हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अम्मा कहती हैं बेटियाँ अब नहीं आती ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ अम्मा कहती हैं बेटियाँ अब नहीं आती ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

अम्मा कहती हैं बेटियाँ  अब आती नहीं. वह अपने घर में इस कदर खो गई कि मायेके की मिट्टी ही भूल गई

अरे भला कैसे अम्मा भूल गई?

बेटियाँ  मायेका क्यों नहीं आती, तो सुनिए बताती हूं –

जैसे  अक्सर आप आंगन, तो कभी दरवाजे पे सुलगती हुई चिड़चिड़ी बन अपने भीतर की सांसें भीतर ही रोक लिया करतीं थीं और अक्सर मामा के घर जाने के लिए मन मसोस लिया करतीं थीं, उसी पगडंडी पे बैठीं हूई बेटियां वैसे ही सुलग रही है.

हां विदाई के बाद बेटियाँ  जानतीं है कि वह अब मायेके में केवल एक मेहमान है और बिना कुछ कहे ही वह अधिकार की देहरी पर पसरी नज़र आती है.

अपने किरदार में खो जातीं बेटियाँ  धीरे धीरे अर्धांगिनी व मातृत्व में बंध जातीं दो घरों की नींव में खड़ी होकर भी केवल एक दीए के भांति ही होती है जो प्रकाशित तो होती है लेकिन उसके हिस्से में केवल मौन -दर्द होता है जो शब्द में नहीं लिखा जा सकता है बल्कि एक एहसास भर है फिर भी,

अम्मा कहती हैं

बेटियाँ अब आती नहीं बल्कि वह खो चुकी है अपने हिस्से की गृहस्थी में,

बेटियों के गृहस्थी में

अम्मा होता बहुत कुछ है

जैसे मंदिर की घंटी, पूजा के बर्तन घर की बरकत और बच्चों की जिम्मेदारी, पति का आंगन माथे पे पल्लू और रोटी की गंध.

बस, नहीं होती है तो केवल एक ही बात और वह बात है अम्मा तेरी नरमी और उपस्थिति क्योंकि ससुराल और पीहर के छत के नीचे के आहट में केवल एक ही अंतर है और वह अतंर ही अतंस में सदा जीवित होकर एक अदृश्य डोर से बांधे हुए रखता है व बेटियाँ दुआओं में अपने हिस्से की खुशी भी अपने मायके के लिए ही मांगती है फिर भी, बेटियाँ नहीं जा पातीं क्योंकि वह चूड़ियों के साथ ही कैद हो जाती है ससुराल में और अम्मा कहती हैं –

बेटियाँ  नहीं आती??

☆

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४० – आलेख ~ बेटी के विदाई से बहू बनने की कथा, भारतीय संस्कृति का अनुपम एक उदाहरण ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४० ☆

☆ आलेख ☆ ~ बेटी के विदाई से बहू बनने की कथा, भारतीय संस्कृति का अनुपम एक उदाहरण ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

बेटी की विदाई कितनी कारूणिक होती है, इसको शब्दों में तो बयां किया ही नही जा सकता है। मैंने अपनी कई बड़ी रचनाओं में इस भाव को सजाने और समझने की कोशिश की है। लेकिन बेटी के बिछुडन – वियोग भाव की गहराई इतनी है कि मै इसमे अपने शब्दों की रस्सी डालता जाता हूँ, डालता जाता हूँ, वह छोटी ही पड़ती जाती है।

बेटी के विदाई की बेला, बाबुल से बिछड़ने की, भाई से लिपटकर रोने की, चाचा ताई को याद करने की, सहेलियों के साथ मुस्कुराने की, गांव परिवार के लोगों के बीच हंसी की ठिठोली करने की, आदि आदि जीवंत दृश्यो के यादों को शब्दों में बांधने के लिए लेखक के पास शब्द कम पड़ जाते हैं।

बेटी अनेकानेक स्नेहिल रिश्तो को त्याग कर जब एक नए घर की ओर प्रस्थान करती है, एक नए आशियाने की ओर कदम बढ़ाती है तो उस वक्त उसके और उसके परिजनों के दिल की पीड़ा, उस माहौल में उठने वाले रुदन की ध्वनि कलेजे को फाड़ कर रख देती है।

बाबुल घर से निकलकर, पिया घर में पहुंचने तक, पुराने रिश्तों से निकल कर नए रिश्तों तक पहुंचने की कठिन यात्रा पर बेटी के कदम जब निकल पड़ते हैं तो इस वृत्तांत को लिखते लिखते लेखक कलम भी स्वयं रो पड़ती है है।

लेकिन मां-बाप की जीविषिका सिर्फ इस बात पर निर्भर होती है कि मेरी प्राणों से प्रिय सिया कहीं अन्यत्र नही जा रही है है बल्कि वह किसी अवधपति दशरथ नंदन राम की प्राण प्रिया और उनके कुल की लक्ष्मी बनने जा रही है तब जाकर ये आंसू कहीं थमते हैं।

विदाई की बेला पर न सिर्फ परिजन, पुरजन एवं परिवारजन आँखे नम हो उठती है, बल्कि बाबुल के घर के सामने खड़े नीम के पत्ते, घर के पीछे की क्यारी में खिले फूल, घर की चौखट, कुंवें की जगत, खूंटे से बधी गाय और बछीया, सदैव दरवाजे पर रहकर दुम हिलाने वाला कुत्ते आदि जैसे बेजुबान जीवों एवं ये तथाकथित निर्जीव कही जाने वाली चीजो को भी लेखक ने विदाई के इस वियोग पल में आंसू बहाते देखता है।

बेटी को विदा कराकर ससुराल की ओर डोली को ले जाने कहारों के बढ़ते कदमों के पद चाप को पीछे से देखकर और या फूलों से सजी हुई कार घूमते चक्को को धीरे-धीरे आंखों से ओझल होने के साथ फिर ही, एक दिन पूर्व शहनाई की धुन से गुजते घर में गजब का सन्नाटा पसर जाता है। मानो सबकुछ ठहर गया हो। यहाँ सबके जुबा से एक ही स्वर निकलता है कि वह चली गई, वह हम सब को छोड़ कर चली गई, अपने प्रीतम के घर गई। फिर मन में एक भाव आता है, मेरी बेटी..तुम जहां भी रहना, सदैव खुश रहना। जिस रूप में रहना, सदा खुश रहना। जब तुम्हें अपने इस घर की याद आए, बिना पूछे चली आना, क्योंकि यह घर तुम्हारा ही घर है और इस घर के दरवाजे सदैव तुम्हारे लिए खुले रहेंगे।

हां मेरी बेटी तुम्हें किसी बुलावे की जरूरत नहीं, तुम तब भी परिवार की एक अंग थी, आगे भी बनी रहोगी। तुम्हारा मायका तुम्हारा वही अपना पुराना किला है, जिसकी तुम जागीर रही हो। जिसमें चलकर तुम्हारे नन्हे पाँव बड़े हुए। बेटी तुम अपरोक्ष रूप से आज भी इस महल की मालकिन हो। बस तुम एक पुराने महल से अपने नये महल में ही गयी हो, सिर्फ इतना ही अंतर है। हाँ एक बात ध्यान रखना, अपने नए महल में जाकर हम सभी को कभी भी मत भूलना। यहाँ बैठा पूरा परिवार हर वक्त बस इस बात की चर्चा करता है कि तुम जहाँ भी रहो खुश रहना।

