके पैरों में रख देती है

छोड़ देना चाहती हूं वे रास्ते

जो सिर्फ मेरे लिए ही बनाए गए हैं

मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं

जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती हैं

पलट देना चाहती हूं वे सारी परंपराएं

जो मेरे गले में लटका दी गई हैं

इसी तरह ‘मैं किसको क्या कहूं’- कविता में भारतीय गांव में दलित महिला की स्थिति देखिए —

मैं क्या कहूं

उस गांव को

जो सबका है पर मेरा नहीं

उन गांव के कुत्तों को

जो मुझे ही देखकर भौंकते हैं

उन गाय भैंसों को

जिनका गोबर-मूत भी मेरे हाथों से पवित्र है

उस गाय- माता को

जिसके के नाम पर माबलिंचिंग हुई

और मैं विधवा हो गई

 

क्या कहूँ

उन देवताओं को

जो मुझे हमेशा शाप ही देते हैं

उन पवित्र पुजारियों को

जिनका धर्म मेरी परछाई पर टिका है

 उन धार्मिक चरणों को

 जिनके नीचे मुझे कुचला ही गया

 उस हवेलियों को

 जिसके दरवाजे हमेशा बन्द ही रहते हैं

उन महाजनों को

जिनके पास मेरी आत्मा गिरवी है

वर्ण-व्यवस्था को लेकर उपरोक्त कविता कुछ तीखे सवाल उठाती है और बेचैन करती है।

संस्कृत से लिया गया “दलित” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “टूटा हुआ,” “कुचला हुआ,” “बिखरा हुआ,” या “उत्पीड़ित,” जो भारत में इन समुदायों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक अधीनता, हाशिए पर धकेले जाने और अधिकारों से वंचित किए जाने को दर्शाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से “अछूत” माना जाता था और जाति व्यवस्था से बाहर रखा गया था । यह शब्द अब सामाजिक/ राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया है,जो ज्यादातर कविताओं में झलकता है। इन कविताओं में दलित समाज की पीड़ा को गहरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता  के साथ व्यक्त किया गया है । देश के वर्तमान जातिवादी और साम्प्रदायिक माहौल में ये कविताएं बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं । मनुष्यता को बचाने का  आह्वान करती हैं और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करती हैं।

आशा है पाठकों को श्री जयपाल जी की पुस्तक बंद दरवाजे की कविताएं दलित समस्या पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी   ।

 

श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८६ ⇒ दूर संवेदन और पूर्वाभास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर संवेदन और पूर्वाभास…“।)

?अभी अभी # ८८६ ⇒ आलेख – दूर संवेदन और पूर्वाभास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या किसी की अनायास याद आना महज एक संयोग है। आज दूर संचार के माध्यमों ने हमारी वैचारिक तरंगों का स्थान ले लिया है। जब मन किया, कॉल कर लिया। जिन लोगों को कॉल से तसल्ली नहीं होती, वे वीडियो कॉल लगा लेते हैं। आज के डिजिटल इंडिया में राष्ट्र के हर नागरिक के पास संजय की दिव्य दृष्टि है।

केवल कवि की पहुँच ही रवि तक नहीं होती, जब मन के घोड़े सरपट दौड़ते हैं, तो सात समंदर पार बैठा पिया, मल्हारगंज में बैठी मानसी के मन में ऐसा समा जाता है, कि इधर खयाल आया और उधर फोन की घंटी बजी। इसे कहते हैं टेलीपेथी। ।

बड़ी उम्र है आपकी ! क्या विचित्र संयोग है, अभी अभी बस आपको याद ही किया था और आप हाजिर। हिचकी को हम कभी गंभीरता से नहीं लेते। क्या किसी के महज स्मरण मात्र से हिचकी आना बंद हो सकती है। कहीं यह टेलीपेथी तो नहीं ! मन पर अगर लगाम लगा ली जाए, तो बड़ा काम का है यह मन। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसी मन की अवस्था से तो हम कभी फकीरी और कभी अमीरी का लुत्फ उठा सकते हैं।

