हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – बेटियाँ – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे। आज प्रस्तुत है श्रद्धेय अमृतलाल नागर जी के उपन्यास ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ को समर्पित लघुकथा “बेटियाँ — ”।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी ☆ — बेटियाँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

बेटे की अपेक्षा में वे पाँच बेटियों के माँ — बाप बन गए। कालांतर में बीमारी और उम्र के बोझ से दबे हुए माँ — बाप के जीवन में ऐसा वक्त आया विवाहित बेटियों ने प्रेमवश उन्हें अपने यहाँ रखने लिए बारी लगा ली। बड़ी बेटी से शुरु हो कर बारी पाँचवीं बेटी तक पहुँच जाती। माँ बाप के लिए एक प्रार्थना हुई बेटियों को कभी पता न चले उन्होंने बेटे के नाम से उन्हें फीका समझा था।

© श्री रामदेव धुरंधर

10 – 08 – 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – या क्रियावान… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – या क्रियावान… ? ?

बंजर भूमि में उत्पादकता विकसित करने पर सेमिनार हुए, चर्चाएँ हुईं। जिस भूमि पर खेती की जानी थी, तंबू लगाकर वहाँ कैम्प फायर और ‘अ नाइट इन टैंट’ का लुत्फ लिया गया। बड़ी राशि खर्च कर विशेषज्ञों से रिपोर्ट बनवायी गयी। फिर उसकी समीक्षा और नये साधन जुटाने के लिए समिति बनी। फिर उपसमितियों का दौर चलता रहा।

उधर केंचुओं का  समूह, उसी भूमि के गर्भ में उतरकर एक हिस्से को उपजाऊ करने के प्रयासों में दिन-रात जुटा रहा। उस हिस्से पर आज लहलहाती फसल खड़ी है।

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रवण मास साधना में जपमाला, रुद्राष्टकम्, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना करना है 💥 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – 36 – रिश्ते…  ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते।)

☆ लघुकथा # 36 – रिश्ता ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“दीदी तुम हर साल की तरह फिर सुबह से आ गई।”

अनु ने मुस्कुराते हुए कहा-” हां क्या करती तू ही तो मेरा एक भाई है चल जल्दी से तैयार होकर आ राखी बांधना है?”

अरुण ने कहा दीदी -“हां दीदी बस अभी थोड़ी देर में मैं आया।”

“तब तक मैं तेरे लिए चाय बना देती हूं दोनों चाय नाश्ता करेंगे।“

“अरुण बच्चे और नीता दिखाई नहीं दे रहे?”

“दीदी वह लोग कमरे में सो रहे हैं…”

कहते-कहते अरुण रुक गया।

“दीदी मुझे राखी बांधो वाह दीदी साबूदाने की खिचड़ी तुम बनाकर मेरे लिए लाई हो और हलवा इसका कोई जवाब नहीं।“

“बच्चों को मैं उठा दूँ क्या? शायद उठ गए होंगे।”

“रहने दो दीदी सब अपने मन के हो गए हैं। अब मैं तुमसे क्या कहूं चलो हम लोग मम्मी पापा के फ्लैट में चलते हैं और वहीं सुखद पुराने दिन को जीते हैं…।“

तभी नीता उठकर आती है और कहती है- “तुम भाई बहन का गिला शिकवा शुरू हो गया…कितनी बार मना किया कि मेरे फ्लैट में आकर हल्ला मत किया करो लेकिन आप सुनते ही नहीं हो?“

“नीता भाई बहन का प्यार तुम नहीं समझोगी। बहू यह रिश्ता ही अनोखा है।“

“तुम कितना भी अपमान करो पर मैं आऊंगी” अनु ने कहा और वह रोती हुई अपनी मां के पास चली गई…।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 207 – हस्तरेखा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “हस्तरेखा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 202 ☆

🌻लघु कथा🌻 हस्तरेखा 🌻

तीसरी मंजिल पर छोटा सा कमरा। गर्मी का समय सिर्फ ऊपर पंखा लगा था। किनारे पर टेबिल पर एक भरा हुआ पानी का जग दो गिलास।