बेटी अपने बाबुल के घर से बेटी के रूप में तो विदा हो जाती है, और जब उसके कदम किसी नये घर में पड़ते हैं, तो वह उस घर की बहू बन जाती है। बस यह उसका एक नाम का परिवर्तन हुआ। जहां वह बेटी अपने अधिकारों के साथ अपने बाबा के घर में रह रही थी, वहीं वह बहु के अधिकारों के साथ श्वसुर या पति के घर रहने चली जाती है।

यहाँ उसे बहू के अधिकारों के साथ प्रीतम का घर मिलता है, जहां उसके मां-बाप के रूप में उसके सास श्वसुर मिलते हैं, रिश्ते का नाम बदलता है, कुछ थोड़े बहुत फर्ज के अलावा अन्य कुछ भी नही बदलता है।

पिता के घर से विदाकर बहु के रूप में आयी उस बेटी की एक चाहत होती है कि उसका पिता के घर में मिला प्यार, सम्मान और अधिकार तो किसी भी हालत में नहीं बदलना चाहिए, जो उसे एक बेटी के रूप में मिला हुआ होता है। ऐसा ही प्यार, सम्मान एवं अधिकार उसे बहू के रूप में पति के घर में मिलना चाहिए। वहीं उस बेटी के भी मन में ऐसा ही प्यार बना रहना चाहिए कि उसे इस नये घर में सास ससुर के रूप में माता पिता मिले हैं। उनके मान, सम्मान और स्वाभिमान का आदर उसी प्रकार हो जैसा माँ -बाप के प्रति था।

उसके भीतर इस बात गौरव होना चाहिए कि वह इस नये घर की कुलबधु होकर आयी है। पुत्र को तो केवल एक कुल की मर्यादा होने का गौरव प्राप्त होता है, वहीं कन्या दो कुलों की मर्यादा होती है। उसके ऊपर दो कुलों की मर्यादा को निभाने का दायित्व होता है।

यह तो जीवन का एक चक्र है जो कि अपनी धुरी पर घूमता है और पूरा घूम कर वहीं पहुंच जाता है, जहां से वह चला होता है।

बेटी ही बहू होती है और बहू ही बेटी होती है। बस बेटी से बहू के रूप में नाम परिवर्तन की यात्रा में एक मार्मिक पल आता है, जिसे हम विदाई की वेला कहते हैं। बेटी जो आज एक घर की बेटी के रूप में एक परिवार सदस्य होती है, बहु के रूप में दूसरे घर की सदस्य बनती है और फिर व्यस्कता की ओर बढ़ते हुए, उस घर की मालिकिन बन जाती है। फिर वह एक बेटी की माँ बनती है और पुनः उस अपनी जायी बेटी को बेटी के रूप में विदा करती है, जो किसी दूसरे कुल की बहु बनने जा रही होती है। यही वह सामाजिक क्रम है जो लगातार अनवरत चलता रहता है।

बस आवश्यकता इस बात की है कि इस व्यवस्था के भीतर का आदर, प्रेम, सम्मान, मर्यादा, अधिकार, आदि नीति नियमों में कहीं भी घृणा द्वेष, लोभ असम्मान एवं अनीति का समावेश न हो। जब कभी ऐसा होता है तभी वहां सामाजिक व्यवस्था विद्रूप रूप में दिखाई देने लगती है। नहीं तो हमारी सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था है। इसी व्यवस्था को भारतीय सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। यही हमारी भारतीयता है, यही हमारे भारत की सांस्कृतिक व्यवस्था है। यही हमारे बहुरंगी फूलों से सजे गमले सदृश्य भारत की खुशबू है। भारतीय संस्कृति का एक संकल्प है कि उसे किसी भी भाषा, क्षेत्र, समुदाय, संप्रदाय मैं नहीं बदलना है और न ही यह बदलती है। हमारी भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का गान करती है और हमारे भारत को महान बनाती है

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि, लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८३ ⇒ गरीब की जोरू ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गरीब की जोरू…“।)

?अभी अभी # ८८३ ⇒ आलेख – गरीब की जोरू ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ना तो गरीब कोई गाली है, और ना ही जोरू कोई गाली, लेकिन यह भी एक सर्वमान्य, सनातन सत्य है कि एक गरीब का इस दुनिया में सिर्फ अपनी जोरू पर ही अधिकार होता है। होगा पति पत्नी का रिश्ता, प्रेम और बराबरी का आपके सम्पन्न और शालीन समाज के लिए, गरीब की जोरू तो बनी ही, जोर जबरदस्ती के लिए है।

हमारे समाज ने पत्नी को अगर धर्मपत्नी और अर्धांगिनी का दर्जा दिया है तो एक आदर्श पत्नी भी अपने पति को परमेश्वर से कम नहीं मानती। सात फेरों और सात जन्मों का रिश्ता होता है पति पत्नी का। लेकिन एक गरीब और उसकी जोरू समाज के इन आदर्श दायरों में नहीं आते। ।

हम भी अजीब हैं। बचपन में कॉमिक्स की जगह हमने चंदामामा में ऐसी ऐसी कहानियां पढ़ी हैं, जिनका आरंभ ही इस वाक्य से होता था। एक गरीब ब्राह्मण था। समय के साथ थोड़ा अगर सुधार भी हुआ तो शिक्षकों को गुरु जी की जगह मास्टर जी कहा जाने लगा और उनके कल्याण के लिए एक गृह निर्माण संस्था ने सुदामा नगर ही बसा डाला।

लेकिन वह तब की बात थी, जब लोग सुदामा को भी गरीब समझते थे और एक मास्टर को भी। जिसकी आंखों पर अज्ञान की पट्टी पड़ी हो, उसे कौन समझाए। सुदामा एक विद्वान ब्राह्मण थे, श्रीकृष्ण के बाल सखा थे, और हमेशा पूरी तरह कृष्ण भक्ति में डूबे रहते थे। आज सुदामा नगर जाकर देखिए, आपको एक भी शिक्षक नजर नहीं आएगा। सभी सुदामा नगर के वासी आज उतने ही संपन्न और भाग्यशाली हैं, जितने सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने के बाद हो गए थे। ।

बात गरीब की जोरू की हो रही थी। आप अगर एक गरीब की पत्नी को जोरू कहकर संबोधित करते हैं, तो उसे बुरा नहीं लगता, क्योंकि उसका पति भले ही गरीब है, पर वह उसका मरद है। हमने अच्छे अच्छे मर्दों को घर में घुसते ही चूहा बनते देखा है। लेकिन गरीब की जोरू का मरद तो और ही मिट्टी का बना होता है। वहां मरद को दर्द नहीं होता, लेकिन जब वह अपनी जोरू को मारता है, तब जोरू को दर्द होता है। आखिर एक मरद और जोरू का रिश्ता, दर्द का ही रिश्ता ही तो होता है। गरीबी और मजबूरी वैसे भी दोनों अभिशाप ही तो हैं।

