(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समाधान।
लघु कथा – समाधानसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
पांचवी कक्षा में पढ़ने वाला आशीष शाम को चार बजे घर लौटता तो स्कूल बैग, यूनिफॉर्म और जूते उतारने के बाद अलमारी में से अपना मोबाइल निकालता और डाइनिंग टेबल पर पहुंच जाता.
दादी गीता उसे गर्म गर्म नाश्ता बना कर देती. वह नाश्ता खाते-खाते लगातार मोबाइल में आ रहे गेम्स खेलने लगता. गीता जी को बहुत बुरा लगता .एक दो बार उन्होंने टोक भी दिया – “बेटा खाते समय मोबाइल को कुछ देर साइड में रख दिया करो…” लेकिन वह उनकी बात को अनसुना करके अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहता.
आज फिर उसके मोबाइल देखने पर गीता ने कह दिया- ” बेटा, थोड़ी देर मोबाइल रख दो ना. मुझसे बात करो मैं भी तो यहीं बैठी हूं…” एकाएक वह गुस्से से भड़क उठा- ” मुझे दो घंटे बाद ट्यूशन पर जाना है फिर मोबाइल कब देखूंगा..? और आपके साथ मैं क्या बात करूं..? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो मोबाइल मत देखो..…आप अपना काम करो और मुझे मोबाइल देखने दो….”
और वह फिर से मोबाइल देखने में व्यस्त हो गया. अपने पोते के व्यवहार से गीता जी भीतर तक आहत हो गईं. उनकी आंखें भीग गईं.
रात को बेटे बहू को उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया तो दोनों एकदम चुप हो गए और एक दूसरे का मुंह देखने लगे.
अगले दिन शाम को ऑफिस से लौटने पर बहू बेटे ने गीता जी के हाथ में एक मोबाइल फोन रख दिया और बोले – ” मां,अब आप भी अपने आप को इसमें व्यस्त कर लो… हमारे पास यही एक समाधान है…”
☆ बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – २ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
उसके मन को बस एक ही सवाल निरंतर कुरेदता रहता … पति की सात-आठ हजार रुपये की तनख्वाह में मनमाफिक जीवन कैसे जिया जाए? यथा काल घर में नए मेहमान आने का अंदेशा होने लगा। दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। पति यथाशक्ति उसको लाड प्यार से जतन कर उसकी मांगें पूरी करने में लगा रहता। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई और एक शुभ दिन उनके जीवन में नन्ही परी ने कदम रखा। उसके आगमन के साथ ही उन दोनों के जीवन में एक नया मोड़ आया। उसके कार्यकलाप काफी हद तक बढ़ गए और साथ साथ खर्चे भी! लेकिन वह बदलते हालात के साथ पूरी तरह से जी जान लगा कर तालमेल बिठाने में लगी रही। चॉल में हमउम्र सहेलियों के साथ गपशप के दौरान विचारों और समस्याओं का आदान-प्रदान करते हुए, अनायास ही उसने एक गांठ मन में बांध ली कि, अपने सवालों के जवाब खुद को ही खोजने होते हैं। ऐसे में पहली बिटिया सवा साल की होते-होते फिर एक बार नया कोंपल फूटा। उसने सही समय पर दूसरे बच्चे को जन्म दिया और इस बार भी बेटी ही हुई। एक पल के लिए, अनजाने में ही उसके मन में हूक उठी कि काश इस बार बेटा होता तो कितना ही अच्छा होता! यह तो उस क्षण का आवेग था, परन्तु बेटा हो या बेटी… वात्सल्य भाव से भरपूर दूध की धारा माँ के अंचल से अपने आप ही झरने लगती है… और फिर इसी से समानांतर खर्चे का भी झरना तेजी से बहने लगा। अब तो ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या’ जैसी हालत होने लगी।
एक दिन, उसके पति ने नौकरी का विज्ञापन पढ़ा और अपने दिल पर पत्थर रखकर अकस्मात ही उसे सुझाव दिया कि यह नौकरी उसके लिए ठीक रहेगी। नौकरी के लिए एकमात्र शैक्षणिक योग्यता बारहवीं पास होना था। वह आयु सीमा भी पूरी कर रही थी। बस बाधा उत्पन्न करने वाली एकमात्र शर्त यह थी कि, उसे नगर निगम के मुख्य कार्यालय जाना पड़ेगा। अब तक वह मुंबई के जीवन से अच्छी तरह से परिचित हो चुकी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या वह अकेली बस से यात्रा कर पाएगी? लोकल ट्रेन का सफर तो दूर की बात थी। इस घडी तक तो घर की चारदीवारी में ही उसका विश्व समाया था । घर-आंगन के परे भी जग होता है, इस वास्तविकता को मानों वह भूल चुकी थी। लेकिन घर में आमदनी बढ़ाना अत्यावश्यक था। माता-पिता की दवाइयों और लड़कियों की स्कूल का खर्चा आए दिन बढ़ता ही जा रहा था। और पति के दोनों हाथ कमजोर पड़ने लगे थे। इस परिस्थिति में मजबूरन पति बहुत अनिच्छा से ही सही, उसे नौकरी के लिए आवेदन करने का आग्रह करने लगा। वह भी घर दर्दनाक हालत समझ पा रही थी, साथ ही पैसे की बढ़ती आवश्यकता उससे छिपी नहीं थी। एक ओर, खुद पैसे कमाने का विचार लुभावना प्रतीत हो रहा था, लेकिन दूसरी ओर उसके मन पर भय का गहरा साया छाया था। हर दिन उसे इतनी लंबी दूरी की यात्रा अकेले तय करनी होगी, उस प्रचंड भीड़भाड़ में अकेले मजबूती से डटे रहना, दिन भर अजनबी इन्सानों के बीच आना-जाना… और तिस पर काम? उसने तो महीनों से कलम छुई तक नहीं थी… वह जटिल सरकारी कार्य… क्या वह समझ पाएगी? क्या वह उसे सक्षमता से निभा पायेगी?