(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८४ – मत समझ हमको पराया…२
दोस्त! तू भोला भाला था
क्या नहीं तुझको पता था
यह जमाने का पुराना सिलसिला है
चाहने पर क्या मिला है?
मन जिसे चाहे जहाँ
वह वहाँ
मिलता नहीं है,
सड़क
में कीचड़ बहुत होता
पर कमल खिलता नहीं है।
भुला दे दुख दर्द अपना
छोड़ दे रोना कल्पना
एक शायर ने कहा है-
‘मोहब्बत के अलावा भी और गम है।
एक तेरी ही नहीं
दूसरी भी आँख नम हैं।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मकड़जाल में...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “मकड़जाल में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
☆
सुनो चतुर्भुज !
जो मशाल थी –
सुबह जलायी
वही गई बुझ ॥
जो भी रण था
जीत गये तुम ।
फिर भी क्यों
टेढ़ी तेरी दुम ।
साज सँवार
और सामग्री –
राजकोट से जा
पहुँची भुज ॥
दिन का तार –
तम्य है ढीला ।
समझ चुका है
समय हठीला ।
कितने दस्तों*
में बाँधोगे ?
खुल न जायें सब
उनके जुज **॥
कहीं कहीं अस –
हज प्रवृत्ति सा ।
खड़ा हुआअव –
रोध भित्ति सा ।
फिर पहाड़ से
नीचे आकर ।
मकड़जाल में –
उलझा तन्तुज ॥
* एक निश्चित संख्या में इकट्ठे कागज
** पुस्तकाकार छापे जाने के लिये छोटे छोटे समूह में कागज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “एक स्मारक .. मेरा पुश्तैनी घर भी था” ।)
कविता – “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!! मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
(हिंदी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम पर एक कविता लिखने के मेरे प्रयास का पठन और समीक्षा कीजिये – मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग)
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सीने मे आग है…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘तेरा बलिदान सरहद पर…‘।)
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका गीत – ममता के गाँव में…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७९ ☆
☆ गीत – ममता के गाँव में…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – झूठ के घर…!
☆ काय फरक पडतो?? … मूळ हिन्दी कविता : हेमन्त बावनकर ☆ स्वैर अनुवाद – मंजुषा सुनीत मुळे ☆
अमेरिका – इस्राईल – इराण यांच्यामध्ये सुरु झालेल्या आणि जगभर खळबळ आणि अशांतता माजविणाऱ्या तीव्र संघर्षाचे खेदजनक आणि वेदनादायक पडसाद जगभर वेगवेगळ्या प्रकारे उमटले .. उमटत आहेत.. उमटत राहणार आहेत. या युद्धातला सर्वात जास्त उद्विग्न करणारा हाहा:कार म्हणजे दि. २८ फेब्रुवारी २०२६ रोजी नराधमांकडून केली गेलेली अत्यंत हीन कारवाई ….. दक्षिण इराणमधल्या ‘मिनाब’ मध्ये मुलींच्या प्राथमिक शाळेवर केला गेलेला मिसाईल हल्ला. या हल्ल्यात शंभराहूनही जास्त व्यक्ती मारल्या गेल्या …. ज्यात बहुतांश व्यक्ती म्हणजे या शाळेतल्या लहान लहान मुली होत्या .. ‘ व्यक्ती’ म्हणून अजून पुरेशा उमललेल्याही नाहीत अशा मुग्ध कळ्या ..
…. ज्यांची मने दगडाचीच आहेत त्या निर्घृणांना या घटनेमुळे दु:खच काय .. साधा खेदही वाटला नसेल. पण अतिशय संवेदनशील मन असणारे हिंदी कवी श्री. हेमंत बावनकर यांच्या मनात या प्रसंगामुळे माजलेली खळबळ आणि उद्विग्नता मात्र शब्दरूप घेऊन व्यक्त झाली आणि ‘क्या फर्क पड़ता है?’ या अगदी चपखल शीर्षकाची त्यांची मुक्तछंदातली कविता कागदावर उतरली. त्यांनी अनुभवलेला सृजनाचा हा अतिशय हळवा क्षण या कवितेतून थेट हृदयाला भिडला आणि या काव्याचा स्वैर अनुवाद केल्यावाचून रहावलेच नाही …..
