हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ लघु कथा # १०२ – राज — तंत्र… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– राज — तंत्र …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ लघु कथा # १०२ राज — तंत्र  ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

क्रांति — दूत के अपाहिज होने पर राज द्रोह के उसके खाते बंद कर दिये गए। इसके पीछे जानी बूझी सोच यह थी जो अपाहिज हो गया उससे अब आतंकित होने का काई कारण शेष रहा नहीं। पर इस कोण से सतर्कता की एक दृष्टि तो रखी ही जाती थी जो निढाल हो गया कहीं वह फिर से सक्रिय न हो जाए। कुछ दिनों बाद क्रांति — दूत की दयनीय मृत्यु होने पर वे खाते जला दिये गए। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण था। इन लोगों के दुर्योग से अगले चुनाव में इनकी हार हो जाती और नई सरकार क्रांति — दूत के उन बंद खातों को खुलवाती तो शर्म के मारे इन्हें नर्क में भी मुँह छिपाना भारी पड़ता। वास्तव में क्रांति — दूत के राज द्रोह थे कहाँ। उसकी तो समर्पित राज भक्ति थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

10 — 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम ☆

श्री परम शिवम

(श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी संस्मरणात्मक कथा – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है!.)

 

कथा कहानी – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम

(‘सतरंगी दस्तरख्वान’ (संपादन- सुमना रॉय, कुणाल रे अनुवाद- वंदना राग, गीत चतुर्वेदी) में खाने की कहानियाँ हैं, अन्न की कहानियाँ- फार्मचे पाव, साउरडॉ, रसम, सारस्वत तमड़ी, भाकरी, पचडी-हुग्गी, किकोड़े, बैंगुनभाजा….. भोजन के विविध रूपों, व्यंजनों, पाक-कला की कहानियाँ, पर दुनिया का ऐसा कौन सा स्वाद जो मेरी ‘भूख’ की कहानी के बिना पूरा हो जाए-  श्री परम शिवम् )

बेसिक ट्रेनिंग संपन्न हो गयी थी और चालीस किलोमीटर की रेस सफलतापूर्वक करने के बाद कमांडो-ट्रेनिंग की भी इति हो आयी थी. अब प्रयाण था- बटालियन की पहली तैनाती पे सुदूर उत्तर पूर्व में मणिपुर जाना था, यही जीवन मे ‘दूर’ का आरम्भ था इसके बाद जीवन में अनगिन ‘दूर’ आए, करीबी शायद एकाध !

अकादमी से निकलते बरास्ता तीन दिन की छुट्टी ली गयी थी उसके बाद कमज़ोर मन ने पाँच दिन एक्स्ट्रा भी निकाल लिए थे, फिर भी तैयार ना था. अप्रेल-मई की गर्मियों की साँय-साँय करती दोपहर में ‘घर’ सोचते तो घर का कोना-कोना रस्सी होकर पाँव से लिपटने लगता, पाँव खुद-ब-ख़ुद स्तम्भित हो जाते, अडिग…अचल…अहिल.

यात्रा लम्बी थी-पहले जबलपुर से गुवाहाटी फिर आगे दीमापुर और फिर उसके बाद कॉन्वॉय से इम्फाल, लगे कित्ता दूर है, मन नहीं सोचता था पाँव ही सोचने लग पड़े थे और सोच-सोच जमते जाते थे, सून-सपाटा ऐसा कि कोई बोलने वाला भी न था-

सूखी रोटी तोड़ लें, कोई कहीं न जाए

आ पिया घर रहें मैं कमाउँ तू खाए

मन को मारा गया, कोनों की रस्सियों को खोला गया, पाँव उठाए गए और घर को छोड़ा गया, अजानी दिशाओं का प्रयाण और विलम्बित नहीं किया जा सकता था पर रत्ती भर भी मन नही, जबलपुर में हिले-डुले का धर्म भूलने वाले पाँव दादर-गुवाहाटी के स्लीपर कोच में चढ़े हैं, रात के दो बजे. जबलपुर से टिकट कन्फर्म नही हुई थी, टी टी ने मरी सी आश्वस्ति कर रखी थी-देखते हैं !

सिहोरा, स्लीमनाबाद, कटनी, मैहर, सतना… सब निकल रहे खड़े-खड़े, आस-पास ‘खड़ों’ की भीड़ है, सब खड़े-खड़े ही जा रहे, किसी के पास आश्वस्ति है, बाकियों के पास वो भी नहीं. सामान- एक सूटकेस, एक ट्रंक, एक बैग और एक होल्डाल-बेडिंग भी इधर-उधर हो रखी, मन के क्षेत्रफल मे किसी अन्य बात का अवसर ही न हो रहा, बस टुकुर-टुकुर टी टी को ताके जाएं, वो भी दृष्टि बचाते दूसरे कोच निकल गए. बाहर पौ फट रही, उषा की चमकीली रेख उभर रही किन्तु बर्थ-रहित अंतस में प्रत्यूषा का कोई आकर्षण नहीं, आंतरिकता निश्चिंत हो तो कोई सौंदर्य जगे इस अनिश्चय में क्या तो तुम्हें निरखें जगती ! मन, चेतना, ह्रदय, मस्तिष्क सब का केंद्र एक- बर्थ मिले तो प्रकृतिस्थ हों,तब बताते तुम्हें ओ दृश्यावलियों !

घर से निकले आठ घण्टे हो चुके, अंधकार का चँदोवा तो सतना में ही उठ गया था अब सूरज पूरा का पूरा चढ़ आया है, दिन का चमकीला थान खुल-बिछ गया. गाड़ी मुगलसराय पहुँची है, टी टी ने बर्थ भी कन्फर्म कर दी – साइड अपर ! सामान व्यवस्थित कर लिया गया है, बर्थ मिलते ही खंड-खंड व्यवस्थित हो आया है, अणु-परमाणु अपने घेरे में घूमने लगे हैं- आत्मस्थ, प्रकृतिस्थ, चेतनस्थ सब हो आया. सारी अनाश्वस्तियाँ पलक झपकते लुप्त हुई हैं, नासिका में वास आने लगी, कानों को सुनाई दे रहा, दृष्टि को दिखाई देने लगा-सामने जूस सेंटर है, कोई तृष्णा नहीं, बस नई-नई आश्वस्ति को सेलिब्रेट करना है, उतरता हूँ.