… और उसकी छोटी बेटियां, सास-ससुर का क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा?… ऐसे अनगिनत सवाल उसके दिमाग को घेरे हुए थे, जिनके उत्तर ढूंढते हुए वह और भी भयकंपित होने लगी । “अरी भागवान! आवेदन करने में हर्ज क्या है? तुरन्त नौकरी मिलेगी इसकी कोई गुंजाईश तो है नहीं।”…उसके पति ने इन आश्वासक शब्दों से उसे मना ही लिया… उसने आवेदन किया। उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया… उसने अत्यधिक घबराहट की स्थिति में किसी तरह साक्षात्कार भी दिया… और आश्चर्यजनक रूप से, उसे एक महीने के भीतर नियुक्ति पत्र तक मिल गया…अब उसकी वास्तविक सत्वपरीक्षा का प्रारम्भ हुआ।
चॉल में ही रहने वाली एक चाची मामूली पैसे के ऐवज में बच्चियों की देखभाल करने के लिए राजी हो गई। लेकिन उसे नौकरी मिल जाने के बावजूद गृहकार्यों के लिए किसी नौकरानी को पालना नामुमकिन था, क्योंकि नौकरी ‘लोअर डिविजन क्लर्क’ की थी… और वेतन भी उसके पदानुसार ही सीमित था। एक राहत की बात थी कि, एक नौकरानी सास-ससुर को दोपहर के नियत समय पर खाना देने के लिए तैयार हो गई। उस नौकरानी का वेतन एक अनिवार्य खर्च ही था। धीरे-धीरे एक के बाद एक सारे परिवारजनों की रोजमर्रा जिंदगी सुस्थिति में आ गई। इन खर्चों को घटाने के पश्चात भी उसके पास कम से कम चार-पाँच हज़ार रुपये बचेंगे, ऐसा उसका अनुमान था। अब सबसे कठिन कार्य बचा था अपने अस्थिर मन को आत्मविश्वास के अश्व पर आरूढ़ करवाना।
अपने पति के विश्वास का हाथ मजबूती से थामे हुए, उसने यह व्यवधान भी दूर किया और उसकी नौकरी शुरू हो गई… और जीवन की रेलगाड़ी वक्त की पटरियों पर बेतहाशा भागने लगी। यादों के झुरमुट की हरियाली भी उसी द्रुतगति से पीछे हटती गई… एक-एक करके, वे इतने पीछे हो गई कि नजर की ओट से भी अदृश्य हो गई…ठीक वैसे ही, जैसे लोकल ट्रेन की खिड़की से ओझल होती रहती थी। … जब उसने पहली बार मुंबई में कदम रखा, तो वह अपने साथ सपनों की बड़ी सी गठरी भी साथ संजो कर लाई थी। उस गठरी में बंद सपने अपेक्षाकृत छोटे-छोटे ही थे! …वह चाहती थी, ‘राणीचा बाग’ (रानी का बगीचा) जी भरकर घूमूं, … कमला नेहरू पार्क में बने ‘बूट हाऊस’ अर्थात बूढ़ी औरत के जूते में जाते हुए मरीन ड्राईव्ह का मनोरम नजारा देखूँ, … उसने सुना था, जहाँ देखो वहीं सड़कों के किनारे बाजार सजते हैं रोज, अलीबाबा की गुफा जैसी तरह-तरह की चीज़ों से भरे रहते हैं…… उसने सोचा था, जहाँ तहाँ इतराते हुए चक्कर काटूंगी और मनचाही छोटी-मोटी चीज़ें खरीद लूँगी…उसे नमक की खदानें (मीठागर) देखने की बहुत उत्सुकता थी…इसके अलावा, वह देखना चाहती थी कि डबल-डेकर बस वास्तव में कैसी होती है… उसमें सवारी करने की चाह भी थी मन में… और उसका सबसे बड़ा सपना था मुंबई के समुन्दर का दर्शन करने का… मुंबई में भी समुन्दर है, यह जानने के तुरन्त बाद तो नीलवर्णी मनोरम सागर से गर्भनाल के अटूट बंधन द्वारा जुड़े सुहाने रिश्ते को वह किसी भी हालत में टूटने नहीं देना चाहती थी। लेकिन जैसे ही उसका जीवन उस चॉल में सिमटी छोटी-सी दुनिया में उलझ गया, वैसे ही ये नन्हे कोंपल से खिले सपने भी उसके मन की गठरी में उलझ गए… बंद होने से उनका दम घुटने लगा … और फिर धीरे-धीरे विस्मृति के काले धुंए में लुप्त हो गए।
शीघ्रगामी कालचक्र रुकने का नाम तक नहीं ले रहा था। बेटियाँ बड़ी हो गईं। वह हर हाल में उन्हें स्नातक होने तक तक पढ़ाना चाहती थी, और इस आकांक्षा को पूरा करने हेतु वह खुद के मामले में बेहद कृपणता दिखाकर पाई पाई जोड़ रही थी। उसने और उसके पति ने केवल बारहवीं कक्षा तक ही शिक्षा पाई थी। इस कारण स्टोर कीपर और एलडीसी (निम्न श्रेणी लिपिक) इन दोनों ही पदों के चलते पदोन्नति का कोई सवाल ही नहीं था… लोकल ट्रेन एवं और कार्यालय की चिट फंड योजना में नियमित रूप से भाग लेने से, और वेतन में वृद्धि होने पर भी, उस वृद्धि को छुए बिना उसने कुछ रकम और थोड़ा बहुत सोना इकठ्ठा कर रखा था। एक के बाद एक पैदा हुई दोनों बेटियों का विवाह भी थोड़े ही अंतराल में करना था। इसलिए बहुत समय पहले, उसने अपने माता-पिता द्वारा उसकी शादी में पहनाई गईं चार चूड़ियाँ और एक छोटा गले का हार बिना ज्यादा उपयोग में लाते हुए इसी समय के लिए संजो कर रखे थे। दोनों ही लड़कियों के नाक नक्श सुन्दर थे। परिस्थितिनुसार वे समझदार और सुशील थीं। उनकी स्नातक परीक्षा समाप्त होते ही, उन दोनों के लिए खातेपीते परिवारों से रिश्ते के प्रस्ताव आने लगे। उसका बड़ा ही सीधा और सटीक सा विचार था कि जब उसकी अपनी झोली खाली है, तो दूसरे की खाली झोली के बारे में शिकायत कैसी? भाग्यवश दोनों ही होने वाले दामाद भी