हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा”” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(आज पिता दिवस पर एक लघुकथा )

शहर के फुटपाथ से लगे बिजली के खम्भे अपनी पीली रोशनी से सारे शहर को चमकातेथे, किन्तु उन्ही खम्भों के नीचे खड़े भिखारियों की खुली हथेलियों पर अंधेरा ही रहता। उनकी हथेलियाँ तो तभी चमकतीं जब कोई दाता उन पर  छोटे या बड़े  पैसों का सिक्का रख देता। तब, ये हथेलियाँ सिक्कों के अनुपात में 25, 40 या 100 पाॅवर के बल्ब के समान चमक उठती। ऐसी ही एक हथेली का नाम रमदू था। यह नाम उसे कब, किसने और कैसे दिया, कोई नहीं जानता। स्वंय रमदू भी नहीं। बचपन से लेकर आज तक इसी खम्भे के नीचे खड़े होकर भीख माँगते-माँगते उसे साठ वर्ष हो गए।

कुछ महीनों से वह सुबह दस बजे और शाम पाँच बजे एक-एक घण्टे के लिए चौराहे पर चला जाता। इस समय चौराहे पर ट्रैफिक जाम रहता। पाँच-पाँच मिनट तक हरा सिग्नल नहीं होता। कारों की लाइनें लग जाती। रमदू इन्हीं कारों के शीशे में अपनी हथेली फैला देता। उसकी अनुभवी आँखें कार व कार मालिकों को पहचानने लगी थीं। अतः उसकी हथेली प्रायः खुली नहीं आती थी। जब ट्रेफिक कम हो जाता, वह अपने खम्भे के पास आ जाता। यदि वहाँ कोई दूसरा भिखारी खड़ा होता तो वह चीख-चीखकर, गालियाँ देकर उसे भगा देता। अक्सर भिखारी उसे देखते ही उसका खम्मा छोड़ देते।

उस दिन भी रमदू ने रुकी हुई कारों में से एक कार में अपनी हथेली फैला दी। क्षणभर के बाद ही उसे लगा कि आज उसने गलत कार चुनी है। इस कार ने कई बार उसे निराश लौटाया है। सेठ बुलाकीदास बड़े कंजूस और चिड़चिड़े व्यक्ति थे।

रमदू अपनी हथेली खींच ही रहा था कि सेठ बुलाकीदास ने उसं रुकने का संकेत दिया और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकालकर उसकी हथेली पर रख दिया। रमदू ने अपनी लम्बी जिन्दगी में सिर्फ़ सुना भर था कि सौ का नोट कारवालों के पास होता है। आज वह न केवल उसे इतने करीब से देख रहा था, बल्कि उसकी गर्म छुअन भी महसूस कर रहा था। एक अजीब से स्वप्न की तरह कभी सेठ को और कभी नोट को देख रहा था। सेठ ने मुसकुराते हुए कहा- “डरो नहीँ बाबा, रख लो। असली है। जाओ मौज करो। आज मैं पहली बार इस उम्र में बाप बना हूँ। अभी-अभी अस्पताल से खबर आई है कि मेरी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया है। वहीं जा रहा हूँ। बच्चे के लिए दुआ करो बाबा। जाओ मौज करो।”

बुढ़ापे में बाप बनने की कितनी खुशी होती है कि आदमी यह भी भूल जाता है कि वह अपनी खुशी किसके सामने व्यक्त कर रहा है। रमदू ने नोट को अपनी मुट्ठी में कैद कर बन्द मुट्ठी से ही सेठ को हाथ जोड़े। सिग्नल हरा हो गया। रमदू ने सेठ पर दुआ भरी नजर डाल अपना हाथ खींच लिया। कारों के समान रमदू भी सरकते-सरकते सड़क पार की। वह तेजी से अपने खम्भे की ओर बढ़ने लगा। उसका चेहरा मारे खुशी के सेठ बुलाकीदास के चेहरे की तरह चमकने लगा। उसकी मुट्ठी में सौ का नोट है,  उसकी चाल में एक सेठपन आ गया ।

