(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ व्यंग्य # १६० ☆ देश-परदेश – Health Talk Show ☆ श्री राकेश कुमार ☆
उपरोक्त विज्ञापन देखकर दिल में विचार आया कि डॉ नरेश त्रेहान ना सिर्फ देश के वरन पूरे विश्व में कुछ चुनिंदा चिकित्सकों में से एक है, क्यों ना इनको रूबरू सुना जाय।
घर से चलते चलते वार्ता स्थल की जानकारी ले रहे थे, तभी इस विज्ञापन के ऊपरी भाग पर नज़र पड़ गईं। कार्यक्रम के एक प्रायोजक रजनीगंधा पान मसाला बनाने वाले भी हैं।
हमें ऐसा लगा, वहां जाकर पहले रजनीगंधा पान मसाले का सेवन करना पड़ेगा, उसके बाद ही डॉ साहब अपना ज्ञान हम सबको बताएंगें। जब कार्यक्रम का खर्च रजनीगंधा पान मसाला के निर्माता ही कर रहें है, तो वो अवश्य चाहेंगे कि वहां बैठे सभी श्रोता पान मसाला अवश्य खाएं, ताकि आने वाले समय में उनकी बिक्री में वृद्धि हो।
डॉ त्रेहान जैसी शख्सियत विज्ञान के साथ योग की बात भी खूब करते हैं। पान मसाले का बैनर उनके पीछे लगा होगा तो लोग अवश्य ही पान मसाले की और आकर्षित होंगे।
विश्व प्रसिद्ध हस्ती, स्वास्थ्य के प्रति इतने घटिया उत्पादों के साये में हमें क्या ही ज्ञान देगी। हमने अपना इरादा बदला और अपना देसी गुड़ाखू मुंह में दबा कर मोबाइल पर तन्मयता से ये सब लिख रहें हैं।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘माले मुफ्त, दिले बेरहम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१७ ☆
☆ व्यंग्य ☆ माले मुफ्त, दिले बेरहम ☆
टीवी में समाचार देखा कि 25 दिसंबर को लखनऊ में प्रेरणा-स्थल में जो तीन मूर्तियों के अनावरण का कार्यक्रम हुआ उसके बाद पुष्प-प्रेमी लोग वहां सजावट के लिए रखे गये तीन चार हजार गमले उठा ले गये। इनमें कोई वर्ग-भेद नहीं था। कार वाले, संपन्न, भी थे और स्कूटर वाले भी। पुरुष भी थे और स्त्रियां भी। पता चला कि हम नारी- सशक्तीकरण के मामले में कितना आगे बढ़ गये हैं। भरोसा हो गया कि भारतीय नारी अब हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। यह भी पता चला कि लोगों ने प्रेरणा-स्थल से क्या प्रेरणा ली।
हमारे देश में पुष्प-प्रेम जगजाहिर है। अनेक पुष्प-प्रेमी मुंह-अंधेरे ‘लग्गी’ लेकर निकलते हैं और फूल उगाने वाले हर मूर्ख गृहस्वामी की चारदीवारी के ऊपर से फूल खींचकर पॉलिथीन में डालते चलते हैं। कोई गृहस्वामी पीछे से गाली दे तो उसे भी शांत भाव से झेल लेते हैं। ‘तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे कांटों से भी प्यार’ वाले उसूल पर चलते हैं। कई बार लग्गी से फूल खींचने के चक्कर में डाल ही टूट जाती है। पुष्प-प्रेमियों से यह सुना कि चोरी के फूल चढ़ाने से देवता अधिक प्रसन्न होते हैं। वैसे कई पुष्प-संग्राहकों को देखकर समझना मुश्किल होता है कि वे किस लिए फूल तोड़ते हैं क्योंकि उन्हें देखकर लगता नहीं कि वे रोज़ नहाते होंगे।
हाल ही में बागेश्वर वाले बाबा की यात्रा में भी बड़ी गड़बड़ी हो गयी। बाबा ने रास्ते में सोने के लिए 10-15 हजार रुपये के गद्दे-कंबल भक्तों को दिये, लेकिन भक्त इन्हें लेकर अपने घर चले गये। बाबा सोशल मीडिया पर भक्तों से अपील करते दिखे कि उन्होंने उधार लेकर गद्दों-कंबलों का इंतज़ाम किया था, अतः कृपा करके उन्हें लौटा दें। यानी लोग धर्म के आयोजन में भी पलीता लगाने से बाज़ नहीं आते। अब ये भक्त अपने घर में बाबा के गद्दा-कंबल में गर्म हो रहे होंगे और बाबा की जय जयकार कर रहे होंगे।