हमारे लिए तो मजबूरी का नाम भी महात्मा गांधी है। जब कि गरीब का दुख दर्द, अभाव और मजबूरी अपने आप में एक मजाक है। जो किसी की गरीबी का मजाक उड़ाता है, उसके लिए किसी गरीब और जोरू के लिए दर्द कहां से उपजेगा। ।

जब रिश्तों में मूल्य नहीं होते तो रिश्ते भी मजाक बन जाते हैं। मजाक और हंसी मजाक में जमीन आसमान का अंतर होता है। क्या गरीबों के लिए हमारा दर्द, मुफ्त राशन की तरह एक मजाक बनकर नहीं रह गया है।

जी हां, यही है हमारे मजाक का स्तर। गरीब की जोरू सबकी भाभी। यहां हम गरीब का ही नहीं, उसकी गरीबी का ही नहीं, उसकी पत्नी का भी मजाक उड़ा रहे हैं। हें, हें ! कैसी बात करते हैं। देवर भाभी में तो मजाक चलता रहता है, और वास्तविकता में भी चल ही रहा है। गरीबी आज मजाक का विषय ही है। गरीब की जोरू सबकी भाभी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०५ ☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रतिशोध नहीं परिवर्तन। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०५ ☆

☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆

‘ऊंचाई पर पहुँचते हैं वे, जो प्रतिशोध के बजाय परिवर्तन की सोच रखते हैं।’ प्रतिशोध उन्नति के पथ में अवरोधक का कार्य करता है तथा मानसिक उद्वेलन व क्रोध को बढ़ाता है; मन की शांति को मगर की भांति लील जाता है… ऐसे व्यक्ति को कहीं भी कल अथवा चैन नहीं पड़ती। उसका सारा ध्यान विरोधी पक्ष की गतिविधियों पर ही केंद्रित नहीं होता, वह उन्हें नीचा दिखाने के अवसर की तलाश में मग्न रहता है। उसका मन अनावश्यक उधेड़बुन में उलझा रहता है, क्योंकि उसे अपने दोष व अवगुण नज़र नहीं आते और अन्य सब उसे दोषों व बुराइयों की खान नज़र आते हैं। फलत: उसके लिए उन्नति के सभी द्वार बंद हो जाते हैं। उन विषम परिस्थितियों में अनायास सिर उठाए कुकुरमुत्ते, हर दिन सिर उठाए उसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में नज़र आते हैं और हर इंसान उसे उपहास अथवा व्यंग्य करता-सा दिखाई पड़ता है।

ऊंचा उठने के लिए पंखों की ज़रूरत पक्षियों को पड़ती है। परंतु मानव जितना विनम्रता से झुकता है; उतना ही ऊपर उठता है। सो! विनम्र व्यक्ति सदैव झुकता है; फूल-फल लगे वृक्षों की डालियों की तरह… और वह सदैव ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर के भाव से मुक्त रहता है। उसे सब मित्र-सम भासते हैं और वह दूसरों में दोष-दर्शन न कर आत्मावलोकन करता है… अपने दोष व गुणों का चिंतन कर वह ख़ुद को बदलने में प्रयासरत रहता है। प्रतिशोध की बजाय परिवर्तन की सोच रखने वाला व्यक्ति सदैव उन्नति के अंतिम शिखर पर पहुंचता है। परंतु इसके लिए आवश्यकता है– अपनी सोच व रुचि बदलने की; नकारात्मकता से मुक्ति पाने की; स्नेह, प्रेम व सौहार्द के दैवीय गुणों को जीवन में धारण करने की; प्राणी-मात्र के हित की कामना करने की; अहं को कोटि शत्रुओं-सम त्यागने की; विनम्रता को जीवन में धारण करने की; संग्रह की प्रवृत्ति को त्याग परमार्थ व परोपकार को अपनाने की; सबके प्रति दया, करुणा और सहानुभूति भाव जाग्रत करने की। यदि मानव उपरोक्त दुष्प्रवृत्तियों को त्याग, सात्विक वृत्तियों को जीवन में धारण कर लेता है, तो संसार की कोई शक्ति उसे पथ-विचलित व परास्त नहीं कर सकती।

इंसान, इंसान को धोखा नहीं देता, बल्कि उम्मीदें धोखा देती हैं; जो वह दूसरों से करता है। इससे  संदेश मिलता है कि हमें दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इंसान ही नहीं, हमारी अपेक्षाएं व आकांक्षाएं ही हमें धोखा देतीं हैं, जो इंसान दूसरों से करता है। वैसे यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि ‘पैसा उधार दीजिए; आपका पक्का दोस्त भी आपका कट्टर निंदक अर्थात् दुश्मन बन जाएगा।’ सो! उधार देने के पश्चात् भूल जाइए, क्योंकि वह पैसा लौट कर कभी भी नहीं आने वाला है। यदि आप वापसी की उम्मीद रखते हैं, तो यह आपकी ग़लती ही नहीं, मूर्खता है। जिस प्रकार दुनिया से जाने वाले लौट कर नहीं आते; वही स्थिति ऋण के रूप में दिये गये धन की है। यदि वह लौट कर आता भी है, तो वह आपके सबसे प्रिय मित्र भी शत्रु के रूप में सीना ताने खड़ा दिखाई पड़ता है। सो! प्रतिशोध की भावना को त्याग, अपनी सोच व विचारों को बदलें– जैसे एक हाथ से दिए गए दान की खबर, दूसरे हाथ को कदापि नहीं लगनी चाहिए। उसी प्रकार उधार देने के पश्चात् उसे भुला देने में ही सबका मंगल है। सो! जो इंसान अपने हित के बारे में ही नहीं सोचता; वह दूसरों के लिए क्या ख़ाक सोचेगा?

समय परिवर्तनशील है और प्रकृति भी पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी यथा-समय बदलते रहते हैं। सो! मानव को श्रेष्ठ संबंधों को कायम रखने के लिए स्वयं को बदलना होगा। जैसे अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है; उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी मानव के लिए कष्टकारी

होता है। सो! अपनी ‘इच्छाओं पर अंकुश लगाएं और तनाव को दूर भगाएं…दूसरों से उम्मीद मत रखें, क्योंकि वह तनाव का कारण होती हैं।’ महात्मा बुद्ध की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है कि ‘आवश्यकता से अधिक सोचना, संचय करना व सेवन करना– दु:ख और अप्रसन्नता का कारण है, जो हमें सोचने पर विवश करता है कि मानव को व्यर्थ के चिंतन से दूर रहना चाहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब वह आत्मचिंतन करता है और दुनियादारी व दोस्तों की भीड़ से दूरी बनाकर रखता है।