उसने देखा कि उसके खम्भे के नीचे एक मरियल-सा भिखारी खड़ा है। पर आज उसके चेहरे पर गुर्राहट की जगह। मुस्कुराहट खेल रही थी। वह दबे पाँव उस भिखारी के पीछे खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और पीछे से उस भिखारी की खुली हथेली पर रख दिया। मरियल-से भिखारी ने चौंककर देखा तो वह काँपने लगा। रमदू मुस्कुरा रहा था। उसे मुस्कुराते देखकर वह भय और आश्चर्य से कभी सिक्के को, तो कभी रमदू को देख रहा था। गाली के बजाय रमदू से सिक्का जो मिला। रमदू ने हँसते हुए कहा- “डरो नहीं, आज दिनभर यहीं डटे रहो। तुम भी मौज करो। अपुन आज इस उम्र में पहली बार बाप बना है।” यह कह वह जेब में रखे सौ के नोट को यूँ थपथपाने लगा, मानो वह सौ का नोट नहीं, एक नन्हा-सा शिशु हो।

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर# ११० – लेखक की बेईमानी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– लेखक की बेईमानी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य – भँवर # ११० — लेखक की बेईमानी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वयोवद्ध सनत से पढ़ना तो छूट ही जाता, लेकिन उन्होंने जारी रखा। बच्चे उनकी रुचि के अनुसार पुस्तकें खरीद लाते थे। चालीस साल पहले की बात थी सनत अपने आंगन में फूल बो रहे थे। तभी एक मोटर खराब हो जाने पर उनके घर के सामने रुकी थी। सनत ने स्वयं मोटर ठीक कर दी थी। उन्होंने एकाकी आदमी को अतिथि स्वरूप चाय पिलायी थी। इस परिवार और घर से प्रभावित आदमी के पूछने पर उन्होंने संघर्षों से भरा अपना जीवन और पारिवारिक अनुराग उसे बताया था। वही लिखा गया था और आज सनत वही पढ़ रहे थे। आदमी से जब बात हुई थी सनत पढ़ने में कमजोर ही थे। उन्होंने कहा था पढ़ना आता नहीं है। आदमी जो एक सुविख्यात लेखक था उनकी अनपढ़ता का लाभ उठा कर उनकी अद्भुत जीवन यात्रा और आदर्श परिवार की कहानी को अपने विशद संस्मरण के नाम से लिखा था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

माँ ने रसोई से आवाज़ दी- “बेटा, चाय बना दूँ?”

रवि ने थके हुए स्वर में कहा- “हाँ माँ… आज बहुत थक गया हूँ।”

कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में चाय का कप थमा दिया।

रवि ने एक घूंट लिया।

फिर मुस्कुराकर बोला-

“माँ, पता है… जब भी जिंदगी उलझती है, मुझे लगता है बस एक कप चाय मिल जाए, सब ठीक हो  जाएगा।”

माँ हँस पड़ीं- “चाय में ऐसा क्या है?”

रवि ने कप को देखते हुए कहा- “चाय में सिर्फ दूध, पानी और पत्ती नहीं होती माँ…

उसमें आपका अपनापन, दोस्तों की बातें, बारिश की यादें और मन को सुकून देने वाला थोड़ा-सा प्यार भी घुला होता है।”

माँ चुप रहीं।

और रवि चाय के घूंट के साथ दिनभर की थकान पीता रहा।

तभी उसे लगा- हम सिर्फ चाय नहीं पीते,

उसके साथ रिश्तों की गर्माहट भी घूंट-घूंट पीते हैं।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०१ – कथा कहानी – जो लौटकर नहीं आते ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कहानी – जो लौटकर नहीं आते।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०१ – कथा कहानी – जो लौटकर नहीं आते ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कमरे की वो सीलन भरी गंध अब भी ठीक वैसी ही थी जैसी अविनाश के जिंदा रहते हुआ करती थी। अलमारी का वह पुराना आधा खुला पल्ला जैसे किसी टूटे हुए जबड़े की तरह चिढ़ा रहा था। मैं उसकी बिखरी हुई दुनिया को समेटने के लिए फर्श पर बैठ गया तो पैरों के नीचे धूल की एक मोटी परत चरमरा उठी। अविनाश के अचानक चले जाने के बाद इस घर में सन्नाटा इतनी जोर से चिल्लाता था कि कान के पर्दे फटने लगते थे। अलमारी के सबसे ऊपरी खाने में हाथ डालते ही उंगलियों से एक पुरानी डायरी टकराई जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसी डायरी के भीतर से एक मोड़ा हुआ कागज का टुकड़ा नीचे गिरा जिस पर लिखा था कि तुम्हें यह तब मिलेगा जब मैं बहुत दूर जा चुका हूँगा। दिल की धड़कन ने एक पल के लिए जैसे हड़ताल कर दी और फेफड़ों में हवा जम गई। उस कागज पर स्याही के कुछ ऐसे धब्बे थे जो आंसुओं के गिरने से फैल गए थे। मुझे लगा कि कोई अदृश्य हाथ मेरी गर्दन दबा रहा है और कमरे की खिड़की से आती धूप भी बर्फीली सुई की तरह चुभने लगी। मौत का यह कैसा क्रूर मजाक था कि जो इंसान जिंदगी भर अपनी हर बात को छुपाने का हुनर रखता था वह जाते-जाते एक ऐसा सुराग छोड़ गया जो मुझे जलती हुई भट्टी की तरफ खींच रहा था।

