हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५२ – बुन्देली कविता – ”कविता बचपन, ज्वानी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – कविता बचपन, ज्वानी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५२ ☆

☆  बुन्देली कविता – कविता बचपन, ज्वानी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

कविता बचपन, ज्वानी है

जाई कथा-कहानी है

*

लोक राग में गूँज रई

ई की कहन पुरानी है

 *

भौत पुरानी टिमकी रइ

जाने कितै हिरानी है

 *

हास लाइ की सुन्न भई

गई भैंस अब पानी – है

 *

कविता बच्चों की ठनगन

रूठन, आनाकानी है

 *

झोपड़ियों में नइँ फटकत

खुशी महल की रानी है

 *

भगवतखम्भा नोंच रई

बा बिल्ली खिसयानी है.

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२४ – खो गया वह समय ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “खो गया वह समय। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२४ ☆

☆  खो गया वह समय  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

चोट लगती रही, मुस्कराते रहे।

जिंदगी इस तरह, हम बिताते रहे।।

*

घर हमारा रहा, पर अतिथिगण बहुत।

देव कहकर अतिथि मन रिझाते रहे।।

*

दर्द  से  ही  बनें  मित्र रिश्ते सदा।

दूर से बस हमें सुख लुभाते रहे।।

*

घर अभावों का था पर्वत सा खड़ा।

प्रभु जी फिर भी कृपा बरसाते रहे।।

*

एक जुट रखना था बस परिवार को।

दीप-त्यौहार मिल-जुल मनाते रहे।।

*

नेह के उन पलों को न भूले कभी।

याद आकर हमें वे रुलाते रहे।।

*

खो गया वह समय क्यों दिखता नहीं।

प्रेम की गंग में सब नहाते रहे।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

12/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कलम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कलम ? ?

जब कोई रास्ता नहीं सूझता,

कलम उठा लेता हूँ,

अनगिनत रास्ते और

अनंत पगडंडियाँ खोलनेवाले

मोड़ पर खुद को पाता हूँ,

दिशा पाने के लिए

फिर कलम चलाता हूँ,

और रचना बनकर

पाठकों तक पहुँच जाता हूँ..!

?

© संजय भारद्वाज   

(रात्रि 10:01 बजे, 3 जून 2021)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मन, मानस और हम…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – मन, मानस और हम… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

उम्र के सत्तरवें दशक में कदम रखते हुए भी..

दिल और ज़हन

न वो बचपन की मासूमियत भूल पाता है..

न वो नटखटपन, न शरारतें,

न वो जवानी की रुमानियत।

 

जिस्म चुकता जाता है ..

स्मृतियाँ तरो ताज़ा होती जातीं हैं ।

 

माज़ी (अतीत) तकरीबन रोज़..

चौखट पर आकर, दरवज्जे पर,

दस्तक देता है।

 

चाहे कुछ लम्हों को सही..

वजूद लौट आता है

उस हाशिये पर

जहाँ स्वच्छंदता थी..

मन आवारा था, भावनाओं में।

 

न ज़िम्मेदारियां, न संघर्ष था जीवन..

बस अपनी सांसें, अपनी धड़कनें थीं।

कल्पनाओं की उस “टाईम मशीन” का शुक्रिया

जो हमें चाहे अनचाहे उस दौर ए वक़्त में ले जाती है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८८ – महा-प्रस्थान के क्षण – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  महा-प्रस्थान के क्षण – २।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८९ ☆

☆ – महा-प्रस्थान के क्षण – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

बूढ़े पिता सा

देखता आकाश

दृश्य यह कितना करुण है।

ज्वाल के सम्मुख लिए जल

और भी जन है,

जिनके टूटते मन हैं।

ठीक ऐसी ही दशा में…

भू, हवा, पर्वत, किरन, वन औ सुमन हैं।

त्यक्त वस्त्रों सी पड़ी

निस्पंद ये

परछाइयाँ,

मानो किसी का शापमय आदेश हो!

लग रहा-

जैसे कि खण्डित मूर्तियों का देश हो !

पाषाण जैसे प्राण भी तो

कर रहे हैं

आँसुओं में संतरण,

क्योंकि निष्प्रभ हो गई है

सभ्यता की व्याकरण।

आह! मेरे प्रश्न बालक, खो गये,

पगवाट में, वनवाट में,

और उनके उत्तरोंका ध्रुव

कि वह तो गया है

शान्ति वन के घाट में।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८६ – “ऐसे आर्तनाद के क्षण बस…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत ऐसे आर्तनाद के क्षण बस...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ऐसे आर्तनाद के क्षण बस...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जिसकी बेटी व्याह योग्य हो

हम वह बाप रहे

हालातों के कोपभवन का

कठिन विलाप रहे

 

नीचा सिर करके निकाल दी

जीवन की आशा

शायद कोई क्रुद्ध हो गया

गति का दुर्वासा

 

ऐसी विकट परिस्थितियों का

दारुण ताप रहे

 

कतरब्योत में लगे रहे

या फिर उधेड सींते

याद नही कर पाते यह दिन

कैसे क्पा बीते

 

बे मौसम की बारिश का

जैसे अनुताप रहे

 

सूत कातते रहे मगर

ना बुन पाये कपड़ा

जिन्हें बनाया अपना

अब उन से भी है झगडा

 

ऐसी भिन्न परिस्थितियों में

हम चुपचाप रहे

 

हारे थके व्यथा अपनी यह

हम कहते किससे

जिससे कहते उसके भी

अनगिनत मौन किस्से

 

ऐसे आर्तनाद के क्षण बस

आत्म प्रलाप रहे

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

04-07-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता बेटियां…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆

☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

हमारा एक मित्र सुबह मॉर्निंग वॉक में मिला

मिलते ही  करने लगा

आजकल नहीं मिलने का गिला

यार दिन भर क्या करते हो ?