वास्तव में दूसरों से अपेक्षा करना हमें अंध-कूप में धकेल देता है, जिससे मानव चाह कर भी बाहर निकल नहीं पाता। वह आजीवन ‘तेरी-मेरी’ में उलझा रहता है तथा ‘लोग क्या कहेंगे’–यह सोचकर अपने हंसते-खेलते जीवन को अग्नि में झोंक देता है। यदि इच्छाएं पूरी नहीं होती, तो क्रोध बढ़ता है और पूरी होती हैं तो लोभ। सो! उसके लिए हर स्थिति में धैर्य बनाए रखना अपेक्षित है। ‘इच्छाओं को हृदय में अंकुरित मत होने दें, अन्यथा आपके जीवन की खुशियों को ग्रहण लग जाएगा और आप क्रोध व लोभ के भंवर से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। कठिनाई की  स्थिति में केवल आत्मविश्वास ही आपका साथ देता है, इसलिए सदैव उसका दामन थामे रखिए। ‘तुलना के खेल में स्वयं को मत झोंकिए, क्योंकि जहां इसकी शुरुआत होती है, वहां अपनत्व व आनंद समाप्त हो जाता है और कोसों दूर चला जाता है।’ इसलिए जो मिला है, उससे संतोष कीजिए। स्पर्द्धा भाव रखिए, ईर्ष्या भाव नहीं। ख़ुद को बदलिए, क्योंकि जिसने संसार को बदलने की कोशिश की, वह हार गया और जिसने ख़ुद को बदल लिया, वह जीत गया। दूसरों से उम्मीद रखने के भाव का त्याग करना ही श्रेयस्कर है। सो! उस राह को त्याग दीजिए, जो कांटों से भरी है, क्योंकि दुनिया भर के कांटों को चुनना व दु:खों को मिटाना संभव नहीं। इसलिए उस विचार को समूल नष्ट करने में सबका कल्याण है। इसके साथ ही बीती बातों को भुला देना कारग़र है, क्योंकि गुज़रा हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए वर्तमान में जीना सीखिए। अतीत अनुभव है। उससे शिक्षा लीजिए तथा उन ग़लतियों को वर्तमान में मत दोहराएं, अन्यथा आपके भविष्य का अंधकारमय होना निश्चित है।

वैसे तो आजकल लोग अपने सिवाय किसी के बारे में सोचते ही नहीं, क्योंकि वे अपने अहं में इस क़दर मदमस्त रहते हैं कि उन्हें दूसरों का अस्तित्व नगण्य प्रतीत होती है। अब्दुल कलाम जी के शब्दों में ‘यदि आप किसी से सच्चे संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो आप उसके बारे में जो जानते हैं; उस पर विश्वास रखें… न कि जो उसके बारे में सुना है’…  यह कथन कोटिश: सत्य है। आंखों-देखी पर सदैव विश्वास करें, कानों-सुनी पर नहीं, क्योंकि लोगों का काम तो होता है कहना व आलोचना करना; संबंधों में कटुता उत्पन्न करने के लिए इल्ज़ाम लगाना; भला-बुरा कहना व अकारण दोषारोपण करना। इसलिए मानव को व्यर्थ की बातों में समय नष्ट न करने, बाह्य आकर्षणों व ऐसे लोगों से सचेत रहने की सीख दी गयी है, क्योंकि ‘बाहर रिश्तों का मेला है/ भीतर हर शख्स अकेला है/ यही ज़िंदगी का झमेला है।’ इसलिए ज़रा संभल कर चलें, क्योंकि तारीफ़ के पुल के नीचे सदैव मतलब की नदी बहती है अर्थात् यह दुनिया पल-पल गिरगिट की भांति रंग बदलती है। लोग आपके सामने तो प्रशंसा के पुल बांधते हैं, परंतु पीछे से फब्तियां कसते हैं; भरपूर निंदा करते हैं और पीठ में छुरा घोंपने से तनिक भी गुरेज़ नहीं करते।

‘इसलिए सच्चे दोस्तों को ढूंढना/ बहुत मुश्किल होता है/ छोड़ना और भी मुश्किल/ और भूल जाना नामुमक़िन।’ सो! मित्रों के प्रति शंका भाव कभी मत रखिए, क्योंकि वे सदैव तुम्हारा हित चाहते हैं। आपको गिरता हुआ देख, आगे बढ़ कर थाम लेते हैं। वास्तव में सच्चा दोस्त वही है, जिससे बात करने में खुशी दोगुनी व दु:ख आधा हो जाए…केवल वो ही अपना है, शेष तो बस दुनिया है अर्थात् दोस्तों पर शक़ करने से बेहतर है… ‘वक्त पर छोड़ दीजिए/ कुछ उलझनों के हल/ बेशक जवाब देर से मिलेंगे/ मगर लाजवाब मिलेंगे।’ समय अपनी गति से चलता है और समय के साथ मुखौटों के पीछे छिपे लोगों का असली चेहरा उजागर अवश्य हो जाता है। सो! यह कथन कोटिश: सत्य है कि ख़ुदा की अदालत में देर है, अंधेर नहीं। अपने विश्वास को डगमगाने मत दें और निराशा का दामन कभी मत थामें। इसलिए ‘यदि सपने सच न हों/ तो रास्ते बदलो/ मुक़ाम नहीं/ पेड़ हमेशा पत्तियां बदलते हैं/ जड़ नहीं।’ सो! लोगों की बातों पर विश्वास न करें, क्योंकि आजकल लोग समझते कम और समझाते ज़्यादा हैं। तभी तो मामले सुलझते कम, उलझते ज़यादा हैं। दुनिया में कोई भी दूसरे को उन्नति करते देख प्रसन्न नहीं होता। सो! वे उस सीढ़ी को खींचने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं तथा उसे सही राह दर्शाने की मंगल कामना नहीं करते।

इसलिए मानव को अहंनिष्ठ व स्वार्थी लोगों से सचेत व सावधान रहने का संदेश देते हुए कहा गया है, कि ‘घमंड मत कर ऐ!दोस्त!/  सुना ही होगा/ अंगारे राख ही बनते हैं’…जीवन को समझने से पहले मन को समझना आवश्यक है, क्योंकि जीवन और कुछ नहीं, हमारी सोच का साकार रूप है…’जैसी सोच, वैसी क़ायनात और वैसा ही जीवन।’ सो! मानव को प्रतिशोध के भाव को जीवन में दस्तक देने की कभी भी अनुमति नहीं प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि आत्म-परिवर्तन को अपनाना श्रेयस्कर है। सो! मानव को अपनी सोच, अपना व्यवहार, अपना दृष्टिकोण, अपना नज़रिया बदलना चाहिए, क्योंकि नज़र का इलाज तो दुनिया में है, नज़रिए का नहीं। ‘नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। नज़रिया बदलो/ दुनिया के लोग ही नहीं/ वक्त के धारे भी बदल जाएंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८२ ⇒ घंटा घर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घंटा घर…“।)

?अभी अभी # ८८२ ⇒ आलेख – घंटा घर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

∆ bell tower ∆

घंटा, घर में नहीं, मंदिरों में होता है। घरों में और पूजा घरों में घंटियां होती हैं। कुछ पुरानी अंग्रेजों के जमाने की इमारतों में गुंबद की जगह टॉवर होते थे, जिसके चारों ओर चार बड़ी बड़ी घड़ियां होती थीं और उस इमारत को घंटा घर कहते थे। हमारे शहर में भी एक नहीं दो घंटा घर थे, (जो आज भी मौजूद हैं)

