( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “मोबाइल में खोया बचपन…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २३
लघुकथा – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
स्मरण आता है, वह स्वर्णिम बचपन… l घर में जब कोई डिब्बा खाली हो जाता था, उसे लेकर हमारे साथी, हमारे भाई-बहन एक कोने में खड़े हो जाते थे, दूसरा खाली डिब्बा लेकर दूसरे कोने में हम l दोनों खाली डिब्बों को एक धागा अथवा किसी डोर से बाँध लिया जाता था l
उस कोने से हमारे साथी या हमारे भाई-बहन खाली डिब्बे में मुँह लगाकर बोलते थे, इधर हम सुनते थे….. कभी इधर से हम बोलते थे, उधर वो सुनते थे l
खाली डिब्बे का स्थान अब मोबाइल ने ले लिया है l बात तब भी होती थी, बात अब भी होती है l….. लेकिन बीच की स्नेहिल डोर न जाने कहाँ ग़ायब हो गई है l
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रेत की दीवार।)
शांति दास जी सोच रहे थे कि आसपास इतना सन्नाटा है।आजकल कोई सुबह की सैर को भी नहीं जाता?
सुबह हो गई अब चाय तो बना कर पी लेता हूँ, तभी आवाज आई कचरे वाली गाड़ी आई।
“चलो कचरा डालकर ही चाय पीता हूँ।”
कचरा उठाकर बाहर डालने के लिए गए, तभी कचरे वाले ने कहा – “बाबा आज बाहर बहुत ठंड है और आपने बस एक स्वेटर पहनना है, टोपी क्यों नहीं पहनी, आपको खांसी आ रही है।”
शांति दास जी ने कहा- “बेटा बहू ऊपर की मंजिल में रहते हैं नीचे मुझे अकेला छोड़ दिया। पत्नी के गुजर जाने के बाद जिंदगी बोझ हो गई है। बुढ़ापे का बोझ मुझसे अब सहन भी नहीं होता? ऐसा लगता है कि मरुस्थल के चारों ओर में गिरा हूँ। सब तरफ अंधेरा दिखाई दे रहा है।”
कचरे की गाड़ी वाले ने कहा- “बाबा आपकी बात तो मेरे सिर के ऊपर से जा रही है, ठीक है आपका जीवन आप जानो, मैं आगे के घर का कचरा लेता हूं।”
“बाबूजी आपने अपने आसपास रेत की दीवार क्यों खड़ी की है?”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ ☆
🌻 लघुकथा 🌻 भोले का अभिषेक 🌻
महाशिवरात्रि की धूम, भक्तों की टोली यत्र- तत्र, शिवालय, देवालय घर मंदिर, सजा सुंदर, चमकता जहाँ तक दृष्टि जाए हर- हर महादेव की गूंज।
दूध दही, गंगाजल निर्मल जल की धार, अभिषेक करने की होड़ सी मची है। शिव शंकर भक्तों की परीक्षा ले रहे हैं। सब उनका मायाजाल।
अरे जल्दी चलो नहीं जाना है क्या? मालती।
जल्दी चलो– शिव अभिषेक करने का समय हो चला है। पास के मंदिर में बहुत भीड़ होने लगी है।
सखी ने जोर से आवाज लगाई।
नहीं अभी नहीं जा रही हूँ। घर मंदिर में अभिषेक कर लूँ तत्पश्चाप जाऊंगी।
तू तो पगली है घर में बाद में करते रहना। पहले चल वहाँ हो आते हैं। बहुत अच्छा पुण्य मिलता है। नहीं तो मंदिर में बहुत भीड़ हो जाएगी।
नहीं मेरे मंदिर में सभी देवगण बैठे इंतजार करते हैं। सभी को मेरे अभिषेक की आवश्यकता है।
सखी आँखें तरेर कर बोली– ऐसे कह रही है– जैसे भगवान इसके घर पर हैं।
मालती ने कहा सही कहा तुमने। चाय, दूध, नाश्ता, टिफिन, कपड़े की तैयारी, स्कूल की तैयारी, भोजन व्यवस्था, झाड़ू बुहार, साफ सफाई समय पर नहीं हुआ तो मेरे अभिषेक का क्या महत्व।