हमारी संवेदना का स्तर जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होता चला जाता है, हमारे मन के द्वार खुलते चले जाते हैं। अन्नमय, मनोमय प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष में वह सब है, जो कुबेर के खजाने में भी नहीं। रावण और राम में बस यही अंतर है। ।

हमारा मन चेतन हो अथवा अवचेतन, आगे आने वाली घटनाओं का भी हमें पूर्वाभास होता रहता है। गणित का अध्ययन और धारणा ध्यान का मिला जुला स्वरूप ही है ज्योतिष और नक्षत्र विज्ञान। मंगल पर आप जब जाना चाहें जाएं, हम तो मंगलनाथ कल ही होकर आ गए। परा, पश्यन्ती , मध्यमा और वैखरी जैसी विद्याएं कहीं बाहर नहीं, हमारे अंदर ही मौजूद हैं। जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। बस इधर मन चंगा हुआ, उधर कठौती में गंगा प्रकट।

शरीर ही हमारा विज्ञान है और प्रकृति हमारी प्रयोगशाला। सभी वैज्ञानिक हाड़ मांस के पुतले ही थे, जब जिज्ञासा जुनून बन जाती है तब ही आविष्कार संभव होते हैं। ।

घर के जोगी बने रहें, अगर आन गांव में सिद्ध होने की कोशिश की, तो महात्मा बनने का खतरा है। अपनी सिद्धियों को छुपाए रखिए, उनका प्रदर्शन नहीं, सदुपयोग कीजिए, ज्ञानार्जन बुरा नहीं, ज्ञान का मार्केटिंग भ्रमित करने वाला है।

डोनेशन से एडमिशन और कोचिंग क्लासेस का ज्ञान ही आज हमारी धरोहर है, काहे की टेलीपेथी और इंटुइशन की मगजमारी।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभिव्यक्ति # ९१ – थोड़ा विचार कीजिए ना… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख ‘थोड़ा विचार कीजिए ना…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ९१ ☆ आलेख – थोड़ा विचार कीजिए ना…☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

अभी हाल ही में, इंदौर में प्रदूषित पानी सप्लाई होने से अनेक मौतें हो गई. अनेक लोग बीमार हो गए, अनेकों जगह अभी भी प्रदूषित पानी की सप्लाई जारी है. लोगों को पानी ही नहीं मिल रहा है. हम कोसने लगते हैं सिस्टम को. जब समाज में भ्रष्टाचार होता है, तो, कोसने लगते हैं, समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को. स्वास्थ्य सेवाओं में कमियां है, कि अनेक शहरों से बीमार को बड़े शहरों के लिए रेफर कर दिया जाता है, क्योंकि शहरों में स्वास्थ्य की अच्छी सेवाएं उपलब्ध नहीं है.

हम कोसते हैं, हमारी शिक्षा प्रणाली को, हमारे बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाते हैं. अच्छे जॉब के लिए विदेश जाते हैं. क्यों? क्यों हम उन्हें अपने देश में अच्छी शिक्षा और अच्छा जॉब  मुहैया नहीं कर सकते? शिक्षा विभाग में पहले भ्रष्टाचार को क्यों कोसते हैं? अरे हमें वही मिला है, जो हमने चाहा था हमने कभी अपने बच्चों के लिए, अच्छी शिक्षा नहीं चाही. अपने लिए कभी अच्छा स्वास्थ्य नहीं मांगा. हमने कभी स्वच्छ पानी अपने लिए नहीं चाहा, क्योंकि हम आदी हो गए बोतल बंद पानी पीने के. इसमें कितनी मात्रा में प्रिजर्वेटिव  मिला रहता है, नहीं मालूम, हमारे लिए कितना नुकसानदायक है, हमें कोई चिंता नहीं है. क्योंकि हमारे पास बोतल बंद पानी है, हम बहुत खुश हो जाते हैं, प्लास्टिक की बोतलों के ढेर लगा देते हैं जो नष्ट नहीं होता, हमने जल का संरक्षण नहीं किया,हमारे तालाब, हमारी नदियां, प्रदूषित हो गईं, वायु में प्रदूषण है, हम कोसने लगते हैं कि वायु में प्रदूषण हो गया, अरे हमने स्वच्छ वातावरण के कल्पना ही कब की है. हमने चाहा ही नहीं, कि हम एक स्वच्छ वातावरण में, स्वच्छ पानी पीकर, अच्छी शिक्षा प्राप्त कर, अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना करें. हमने जो चाहा हमें मिल गया, हमारी चुनाव प्रणाली जिससे हम अपने नेता तय करते हैं, हम धर्म और जाति के आधार पर चुनते हैं. कितने नेताओं ने अपनी जाति का भला किया है. हमने उनकी योग्यता के आधार पर कभी उनका चुनाव ही नहीं किया, तो जैसा हम चाहते हैं वैसा हमें मिलता है फिर हम किसी को क्यों कोसते हैं.