शालीन, व्यसन-मुक्त और शिष्ट थे। उन पर ज्यादा जिम्मेदारियां भी नहीं थीं। वेतन भी संतोषजनक थे। भला उसके पास इससे अधिक सोचविचार करने का वक्त कहां था? एक वर्ष के अंतराल से दोनों बेटियां ससुराल चलीं गईं। लेकिन घर में पैसों की तंगी की कहानी तो चल ही रही थी। बेटियों की शादी के लिए पति-पत्नी को कुछ कर्ज लेना पड़ा। फिर लड़कियों पर होने वाले खर्चों की जगह ऋण की किश्तें चुकानी शुरू हो गईं; बस यही एक अंतर था। वक्त के प्रवाह में वृद्धावस्था की सीमा लाँघ चुके उसके ससुर एवं फिर थोड़े अंतराल के भीतर उसकी सास, दोनों ही चल बसे। इतनी तसल्ली थी कि इन दुखद घटनाओं के पहले उसे, उसके पति और दोनों विवाहित बेटियों को उनके भरपूर आशीष प्राप्त हुए।
… इतने वर्षों तक लगातार भागदौड़ करने के बाद न केवल उसका शरीर बल्कि, उसका मन भी अत्यधिक क्लांत हो चला था… लेकिन अब वह बहुत ही तटस्थ, शांत और बेहद मजबूत हो गया था। इतने वर्षों की अथक मेहनत के बाद उसने जिन जिम्मेदारियों का बोझ उठाया था, वह वाकई थोड़ा कम हो गया था, परन्तु इस हालात में तुरन्त नौकरी छोड़ने के बारे में सोचना बिलकुल असंभव लगता था। पति की नौकरी एकाध साल में खत्म होने वाली थी, लेकिन उसकी नौकरी के फ़िलहाल ४-५ वर्ष बाकी थे। पति की निजी नौकरी में पेंशन की कोई गुंजाईश ही नहीं थी। यदि निवृत्ति के वक्त पति को फंड की थोड़ी बहुत धनराशि भी मिलती, तो उसे दोनों की वृद्धावस्था के खर्चों में ही लगाना पड़ता। इसके अलावा, यदि वह सेवानिवृत्ति की आयु से पहले ही नौकरी छोड़ देती, तो उसकी निवृत्ति- निधि अर्थात पेंशन की राशि कम हो जाती। इसलिए अभी नौकरी छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चाहे वह कितनी भी थकी-हारी हो, चाहे उसका प्रकृति स्वास्थ्य बिगड़ने लगा हो, वह बीच में नौकरी से छुटकारा पाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। आजकल उसके पैर शिथिल हो गए थे सो तेज़ी से नहीं उठ पा रहे थे… उन्हें जोर जबरदस्ती से घसीटना पड़ता था। लेकिन इन सब मुसीबतों को झेलते हुए, उसको सुबह नौ सात (९.०७ ) वाली लोकल ट्रेन पकड़ना आज की तारीख में भी परम आवश्यक था…
… लेकिन हाल ही में, कोल्हू के बैल जैसी अनवरत पिसती जिंदगी के बीच एक नवीनतम सपना उसे पुकार रहा था…. पहले वाले सपनों जैसा ही, बहुत छोटा सा…. सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम एक महीने के लिए उस ९. ०७ की लोकल ट्रेन का फर्स्ट क्लास पास खरीदना, और महीन साड़ियों और पोशाकों से सजी, इत्र की खुशबू महकाती खुशहाल स्त्रियों के धक्के खाते ही सही, इत्मीनान से ऑफिस पहुंचना, और इसके बाद ही निवृत्त होना…. बस इतना ही… यह तो कुंवारी कली सा अछूता सपना था…. वैसे, सच में देखा जाए तो यह अंतिम ही समझना होगा… परन्तु कम से कम यह तो पूरा होगा न? –
…. वह फिर एक बार शांतिपूर्वक उस भीड़ का एक बेनाम हिस्सा बनकर उसमें घुल जाती!…
♦ ♦ ♦ ♦
मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीनाश्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जीभारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी एवं विचारणीय कथा “आखिर सुनती क्यों नहीं ?“.)
☆ कथा कहानी ☆ आखिर सुनती क्यों नहीं ? ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
अरे यार इतनी देर हो गई है, मैं मार्निंग वाक करके वापस भी चला आया और तुम अभी तक सो ही रही हो. उठो, मैं तब तक चाय बनाता हूँ. मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरे हाथ की चाय अच्छी नहीं लगती, लेकिन भाई मुझे तो पीना है. मैं बना रहा हूँ, अभी मेरे हाथ का चाय पी लो, फिर उठना तो बनाना, फिर तुम्हारा बनाया भी पी लेंगे. अरे अभी तक तुम फ्रेस नहीं हुई. मैं तो ज्यादा इंतजार नहीं कर सकता, चाय ठंडी हो जायेगी, तो मजा़ नहीं आयेगा, मैं तो चाय पी लेता हूँ.
वह भी क्या दिन थे, हम दोनों सुबह – सुबह टहलने जाते, और टहलने के बाद वहीं मैदान के बगल में एक अन्ना की इडली डोसा की दुकान थी, वहीं इडली खाते थे और वहीं पर काफी पीते थे. तुम्हें उसकी काफी बहुत पसंद थी. बहुत दिन हो गया, हम उधर गयेे नहीं. कोई कह रहा था कि अन्ना ने एक बहुत बड़ा साउथ इंडियन रेस्टोरेंट खोल लिया है और वहाँ केले के पत्ते पर दक्षिण भारतीय ढंग से बड़ा अच्छा खाना मिलता है. एक काम करना, एक दिन तुम दोपहर में खाना मत बनाना, हम दोपहर का खाना वहीं खायेंगे. बहुत दिन हो गया दक्षिण भारतीय खाना खाये हुए. उस साल हम लोग बच्चों के साथ मदुरै गये थे, मीनाक्षी मंन्दिर में, मीनाक्षी देवी के दर्शन करने के बाद, वहीं बगल के होटल में हम सबों ने खाना खाया था. कितना अच्छा खाना था! तुम्हें इतना अच्छा लगा कि दक्षिण भारत के दस दिनों की यात्रा में हम दोनों समय दक्षिण भारतीय खाना ही खाते रहे.