एक हुकमचंद का घंटा घर और एक टाउन हॉल, जिसे आजादी के बाद से गांधी हॉल कहा जाने लगा है।

जिस इमारत के ऊपर, चार बड़ी बड़ी घड़ियां नहीं, वह घंटाघर नहीं। घंटा, घंटाघर में नहीं, बड़े बड़े मंदिरों में होता है। मंदिर में घड़ी और घंटा दोनों हो सकते हैं लेकिन घंटाघर में घंटे का क्या काम। ।

घड़ी, कितनी भी बड़ी हो जाए, भले ही आसमान को छू ले, कभी घंटा नहीं बन सकती जब कि घंटी छोटी से छोटी और घंटा बड़े से भी बड़ा हो सकता है। घड़ी और घंटे में सबसे बड़ी समानता ही यही है कि दोनों ही बजते हैं। मंदिर के घंटे को तो बस हिलाया और बजा, लेकिन बेचारी घड़ी को बजने के लिए चलना पड़ता है। वह जहां है, वहीं चलती रहती है। वह कभी चलते चलते थकती नहीं। पुरानी घड़ियां जब थक जाती थीं, तो उनमें चाबी भरना पड़ती थी। घंटे अभी डिजिटल नहीं हुए, घड़ियां जरूर हो गई हैं, क्योंकि घड़ियां समय के साथ चलना जानती हैं।

जब लोगों के पास समय तो था, लेकिन घड़ियां नहीं थी, तब घंटों की आवाज से ही समय का बोध करवाया जाता था। चार बजे चार घंटे और ग्यारह बजे, ग्यारह घंटे बजाकर समय की जानकारी दी जाती थी।

पुरानी दीवार घड़ियां हर घंटे में बजकर ही टाइम बताया करती थी। रेलवे में आज भी टाइम कीपर होते हैं। गाड़ियों का टाइम टेबल यात्रियों के लिए बड़ा उपयोगी होता है।।

घड़ी छोटी हो या बड़ी, घर की हो या घंटाघर की, उसे हर पल, हर सेकंड, हर मिनिट और हर घंटे, चौबीसों घंटे, लगातार चलते ही रहना है। उसे मंदिर के घंटे की तरह, चैन कहां आराम कहां।

मंदिर के घंटे के अपने ठाठ हैं। मंदिर में ऊंचा लगा रहता है, बच्चों की पहुंच से दूर। जिसने घंटा नहीं बजाया, समझो, उसने मंदिर में प्रवेश नहीं पाया।

किसी के घर में प्रवेश के समय क्या हम घंटी नहीं बजाते। इंसाफ का मंदिर हो या भगवान का मंदिर घंटा तो बजाना ही पड़ता है। कानून अंधा हो सकता है, हमारा भगवान नहीं।

उसके न्याय पर आज भी हमें भरोसा है। तेरे भरोसे हैं नंदलाला। ।

घंटाघर की घड़ियां वहीं रह गईं, लेकिन वक्त बहुत आगे निकल गया। बेचारी पुरानी घड़ियां भी देखभाल मांगती हैं। आज किसे फुर्सत, घंटाघर की उन घड़ियों की ओर झांके भी। कभी कभी जब चौराहे पर लाल बत्ती के कारण ट्रैफिक रुकता है, तो उन पर जरूर नजर पड़ जाती है और अनायास बच्चों की हिंदी नर्सरी की यह पुरानी पंक्तियां याद आ जाती हैं ;

घंटाघर में चार घड़ी

चारों में जंजीर पड़ी।

जब जब घंटा बजता है

सोया मुसाफिर जगता है। ।

जिस इमारत का नाम ही बेल टॉवर अर्थात् घंटाघर हो, उनकी घड़ियों के घंटों की आवाज भी शायद कभी सुनने में आती हों, आज तो ध्वनि प्रदूषण और वातावरण के प्रदूषण में इनका अस्तित्व ही किसी चमत्कार से कम नहीं ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९४ ☆ न्यूयॉर्क से – श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९४ ☆

?  न्यूयॉर्क से – संस्मरणात्मक आलेख – श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ज्ञानरंजन

(जन्म: 21 नवंबर 1936, निधन : 07 जनवरी 2026)

(हिंदी के प्रमुख कथाकार और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक थे। ‘साठोत्तरी’ पीढ़ी के साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान। उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई और वे जबलपुर के जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रहे। उनकी कहानियों में मानवीय रिश्तों का तीखा विश्लेषण और शहरी जीवन का मार्मिक चित्रण मिलता है, ‘कबाड़खाना’ उनकी लोकप्रिय गद्य रचना है और उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले।)

ज्ञानरंजन हिंदी कहानी के उस युग के प्रवर्तक स्वर हैं जिन्होंने “आम आदमी” को कथा का केंद्र बनाया। उन्होंने हमारे भीतर बसने वाले मौन, असहमति और पीढ़ियों के फासले को इतने स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया कि उनकी कहानियाँ  समय की डायरी बन गईं। वे दैहिक जीवन से दुनिया छोड़ गए हैं। सबको किसी न किसी दिन जाना ही होता है, किन्तु वे अपने शब्द संवाद में और हमारे संस्मरणों में चिर जीवी बने रहेंगे।

उन्होंने पहल में मुझे स्थान दिया था, उनके निवास पर जाकर उनसे मिलने के अवसर आए, उनकी सादगी के चित्र सजीव हो रहे हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर, किसी समारोह में अनायास कई बार मिले, चरण स्पर्श करने का यत्न करते ही कंधे पकड़ लेते थे।

नमन ज्ञानरंजन 🙏

उनकी लेखनी में कोई कृत्रिमता नहीं थी ।  उनकी सोच  जीवन के छोटे क्षणों में बड़े अर्थ खोजती थी। उनकी कहानी  ‘पिता’ याद आ रही है।  ऐसी  कहानियाँ हमें अपने घर के भीतर झाँकने को विवश करती हैं ।  उस कमरे तक जहाँ पिता और पुत्र हृदय से नहीं, संकोच से बात करते हैं। समाज जैसे-जैसे ‘तरक्की’ की दौड़ में बढ़ा, पिता का अनुभव ‘अप्रासंगिक’ माना जाने लगा है । यही त्रासदी उनकी कथा पिता का महत्त्वपूर्ण बिंदु है। 

ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी कथा साहित्य ने अपना एक  साक्षी खो दिया। किंतु उनकी कहानियों का असर  जीवित रहने वाला है। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक या आधुनिकता से नहीं, मनुष्यता से ही पीढ़ियाँ जुड़ी रहती हैं। 

००००

नीचे मैं उनकी कहानी पिता का जो कथानक स्मरण है दे रहा हूं ।

उसी भाव को पिता पुत्र की वर्तमान पीढ़ी पर अधिरोपित कर श्रद्धांजलि स्वरूप एक नई कहानी लिख कर उन्हें समर्पित करता हूँ।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