सद्य हासिल अचिंता को एन्जॉय करते एप्पल-जूस पिया गया है, हर घूँट में बर्थ प्राप्ति की स्वास्ति उतरी है, मन्यस्कता स्थिर हो रही, भुगतान के लिए पैसे बाहर निकाले फिर वापिस रखे है, कोई दो हज़ार रु कत्थई, ढीली जीन्स की पिछली पॉकेट में और आकर आश्वस्ति की पुष्टि के लिए बर्थ पर लेटता हूँ, जाने किस कौंध में पीछे पॉकेट पे हाथ मारता हूँ-‘अरे दूसरे पॉकेट में होंगे’ हाथ तत्क्षण दूसरे पॉकेट पर जाता है, हड़बड़ाहट सी हो जाती है, एक धड़के में वाशरूम की तरफ भागता हूँ, क्या उतार दूँ, क्या निकाल फेंकू कि दो हज़ार वापिस मिल जाएं, कहीं से झटक आएं, माँ ने बोला भी था सारे पैसे एक जगह मत रखना पर मलंग को किसका सुनना ठहरा, नहीं सुनी अब भुगतो ! वाशरूम की सीमित जगह में क्या-क्या न झटका गया, बस ट्रेन को झटकना रह गया था, दो हज़ार रुपए जा चुके थे, जेब कट गई थी. मन कैसा-कैसा हो आया था और कैसी तो नाउम्मीदी उतर आई थी ट्रेन के उस गंधाते प्रसाधन में. इधर-उधर खंगालने में सिर्फ छह रुपए और गुवाहाटी तक का टिकट ही निकल पाया. निढाल और विरक्त कदमों से बर्थ तक पहुँचता हूँ, ट्रेन कहाँ जा रही, क्यों जा रही, क्या जा रही, कोई लेना-देना नही, बोध-दर्पण हठात ही चटक-तिड़क उठा है, जगत बहा जा रहा पर कोई बिम्ब, कोई छवि नही उभर रही और तो और माँ के गर्भ से साथ हो लिया ‘आत्मालाप’ भी गूँगा पड़ गया है, सन्न पड़ा है, एक सपाटता सी पसर गयी है हर ओर हर छोर !

पिछली रात खाना खाया था, मुगलसराय में जूस पिया अब पेट पकड़ के साइड अपर पे लेटा हूँ, आँतों में हलचल है, भूख लग रही…

दोपहर भूखे पेट ही निकाल दी, पानी की बोतल साथ है, वही पी लेते हैं. मन रो रहा, घर वापिस लौट जाएं ! माँ ने सूजी के लड्डू साथ दिए थे, एकाध जैसे-तैसे गटका गया है, गला सूख रहा. कैसी तो बेकसी पसर रही अस्ति के सारे संभव में, जीवन का प्रवाह, आत्मा का प्रवाह, देह का प्रवाह, सारे प्रवाह रुद्ध हो आए हैं. बक्सर-दानापुर के आस-पास का इलाका है कुछ विद्यार्थी कोच में चढ़ें हैं, भीड़ बढ़ गयी है, मैने मुद्रा बदल ली है और उठ बैठा हूँ, एक छात्र बची जगह में ऊपर चढ़ आया है, साथ बैठ गया है. मन होता है उससे कुछ अनुरोध करूँ, आँतें बात-बात में ख़ुद को उमेठने सी लगती हैं. बातों का सिलसिला शुरू करता हूँ, अपना दुखड़ा रोता हूँ, बताता हूँ कि जेब कट गयी है अब पास कुछ नहीं किन्तु इसके आगे स्पष्ट रूप से माँग नहीं पाता, माँगने की सामर्थ्य नहीं, दीनता नहीं जुटा पा रहा, भूख के आगे अभी समर्पण नहीं, किसी के आगे समर्पण नहीं !

छात्र से कोई खाद्य न जुटता वो बस इतना ही बोलता है -“अरे ! मुगलसराय बहुत खराब है वहाँ तो यही होता है”

चौबीस घण्टे बीत गए कुछ खाए हुए, अन्न को देखे उसकी गंध लिए हुए…अन्न, अनाज, गंदुम, दालें, बासमती कितने नाम-रूप सब भीतर बन-बिगड़ रहे. रात के तिमिर को चीरती ट्रेन भागी जा रही.

गर्मियों के दिन, कोच में भी गर्मी पसरी है  पर प्यास नहीं लग रही, भूख लग रही है,

नींद नहीं आ रही, भूख लग रही है,

आँख नहीं लग रही, भूख लग रही है,

घर की याद आ रही, भूख लग रही है,

लौट जाऊँ, लौट जाऊँ भूख लग रही है.

आस-पास सबने खाना खाया है, किसी ने शिष्टतावश भी नहीं पूछा, भूख लग रही है.

कैसी कातरता है ! घर से लेकर चले ग्लूकोज़ पैकेट से बीच-बीच में ग्लूकोज़ मिला पानी पीता हूँ तो घड़ी दो घड़ी राहत होती है जैसे आँतें सो गई हों किन्तु थोड़ी देर में ही फिर मरोड़ उठने लगते हैं जैसे कोई शक्तिशाली पँजों से गीले कपड़ों के समान आँतों को मरोड़ रहा हो, यही क्रम हो रखा. थोड़ा ग्लुकोज-पानी पीता हूँ आँतें भ्रमित हुई हैं, आँख लग जाती है, करवट नहीं लेटता, पीठ के बल भी नहीं, पेट के बल लेटता हूँ आँतों पर दबाव डाल उनके उमेठ, उनके दर्द को काबू करता.

एक बस व्यवधान हो रखा शेष सब क्रम से हो रहा- दूसरी सुबह भी समय पर खुल रही, भगवान भुवन भास्कर, अनंत रश्मियों के चमकीले रथ पर सवार धरा तक आए तो, किंतु निपट खाली हाथ – ऐसे सूरज का मैं क्या करूँ, अन्नहीन…. खाद्यहीन….नाश्ता हीन ! तुम्हारा प्रकाश लेकर क्या करूँ अंशुमाली ! गेहूँ चाहिए चावल चाहिए मुझे ! क्षुधा की अरश्मियों ने तिमिर फैला रखा है उदर में, एक दाने का प्रकाश ही इस तिमिराच्छन्न को भेद पाएगा, इस जठराग्नि का शमन कर पाएगा जिसमें तिल-तिल मै स्वाहा हो रहा.

खाने को कुछ नहीं तो क्या ब्रश का स्वांग किया जाए. जिनके पास अन्न है, अन्न की सामर्थ्य है, ब्रश कर रहे, मुँह धो रहे, हँस-हँस कर अन्न की बातें कर रहे. मैं एक निरान्न आँतों को भरमाए रखने की जुगत में लगा हूँ- बोतल में पानी भर लिया जाए, ग्लूकोज़ मिलाकर घूँट-घूँट उतारते रहेंगे, बरगलाएँगे उन आँतों को जिनमें सहस्त्रों कांटे से उग आए हैं, जिनकी नोक हरपल आँतों की भीतरी दीवार को छेद रही. ट्रेन किसी छोटे निर्जन स्टेशन पर खड़ी है, नल से पानी भर लिया जाए !