मेरे पतिदेव ने सारा कुछ मुझे सौप दिया है। अपनी जिम्मेदारी उठा परिवार को खुश रखने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं।
कहते-कहते वह भाव विभोर होने लगी। आज पतिदेव उठकर भोर एक लोटा जल सूर्य देव अर्पण करते कह रहे थे – – – प्रभु मेरी मालती को सदैव कुशल रखना। हे अर्धनारीश्वर बस यही मेरा अभिषेक है।
और वह सखी की ओर देखने लगी। सखी बोल पड़ी – – हो गया भोले का अभिषेक। 🙏😊
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – लघुकथा – क्या रखा है नाम में?)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६७ ☆
☆ लघुकथा – क्या रखा है नाम में?☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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नाम व्यक्ति की पहचान होता है। शिशु को नाम माता-पिता या अन्य पारिवारिक बड़े जन देते हैं। हम सब समाज में अपने नाम से ही जाने जाते हैं। एक ही नाम एक से अधिक व्यक्तियों के हो सकते हैं। पहचान सुनिश्चित करने के लिए पिता, पति या गाँव के नाम तथा कुलनाम भी जोड़ लिया जाता है। नेकनाम होना तथा नाम कमाना सबकी चाह होती है जबकि गुमनाम, बदनाम होना कोई नहीं चाहता।
मेरे कार्यालय में एक अधिकारी आए जिनका नाम था राम लाल शर्मा। संयोगवश दफ्तर में एक भृत्य का भी यही नाम था। अधिकारी के कक्ष के बाहर उनकी नाम पट्टिका लगाई गई तो उन्होंने उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि आर. एल. शर्मा आई.ए.एस. लिखवाओ।
एक बच्चे का नाम गरीब दास था। वह पढ़-लिखकर नौकरी में लगा तो यह नाम चुभने लगा उसने शपथ पत्र देकर नाम बदल लिया। उसके रिश्तेदार आते तो उसे बचपन के नाम से पुकारते, यह उसे बहुत खराब लगता। माता-पिता से अक्सर बहस कर लेता और डाँट खाता।
कुछ लोग अपने पेशे को अपने व्यक्तित्व से अहमियत देते हैं, वे नाम के पहले डॉक्टर या प्रोफेसर लिखने लगते हैं। यह लत इतनी बढ़ जाती है कि केवल नाम लिखा या लिया जाने पर वे खुद को अपमानित या शर्मिंदा अनुभव करते हैं।
जब समाज में शिक्षा का प्रसार कम था तब नाम के साथ उपाधि बी.ए., एम.ए., विशारद, शास्त्री आदि लिखने का चलन था। मेरे एक पड़ोसी सेवा निवृत्त उच्च अधिकारी हैं, वे नाम पट्टिका पर अपना पदनाम लिखने का मोह नहीं छोड़ पाए। एक सामाजिक कार्यकर्ता खुद का परिचय पत्नी के पद से से पार्षद पति कहकर देते हैं।
एक दिन मेरी बेटी ने मेरे पिता श्री पूछ लिया कि व्यक्ति की सही पहचान नाम, कुलनाम या पदनाम क्या होती है? पिता जी बोले- पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात, क्या धरा है नाम में? मनुष्य की सही पहचान उसके काम से होती है। दुनिया को काम ही प्यारा होता है, नाम या चाम नहीं।”
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मौन।)
“माँ जल्दी करो अभी तक चाय नहीं बनाई है और न टिफिन दिया है कॉलेज जाने में देर हो रही है।”
रवि ने अपनी माँ कमला से कहा।
“बेटा आज बहुत ठंड है 8:00 बज गया अभी तक मेरा हाथ पैर सीधा नहीं हो रहा है?”
“कोई बात नहीं माँ मैं चाय बना ले रहा हूं और ब्रेड सेंक के तुम्हें देता हूं” मुस्कुराते हुए रवि ने कहा “माँ ब्रश कर लो।”
“माँ पता नहीं क्यों बाहर बहुत हल्ला हो रहा है?”