थोड़ा विचार कीजिए ना…

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१९ – चक्षो: सूर्यो अजायत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

विश्व हिंदी दिवस पर विशेष

☆  संजय उवाच # ३१९ ☆ चक्षो: सूर्यो अजायत… ?

वैदिक दर्शन सूर्य को ईश्वर का चक्षु निरूपित करता है। हमारे ग्रंथों में सूर्यदेव को जगत की आत्मा भी कहा गया है। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं द्वारा सूर्योपासना के प्रमाण हैं। ज्ञानदा भारतीय संस्कृति में तो सूर्यदेव को अनन्य महत्व है। एतदर्थ भारत में अनेक प्राचीन और अर्वाचीन सूर्य मंदिर हैं।

भारतीय मीमांसा में प्रकाश, जाग्रत देवता है।  प्रकाश आंतरिक हो या वाह्य, उसके बिना जीवन असंभव है। एक-दूसरे के सामने खड़ी गगनचुंबी अट्टालिकाओं के महानगरों में प्रकाश के अभाव में विटामिन डी की कमी विकराल समस्या हो चुकी है।  केवल मनुष्य ही नहीं, सम्पूर्ण सजीव सृष्टि और वनस्पतियों के लिए प्राण का पर्यायवाची है सूर्य। वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण या फोटो सिंथेसिस के लिए प्रकाश अनिवार्य घटक है।

सूर्यचक्र के अनुसार ही हमारे पूर्वजों का जीवनचक्र भी चलता था। भोर को उठना, सूर्यास्त होते-होते भोजन कर सोने चले जाना। सूर्यकिरणें भोजन की पौष्टिकता बनाए रखने में उपयोगी होती हैं।

वस्तुतः जीवन की धुरी है सूर्य। सूर्य से ही दिन है, सूर्य से ही रात है। सूर्य है तो मिनट है, सेकंड है। सूर्य है तो उदय है, सूर्य है तो अस्त है। सूर्य ही है कि अस्त की आशंका में पुनः उदय का विश्वास है। सूर्य कालगणना का आधार है, सूर्य ऊर्जा का अपरिमित  विस्तार है। सूर्यदेव तपते हैं ताकि जगत को प्रकाश मिल सके‌। तपना भी ऐसा प्रचंड कि लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर होकर भी पृथ्वीवासियों को पसीना ला दे।   

सूर्य सतत कर्मशीलता का अनन्य आयाम है, सूर्य नमस्कार अद्भुत व्यायाम है। शरीर को ऊर्जस्वित, जाग्रत और चैतन्य रखने का अनुष्ठान है सूर्य नमस्कार। ऊर्जा, जागृति और चैतन्य का अखंड समन्वय है सूर्य।

‘सविता वा देवानां प्रसविता’…सविता अर्थात सूर्य से ही सभी देवों का जन्म हुआ है। शतपथ ब्राह्मण का यह उद्घोष अन्यान्य शास्त्रों की विवेचनाओं के भी निकट है। गायत्री महामंत्र के अधिष्ठाता भी सूर्यदेव ही हैं।

सूर्यदेव अर्थात सृष्टि में अद्भुत, अनन्य का आँखों से दिखता प्रमाणित सत्य। सूर्यदेव का मकर राशि में प्रवेश अथवा मकर संक्रमण खगोलशास्त्र, भूगोल, अध्यात्म, दर्शन  सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

