हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६४ – “एक समस्या टली…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “एक समस्या टली–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “एक समस्या टली-...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

गाड़ी की चकील* टूटी है

जुँआ चरमराता ।

जैसे वह हो प्रणव गीत का

नायक उद्गाता* ॥

 

और अँधेरी रात

बैल के कंधे कसे – कसे ।

जैसे कर्जे में आसामी

लगते फँसे – फंसे ।

 

खीसे* की है नींव, कि

उसकी हिली हुई समझो |

वही आदमी करने निकला

मग में जगराता *॥

                                   

बित्ता बित्ता रेंग रही यह

सुविधा नासपिटी ।

जीवनरेखा लगे जहाँ पर  

है सिमटी – सिमटी ।

 

गर्मी की यह प्यास गले

को   भीषण सुखा रही –

बैलों की जोड़ी आपस का

तोड चली नाता ॥

 

माँग चूँग कर थका, चलाता

रहा  बैल गाड़ी ।

एक समस्या टली, दूर

तो दूजी है ठाँड़ी ।

 

हाल* उतरती दिखी तभी

बायें पहिये की किन्तु ,

धैर्यवान क्या कभी विपति में

ऐसे घबराता ?

☆

 * चकील= पहिये को गाड़ी से पृथक न होने देने के लिये लगाया गया कील रूपी सपोर्ट ।

* उद्गाता= उच्चस्वर में गाने वाला,  सामवेद का गायक

* जगराता= रात्रि जागरण

* खीसा= जेब

* हाल= बैलगाड़ी के लकड़ी के पहिये के लिये लोहेका टायर

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

27 -11-2025

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४६ ☆ # “हम कहां जा रहे हैं…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हम कहां जा रहे हैं…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४६ ☆

☆ # “हम कहां जा रहे हैं…” # ☆

☆

यह कैसा विकास देश में ला रहे हैं

सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं

 

यहां छाया घना कोहरा है

यहां इंसान शतरंज का मोहरा है

कदम कदम पर फिरते बहरूपिये है

यहां हर व्यक्ति का चरित्र दोहरा है

वेश बदलकर हम क्या पा रहे हैं

सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं

 

यह कड़ाके की ठंड जलते हुए अलाव

उजड़ती बस्तियां जलते हुए गांव

निष्कासित बेघर जिनके लहूलुहान हैं पांव

भटक रहे हैं ढूंढते अपने सर पर छांव

रसूखदार बड़े-बड़े दाव लगाते जा रहे हैं

सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं

 

निर्बल लगा रहे हैं न्याय की गुहार

सब गूंगे बहरे हैं कौन सुनेगा पुकार

उनके पेट और पीठ पर पड़ रही है मार

दया की जगह उन्हें मिल रही दुत्कार

अंदर ही अंदर आक्रोश में सुलगते जा रहे हैं

सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं

 

एक प्रताड़ित बेटी मांग रही है न्याय की भीख

मीडिया से कह रही है मेरी यातनाएं लिख

दुर्दांत अपराधी को मिलनी चाहिए सिख

वरना दबके रह जाएगी न्यायालय में उसकी चीख

बेल पर छूट कर यह जालिम न्याय का मजाक उड़ाते जा रहे हैं

सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं

 

यह कैसा विकास देश में ला रहे हैं

सन्मार्ग छोड़कर हम कहां जा रहे हैं /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ८९ चलो चलें वहां-… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘चलो चलें वहां…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ८९ ☆ चलो चलें वहां… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

हम चलें वहां,

जहां धरती अम्बर मिलते हैं,

जहां पुष्प प्यार के खिलते हैं,

चादर ओढ़े है बर्फीली,

सकुचाती है शर्मीली,

तारे मुस्काते हैं जहां,

चलो चलें वहां,

हम चलें वहां

*

रात में सूर्य निकलता है,

दिन में चांद चमकता है,

जहां ठंडी हवाएं गाती हैं,

प्रेम संदेशा लाती हैं,

खुशियां बरसें चहुं ओर जहां,

चलो चलें वहां,

हम चलें वहां.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मर्मबंध… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ मर्मबंध… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

