हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४२ – अनछुए कोरे सफों पर… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अनछुए कोरे सफों पर…।)

✍ अनछुए कोरे सफों पर… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

अतीत के पन्नों पर,

उकेरे हुये

कुछ

प्रतीक,

बिम्ब, प्रतिबिम्ब

और

चितवने

आ खडी होती है, सामने

जब कभी,

वजह – बेवजह आयी लहर कोई

भीगो जाती है

अंतर्मन को |

 

ऐसे में,

अनछुए कोरे सफों पर

उतर आता है बसंत,

कि आने को है उनकी भी बारी

कि लिखा जाना है उन पर भी

कोई अफसाना या कोई तराना |

 ☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३३ – साँड़ तकादों के ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत हैं “साँड़ तकादों के“।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३३ – साँड़ तकादों के ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

न्याय माँगने, गाँव हमारे, जब तेहसील गये,

न्यायालय, खलिहान, खेत,

घर गहने लील गये!

लिया कर्ज़,

सम्भावनाओं की फसल गयी बोई,

फलीभूत आशा के होते, लगा रोग कोई।

साँड़ तकादों के, लठैत

खेतों में ढील गये

गिरवी रखा

अँगूठा, करने बेटी का गौना,

छोड़ पढ़ाई हरवाही करने निकला छौना।

चिन्ताओं के बोझ, सुकोमल

काँधे छील गये

उर्वर की,

भूदान यज्ञ वाली ज़मीन पड़ती,

हरियाली शहरी आँखों में, सदा रही गड़ती।

फिर कछार कांक्रीट वनों में

हो तब्दील गये

 

नफ़रत से

तिमिराच्छादित दिखती है गली-गली,

उच्छृंखल धर्मान्धताओं की ऐसी हवा चली।

प्रेम और सद्भावनाओं के

बुझ कन्दील गये

कभी न

छँट पाया, जीवन से विपदा का कुहरा,

राजनीति का, जिन्हें बनाया गया सदा मुहरा।

दिल्ली, लोक कला दिखलाने

भूखे भील गये

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०६ – सत्ता का भोगी बुरा… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सत्ता का भोगी बुरा…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०६ – सत्ता का भोगी बुरा… ☆