ठीक है चलो जाड़े में एक बार फिर दक्षिण भारत घूमने की योजना बनाते हैं. अब नौकरी से भी रिटायर हो चुका हूँ, छुट्टी की भी कोई चिंता नहीं, और बच्चे भी अपनी- अपनी जगह लग गये हैं, जितना दिन तुम्हारा मन होगा, हम घूमेंगे. देखो तुम अभी तक नहीं उठी! अरे यार रिटायर मैं हुआ हूँ, तुम नहीं. लगता जैसे तुम्हीं रिटायर हुई हो. जब नौकरी करता था तो कैसे मेरे उठने के पहले ही मेरा और बच्चों का नाश्ता और टिफिन बना कर तैयार कर देती थी और आश्चर्य तो यह कि तुम भी सुबह- सुबह ही तैयार हो जाती थी और मेरे साथ ही सुबह की चाय पीती थी. पूछने पर कहती थी कि सबके जाने के बाद अकेले के लिए एक कप चाय बनाने का मन नहीं करता. दोपहर में जब बर्तन माजने वाली आती है तो उसी से बनवा कर, उसके साथ दुबारा चाय पी लेती हूँ. लेकिन तुम खाना पहले भी बहुत देर से खाती थी. अरे अब तो जल्दी खाया करो, तुम्हारे चक्कर में आजकल मुझे भी देर हो जाती है. लेकिन तुम भी क्या करोगी, जिन्दगी भर का आदत कहाँ छूटता है! खैर चलो, कौन जल्दी है! लेकिन तुम आजकल सोने बहुत लगी हो.
इतने में दरवाजे की घंटी बजती है. अरे जरा देखो कौन घंटी बजा रहा है, शायद कचरा वाला होगा, रात में कचरे का डब्बा बाहर नहीं रखा था क्या? दुबारा घंटी बजने पर राघव बाबू दरवाजा खोलते हैं. सामने बेटी शीला खड़ी थी. शीला जैसे ही अन्दर आयी देखी कि टेबल पर एक कप चाय बिना पिये रखा है. बोली पापा कौन आया है? और अभी तक उसने चाय क्यों नहीं पिया, चाय ठंडी हो गई है. राघव बाबू ने कहा अरे तुम्हारी मम्मी के लिए बनाया था, अभी तक उठी नहीं! कोई बात नहीं, उठने पर दूसरा कप बना देंगे. तुम कैसी हो, दामाद जी कैसे हैं, मेरा छोटका नाती कैसा है?
शीला स्तब्ध खड़ी थी, उसके ऑंखों से ऑंसू बह रहे थे. राघव बाबू ने देखा. चौंक गए! बोले बेटी क्यों रो रही हो? ससुराल में सब लोग ठीक तो हैं? शीला ने राघव बाबू को सीने से लगा लिया और बच्चे की तरह रोने लगी. राघव बाबू कुछ समझ नहीं पा रहे थे. वहीं से बोले अरे देखो शीला बेटी आयी है. थोड़ी देर बाद शीला बोली पापा आप कब स्वीकार करेंगे कि मम्मी अब नहीं है, वर्षों पहले हम लोगों को छोड़ कर वह भगवान के यहाँ चली गई. थोड़ी देर तक दोनों बाप – बेटी एक दूसरे के ऑंखों से ऑंसू पोछते रहे.
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय कथा – “स्नो मैन ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०१ ☆
न्यूयॉर्क से ~ कथा कहानी – स्नो मैन श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(वैश्विक परिदृश्य पर मेरी नई कहानी)
सुबह की धूप फार्म हाउस की लाल ईंटों पर पड़ रही थी , एक कतरा धूप बिना इजाजत , खिड़की पार कर मनोज जी की तख़त तक उन्हें जगाने चली आई थी। उनके चेहरे पर धूप पड़ते ही उनकी आँख खुली। नहीं, अलार्म ने नहीं जगाया। उन्हें आदत थी, सूरज के साथ उठने की, पिछले चालीस साल से। फर्क इतना था कि पहले उठते ही बच्चों की हँसी सुनाई देती थी, अब खिड़की के बाहर चिड़ियों की आवाज़ आती है।
वह उठे, चाय बनाई। खुद के लिए। केतली में दूध उबलते देखा तो याद आया, एमा को दूध की झाग बहुत पसंद थी। “दादू, देखो, क्लाउड!” कहकर चम्मच से झाग उठाकर हवा में उड़ाती थी। रॉनी कहता था, “एमा, स्टॉप इट!” लेकिन खुद भी हँसता था। वह एमा से तीन वर्ष बड़ा था ।
चाय लेकर वह बरामदे में आए। लॉन में ओस की बूँदें चमक रही थीं। सामने अमलतास के पेड़ पर गौरैया चहचहा रही थी। बगल में कुएँ से पानी खींचने की मोटर चालू हुई। रामस्वरूप ने आज भी समय पर बगीचे में सिंचाई के लिए पानी लगा दिया, केवल पंप का बटन ही तो स्विच आन करना था ।
“नमस्ते, साहब!” रामस्वरूप ने दूर से हाथ जोड़े। बीस साल से वह मनोज के यहाँ माली है।
“रामस्वरूप, गुलाबों की कटाई-छँटाई कर दो आज। इस सर्दी में फूल नहीं आए ठीक से।”
“जी साहब। कल ही सोच रहा था।”
रामस्वरूप कटर लेकर काम में लग गया। मनोज की नज़र लॉन के बीचो बीच खाली जगह पर ठहर गई। वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ सूखी घास। लेकिन मनोज को लगा, वहाँ एक स्नोमैन खड़ा था।
तीन साल पहले। अमेरिका। विस्कॉन्सिन का वह भव्य फार्म हाउस, उनके बेटे राजेश का ।
दिसंबर की सुबह थी। खिड़की के बाहर बर्फ़ गिर रही थी। रॉनी और एमा ने शोर मचा रखा था। “दादू! दादू! इट्स स्नोइंग!” एमा ने उनकी गर्दन में हाथ डाल दिया। रॉनी पाजामा पहने ही बाहर भागने को तैयार। बहू रोजी चिल्लाई, “रॉनी, जैकेट और बूट पहनो पहले!”