नीचे बहुत बड़ा बंगला। बोर्ड लगा था। महान ज्योतिषाचार्य मिलने का समय दोपहर 1:00 से शाम 6:00 बजे तक। जब सीमा को पता चला कि ज्योतिषाचार्य जी के आँख का मोतियाबिंद ऑपरेशन हुआ है।

वह देखने पहुंच गई। वैसे भी उसका आना-जाना लगा रहता था। जैसे ही वह घर पहुंची। आचार्य जी ने गदगद मन से कहा… आओ कुछ पूछना है क्या? या यूँ ही अपने काम के सिलसिले में आई हो? सीमा ने कहा- नहीं नहीं.. आचार्य जी, मैं तो आपकी कुशलता के बारे में पूछने आई हूँ।

– हाँ, तुम तो  समाज सेवा कर रही हो।

एक हँसी सी कुटिल मुस्कान के साथ। उसने धीरे से कहा… और आज आप अपनी हस्त रेखा के बारे में भी बता दीजिए।

ज्योतिषाचार्य के आँखों से आँसू गिरने लगे। यदि मैं कहूं कि मेरा भविष्य अंधकार में है तो आप क्या कहना चाहेंगी। हस्तरेखा बता रही हैं।

सीमा ने कहा तो आप कुछ उपाय क्यों नहीं कर लेते। आचार्य जी ने कहा.. बेटा दुनिया को बताना और अपने लिए करना और कहना आज सबसे बड़ा कार्य होता है। पर देखना तुम आज आई हो अब मेरे लिए कुछ अच्छा होगा।

उनकी असमर्थता समझते देर न लगी। भारी मन से सीमा लौट चली। कुछ रुपयों को उनके सिरहाने रखकर।

कुछ अच्छा ही होगा क्या कुछ कहती है हस्तरेखा मन ही मन विचार करती रही। क्या सचमुच जीवन हस्तरेखा पर निर्भर!!!! नहीं- नहीं दुनिया पैसों पर चलती है। सीमा ने कसकर मुट्ठी बंद कर लिया और मन में बोलने लगी…

– यह पैसों की दुनिया है।

– यह पैसों की दुनिया है।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – मंजिल अभी दूर है – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे। आज प्रस्तुत है श्रद्धेय अमृतलाल नागर जी के उपन्यास ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ को समर्पित लघुकथा “मंजिल अभी दूर है”।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी ☆ — मंजिल अभी दूर है — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(श्रद्धेय अमृतलाल नागर जी के उपन्यास ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ को समर्पित लघुकथा)

आदिवासी जैसे इलाके के पंद्रह साल के लड़के ने अपने घर से पैसा चुरा कर सुदूर शहर की ओर पलायन किया था। पैसा तो कुछ ही दिनों में खत्म हो गया। पर अब तक उसे इस शहर के बहुत हद तक अच्छे खासे अनुभव हो गए थे। वह सूखी नदी के पुल के नीचे तमाम लड़कों के साथ रात के वक्त सोता था। उसने राशन की एक दुकान में झाँड़ पोंछ का काम किया। उसने पढ़ाई में ध्यान दिया और उसे एक अध्यापक का पूरा सहयोग मिला। दो चार साल में वह पूरा जवान हुआ। पढ़ना तो उसे कुछ कुछ आता ही था। भगवान ने उसे गरीब घर का बेटा तो बनाया था, लेकिन दिया था तो एक सुन्दर चेहरा ही। यही सुन्दर चेहरा उसके अंधेरे जीवन का प्रकाश बना। फिल्म वालों का ध्यान उस पर गया और वह अभिनेता बन गया। उसने कुछ ही दिनों के बीच पैसे और शोहरत में एक अद्भुत गरिमा हासिल कर ली।