कभी रास्ते में माल ले कर जाने वाला कोई वाहन पलट जाए तो लोग मदद करने के बजाय माल को लूटना शुरू कर देते हैं। अगर गाड़ी में दारू की बोतलें हुईं तो लूटने वालों की मौज हो जाती है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री और श्रीलंका के राष्ट्रपति के देश छोड़कर भागने के समय भी उनके आवास में जमकर लूट-मार हुई थी। लोगों ने हसीना बेगम की साड़ियों और अंतर्वस्त्रों को भी नहीं छोड़ा था।
साहित्य में भी चोरी की बीमारी जब- तब पकड़ में आती रहती है। कई साल पहले एक ऐसे ही लेखक प्रकाश में आये थे जो दूसरों की रचनाओं पर अपना नाम चेंप कर पत्रिकाओं को भेज देते थे। जब वे पकड़े गये तो उन्होंने मासूमियत भरा बहाना बनाया कि उनकी पत्नी गलती से उनका नाम लिखकर रचनाएं भेज देती थी। वीर पुरुष गलती पकड़े जाने पर ऐसे ही बेचारी पत्नियों को ढाल बनाते रहे हैं। नतीजतन पतिदेव की लेखक बनने की आकांक्षा की भ्रूणहत्या हो गयी।
दरअसल चोरी की आदत एक बीमारी जैसी होती है जिसका विपन्नता से कोई लेना-देना नहीं है। इसे ‘क्लैप्टोमैनिया’ कहा जाता है। विदेश में बड़ी-बड़ी संपन्न अभिनेत्रियां दुकानों से सामान चोरी करते पकड़ी गयीं। हमारे देश में भी इस रोग के सबूत मिलते रहते हैं। मुफ्त की चीज़ आदमी को हमेशा लुभाती है, भले ही उसकी कीमत कुछ न हो।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७६ – व्यंग्य – जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
बृजमोहन लाल की कुर्सी बहुत पुरानी थी। इतनी पुरानी कि उस पर बैठते ही आदमी इतिहास में चला जाता था। कुर्सी जानती थी कि उस पर कौन क्यों बैठा है। बृजमोहन लाल कहते थे—“मैं जनहित में बैठा हूँ।”
जनहित को कभी बैठने का मौका नहीं मिला।
वे जब भी उठते, कुर्सी को देखकर कहते—“बस पाँच मिनट।”
पाँच मिनट वर्षों में बदल जाते। कुर्सी उनके शरीर की तरह थी—अगर अलग कर दी जाए तो पहचान खत्म हो जाए। लोग उन्हें आदमी नहीं, पद के नाम से जानते थे।
एक दिन सरकार ने आदेश निकाला—
“अब कुर्सियाँ बदली जाएँगी।”
बृजमोहन लाल परेशान हो गए। उन्होंने जनहित का हवाला दिया। बोले—
“अचानक बदलाव से व्यवस्था चरमरा जाएगी।”
व्यवस्था ने सिर हिलाया—वह पहले से चरमराई हुई थी।
बृजमोहन लाल ने तुरंत एक जनहित याचिका दायर की—
“जनहित बनाम कुर्सी परिवर्तन”
अदालत गंभीर हो गई। मामला बड़ा था। कुर्सी बीच में थी।
सुनवाई के दौरान बृजमोहन लाल बोले—
“मैं इस कुर्सी पर नहीं, इस कुर्सी के लिए बैठा हूँ।”
कुर्सी भावुक हो गई।
जनता भ्रमित।
मीडिया ने हेडलाइन चलाई—
“ईमानदार अफ़सर का संघर्ष”
संघर्ष किससे था, यह स्पष्ट नहीं किया गया।
कुछ महीने बीत गए। आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।
बृजमोहन लाल की कुर्सी और चमकने लगी। अब उस पर गद्दी लग गई थी—जनहित की।
हाड़ कँपा देने वाली, कयामत की ठंड फिर भी निकिता को मुँह पर रजाई ओढ़कर सोना अच्छा नहीं लगता। दम घुटने जैसा एहसास होता है। ये क्या—जैसे ही भगवान का नाम लेकर निकिता ने आँखें बंद कीं सोने का प्रयास किया ,एक मच्छर होठों के ऊपर, ठीक नाक के नीचे काट गया।वह खुद ही भुनभुनाने लगी–इन मच्छरों को जरा भी तमीज नहीं। काटने का सलीका तो सीख लेते। ठीक है कि”खून पीना तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”
खून ही पीना है तो चुपचाप पियो ना। तबला पेटी लेकर क्यों चले आते हो। उस पर भूँssssभूँ ssssगीत गाने की जरूरत क्या है।
पर नहीं, हम डंके की चोट पर पिएंगे—ढोल नगाड़े बजाकर पिएंगे। बिना ढोल नगाड़े बजाए, ताकत का लोहा कौन मानता है।डरता है कौन !
