हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ जमीन से जुड़ा… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता जमीन से जुड़ा।

? कविता – जमीन से जुड़ा ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

☆

गगनचुंबी इमारतों के जंगल में

चालीसवीं  मंजिल की बालकनी में बैठी

नीचे सड़क पर चलते लोगों को देख

सोच रही हूं

क्या यह शहर बौनों का है

हर व्यक्ति दो-तीन बालिश्त का ही तो नजर आता है

 

कर्म निर्वाहन हेतु

जब सड़क पर उतरी

तो सभी इंसानों को समतुल्य पाया

एक भी बौना नहीं था

तो यह दृष्टि भ्रम था

 

ऊंचाई पर खड़े हो

नीचे नजर जाएगी

तो सबका कद छोटा ही महसूस होगा

फिर चाहे वे इंसान हो

पेड़ मकान हो

नदी पहाड़ हो

आकाश में विचरते

बादल पंछी या

 समुद्र ही हो

यह नजारा हम

अक्सर प्लेन से देखते हैं

 

और जब जमीन पर

खड़े हो

ऊपर देखते हैं तो

सब कुछ कितना विशाल

अद्भुत अनन्य अनंत नजर आता है

कितना श्रेष्ठ होता है

सदा जमीन से जुड़े रहना

क्योंकि

ऊंचाई से नीचे गिरने की संभावना

सदा बनी रहती है

पर जमीन से जुड़ा

भला कहां गिरेगा ?

☆

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – त्रिशंकु ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – त्रिशंकु… ? ?

स्थितियाँ हैं कि

जीने नहीं देती और

जिजीविषा है कि

मरने नहीं देती..,

सुनो सत्यव्रत!

अपवाद भी

कालांतर में,

परंपरा सिद्ध हुए,

जगत में

तुम अकेले

त्रिशंकु नहीं हुए!

(राजा सत्यव्रत के हठ के चलते महर्षि विश्वामित्र ने उसे सदेह स्वर्ग भेजने का यत्न किया था। इंद्र ने उसे नीचे ढकेल दिया पर कुपित विश्वामित्र ने धरती पर गिरने नहीं दिया। मान्यता है कि सत्यव्रत औंधा होकर निराधार लटका रहा और त्रिशंकु कहलाया।)

?

© संजय भारद्वाज   

(शुक्र. दि. 26.08.2016, प्रातः 7:40 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गीत – भरे हर्ष से तन-मन ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत – भरे हर्ष से तन-मन ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

अनाचार से जो भिड़ते हैं, उनका खिलता जीवन। 

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

*

सदाचार है मानवता-पथ, रीति-नीति सिखलाए। 

साँच-झूठ में भेद बताता, जीवन-सुमन खिलाए।। 

सदाचार को जो अपनाते, उनका महके आँगन। 

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

*

सदा कर्म की महिमा न्यारी, चमत्कार होता है। 

अनुपालन है जहाँ न्याय का, वहाँ सुयश बहता है।। 

रौनक के मेले लग जाते, जीवन बनता मधुवन। 

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

*

झूठ-कपट से टकराता जो, उसका महके जीवन। 

कर्मपथिक जो दिव्य बने वह, भीतर से हो पावन।।

करे लोक-मंगल जो नित ही,  वह बरसाता सावन।

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।।

*

साहस, शौर्य सँजो जो बढ़ता, लक्ष्य सहज पाता है।

पराक्रमी मानव हर पल ही, मंजिल दुलराता है।।

देशभक्त जो बना सदा ही,  चहके उसका आँगन।

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०९ ☆ बाल कविता – संस्कार तो मां ही देती… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०९ ☆ 

☆ बाल कविता – संस्कार तो मां ही देती…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

लाड़-प्यार बच्चों से करना,

पर सिर पर तुम नहीं चढ़ाना।

देर अगर यदि हो जाएगी तो,

खूब पड़ेगा फिर पछताना।।

 *

संस्कार तो मां ही देती,

वह ही प्रथम गुरु है।

बनना और बिगड़ना हाथों,

उससे जीवन शुरु है।

 *

मोबाइल जो हाथ हैं देते,

बचपन का छिन जाए बाना।

 **

नरक बनाना है यदि घर को,

बच्चे की जिद पूरी करना।

ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा बनेगा,

अपनों से ही दूरी करना।

 *

जीवन में यदि खुशियां लानी,

कथनी करनी एक बनाना।

 **

मां का त्याग खूब फलता है,

वे ही बच्चे अच्छे बनते।

पिता भी अच्छे यदि बन जाएं,

बच्चे भी सद्गुण को चुनते।

 *

बच्चों से नहीं हिंसा करना,

बस केवल उनको समझाना।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५९ ☆ एक गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “एक गीतिका” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५९ ☆

☆ एक गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

पत्ता-पत्ता बूँद झरी है

धूप बिचारी पड़ी मरी है।।

 *

बादल के आँगन में हँसती

चंचल बाला सी बिजुरी है।।

 *

छप्पर से लटकी है बरखा

छानी भरी-भरी गगरी है ।।

 *

ताल-तलैया पोखर बोलें

परे हटो नदिया गहरी है।।

 *

कहाँ रुकेगी मन की फिसलन

जहाँ-तहाँ काई पसरी है।।

 *

धरती पर है यौवन छाया

हरियाली गाती कजरी है ।।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नतमस्तक शक्तिमान है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – नतमस्तक शक्तिमान है…!