मैंने उस कागज को खोला तो अविनाश की वही कटी-फटी लिखावट सामने थी जो हमेशा किसी रहस्यमयी लिपि जैसी लगती थी। उसने लिखा था कि राहुल मुझे पता है कि तुम मुझे एक पत्थर दिल इंसान समझते रहे क्योंकि मैंने कभी तुम्हारी उम्मीदों का जवाब नहीं दिया। पर सच तो यह है कि मैं तुम्हें उस दलदल से बचाना चाहता था जिसका सिरा सीधे इस अलमारी के पीछे छिपे लॉकर से जुड़ता है। तभी बाहर लॉबी में किसी के जूतों की आहट हुई और मेरा पूरा बदन पसीने से तर हो गया। मैंने घबराकर पीछे मुड़कर देखा पर वहां केवल सन्नाटा अपनी लंबी उंगलियां फैलाए खड़ा था। तभी मां ने रसोई से आवाज दी “राहुल वहां क्या कर रहे हो इतनी देर से क्या तुम्हें कुछ मिला वहां।” मैंने अपनी कांपती आवाज को संभालते हुए कहा “नहीं मां यहां तो बस पुरानी रद्दी और धूल के सिवा कुछ भी नहीं है।” मां ने एक लंबी ठंडी सांस ली और बोली “उसकी चीजें जितनी जल्दी इस घर से बाहर चली जाएं उतना ही अच्छा है क्योंकि उसकी यादें अब इस घर को खाने लगी हैं।” मां की इस बात में छुपा हुआ दर्द और नफरत का वह अजीब मिश्रण मुझे झकझोर गया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर अविनाश ने ऐसा क्या गुनाह किया था जो मां भी उसे माफ नहीं कर पा रही थी।

मैं वापस उस अलमारी के सामने घुटनों के बल बैठ गया और उस भारी लकड़ी के ढांचे को पूरी ताकत से एक तरफ खिसकाया। दीवार के उस हिस्से पर सचमुच एक छोटा सा लोहे का दरवाजा था जो बरसों से बंद रहने के कारण जंग खा चुका था। चाबी कहां होगी यह सोचते ही मुझे अविनाश के गले का वह काला धागा याद आया जिसे वह सोते समय भी कभी अपने जिस्म से अलग नहीं करता था। वह धागा अब मेरे पास उसकी आखिरी निशानी के रूप में मेरे हाथ में बंधा हुआ था जिसमें एक छोटी सी पीतल की चाबी लटक रही थी। जब मैंने उस चाबी को ताले में घुमाया तो एक तीखी चरचराहट के साथ वह छोटा दरवाजा खुल गया और उसके अंदर एक मखमली डिब्बा रखा हुआ था। डिब्बे को खोलते ही मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि उसके अंदर किसी की मेडिकल रिपोर्ट और कुछ कानूनी कागजात थे। तभी अचानक खिड़की का पल्ला जोर से टकराया और मुझे लगा जैसे अविनाश मेरे ठीक पीछे खड़ा होकर मेरे कान में फुसफुसा रहा हो। उस बंद कमरे में हवा का एक ऐसा झोंका आया जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए और मुझे अपनी ही परछाई से डर लगने लगा।

