हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मानदंड ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मानदंड ? ?

सफेद कैनवास पर

बिखर जाते हैं रंग

कैनवास रंगमिति से

उर्वरा हो जाता है

सृजन की बधाई देने

समूह पहुँचता है…..

सफेद साड़ी पर

भूल से छितर जाती है

रंग की एकाध बूँद,

आँचल तनिक फहराता है

हाहाकार मच जाता है,

घुटते रहने की हिदायतें देने

समूह पहुँचता है…..

कलमकार स्वप्न देखता है-

काश! फ्रेम पर

तान देता सफेद साड़ी

और औरत को

ओढ़ा पाता कैनवास!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५८ ☆ # “दूरियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “दूरियां…”`।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५८ ☆

☆ # “दूरियां…” # ☆

दिलों में अब कितनी दूरियां आ गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

कोई जीने के लिए संघर्ष कर रहा है

रोज जी रहा है मर रहा है

मजबूरी में कठिनाइयां

उसको भा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

रिश्ते तो अब तार-तार हो गए हैं

सबके अलग घर बार हो गए हैं

यह नई नीतियां है

जो रिश्तों को खा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

यहीं से विरोध में निकलती थी रेलियां

बुलंद आवाज में होती थी बोलियां

अब सब चुप है

जैसे वह सब कुछ पा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

यहां कुछ बोले तो क्या बोलें ?

सब खामोश है किससे बोलें ?

सवाल करना गुनाह है

हर वह आवाज कैद पा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

नदी नाले नहीं मिलते हैं समंदर में

कोई तूफान नहीं है उनके अंदर में

ज्वार -भाटे भी अब कहां उठते हैं

लहरों में शांति छा गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

 

“श्याम” यह जिंदगी का आखिरी पहर है

जहां रहते हैं वह मुर्दों का शहर है

मसान की उड़ती हुई राख

कहर ढा़ गई है

जिंदगी में हर पल कशमकश छा गई है

दिलों में दूरियां अब कितनी आ गई है

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०१ – तुम्हारे एहसास ने… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता तुम्हारे एहसास ने।)

☆ अभिव्यक्ति # १०१ ☆ तुम्हारे एहसास ने☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तुम्हारे एहसास ने स्पर्श किया है मुझको,

मुझे सहलाया, फिर रुलाया है मुझको,

तेरे आंचल की छांव, में महफूज था मैं,

अब गर्म थपेड़ों ने झुलसाया है मुझको,

मां का आंचल इतना विस्तृत, कमाल है,

मां का आंचल बरगद पीपल, विशाल है,

हर नजर से, तेरी नजर बचाती है मुझको,

तुम्हारे एहसास, ने स्पर्श किया है मुझको,

 *

हर बार भूलती है, गिनती नहीं आती तुझको,

दो गिनती है, पर चार रोटी देती है मुझको

तेरी ममता की छांव ने ही पाला है मुझको,

तुम्हारे एहसास ने स्पर्श किया है मुझको.

 *

मां की ममता नदिया जैसी सदा प्रवाहित रहती है,

मां की यादें, मेरे अंतः, सदा समाहित रहती हैं,

यादों ने, सुख का झूला सदा झुलाया है मुझको,

तुम्हारे एहसास ने स्पर्श किया है मुझको

 

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ झुके, ना हारे हैं हम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – झुके, ना हारे हैं हम…!

☆ ॥ कविता॥ झुके, ना हारे हैं हम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

समय सरिता के बहते हुए धारे हैं हम,

हालातों के आगे झुके,ना हारे हैं हम।

जीवन- पथ में अनगिन बाधाएँ आईं,

उर्मियाँ  आकर हौसलों से हैं टकराईं।

पर हार न मानी जीवन की ये कहानी,

इसीलिए, जग  में सबसे न्यारे हैं हम।

जो  कहा है मन से उसे पूरा किया है,

ना किसी से लिया, दिया ही दिया है।

दिनकर बनकर जग को रौशन करते,

मात- पिता की आँखों के तारे हैं हम।

दीन-दुखियों की सेवा, धर्म हमारा है,

अपने प्राणों  से  देश हमको प्यारा है।

शरणागत  को  सदा ह्रदय से लगाया,

विश्वास  के हाथों सर्वस्व हारे हैं हम।

जो हमने चाहा है,हमको वो मिला है,

इंदीवर-सा मन मेरा खिला-खिला है।

प्रीत के ग्राहक शाँति के संदेशवाहक,

जन  में अलख जगाते हरकारे हैं हम।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मराठी कविता  – जन्म… – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ ☆

श्री भगवान वैद्य प्रखर

☆ मराठी कविता  – जन्म… – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

उज्ज्वला केळकर

अंतिम घड़ी निकट है  

प्राणांतक वेदना से

फट गया है मस्तिष्क

भाग्य-रेखा

भूल चुकी है मार्ग अपना

घड़ी की टिक-टिक

जारी है

सांसों की सरगम सम्भालते हुए

ईथर के असर से बाधित है देह की नस-नस

आंखों के सामने छा रहे हैं काले पड़ते

लाल, हरे, पीले, नीले वृत्त

बढ़ते धुंधलके में हो रही

श्वेत-चकत्तों की लयबद्ध हलचलें

पैने रक्तपिपासू-हथियारों की

लंबाती जा रही है अशुभ परछाई

संज्ञा शून्य होते-होते

सब कुछ छूटता जाता है

खून में उमड़ रहीं

गुलबकावली के हास्य की लहरों से

मन भर जाता है

रोम-रोम सराबोर हो जाता है।

 