इस दिव्य प्रकाश पुंज का उत्तरी गोलार्ध से निकट आना उत्तरायण है। उत्तरायण अंधकार के आकुंचन और प्रकाश के प्रसरण का कालखंड है। स्वाभाविक है कि इस कालखंड में दिन बड़े और रातें छोटी होंगी।

दिन बड़े होने का अर्थ है प्रकाश के अधिक अवसर, अधिक चैतन्य, अधिक कर्मशीलता।

अधिक कर्मशीलता के संकल्प का प्रतिनिधि है तिल और गुड़ से बने पदार्थों का सेवन।

निहितार्थ है कि तिल की ऊर्जा और गुड़ की मिठास हमारे मनन, वचन और आचरण तीनों में देदीप्यमान रहे।

मकर संक्रांति/ उत्तरायण/ भोगाली बिहू / माघी/ पोंगल/ खिचड़ी की अग्रिम शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख – पूर्णिका की परिभाषा… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(पूर्णिका’  के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)

☆ आलेख – पूर्णिका की परिभाषा… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

(ई-अभिव्यक्ति में प्रस्तुत “पूर्णिका की परिभाषा” पूर्णिका के जनक डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ द्वारा प्रस्तुत मौलिक परिभाषा है. यह पढ़कर उत्सुकतावश मुझे लगा कि आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (A I) इस सन्दर्भ में क्या कहता है? तो लीजिये आप स्वयं ही पढ़ लीजिये –

“पूर्णिका हिंदी साहित्य की एक आधुनिक काव्य विधा है, जिसमें न्यूनतम पांच नेह (पंक्तियों के छोटे-छोटे खंड) से अधिकतम बीस नेह तक भावपूर्ण रचना की जाती है। यह स्वतंत्र रूप में पूर्ण अनुभूति प्रस्तुत करती है।​

परिभाषा

पूर्णिका को डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ द्वारा शोधित माना जाता है, जो न्यूनतम 5 से 20 नेह तक सजी काव्य रचना है। इसमें छंदबद्ध या मुक्तक शैली में भाव, रस और अलंकारों का समावेश होता है, जो स्वयं में पूर्ण होती है। यह मुक्तक काव्य से प्रेरित है, किंतु विशिष्ट नेह संरचना पर आधारित।​

इतिहास

पूर्णिका का प्रारंभिक शोध जबलपुर, मध्य प्रदेश के डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ने किया। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने इसे विश्ववाणी हिंदी की लोक हितैषी काव्य भंगिमा कहा। यह हालिया विधा है, जो 21वीं सदी में हिंदी साहित्य में लोकप्रिय हो रही है, विशेषकर दोहा, मुक्तक और ग़ज़ल जैसी विधाओं को समाहित कर।”

उपरोक्त जानकारी AI tool – Perplexity द्वारा प्रस्तुत की गई है.    

 – हेमन्त बावनकर, सम्पादक – ई-अभिव्यक्ति, पुणे 

☆

पूर्णिका पांच नेह से लेकर बीस नेह तक में सजा कर कही जाए, पहली नेह को प्रारम्भी, अंतिम नेह को परचयी कहा जाए।

दो सुधि ( पंक्ति ) को मिला कर नेह रची जाए, ऊपर की पंक्ति अर्थात नेह की पहली पंक्ति को पूर्ण सुधि और नेह की – दूसरी पंक्ति को संपूर्ण सुधि कहा जाए। संपूर्ण सुधि के अंत में परिवर्तनीय और स्थानीय लगाकर लिखी जाए और जब किसी नेह की संपूर्ण सुधि में अंत में स्थानीय की जगह परिवर्तनी हो, तब इसे स्थानीय विहीन पूर्णिका कहा जाए। जब पूर्णिका के एक या दो नेह पढ़े जाएं तो उसे पूर्णिकांश कहा जाए। यथा नेह में मात्रा का विशेष ध्यान रखे बिना, बिना अटके बोलकर, गाकर पढ़ी जा सके यही सही पूर्णिका होगी।                    

पूर्णिका दुनिया के हर क्षेत्र, हर विषय, हर प्राणी, हर भाव-भाषा को विषय बना कर कही / लिखी जा सकती है।

