हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆ लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “आत्ममुग्ध“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆

✍ लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते  एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है,  क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।

सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए।  न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में  शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , “हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर” और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।

ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी  बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे।  उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०० – नई ऊर्जा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नई ऊर्जा।)

☆ लघुकथा # १०० – नई ऊर्जा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सीता जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ा रही थी मंदिर की ओर तभी उसके मन में ख्याल आता है कि एक बार अपनी पूजा की थाली को देख लूं सब सामान बराबर रखी हूँ।

अरे! भगवान मुझसे गलती हो गई फूल रखना भूल गई?

वह सोचने लगती है। भगवान को जल चढ़ाऊंगी अक्षत चढ़ाऊंगी टीका लगाऊंगी आरती भी करूंगी पर फूल नहीं, तो अच्छा नहीं लगेगा तभी अचानक उसे सामने एक फूल वाला बैठे दिखता है।

“भैया फूल ₹5 के दे दो?”

“मेरा नाम मोहन है, मैं कोई भैया दूध वाला नहीं हूं?”

सीता ने गुस्से में कहा- “ओ मोहन ₹5 के फूल दे दो?”

मोहन ने कहा- “₹5 के फूल नहीं मिलेंगे?”

सीता ने कहा- “अरे! मुझे दो-चार फूल ही चाहिए है? कोई बात नहीं ₹10 के दे दो?”

मोहन सभी फूलों को एक कागज में रखता है।

सीता ने कहा- “ये लाल गुड़हल के २ फूल दो न? गौरी माता को जोड़ा फूल चढ़ाने की मन में इच्छा है।”

मोहन ने कहा – “मैडम यह फूल तो ₹5 का एक मिलता है एक फूल आपको दे रहा हूँ।”

सीता ने कहा – “फूल बेचने बैठे हो या सोना बेच रहे हो। अच्छा सुबह-सुबह मेरा दिमाग मत खराब करो,मुझे पूजा करना है।”

सीता मंदिर में प्रवेश करती है और भगवान शिव की पूजा करती है उन्हें फूल चढ़ाती  है और सामने जब माँ गौरी के चरणों में जल चढ़ाती है और सिंदूर चढ़ाने के बाद जब वह फूल चढ़ाने लगती है तो देखी है कि उसके हाथ में दो फूल आ जाते हैं उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वह मां को श्रद्धापूर्वक नमन करती है और आरती पूजा करती है।

 मंदिर में भगवान के सामने बैठकर वह सोचती है, भगवान से जो मांगो वह मिलता है माता तुम तो सब जानती हो जिस तरह दो फूल दिए हैं। इस तरह मेरी गोद भी भर देना।

दुनिया के तानों से अब मेरा मन भर गया है और सीता के मन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ – ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ ☆

🌻लघु कथा🌻ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड 🌻

सभी कहते हैं सोशल मीडिया ने रिश्ता तो खतम ही कर दिया अब तो भगवान भी दिन भर छाये रहते हैं।

पोस्टर बना बना भेज दिये। अब डिलीट करने वाला मोबाइल को सिर माथे लगा रट सपाट सभी ऊँगलियाँ चला डिलीट करते चलते हैं।

भला हो उस मेसेज का अभी कुछ दिनों से बंद है – – 👉 ये मेसेज दस लोगों को भेजों नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।

बात करते हैं शादी ब्याह के सुंदर- सुंदर कार्डों का। किटी आयोजन में भरपूर उपयोगिता 😊

अपने दादा जी के साथ चाचा का कार्ड बाँटते बच्चा बड़ा खुश हो रहा था। घर आते ही कहने लगा इसमें मेरा नाम लिखा है आंटी पढिये।

यहाँ से वहाँ तक पूरा कार्ड अंग्रेजी के अक्षरों से भरा। हमें तो अंग्रेजी आती नहीं है।

भोले पन से बच्चे ने हिन्दी पर लिखें अक्षरों को दिखाते कहा – – ये है न हिन्दी आप पढ़ लिजियेगा।

और धीरे से कान के पास आकर बोला–गणपति बप्पा को भी अंग्रेजी कहाँ आती है। इसलिये उनका नाम बस हिन्दी में लिखा गया है।