नाश्ते के बाद सब बाहर निकले। बर्फ़ सचमुच जादू थी। एमा ने जीभ बाहर निकालकर बर्फ़ के फाहे पकड़ने की कोशिश की। रॉनी ने स्नोबॉल बनाकर निशाना लगाया – पापा पर। बहू रोजी ने कैमरा निकाल लिया।
फैमिली ग्रुप विथ दादा जी, उसने डेट, प्लेस , टाइमर ऑन करके फोटो क्लिक की थी ।
“चलो, स्नोमैन बनाते हैं!” मनोज ने ऐलान किया।
अगले एक घंटे में दुनिया का सबसे सुंदर स्नोमैन बना। हर बच्चे केवल अपने बनाए स्नो मैन को ही सदा से वर्ल्ड बेस्ट कहते आए हैं।
रॉनी ने बड़ा गोला बनाया, एमा ने बीच वाला, मनोज ने सबसे ऊपर वाला। रोजी ने रसोई से गाजर ला दी। राजेश ने कोयले के दो टुकड़े ढूँढ़े, आँखें बनाने के लिए । एमा ने अपनी क्रिसमस वाली लाल टोपी , स्नोमैन को पहना दी थी। रॉनी ने कहा, “इसे टाई भी चाहिए!”
मनोज ने अपनी पुरानी धारीदार टाई निकाली। वही टाई जो उन्होंने राजेश की ग्रेजुएशन सेरेमनी में पहनी थी। टाई स्नोमैन के गले में लपेट दी। एमा ने तालियाँ बजाईं। “डैडी, लुक! अवर स्नोमैन इज़ सो हैंडसम!”
स्नोमैन का नाम रखा गया – फ्रॉस्टी।
मनोज जी ने बाजू में ही एक मंदिर नुमा आकृति बर्फ से बना दी , और इस तरह मानसरोवर के शिव अमेरिका में प्रतिष्ठित हो गए थे, मनोज के मन ही मन में।
हफ्ते भर से ज्यादा ही फ्रॉस्टी खड़ा रहा। रॉनी हर दिन कई चक्कर उसके पास जाता, “हाउ आर यू, फ्रॉस्टी?” एमा उसे कुकीज़ खिलाने की कोशिश करती। सब उसके चारों ओर खड़े होकर वीडियो और तस्वीरें लेते।
मनोज बताते, “हम भी जब नैनीताल में थे, तुम्हारे पापा छोटे से थे तब वहां स्नो फाल होता था , पर इस स्नो स्टॉर्म की तरह नहीं।”
तीसरे दिन धूप निकली।
एक तरफ सफेद बर्फ की ठंडी चादर और जस्ट कंट्रास्ट ब्राइट सनी डे , मनोज के लिए भी यह अनुभव नया सा था ।
उन्हें घरों में एंट्री पर डबल डोर , और चौबीस घंटे हीटिंग का महत्व समझ आ रहा था।
रात को आसमान से बर्फ झरती पर परावर्तन के चलते रोशनी ऐसी तेज रहती की जैसे चांद तारे खुद जमीन पर उतर रहे हों।
आसमान बिना पक्षियों के सूना सूना था । पेड़ो की डालियों पर पत्ते नहीं सफेद बर्फ चिपकी हुई थी।
कभी कुछ भी स्थाई नहीं रहता । प्रकृति इसी लिए चेतन कही जाती है । मौसम ने करवट ली,
पहले फ्रॉस्टी का सिर थोड़ा झुका, फिर टोपी फिसली, फिर नाक ढीली पड़ी। एमा रो पड़ी। “फ्रॉस्टी इज डाइंग!”
मनोज ने उसे गोद में उठाया। “नहीं बेटा, वह नहीं मर रहा। उसने अपने जिम्मे की सारी खुशियां हमें बांट दी है, अब वह लौट रहा है, बादलों में। अगली बर्फ़ में वह फिर आएगा, इसी तरह और खूब सी खुशियां फैलाने।”
एमा ने आँखें पोंछीं। “प्रॉमिस?”
“गाड प्रॉमिस।” मनोज बोले थे।
अगली सुबह स्नो मैन की जगह सिर्फ़ गीली ज़मीन थी, एक लाल टोपी, एक धारीदार टाई , गाजर और कोयले के दो टुकड़े बचे रह गए थे।
मनोज किसी गहरी सोच में खोए हुए थे ।
“साहब, चाय ठंडी हो रही है।”, मनोज चौंके। रामस्वरूप सामने खड़ा था। चाय की प्याली उसके हाथ में थी, चाय ठंडी हो रही थी।
“हाँ, हाँ। रख दो इधर।”
रामस्वरूप ने झाड़ियों की ओर देखा।
“साहब, अमेरिका में भी ऐसे ही बगीचे थे क्या?”
मनोज मुस्कुराए। “वहाँ ऐसे बगीचे तो नहीं थे। वहाँ खेती के मैदान थे। जो बर्फ का बड़ा सा फुसफुसा टर्फ बन गया था । पैर पड़ते ही सफेदी धंस जाती थी ।
उस पर था खुशियां बांटता एक स्नोमैन खड़ा कर दिया था, बच्चों ने।”
“स्नोमैन?”
“हाँ। बर्फ़ का बना आदमी। इसे बच्चे बनाते हैं। गाजर की नाक, कोयले की आँखें।”
तुम इसे ऐसे समझ जाओगे, जैसे यहां संगम में गीली बारीक रेत से बच्चे घरौंदे और पुतले बनाते हैं, वैसे ही बड़े सफेद बर्फ के पुतले , बनाने वाले की मर्जी के मुताबिक ।
रामस्वरूप को हँसी आ गई। “बर्फ़ का आदमी! और वह पिघलता नहीं?”
उसने कौतूहल व्यक्त किया।
“पिघलता है। पर ठंडे मौसम में हफ्ते दस दिन बना रहता है। धूप आते ही , धीरे धीरे पिघल जाता है। बच्चे रोते हैं। फिर अगली बर्फ़बारी का इंतजार करते हैं।
फिर दूसरा बना लेते हैं।”
रामस्वरूप ने सिर हिलाया। वह काम पर लौट गया। मनोज फिर उस खाली जगह को देखने लगे।
गंगा अंदर से आई। बर्तन साफ़ कर चुकी थी। “साहब, खाना क्या बना दूं आज?”