अर्थात पूर्णिका कहने/ लिखने के लिए पूर्णिका – कार कोई भी विषय चुन सकते हैं ।।

☆

©  डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८५ ⇒ जड़ भरत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जड़ भरत…“।)

?अभी अभी # ८८५ ⇒ आलेख – जड़ भरत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज हम दशरथनंदन, राम लक्ष्मण के भाई महात्मा भरत का नहीं, ऋषभदेव जी के सबसे श्रेष्ठ पुत्र भरत जी का स्मरण करने जा रहे हैं। ये बड़े भगवत भक्त थे और इनके ही नाम पर हमारे देश का नाम भरत खण्ड पड़ा।

कैसा होगा वह सनातन युग, जहां राजा हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते थे, और तत्पश्चात् संसार छोड़कर वानप्रस्थ और सन्यास भी ग्रहण कर लेते थे। हमारे भरत महाराज भी राजपाट और समस्त राजसी सुख वैभव त्याग अपने आश्रम में एक तपस्वी का जीवन बिता रहे थे कि एक दिन एक मृगशावक पर इनका मन पसीज गया और उसकी सेवा आसक्ति में इतने जड़वत हो गए कि आज की भाषा में इनकी मति मारी गई। हिरण के बच्चे के मोह में प्राण इतने अटके कि पहले एक जन्म हिरण का लिया और बाद में एक जन्म जड़ भरत का। अपने मोह और आसक्ति से जब दो जन्मों बाद छूटे तब अपनी पुनः अपनी वास्तविक अवस्था को प्राप्त हुए। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में जड़ भरत की कथा का वर्णन है। ।

हम अपने आदर्श अवतारों और महापुरुषों तक ही सीमित रखते हैं। उनकी पूजा, भक्ति, आराधना और उनकी चरण रज हमारे माथे पर लग जाए, और हमें क्या चाहिए। हम गृहस्थ, संसारी जीव हैं, अपनी सीमाएं और प्रतिबद्धताएं भली भांति जानते हैं। मोह और आसक्ति हमारे जीवन में आसानी से आ तो सकती है, लेकिन इतनी आसानी से जा नहीं सकती।

फिर भी अगर कोई हमें जड़ भरत अथवा गोबर गणेश कहे तो हम बुरा मान जाते हैं। इच्छा होती है, दो मिलाकर जड़ दें। जब कि हम यह भी जानते हैं कि जड़ भरत की हम दस जन्मों तक बराबरी नहीं कर सकते और गोबर तो कितनी पवित्र चीज है। अब गणेश जी के बारे में भी मुंह खुलवाओगे क्या।

उनका तो हमें इष्ट है।

क्यों आखिर सब गुड़ गोबर करने पर तुले हो। ।

यह एक गंभीर पोस्ट है। मैं जब आत्म चिंतन करता हूं, तो अनायास पिछली कई घटनाएं स्मृति में आ जाती हैं और मुझे यह आभास होता है कि हमारी वर्तमान स्थिति भी किसी जड़ भरत से बेहतर नहीं।

मेरा कॉलेज का एक मित्र था, मुझसे अधिक बुद्धिमान और साधन संपन्न ! जीवन में दोस्ती बराबरी वालों से करना चाहिए, लेकिन स्कूल कॉलेज में जिससे दोस्ती होती थी, वही बराबरी का हो जाता था। वह दोस्त भी कुछ ऐसा ही था। वैसे हमने कभी एक दूसरे के लिए जान नहीं छिड़की लेकिन उसके बड़े से बंगले में हमेशा एक विदेशी किस्म का कुत्ता रहता था, जिस पर वह जान छिड़कता था। ।

समय ही हमें मिलाता है और हमारे बिछड़ने में भी समय का ही हाथ होता है।

एक नौकरीपेशा आदमी जीवन के साठ वर्षों के संघर्ष के बाद जब जिंदगी जीना शुरू करता है तो कभी बीमारी तो कभी कोविड – 19 दस्तक दे देती है। मेरे मित्र ने अपनी रुचि अनुसार सेवा निवृत्ति का समय काटने के लिए विदेशी किस्म के श्वान पाल लिए थे। कुत्ता स्वामिभक्त होता है, घर की रखवाली भी करता है, लेकिन कालांतर में वह घर का एक महत्वपूर्ण सदस्य हो जाता है, उसका भी एक नाम होता है, पहचान होती है। क्या उसके प्रति हमारी आसक्ति स्वाभाविक नहीं। तो क्या हम एक जड़ भरत से बेहतर हुए ?