ज्ञानरंजन की कहानी — “पिता” का कथा सार 

कहानी ‘पिता’ में एक वृद्ध व्यक्ति अपने बेटे के पास शहर आता है। बेटा अब एक आधुनिक, व्यवस्थित, व्यस्त जीवन में है। वह पिता का आदर करता है, पर उस आदर में वह आत्मीयता नहीं  नियम और दूरी है। 

पिता छोटे कस्बे के, सहज और भावुक व्यक्ति हैं। शहर की ठंडी दीवारों में उन्हें अपनेपन की जगह नहीं मिलती। टीवी, फ़ोन, ऑफिस की बातें और ‘मॉडर्न’ रहन-सहन के बीच पिता धीरे धीरे खुद को असहज महसूस करने लगते हैं। कहीं कुछ कहना चाहते हैं, पर शब्द नहीं ढूँढ पाते। 

रात को वे बेटे को सोते देखते हैं और सोचते हैं , “यह अब मेरे बस का नहीं रहा।” 

यह वाक्य पूरी कहानी का सार है। “पिता” केवल एक निजी संबंध की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ी के सोच परिवर्तन की कहानी है। 

यह उस मौन पीढ़ी की कथा है जो समझ तो सब जाती है, पर कह नहीं पाती। और उस नई पीढ़ी की भी, जो सुन तो लेती है, पर समझना भूल गई है। 

कहानी का वातावरण अत्यंत सूक्ष्म है । बेटे की व्यस्तता, पिता की निस्तब्धता, घर की ठंडी हवा, और उनके भीतर का अकेलापन ।  सब मिलकर एक अदृश्य संवाद रचते हैं।

पुत्र पिता को नई सुविधाओं से आराम पहुंचाना चाहता है, पर आत्म संतोषी पिता को वह पसंद नहीं।

एक दिन पुत्र खिड़की से देखता है कि पिता खटिया बाहर निकाल कर गर्मी से बचाव के लिए उस पर पानी छिड़क रहे हैं, किन्तु वह चाह कर भी कुछ कर नहीं सकता ।

ज्ञानरंजन का यह शिल्प आज भी पीढ़ीगत विमर्श का जीवंत प्रतीक है। 

०००००

भाव रूपांतरित कथा

“वाया वीडियो कॉल”

(ज्ञानरंजन की कहानी “पिता” का समकालीन पुनराख्यान)

लेखक : विवेक रंजन श्रीवास्तव

न्यूयॉर्क से

हवाई जहाज की खिड़की से नीचे झिलमिलाती बर्फ़ दिख रही थी। बूढ़े पिता ने कौतूहल से उस परतदार सफेदी को देखा । जैसे किसी पुराने समय की चिट्ठियाँ अब बर्फ़ बनकर फैल गई हों। 

वह पहली बार बेटे के देश जा रहे थे,न्यूयॉर्क। बेटे ने महीनों पहले कहा था, “आपको देखे ज़माना हो गया, अब आ जाइए कुछ दिनों को।”  टिकिट भेज रहा हूं।

पिता की पीढ़ी के पास अनुभव के समय का सरोवर था । धीरे बहता, विचार करता, जमा होता। बेटे की पीढ़ी के पास समय नहीं, बस “शेड्यूल” था । हर मुलाकात मोबाइल पर ‘कैलेंडर एंट्री’ में दर्ज। 

एयरपोर्ट से घर तक बेटे ने गाड़ी में स्पॉटिफ़ाई पर कोई अंग्रेज़ी गाना लगाया, बीच-बीच में मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालता रहा। पिता खिड़की से बाहर देखते रहे। वही दृश्य जो उन्होंने कई बार कल्पना में देखे थे, उँची इमारतें, चौड़ी सड़कों का स्वप्निल अनुशासन। पर भीतर एक हल्की उदासी उठ रही थी, जिस पर वे विजय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करते , खिड़की से देखते बेटे से पूछते पर बेटे का मोबाइल नोटिफिकेशन, चौराहे के सिग्नल उसे उनसे उन्मुक्त बात करने से रोक देते ।

घर पहुँचे तो बेटे ने रोबोटिक आवाज़ से कहा, “Alexa, लाइट ऑन करो।” 

पिता मुस्कुरा दिए, यह नई दुनिया थी, जहाँ चाय तक आवाज़ से बनती थी और रिश्ते इमोजी से जताए जाते थे। 

रात को, जब बेटा लैपटॉप पर देर तक काम करता रहा, पिता ने चुपचाप खिड़की से बाहर देखा , बर्फ़ गिर रही थी। 

उन्हें याद आया, कैसे कभी गाँव में वह बेटे के लिए स्वयं घोडा बन जाते थे, और वह दौड़ में सबसे आगे निकलने का सपना देखा करता था। अब वही बेटा ऐसी दौड़ में था जिसका अंत किसी को नहीं पता। 

अगली सुबह कॉफी के साथ पिता बोले,

“तुम्हें कभी अपने बचपन का घर याद आता है?” 

बेटे ने हँसकर कहा, “डैड, अब तो सब कुछ क्लाउड में है, लगता है यादें भी।” 

पिता ने मुस्कुराहट में अपनी भावनाएं छिपा ली। 

बेटे की पत्नी और बच्चे कोई 6 घंटे की ड्राइव पर रहते हैं, शाम को वीडियो कॉल पर बेटा अपनी पत्नी और बच्चों को दिखा रहा था “ भारत से दादाजी आए हैं।” 

पिता स्क्रीन पर झुके बच्चों को देख मुस्कुराए। उन्हें लगा, अब हर रिश्ता “वाया वीडियो कॉल” है निकट मगर असम्पृक्त। 

रात में बेटे ने पास आकर धीमे से उनका हाथ दबाते हुए कहा, “डैड, मुझे पता है आप सोचते हैं मैं दूर चला गया हूँ।” 

पिता ने उसकी ओर देखा बोले “नहीं बेटा!

पर जो वे नहीं बोले वह था  “दूरी केवल मीलों से नहीं, संवाद और मौन से भी मापी जाती है।” 

कुछ देर बाद धीरे से बोले, “देखो, बाहर अब भी बर्फ़ गिर रही है, पर कोई आवाज़ नहीं होती।” 

बेटा चुप था। दोनों ने खिड़की से बाहर की ओर देखा। 

शायद वही मौन अब दोनों पीढ़ियों के बीच था , सफेद, सुंदर और बर्फ़ सा ठंडा।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७२ ☆ ॐ का : पौधों पर सकारात्मक प्रभाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “ॐ का : पौधों पर सकारात्मक प्रभाव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७२ ☆ ॐ का : पौधों पर सकारात्मक प्रभाव… ☆

ॐ केवल एक शब्द नहीं, यह सृष्टि की पहली धड़कन है। जब यह ध्वनि हरियाली से जुड़ती है, तो पेड़-पौधे केवल बढ़ते नहीं, जीवंत चेतना बन जाते हैं। ॐ के साथ सूरजपुर गाँव के सभी लोग अपने दिन की शुरुआत करते ।नदी किनारे एक छोटा-सा उपवन था। वहाँ एक साधिका रोज़ सुबह सूर्योदय से पहले आती, नंगे पाँव धरती को स्पर्श करती और एक बरगद के नीचे बैठकर धीरे-धीरे ॐ का उच्चारण करती।

उसकी आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर स्थिर और प्रेम से भरी थी।

“ॐ… ॐ… ॐ…”

ध्वनि हवा में नहीं,

धरती की नसों में उतर जाती थी।

धीरे-धीरे उस उपवन में परिवर्तन होने लगा। सूखे पौधों में नई कोंपलें फूटने लगीं, पत्तियाँ अधिक हरी और चमकदार होने लगीं, फूलों में सुगंध बढ़ गई, पक्षी वहाँ अधिक समय ठहरने लगे। गाँव के लोग आश्चर्य में थे। किसी ने पूछा—

“माँ, आपने कोई दवा डाली है क्या?”