है कोई माई का लाल- जो हमारा कुछ बिगाड़ सके। बाल भी बाँका कर सके। पता चला कि उस मच्छर की सियासी हल्के में भारी दखल है। और वह “किम जोंग” प्रजाति का मच्छर है। जिनपिंग कबीले के मच्छरों से गाढ़ी दोस्ती है उसकी। तभी तो मगरा रहा है ।
ऐसे में नींद आने से रही। निकिता के भीतर का खोजी पत्रकार जाग्रत हो उठा। उसने गूगल सर्च किया तो पता चला कि वे फीमेल को इम्प्रेस करने के लिये गाते हैं। तो भाई मच्छर -जाओ ना ! जाकर अपनी मच्छरानी को रिझाओ ना गाकर। हमारी नींद में खलल क्यों डालते हो।
एक तो अपनी लंबूतरी नोंक से खून चूसते हो—-ऊपर से गीत संगीत का सहारा लेते हो।
असित बोले डार्लिंग–अपनी सहनशीलता बढ़ाओ। वैसे भी तुम कछुआ छाप क्वाइल, अगरबत्ती,लिक्विड सभी कुछ आजमा चुकी हो। कुछ बिगड़ा मच्छरों का। सब कुछ पचा गये। इनका इम्यून सिस्टम बड़ा तगड़ा है। ठीक वैसे ही जैसे जनता की सारी शिकायतों का नेता पर कोई असर नहीं होता। अब तुम रैकेट ले आओ, थोड़ी थोड़ी देर में घुमाती रहो। पहले भूँ भूँ सुनते थे अब तिड़ तिड़- तिड़ तिड़ सुनो। आत्मरक्षार्थ कोई न कोई उपाय तो करना पड़ेगा ना।
रही आवाज़ की बात तो तुम चाहो न चाहो सुनना तो पड़ेगा कितनी ही भौंडी, बेसुरी,खरखरी, कर्णकर्कश क्यों न हो। हमारे पास चुनाव की सुविधा कहाँ, जो मनपसंद आवाज़ का चयन कर सकें।
निकिता बोली असित तुम बात को कहां से कहां तक ले गये। टी वी चैनल ज्यादा न देखा करो। भक्तिभाव में लीन लोगों की संगत न किया करो।
तुम्हें पता है मुझे डेंगू से बड़ा डर लगता है। जानते हो कार्पोरेशन वालों ने क्या कहा–घर के बाहर रखे जलपात्रों में “गप्पी मछली”डालने का सुझाव दिया है। अब गप्पी मछली लाये कहां से ?