आह ! अब यही बचा था, विपदा ! ऐसी परीक्षा करोगी भूख-आपदा में फँसे और होम-सिकनेस से जूझते मन की बोतल का ढक्कन गिरकर ट्रेन के नीचे पटरियों में चला गया है.

हे मालिक ! यही बोतल तो जीवन-रेखा हो रखी, इसके बिना तो आँतों को भ्रमित करना भी मुश्किल हो जाएगा.

जान की परवाह नहीं करता, भूख की परवाह करता हूँ, उतरता हूँ, ट्रेन के नीचे जाता हूँ, कोई भय नही, ट्रेन चल पड़ने की कोई आशंका नहीं, बस आँतों को शांत रखने का ध्येय ही आत्मा पर फहरा रहा, आत्मा भी रिक्त, क्षीण और कृश हो चली, अन्नहीन देहता में आत्मा का वो स्वरूप नहीं होता जो खाते-पीते इतराते बदनों में होता है.

तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है

बाग के बाग़ को बीमार बना देती है

भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालों

पेट की भूख इन्सान को ग़द्दार बना देती है

‘नीरज’ याद आते हैं और तिरोहित भी हो जाते हैं

नीचे वाली बर्थ पर सफेद कुर्ते पाजामे में तुंदियल से सज्जन जमे हैं. आते-जाते हर फेरीवाले से कुछ न कुछ लेकर खाने और लगातार चना-मूँगफली से अपना मुँह चलाते रहने के कारण सिंधी लगते हैं, मन में आता इनसे याचना करता हूँ , टूटने लगा हूँ, अब टूटने लगा है सब-कुछ, घर वाले कहते रहे हैं घुन्ना है,संकोची है, जिसे अब तक किसी संपदा सा सम्हाला वो संकोच भी टूटा जा रहा, माँग लेता हूँ, भयँकर भूख लग रही, माँग की अनुनय भीतरों में भाषा हो आयी है, बस ध्वनि होने को है, लेकिन जो भी चेष्टा सी पनपी थी गले में फंसकर रह जाती है फड़फड़ाती सी, नहीं माँग पाता ! उन्हें खाते देखता हूँ, बर्थ पे लेटा सामने पीली सी छत देखता हूँ, घरघराते पँखे को देखता हूँ, छत पे आड़ी-तिरछी लकीरों से उभर आई भिन्न-भिन्न आकृतियाँ देखता हूँ, आँते फिर दुखने लगी हैं सहन नहीं हो रहा.

सिंधी सज्जन उठकर वाशरूम की तरफ गए हैं, कोई स्टेशन आया है हबड़-तबड़ मची है. सज्जन की बर्थ पर सिक्का नज़र आता है, और दिन होते तो सोने के सिक्कों के ढेर को भी हेय-दृष्टि देखता किन्तु आज यही सिक्का समूची दृष्टि में भर आया है, उतरकर सिक्का उठा लेता हूँ. अपने पास से एक रुपए मिलाकर दो रुपए का खीरा खरीदा है. समय को खींचकर, तानकर एक-एक टुकड़ा खाया जा रहा ताकि अधिक लगते समय से अधिक परिमाप का भ्रम-बोध हो, ख़ुद को नहीं आँतों को छलने का उपक्रम है किन्तु एकाध घण्टे बाद आंतें फिर दुखने लगी हैं इस बार दुगुनी प्रबलता से, असहनीय मरोड़ उठती है, अब ग्लूकोज़ पानी भी आँतों को तुष्ट नहीं कर पा रहा, गला इतना सूख गया है कि सूजी के लड्डू निगलने के क्रम में लगता जैसे गले के भीतर खरोंचे पड़ रहीं, गला छिल जाएगा. कमांडो ट्रेनिंग के सर्वाइवल कोर्स में भी ‘बर्दाश्त का माद्दा’ बढ़ाने भूखा रखा गया था पर ऐसा भूखा नहीं कि दाने को तरस जाए आदमी, मोहताजी हो जाए.

ट्रेन पता नहीं किस भू-भाग से गुज़र रही, लेट हो आयी है- शाम तक गुवाहाटी पहुँचना था पर रात ग्यारह बजे पहुंची है. अगली ट्रेन कल सुबह दस बजे वो भी एक नम्बर प्लेटफार्म से. चार नम्बर प्लेटफार्म पर माँदा सा खड़ा, सामान एक नम्बर प्लेटफार्म तक ले जाने की योजना बनाता हूँ, खाली पेट योजना नहीं बनती. पीछे बाकी सामान छोड़ ट्रंक उठाता हूँ, प्लेटफार्म से सीधे पटरियों पे उतरता, पार करता, अगले प्लेटफार्म पे चढ़ता, फिर उतरता, पार करता अन्ततः एक नम्बर पर पहुँच ट्रंक रखता हूँ, लौट पड़ता हूँ. यही क्रम बाकी सामान के लिए भी दोहराता हूँ. लोगों का आना-जाना लगा है, सब खाए-पिये लग रहे, क्या-क्या खाया होगा इन लोगों ने, दुनिया भर के स्टॉल लगे हैं,हर स्टॉल पे भीड़ लगी है सबको कुछ न कुछ मिल रहा, कोई मेरा पेट क्यों नहीं पढ़ता, कोई मेरी निरीहता क्यों नहीं पढ़ता. चारों सामान एक नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचा ट्रंक पर ही दुहरा हो जाता हूँ. 48 घण्टे से अधिक हो रहे पेट में अन्न का दाना नहीं, आँखों के नीचे हल्की कालिमा उभर रही.

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक एक पर तीसरी सुबह खुल रही पर जीवन का क्रम वही आँतों पे टिका हुआ, मन में आया कि जी आर पी थाने में जाकर बात करता हूँ, पर सामान का क्या करूँ, कहाँ ढोउँ, जेब तो कटवा ही ली अब यदि सामान भी हाथ से जाए ? तिस पर संकोच अलग, कहीं नहीं जाता नियति के समक्ष अड़ा रहता हूँ.

आगे दीमापुर की तरफ जाने वाली गाड़ी को दस बजे इसी एक नम्बर पे लगना था किन्तु ऐन वक्त पे घोषणा हुई कि ट्रेन एक नम्बर पर नहीं सात नम्बर पर लगेगी एक भूखे-टूटे मनुष्य की असहायता की ऐसी पराकाष्ठा, ऐसी परीक्षा !