कागजों को पढ़ते हुए मेरी आंखों से आंसू बहकर उस रिपोर्ट पर गिरने लगे जिससे वहां लिखे शब्द धुंधले होने लगे। उस रिपोर्ट के मुताबिक अविनाश को ब्लड कैंसर था और वह अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़ा था पर उसने यह बात पूरी दुनिया से छुपा कर रखी थी। चिट्ठी का अगला हिस्सा मेरे हाथ में था जिसमें लिखा था कि राहुल अगर मैं तुम्हें बताता कि मैं मरने वाला हूँ तो तुम अपनी पढ़ाई छोड़कर मेरे इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाते। मैं तुम्हारी आंखों में अपने लिए तरस की वह भीख नहीं देखना चाहता था जो अक्सर बीमार लोगों को मिलती है। मैंने जानबूझकर तुमसे लड़ाई की ताकि तुम मुझसे नफरत करने लगो और मेरे जाने के बाद तुम्हें ज्यादा दुख न हो। यह पढ़कर मेरा सीना फट गया और मैं पागलों की तरह उस खाली कमरे में रोने लगा जहां अब कोई सुनने वाला नहीं था। मैंने हवा में हाथ मारते हुए कहा “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया अविनाश क्या मैं इतना पराया था कि तुमने मुझे अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सच से भी दूर रखा।” कमरे का सन्नाटा मेरे इन सवालों को निगल गया और दीवारों पर टंगी उसकी हंसती हुई तस्वीर मुझे और ज्यादा रुलाने लगी।

तभी उस चिट्ठी के आखिरी पन्ने पर मेरी नजर पड़ी जहां कुछ ऐसा लिखा था जिसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसका दी। वहां लिखा था कि राहुल तुम्हें लगता होगा कि बीमारी ही मेरी मौत की वजह बनी पर सच यह है कि मुझे बचाने के लिए डॉक्टर ने जिस डोनर का इंतजाम किया था वह कोई और नहीं बल्कि तुम्हारे असली माता-पिता का सुराग था। इस घर में जिसे तुम अपनी मां समझते हो वह दरअसल मेरी सगी मां हैं पर तुम इस परिवार का हिस्सा कभी थे ही नहीं। मैंने तुम्हें गोद लिया था जब तुम्हारे माता-पिता एक हादसे में मारे गए थे और मैंने यह बात हमेशा छुपाए रखी ताकि तुम्हें कभी अनाथ होने का अहसास न हो। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा और सिर चकराने लगा क्योंकि जिस पहचान को मैं अपनी जिंदगी मान रहा था वह एक पल में ताश के पत्तों की तरह ढह गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अविनाश की मौत पर रोऊँ या अपनी इस नई और खोखली हकीकत पर जो मेरे सामने नंगी खड़ी थी।

तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और मां अंदर आईं जिनके हाथ में पानी का एक गिलास था। उन्होंने फर्श पर बिखरे कागजों और मेरी रोती हुई आंखों को देखा तो उनके हाथ से वह गिलास छूटकर गिर गया और पानी फर्श पर फैल गया। मां ने कांपते हुए होठों से कहा “तो आखिरकार तुम्हें पता चल ही गया जो अविनाश अपनी आखिरी सांस तक छुपाना चाहता था।” मैंने उस आखिरी कागज को मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा “मां क्या यह सच है कि मैं आपका बेटा नहीं हूँ और अविनाश ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।” मां ने घुटनों के बल बैठकर मुझे गले से लगा लिया और रोते हुए बोलीं “अविनाश तुमसे बहुत प्यार करता था राहुल उसने अपनी बीमारी के सारे पैसे तुम्हारी विदेश की पढ़ाई के लिए जमा कर दिए और खुद बिना इलाज के मर गया ताकि तुम एक शानदार जिंदगी जी सको।” उस अधूरी चिट्ठी का अंत अविनाश की मौत से नहीं बल्कि मेरी उस पहचान की मौत से हुआ था जिसे मैं सच समझता रहा और अब उस सूने कमरे में केवल दो लाचार इंसान थे जो एक ऐसे शख्स के लिए रो रहे थे जो नफरत का मुखौटा पहनकर दुनिया का सबसे बड़ा प्यार दे गया था।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)

☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।

भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।

शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,

“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”

बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।

शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,

“और भूख लगेगी क्या?”

बालक की आँखें झुक गईं—

“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”

बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।

शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—

“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”

“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ – बाल मजदूर (कलूवा) ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆

🌻लघु कथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔

मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।

ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”

“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”

“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”

कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।

आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस  गई थी।”

“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”

ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०० – कथा कहानी – घुटनों के बल बैठी इंसानियत ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा- घुटनों के बल बैठी इंसानियत)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०० – कथा कहानी  – घुटनों के बल बैठी इंसानियत ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