उन्हें पता है जब केवल शब्दों के जमाखर्च से काम चल जाता है तो खाली पीली मशक्कत कौन करे! घर घर गप्पी पहुँचाए कौन ? सुनते हैं अब लेडी मच्छर भी प्रतिशोध की मुद्रा में हैं। उनको अंडरएस्टीमेट करना भी ठीक नहीं।
अब बस भी करो निकिता- मच्छर पुराण खत्म करो। सो भी जाओ। जानती हो ना मच्छर हो या मच्छरानी, सियासी रंग में रंगकर एक रंग हो जाते हैं। ढंग एक हो जाते हैं।उनपर चढ़ने से रहा और दूसरा रंग।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘दो प्रेम-पत्र। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१६ ☆
☆ व्यंग्य ☆ दो प्रेम-पत्र ☆
प्राणप्यारे,
कल तुम्हें छोड़कर चली तो आयी लेकिन मुझे लगता है जैसे मेरा सब कुछ वहीं छूट गया। रास्ते में मेरी आंखें भर भर आती थीं, कुछ सूझता नहीं था। गुस्सा भी लगता था कि कहां से यह निगोड़ा पुन्नी का ब्याह आ पड़ा। यहां आकर जो मेरी दशा है सो मैं जानूं कि मेरा राम जाने। खाने पीने की इच्छा नहीं होती, किसी काम में मन नहीं लगता। दिल में टीस सी उठती है, सारा बदन जलता रहता है। प्यारे, लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में। दिन को आंखें मूंदे लेटी रहती हूं, रात को तारे गिना करती हूं। फिकर लगी रहती है तुम कैसे रहते हो, क्या खाते पीते हो, परेशान तो नहीं हो? बस प्यारे, मेरी यही प्रार्थना है कि तुम सब को छोड़कर आ जाओ।
तुम्हारी ही दुखिया
चुन्नी
जवाब
प्यारी चुन्नी,
अत्र कुशलं तत्रास्तु। तुम्हारी चिट्ठी कल मिली, पढ़ कर खुशी हुई। समाचार मालूम हुए। तुमने जो बातें लिखीं उनको पढ़कर चिन्ता होती है। तुमने जो लिखा है सो वह तुम्हारी भूल है। यहां तुम्हारा कोई भी जरूरी सामान नहीं छूटा। दोनों अटैची मैंने तुम्हारी सीट के नीचे रख दी थीं। कहीं रास्ते में किसी ने चुरा ली हों तो तुरंत लिखो जिससे मैं खोज करा सकूं। रास्ते में तुम्हारी आंख में कोयले की धूल चली गयी होगी, उसी की वजह से आंख में पानी आता रहा होगा। तुमसे कहा था कि खिड़की के पास मत बैठना लेकिन शायद तुम मानी नहीं। पुन्नी के ब्याह का जहां तक सवाल है तो उसमें गुस्सा करने का कोई मतलब नहीं। ब्याह जून में ही बनता था। पंडितों ने कहा था कि आगे साल भर तक कोई मुहूर्त नहीं निकलता। तुमने जो अपनी हालत लिखी सो बात ठीक नहीं। तुम फौरन किसी डाक्टर को दिखाओ। पैसे की फिकर मत करना, जो लग जाए सो लगा देना। यहां तो तुम बिल्कुल ठीक थीं, वहां क्या हो गया? लगता है ब्याह के घर में वनस्पति वगैरह ज्यादा खा गयीं। अम्मां से कहके तुम अपने खाने का इंतजाम अलग करवा लेना। ये उजड़े दयार में तुम कहां घूमती हो? घर के सामने तो कहीं उजाड़ है नहीं। लगता है तुम पीछे बगीचे में घूमती हो। उजड़े बगीचे में कहां मन लगेगा? घर में सबके साथ हंसा बोला करो तो मन लगे। तुम्हारे तारे गिनने की बात पढ़ कर हंसी आती है। पगली, तारे तो इतने सारे हैं, भला तुम उन्हें कहां गिन पाओगी? मेरा खाना पीना सब नट्टू के होटल में चलता है। पट्ठा बढ़िया कोरमा बनता है, तबियत खुश हो जाती है। मुझे कोई परेशानी नहीं है। तुमने जो मेरे आने की बात लिखी सो बहुत मुश्किल है। अभी बहुत सी जरूरी फाइलें निपटाने को हैं, भला उन्हें छोड़ कर कैसे आ जाऊं? खत का जवाब जल्दी देना। अम्मांजी बाबूजी को चरन छूना। टुल्लू ,मुंडू को प्यार।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत…” ।)
☆ शेष कुशल # ५८ ☆
☆ व्यंग्य – “वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत…”– शांतिलाल जैन ☆
9 नवंबर, 2025. जैन परिवार पूर्व और वर्तमान के सभी सरकारी कर्मचारियों,अधिकारियों का आभार व्यक्त करता है. काम के प्रति आपकी उदासीनता और बेरुखी के कारण हमारा परिवार देश के विकास के लिए, सरकारी खजाने में अत्यंत मामूली ही सही, योगदान दे तो पाया है. इसका पता भी हमें आज ही अख़बारों से चला जब सरकार ने संसद में बताया कि सरकारी दफ्तरों में चले सफ़ाई अभियान में रद्दी बेचकर सरकार को चार हज़ार पिच्चासी करोड़ रुपए मिले हैं. निश्चित ही इसमें वो फाईल भी रही होगी जिसमें दादाजी ने राशनकार्ड के लिए एप्लाय किया था और ताउम्र चक्कर काटने के बाद भी बन नहीं पाया था. उस मोटी सी पेंडिंग फाईल का डब्बा-बाटली वाले ने कम से कम एक रूपया तो दिया ही होगा. राष्ट्र के विकास में हमारे साधारण से मुफ़लिस परिवार से एक रूपए का योगदान भी कम नहीं होता श्रीमान्.