भारतीय रेल व्यवस्था ! तुम नहीं जानतीं क्या पाप कर रही हो, क्या अघट कर दिया है तुमने ! तुम्हारे लिए प्लेटफार्म बदलना एक प्रशासनिक आदेश है किन्तु एक मनुज टूटन की कगार पे है, नियति के षड्यंत्र में भारतीय-रेल तुम भी शामिल हो रही ! रोज़े-महशर ये हिसाब भी रखा जाएगा दावरे-हश्र के हुज़ूर में ताकता हूँ इधर-उधर, कैसी विदीर्णता है, कैसी लाचारी ने जकड़ लिया है कि कोई कँधे पे हाथ भी धर दे तो फूट-फूट कर रो पडूँ, सोचता हूँ चारों सामान उठा लूँ किन्तु उठाऊँ तो उठाऊँ कैसे

ट्रेन की तरफ भाग रहे लोगों पर दृष्टि बिछलती है. ‘सामान उठाए साहेब !’ बाजू से ध्वनि आयी है, चन्द्रभान कुली,-” बटालियन जॉइन करने जा रहे…जेब कट गई…पाँच रुपए बचे हैं, दे देंगे, उठाना है तो उठाओ !” बहुत करके भी इतना ही माँग पाता हूँ.

-“आइये ! एकाध आप उठाइये बाकी हम ले चलते हैं”.

चन्द्रभान ने लाकर लामडिंग जाने वाली पैसेंजर ट्रेन की काष्ठ-कुर्सी पर बिठा दिया है. सामने साधु बाबा हैं. पाँच रुपए चन्द्रभान को दे दिए गए हैं अब दमड़ी नहीं, हाय ! क्या तो घट रहा.

कुछ समय बीतता है

चन्द्रभान वापिस आया है

-” यदि आपके पास पैसे नहीं तो ये दस रुपए रख लीजिए”

-“नहीं, हो जाएगा”

‘हाय रे संकोची ! तेरे संकोच को आग लगे’ आँतें बिफर पड़ी हैं. पेट की भूख के आगे चन्द्रभान के लिए कृतज्ञता भी आकार नहीं ले पाती, हल्की नमी है आँख के कोरों में. चेहरे का हाल-मुहाल देख सामने वाले साधु बाबा भी पूछ बैठते हैं-“परेशान दिखता है बच्चा !”

घर-घर जाते हैं, हर घर से न मिले फिर भी विविध तो मिलता ही होगा सो एकाध रोटी तो होगी बाबा के झोले में इसी आस में झोले को ताकते साधु को पूरा दुखड़ा सुना डालते हैं वो पूरा सुनते हैं पर मिलता कुछ नहीं तो क्या खुलकर ही माँगना पड़ेगा ‘कोई रोटी वोटी है तो दो”

अजब समय है जब तक हाथ पसारकर नहीं मांगेंगे तो क्या कोई देगा नहीं, क्यों ये जगत ऐसा संवेदनहीन हो रखा, क्यों कोई इस असहनीय भूख को नही पढ़ पा रहा

न ! नहीं माँगूगा !

साधु दो लड्डू ले लेते हैं, देते कुछ नहीं.

गुवाहाटी स्टेशन से ट्रेन चल पड़ी है. असम की भू-दृश्यावली खिड़की के पार एक चक्कर में गुज़र रही पर भीतर कोई भाव नहीं उपजता, सारी शक्तता जैसे लुट गयी हो, पेट में दाना होता तो इन दृश्यों को पी रहा होता- दृश्यों को तरल बनाकर पीने की कला आती है मुझे !

प्रथमतया गुज़र रहा अहोम भूमि से, ओ ब्रह्मपुत्र ! ओ सुपारी के पेड़ों की श्रृंखला तुम ही साक्षी रहना मेरी इस भूख की जिसने तुम्हें न निरखने दिया.

शाम तक ट्रेन लामडिंग पहुँचाती है, प्लेटफार्म पर सामान रख ट्रंक के ऊपर ही ढेर हो जाता हूं. यहां से दीमापुर के लिए ट्रेन पकड़नी जो देर रात आएगी. समीप ही जवानों का एक ग्रुप पटरी पार बाज़ार में मिल रही स्वादिष्ट मछली और दाल का चटखारे लेकर ज़िक्र कर रहा, सी आर पी एफ के ही जवान लग रहे.

“इनसे माँग लेता हूँ”

किन्तु कैसे स्वयं को दयनीय प्रस्तुत करूँ, देह अशक्त हुई है पर अभी भी दैन्य नहीं, नहीं माँगता !

यहाँ-वहाँ दृष्टि दौड़ाता हूँ, प्लेटफार्म में कही रोटी का टुकड़ा दिख जाए तो उठाकर खा लूँ, खड़े नहीं हुआ जा रहा आँतें तो लगता मर चुकीं, अब दर्द नहीं बल्कि अब दर्द महसूसने की क्षमता ही नहीं.

ट्रंक पर ही पड़ा रह जाता हूँ.

रात दो बजे दीमापुर की ट्रेन आयी है सुबह सात बजे दीमापुर पहुँचा हूँ.

हवलदार नायर आया है लेने, “क्या हुआ साब !” आंखों के नीचे गाढ़े काले घेरे और चेहरे पे उतर आई दीनता को देख पूछता है

कुछ नहीं बोलता

मेस पहुँचा हूँ

तीन पूरे दिन और एक रात के बाद अन्न सामने है

रोटी और भिंडी की सूखी सब्ज़ी

पहला कौर लेता हूँ…

अन्न पधारो आँत में भूखन को सुख दो

सबकी विधी में जा बसो कोई को न दुख दो

© श्री परम शिवम्  

डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ मुझे जीना है (जिजीविषा) — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “मुझे जीना है (जिजीविषा)“.)

 ☆ कथा कहानी  ☆ मुझे जीना है (जिजीविषा) — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

त्रिपाठी जी का अच्छा खासा परिवार था, तीन बेटे, दो बेटियां और पत्नी सरला. त्रिपाठी जी स्वयं रेलवे में एक बहुत बड़े अधिकारी थे. सारे बेटे – बेटियां पढ़ाई कर रहे थे. सबसे बड़ा वाला बेटा सागर, कानून की पढ़ाई कर रहा था, बाद वाला एम एस सी, उससे छोटा बी एस सी. एक लड़की हाईस्कूल में, सबसे छोटी वाली कक्षा आठ में थी. परिवार में सब कुछ ठीक था.

अब त्रिपाठी जी बहुत बड़े अधिकारी थे, तो उनके उपर हमेशा काम का काफी दबाव भी  रहता ही था. यह किस्सा आज से लगभग पचास- पचपन साल पहले की है. बड़े अधिकारियों पर कई तरह के दबाव हुआ करते थे. कर्मचारी, मजदूर यूनियन, रेलवे बोर्ड आदि. एक दिन शाम को देर तक त्रिपाठी जी  आफिस में काम कर रहे थे, उसी समय उनके सीने में दर्द शुरू हुआ. अपने पी ए , रमन को उन्होंने कहा कि दर्द काफी हो रहा है. तुरन्त कार से रेलवे के हास्पिटल में त्रिपाठी जी को ले जाया गया. पता लगा कि हर्ट अटैक हुआ था. खैर तत्काल चिकित्सा शुरू हो जाने से, काफी लाभ हुआ. घर वालों को पता लगा तो पूरा परिवार आ गया. डाक्टर ने कहा कि कोई घबराने की बात नहीं है, हल्का सा ही था. त्रिपाठी जी को एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. लगभग दस दिन आराम करने के बाद, त्रिपाठी जी फिर से  आफिस पहले की तरह ही जाने लगे और आफिस का काम यथावत  करने लगे.