सौ टके की बात कहते मासूम से बच्चे की मासूमियत पर ह्रदय सोचने पर मजबूर हो गया।

पूरे कार्ड में गणपति वंदन हिन्दी में लिख कर बाकी पढ़ने वाले भी उसी दो लाईन को पढते है बाकी तो इधर की जुबानी कुछ उधर की जुबानी।

हाँ कार्ड मिल गया।

ढेरों बधाईयाँ 💐💐

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९२ – कारा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कारा…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९२ कारा  ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

दोनों कहते थे पिंजड़े में बंद उनका तोता उनके प्रेम का साक्षी है। तोते को दिखा कर वे हाथ पर हाथ रखते और कभी एक दूसरे को चूम लेते थे। तोता पिंजड़े में जैसे उनका यह प्रेम देख कर नाचने लगता था। आवाज़ तो वह खूब लगाता था। पर तोता एक दिन पिंजड़ा तोड़ कर उड़ गया। दोनों समझ रहे थे तोता उनके प्रेम का मोहताज नहीं था। वह भी एक जीव है। उसका अपना प्रेम कहीं और है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

26 — 01 — 2026 

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।

वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।

अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!

ये कैसे संजय हैं?

ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – नेम प्लेट… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नेम प्लेट

? लघुकथा – नेम प्लेट ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

रात के खाने के बाद घर के सभी सदस्य इकट्ठे बैठे. पति, पत्नी, बेटा, बेटी और दूर कोने में कुर्सी पर बैठी उदासीन, स्वयं को उपेक्षित मानती मां. नया घर पूरा बन चुका था और अब उसके नाम के बारे में चर्चा चल रही थी.

“आशियाना” नाम कैसा रहेगा? बेटी उत्साह से बोली.

“कोई नया नाम सुझाओ… वैसे “ उपवन “ कैसा रहेगा..? बेटा उत्साह से बोला.

“अच्छा, “ हार्मनी “ या “ हरसिंगार “ कैसा रहेगा…? पत्नी ने अपनी राय रखी.

“दोनों अच्छे हैं. लेकिन मैं सोच रहा हूं पिताजी के नाम पर अगर” घनश्याम कृपा” रखा जाए तो कैसा रहेगा..? पति ने भी अपना सुझाव दिया.

सर्वसम्मति से इस नाम को स्वीकृति दे दी गई.

पति के जाने के बाद मां धीरे-धीरे स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं थीं जैसा अक्सर होता है. आजकल तो वे डाइनिंग रूम के कोने में कुर्सी पर बैठी रहतीं और वहीं पर खाना मांग लेती. शेष समय तो अपने कमरे में ही पड़ी रहतीं. बहू बेटे ने उन्हें कितनी ही बार समझाया कि शाम के वक्त आप सोसायटी में जहां बुजुर्ग बैठकर बतियाते, हंसते, गपशप, मनोरंजन करते हैं उनके पास जाकर बैठ जाया करें. आपका भी दिल बहल जाया करेगा लेकिन वह इस बात को मानने को तैयार ही नहीं थीं. उन्हें लगता उनसे दो घड़ी बातें करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं था. सभी अपने अपने कार्यों में उलझे रहते हैं. कितनी ही बार पति की फोटो देखकर शिकायत करने लगतीं-“ मुझे बीच मँझधार में छोड़कर आप तो चले गए. कितनी अकेली रह गई हूं मैं आपके बिना… किसी को फुर्सत नहीं मेरे पास बैठने की, बातें करने की… ”

नेम प्लेट बनकर आ गई. काले रंग पर सुनहरे अक्षरों से “घनश्याम- रमा कृपा“ के चारों तरफ बेल बूटों से बनी हुई अत्यंत आकर्षक और सुंदर नेम प्लेट देखकर घर के सभी सदस्य चहक उठे.

सबके देख चुकने के बाद नेम प्लेट को लेकर पोती दादी के पास गई और बोली – “ देखो दादी अपने नए घर की नेम प्लेट, दादू और आपके नाम पर. है न सरप्राइज़… “

मां ने नेम प्लेट हाथ में ली एकटक उसे निहारती रहीं. फिर ना जाने क्या हुआ कि उसे आंखों से लगाकर लगातार चूमने लगीं. उनकी आंखों से निरंतर आंसुओं की झड़ी लग गई जिसमें बच्चों के प्रति उनके मन में जबरन पनपते उपेक्षा, अनगिनत शिकायतों, तिरस्कार के भाव धुलने लगे थे. आंखों में छाई धुंध भी छंटने लगी थी.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आग ? ?

दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।

बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।

वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।

लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।

वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९८ ☆ लघुकथा – “जानूमेट” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९८ ☆

?  आलेख – लघुकथा – जानूमेट ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

करीने से सजे ड्राइंग रूम के एक कोने पर अपनी राकिंग चेयर पर आगे पीछे डोलते हुए राजन एल्बम के पन्ने पलटते और खुद ही मुस्कराने लगते ।

तभी जुनू आई और इस तरह उन्हें मुस्कुराते देख बोलीं, क्या हुआ जानू, राजन बोले आई लव यू।

पिछले पैंतीस सालों के वैवाहिक जीवन में यह वाक्य हजारों बार जुनू और उनके जानू राजन के बीच संवाद, समझ, और प्यार व्यक्त करता ही रहा है।

नाश्ते के पहले अपनी दवा निकालते हुए डिब्बे पर छपा नाम जानुमेट 500 देख रंजन हमेशा मुस्कुरा देता था। जानूमेट। जैसे डाक्टर ने बीमारी की दवा नहीं, रिश्ते का नाम दे दिया हो। जब पहली नार्मल चेकअप में उसका शुगर लेवल अधिक आया था, तो मन में डर था, भविष्य का, परहेज का ।

डॉक्टर ने सहज स्वर में कहा था हर भोजन के साथ एक जानूमेट500, जीवन भर।

जीवन भर शब्द ने राजन को भीतर तक हिला दिया था, लेकिन जानूमेट ने उसे थाम लिया।

अब दिन के खाने की शुरुआत घड़ी से नहीं, जानूमेट से होती थी। नाश्ते की प्लेट लगे या देर हो जाए, उसका ध्यान पहले छोटी सी इस गोली पर जाता। जेब में, पर्स में, दराज में, कार में, हर जगह उसकी मौजूदगी रहती। जैसे कोई प्रेमी बिना बोले याद दिलाता रहे कि लापरवाही मत करना। दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाए तो वह घबराता नहीं था, बस जेब टटोलता था। जानूमेट है न।

धीरे धीरे उसने देखा कि दवा ने उसके भीतर एक अनुशासन जगा दिया है। वह समय पर खाने लगा, पैदल घूमने जाने लगा, मीठे से दूरी रखने लगा। हर तीन महीने में जांच करवाना अब मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बन गई थी। रिपोर्ट आते ही वह पहले खुद को देखता, फिर जानूमेट के डिब्बे को। जैसे कह रहा हो देखा, तुम्हारा साथ ।

कभी कभी उसे लगता यह गोली उससे ज्यादा फिक्र करती है उसकी। जब वह थक कर सब कुछ भूल जाना चाहता, तब जानूमेट उसे रोक लेती। जब वह कहता एक दिन न लेने से क्या होगा, तब जानूमेट चुपचाप आईने में उसका भविष्य दिखा देती। कोई डांट नहीं, कोई शोर नहीं, बस खामोश मौजूदगी।

एक दिन उसकी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा, पापा ये जानूमेट क्या है। उसने हंसते हुए कहा, यह मेरी जानू है। जो मुझे हर दिन याद दिलाती है कि खुद से प्यार कैसे किया जाता है। बेटी ने चौंक कर देखा, फिर समझ गई। उसने डिब्बे को आदर से उठाया, जैसे परिवार का कोई सदस्य हो।

शुगर की बीमारी ने उसे जो सिखाया, वह किसी प्रवचन में नहीं था। जीवन की देखभाल भी एक प्रेम है, बस उसमें, नियमित जांच होती है। जानूमेट ने उसे यह प्रेम करना सिखा दिया था। बिना शिकायत, बिना शर्त, हर भोजन के साथ। अपनी जिंदगी में जुनू और जानूमेट के अनुप्रास पर वह बरबस एक बार फिर मुस्करा पड़ा ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “स्वाभिमान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सुबह सवेरे अखबार बांटने जब एक छोटा सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढ़ते लिखते क्यों नहीं? या पापा पढ़ाते क्यों नहीं? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में आता है?

एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर जाने लगा तब मैंने रोक कर पूछा -रुकना, ऐ लड़के।

-कहिए।

-क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते?