आप ही सोचिए, जो हमारे दादाजी ने उस समय राशन कार्ड बनवाने में टाईम वेस्ट नहीं किया होता तो आज ‘वेस्ट से वेल्थ’ कैसे बना पाती सरकार? फाईलों के पहाड़ों को वेस्ट नहीं इन्वेस्टमेंट के नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है. देशभर में लाखों बाबूओं ने जो अपनी काहिली, कामचोरी और भ्रष्टाचार से आम आदमी को यह इन्वेस्टमेंट करने के लिए विवश नहीं किया होता क्या आज सरकार चार हज़ार करोड़ कमा पाती!! जो कागज़ कभी आम नागरिकों को उनके अधिकार नहीं दिला पाए अब सरकार का रेवेन्यू मॉडल बन चुके हैं.
फिर बात सिर्फ आर्थिक योगदान की नहीं है, मंत्रीजी ने यह भी बताया कि ‘ज़्यादातर पेंडिंग फाइलें और दूसरे पेपरवर्क के रूप में अटाला हटाने से 923 लाख वर्गफुट ऑफिस स्पेस खाली हुआ, इतनी जगह में एक बड़ा मॉल या वैसी ही बड़ी बिल्डिंग बन सकती है. जैन परिवार के राशन कार्ड की फाईल ने एक वर्गफुट जगह भी खाली करने में मदद की हो तो इसे मामूली योगदान न समझा जाए श्रीमान्. हम दादाजी के लिए कोई पद्म पुरस्कार नहीं मांग रहे, उनके योगदान की पावती भर मिल जाए, बस. लेमिनेट करा कर उनकी तस्वीर के बाजू में लगाकर हम उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि देना चाहते हैं. इससे हमारा अपराध बोध कम होगा. अब तक हम उन्हें झक्की इंसान समझते रहे. हमें लगता था उनकी कुंडली राग दरबारी के लंग्गड़ की कुंडली से मैच करती है. अगर उस ज़माने की प्रचलित दरों के अनुसार उन्होंने पाँच रूपए की रिश्वत दे दी होती तो महज़ एक पेज की दरख्वास्त में उसी समय काम हो गया होता. आज लगा कि वे झक्की नहीं दूरदर्शी थे. पहले एप्लीकेशन, फिर एफिडेविट, फिर मूलनिवासी का प्रमाणपत्र, फिर रिमाइंडर, रि-एप्लाय, रि-रिमाइंडर के कागज़ सबमिट कर-कर के थ्रू एक जाड़ी फाईल के देश के खजाने में तभी अपना योगदान करके चले गए. वे बो गए थे, सरकार काट रही है.
बहरहाल, आज से जैन परिवार सरकार का मुरीद हो गया है. उसने अब जाकर यह रियलाइज़ किया है कि बेचने के मामले में सरकार की नज़र में सब समान है. वह सरकारी दफ्तरों से निकले जूने-पुराने अटाले को भी उसी शिद्दत से बेच लेती है जिस शिद्दत से एयरलाईंस, पोर्ट, एयरपोर्ट, सार्वजनिक उपक्रमों, उद्यमों को बेच लेती है. जब बेचने ही निकले हैं श्रीमान् तो क्या लकड़ी के जंगल और क्या लकड़ी की टूटी कुर्सी!! सरकार वेस्ट बेचकर वेल्थ बनाने के मिशन पर काम कर रही है. इस बेचने को सरकार बेचना कहती भी नहीं, असेट मोनेटाईजेशन कहती है.