☆

सत्ता का भोगी बुरा, जिसको चढ़ा खुमार।

नैतिकता को भूलकर, भरते रहे डकार।।

* 

सतयुग में सुर औ असुर, रहे केन्द्र के बिन्दु।

ब्रम्हा विष्णु महेश ही, बने कृपा के सिन्धु ।।

 *

त्रेता में श्री राम ने, किया दशानन युद्ध।

संकटमोचन बन गये, किया धरा को शुद्ध।।

 *

अजुद्धा में श्री राम को, मिले भरत से भ्रात।

रामराज्य की कल्पना, के सर्जक थे तात।।

 *

द्वापर में पलटा समय, त्रेता को दी मात।

सिंहासन अंधा हुआ, पुत्र मोह में तात।।

 *

स्वार्थों में सब खो गये, अंध भक्ति का शोर।

दुर्योधन धृतराष्ट्र से, हुयी अनोखी भोर।।

 *

मान और अपमान का, चला अनोखा दौर।

नीति अनीती भूलकर, हुये सिंहासन खोर।।

 *

भरी सभा में द्रोपदी, किया वस्त्र से हीन।

जनता की न पूछिये, स्थितियाँ थीं दीन।।

 *

तब द्वापर में कृष्ण ने, किये अनोखे काम।

सभी विधर्मी का किया, पूरा काम तमाम।।

 *

जबसे कलियुग आ गया, फिर से छाया रोग।

नर-नारी के भाग्य में, बस कष्टों का भोग।।

 *

सत्ता की चाहत बुरी, भूलें नैतिक राह।

परहित भाव बिसारते, जग से बेपरवाह।।

 *

यवनकाल में तो मचा,जग जाहिर कुहराम।

पिता-पुत्र नाते सभी, बुरे हुये बदनाम।।

 *

धर्मान्धों की फौज ने, कर दी बगिया सून।

सिंहासन की चाह में, खूब बहाया खून।।

 *

अंगे्रजों के काल में, खूब मची थी लूट।

जितना चाहे लूट लो, उनको ही थी छूट।।

* 

स्वतंत्रता जब मिल गई, थामी हमने डोर।

तब भारत को था लगा, अब तो होगी भोर।।

* 

भ्रष्टाचार अचार का, लगा अनोखा स्वाद।

जिसको देखो खा रहा, चारों ओर विवाद।।

* 

कालान्तर में शक्तियाँ, प्रखर हुयीं दिन रात।

लम्पट चोर मवालि की, चारों ओर बिसात।।

 *

निज स्वार्थों की भीड़ ने, किये अनोखे काम।

खुद का घर भरने लगे, कैसे लगे विराम।।

 *

आजादी के साथ में, बटवारे का शोर।

धरा रक्त से रंग गई, तब आयी थी भोर।।

* 

लोकतंत्र की त्रासदी, आरक्षण का जोर।

अगड़े पिछड़े सब खड़े, मचा रहे हैं शोर।।

* 

तुष्टिकरण की नीति से, बिगड़ी सारी सोच।

समीकरण सब रूठते, सबके मन संकोच।।

 *

नेताओं की डुगडुगी, बजती है हर बार।

बंदर से सब नाचते, जब सजता दरबार।।

 *

आशायें सबकी लगीं, कब बदलेगा तंत्र।

तिमिर हटे इस देश का, तब गूँजेगा मंत्र।।

 *

रामराज्य की आस में, बैठा है इंसान।

भेद भाव का अंत हो, बदले हिंदुस्तान।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – परिक्रमा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – परिक्रमा ? ?

मैंने जब कभी

छलकानी चाही

वेदना की एक बूँद,

विरोध में उसने

उँड़ेल दिया

खारा सागर,

विवश बूँद जा गिरी सीप में

और कालातीत हो गई।

 

कालांतर में

अनगिनत मोतियों की

एक माला बन गई,

इस माला में

छिपी है

मेरे जीवन की परिक्रमा!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

*

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६८ – घिन आती है ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – घिन आती है…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६८ – घिन आती है ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

मुझे

घिन आती है

अपने बुद्धिजीवी होने पर

घिन आती है।

बहुत मुश्किल हो रहा है

प्रबुद्धता के नाटक को निबाहना ।

एक कापुरुष की निरीहता से

देख रहा हूँ

अन्याय, अत्याचार,

आतंक

भूख, भ्रष्टाचार और

बेरोजगारी ।

कभी लगता है

काश! मैं बंदूक बन पाता

या

अलादीन का चिराग पा जाता

या फिर बन जाता बाढ़ का जल

या फिर दावानल

ताकि भ्रष्ट व्यवस्था को दबोच लेता

अपने आगोश में।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६७ – “कथ्यों का अन्तर्मन…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “कथ्यों का अन्तर्मन–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “कथ्यों का अन्तर्मन–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

आकर्षण दिन का

खरोंच के ।

संध्या के गई धूप

पोंछ के ॥

 

गोष्ठियाँ दिशाओं

की छिन्न भिन्न ।

परिवर्तित मुद्रायें

हुई खिन्न ।

 

बतलाती अनगिनत

प्रकारों को –

मुई हवा लँगड़ाकर

मोंच के ॥

 

अपनी जो निगाहें

किये  नीची ।

आम की होती

प्रमुदित बगीची ।

 

मार रही ताने

मुँह चिढ़ाती –

भाभियों सरीखा

दिल कोंच के ॥

 

यह सधी परछाईं

शुष्क गाछ की ।

दुखिया प्रतीक्षारत है

छाछ  की ।

 

क्या कह दें दिन

के कथानक को –

कथ्यों का अन्तर्मन

नोंच के ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-01-2026

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कुंदन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कुंदन ? ?

नित्य आग में

जलाया जाना,

तेज़ाब में रोज़

गलाया जाना,

लहुलुहान

की जाती वेदनाएँ,

क्षत-विक्षत

होती संवेदनाएँ,

अट्टहासों के मुकाबले

मेरे मौन पर

चकित हैं,

कुंदन होने की

प्रक्रिया से वे

नितांत अपरिचित हैं!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 6:29 बजे, 25.3.2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

*

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ईश्वर कटघरे में… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “ईश्वर कटघरे में…”।