उसके बारे में तो बहुत लिखा जाता था। लिखने वालों ने ऐसा भी किया उसके परिवार के बारे में पता लगा लिया। उसके परिवार के लोग कभी भंगी हुआ करते थे। अब उन्होंने अपना जीवन स्तर काफी ऊँचा कर लिया था। पर मानो दाग रह गया ये लोग तो भंगी के वंशज हैं। फिल्मकारों ने तो निचले तबके के लोगों पर तमाम फिल्में बनायीं और विश्व व्यापी ख्याति अर्जित की। पर उन्हीं के अपने कलाकार के पूर्वजों के जीवन को इस रूप में जाना तो उस पर छींटाकशी करने लगे। इस विद्रूपता से खीज कर उसने उन लोगों का साथ छोड़ा और अपने माँ – बाप के यहाँ लौट गया। यहाँ उसने एक चमत्कार देखा। यहाँ लोगों को एक दिन पहले पता चला था वह शहर में बहुत बड़ा ऐक्टर बन गया है। उसने देखा उसके पिता को ऊँची कुरसी पर बिठाया गया है और उसके गले में फूलों की मालाएँ डाली जा रही हैं। नाच गानों से पूरा वातावरण गूँज रहा था।

गाँव का सेठ जो उसके पिता को भंगी का वंशज जानने से उसे देखने पर बुदबुदाते हुए मुँह टेढ़ा कर के घुमा लेता था वह खुशी मना रहे इन लोगों के बीच तो न था। पर उसे पता चल गया था भंगी कुल का बेटा वापस आया है। अगली सुबह वह भंगी कुल के बेटे से मिलने उसके घर आया और हाथ जोड़ कर कहा जाते वक्त उसके बेटे को साथ ले जाए। बेटे ने कह रखा है उसे न भेजेगा तो आत्म हत्या कर लेगा। उसे बचपन से ऐक्टर बनने के सपने आते थे। अब उसे लग रहा है गाँव का यह दुलारा बेटा, शहर का वह ख्यातिलब्ध ऐक्टर उस के बेटे का हाथ पकड़ कर उसे उस दुनिया में ले जाने के लिए वापस आया है।

© श्री रामदेव धुरंधर

17 – 08 – 2019

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #183 – बाल कहानी – नकचढ़ा देवांश ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक रोचक कहानी- “दौड़ता भूत”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 183 ☆

☆ बाल कहानी – नकचढ़ा देवांश ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

देवांश की शैतानियां कम नहीं हो रही थी। वह कभी राजू को लंगड़ा कह कर चढ़ा दिया करता था, कभी गोपी को गेंडा हाथी कह देता था। सभी छात्र व शिक्षक उससे परेशान थे।

तभी योगेश सर को एक तरकीब सुझाई दी। इसलिए उन्होंने को देवांश को एक चुनौती दी।

“सरजी! मुझे देवांश कहते हैं,” उसने कहा, “मुझे हर चुनौती स्वीकार है। इसमें क्या है? मैं इसे करके दिखा दूंगा,”  कहने को तो देवांश ने कह दिया। मगर, उसके लिए यह सब करना मुश्किल हो रहा था।

ऐसा कार्य उसने जीवन में कभी नहीं किया था। बहुत कोशिश करने के बाद भी वह उसे कर नहीं पा रहा था। तब योगेश सर ने उसे सुझाया, “तुम चाहो तो राजू की मदद ले सकते हो।”

मगर देवांश उससे कोई मदद नहीं लेना चाहता था। क्योंकि वह उसे हमेशा लंगड़ा-लंगड़ा कहकर चिढ़ाता था। इसलिए वह जानता था राजू उसकी कोई मदद नहीं करेगा।

कई दिनों तक वह प्रयास करता रहा। मगर वह नहीं कर पाया। तब वह राजू के पास गया। राजू उसका मंतव्य समझ गया था। वह झट से तैयार हो गया। बोला, “अरे दोस्त! यह तो मेरे बाएं हाथ का काम है।” कहते हुए राजू अपने एक पैर से दौड़ता हुआ आया, झट से हाथ के बल उछला। वापस सीधा हुआ। एक पैर पर खड़ा हो गया, “इस तरह तुम भी इसे कर सकते हो।”