चमकती हुई कांच की दीवारों और मखमली कालीनों से सजे उस बड़े से शोरूम में वीआईपी ग्राहकों का हुजूम हमेशा वैसे ही उमड़ता था जैसे मुफ़्त के चंदन को घिसने के लिए पूरी बारात तैयार खड़ी हो। रामसरन वहां पिछले बीस साल से इस देश के लोकतंत्र की तरह घुटनों के बल बैठा था जिसका मुख्य और इकलौता काम वीआईपी पैरों के तलवों का नाप लेना था ताकि बड़े साहबों को कॉर्पोरेट की सीढ़ियां चढ़ने में कोई तकलीफ़ न हो। जब वह किसी बड़े साहब के पैर में पांच हजार का जूता डालने के लिए अपनी रीढ़ को नब्बे डिग्री पर मोड़ता तो उसकी हड्डियों से एक अजीब सी कराह उठती थी जो शोरूम के उस धीमे विदेशी संगीत में वैसे ही विलीन हो जाती थी जैसे चुनाव के बाद जनता के वादे। शोरूम के बड़े मालिक अक्सर मुस्कुराते हुए कहते थे “रामसरन तुम्हारे हाथों में जादू है क्योंकि तुम पैर देखकर ही इंसान की औकात और उसके बैंक बैलेंस का सही साइज बता देते हो।” रामसरन बस अपनी फीकी मुस्कान का विज्ञापन बिखेर कर रह जाता और उसकी आंखें काउंटर के पीछे रखे उस बड़े से चमड़े के बक्से पर टिक जातीं जिस पर हमेशा एक बड़ा सा ताला वैसे ही जड़ा रहता था जैसे हमारी व्यवस्था पर जवाबदेही का ताला। उस बक्से में क्या था यह रहस्य शोरूम के किसी पढ़े-लिखे कर्मचारी को नहीं पता था क्योंकि उसकी चाबी हमेशा रामसरन के गले में एक गंदे से धागे में लिपटी रहती थी। लोग कहते थे कि रामसरन ने इस दुकान में अपनी जिंदगी की सारी खुशियां दफन कर दी हैं और अब वह बस एक जिंदा लाश की तरह दूसरों के तलवे चाटने और सहलाने की कला में पीएचडी कर रहा है। आज भी जब शहर के सबसे बड़े बिजनेसमैन कपूर साहब अपनी चमचमाती कार से उतरे तो रामसरन पहले से ही फर्श पर घुटने टेक कर उनका स्वागत करने के लिए तैयार बैठा था मानो वह किसी राजा के सामने झुका हुआ कोई बंधुआ मजदूर हो जिसका अपनी परछाई पर भी कोई हक नहीं था।

कपूर साहब ने अपने भारी पैर को रामसरन के घुटने पर वैसे ही टिका दिया जैसे सरकारें जनता के सिर पर टैक्स का बोझ टिका देती हैं और बड़े घमंड से कहा “रामसरन इस बार कोई ऐसा जूता दिखाओ जो मेरी इस नई बिजनेस डील की तरह बिल्कुल शाही और बेदाग हो जिसमें सामने वाले की औकात नीचे दबी दिखे और पैसों की फिक्र मत करना।” रामसरन ने उनके मोजे को उतारते हुए बहुत धीरे से कहा “साहब पैर का नाप तो वही रहेगा जो पिछले साल था पर इस बार आपके तलवों की चमड़ी थोड़ी ज्यादा सख्त हो गई है शायद दूसरों का हक दबाते-दबाते वहां की संवेदनशीलता ही मर गई है।” कपूर साहब इस गहरे कटाक्ष को समझ नहीं पाए और जोर से हंसे और बोले “तुम बस पैर का साइज नापो रामसरन मेरी जिंदगी का नाप लेने की औकात मत बनाओ।” तभी काउंटर पर बैठे मैनेजर ने अपनी ऊंची गर्दन को और तानते हुए आवाज लगाई “रामसरन जल्दी करो अपनी इस दार्शनिक बकवास को बंद करो और अंदर के केबिन से वह खास इटालियन लेदर वाला पीस निकाल कर लाओ जो सिर्फ बड़े साहब की शान के लिए ही स्पेशल इम्पोर्ट किया गया है।” रामसरन उठा और हांफते हुए अंदर के अंधेरे कमरे की तरफ चला गया जहां जूतों के डिब्बों का एक ऐसा पहाड़ खड़ा था जो हमारे देश के विकास के दावों जैसा खोखला था। वहां पहुंचते ही उसने अपनी फटी कमीज के अंदर से वह चाबी निकाली और उस रहस्यमयी बक्से को एक पल के लिए सहलाया पर तभी मैनेजर के चिल्लाने की आवाज आई जो किसी भूखे भेड़िए की दहाड़ जैसी थी। उस बंद केबिन में घुटन और मुनाफे की बू इतनी ज्यादा थी कि रामसरन का दम फूलने लगा और उसकी आंखों के सामने कॉर्पोरेट गुलामी की धुंध छा गई पर वह खुद को संभालते हुए उस कीमती जूते का डिब्बा लेकर बाहर आ गया।