“जो बनाना है, बना दो गंगा। मुझे क्या पता।”
गंगा चली गई। पिछले छह महीने से वही हाल था। अकेले खाने का स्वाद ही नहीं रहा। पत्नी न हो तो घर घर नहीं लगता। बच्चे न हों तो घर सुनसान हो जाता है। पर सबका जाना ही नियति है , स्नोमैन के पिघलने के समान ।
अब तो मनोज जी अकेले ही रह गए थे पत्नी श्यामली को गए भी चार साल हो गए हैं।
शाम को फोन की घंटी बजी। वीडियो कॉल था।
“हाय, पापा! कैसे हैं?”
“ठीक हूँ।”
“सब ठीक तो है? दवा समय पर ले रहे हैं न, खाना ठीक से खा रहे हैं?” राजेश ने चिंता जताई ।
“हाँ, हाँ। गंगा बना देती है।” मनोज बोले।
बीच में एमा कूद पड़ी। “दादू! दादू! आज स्कूल क्राफ्ट में मैंने स्नोमैन बनाया , पेपर का!”
मनोज के चेहरे पर रौनक आ गई। “वाह! दिखाओ तो!”
एमा ने कागज़ का स्नोमैन दिखाया। गोल-गोल, लाल टोपी, ऑरेंज कलर की नाक। मनोज की आँखें भर आईं।
“बहुत सुंदर बनाया, बेटा। बिल्कुल अपने फ्रॉस्टी जैसा।”
“दादू, आप कब आ रहे हैं यहाँ? फिर स्नोमैन बनाएँगे साथ में!”
मनोज चुप रहे। कैसे बताएँ कि अब वहाँ नहीं जा सकते। वहाँ की ज़मीन उन्हें अच्छी नहीं लगती। वहाँ वह खुद को बर्फ़ के उस स्नोमैन की तरह महसूस करते हैं जो धूप में पिघल रहा हो। यहाँ कम से कम धूप तो अपनी है। मिट्टी तो अपनी है।
“जल्दी आऊँगा, बेटा।”
फोन रखते ही सन्नाटा और गहरा गया।
अमलतास पर चिड़ियाँ सो चुकी थीं। रामस्वरूप जा चुका था। गंगा भी चली गई। फार्म हाउस में सिर्फ़ मनोज थे और उनकी परछाइयाँ।
रात के खाने में उन्होंने रोटी नहीं खाई। बस दूध पिया और बरामदे में आ बैठे। ठंड बढ़ गई थी। सर्दियों की रातों में यहाँ शहर से बाहर फार्म हाउस में मौसम अमेरिका जैसा ही ठंडा हो जाता है। बस बर्फ़ नहीं गिरती। बस कमरों में वैसी ऊष्मा बनाए रखने वाले हीटर नहीं होते।
उन्होंने ऊनी मफलर लपेटा। वही जो रोजी ने पिछले साल भेजा था। उनकी नज़र फिर लॉन के बीचोबीच गई। वहाँ अब भी कुछ नहीं था। लेकिन उन्हें वहाँ एक पहचानी सी धुँधली आकृति दिख रही थी ।
स्नोमैन!
बर्फ़ का नहीं, यादों का। उसके गले में धारीदार टाई थी, सिर पर लाल टोपी, गाजर की नाक, कोयले की आँखें। वह मुस्कुरा रहा था। मनोज को लगा, वह स्नोमैन उन्हें देख रहा है।
दो अकेले प्राणी। एक ठंडी रात में। एक यहाँ, एक वहाँ। दोनों पिघलने के इंतज़ार में।
मनोज ने धीरे से कहा, “हैलो, फ्रॉस्टी।”
हवा में सनसनाहट हुई। जैसे कोई जवाब दे रहा हो।
“तुम भी यहाँ? मैंने सोचा तुम अमेरिका में ही रह गए।”
एक पत्ता हवा में उड़कर लॉन के बीचोबीच गिरा। मनोज ने देखा, वह पत्ता स्नोमैन के पैरों के पास गिरा था। उन्हें यकीन हो गया, वह वहाँ है। सच में है।
“पता है, फ्रॉस्टी, मैं भी तुम्हारी तरह हूँ। बच्चों ने बनाया, बच्चों ने सजाया, बच्चों ने प्यार किया। फिर समय की धूप आई और मैं पिघलने लगा हूं। फर्क इतना है कि तुम पूरी तरह पिघल गए, मैं आधा-अधूरा रह गया हूँ।”
आँखों से आँसू ढुलक पड़े। उन्होंने पोंछे नहीं।
“लेकिन तुम्हें पता है, फ्रॉस्टी, मुझे कोई गिला नहीं। बच्चों ने मुझसे जितनी खुशियाँ लीं, उतनी ही तो मैंने भी लीं। रॉनी की हँसी, एमा की बातें,राजेश की चिंता, रोजी का ध्यान। श्यामली के बाद यही सब तो मेरे पास है। यादों में।
तुम्हारी तरह, मैं भी हर बर्फ़ में लौटूँगा या नहीं, मुझे पता नहीं ।
रात और गहरी हुई। ठंड और बढ़ी। मनोज की पलकें झुकने लगीं। वह कुर्सी पर ही सिमट गए। मफलर लपेटे। स्नोमैन अब भी वहाँ खड़ा था। दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। दो स्नोमैन। एक बर्फ की यादों का, एक मनोज खुद। दोनों पिघल रहे थे।
बाहर अमलतास पर एक रंगीन चिड़िया बैठी थी। लाल टोपी जैसी।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी लघुकथा –“कारण” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४१ ☆
☆ लघुकथा – कारण☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
” लाइए मैडम ! और क्या करना है ?” सीमा ने ऑनलाइन पढ़ाई का शिक्षा रजिस्टर पूरा करते हुए पूछा तो अनीता ने कहा, ” अब घर चलते हैं । आज का काम हो गया है।”
इस पर सीमा मुँह बना कर बोली, ” घर ! वहाँ चल कर क्या करेंगे? यही स्कूल में बैठते हैं दो-तीन घंटे।”
” मगर, कोरोना की वजह से स्कूल बंद है !” अनीता ने कहा, ” यहां बैठ कर भी क्या करेंगे ?”