नेशन के लिए असेट मोनेटाईजेशन में अपने अल्प किन्तु महत्वपूर्ण योगदान से जैन परिवार गौरवांवित अनुभव करता है और उन सभी बाबूओं का आभार व्यक्त करता है जिनकी काहिली, लापरवाही, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण जैन परिवार को यह सुअवसर प्राप्त हुआ है. आभार.
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “नेकी कुएं में : पाप घड़े में”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २१ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “नेकी कुएं में : पाप घड़े में” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
☆
लोग संसार में बढ़ते पापियों से परेशान हैं, लेकिन कहते हैं कि “भगवान के घर देर है अंधेर नहीं”। संसार में जितने भी पापी हैं सबके पाप के घड़े एक न एक दिन अवश्य ही फूटेंगे। अस्तु, जनता को परेशान होने अथवा घबराने की जरूरत नहीं है। उसे केवल पापी का घड़ा भरने का इंतजार करना है। पापी का घड़ा फूटा और उसका हिसाब हुआ।
भगवान भी बड़ा अजीब है, जिसने आदमी की पीठ पर पुण्य का घड़ा बांधने के बजाय पाप का घड़ा बांध दिया। शायद उसे यह विश्वास था कि आदमी पुण्य कार्य करेगा ही नहीं अथवा करेगा भी तो इतनी अधिक मात्रा में नहीं कि उन्हें इकट्ठा करने के लिए उसे घड़े जैसे किसी पात्र की जरूरत पड़े। आदमी के सामने बड़ी समस्या है कि नेकी के कार्य तो उसे कुएं में डाल देना पड़ते हैं और पाप घड़े में सुरक्षित रखना पड़ते हैं। यहां सोचने वाली बात यह है कि आखिर भगवान ने आदमी के साथ पाप इकट्ठे करने के लिए एक खाली घड़ा क्यों बांधा ? यदि वह आदमी को पाप करके उसे सुरक्षित रखने हेतु घड़े जैसी वस्तु नहीं देता तो आदमी पाप करता ही क्यों और यदि पाप करता भी तो घड़ा न होने के कारण उसे छिपा न पता, उसका पाप फौरन लोगों के सामने आ जाता।
अब चूंकि सबके पास पाप इकट्ठे करने एक – एक घड़ा है और हर घड़ा मालिक यह जानता है कि भगवान द्वारा निर्मित यह विशेष घड़ा जब तक पूरा न भरे तब तक इसके टूटने – फूटने का कोई खतरा नहीं है। अतः लोग बेहिचक हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसे संगीन पाप करके उन्हें घड़े में भरते जाते हैं, क्योंकि आदमी के पास बुद्धि नाम की चीज भी है अतः कुछ लोग बीच – बीच में अपने पाप के घड़े की स्थिति देखते रहते हैं और चतुराई पूर्वक पाप इस गति से करते हैं कि घड़ा भर कर फूट न जाए। वे घड़ा भरने से पूर्व ही पाप करना छोड़ कर सभ्य बन जाते हैं और पूर्व के पापों की कमाई खाते हुए चैन से जीवन गुजारते हैं। भाइयो यदि समाज में सुरक्षित और सम्मानित बने रहना चाहते हैं तो घड़े पर नजर रखते हुए पाप करें, उसके भरने के पूर्व पापों से तौबा कर लें। कहावत है कि सौ चूहा खाने के बाद बिल्ली हज को चली जाती है। शायद बिल्ली के घड़े की पाप ग्रहण क्षमता सौ चूहों की हत्या है। इसीलिए चतुर बिल्ली एक सौ एकवाँ चूहा नहीं मारती।
पाप पुण्य की बातें तो इतनी हैं कि लिखना शुरू कर दें तो पुथन्ना बन जाए, किंतु यहां मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि जब कुछ लोगों ने अपने बुद्धिबल से लोगों को चांद पर पहुंचा दिया है और कुछ ने आध्यात्म बल से ईश्वर से साक्षात्कार कर लिया है तो उन्हें चाहिए कि वे अपने विज्ञान, तकनीक अथवा ईश्वरीय समीप्य का उपयोग करते हुए इस बात की कोशिश करें कि भगवान द्वारा आदमी के साथ भेजा जाने वाला पाप का खाली घड़ा उसका पिंड छोड़ दे, क्योंकि ” न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।”