कपूर साहब के पैरों में वह नया इटालियन जूता पहनाते समय रामसरन के हाथ ऐसे कांप रहे थे जैसे रिश्वत लेते हुए किसी नए क्लर्क के हाथ कांपते हैं और उसकी आंखों से पानी की एक बूंद चुपके से गिरकर जूते के चमकदार फीते पर ठहर गई। कपूर साहब ने चिढ़कर अपना पैर पीछे खींचा मानो उनका पवित्र पैर किसी अछूत की भावना से दूषित हो गया हो और बोले “यह क्या बदतमीजी है रामसरन तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे पांच हजार के ब्रांडेड जूते पर अपने इन मुफ्त के आंसुओं को गिराने की क्या तुम्हारी बची-कुची अक्ल भी घास चरने गई है।” रामसरन ने तुरंत अपने फटे हुए अंगोछे से उस बूंद को पोंछा और गिड़गिड़ाते हुए कहा “माफ करना साहब बस इस पांच सितारा शोरूम की चकाचौंध से आंखों का पानी मर गया है और वही बाहर आ रहा है वैसे यह जूता आपकी झूठी शान में चार चांद लगा देगा।” तभी शोरूम का कांच वाला दरवाजा खुला और एक बूढ़ा भिखारी अंदर आने की हिमाकत करने लगा जिसे वहां खड़े सूट-बूट वाले सिक्योरिटी गार्ड ने तुरंत ऐसे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जैसे बजट से गरीब को बाहर निकाला जाता है। उस भिखारी को देखकर रामसरन के चेहरे का रंग बिल्कुल सफेद पड़ गया जैसे उसके शरीर का सारा खून किसी ने चूस लिया हो और उसके हाथ से पैर नापने वाला वह लोहे का स्केल फर्श पर गिर गया जिससे पूरा शोरूम गूंज उठा। मैनेजर ने गुस्से में आकर रामसरन को डांटते हुए कहा “अगर यह नाटक ही करना है तो सीधे सड़क पर भीख मांगो इस तरह हमारे वीआईपी ग्राहकों के सामने अपनी कंगाली का तमाशा मत बनाओ।” रामसरन ने चुपचाप अपना सिर झुका लिया क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इस आलीशान दुकान में जूते बिकते हैं इंसानी जमीर तो यहां मुफ़्त में गिरवी पड़ा रहता है।

दोपहर ढल चुकी थी और शोरूम में उन रईसों की भीड़ थोड़ी कम हुई जो अपनी बोरियत मिटाने के लिए लाखों की शॉपिंग करते हैं तो रामसरन चुपके से उस अंदर वाले अंधेरे केबिन में गया और उसने उस रहस्यमयी बक्से का ताला खोल दिया। बक्से के अंदर कोई सोने-चांदी के सिक्के नहीं थे बल्कि उसके अंदर धूल से सनी हुई एक बहुत पुरानी फटी हुई हवाई चप्पल की जोड़ी और कुछ पुराने अखबार के टुकड़े रखे थे जो इस देश की गरीबी के आंकड़ों की तरह फटे हुए थे। रामसरन ने उन चप्पलों को अपनी छाती से लगा लिया और इस तरह फूट-फूटकर रोने लगा जिससे उसकी सिसकियां उस बंद कमरे की वातानुकूलित दीवारों से टकराकर वापस आने लगीं क्योंकि एयर कंडीशनर हवा को तो ठंडा कर सकते हैं पर किसी के कलेजे की आग को नहीं। उसने उस चप्पल को चूमते हुए कहा “मैं रोज सुबह यहां दूसरों के पैर नापता हूँ उनकी हैसियत का अंदाजा लगाता हूँ पर तुम्हारे पैरों का सही नाप आज तक इस शोरूम से खरीद नहीं पाया।” तभी मैनेजर अचानक बिना दस्तक दिए अंदर आ गया और उसने रामसरन को इस हालत में देखकर अपनी भौहें सिकोड़ते हुए पूछा “रामसरन यह तुम क्या पागलों जैसी हरकत कर रहे हो और इस बदबूदार कबाड़ को इस वीआईपी शोरूम की नाक के नीचे क्यों छुपा कर रखा है।” रामसरन ने अपनी गीली आंखों को पोंछते हुए एक तीखा व्यंग्य कसा “साहब यह कबाड़ नहीं है यह मेरी औकात का वह आईना है जिसे मैं रोज रात को देखता हूँ ताकि कहीं इन बड़े साहबों के जूते चमकाते-चमकाते मैं यह न भूल जाऊं कि मैं भी एक इंसान हूँ।” मैनेजर ने उसकी इस गहरी बात को एक अनपढ़ की बकवास समझते हुए कहा “चलो अपनी यह फिलॉसफी बाहर फुटपाथ पर बेचना अभी एक नए साहब आए हैं जो अपने लाडले के लिए सबसे महंगा जूता खरीदना चाहते हैं।”