देवांश का एक पैर डोरी से बना हुआ था। वह एक लंगड़े छात्र के नाटक का अभिनव कर रहा था। मगर वह एक पैर पर ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा था। अभिनव करना तो दूर की बात थी।

तभी वहां योगेश सर आ गए। तब राजू ने उनसे कहा, “सरजी, देवांश की जगह यह नाटक मैं भी कर सकता हूं।”

“हां, कर तो सकते हो,” योगेश सर ने कहा, “इससे बेहतर भी कर सकते हो। मगर उसमें वह बात नहीं होगी, जिसे देवांश करेगा। इसके दोनों पैर हैं। यह इस तरह का अभिनव करें तो बात बन सकती है। फिर देवास ने चुनौती स्वीकार की है। यह करके बताएगा।”

यह कहते हुए योगेश सर ने देवांश की ओर आंख ऊंचका कर कर पूछा, “क्यों सही है ना?”

“हां सरजी, मैं करके रहूंगा,” देवांश ने कहा और राजू की मदद से अभ्यास करने लगा।

राजू का पूरा नाम राजेंद्र प्रसाद था। सभी उसे राजू कह कर बुलाते थे। बचपन में पोलियो की वजह से उसका एक पैर खराब हो गया था। तब से वह एक पैर से ही चल रहा था।

वह पढ़ाई में बहुत होशियार था। हमेशा कक्षा में प्रथम आता था। सभी मित्रों की मदद करना, उन्हें सवाल हल करवाना और उनकी कॉपी में प्रश्नोत्तर लिखना उसका पसंदीदा शौक था।

उसके इसी स्वभाव की वजह से उसने देवांश की भरपूर मदद की। उसे खूब अभ्यास करवाया। नई-नई तरकीब सिखाई। इस कारण जब वार्षिक उत्सव हुआ तो देवांश का लंगड़े लड़के वाला नाटक सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसनीय और उम्दा रहा।

देवांश का नाटक प्रथम आया था। जब उसे पुरस्कार दिया जाने लगा तो उसने मंचन अतिथियों से कहा, “आदरणीय महोदय! मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूं।”

“क्यों नहीं?” मंच पर पुरस्कार देने के लिए खड़े अतिथियों में से एक ने कहा, “आप जैसे प्रतिभाशाली छात्र की इच्छा पूरी करके हमें बड़ी खुशी होगी। कहिए क्या कहना है?” उन्होंने देवांश से पूछा।

तब देवांश ने कहा, “आपको यह जानकर खुशी होगी कि मैं इस नाटक में जो जीवंत अभिनव कर पाया हूं वह मेरे मित्र राजू की वजह से ही संभव हुआ है।”

यह कहते ही हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। देवांश ने कहना जारी रखा, “महोदय, मैं चाहता हूं कि आपके साथ-साथ मैं इस पुरस्कार को राजू के हाथों से प्राप्त करुं। यही मेरी इच्छा है।”

इसमें मुख्य अतिथि को भला क्या आपत्ति हो सकती थी। यह सुनकर वह भावविभोर हो गए, “क्यों नहीं। जिसका मित्र इतना हुनरबंद हो उसके हाथों दिया गया पुरस्कार किसी परितोषिक से कम नहीं होता है,” यह कहते हुए अतिथियों ने ताली बजा दी।

“कौन कहता है प्रतिभा पैदा नहीं होती। उन्हें तराशने वाला चाहिए,” भाव विह्वल होते हुए अतिथियों ने कहा, “हमें गर्व है कि हम आज ऐसे विद्यालय और छात्रों के बीच खड़े हैं जिनमें परस्पर सौहार्द, सहिष्णुता, सहृदयता,सहयोग और समन्वय का संचार एक नदी की तरह बहता है।”