साधिका मुस्कुराई और बोली—

“नहीं पुत्र,

मैंने केवल ॐ की ध्वनि से उन्हें याद दिलाया है

कि वे भी ब्रह्म का ही अंश हैं।”

ॐ और पेड़-पौधों का गहरा संबंध भावात्मक सत्य है । ॐ की ध्वनि कंपन है,और हर पौधा कंपन को महसूस करता है।जब प्रेमपूर्ण ध्वनि मिलती है,तो पौधा तनाव नहीं, विकास चुनता है।

ॐ = शांति + संतुलन + जीवन ऊर्जा।

पेड़-पौधे शांति में सबसे अच्छे से बढ़ते हैं। ॐ धरती को यह संदेश देता है कि तुम अकेली नहीं हो,मैं तुम्हारे साथ हूँ।”जब आप पेड़ लगाएँ,तो केवल पानी न दें…ॐ की ध्वनि भी दें।जब आप पौधे के पास बैठें,तो उसे वस्तु न समझें…जीवित परिवार मानें।हर “ॐ” एक बीज है,जो हरियाली के रूप में फल देता है।

आप जहाँ भी पेड़ लगाएँ, जहाँ भी हरियाली की बात करें, वहाँ आपकी वाणी में ॐ की शक्ति हो इसका ध्यान रखें । ग्रीन मोटिवेशन सिर्फ पौधे उगाना नहीं बल्कि पौधों के साथ निरंतर ग्रो होना है ।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८१ ⇒ | प्र कृ ति | ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “| प्र कृ ति | “।)

?अभी अभी # ८८१ ⇒ आलेख – | प्र कृ ति | ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

* N A T U R E *

जो कृति है और प्रकट है, वह प्रकृति है। प्रकट है, क्योंकि दिखाई देती है, और किसी अदृश्य, अप्रकट द्वारा अभिव्यक्त (manifest) की गई है। वैसे प्रकृति जितनी प्रकट है, उतनी ही अप्रकट और आकस्मिक भी।

प्रकृति जड़ भी है और चेतन भी,

शाश्वत भी और अस्थिर भी।

मनुष्य की भी अपनी प्रकृति है, वह भी जितनी प्रकट है उतनी ही अप्रकट भी। प्रकृति का भी नेचर है और हमारा भी नेचर। जिस तरह मौसम खराब होता है, हमारा भी मूड खराब होता है। प्रकृति में कहीं जलजला तो कहीं ज्वालामुखी। इंसान में भी कोई सूरजमुखी तो कोई ज्वालामुखी। कितनी समानता है हममें और प्रकृति में। हम दोनों का नेचर कितना मिलता है।।

प्रकृति का अपना स्वभाव है और हमारा अपना। प्रकृति अगर अपना स्वभाव बदल ले, तो आसमान टूट पड़े, सूरज बिना नागा, सुबह शाम अपनी ड्यूटी बजाता है, लेकिन अपनी जगह से हिलडुल भी नहीं सकता। सब जानते हैं वह आग का गोला है। आपके पास जो आएगा, वो जल जाएगा। ठंड कितनी भी हो, अलाव से थोड़ी दूरी, बहुत जरूरी है।

जिन पांच तत्वों से यह प्रकृति बनी है, उन्हीं पांच तत्वों से हमारा यह पंच महाभूत शरीर बना है।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पांच तत्व हैं तो प्रकृति है, पुरुष है। महाप्राण ही महापुरुष है, वह और प्रकृति एक है। अगर प्रकृति में वह प्राण तत्व मौजूद नहीं होता, तो हम सांस ही नहीं ले पाते। उस दौर से भी हम अभी अभी गुजर चुके हैं। हमने ही प्रकृति के साथ छेड़खानी की, प्रकृति ने नहीं।।

प्रकृति की लीला का विस्तार भी होता है और प्रकृति अपने आपको समेट भी लेती है। जिस तरह जन्म है तो मृत्यु, उसी तरह प्रकृति में अगर प्रलय है तो पुनरूदय भी, और पुनर्निर्माण भी। बनाकर मिटाना, और मिटाकर बनाना, ही है उसका दस्तूर पुराना। कोई तो है सर्वशक्तिमान ! मान या ना मान।

नदियां ना पीयें अपना जल, वृक्ष ना खायें कभी अपना फल। लेकिन बेचारे इंसान की प्रकृति देखो, उसे इसी प्रकृति का जल भी पीना है और फल भी खाना है। वह प्रकृति का ही नमक खाकर प्रकृति पर अपना हुक्म चलाना चाहता है। पानी में चलना चाहता है, हवा में उड़ना चाहता है। मछली नहीं बन पाया, तो जहाज बना लिया। पंछी की तरह हवा में नहीं उड़ पाया, तो हवाई जहाज बना लिया।।

ज्ञान अगर सनातन है, तो विज्ञान खोज और आविष्कार। हम अपने स्वर्णिम अतीत में जा नहीं सकते। अभी तक किसी टाइटन कंपनी ने टाइम मशीन नहीं निकाली। नवग्रह के प्रताप के आगे नतमस्तक हो, हम चांद पर भी उतर आए और शायद मंगल पर भी कॉलोनी बसा लें। हम शक्तियों से डरते भी हैं और उनका आव्हान भी करते हैं। प्रकृति पर हमारा विश्वास भी है और अंध विश्वास भी।

नये वाहन को मंदिर ले जाना, यात्राओं के पहले नारियल फोड़ना, वास्तु शांति और ग्रह शांति, यज्ञ, हवन पूजा, कथा कीर्तन और व्रत उपवास करते हुए भी हमारे वैज्ञानिक शोध और आविष्कार में सक्रिय बने हुए हैं। अपने स्वभाव और प्रकृति के कानूनों के बीच सामंजस्य स्थापित करना ही समय से समझौता करना है।।

हम पर हमारा स्वभाव हावी ना हो, हम जितना प्रकृति से लें, हाथ जोड़कर लें, और तेरा तुझको अर्पण करते हुए उसकी चीजें वापस उसे ही लौटा दें। आप सिर्फ प्रकृति का दोहन कर सकते हैं, शोषण नहीं। प्रकृति हमारी वत्सला मां है, जो हमें पाल पोसकर बड़ा कर रही है। बड़ा होकर हमें उसका ही खेत जोतना है, फसल उगानी है, कुएं की रेहट के पानी से जमीन को सींचना है। वृक्ष उगाना है। फिर से घी दूध की नदियां बहाना है।

हमारे अंदर भी प्रकृति, बाहर भी प्रकृति, दोनों के अपने अपने स्वभाव, Love thy neighbour ही नहीं, Love thy nature.