☆ ॥ कविता॥ नतमस्तक शक्तिमान है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

सबका अपना धर्म है, अपनी पहचान है,

किंतु सबका प्राणाधार एक दिनमान है।

*

सत्कर्मों के कारण व्यक्ति पूजा जाता है,

माँगने  से  नहीं  मिलता मान-सम्मान है।

*

जिंदगी में कब होनी, अनहोनी घट जाए,

कोई समझ न पाया ईश्वरीय विधान है।

*

कंटक- संकट बीच सदा जो खुश रहता,

उसके लिए महल-मढ़ैया एक समान है।

*

स्वाधीनता का अर्थ मिथ्या आरोप नहीं,

प्रजातंत्र में सबका अपना स्वाभिमान है।

*

बड़े-बड़े ज़ोरावर आए, जहां से चले गए,

समय के आगे नतमस्तक शक्तिमान हैं।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विकल्प… ? ?

उदय की प्रक्रिया में

ठहरे हैं कई,

मध्याह्न तक पहुँचकर भी

बालसुलभ क्रियाकलापों में

डूबे पड़े हैं कई,

उधर अवसान की देहरी पर

रुके हैं-

संतृप्त-से कई,

अतृप्त-से कई,

सुनो पथिक!

चक्र के आगे भले

हरेक विवश है,

पर तृप्ति-अतृप्ति,

तृष्णा-संतृप्ति पर

हरेक का अपना बस है,

अपना आकलन खुद करो,

अपना विकल्प खुद चुनो!

?

© संजय भारद्वाज   

21.39 बजे, 7 सितम्बर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर  तक गोविंद साधना संपन्न होगी। 🕉️

💥 ‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा-  ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।💥

💥आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे। 💥

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६६ ☆ मरकर अमर वो हो गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मरकर अमर वो हो गया…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६६ ☆

✍ मरकर अमर वो हो गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

पूछा तू उसके पास  बुलाया न आ गया

बोला कि पलकें छपका इशारा किया गया

 *

फ़रियाद है ग़रीब की हर दर पे अनसुनी

रोता हुआ वो आया था रोता चला गया

 *

मरकर अमर वो हो गया सदियों के वास्ते

जो जान अपनी मुल्क की ख़ातिर लुटा गया

 *

धोखे से कब गिला तेरे मैं शुक्रिया करूँ

आँखों से ये जो यक़ीन का चश्मा हटा गया

 *

भागे है ज़र के पीछे बशर जानते हुए

ले साथ क्या वो आया है ले साथ क्या गया

 *

उम्मीद दर्द से थी मुदावा की जिससे वो

इक ज़ख़्म  मेरे दिल पे है ताज़ा लगा गया

*

अब आज़माने को कोई सूरत नहीं बची

तोड़ा है तुमने जब भी भरोसा किया गया

 *

वो तंगदिल था कर न सका है मुझे मुआफ़

वर्षों का रब्त एक ख़ता पर मिटा गया

 *

इल्ज़ामे-बेवफाई से मैं बच गया अरुण

मुझसे किनारा करके सनम बेवफा गया

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७० – गर इश्क है उर्दू से… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – गर इश्क है उर्दू से…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७० ☆

✍ गर इश्क है उर्दू से… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

फ़ासला  नही,  फ़ासिला कहा करो

हादसा  नही,   हादिसा  कहा  करो

गर इश्क है उर्दू से,  पशेमा  क्यों हो

यार,  सरेआम ऐलानिया कहा करो

* 

कुछ  रिवायतें होती हैं उर्दू अदब की

मशायरे सुनो, और ईर्शाद कहा करो

 *

गैरों की नही अपनों की बात करता हूं

गर वो ग़लत है, उन्हें गलत कहा करो

 *

आधा सच कहो,  ये लाजिमी तो नही

जो बात है, वो साफगोई से कहा करो

 *

ख़ामोशी बोलती है जानम, इंकार नही

पर, कभी खुलकर भी  बात  कहा करो

 *

जो मौसम – ऐ – तपिश में देते है पनाह

उन  दरख़्तों को भी शुक्रिया कहा करो

 *

ये दिल है ‘हेमंत’ कोई खिलौना तो नही

टूट जाता है गर खेले कोई ये कहा करो

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

✍ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ✍

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी जी  की स्मृति में आपकी कविता – ओ प्राणमयी…।)

✍ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ✍

☆

ओ प्राणमयी, ओ दीप्तिमयी

जीवन संगिनि मेरी ।

 *

लाया था मैं तुम्हें व्याहकर

हुआ यही अनहोना

दुनिया मिली अभावों वाली

दे न सका सुख दौना।

सोचा दूँगा पूरनमासी

सौंपी रात अँधेरी ।

 *

कब रेशम श्रृंगार किया था

कब आभूषण पहने

मेरी लाज बचाने खातिर

उतर गये सब गहने

रानी रानी कहा किया पर

बना दिया था चेरी

 *

उजड़ी उजड़ी सी बगिया में

तुमने फूल खिलाये

पथराये प्राणों में तुमने

नये बीज अँकुराये

बिना कहे ही समझी तुमने

मेरी पीर घनेरी

*

मेरी मान प्रतिष्ठा को ही

जीवन लक्ष्य बनाया

मेरी हर इच्छा को तुमने

शिशु जैसा दुलराया

मन की बात जान लेती हो

लगती नहीं अबेरी

*

अर्पित किया सभी कुछ तुमने

बदले में क्या पाया

जीवन के दु:खों  को तुमने

सदा गीत सा गाया।

कल्पवृक्ष सी बनी रहीं तुम

मैं जैसे झरबेरी ।

 ☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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