☆ काय फरक पडतो ? ☆ स्वैर अनुवाद – मंजुषा सुनीत मुळे ☆
अजिबात आवाज नको हं ..
शांतता .. एकदम शांतता ..
इथे गाढ झोपल्यात लहान लहान मुली .. शंभराहून जास्त ..
हो खरंच .. शंभराहून जास्त
शिकायला चाललेल्या ..
चालल्या तर होत्या .. पण परत येऊ शकल्याच नाहीत ..
झोपवून टाकलं गेलं त्यांना .. त्या लहान लहान कबरींमध्ये ..
एका भयानक दफनभूमीमध्ये ..
– – पण .. पण यामुळे जगातल्या बाकीच्या तशाच लहान लहान मुलींना ..
त्यांच्या नातेवाईकांना .. आणि .. आणि ..
माणूस म्हणण्याच्या लायकीच्याच नसलेल्या माणसांना ..
काय फरक पडतो ???
..
त्या निष्पाप लहान मुलींना तर हेही माहिती नव्हतं की ..
देश म्हणजे नक्की काय असतं ?
देशाची सीमा काय असते ? ..
धर्म .. पंथ म्हणजे तरी काय ?
वंश म्हणजे नेमकं काय असतं ? .. यातलं काही काही माहिती नव्हतं ..
मित्र देश आणि शत्रू देश म्हणजे नेमके कोण ?
.. आणि ते कसं ठरवतात
.. हे कुठे ठाऊक होतं ?
.. .. त्यांना तर एवढंच समजत होतं की ..
सूर्य एकच असतो ..
चंद्रही एकच असतो ..
आणि ही जमीन सगळ्यांचीच असते.
त्यांचं सगळं विश्व घरापासून सुरू होतं आणि शाळेपर्यंत संपतं सुद्धा..
खायचं-प्यायचं, अभ्यास करायचा आणि आई-वडलांच्या कुशीत स्वतःला विसरून जायचं .. बस् .. ..
– – पण ज्याने कुणी त्यांच्या शाळेला लक्ष्य करून मिसाईल टाकलं ..
.. .. त्यांना या निरागस वास्तवामुळे काय फरक पडतो ???
आपल्याला तर आता सवयच झालीये ..
टि.व्ही. वर लढाया बघायची ..
व्हिडिओ गेम्स बघतो तितक्याच सहजपणे बघायची …
विनाशाच्या या खेळात आता आम्हाला दिसतच नाहीत ..
.. .. पार विध्वंस होत असलेल्या शाळा आणि रुग्णालयं ..
.. शहरं .. तिथल्या दिमाखदार इमारती ..
.. विध्वंस झालेल्या शहरांखाली दडलेली
.. गुदमरणारी शांत- स्वस्थ आयुष्यं …
.. उध्वस्त झालेल्या सुंदर बागा .. .. आता ..
.. आता लहान मुलं , स्त्री-पुरुष ,वृद्ध माणसं
.. सगळेच कसं का जगेनात नाहीतर मरेनात …
.. .. कुणाला काय फरक पडतो ???
शिकण्यासारखं तर खूप काही होतं आपल्याला …
पण काय शिकलो आपण …
– – शासक निरंकुश सत्ताधारी झाले त्यापासून ?
– – नागासाकीत अणुबॉम्बचा विस्फोट केला गेला त्यापासून ?
– – छळछावण्यांकडून ? गॅस चेम्बर्सकडून ? थेट मृत्यूच्या जबड्यात टाकणाऱ्या त्या विनाशक गॅसकडून ?
– – आतंकवादाच्या भयानक सावटाकडून ..
– – जहाल विषारी असणाऱ्या धर्मान्धतेकडून ..
– – सततची युद्ध आणि प्रचंड नरसंहाराकडून … ???
.. .. .. आणि आता हताश झालेल्या त्या शांती आणि सुरक्षिततेच्या भावनेचीच जरी हिंसा झाली
.. शान्तिदूत जन्माला येण्याची शक्यताच जरी मावळली .. तरी ..