” दुखसुख की बातें करेंगे । और क्या ?” सीमा बोली, ” बच्चों को कुछ सिखाना होगा तो वह सिखाएंगे । मोबाइल पर कुछ देखेंगे ।”
” मगर मुझे तो घर पर बहुत काम है, ” अनीता ने कहा, ” वैसे भी ‘हमारा घर हमारा विद्यालय’ का आज का सारा काम हो चुका है। मगर सीमा तैयार नहीं हुई, ” नहीं यार। मैं पांच बजे तक ही यही रुकुँगी।”
अनीता को गाड़ी चलाना नहीं आता था। मजबूरी में उसे गांव के स्कूल में रुकना पड़ा। तब उसने कुरेदकुरेद कर सीमा से पूछा, ” तुम्हें घर जाने की इच्छा क्यों नहीं होती? जब कि तुम बहुत अच्छा काम करती हो ?” अनीता ने कहा।
उस की प्यार भरी बातें सुनकर सीमा की आंख से आंसू निकल गए, ” घर जा कर सास की जलीकटी बातें सुनने से अच्छा है यहां शकुन के दोचार घंटे बिता लिए जाए,” कह कर सीमा ने प्रसन्नता की लम्बी साँस खिंची और मोबाइल देखने लगी।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना।)
☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
कमला अपनी कहानी के रजिस्टर को लेकर पास के साइबर कैफे में गई ।
साइबर कैफे का मालिक उसके बेटे उज्जवल का परम मित्र था।
उज्जवल तो विदेश में नौकरी करने चला गया। अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़कर।
कमला जी विदेश जाना भी नहीं चाहती थी?
अकेले घर में खाली बैठे हुए बागवानी करती थी और कहानी लिखती थी, अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की।
मन में एक विचार आया कि चलो अमन से बात करते हैं।
कमल जी तैयार होकर तुरंत अमर के कैफे में पहुंची।
कमल जी को देखकर अमन ने कहा- “नमस्ते आंटी आप थोड़ी देर बैठ जाइए मैं कुछ फोटो को एडिट कर रहा हूं। बस थोड़ी देर में ही काम खत्म हो जाएगा, फिर आपकी बात सुनता हूँ।”
वे किनारे रखी कुर्सी में बैठ गई उनके बगल में एक 15 साल की लड़की नेट पर कुछ मैटर सर्च करवा रही उन्होंने देखा प्रसिद्ध हिंदी के रचनाकारों की पिक्चर थी, इसलिए उनकी जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने पूछा बिटिया “हिंदी के इन कलम के सिपाहियों के बारे में क्या जानती हो?”
“नहीं आंटी पर मैं इनके बारे में नहीं जाना चाहती स्कूल में मुझे फेमस राइटर के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को दिया है।”
कमल जी ने कहा -“बेटा यदि तुम जानना चाहो तो मेरे पास किताबें हैं तुम लेकर प्रोजेक्ट बना सकती हो।”
“हम इंटरनेट यूजर हैं, हमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं है।”
आंटी मेरा नाम खुशी है आप मुझे बिटिया न कहें, मैडम ने कहा है, प्रोजेक्ट बनाना है अंकल सभी की फोटो निकालकर बढ़िया सा एक प्रोजेक्ट मुझे बनाकर 1 घंटे में दे देंगे।
इधर-उधर भटकने की और मेहनत करने की मुझे क्या जरूरत है?
कमल जी की ओर देखकर उस लड़की ने बोला -“जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं सलाह देने के लिए?”
कमल जी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि वे सब उनके पसंदीदा लेखक थे वे क्या करती इसीलिए चुप हो गई।
लड़की खुशी ने कहा- अमन अंकल मेरी फोटो तो आपने सब एडिट कर दिए अब एक लेख के साथ अच्छा सा प्रोजेक्ट बना दीजिएगा, वीडियो भी बना दीजिएगा बिल्कुल ऐसा लगे मैं ही बोल रही हूँ। 2 घंटे बाद में आकर ले जाऊंगी एक पेन ड्राइव में सब कर दीजिएगा, पैसे आपको पूरे मिल जाएंगे।
अमन ने कहा -“चार हजार में बढ़िया बन जाएगा।”
उस लड़की ने कहा – ठीक है और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई।
कमल जी ने कहा – “अमन बेटा आजकल बच्चे पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते तुम्हारे पास आते रहते हैं इसीलिए इतनी भीड़ है।”
अमन बोल – “हां आंटी आजकल सभी बच्चों के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट भी है सारे सवालों के जवाब पूछते हैं।”
कमल जी ने कहा- ” बेटा फिर इन बच्चों का दिमाग कैसे चलेगा जब किताब पढ़ कर प्रोजेक्ट नहीं करेंगे तो?”
अमन ने कहा – “अरे! आंटी आजकल सारे बच्चे बदल गए हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करते हैं।”
“ठीक कह रहे हो अमन” – कमल जी ने गंभीर स्वर में कहा।
कमला जी की आंखों में आंसू आ गए रोते हुए उन्होंने कहा-
“आजकल किसी के अंदर कोई भावना और इमोशन नहीं है, रिश्ते भी बदल गए हैं।”
“हाथ में एक छोटा सा जादू पकड़ लिया है मोबाइल नामक राक्षस।”
सारा कुछ इसी में देखते हैं, आजकल लोग एकाकी हो गए हैं, इसी के जरिए लोगों को उल्लू बनाकर पैसे भी मांगते हैं, कुछ दिन पहले बेटा डिजिटल क्राइम के विषय में सुना था।
क्या कोई इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इलाज नहीं करता?
अमन ने कहा -“आंटी अभी तो दुनिया इसी पर चल रही है, जाने कितने युवाओं की नौकरी भी जा रही है भविष्य में देखते हैं क्या होगा?”