लगभग तीन महीने के बाद, आफिस में त्रिपाठी जी को फिर घबराहट हुई, तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया गया. पता लगा कि इस बार फिर हार्ट अटैक हुआ था और पहले की तुलना में काफी अधिक था. परिवार के लोग घबड़ा गए. खैर समय पर सही चिकित्सा हो जाने के कारण त्रिपाठी जी ठीक हो गये, लेकिन लगभग दो महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. एक दिन रोज की तरह त्रिपाठी जी आफिस गये और दोपहर में ही घर वापस आ गए. सामान्यतः त्रिपाठी जी रात आठ बजे तक ही घर आते थे. आज जल्दी आ जाने पर पत्नी सरला ने पूछा कि आज जल्दी आ गए, सब ठीक तो है? त्रिपाठी जी ने कहा कि सब ठीक है, लेकिन मैंने आज नौकरी से इस्तीफा दे दिया . सरला एकदम स्तब्ध हो गई, लेकिन कुछ कहा नहीं, बोली ठीक है, दोपहर का खाना खा कर आराम करो. त्रिपाठी जी ने खाना खाया और सोने चले गए.

 शाम तक पूरे परिवार को त्रिपाठी जी के नौकरी से इस्तीफा देने की जानकारी हो गई, लेकिन किसी ने भी त्रिपाठी जी से कुछ नहीं पूछा और न तो कुछ कहा. पहले की तरह सब लोग त्रिपाठी जी से व्यवहार करते रहे, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो. लेकिन त्रिपाठी जी के बचपन के मित्र पाण्डेय जी को, त्रिपाठी जी का अचानक नौकरी से इस्तीफा देना, जबकि परिवार में कोई कमाने वाला नहीं था और परिवार का इतना खर्चा था, समझ नहीं आ रहा था. एक दिन शाम को उन्होंने पूछ ही लिया कि त्रिपाठी एक बात बताओ, तुम तो पूरी तरह ठीक हो गये थे, फिर अचानक बिना किसी को कुछ बताये, परामर्श किये, नौकरी से इस्तीफा क्यों दे दिया? त्रिपाठी जी मुस्कुराये और बोले कि मैं इस प्रश्न की प्रतिक्षा बहुत दिनों से कर रहा था, आज तुमने पूछ ही लिया तो, सुनो. मैं जीना चाहता हूँ. पाण्डेय जी चौंक गए! क्या मतलब है तुम्हारा, कौन मार रहा है तुम्हें! त्रिपाठी जी बोले मुझे मेरा आफिस का काम मार रहा है. देखो पाण्डेय, मैंने जिन्दगी में कभी भी हरामखोरी नहीं किया है. अब नौकरी करुंगा तो काम का दबाव तो रहेगा ही. मुझे दो बार हर्ट अटैक हो चुका है, अगर काम के दबाव से तीसरी बार हर्ट अटैक हुआ तो मैं बच नहीं पाऊँगा, मैं अभी जीना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ कि मेरे इस तरह से इस्तीफा देने से परिवार में बहुत बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है, लेकिन सब ईश्वर ठीक कर देगा. हर किसी का अपना – अपना भाग्य होता है, मेरे बच्चों का भी अपना भाग्य है, सब ठीक हो जायेगा. पाण्डेय जी, त्रिपाठी जी का चेहरा देखते रहे. कुछ देर बाद बोले ठीक किया त्रिपाठी!

खैर साहब, समय कहाँ रुकता है! परिवार ने त्रिपाठी जी के पेंशन में ही गुजारा करना सीख लिया. पांच सालों के भीतर सारे लड़कों को अच्छी जगह  नौकरी मिल गयी और उसके बाद धीरे-  धीरे लड़कियों की भी शादी हो गई. त्रिपाठी जी भी इस्तीफा देने के बाद तीस से अधिक सालों तक अपना स्वस्थ जीवन जिये.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

25.03.2026

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४५ – बाल कहानी — जादूई पेन – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बालकहानी  बाल कहानी — जादूई पेन ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४५ 

☆ बाल कहानी — जादूई पेन ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

दादीजी सुबह जल्दी उठीं। देखा, श्रेया को बुखार था। 

‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था। 

‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’ 

‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा। 

मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी। 

कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’ 

‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा। 

तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’ 

‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया। 

‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’ 

‘‘जादूई पेन!’’ 

‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’ 

‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’ 

‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’ 

‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई। 

आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था। 

श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी। 

वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’ 

‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं। 

श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं। 

जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’ 

उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’ 

‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा। 

लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’ 

यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’ 

इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’ 

‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’ 

‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’ 

‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’ 

‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया।     

 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

दिनांक- 10.01.2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – यादें पुरानी।)

☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

तुम्हें कुछ याद नहीं रहता ।

महीने में एक दिन किटी पार्टी के लिए  समय नहीं निकल सकती क्या इतनी देर से क्यों आई कमला जी ने कहा।

नेहा ने बड़ी विनम्रता से कहा- “क्या करूँ! घर में काम इतने हो जाते हैं कि समय का पता नहीं चलता।”

कमल जी ने कहा- “भाई हमें भी काम होता है फिर भी हम लोग महीने में एक दिन सब कुछ छोड़कर अपने लिए समय निकालते हैं।”

“ठीक है दीदी अब अगली बार किटी पार्टी में मैं सबसे पहले आ जाऊंगी आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”

अच्छा यह तो बताइए कि “आप लोग  इतनी जोर से हॅंस रहे थे और मुझे देखकर अचानक चुप हो गए?”