यह प्रश्न शायद मेरे जेहन में कभी आता ही नहीं, अगर एकाएक मेरा यह अभिन्न मित्र, मेरी जिंदगी से हमेशा के लिए कोराना पॉजिटिव का शिकार बन, इस दुनिया से विदा नहीं हो जाता।

जड़ भरत के जीवन में तो बस एक हिरण का बच्चा आया था। हमारी स्थिति क्या है। क्या समय हमें संभलने अथवा जागने का मौका देता है, कभी नहीं।

एक परीक्षक की तरह आता है वह पल, प्रश्न पत्र हाथ से छीन ले जाता है और कह देता है, your time is over . मेरे दोस्त के साथ यही हुआ, उसे कहां संभलने अथवा कुछ भी संभालने का मौका दिया। हमारे साथ भी यही होना है। कितना अच्छा हो, एक क्लियर ऑल का बटन दबा दिया जाए, सभी माया, मोह, ममता और आसक्ति को डिलीट कर दिया जाए और जगजीत सिंह को गुनगुनाया जाए ;

कुछ ना कुछ तो ज़रूर होना है।

सामना आज उनसे होना है।।

लेकिन हमें किसी भी हाल में, जड़ भरत नहीं बनना है..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अम्मा कहती हैं बेटियाँ अब नहीं आती ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ अम्मा कहती हैं बेटियाँ अब नहीं आती ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

अम्मा कहती हैं बेटियाँ  अब आती नहीं. वह अपने घर में इस कदर खो गई कि मायेके की मिट्टी ही भूल गई

अरे भला कैसे अम्मा भूल गई?

बेटियाँ  मायेका क्यों नहीं आती, तो सुनिए बताती हूं –

जैसे  अक्सर आप आंगन, तो कभी दरवाजे पे सुलगती हुई चिड़चिड़ी बन अपने भीतर की सांसें भीतर ही रोक लिया करतीं थीं और अक्सर मामा के घर जाने के लिए मन मसोस लिया करतीं थीं, उसी पगडंडी पे बैठीं हूई बेटियां वैसे ही सुलग रही है.

हां विदाई के बाद बेटियाँ  जानतीं है कि वह अब मायेके में केवल एक मेहमान है और बिना कुछ कहे ही वह अधिकार की देहरी पर पसरी नज़र आती है.

अपने किरदार में खो जातीं बेटियाँ  धीरे धीरे अर्धांगिनी व मातृत्व में बंध जातीं दो घरों की नींव में खड़ी होकर भी केवल एक दीए के भांति ही होती है जो प्रकाशित तो होती है लेकिन उसके हिस्से में केवल मौन -दर्द होता है जो शब्द में नहीं लिखा जा सकता है बल्कि एक एहसास भर है फिर भी,

अम्मा कहती हैं

बेटियाँ अब आती नहीं बल्कि वह खो चुकी है अपने हिस्से की गृहस्थी में,

बेटियों के गृहस्थी में

अम्मा होता बहुत कुछ है

जैसे मंदिर की घंटी, पूजा के बर्तन घर की बरकत और बच्चों की जिम्मेदारी, पति का आंगन माथे पे पल्लू और रोटी की गंध.

बस, नहीं होती है तो केवल एक ही बात और वह बात है अम्मा तेरी नरमी और उपस्थिति क्योंकि ससुराल और पीहर के छत के नीचे के आहट में केवल एक ही अंतर है और वह अतंर ही अतंस में सदा जीवित होकर एक अदृश्य डोर से बांधे हुए रखता है व बेटियाँ दुआओं में अपने हिस्से की खुशी भी अपने मायके के लिए ही मांगती है फिर भी, बेटियाँ नहीं जा पातीं क्योंकि वह चूड़ियों के साथ ही कैद हो जाती है ससुराल में और अम्मा कहती हैं –

बेटियाँ  नहीं आती??

☆

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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