 मूल लेखिका – -उज्ज्वला  केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

भावानुवाद  श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

30, गुरुछाया कालोनी, साईंनगर, अमरावती  444607

संपर्क : मो. 9422856767, 8971063051  * E-mailvaidyabhagwan23@gmail.com *  web-sitehttp://sites.google.com/view/bhagwan-vaidya

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७३ – सॉनेट – जल दिवस ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सॉनेट – जल दिवस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७३ ☆

☆ सॉनेट – जल दिवस ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

पानी कर बर्बाद मिले हम

पानी दिवस मनाएँगे।

खुद ही घर में आग लगा हम

रघुपति राघव गाएँगे।।

जंगल काट, पहाड़ खोदकर

कदम न अपने रोकेंगे।

पोखर पाटे, नदी सुखाकर

हम किस्मत को रोएँगे।।

कर विनाश हम कह विकास खुद

अपने दुश्मन सच मानो।

रहम न खाते हम पर अब बुत

कहते सुधरो इंसानो!

जल ही जीवन है स्वीकारो

पैर न आदम अधिक पसारो।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२३.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८७ – गीत – राम अवतार… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतराम अवतार

? रचना संसार # ८७ ☆

☆  गीत – राम अवतारसुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

 

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।

कौशल्या बलिहार हैं, होती जयजयकार।।

*

मंगल गाते देवता, नभ बरसाते फूल।

सुर नर मुनि व्याकुल बड़े, मिले चरण की धूल।।

छवि मनहर शिशुराम की, दशरथ देख निहाल।

नमन करें जन-जन उन्हें, अवध पुरी के लाल।।

ढ़ोल नगाड़े बज रहे, सजते तोरण द्वार।

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।।

*

भक्तों को हैं तारते, रखते हृदय विशाल।

दानव को हैं मारते, दुष्टों के हैं काल।।

जगतारक प्रभु राम हैं, जपिए प्रभु अभिराम।

जनक लली के नाथ हैं, दशरथ नंदन राम।।

जग के पालनहार हैं, महिमा अपरम्पार।

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।।

*

नार अहिल्या तारते, धर्म परायण राम।

दीनदयाल कृपाल हैं, भक्ति करो निष्काम।।

राम नाम का जप करो, भक्तों आठों याम।

अवध नाथ रघुनाथ को, शत -शत करूँ प्रणाम।।

भक्तों की रक्षा करें, दुष्टों का संहार।

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हरापन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – हरापन ? ?

शादी-ब्याह में

हरी साड़ी

हरी चूड़ियाँ

यहाँ तक कि

अंतिम प्रयाण में भी

हरे वस्त्र,

महत्वपूर्ण है

स्त्री का हरा होना

हरा रहना..,

 

हरी घास

हरी पत्तियाँ

हरे पेड़

हरी काई

प्रकृति की

अक्षत सौंध है

हरा होना..,

 

पेड़-पत्तियाँ

निर्दय संहार के

शिकार हैं

पानी के अभाव में

काई पर

भ्रूण हत्या की मार है..,

 

मखमली घास पर

बलात लाद दी गई हैं

हजारों टन की इमारतें..,

 

चैनल बता रहे हैं

तलाक में

साढ़े तीन सौ

प्रतिशत की वृद्धि

लिव-इन

सिंगल पेरेंट

बलात्कार

विकृत यौन अत्याचार

और भी बहुत कुछ वीभत्स..,

 

दम जैसे

घुट-सा रहा है

हरापन हमसे

छूट-सा रहा है।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आपदां अपहर्तारं साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।  🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१५ ☆ भावना के दोहे – श्रीराम  ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – श्रीराम )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – श्रीराम  ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

जनम लिया है अवध में, रूप सलोने राम।

आनंदित होते सभी, सरस अयोध्या धाम।।

 *

हम तो करते आपको, शत – शत करें प्रणाम।

आए हो इस धरा पर, सबके प्रभु श्री राम।।

 *

 नहीं जाति का भेद है, खाए  शबरी बेर।

राह राम की देखती, हुई नहीं है देर।।

 *

चैत्र मास नवमी हुई, महिमा प्रभु का नाम।।

हृदय सभी के बस रहे, सीता के प्रभु राम।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९७ ☆ गीत – आज नहीं तो कल होगा… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – आज नहीं तो कल होगा  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९७ ☆

गीत – आज नहीं तो कल होगा☆ श्री संतोष नेमा ☆

आज नहीं तो कल होगा |

हर मुश्किल का हल होगा ||

लें धीरज से काम सदा |

अपना अगला पल होगा ||

आज नहीं तो कल होगा |

*

दुविधा में तुम मत रहना |

बात साफ अपनी कहना ||

रखें चरित्र सदा ऊँचा |

यह जीवन का है गहना ||

तब यह जन्म सफल होगा |

आज नहीं तो कल होगा |

*

होगी जितनी गहराई |

तभी दिखेगी सच्चाई ||

सच के मोती निकलेंगे |

हाथ लगेगी अच्छाई ||

निर्मल अन्तस्तल  होगा |

आज नहीं तो कल होगा ||

*

दृढ़ता से आगे बढ़ना

साहस का संबल रखना ||

मंजिल होगी मुट्ठी में |

तुम पुरुषार्थ सदा करना ||

निर्बल हृदय सबल होगा |

आज नहीं तो कल होगा ||

*

चिंतन की धारा गंगा।

तन-मन स्वस्थ भला चंगा।

होगा तब संतोष तुम्हें |

जीवन होगा सतरंगा।

कर्म नहीं निष्फल होगा |

आज नहीं तो कल होगा ||

हर मुश्किल का हल होगा |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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