क्या यहां पर नहीं रहते हो ?

 

मैंने कहा मित्र

मैं अपनी पत्नी के संग बच्चों के पास चला जाता हूं

कुछ दिन वहां रहता हूं

इसलिए रोज नहीं आता हूं

उसने पूछा,

बच्चे कहां पर रहते है?

मैंने कहा,

एक बेटा और तीन बेटियां हैं

सभी विवाहित है

वे देश के तीन कोने में है

और हम यहां इस कोने में है

 

उसने लंबी सांस भरी

और बोला,

एक बात करूं खरी खरी

तुम बहुत भाग्यशाली हो

जो बच्चों के साथ समय बिताते हो

खुशी खुशी रिटायरमेंट के दिन बिताते हो

 भाई,

हमारे साथ तो प्रश्न चिन्ह है

परिस्थितियों बहुत भिन्न है

एक ही बेटा और बेटी है

दोनों अपने परिवार में व्यस्त है

अपने परिवार संग मस्त है

हम जब भी बहु बेटे के पास जाते हैं

कुछ दिन मुश्किल से रह पाते हैं

हमारी पत्नी और बहू में

रोज होती जंग है

पारिवारिक शांति होती भंग है

वैसे ही वृद्धावस्था में बीमारियों की समस्याएं क्या कम है

बेटे का उदास चेहरा देखकर

लगता है कि अपराधी हम है

मन मारकर घर वापस आ जाते हैं

दोबारा नहीं जा पाते है

आप ही बताओ यार

कहां जाए ?

कहां मान सम्मान और प्यार पायें ?

क्या सब कुछ हमारे लिए छलावा है ?

रिश्तो में प्यार बस एक दिखावा है ?

 

मैंने कहा नहीं मित्र

तुम्हें प्यार, सम्मान, अपनापन

इज्जत, प्रतिष्ठा, आदर और मान

एक ही जगह मिल सकता है

तुम्हारे जीवन में खुशियों का फूल खिल सकता है

तुम्हें खुशी प्रसन्नता मन से सत्कार

दिल से तुम्हें प्रेम का व्यवहार

तुम्हें मनपसंद व्यंजन

मनपसंद सुकून भरी रातें

मन में ताजगी भर दें

ऐसी ममतामयी बातें

एक ही जगह मिल सकती है

जो तुम्हें अपना समझती है

वह है तुम्हारी बेटी

उसका परिवार

जो करती है तुमसे मन से प्यार

बाकी सब रिश्ते पानी के बुलबुले है

जो स्वार्थ में अपने तुमको जीवन भर छले है

 

आजकल बेटिंया

जीते जी  बेटे का फर्ज निभा रही है

और

मरने के बाद भी अंतिम संस्कार का भार

खुद के कंधे पर उठा रही है

 

मित्र वह लोग धन्य है

जिनकी बेटियां है

वह बुढ़ापे का सहारा ही नहीं

घी, शक्कर में लिपटी

रोटियां है

यह आज की

कटु सच्चाई है

जो स्वार्थी संसार ने

हमें दिखाई है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१८) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१८) ? ?

शब्दों का सृजक

भला कोई

कैसे कहला सकता है?

शब्द

उधार के होते हैं

आदमी

चुप्पी ही रचता है।

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:07 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ – !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!पिता!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ ☆

☆ !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

जिनकी क्षमताएंँ ऊंँची हो आकाश से,  मन में सपने सजाते तुम्हारे लिए ।

देखना चाहते खुद से उत्तम तुम्हें , करते हैं सब समर्पित तुम्हारे लिए ।‌‌।

शब्द भी श्रेष्ठ से सदा खोजती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

मन में गहराई रखकर वे पाताल सी,  दर्द दुनियाँ के तुमसे छुपाते सदा ।

असीमित प्रेम करते हैं संतान से, रौब बातों में अपनी दिखाते सदा ।।

रौब से झांँकता उनका डर टोहती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

उनका साया हिमालय सा दे हौसला,  वो कहें धैर्य खोना न चलते रहो ।

हर कदम पर खड़ा हूंँ मैं परछाई सा, पीछे देखो नहीं आगे बढ़ते रहो ।।

पिता तुल्य पाया न रिश्ता कोई, जग के रिश्तों को जब-जब भी मैं तोलती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३४ – कविता – सलामी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सलामी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३ ?

? कविता – सलामी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

चापलूसों द्वारा ये गुलामी देखिये

डूबते सूरज को उफ़ सलामी देखिये

=2=

जनता हलाकान है कोहराम हर तरफ़

चुनी हुई सरकार की नाकामी देखिये

=3=

अच्छे दिनों की बात उनके भाषणों में है

परिणाम इसका आप दूरगामी देखिए

=4=

कल के फटीचर जो आज कुर्सी पा गये

अब हुए करोड़ों के आसामी देखिये

=5=

हो गये हरामी सभी नामी गिरामी

आगामी साजिशों पे उनकी हामी देखिए

=6=

त्राहिमाम पानी पे मचा है देश में

पी रहा शरबत कोई बादामी देखिये

=7=

‘राजेश’ नुक्ताचीनी बेवज़ह की छोड़िये

खूबियाँ औरों में, ख़ुद में ख़ामी देखिए

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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