प्रकृति को प्यार करें, अपने मूल स्वरूप को प्यार करें। मौसम तो बदलता ही रहता है और हमारा मिजाज भी। कल भले ही सूरज नहीं निकला हो, आज फिर मौसम आशिकाना है।

ये कौन चित्रकार है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८८० ⇒ हृदय परिवर्तन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हृदय परिवर्तन…“।)

?अभी अभी # ८८० ⇒ आलेख – हृदय परिवर्तन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हृदय हमारे शरीर का वह अंग है, जो हमेशा धड़कता ही रहता है। बड़ा नाजुक अंग है यह, हमेशा घड़ी की टिक टिक की तरह, धक धक किया करता है, एक मिनिट में 60 से लगाकर 90 बार तक।

इसमें घड़ी की तरह कांटे नहीं होते, फूल की तरह कोमल होता है यह हृदय, क्योंकि यहां प्रेम का वास है। कहते हैं, आत्मा और परमात्मा दोनों का गुप्त रूप से वास यहीं है।

यह अगर थोड़ा भी छलका, तो प्रेम प्रकट हो जाता है।।

कहां हम और कहां राम भक्त हनुमान, फिर भी हमारे प्रिय भाई मुकेश गलत नहीं कह गए ;

जिनके हृदय श्री राम बसे,

उन, और का नाम लियो न लियो।

हमारे हृदय में कौन विराजमान है, क्या यह जानना इतना आसान है।

बोलचाल की भाषा में, यही तो वह दिल है, जो कभी बेचारा, कभी पागल, तो कभी दीवाना है। यही वह जिया है, जो कभी कभी पिया के लिए बेकरार रहता है। कभी सुख चैन, तो कभी बैचेन, यही इस दिल की दास्तान, दिन रैन।।

कहने को छोटा सा दिल, लेकिन कहीं यह विशाल हृदय तो कहीं संग दिल, कोई दिल वाला, तो कोई दिल का मरीज। कितने हृदय रोग विशेषज्ञ तो कितने हृदय सम्राट।

सबके अपने अपने ठाठ।

आज विज्ञान भले ही इस हृदय की एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्ट और बायपास कर ले, कितनी भी चीर फाड़ कर ले, हृदय का प्रत्यारोपण भी कर ले, लेकिन इसकी भावना को छूना किसी चिकित्सक के बस का नहीं।।

सभी का हृदय एक समान धड़कता है, फिर भी सारे इंसान एक जैसे क्यों नहीं होते। यह चित्त क्या बला है, इंसान भला और बुरा क्यों होता है, यह तो सब ज्ञानी ध्यानी जानते हैं, लेकिन क्या किसी बुरे इंसान का हृदय परिवर्तन इतना आसान है।

सुना है, नर सत्संग से, क्या से क्या जो जाए ! अगर ऐसा होता तो शायद महा ज्ञानी शिव भक्त रावण, विभीषण बन जाता। वाल्मीकि पहले डाकू थे, और अंगुलिमाल की तो पूछिए ही मत। कहीं निर्मल मन की बात होती है तो कहीं कुत्ते की पूंछ की।।

काश कोई ऐसी जादू की छड़ी होती कि इधर फिराई और उधर हृदय परिवर्तन, जैसा आजकल राजनीति में देखने में आता है। कभी कमल तो कभी कमलनाथ, कल शिवराज तो आज मोहन यादव। यथा महाराजा, तथा प्रजा।

सबका साथ, सबका विकास के साथ साथ, कितना अच्छा हो, सबका हृदय परिवर्तन भी हो जाए तो ना ही रहेगा बांस, और ना ही बजेगी अलग अलग सुरों में बांसुरी। बस सिर्फ एक, चैन की बांसुरी ! लेकिन यह क्या, राधिके तूने बंसुरी चुराई ..!!??

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८७९ ⇒ घड़ी और समय ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घड़ी और समय…“।)

?अभी अभी # ८७९ ⇒ आलेख – घड़ी और समय ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हमें समय दिखाई नहीं देता, फिर भी हर घड़ी, हर पल, समय बदलता रहता है। समय को देखने के लिए हमारे पास घड़ी है। समय कभी नहीं बजता, फिर भी हमें तसल्ली नहीं होती, घड़ी देखते रहते हैं, कितना बजा ! घंटे की आवाज सुनकर, अलार्म लगाकर हमें पता चलता है, कितना बजा, कितनी बजी।

घड़ी की टिक टिक और हमारे दिल की धड़कन में भी बड़ी समानता है। अगर उधर टिक टिक, तो इधर धक धक। उधर इंतजार की घड़ियां और इधर दिल की धड़कन। इंतजार और अभी, और अभी, और अभी।।

समय देखने के लिए अगर हमारे पास घड़ी है, तो तारीख और तिथि देखने के लिए कैलेंडर और पंचांग।

वेतन के लिए हम तारीख देखते हैं और शुभ मुहूर्त केलिए तिथि और वार। शुभ समय के निर्धारण के लिए घड़ी नहीं, चौघड़िया देखा जाता है। हमारे अच्छे बुरे समय का निर्णय घड़ी से नहीं, काल निर्णय से होता है। सिर्फ अपनी ही नहीं, ग्रहों की दशा भी देखी जाती है।

दिन रात बदलते हैं,

हालात बदलते हैं।

साथ साथ मौसम के

फूल और पात बदलते हैं: और कैलेंडर भी

हर साल बदलते हैं।।

नए कपड़ों की ही तरह लोग नए वर्ष की भी खुशी मनाते हैं। कोई जीन्स पहन रहा है तो कोई धोती कुर्ता ! यह साल मेरा नहीं। हिंदू तिथि और पंचांग वाला साल मेरा है। खुशी तो खुशी है, वक्त क्या तेरा मेरा। जन्म मरण कहां चौघड़िया और कैलेंडर देखते हैं। हां, जन्म तो फिर भी तारीख, तिथि और मुहूर्त से होने लग गया है। सिजेरियन जिंदाबाद। जो भविष्य दृष्टा होते हैं, उनकी बात और है, आम आदमी के लिए तो आज भी जिंदगी एक पहेली ही है और मौत अंतिम सत्य।

आपको आपका नव वर्ष मुबारक चाहे वह अब वाला हो या आगामी ९ अप्रैल २०२६ चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि। गया दिसंबर आई जनवरी। हो सकता है सभी हिंदू उत्सव इस बार २२ जनवरी को ही धावा बोल दें। असली काउंट डाउन तो यही है। जब वक्त ठहर जाएगा, इतिहास बदल जाएगा और इस देश में फिर से रामराज्य की स्थापना हो जाएगी। शायद अच्छे समय और अच्छी घड़ी की यह जुगलबंदी हो। नेपथ्य में कहीं से तथास्तु की ध्वनि कानों में पड़ रही है।

Be it so ! शुभ शुभ सोचें स्वागत नव वर्ष २०२६…

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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