यदि दुनिया के वैज्ञानिक, तकनीशियन और ईश्वर के मित्र (धर्मगुरु, आचार्य, महर्षि और जमीन के भगवान) प्रयास पूर्वक आदमी को घड़े की झंझट से मुक्त नहीं करवा सकते तो कम से कम उन्हें यह जानने की कोशिश करना चाहिए कि भगवान द्वारा प्रदत्त पाप का घड़ा किस धातु अथवा मिट्टी का बना रहता है ताकि उसे नष्ट करने का प्रयास किया जा सके। यदि हम यह नहीं करते तो संसार को पाप मुक्त कर सकना टेढ़ी खीर है, क्योंकि हर आदमी के पास पाप छुपाने के लिए एक मजबूत घड़ा है जो तभी फूटता है जब भर जाए। अतः इन स्थितियों में हमें केवल उन बड़े – बड़े पापियों की ही जानकारी हो पाती है जिनके घड़े फूट जाते हैं। मझौले, छोटे अथवा चतुर पापी जीवन भर पाप करने के बाद भी शान से अपने पाप, अपने साबूत घड़े में छुपाए दुनिया से विदा हो जाते हैं।
मैं व्यक्तिगत तौर पर भी भगवान से और उनके प्राइवेट सेक्रेटरी श्री चित्रगुप्त से जिनके खानदान का मैं स्वयं हूं यह निवेदन करता हूं कि अब वे आदमी को बिना घड़े के भेजने की व्यवस्था करें।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…” ।)
☆ शेष कुशल # ५७ ☆
☆ व्यंग्य – “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…”– शांतिलाल जैन ☆
‘मैं इमरजेंसी वर्क मीटिंग में हूँ। बाद में कॉल करता हूँ।’
‘झूठ लिखना पाप है’ – ऐसा तो न कहीं पढ़ा, न कहीं सुना। अलबत्ता ‘झूठ बोलना पाप है’ – बचपन से सुनते आ रहे हैं।
सो बोल नहीं रहे, लिख रहे हैं, धड़ल्ले से लिख रहे हैं। लिख कर रख ले रहे हैं, उसी को बार बार फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। लिखना एक बार, फॉरवर्ड अनेक बार। इस कला में प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती श्रीमान्, एक गिफ्ट सी है जो मोबाईल खरीदने के साथ गॉड से मिल जाया करती है। नेटफ्लिक्स पर आप वेब सिरीज़ देख रहे हैं और कॉल रिसीव हुआ। लिखिए कि – ‘बॉस के साथ एक अर्जेंट मैटर पर डिस्कशन में हूँ। केबिन से बाहर आकर फोन करता हूँ’। फिर क्या तो आपका केबिन से बाहर निकलना और क्या ही आपका कॉल करना। यकीन मानिए लिखा हुआ झूठ पाप की केटेगरी में नहीं आता। आता तो लाखों व्हाट्सअप अंकल पाप की गठरी सिर पर लादे नरक में प्रवेश की कतार में खड़े होते। उनकी कहानी फिर कभी, फिलवक्त आज के विषय ‘ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ’ पर ही रहते हैं।
वाईफ का मूड सुबह से ख़राब है। मूड अगर सुबह आठ बजे के आसपास ख़राब हुआ है तो नौ साढ़े नौ तक तो माईग्रेन का माइल्ड से सीवियर केटेगरी में कन्वर्जन पक्का है। शॉपिंग ही इलाज़ है। शाम तक क्रेडिट कार्ड की शरण में जाना ही जाना है। तनाव पसरा है घर में कि घंटी बज उठती है। एक दोस्त का कॉल है। उठाऊँगा तो कहेगा – घर पर मिलने आना चाहता हूँ। ‘जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौंसला नहीं होता’। कुछ देर की ऊहापोह के बाद हौंसला जुटाकर लिखा – ‘सॉरी डियर, मैं आपसे मिल नहीं पाउँगा! आउट ऑफ़ स्टेशन हूँ, परसों लौटने का है। लौटने पर मैं ASAP जवाब दूँगा। कुछ अर्जेंट हो तो मैसेज करना। बाय।’ शहर में, दस मिनिट बाद ही, जो वो सामने पड़ जाता तो…। तो भी कुछ नहीं होता। आजकल झूठ बोलकर लोग शर्मिंदा नहीं होते। सारे ही बंदरों की पूँछ कटी हुई है इन दिनों। ऐसा कुछ हुआ भी नहीं, बस जवाब में उसने वसीम बरेलवी साहब का एक शेर लिख भेजा – ‘वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ए’तिबार न करता तो क्या करता’।
अगर अब भी आपको लगता है झूठ लिखने से पाप लग सकता है तो आप ये जिम्मेदारी मोबाइल पर डालकर अपराध-बोध मुक्त हो सकते हैं। ऑटो रिप्लाई का सिस्टम अवेलेवल जो है। मैनेजर साहब ने अपने वाट्सअप अकाउंट में सेट कर रखा है। मैसेज मिला – ‘पिताजी नहीं रहे। शवयात्रा 11 बजे निज निवास से निकलेगी।’ रिप्लाईड इंस्टेंटली – ‘थैंक-यू, आपका संदेश पाकर हमें बहुत ख़ुशी हुई। हमारे प्रतिनिधि आपके पिताजी से शीघ्र संपर्क करेंगे। उनका लोकेशन शेयर कर सकेंगे तो हमें आसानी होगी। आपका दिन शुभ हो।’ बैकुंठ धाम की लोकेशन खोजने में कितने ऋषियों, संतों ने हिमालय में अपने आप को गला दिया श्रीमान् मैनेजर साहब !! क्या शेयर करें आपको ?