“कुछ नहीं हम सभी सहेलियाँ बात कर रही थीं ।” पुराने दिन कितने अच्छे थे जब हम लोग घर के बाहर बैठकर एक दूसरे से सुख-दुख की बातें करते थे। स्वेटर बुनते ,आचा,र बड़ी ,पापड़, चिप्स बनाते थे ।

आज वह सब दिन जाने कहाँ चले गए अब तो लोग बाजार से सब चीज खरीद लाते हैं मेरी बहू को तो यह सब काम फालतू और फिजूल खर्ची लगता है।

“कोई बात नहीं दीदी आप मेरे घर आइएगा मैं आपको यह सारी चीज अपने हाथों से बनी हुई खिलाऊंगी।”

“ठीक है तुम्हारे यहां आकर मैं यह सब चीज बनवाऊंगी।”

“अच्छा तुम सभी को दिखाने के लिए मैं एक पुराने जमाने की चीज लाई हूँ।”

“दीदी यह तो लालटेन है” जोर से चिल्लाते हुए नेहा बोली।

“हाँ यह मेरी अम्मा ने मुझे शादी में दिया था बहु को मेरे यह कबाड़ लगता है मेरे कमरे में मेरे साथ मेरी नातिन रहती है उसे भी यह अच्छा नहीं लगती ।”

“बहुत दिनों से इसे लपेटकर अलमारी में आदर पूर्वक रखी हूँ।”

” बिजली और नए युग के आने की खुशी तो बहुत है लेकिन क्या करूँ?”

“इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि मेरी माँ मेरे पास है।”

नेहा बोली-” दीदी सच कह रही हो आजकल की पीढ़ी भी प्लास्टिक की दुनिया में खो गई है।”

“सारे सामान इस्तेमाल करके फेंक देती है उन्हें संभालना रखना यह अच्छा ही नहीं लगता।”

“बस बाहर जाना, नौकरी करना, घूमना, फास्ट फूड खाना हमारे पास बैठने तक का वक्त नहीं है?”

कमल जी ऑंखों से ऑंसू से बहने लगते हैं।  उनके मन का सूनापन उनकी ऑंखों में उभर आता है।

कमल जी रोते हुए कहा -“एक दिन मैं भी ऐसे ही डिब्बे में पैक होकर भगवान के घर चली जाऊंगी।”

  “क्या तुम लोग मुझे इस लालटेन की तरह याद करोगी।”

 नेहा यह लालटेन  निशानी समझ कर तुम संभाल कर अपने पास रख लो। देर से आने की  यही तुम्हारी सजा है।

सभी सहेलियों मुस्कुराते हुए कहती हैं कमल दीदी अब हम सभी देर से आएंगे तो आप हमें इसी तरह उपहार देना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – आशीर्वाद के अक्षत ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा आशीर्वाद के अक्षत”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻 💐आशीर्वाद के अक्षत 💐

आजकल पैसों से गरीब कोई नहीं होता। जो गरीब दिखते हैं वास्तव में वह कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर एकदम बेसहारा लाचार प्राकृतिक आपदा दिव्यांगता।

इन चीजों को परे हट कर  देखा जाए तो आज वास्तव में पैसा संस्कार, श्रद्धा, अपनापन, रीतरिवाज, मर्यादा, सम्मान सब भूला देता है। भीषण युद्ध का समाचार पढ़ते- पढ़ते अचानक पेपर पर निगाह दौड़ रही थी।

एक पूंजीपति इंसान की दर्दनाक मौत। वजह अकेलापन, अपनों की याद, जकड़े हुए रिश्ते और बोझिल होती साँसे।

आसमान साफ परंतु हल्की सी बूंदाबांदी मानो कह रही हो राहत तो अपनों से ही मिलती है। पर अपने है कहाँ??

तभी दरवाजे पर दस्तक। चश्मे से निहारते नयन दरवाजे पर जाकर अटकी। सामने महीने बंदी सामान लेकर आने वाला किराना व्यापारी खड़ा था। मालती— सुनिए भैया इस बार का राशन का सामान आप इस पते पर पहुंचा दीजिएगा।

व्यापारी बोला – – क्या बात है मैडम कहीं जा रही है और यह किसको देना है।

मालती ने बड़े भोलेपन और खुशी जाहिर करते हुए बोली– वह हम अपने बेटे के यहाँ जा रहे हैं। यहाँ घर पर जो बनेगा वह सब वहाँ बन जाएगा।

व्यापारी – मैडम बेटे के यहाँ सामान लेकर जा रही है? मैं कुछ समझा नहीं। अपना ही बेटा है न?

हमारा ही बेटा है। खूब बड़ी कंपनी में नौकरी करता है। कल उसने फोन पर कहा है–अपना दो-चार दिन रहने का इंतजाम करके आना।

मुझे समय नहीं मिल रहा हैअब कुछ खाना है। तो ले जाना पड़ेगा और उसे उपहार में कुछ देना पड़ेगा। उपहार ही समझो। पर चिंता न करो हम कुछ दिन उसके घर पर ही रहेंगे।

जलती तवे पर पानी की बूँदे जैसे चटपटाती है, ठीक उसी तरह उसके हृदय के बोल निकल रहे थे। बाबूजी की आवाज – – अब छोड़ो भी बच्चों के पास जा रहे हैं क्या यह काम है।

जन्मदिन पर बुलाया है आशीर्वाद के अक्षत तो लेकर जाना ही है। व्यापारी को आशीर्वाद के अक्षत और उपहार का सामान समझते देर न लगी। वह बोला– ठीक है जल्दी आ जाईयेगा और अपना ध्यान रखिएगा

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३० ☆ कथा कहानी – सूखी पत्ती ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘सूखी पत्ती‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३० ☆

☆ कथा-कहानी ☆ सूखी पत्ती

दफ्तर की इमारत वैसी ही है जैसी सरकारी इमारतें अमूमन होती हैं— बदरंग और बेरौनक। कई सालों से उसमें रंगाई-पुताई नहीं हुई। भीतर दीवारों पर बरसाती पानी के बड़े-बड़े धब्बे बारह महीने उपस्थित रहते हैं। बाहर की दीवारें काली हो रही हैं। टॉयलेट में थोड़ी देर खड़े रहने पर छत से पानी की बूँद चाँद पर टपककर मन को पवित्र कर देती है।
गेट और दफ्तर की इमारत के बीच जो खाली ज़मीन है उसमें कई तरह के पौधे बेतरतीब उग आये हैं। उनकी कटाई-छँटाई का कोई इन्तज़ाम नहीं है। इन्हीं के बीच से दफ्तर तक का घुमावदार रास्ता गुज़रता है।

इसी दफ्तर में पाँच छः बाबू बैठते हैं। बगल में छोटा सा कमरा बड़े बाबू का है, और उसके पार साहब का कमरा। साहब के आने-जाने का कोई निश्चित वक्त नहीं है। इससे बाबुओं को कोई दिक्कत भी नहीं होती। साहब के न रहने पर आज़ादी और मौज का वातावरण रहता है। बड़े बाबू को पटा कर कोई सुविधा ली जा सकती है।

