हिन्दी साहित्य – कविता ☆ श्री राम ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  श्री राम ।)

? कविता – श्री राम ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(हाकली छंद)

?

राम नाम का जाप करो

जग का ये संताप हरो l

सुबह करो या शाम करो

सदा राम का नाम धरो ll

*

राम नाम शब्द अधारा

जीव सृष्टि की यह धारा l

जो राम नाम अपना ले

जीवन का सब सुख पा ले ll

*

जीवन में उल्लास भरो

अधरों पर मधुहास भरो l

नेहा रस छलके जीवन

आनंदित हो सबका मन ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १७ – कविता – नया प्रयास… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता गोपी संग रास रंग।)

☆ शशि साहित्य # १७ ☆

? कविता – नया प्रयास…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

क्यूं उच्छवास में उदासी है ?,

मलाल है, कि पच्चीस भी निकल गया..

समय ही तो वह चक्र है,

जिसका हर पल बदल गया..

 

बीते कल पर डालो नजर,

कितने खजाने झोली में भर गया..

नए से रिश्ते, नयी दोस्तियां,

नई पहचान, नए सपने और,

नए अनुभव दे, परिपक्व कर गया..

 

कदमों तले तुम्हारे, ठोस आधार बन,

उन्नति के नए सोपान रच गया..

बिखेरे थे, जो धरती के गोद में,

उन बीजों का उत्सर्जन हो गया..

 

जितना बन सके, भला करते चलो,

धर्म से सुगम मार्ग, प्रशस्त हो गया..

बंदिशों की बेड़ी डालो, दुर्गुणों पर..

कह सको..  छब्बीस नई उपलब्धियां दे गया..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९१ ☆ बाल कविता – यज्ञ-हवन से शुद्धि होती… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९१ ☆ 

☆ बाल कविता – यज्ञ-हवन से शुद्धि होती☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

यज्ञ-हवन से शुद्धि होती,

आओ मिलकर यज्ञ करें।

दूषित वायु शुद्ध हो जाती,

अंतस में नव प्राण भरें।

 *

चारों वेद यही हैं कहते,

ईश्वर की यह वाणी है।

ऋषियों ने लिपिबद्ध कर दिए,

ईश्वर के हम प्राणी हैं।

 *

स्वाध्याय करें सदग्रंथों का,

निज संस्कृति का मान करें।

 *

पाठ्य पुस्तकें पढ़कर के,

शिक्षित हम हो जाते हैं।

पर सदग्रंथ पढ़े  जो भी ,

जीवन सफल बनाते हैं।

 *

नई उमंगें मन में आएं,

नव नूतन हम ज्ञान भरें।

 *

दयानंद ऋषि ने  हमको,

वेदों का ज्ञान कराया है।

यज्ञ,हवन के मंत्र बताए,

भारत का मान बढ़ाया है।

 *

ईश्वर ने ही सृष्टि बनाई,

ईश्वर का गुणगान करें।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ रामनवमी विशेष – माँ दुर्गा के दोहे ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ रामनवमी विशेष – माँ दुर्गा के दोहे ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

नवदुर्गा  तुम आ गईं, हरने को हर पाप।

संभव सब कुछ आपको, तेरा अतुलित ताप।।

*

सद्चिंतन तजकर हुआ, मानव गरिमाहीन।

जगजननी माँ दुख हरो, सचमुच मानव दीन।।

*

ममता है तुझ में भरी, तू सचमुच अभिराम।

माता जी तेरे सदा, हैं नित नव आयाम।।

*

तू करुणा करती सदा, तेरा पावन नाम।

यह जग तेरा है सदा, दुर्गा पावन धाम।।

*

 माँ तेरी आराधना, करे सदा कल्याण।

नौ रूपों में तुम रहो, पापी खाते बाण।।

*

करते हैं सब साधना, हम सब तेरे लाल।

दर्शन दो, हमको करो, हे माँ !आज निहाल।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३९ ☆ बज रहे हम ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बज रहे हम” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३९ ☆ बज रहे हम ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

बाँसुरी के छेद

या साँसों का क्रम

बज रहे हैं हम।

 

एक टुकड़ा धूप

बस लाँघती देहरी

पेड़ से उतरी

डरती छाँव सी गहरी

रात वाले भेद

ले सपनों के भ्रम

जी रहे हैं हम।

 

दर्द के आधीन

तन और मन रहे हैं

एक करुणासिक्त

सब आराधन रहे हैं

समय के संकेत

नियति के हर नियम

भज रहे हैं हम।

 

आ लिखित से मौन

स्वाहा यज्ञ समिधाएँ

मूक से सब मंत्र

हुईं आहत ऋचाएँ

हो रहे आखेट

मरता नित्य ही श्रम

चुप रहे हैं हम।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४४ ☆ एक मुफ़लिस रात भर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “एक मुफ़लिस रात भर “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४४ ☆