तभी राजू अपने लकड़ी के सहारे के साथ चलता हुआ मंच पर उपस्थित हो गया।

अतिथियों ने राजू के हाथों देवांश को पुरस्कार दिया तो देवांश की आंख में आंसू आ गए। उसने राजू को गले लगा कर कहा, “दोस्त! मुझे माफ कर देना।”

“अरे! दोस्ती में कैसी माफी,” कहते हुए राजू ने देवांश के आंसू पूछते हुए कहा, “दोस्ती में तो सब चलता है।”

तभी मंच पर प्राचार्य महोदय आ गए। उन्होंने माइक संभालते हुए कहा, “आज हमारे विद्यालय के लिए गर्व का दिन है। इस दिन हमारे विद्यालय के छात्रों में एक से एक शानदार प्रस्तुति दी है। यह सब आप सभी छात्रों की मेहनत और शिक्षकों परिश्रम का परिणाम है कि हम इतना बेहतरीन कार्यक्रम दे पाए।”

प्राचार्य महोदय ने यह कहते हुए बताया, “और सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि राजू के लिए जयपुर पैर की व्यवस्था हमारे एक अतिथि महोदय द्वारा गुप्त रूप से की गई है। अब राजू भी उस पैर के सहारे आप लोगों की तरह समान्य रूप से चल पाएगा।” यह कहते हुए प्राचार्य महोदय ने जोरदार ताली बजा दी।

पूरा हाल भी तालियों की हर्ष ध्वनि से गूंज उठा। जिसमें राजू का हर्ष-उल्लास दूना हो गया। आज उसका एक अनजाना सपना पूरा हो चुका था।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

02-02-2022

संपर्क – पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्रश्नपत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्रश्नपत्र ? ?

बारिश मूसलाधार है। ….हो सकता है कि इलाके की बिजली गुल हो जाए। ….हो सकता है कि सुबह तक हर रास्ते पर पानी लबालब भर जाए। ….हो सकता है कि कल की परीक्षा रद्द हो जाए।…आशंका और संभावना समानांतर चलती रहीं।

अगली सुबह आकाश निरभ्र था और वातावरण सुहाना। प्रश्नपत्र देखने के बाद आशंकाओं पर काम करने वालों की निब सूख चली थी पर संभावनाओं को जीने वालों की कलम पूरी रफ़्तार से दौड़ रही थी।

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – 35 – प्लास्टिक के फूल…  ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – प्लास्टिक के फूल ।)

☆ लघुकथा # 35 – प्लास्टिक के फूल ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

अरे! भाग्यवान सावन त्योहार आया है और राखी का त्योहार है। खरीदारी करने मार्केट नहीं जा रही हो?

नहीं इस बार मैंने रवि और बहू को कह दिया है वे ऑनलाइन ही मेरे भाई को राखी भेज देगी। आजकल राखी के साथ मिठाई टॉफी पर काफी सामान ऑनलाइन मिल जाते हैं और खरीदने और भेजना में कोई परेशानी नहीं होती?

मार्केट की भीड़भाड़ से भी बच जाते हैं।

अरे भाग्यवान! जो सामान खुद जाकर खरीदने में मजा है वह यह ऑनलाइन में कहां है?

कोई नहीं, मैं तो अपनी बहन के घर जा रहा हूं और उसके हाथ की मिठाई खाऊॅंगा। दीदी खुद हाथ से राखी बांधती है और मेरे लिए रूमाल पूरे दो दर्जन मुझे साल भर के लिए देती है। साथ ही मुझे टॉवल भी देती है।

तुम्हें प्लास्टिक की दुनिया मुबारक हो? तुम प्लास्टिक के फूल की तरह हो गई हो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – राज – भोग – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे। आज प्रस्तुत है  मारीशस में गरीब परिवार  में बेटी की शादी और सामजिक विडम्बनाओं पर आधारित लघुकथा “राज – भोग”।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी ☆ — राज – भोग — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