-जाता हूं और नौवीं में पढ़ता हूं।

-फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं?

-पापा बीमार हैं और मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।

-कल सुबह मैं तुम्हें कुछ नोट बुक्स देना चाहता हूं।

-क्यों? मैं खुद कापियां किताबें ले सकता हूं , सर। जो नहीं ले सकते उन्हें दीजिए न।

इतना कह कर उसने साइकिल के पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४२ – लघुकथा – ए.सी. बस ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४२ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ ए.सी. बस ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

शिशिर अपने कड़ाके भरी क्रूर शीतलहर के माध्यम से सबको अपने आगोश में लेने की पूरी कोशिश में लग गया था। सूर्य की किरणें डर कर न जाने कहां छुप गयीं थीं। शीतलहर की क्रूरता की स्थिति यह थी कि वह शरीर के मांस, मज्जा क्या हड्डियों के भीतर तक घुस कर जान खींचने को तैयार था। बुढ़ापे की ओर बढ़ चली रंजू की माँ बिस्तर से उठने की लगातार कोशिश कर रहीं थी,लेकिन उनके पैर के घुटने उन्हें उठने से बुरी तरह रोक रहे थे। वहीं छोटी बेटी रंजू को प्रत्येक दिन घर का खाना नाश्ता बनाकर हर हाल में प्रातः आठ बजे कोचिंग जाने के लिए निकलना ही होता था।

आखिरकार रंजू शहीद पथ पुल के नीचे साऊथ सिटी बस स्टॉप पर पहुंच गयी थी। कंधे से लटका स्कूल बैग, शरीर पर एक पतले से स्वेटर के अलावा और कुछ भी नहीं था। कई ऑटो वाले आए और चले गए लेकिन रंजू इतना हिम्मत नहीं जुटा सकी कि वह उन ऑटो में बैठ सके। कारण यह नहीं था कि उसका किराया ₹15 था। ट्रांसपोर्ट नगर तक का सिटी बस का किराया भी ₹11 /- था। जिसे देकर रंजू किसी तरह से अपने महीने के हिसाब किताब में जोड़कर चल सकती थी। कारण यह था कि शरीर को कंपा देने वाले जाड़े से बचने के लिए बस ही एक अच्छा साधन था। ऐसी ठण्ड में खुली ऑटो में चलना किसी बड़ी मुसीबत से कम नही था। एक के बाद एक- दो इलेक्ट्रिक ए.सी. बस आयीं और चली गई,लेकिन बेचारी रंजू यह हिम्मत नहीं जुटा पायी कि वह उन ऐसी बसो में बैठकर चली जाए। कारण वही जो उनका किराया साउथ सिटी से ट्रांसपोर्ट नगर ₹20/- था।

अचानक तीसरी एसी बस आयी और रुकी। तेज ठंडी हवाओं से दो चार हाथ कर रही रंजू ने अपने पांव बस की तरफ बढ़ाये लेकिन गरीबी ने फिर उसके पैरों को पीछे खींच लिया। सवाल ₹9/- बढ़ाने का था। लेकिन आज इस बार का दृश्य कुछ बदला सा था।

बस के कंडक्टर ने कहा बिटिया क्यों रुक गई, आओ बस में बैठ जाओ।

नहीं भैया, ! हम ₹20 /-नहीं दे सकते। ₹20/- हम गरीब घरों के स्टूडेंट की क्षमता के बाहर है।

अरे बिटिया ₹ 20 /- नहीं, ₹15 /- तो दे सकती हो न.. कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।

हां भैया..मैं ₹15 दे सकती हूं लेकिन आप ₹15 /-में तो नही ले जा सकते ..रंजू ने कहा।

आओ.. आओ जल्दी करो बैठ जाओ। हम ₹15 में तुझे ले जाएंगे और टिकट भी देंगे। बिटिया! अब ए.सी. (इलेक्ट्रीक) बस के किराए को सरकार ने ₹20 से घटकर ₹15 कर दिए है। अब तो इस रूट पर जनरल बसें चलती भी नहीं है। रंजू के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई और वह जाकर एसी बस में बैठ गयी।

रंजू आज बहुत खुश थी। आज वह पहली बार स्कूल जाने के लिए ए.सी. बस में बैठी थी।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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