रामसरन फिर से अपनी उसी चिरपरिचित मुद्रा में घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया और उस नए साहब के छोटे बच्चे के पैर का नाप लेने लगा जो लगातार अपनी मां की गोद में वैसे ही मचल रहा था जैसे सत्ता के लिए नेता मचलते हैं। बच्चे की मां ने रामसरन की झुकी हुई पीठ और फटे हुए कपड़ों की तरफ देखते हुए बहुत तिरस्कार और घमंड से कहा “देखो बेटा अगर अच्छे से पढ़ाई नहीं करोगे और बड़े होकर साहब नहीं बनोगे तो तुम्हें भी इसी तरह लोगों के पैरों में बैठकर उनके जूते साफ करने पड़ेंगे और यही तुम्हारी औकात होगी।” रामसरन के दिल पर यह बात किसी जलती हुई कील की तरह चुभ गई पर उसने बिना कुछ कहे बच्चे के पैर में वह सुंदर सा मखमली जूता पहना दिया जो उस बच्चे की पूरी जिंदगी की कमाई से भी महंगा था। तभी उस बिगड़ैल बच्चे ने रामसरन के चेहरे पर एक जोर की लात मार दी जिससे रामसरन के सूखे होठों से खून की एक पतली धारा बह निकली और फर्श पर गिर गई। पूरा शोरूम एक पल के लिए शांत हो गया पर बच्चे के पढ़े-लिखे माता-पिता ने माफी मांगने की जहमत उठाने के बजाय हंसते हुए कहा “बच्चा है थोड़ा नटखट है वैसे भी इसे आदत है सबको अपनी उंगलियों पर नचाने की और बड़े बाप का बेटा है तो लात मारना तो इसका जन्मसिद्ध अधिकार है।” रामसरन ने जमीन पर गिरे अपने उस खून को अपनी कांपती उंगली से साफ किया और एक दर्दनाक मुस्कान के साथ बोला “कोई बात नहीं मेमसाब बड़े लोगों के बच्चों की लात भी हमारे जैसे गरीबों के लिए किसी शाही आशीर्वाद से कम नहीं होती।” इस मार्मिक और कड़वे दृश्य को देखकर वहां खड़े कुछ नए सेल्समैन की आंखों में भी शर्म के आंसू आ गए पर इस शोरूम के सिस्टम में रामसरन की लाचारी का अंत अभी बहुत दूर था।