दफ्तर में बैठने वाले बाबुओं में निरंजन बाबू, बेनी बाबू, गोस्वामी बाबू और सिंह बाबू हैं। इनके अलावा एक रजक बाबू भी हैं। रजक बाबू सीधे-सादे आदमी हैं। कोई उनका मज़ाक उड़ाये  तो बुरा नहीं मानते। हल्के से हँसकर उसे झेल लेते हैं। प्रतिवाद नहीं करते। रजक बाबू का रहन-सहन बहुत सादा है, जैसा साधारण परिवारों का होता है। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे अक्सर अपने सहकर्मियों के निशाने पर रहते हैं। उनकी सिधाई और कपड़ों-लत्तों को लेकर मज़ाक चलता रहता है, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

बड़े बाबू बड़े नफासत-पसन्द व्यक्ति हैं। अच्छे सिले, साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं और माथे पर लाल तिलक लगाते हैं। पान की डिबिया हमेशा बगल में रखते हैं और एक पान मुख में। दफ्तर पहुँचते हैं तो चपरासी पूरनलाल दौड़कर उनका स्कूटर थाम कर पार्किंग के लिए ले जाता है।

रजक बाबू अब भी दीक्षितपुरा के अपने पैतृक घर में रहते हैं। घर काफी पुराना है और मुहल्ला भी पुराना, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों वाला है। दिन में कई बार ट्रैफिक-जाम होता रहता है, लेकिन रजक बाबू का मन वहीं रमता है। मित्र और सहकर्मी उन्हें कई बार बिन-माँगी नसीहत दे चुके हैं कि अब वे एक इज़्ज़तदार नौकरी में आ गये हैं, अब उन्हें अपना बसेरा किसी ऊँची कॉलोनी में बना लेना चाहिए। लेकिन रजक जी ‘मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे’ वाले हैं। वह घर और वह मुहल्ला छोड़ने की बात उनके गले उतरती नहीं।

रजक बाबू के परिवार में पीढ़ियों से कपड़े धोने और प्रेस करने का काम होता रहा है। माता-पिता ने इसी काम से कमाई की और बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। मुहल्ले में उन्हें सब जानते हैं। रजक बाबू भी खाली समय में पिता-माता का हाथ बँटाते रहे। अब दफ्तर में नियुक्त होने पर भी उन्हें अपने घर के धंधे में कोई खोट नज़र नहीं आता।

पिता ज़िन्दगी भर खड़े-खड़े प्रेस करते रहे, इसलिए अब साठ पैंसठ की उम्र में उनकी टाँगें जवाब देने लगी हैं। माँ स्थूल हो गयी हैं, उनसे ज़्यादा काम नहीं होता, इसलिए रजक बाबू सुबह- शाम उनकी मदद करते रहते हैं। माँ कपड़ों की गठरी लेकर मुहल्ले में प्रेस के कपड़े दे आती है। मुहल्ले के बाहर के भी कुछ ग्राहक हैं, उनके कपड़े पहुँचाने के लिए साइकिल पर गठरी रखकर खुद रजक बाबू निकल जाते हैं क्योंकि पिता को अब साइकिल चलाने में घुटनों में तकलीफ होती है। रजक बाबू का छोटा भाई भी है, लेकिन वह कॉलेज में पढ़ता है और उसे कपड़े लेकर लोगों के घर जाने में अपनी बेइज़्ज़ती लगती है। साथ पढ़ने वाले लड़कों-लड़कियों से टकरा जाने का भय भी होता है।

दफ्तर में रजक बाबू के इस काम को लेकर तानाकशी और फिकरेबाज़ी होती रहती है। उनके सहकर्मियों का खयाल है कि रजक बाबू के कपड़ों की गठरी लेकर घूमने से दफ्तर की इज़्ज़त गिरती है। उनके खयाल से यह काम ‘बिलो स्टैंडर्ड’ है। जिस दिन कोई सहकर्मी उन्हें गठरी के साथ देख लेता है उस दिन आक्षेप तेज़ हो जाते हैं— ‘दे आये कपड़े?’  ‘ग्राहक खुश हैं? कोई नाराज तो नहीं हुआ?’ ‘बैठने के लिए कुर्सी मिली या पूरे टाइम खड़े ही रहे?’ ‘बड़े आज्ञाकारी हो भैया।’ ‘ऊँचा पद पाने से कुछ नहीं होता, उसे मेंटेन भी करना पड़ता है।’ बेनी बाबू इस फिकरेबाज़ी में शामिल नहीं होते क्योंकि हर महीने बीस तारीख के बाद उनकी तनख्वाह चुक जाती है और ऐसे में उन्हें रजक बाबू से हजार पाँच सौ की मदद मिल जाती है। अन्य सहकर्मी इस मामले में ज़्यादा उदार नहीं हैं।

रजक बाबू कई बार अपने साथियों को बता चुके हैं कि वे यह यह काम सिर्फ अपने माँ-बाप की मदद के लिए करते हैं, कमाई के लिए नहीं। उन्हें इस काम में कुछ गलत या कोई बेइज़्ज़ती की बात नज़र नहीं आती। उनके हिसाब से कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता। किसी काम से आदमी की इज़्ज़त नहीं घटती। वे महात्मा गाँधी का उदाहरण देते हैं जो अपने सारे काम खुद ही करते थे।

यह सुगबुगाहट बड़े बाबू के कानों तक भी पहुँच चुकी है और वे एक दिन रजक बाबू को बुलाकर उन्हें लेक्चर भी पिला चुके हैं। आवाज़ में मिश्री घोल कर उन्होंने रजत बाबू को समझाया था, ‘देखो भैया, हमें तो बहुत अच्छा लगता है कि आप अपनी इज्जत की कीमत पर अपने माँ-बाप की सेवा करते हो, लेकिन कुछ बातें हैं जो आप को समझना चाहिए। मेहनत मजदूरी के काम करने वालों को हम ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ कहते हैं और दफ्तर का बाबू ‘व्हाइट कॉलर वर्कर’ होता है। ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ की कैटेगरी से उठकर ‘व्हाइट कॉलर’ की कैटेगरी में आना बड़े भाग्य की बात है। आप इस मामले में भाग्यशाली हैं। तो आपको लौटकर ‘ब्लू कॉलर वर्कर’ नहीं बनना चाहिए। इससे हमारे एस्टेब्लिशमेंट की प्रतिष्ठा घटती है।’

थोड़ा रुक कर वे बोले, ‘आप समझिए कि हमारे समाज में मेहनत-मजदूरी करने वाले की इज्जत नहीं है। किसी मजदूर को किसी घर में कुर्सी पर बैठे देखा है क्या? उसे बैठने के लिए जमीन ही मिलती है। आप आज इस लायक हो गये कि समाज में इज्जत पा सकें, इसलिए आपको निचली कैटेगरी के काम से बचना चाहिए, वर्ना बड़ी मुश्किल से कमायी इज्जत कभी भी हाथ से खिसक सकती है। मैं आपको वह काम करने से मना नहीं कर रहा हूँ, लेकिन आपको खुद इस मामले में सोच समझ कर काम करना चाहिए। आप खुद सोचिए कि जो लोग आपसे दफ्तर में मिलते हैं वे आपको बाहर कपड़ों की गठरी लेकर घूमते देखकर क्या सोचते होंगे? अपनी इज्जत का खयाल हम खुद नहीं रखेंगे जो दूसरे क्यों रखेंगे?’