कहा जाता है पुराने ज़माने में राज्य संचालन के नाम पर राजाओं के कानों में उल्टे – सीधे मंत्र फूँकने के लिए उनके नौ रत्न होते थे। यह सच हो तो इतनों के ही पेट भरने की खातिर राजाओं को न जाने कितने गरीबों के पेट में लात मारने के लिए सिपाहियों को दौड़ाना पड़ता होगा। गरीब रो – रो कर जब कहे मेरे पेट में लात न मारो तो उनसे कहा जाता होगा लात न मारें तो नौ रत्नों को क्या घास खिला कर चिकन – चाकन मुस्टंडा बनाएँगे। अत: हर हालत में तुम लोग लात खाओ और प्रार्थना में दिल खोल कर कहो उन मुस्टंडों का पेट इतना भर जाए कि भविष्य के लिए भी उन के काम आ सके। उनके लिए यहाँ जो प्रार्थना करो तुम्हारे मरने पर वह प्रार्थना तुम्हारे साथ जाए। भगवान से कहना एक विशेष कारण से प्रार्थना साथ ले कर आए हो। भगवन, अगला जन्म दो तो यह प्रार्थना हमारे साथ ही धरती पर जाए। इस प्रार्थना का मर्म यह है प्रभु, वे जो ‘नौ रत्न’ नाम से जाने जाते हैं उनका स्वास्थ्य इसी तरह अजर अमर हो तभी तो वे अपने सत्ता भोगी राजा के यहाँ नौ रत्न का सुख भोग कर सकेंगे।

यह जिस राजा की कहानी लिखी जा रही है वह निराला राजा था। वह चाहे नौ रानियाँ नहीं रखता, लेकिन रखता तो अठारह रत्न अवश्य रखता। उसने जैसा सोचा वैसा किया। उसने अपने निरालेपन की जय के लिए अठारह रत्न रख कर गरीबों के पेट में दोहरी लात मरवायी। इन अठारह रत्नों के कारनामे तो और निराले हुए। सभी अपनी – अपनी परिभाषा की एक – एक कहानी थे। अठारह रत्नों में जो अंतिम था वह अंधा था। क्रम में जो पहला था वह बहरा था। बाकी जो सोलह रत्न थे वे जब असेंबली में प्रवेश करते थे तो उनका आतिथ्य बहरा करता था और निकलते वक्त अंधा उन्हें रास्ता दिखाता था। इन अठारह रत्नों की बदौलत राजा ने आजीवन राज किया। इस पर एक महाकाव्य लिखा गया है। पर उसका दाम लाखों रूपए है। हमारे वर्तमान में जो राजनेता इस तरह का राजा बनने का शौक रखता है अपने ज्ञान वर्द्धन के लिए जन – कोष से वह महाकाव्य ज़रूर खरीदता है।

© श्री रामदेव धुरंधर

04 / 08 / 2017

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – 34 – अनमोल यादें…  ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अनमोल यादें ।)

☆ लघुकथा # 34 – अनमोल यादें ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

जब तुम्हारे पास कुछ काम नहीं रहता तो अलमारी को खोल कर अपनी साड़ियों देखती हो और उन्हें पहनती भी हो बच्चों की तरह अपने पूरे गहने भी पहन कर देखती हो?

बाहर नहीं जाती लेकिन घर में तुम इतना तैयार होती हो ऐसा क्यों? बाहर भी पहन कर जाया करो?

ओ मेरे स्वामी! प्यारे पतिदेव रवि आप हम नारी के मन की वेदना को समझ नहीं पाओगे?

यह बातें मुझे भी अब इस बुढ़ापे की उम्र में समझ में आ रही है। बाहर सब लोग मुझे देखकर हसेंगे ।

 इस उम्र में भी देखो बुड्ढी को ! कितना श्रृंगार किया है?

 जेवर और साड़ी के साथ मायके की याद जुड़ी है।

 हमारे मां पिताजी हमारे साथ न रहकर भी साथ है। ये भले किसी काम के जेवर तुम्हें नहीं लगते हैं, पर यह सब मेरे लिए अनमोल यादें है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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