☆

मी जे जगलो त्याचा हा तर मर्मबंध आहे

या गझलेचा अर्थ पसारा लांबरुंद आहे

 *

साध्य साधना करून येथे पूर्ण कर्म केले

निवांत झाल्या देहकुडीचा श्वास मंद आहे

 *

काळजातल्या कथाव्यथांचे स्तोम खूप झाले

त्याच सुखाच्या आठवणींचा मंद गंध आहे

 *

संसाराच्या धकाधकीची रीत छान साधी

जगणे तेथे कालक्रमाने जेरबंद आहे

 *

स्वैरपणाने भटकायाची शांत वेळ नाही

वातावरणातील जराशी हवा कुंद आहे

 *

जमेल तितकी अध्यात्माची साथ घेत जावी

तप करण्याला सोबत तुमच्या संतवृंद आहे

 *

स्वतंत्रतेचा आज जमाना फार ठारवेडा

जगात आता जगणे म्हणजे मुक्त छंद आहे

☆

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १६ – कविता – कितनी देर अब… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कितनी देर अब…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १६ ?

? कविता – कितनी देर अब… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

पक भी गए, झरबेरी बेर अब

और, मिलन में कितनी देर अब

=2=

शेर ग़ज़ल के, पूछ रहे हैं

बचे वनों में, कितने शेर अब

=3=

अधिकारों की बात बे-मानी

अंधों के हाथों बटेर अब

=4=

सुर्खियों में, है बारह मासी

हुई हाशिये पर कनेर अब

=5=

आये दिन की, आम बात हुई

हेरा – फेरी, हेर – फेर अब

=6=

किसे पुकारे, आज द्रोपदी

सुनते नहीं हैं, किसन टेर अब

=7=

लोक तंत्र में, वोट की चोरी

गुण्डागर्दी, ये अंधेर अब

=8=

मत कर सड़क पे, नारे-बाजी

राजभवन को, घेर – वेर अब

=9=

कौन करे, ‘राजेश’ सफ़ाई

सत्ता में है, कचरा ढेर अब

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पहेली ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पहेली ? ?

मिलावट बीजों में है या

माटी ने रंग बदला है

सचमुच नहीं जानता मैं…,

ताउम्र अपनापन बोकर भी

अकेलापन काटता रहा मैं…!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 8:43 बजे 25.12.2018

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०४ ☆ स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – बिन तेरे… ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता – बिन तेरे ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ कविता – बिन तेरे ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

(पूज्य माँ स्मृति शेष डॉ गायत्री तिवारी जी का पुण्यस्मरण)

☆

माँ कैसे जिऊँ

अब बिन तेरे

तेरी स्मृतियां है

मुझे घेरे

कुछ समझ आज का आकार 9

नहीं आता

बिन तेरे

कुछ भी नहीं भाता

माँ कानों में

गूंजती है तेरी आवाज

लगता है

मां हो तुम आसपास

 फिर भी मन है उदास

 बंद करती हूं आँखें

खिलता हुआ

दिखता है चेहरा

लगता जैसे हो रहा सवेरा

जैसे हो रहा सवेरा।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – जागती रहे नदी ☆ श्री हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

 

☆ जागती रहे नदी  ☆
 

(स्वर्गीय डॉ॰ गायत्री तिवारी जी की कृति ‘जागती रहे नदी’ से प्रेरित रचना।)

जाग ही तो रही है नदी।

 

हर्ष से हर्षित

प्रियतम प्रियम

मोहिनी सी आभा

ऊपर से शांत

अंतःस्थल

उतना ही अशांत।

जाग ही तो रही है नदी।

 

धीर गंभीर

बहती हुई नदी का

चारु-चिंतन,

यादों के नागपाश।

भावना और कामना

के तटों पर

संभावना की फसल।

जाग ही तो रही है नदी।

 

