हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ३ – !!प्रगति!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!प्रगति!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ३ ☆

☆ !!प्रगति!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

लक्ष्य करें निर्धारित पहले, नींद त्याग कर जब जागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

०

शुभ विचार धारण करके मन, क्षमता का विस्तार करे।

लड़ना है मुश्किल से डटकर, साहस अपने हृदय भरे।।

कदम -कदम जो आज चलेगा, वही दौड़ के कल भागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

०

निशा भले काली हो कितनी, सूर्योदय से मिट जाती।

पार करे जब चट्टानों को, नदी तभी सागर पाती।।

करें सामना बाधाओं का, सुप्त भाग्य फिर उठ जागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

०

भिन्न-भिन्न पहलू जीवन के,  प्रतिपल आते जाते हैं।

जाना है किस ओर हमें ये, हरपल ही भरमाते हैं।।

उलझाते रहते हैं हरदम, रेशम बंधन के धागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०४ ☆ गीत – ।। जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०४ ☆

☆ गीत ।। जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जो मिला के चलता समय से कदम वो जीत जाता है।

कैसे भी हालात   हों वक्त  बस  चलता ही   जाता है।।

**

जो करता समय काआदर वही समय सेआदर पाता है।

जो भूला देता वक्त को वह फिर अनादर ही लाता है।।

एक बात जान लो गया   समय नहीं वापिस आता है।

जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।।

**

परिश्रमऔर समय का तालमेल ही सफलता की कुंजी है।

आदमी का  जोशो – जनून ही उसकी असली पूंजी है।।

जिसने समझा समय के महत्व को वही मंजिल पाता है।

जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।।

**

आदमी नहीं समय बहुत अधिक बलवान होता है।

धैर्य बहुत जरूरी समय से ही सब समाधान होता है।।

जिसने छोड़ा समय का दामन जीतकर भी हार जाता है।

जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३१ – कविता – मस्ताने… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मस्ताने…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३१ ?

? कविता – मस्ताने… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

लेकर के छुट्टी घर में वो सुस्ताने चले हैं

अंगड़ाई लेके देखिये मस्ताने चले हैं

=2=

कोई सबूत हाथ न लग जाए इसलिए

पहन वो दोनों हाथ में दस्ताने चले हैं

=3=

अदालतों में पैसे देके धुलते पाप हैं

फ़िर क्यों वे गंगाघाट पे नहाने चले हैं

=4=

फ़रमाया बेवड़े ने इक, सफ़ाई में अपनी

ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम उफ़ मयखाने चले हैं

=5=

हालात अपने घर के जो सम्हाल न सके

दुनिया को ‘राजेश’ वो समझाने चले हैं

☆ 

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (४) ? ?

जो मैंने कहा नहीं

जो मैंने लिखा नहीं

उसकी समीक्षाएँ

पढ़कर तुष्ट हूँ

अपनी चुप्पी की

बहुमुखी क्षमता पर

मंत्रमुग्ध हूँ…!

?

© संजय भारद्वाज  

1.9.18 रात्रि11:37 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९४ – नवगीत – मन की सरिता… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मन की सरिता…।

? रचना संसार # ९४ – गीत – मन की सरिता…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

काली छाया देख तिमिर की,

तन जलता ही चला गया।

मन की सरिता को पीड़ा का

जल खलता ही चला गया।।

*

व्यथित  रहा है जीवन सारा ,

थी उधार की तो साँसें।

शूल हृदय में चुभे हुए थे,

चुभी गले में थीं फाँसें।।

उलझन में था जीवन मेरा,

भ्रम पलता ही चला गया।

*

विरह व्यथा से व्याकुल अंतस ,

बरखा बरसे आँखों से।

निष्ठुर काल हमेशा कुचला,

झरती कलियाँ शाखों से।।

जर्जर तन अरु आहत मन था,

अरि छलता ही चला गया।

*

 रहा अनसुना क्रन्दन मेरा,

 तम का घेरा गहरा है।

 साँस- साँस पर विपदाओं का,

 लगा रात दिन पहरा है।।

 लिए हौसलों  की पतवारें,

 मैं चलता ही चला गयाl

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२२ ☆ भावना के दोहे – सूरज ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – सूरज।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – सूरज ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

सूरज का पारा चढ़े, दिन भर रहती धूप।

ताप लिए विकराल वो, बदला उसने रूप।।

 *

गर्मी के आतंक का, बढ़ा बड़ा ही जोर।

पशु पक्षी को खटकती, नहीं नाचते मोर।।

 *

सूरज कबसे जल रहा, निकले भारी आग।

सुर गर्मी के गा रहा, ये तो उसका  भाग।।

 *

करना तुम कम तेज तो, रहे जोड़ते हाथ।

विनती सूरज आपसे, बना रहे यह साथ।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०४ ☆ जनगणना पर एक कविता – घर-घर दस्तक देती टोली… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – घर-घर दस्तक देती टोली… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०४ ☆

☆ कविता – घर-घर दस्तक देती टोली… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

(जनगणना पर एक कविता)