शाम को जब शोरूम के बंद होने का वक्त आया और कांच के दरवाजों पर ताले लटकने लगे तो मालिक ने रामसरन को अपने केबिन में बुलाया और उसके हाथ में एक सफेद लिफाफा थमाते हुए बहुत ही ठंडे लहजे में कहा “रामसरन तुम्हारी उम्र अब हो चुकी है और तुम्हारे कांपते हाथों की वजह से हमारे वीआईपी ग्राहकों को बहुत असुविधा होती है इसलिए यह तुम्हारी सैलरी का आखिरी हिसाब है और कल से आने की जरूरत नहीं है।” रामसरन ने उस लिफाफे को देखा जिसमें उसकी बीस साल की वफादारी की कीमत चंद नोटों के रूप में बंद थी और फिर उसने अपने गले से वह चाबी निकालकर मालिक की कांच वाली मेज पर रख दी और कहा “साहब बस मुझे वह बक्सा ले जाने की इजाजत दे दीजिए जो अंदर रखा है क्योंकि मेरा हिसाब तो उसी में बंद है।” मालिक ने एक अमानवीय हंसी हंसते हुए कहा “ले जाओ वह कबाड़ वैसे भी वह हमारे इस ब्रांडेड शोरूम के स्टैंडर्ड को खराब कर रहा था पर जाते-जाते यह तो बता जाओ कि उस फटी चप्पल से तुम्हारा ऐसा क्या आशिकाना रिश्ता है।” रामसरन ने उस भारी बक्से को अपने बूढ़े और झुके हुए कंधों पर उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए रोते हुए कहा “साहब बीस साल पहले मेरा इकलौता बेटा इसी शोरूम के बाहर नंगे पैर घूम रहा था और मैंने उसे वीआईपी ग्राहकों के महंगे जूतों पर दाग लगने से बचाने के लिए और अपनी नौकरी बचाने के डर से बहुत दूर भगा दिया था जो बाद में एक तेज रफ्तार अमीर की कार के नीचे कुचल कर मर गया। यह चप्पल उसी के नंगे पैरों की है जिसका नाप लेने के लिए मैं आज तक हर आने वाले अमीर बच्चे के पैर में अपनी जिंदगी ढूंढता रहा ताकि अपने मरे हुए बेटे को एक बार सही साइज का जूता पहना सकूं पर इस शोरूम ने मुझे सिर्फ दूसरों के पैर मापना सिखाया अपने बेटे का कफ़न सिलना नहीं।” रामसरन की यह बात सुनते ही मालिक के पैरों के नीचे से मखमली कालीन खिसक गया और वह आलीशान शोरूम उस बूढ़े बाप के आंसुओं के समंदर में ऐसे डूब गया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मंत्री जी, बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने।

– किस मामले में भाई?

– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके।

– अरे , वह मास्टर? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,

– क्या कहते हैं हुजूर?

– उस पर यही इल्जाम है।

– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?

– क्यों?

– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए। जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया। बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं। और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता, वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा?

– अच्छा भाई। तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं। खैर। आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा।

खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५५ – लघुकथा – संशय ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५५ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ संशय ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

महेंद्र को उम्मीद थी कि, वे एक दिन उसके घर जरूर आयेंगें । वह पलक पावड़े बिछाए उनका बराबर इंतजार करता रहता था । अपने मन में वह तमाम ख्वाहिशों को बुनता और सोचता कि अगर वे उनके घर आये तो वह अपनी टूटी चारपाई पर एक फटा ही सही लेकिन सुन्दर साफ बढ़िया सा चादर बिछायेगा। छोटी सी कटोरी में गइया के थोड़े से दूध में जमी मीठी दही खिलायेगा।

कई बार उसे ऐसा लगता था कि वे आज उसके घर की तरफ आ रहे हैं, बस चंद पलों में आ ही जायेगे, ये सब सोच कर उसका मन बाँसो उछलने लगता था ।

वह स्वयं तो रोज उनके घर जाता, उनको नमस्ते कर हालचाल भी पूछता, उनके हर दुख सुख में अपने सामर्थ्य के हिसाब से खड़ा रहताl

पिछले दिनों जब उनके घर में उनका लड़का करोना से बीमार था, तब उनके अपने लोग दूर से झाँक कर चले गए थे, लेकिन महेन्द्र इन बातों से बेफिक्र न सिर्फ उनके घर गया था, बल्कि उनका हाल चाल पूछते हुए बोला था कि बाबूजी, भईया ठीक हो जायेगे, मैंने भईया के लिए हनुमान जी से मन्नत मांगी है ।

भला हो कोरोना का, शायद वह भी उसके प्रेम और समर्पण को समझ गया था, यही कारण था कि चौदह दिन बीतने के बाद उसका नन्हका भी पहले की तरह स्वस्थ होकर किलकारी भर रहा था।

लेकिन महेन्द्र को एक बात समझ में आ रही थी कि वे उसके घर तो नही आते है लेकिन उनके मन में मेरे बाबू के प्रति ममता और प्यार तो जरूर है।

आखिर वे मेरे घर क्यों नही आते है, इस बात का उसे उत्तर नहीं मिल रहा था ।

एक जब उसने थोड़ा दिमाग लगाया, तो उसे हल्का हल्का समझ में आया कि इसमे तो पद और कद का मामला है, जिसके बढ़ने और घटने का संकट या संशय है । बस..बस.. बस यही बात है कि वह नही आते है ।

चलो उनके इस संशय – संकोच पर भी आंच न आये । वे भले ही न आएं, लेकिन उनकी यशकीर्ति और ऊंचाइया छुए, अंततः वह ऐसा सोच कर खुश हो गया थाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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