✍ एक मुफ़लिस रात भर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

दिल में जिसके प्यार का सागर लिए फिरता रहा

मुझको नफ़रत का वही खंज़र लिए फिरता रहा

 *

शहर में मँहगे है होटल कब्जे है फुटपाथ पर

एक मुफ़लिस रात भर चादर लिए फिरता रहा

 *

पूछ मत मुझसे गुज़ारा हिज़्र मैंने किस तरह

वस्ल का आँखों में बस मंजर लिए फिरता रहा

 *

बेचकर ईमान मैंने की नहीं जब नौकरी

उम्र भर सन्दूक और बिस्तर लिए फिरता रहा

 *

उसको कोई भी कभी मंज़िल न हासिल हो सकी

ज़िंदगी भर हार का जो डर लिए फिरता रहा

 *

उम्र से पहले बुढापा आ गया उस शख़्स को

दिल पे जो भी फ़िक़्र का पत्थर लिए फिरता रहा

 *

मुझको आश्रम में अरुण वो भेजने को आ गए

मैं जिन्हें बचपन में शानों पर लिए फिरता रहा

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विरोधाभास ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विरोधाभास ? ?

तूफान-सी दौड़ती रेल आई

सरपट भागती पटरियों के पास

बसी झुग्गियाँ नजर आईं,

मेरी अनजान नजर से

झोपड़ी में जीवन थम-सा गया

ओट लेकर स्नान करती

षोढशी का रक्त जम-सा गया,

क्षण भर के लिए

मेरी दृष्टि उससे जा टकराई

वह सकुचाई

मुझे वितृष्ण हँसी आई,

आँखो में फ्रीज इस दृश्य के समांतर

उभरा दूसरा दृश्य

साबुन, शैम्पू के विज्ञापनों में

विवादास्पद होकर

नाम कमाने की

बाजारू दौड़ का

निर्वस्त्र होने की

कमर्शिअल होड़ का,

ये असहाय सलज्ज नैन

वे समर्थ निर्लज्ज नैन

मेरा देश, मानो विरोधाभास

का सजीव उदाहरण बन गया है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ४९ – जाना था चला जाता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – जाना था चला जाता ।)

☆ हेमंत साहित्य # ४९ ☆

✍ जाना था चला जाता… ☆ श्री हेमंत तारे  

क्यूं बताऊं के, खुश हूं कम में गुजारा करके

इल्तिजा है न पूछा कर, सबब खुदारा करके

मैं तो सीख ही न पाया, बेवफ़ाई के निजाम

आया हूं लौट के, मुहब्बत में खसारा करके

*

वो, यूं चलते – फिरते न बना था अहबाब मेरा

बनाया था उसे अपना, “जान” पुकारा करके

*

जब से वो मेरा जान ऐ जिगर, हमराज बना

निभाई है आशनाई मैंने, जफाऐ गंवारा करके

*

उसके चले जाने से, मेरा कुछ भी तो न बिगडा

जाना था चला जाता पर मुझसे मशविरा करके

*

गरज ये है “हेमंत” कि बेदारी से जिया जाये

यहां गुम हो जाते हैं शातिर जर्रे को शरारा करके

इल्तिजा = अनुनय-विनय, सबब =कारण, खुदारा = भगवान के लिये, निजाम = नियम, खसारा = नुकसान, अहबाब = मित्र, आशनाई = मित्रता, मशविरा = सलाह, बेदारी= जागरूकता,

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५८ ☆ कविता – मेरे घर के सामने… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मेरे घर के सामने“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५८ ☆

✍ कविता – मेरे घर के सामने… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे घर के सामने

अशोक का पेड़ है

वसंत की बहार है

कोमल पत्तों की

बौछार है

बड़े कोमल और

सुनहरे पत्ते हैं

छोटी छोटी चिडियों ने

घोंसले बना लिए हैं

चीं चीं की आवाज

आती रहती है

अशोक की डालियाँ

नीचे झुक गई हैं

लालामी लिए

हरे हरे पत्तों ने

मेरे घर का दरवाजा

ढंक दिया है

मैं डालियों को

छाँटना चाहता हूँ

हँसिया लेकर

जब भी पास जाता हूँ

डालियाँ छाँटने

कोमल पत्ते

मुस्कुरा उठते हैं

और मेरे चेहरे पर भी

मुस्कान आ जाती है

हँसिया लिए घर में

चला आता हूँ

डाली पत्ते काटने की

हिम्मत नहीं होती।

 

पता नहीं लोग

पेड़ कैसे काट

देते हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४२ – बुन्देली कविता – ”नागन सी भन्नाउत जा रइ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – नागन सी भन्नाउत जा रइ।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४२ – बुन्देली कविता – नागन सी भन्नाउत जा रइ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

नागन सी भन्नाउत जा रइ

मैं ओ खें समझाउत जा रइ

*

साँप मरै, ने लठिया टूटे

एई सें बरकाउत जा रइ

*

बो तौ दैरी खूँदे खा रव

रोज-रोज टरकाउत जा रइ

*

साँप-छछूदर सी गत हो गइ

अपनी खैर मनाउत जा रइ

*

बा इतनी फरफन्दहाउ है

दो की चार लगाउत जा रइ

*

चली बिलइया हज करबे खें

सौ-सौ चुखरा खाउत जा रइ

*

‘भगवत’ हो रव आग बबूला

ओ खें गम्म खुबाउत जा रइ

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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