☆

घर-घर  दस्तक   देती  टोली |

लेकर  प्रश्नों  की  इक  झोली ||

नाम  पता  और  उम्र  पूछती |

वह  पूछती   आपकी   बोली ||

*

कितने   बच्चे   कितनी   बेटी |

क्या   पढ़ते   क्या  रोजी रोटी ||

धर्म  कौन  सा  भाषा  क्या  है |

कितनी   दूर   केंद्र  मत – पेटी ||

कब  से   रहते  इसी  पते  पर |

कब   की बनी   तुम्हारी  खोली  ||

घर-घर    दस्तक   देती   टोली |

*

एक  दशक   में   ये   है   होती |

पर   विश्वास   कभी  ना  खोती ||

भारत    की   तस्वीर   दिखाती |

जब  भी  यह  जनगणना  होती ||

गणना   से   ही    बनें   नीतियाँ |

चले    न    झूठमूठ     बड़बोली  ||

घर-घर     दस्तक   देती   टोली |

*

इसे  महज  गणना  मत  समझो |

प्रगणक को छलना मत समझो ||

इससे  चले   देश   की  धड़कन |

आफत  से  लड़ना मत समझो ||

दें  विवरण  सब  जनगणना  में |

जनता  भी  अब  बने  न भोली ||

घर-घर     दस्तक   देती   टोली |

*

कश्मीर       से      कन्याकुमारी |

एक    सूत्र    में   गणना    सारी ||

शालाएं,    अस्पताल    कितनी |

ताल  कुंए  नल   बिजली  भारी ||

गणना    के    रंगों   से   सजती |

भारत    माँ   की    नई   रँगोली ||

घर-घर     दस्तक   देती   टोली |

*

अलग – अलग   भाषा  भाषी  हैं |

फिर   भी   सब  भारत  वासी  हैं ||

बने   महान   देश  हम  सब  का  |

जिसके  सब  अब अभिलाषी  हैं ||

अब “संतोष”  प्रगति के  पथ पर |

जनता  खुद ही  शामिल  हो  ली ||

घर-घर     दस्तक    देती   टोली |

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १० ☆ कविता – मंजिरी  की कुंडलिया – भोजन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी मंजिरी  की कुंडलिया – भोजन ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १० ☆

? मंजिरी  की कुंडलिया – भोजन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ??

?

=१=

साधा भोजन ज्यो करे, बने सरल आहार l

खाना खाओ वक़्त पर, भोजन शाकाहार ll

भोजन शाकाहार, बने ऊर्जा का धारक l

अन्न कोष की जान, उदर अनशन सन्हारक ll

कहे मंजिरी आज, सभी करते हैं योजन l

उत्तम जीवन सार, करो ज्यों साधा भोजन ll

=२=

हलधर बोते धान को, करते जग उद्धार l

माटी को वे पूजते, मिलती ख़ुशी अपार ll

मिलती ख़ुशी अपार, काम से लौटे हारे l

भोजन करने बैठ, सभी मिलजुल कर सारे ll

कहे मंजिरी आज, नहीं रुकते ये क्षणभर l

भोजन सबका प्राण, धान ये बोते हलधर ll

=3=

लें पोषित आहार सब, रखता रोगी दूर l

मानव जीवन सार है, करे कुपोषण चूर ll

करे कुपोषण  चूर, द्वार पर खुशियाँ आती l

भोजन पोष्टिक साथ, सही सेहत बन जाती ll

कहे मंजिरी आज, करो ना जन को शोषित l

रखो स्वास्थ्य का ख्याल, सदा भोजन लें पोषित ll

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २३ – कविता – तेरा साथ… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘तेरा साथ…‘।)

☆ शशि साहित्य # २३ ☆

? कविता – तेरा साथ…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

अद्भुत सुकून है, हे सृजन नाथ,

जब से थामा, पावन तेरा हाथ..

इस मिथ्या जग में,

ना कभी छोड़ना मेरा साथ..

नयन मूंद मैं चलूं,

मन में रख विश्वास,

कंटक हो या कली बिछे,

पार करूं यह पाथ..

अंतस पावन प्रीत लिए,

मगन रहूं दिन रात..

अनवरत रक्षित हो गई,

कोई करे आघात..

ठाना उत्कृष्ट लक्ष्य को,

सौंप दिया सब भार..

सुख दुख स्वीकार करूं,

समक्ष झुका के माथ..

दुर्लभ जीवन यह मिला,

मंगल सृजन, हो प्रयास..

सिद्ध हो मनोरथ सारे,

थाम कर तेरा हाथ..

हे प्रियवर, हे दीनानाथ,

ना छोड़ना मेरा साथ…..

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक । प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय  “पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ”।

☆ पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ☆  श्री जयपाल ☆

☆

=1=

पृथ्वी

यह पृथ्वी

किसी शेषनाग के सिर पर नहीं

नंदी बैल के सींगों पर भी नहीं

स्त्री के हाथों पर टिकी हुई है

=2=

पृथ्वी और स्त्री

पृथ्वी

जब तक स्त्री के हाथों में रहेगी

सुरक्षित रहेगी

पुरुष के हाथ तो खून से रंगे हैं

=3=

विस्थापित बहनें

बहने विस्थापित कर दी गई

कहा गया उनकी शादी हो गई है

विस्थापन का दर्द दिल में दबाये

उन्होंने बसाए घर-परिवार

गांव-नगर-बस्तियां

ताकि विस्थापित न रहे कोई दुनिया में

 

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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