लेकिन इस प्रबोधन के कुछ दिन बाद मामला फिर गर्मा गया। मामला तब उठा जब रजक बाबू ने निरंजन बाबू को अपने बच्चों के लिए दफ्तर की स्टेशनरी देने से मना कर दिया। रजक बाबू दफ्तर की स्टेशनरी के इंचार्ज हैं। निरंजन बाबू तब से बिफरे हैं और उन्होंने बड़े बाबू से कह दिया है कि रजक बाबू जो कपड़े पहुँचाने का काम करते हैं उससे पूरे दफ्तर की नाक कटती है और उस पर तुरन्त कार्यवाही होनी चाहिए, अन्यथा उन्हें अपनी बात साहब तक पहुँचानी पड़ेगी।

बड़े बाबू ने रजक बाबू को तलब किया। मुलायमियत से बोले, ‘आपके अपने घर का काम करने की शिकायत बार-बार आती है। इस समस्या पर मैं सोचता रहा हूँ। मेरी समझ में आपकी समस्या की सारी जड़ यह है कि आप उस पुराने मुहल्ले में फँसे हुए हैं। वहाँ तंग गलियों में रहने से आदमी की सोच भी वैसी ही हो जाती है। मेरी मानिए तो लोन लेकर एक दो बेडरूम वाला फ्लैट ले लीजिए। अभी सब तरफ अपार्टमेंट बन रहे हैं, आसानी से मिल जाएगा। कम आउट ऑफ दैट मुहल्ला। दूसरी जगह दूसरी तरह के लोगों के साथ रहेंगे तो आपकी सोच भी बदलेगी। थिंक ओवर इट।’

रजक बाबू सहमति में सिर हिलाते हैं, फिर अपनी सीट पर बैठकर सोचते हैं। लोन लेकर फ्लैट खरीदने का मतलब है अपना चैन हराम करना। ऊपरी मंज़िल पर बिना लिफ्ट का फ्लैट मिला तो माँ-बाप से अलग होना होगा। बुढ़ापे में उनकी देखभाल और मदद कैसे होगी? उन्हें भाई के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नयी जगह में पुराने मुहल्ले जैसा सुकून, इत्मीनान और अपनापन मिलेगा?

बड़े बाबू की नसीहत याद करके रजक बाबू के मुख पर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान आ जाती है। देखते हैं कि एक सूखी पत्ती उड़कर उनके कंधे से चिपक गयी है। उसे तर्जनी और अँगूठे से झाड़ कर वे सामने रखी फाइल में व्यस्त हो जाते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०१ – धरती एक ही… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– धरती एक ही…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०१ — धरती एक ही — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अकूत धनवान सोचता था एक दिन इतना कुछ छोड़ कर जाना है। इस सोच से उसे रोना आ जाता था। इसी तरह की सोच एक फटेहाल आदमी के जेहन में कौंधती थी। कितने कष्ट से अपनी छोटी सी झोंपड़ी बनायी थी। एक दिन छोड़ कर जाना है। इस सोच से उसे भी रोना आ जाता था। शायद दुनिया के लिए यह नई बात न हो गरीब अपने जन्म की धरती के सीने पर लिखता हो मूल्यवान तो मैं भी होता हूँ।

 © श्री रामदेव धुरंधर
02 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “लाल बत्ती” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “लाल बत्ती” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मैं आज अपनी कार में बेटी को यूनिवर्सिटी छोड़ने जा रहा था। आमतौर पर अपनी सरकारी लाल बत्ती वाली चमचमाती गाड़ी में छोड़ने जाता हूँ। ‌लाल बत्ती देखते ही सिक्युरिटी पर तैनात सिपाही सैल्यूट ठोकना नहीं भूलते। पर आज ड्राइवर छुट्टी पर था। मैंने सोचा कि मैं ही अपनी कार में बेटी को छोड़ आता हूँ।

जैसे ही मेन गेट पर कार पहुंची, सिक्युरिटी वालों ने हाथ देकर रुकने का इशारा किया। मैं हैरान! जो मुझे देखे बिना सैल्यूट ठोकते थे, आज चैकिंग के लिए पूछ रहे थे क्योंकि आज लाल बत्ती वाली गाड़ी जो नहीं थी !

मैंने बताने की कोशिश की कि मैं वही हूँ, जिसे आप बिना देखे सलाम करते हो लेकिन वे मानने को तैयार न थे! तो क्या लाल बत्ती ही मेरी पहचान है, मैं नहीं? और मैं आईकार्ड ढूंढने लगा!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४७ – लघुकथा – पिता की बात, पत्थर पर खींची हुई लकीर? ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४७ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की बात, पत्थर पर खींची हुई लकीर ? ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

पत्थर पर खींची गयी लकीर, और पिता की कही गयी बात कभी मिथ नही हो सकती l ऐसा कह कर वह बुजुर्ग सो गया l इस बात को जिस विश्वास के साथ उसने कहा था, बुजुर्ग को अपने इस विश्वास के अस्तित्व पर खतरा महसूस हो रहा था l बुजुर्ग सोया, मगर इस सोच और मंथन के साथ सोया कि इस पंक्ति में मजबूती कितनी है, यह तो आगे देखने वाली चीज होंगी l

नींद में भी लम्बे अनुभव और युवा के अतिआत्मविश्वास मे द्वन्द बढ़ता गया था l युवा पुत्र को बुजुर्ग बाप से यह कहना बड़ा आसान था कि आप कुछ नही जानते है l आपको कुछ सही समझ मे आता ही कहां है l आप तो गलतियाँ करते ही करते है l अब ऐसी गलती बर्दास्त भी नही होंगी ।

बुजुर्ग बाप की लम्बी उम्र, पके बाल, और मंद होती आँखे स्वप्न में भी इसी सोच मे पड़ी रहीं कि क्या उसका पुत्र सही कह रहा था और उसकी बात गलत है ।

बुजुर्ग आँखे अपनी बत्ती बुझने से पहले पहले अपने इस प्रश्न का सटीक उत्तर ढूढ़ रही थी l अचानक मानव जीवन के यथार्थ का बोध कराने वाली पुस्तक श्रीरामचरितमानस उसके आगे खुली थी l वह लगातार पन्ने पलटते जा रहा था कि..अचानक ये पंक्तियाँ उसके मानस पटल से टकराई l

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें।

चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥

राहत की बात यह थी कि नींद खुलने से पहले उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया था l

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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