? ईश्वर कटघरे में… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

जब पोथियाँ फ़ैसले लिखती हैं

तो मनुष्य कटघरे में नहीं

अपने ही सामने खड़ा होता है

क़ानून मौन रहता है

परंपरा हथौड़ा चलाती है

और सत्य हाशिए पर

अपने ही ख़ून से दस्तख़त करता है…

मेरे गाँव में

हर साल यज्ञ होते हैं

पर अब धुएँ में प्रार्थना नहीं

कुत्सित संदेह उठता है

हाथ आकाश की ओर नहीं

किसी गढ़े हुए शत्रु की तरह उठते हैं

और अग्नि

ईश्वर से पहले

मनुष्य को जलाने लगती है…

नीम पर टँगा लाल हिंडोल

अब बचपन नहीं झुलाता

वह अघोषित भय की घोषणा है

क्योंकि अब यह समाज

अपने ही हलाहल से

स्वयं के भविष्य को पाल रहा है

जब आस्था बीमार होती है

तो सबसे पहले करुणा मरती है-

फिर विवेक

फिर मनुष्य

और अंत में

ईश्वर को भी

भीड़ की जेब में रख लिया जाता है…

वे कहते हैं —

धर्म ख़तरे में है

मैं कहता हूँ —

मानवता ख़तरे में है

क्योंकि जहाँ धर्म बचाने के लिए

मनुष्य को जलाया जाए

वहाँ कोई भी देवी-देवता

खड़ा नहीं रह सकता

अगर तुम्हें सच में धर्म चाहिए

तो उसे मंदिरों- मस्जिदों में नहीं

लोगों में खोजो

उन आँखों में

जो भूख से डरती हैं

उन हाथों में

जो किसी से नफ़रत नहीं कर पाते

क्योंकि ईश्वर

कभी भी

नारों में नहीं,

भीड़ की आग में नहीं

वह वहाँ होता है

जहाँ कोई एक मनुष्य

स्वयं को संकट में डाल

दूसरे मनुष्य को

मृत्युपाश से बचा लेता है…!

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४८ ☆ # “टूटते रिश्ते…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “टूटते रिश्ते…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४८ ☆

☆ # “टूटते रिश्ते…” # ☆

☆

टूटते रिश्ते हैं टूटते परिवार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

बचपन से जिसे संभाला

वह रूठ गया

सांसों से बंधा रिश्ता

अचानक टूट गया

उम्मीद थी जिसे

वह सब कुछ लुट गया

हमारा दर्द अंदर ही अंदर

घुट गया

अब रिश्ते नहीं बस व्यापार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

कहां जाएं हम

छोड़कर यह दुनिया

हमें रास नहीं आ रही

यह दुनिया

कितनी बेरहम हो गई है

यह दुनिया

रोज नए-नए जख्म

दे रही है यह दुनिया

दुनिया में प्रेम नहीं दुखों की भरमार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

हवाओं में कड़वाहट

ईर्ष्या की गंध है

आपस में बेरूखी

प्रचंड द्वंद है

नफरत फैलाते समाज में

कुछ लोग चंद है

सत्य और समझदारी की बातें करना बंद है

सांप्रदायिकता करना अब तो कारोबार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

आजकल संवेदनाएं मर गई है

स्वार्थ की लालसा भर गई है

सच्चाई झूठ से डर गई है

रिश्तो को निरर्थक कर गई है

रिश्ते सांसों पर बोझ और भार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है/

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विश्व हिन्दी दिवस ☆ श्री आर के रस्तोगी ☆

श्री आर के रस्तोगी

☆ विश्व हिन्दी दिवस ☆ श्री आर के रस्तोगी☆ 

☆

भारत की पहचान है हिन्दी,

विश्व पटल की जान है हिन्दी।

कोई देश ऐसा नही इस जग मे,

जहाँ बोली नही जाती ये हिन्दी।।

 *

हिंदुस्तान की मातृ भाषा है  हिन्दी,

सबसे प्यारी भाषा है हमारी हिन्दी।

इसे जरा तुम बोलकर कभी देखो,

जैसे बोलो वैसे लिखी जाती हिन्दी।।

 *

भारत माँ का श्रंगार है हिन्दी,

बिन्दी के रूप मे सजी है हिन्दी।

कोई क्षेत्र नहीं ऐसा भारत मे,

जहाँ बोली नही जाती है हिन्दी।।

* 

आओ इसका हम सब मान बढ़ाये,

इसको सब भाषाओ के ऊपर लाये।

करे इसका विश्व दिवस पर स्वागत

और सब भाषाओ का हार पहनाये।।

☆

© श्री आर के रस्तोगी

गुरुग्राम

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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