पथ पर अविरल

पाथेय अनुरूप लय

नियति है

अथाह समुद्र में विलय।

फिर भी सारे पथ

जाग ही तो रही है नदी।

 

किन्तु,

कैसे कर सकती है

विस्मृत

पथ – पाथेय

मित्र – सुमित्र’

दोनों तटों को दे पारस स्पर्श

बहती रहती है अविरल।

जाग ही तो रही है नदी।

 

एक-एक कर

एक-एक पावन तट पर

छूटते जाते हैं पीछे

फिर भी

बहती रहती है नदी

जागती रहती है नदी

जाग ही तो रही है नदी

जागती रहे नदी।

 

© हेमन्त बावनकर

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८९ ☆ मुक्तक – ।। आओ मिल दुनिया की कहानी नई लिखते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८९ ☆

☆ मुक्तक ।। आओ मिल दुनिया की कहानी नई लिखते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

आओ मिल कर कहानी , नई लिखते हैं।

जीवन रंग-ढंग  रवानी, नई लिखते हैं।।

सबके लिए सरोकार, की ही बात हैं  करते।

जीने का सलीका जिंदगानी, नई लिखते हैं।।

=2=

बात मेहरबानी की हर, किसी के लिए हो।

साथ ही परेशानी कम हर, किसी के लिए हो।।

अधिकार और कर्तव्य, का मेल रहे सदा।

दुनिया दीवानी भी हर, किसी के लिए हो।।

=3=

कड़ी से कड़ी जोड़ कर, जंजीर बनाते हैं।

मेहनत से मिल कर , चलो तक़दीर बनाते हैं।।

कण-कण में जहाँ पर, प्रेम हो बिखरा हुआ।

दुनिया की ऐसी कोई , नई तस्वीर बनाते हैं।।

=4=

हमदर्द हमसाया सा कोई, समाज नया रचते हैं।

हमराह सा अब रिवाज़, कोई नया ही रचते हैं।।

प्यार की हर रीत , प्रेम की प्रथा हो जहाँ पर।

हमदम सा दोस्त का, कोई साज़ नया रचते हैं।।

=5=

स्नेह-प्रेम प्यार के हमसब, बनते चित्रकार हैं।

दोस्ती और दुआ के बनते, हम कलाकार हैं।।

महाभारत पांसे नहीं, लाते हैं रमायण के आदर्श।

स्वर्ग सरीखी दुनिया के, बनते अब शिल्पकार हैं।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५२ ☆ कविता – हर खबर देता यही अख़बार है… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – हर खबर देता यही अख़बार है…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५२ ☆

☆ हर खबर देता यही अख़बार है…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

 हर सुबह पहली खबर देता यही अखबार है

देश में नई समस्याओं का लगा अम्बार है।

एक का जब तक निकल पाता कोई हल

तभी दूसरी अपनी उपस्थिति दिखाने तैयार है।

 *

लोगों के नियमों के पालन के नहीं हैं हौसले

कानून के विपरीत खुद करने लगे अब फैसले।

 विधायको सांसदों के अटपटे व्यवहार हैं

राजनैतिक दलों में नित दिखती नई तकरार है।

 *

जनता, शासक, सेवकों के सुनिश्चित कर्तव्य हैं

भूल से गये है सभी पर शायद निज गन्तव्य है।

रास्तों पर उलझनों का बढ़‌ता जाता भार है

लगता है अब लोक तंत्र हमारा  बीमार है।

* 

मुँह से तो सब कहते हैं कि शांति-सुख हो देश में

काम पर करते हैं जिससे हिंसा है परिवेश में

डर से जन-मन का डिगा दिखता विश्वास है

बढ़ रही शंका कुशंका घटा  मन का प्यार है।

* 

बढ़ाना तो चाहती सुविधायें सब सरकार है

हिंसा से पर साधना सब हो रही बेकार है।

लोगों को प्रिय सदा ही रहा निज संस्कार है

पर दुराचारी के उपद्रवो की भरमार  है ।

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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