कमला जी ने कहा – “बेटा सड़क के किनारे घर हैं। आते जाते बहुत सारी आवाज़ सुनाई देती रहती है। “
रवि ने कहा – “मैं देखता हूँ क्यों बाहर भीड़ लगी है।”
“मां आप चिंता मत करो ऑनलाइन मैंने खाना ऑर्डर कर दिया है थोड़ी देर बाद आ जाएगा और मैं कॉलेज कैंटीन में खाना खा लूंगा।”
वह बाइक लेकर कॉलेज के लिए चला गया।
जब वह पहुंचा तो देखा कि एक वृद्ध ठंड के मारे कांप रहा था और एक फटा कंबल ओढ़ कर बैठा था,
लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे।
रवि ने एक चाय की दुकान से चाय और एक बिस्कुट का पैकेट लिया और उस बुजुर्ग आदमी को दिया।
तभी वहां पास खड़े एक व्यक्ति ने उसे डांटा- “क्या हम इसे भगा रहे हैं जानते हो कौन है और तुम इसे चाय पिला रहे हो?”
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा -“अंकल जी कहिए तो आपको भी मैं चाय पिला दूं बेचारे ठंड से कांप रहे हैं पहले उनमे थोड़ा हिम्मत आये फिर हम पूछते हैं उन्हें कहाँ जाना है। “
वह वृद्ध आदमी बहुत खुश हुआ मुस्कुरा के उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया और बोला कि “मेरा सब कुछ कुछ महीने पहले ही बेटे-बहु सबने छीन लिया था बस यूं ही भटकता रहता हूं गली-गली, आज यहां आग तापते हुए सो गया और मेरी नींद लग गई थी तभी सुबह यह सब लोग मुझे परेशान करने लग गए और मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ ?”
“कोई बात नहीं अंकल जी आप यह बताइए मैं आपको कहां छोड़ दूं? “
“बेटा मुझे तो कुछ पता नहीं है” उसे वृद्ध ने कहा।
“मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल सर भी बुजुर्गों की सेवा करते हैं।”
रवि ने कहा- “बाबा आप बाइक में बैठो।”
वृद्ध की आंखों में एक चमक आ गई और उसके शरीर में अचानक एक ऊर्जा भर गई।
वह उसकी बाइक में तन कर बैठ गया।
प्रिंसिपल सर बोले “अरे यह किसको ले आए कॉलेज!”
“सर बाबा के रहने का इंतजाम करना है इनके बच्चों ने इन्हें घर से निकाल दिया है”
“ठीक है अपने कॉलेज के थोड़ा सा दूरी पर जो वृद्ध आश्रम है उसका नाम है ‘अपना घर’ इन्हें वहां छोड़ आओ।”
वृद्ध की ऑंखों से ऑंसू निकल रहे थे मौन होकर भी ऑंखे आभार व्यक्त कर रही थी।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “आम के बीच राम”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५४ ☆
🌻लघुकथा🌻आम के बीच राम🌻
वार्षिकोत्सव कार्यक्रम चल रहा था। सभी अपनी-अपनी कार्य कुशलता मंच के मध्य रखना चाह रहे थे। चमचमाता मंच, सजावट, तिलक रोली चंदन वंदन अभिनंदन, मन आनंदित और उमंगों से भरा ।
सभी की निगाहें तो बस वहाँ क्या हो रहा? क्या होने वाला है? इसकी जानकारी लेते नजर आए।
किसी ने मन की बात, कोई व्यंग, कोई परियंत, कोई प्रियवर, कोई हँसी ठिठोली, कोई ज्ञान की बात, संत ध्यान की बात, न चाहते भी तालियाँ बजाते रहिए। कुल मिलाकर गीत संगीत भरपूर मनोरंजन।
अंग्रेजी परवरिश में पलते आज के बच्चों को ये सब नही भाता।अथर्व अपनी दादी के साथ आया था। बीच-बीच में तंग करने लगा – – घर चलो यहाँ तो आम लोग बैठे है।
दादी प्यार से सिर पर हाथ फेरते बच्चे से बोली — जहाँ आम लोग होते है। वहीं राम होते है। तुम्हें भी श्री राम बनना है न??