कमला जी ने कहा – “बेटा अमन तुम तकनीकी के काम करते हो और हम बुजुर्गों की बात तो सुन लेते हो। भगवान इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जादू से हम सबको बचाए मैं ऐसी प्रार्थना करूंगी।”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆
🌻लघुकथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻
शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।
कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।
वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।
अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।
जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।
सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।
वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।
गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –
ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– पराये भी अपने…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९५ — पराये भी अपने —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
दिवाली से चार दिन पहले हमारे पड़ोसी के घर में जवान बेटे की मृत्यु हुई थी इसलिए वहाँ दिवाली के दिये नहीं जले। शोक मानो स्वयं बोला हो। हमारे यहाँ दिवाली की भव्य तैयारी तो हो गई थी, लेकिन मेरे पिता ने हमसे कहा था हम दो ही दिये जलायें। पिता के कहने से हमने ऐसा ही किया। शोकग्रस्त घर के उधर के पड़ोसी ने भी दो ही दिये जलाये। इस बार मेरे पिता बोले थे, “पड़ोसी ऐसा ही होना चाहिए।”
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है, उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है, उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।
वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।
अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में, धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।
अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।
तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं .., आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।
☆ लघुकथा ☆ ~ एक चित्र ऐसा भी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
जरा सोचिए! अगर शब्दों में आग हो और भावना में राग हो, तो ऐसा व्यक्तित्व तो अनूठा ही होगा! एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कलम ने संवेदना को नया स्वर दिया और संघर्ष को उद्घोष के अक्षय शब्द| ऐसे हैं बहु आयामी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ – यथा नाम: तथा गुण! अपने गांव की मिट्टी से लेकर साहित्य की दुनिया में जो पहचान बनाई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी-कभी शब्द उनके आँसुओं जैसे बहे… तो कभी तीर बनकर समाज को झकझोर गए। कहते हैं, उन्होंने मात्र लिखा ही नहीं अपितु यथार्थ ज़िंदगी को काग़ज़ पर जिया भी है। हर रचना में उनकी आत्मा बोलती है, और हर पंक्ति में एक नया प्रश्न उभरता है — क्या शब्द सच में दुनिया बदल सकते हैं? हाँ क्यों नहीं? आइए, जानते हैं ऐसे विलक्षण साहित्यकार – राजेश कुमार सिंह श्रेयस की जीवंत कहानी, जिसने सिद्ध कर दिया — कलम अगर ईमानदार हो, तो वह इतिहास भी लिख देती है!
साभार – युग संवाद (यूट्यूब)
☆
मेरे जेहन में आज एक कहानी आ रही है। इस कहानी को मैं अक्षरश: कहना चाह रहा था , लेकिन इस कहानी को अक्षरश: कहने में स्वयं को विवश पा रहा हूँ। चलिए कहानी को कुछ आगे बढ़ा कर बताते हैं।
एक चित्रकार था उसको एक चित्र बनाने को कहा गया। जब वह चित्रकार चित्र बनाने बैठा तो उस चित्रकार की विबशता यह हुई कि चित्र बनाने के पहले ही उसके पास ढेर सारे सुझाव आने लगे। पुरानी कहानी में चित्र बनने के बाद सुझाव आये थे, लेकिन इस कहानी में तो चित्र बनने के पहले ही सुझाव आने लगे थे। यह सुझाव, खाली सुझाव नहीं थे। लोग सुझाव के साथ साथ अपने अपने रंग भी भेज रहे थे। किसी ने लाल पीला हरा, किसी ने हरा नीला लाल, किसी ने लाल सफेद काला, नाना प्रकार के रंग भेज दिये। शुरू में चित्र रंगीन हुआ। बाद में रंग इतने हो गए कि चित्रकार के ऊपर ही रंग छिटक छिटक कर पढ़ने लगा। चित्रकार को लग गया कि अब इन्हीं रंगों से सुन्दर दिखने वाला चित्र ही बदरंग होने वाला है। लेकिन चित्रकार की मजबूरी यह थी कि सुझावो के साथ भेजे रंगों को भरना ही भरना था।
चित्रकार पर दबाव बढ़ता गया, और अधिक बढ़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें क्या रंग डालूं और कौन सा रंग निकालूं। चित्रकार ने अपने चित्रकला के नीचे अपना छोटा सा नाम हस्ताक्षर स्वरूप लिखा था। लेकिन ऊपर का फरमान यह आया कि सुझाव देने वालों की भी नाम भी उसके रंग के साथ लिखना है। अब चित्रकार परेशान हुआ कि सबके भेजे गए रंगों को भरूं कि सबका नाम लिखूं। उसको तो एक खूबसूरत पेंटिंग बनानी थी। यहां तो पूरे पेंटिंग की किताब का मटेरियल आ गया। अब वह परेशान हो गया कि उसे पेंटिंग बनानी है की पूरी पेंटिंग की किताब बनानी है। खैर फरमान तो फरमान ही होता है और कहा भी गया है कि प्रभुता संपन्न व्यक्ति गलती नहीं करता है। राजा कभी गलती करता ही नहीं है। अब फरमान आया है तो फरमान को पूरा करना ही था।
सभी रंग भरे जाने लगे। रंगों को भेजने वालों के नाम भरे जाने लगे। पूरी पेंटिंग रंगीन हो उठी रंग पर रंग, रंग पर रंग। पेंटिक घना होता गया.. घना होता गया.. घना होता गया , घना होते होते पेंटिंग रंग डिब्बे का पूरा बॉक्स बन गया . अंततः चित्रकार की ब्रश ऐसी मजबूरी में फंसी कि सुझाव देने वालों के रंग और उनके नाम डालते डालते मूल चित्रकार का नाम ही है गायब गया। चित्रकार ने इतने पर भी संतोष किया। उसने यह सोचकर संतोष किया कि चलो अगर चित्र बढ़िया बन गया, तो लोग कहेंगे कि वाह क्या सुंदर सा चित्र बना है। भाई..कमाल का चित्रकार है। गजब का चित्र बनाया है। अब उस चित्र पर उसका नाम न लिखा होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा को सुनकर वह खुश होगा। यह सोचकर, उसने चित्र बनाना जारी रखा।
आखिरकार उसने एक भारी भरकम चित्र बना ही गया। जब चित्र बन गया और वह प्रदर्शित हुआ तो जितने लोगों ने ढेर सारे रंग भरे थे। अपने ही भेजें रंगों को देखकर, लोगों ने उनका नुक्स निकालना शुरू किया। अरे यार, यह छूट गया, यह भरना था,यह नहीं भरना था, यह रंग गया, यह नहीं रखता था। लेकिन सारे सुझाव भेजने वाले भूल गए कि चित्रकार की जगह नाम तो उन्हीं का लिखा है, जिन्होंने खाली सुझाव नही भेजे, बल्कि सुझावों के साथ अपने अपने रंग भी भेजें थे। और अपने ही रंग से पेंटीन को बर्बाद किया, तो चित्रकार का कहां दोषी हुआ।
उसकी चित्रकारिता का हुनर तो वहीं समाप्त हो गया जहां सुझाव देने वालों की संख्या थोड़ी नहीं एक भीड़ के सरीखे आ गई।