बच्चे ने धीरे से कहा — तो फिर ठीक है। थोड़ी देर बैठ जाता हूँ।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघु कथा “– मेला …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९३ — मेला —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
आठों पहर वहाँ एक स्थायी मेला बना रहता था। लोग अपनी व्यस्तता से थक जाएँ तो एक वही मेला होता था जहाँ जाने पर उनका मन बहलता था। धारणा इस तरह से बनी होती थी कि अपना कोई घर में खो जाए तो वहाँ मेले में ढूँढने पर उसे पा लेंगे। पर एक प्रेमी के साथ कुछ और हुआ। उसने खोने को तो अपनी प्रेमिका को इस मेले में ही खोया, लेकिन उसे पाया नहीं। बात होती थी सब का कहीं खोया मेले में मिल जाता है तो उसका क्यों नहीं मिलता? रही प्रेमी की बात, वर्षों प्रेमिका को ढूँढते थका – हारा हो जाने से वह खत्म हो गया। अब वह कब्रस्तान में होता। प्रेमिका वहीं थी।
☆ लघुकथा – मुंह पर थप्पड़☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया।पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया, और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा, औरजब मानसी ने सीधे सीधे सवाल किया कि, “जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं, तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?”
“हां! है तो ।”
“क्या, तुम उससे सहमत नहीं ?”
“नहीं।”
“मतलब असहमत हो?’
“नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”
“मतलब यह , कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है, तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा।—-और फिर इसमें बुराई भी क्या है, आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है।इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।”
“मतलब, यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?”
“हां!ऐसा ही समझो।’
“और हमारे प्यार का क्या ?”
“वह तो हमने तब किया था, जब मैं आय.ए.एस. नहीं था। ”
“ओके!तो मैं इस रिश्ते को अभी ख़त्म करती हूं।मुझे नहीं करना दहेज के लालचियों के घर अपना रिश्ता।”
और फुंफकारती हुई मानसी चली गई, और जुट गई जी-जान से यू.पी.एस.सी. की तैयारी करने में।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “दुखवा मैं कासे कहूँ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
घर के निरीह बूढ़े प्राणी की अंतिम सांसें चल रही थीं पर उसके प्राण कुछ कहने के लिए तड़प रहे थे। आंखों की पुतलियां बेचैनी में बार बार धरती को, आसमान को ताके जा रही थीं। होंठ थे कि कुछ कहने के लिए खुलते पर फिर कसमसा कर बंद हो जाते थे।
परिवार के सभी छोटे बड़े सदस्य उनकी चारपाई के इर्द गिर्द घेरा डाले हुए खड़े थे। आखिर उनके प्यारे पोते से उनकी हालत देखी न गयी, आंसुओं से बाबा के पांव को नम करने के बाद, माथा टिकाते कहा- कहिए न बाबा। आप जो कहना चाहते हैं ताकि आपकी आत्मा को मुक्ति मिले।
बाबा ने कोशिश करके मुंदी आंखें खोलीं, फिर परिवारजनों को निहारा और धीमे सुर में कहना शुरू किया -मेरे बच्चो। मेरा जन्म उस पंजाब में हुआ, जिसमें अमृतसर और लाहौर एक दूसरे की ओर पीठ करके नहीं बैठते थे बल्कि एक दूसरे के गले मिलते थे.. हाय.. फिर इनका बिछुड़ना भी इन आंखों ने देखा। कैसे कहूं?
– कहिए न बाबा..
– मेरे बच्चो। मेरी जवानी उस पंजाब के खेतों को हरा भरा करने में निकल गयी जिसे इंसानी लहू से सींचा क्या था? आह.. कैसे कहूं.. ? कैसा भयानक दौर आया। बंटवारे की धुंधली तस्वीर फिर सामने आ खड़ी हुई। और तुम मुझे पंजाब की अनजान धरती पर ले आए। अब..
– दुख कहो न बाबा..
– अब उस धरती पर अपने प्राण त्याग रहा हूं जहां मैंने न जन्म लिया, बचपन बिताया, न जवानी भोगी.. तुम लोगों ने मेरा बुढ़ापा खराब कर दिया। हे भगवान्…. । कुछ और मंज़र दिखाने से पहले इस धरती से मुझे उठा ले.. उठा ले..
इतना कहते कहते बाबा की गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी.. एक प्रश्नचिन्ह बनाती हुई..