ऑटो रिप्लाई तो दादू ने भी सेट किया हुआ है। उसे लगता है हर बार मैं उसे लेख छप जाने का अलर्ट ही भेजता हूँ। मगर उस दिन तो हमारे घर में चोरी हो गई थी। दादू को मैसेज किया। ‘बधाई शांतिबाबू’ – दादू रिप्लाईड।
वफ़ा के शहर में अब सब झूठ लिखते हैं। जो झूठ सब लिखते हों वो झूठ नहीं रह जाता, न्यू नार्मल हो जाता है।
तो लिखिए, धड़ल्ले से लिखिए, झूठ लिखिए, फिलवक्त तो पाप नहीं ही पड़ेगा। पड़ने की संभावना हो तो भी ऑटो रिप्लाई करनेवाला मोबाइल हैण्डसेट नरक में जाएगा, आप और हम तब भी बचे रहेंगे।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘असली नास्तिक की पहचान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१४ ☆
☆ व्यंग्य ☆ असली नास्तिक की पहचान ☆
स्वर्ग-नरक के विशाल स्वागत-कक्ष में भारी भीड़ जुटी थी। तिल धरने को जगह नहीं थी। मृत्युलोक से पहुंची आत्माओं के रिकॉर्ड खंगालने में चित्रगुप्त जी के आठ दस असिस्टेंट लगे थे। रिकॉर्ड के आधार पर स्वर्ग और नरक के अलॉटमेंट की लिस्टें निकाली जा रही थीं। आत्माएं दम साधे अपने कर्मों का फैसला सुनने के लिए खड़ी थीं। कई पाप-कर्म वाले भी इस उम्मीद में थे कि शायद एकाध पुण्य-कर्म के बदौलत स्वर्ग की लिस्ट में नाम आ जाए।
लिस्टें लगीं तो हल्ला-गुल्ला बढ़ गया। स्वर्ग की लिस्ट में जगह पाने वाले खुशी से ‘चित्रगुप्त जी जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे तो नरक की लिस्ट में ढकेले गये विलाप करके उसे अन्याय और भेदभाव बता रहे थे।
हल्ला-गुल्ला सुनकर यमराज वहां घूमते हुए आ गये। चित्रगुप्त जी से हाल-चाल पूछा । चित्रगुप्त जी ने जवाब दिया, ‘सब काम ठीक चल रहा है, प्रभु, लेकिन ये दो-तीन आत्माएं बड़ी देर से बहस कर रही हैं। बार-बार पूछती हैं कि उनका नाम नरक की लिस्ट में कैसे रखा गया।’
यमराज ने पूछा, ‘इनके रिकॉर्ड में क्या है?’
चित्रगुप्त जी बोले, ‘ये घोर नास्तिक हैं। भगवान के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाते हैं। कभी मंदिर नहीं गये, कभी भगवान की पूजा नहीं की। कहते हैं भगवान के अस्तित्व का किसी ने कभी प्रमाण ही नहीं दिया। ‘मान लो’ ‘विश्वास करो’ कहने से काम नहीं चलता। इनका सवाल है कि बिना प्रमाण-सबूत के कैसे मान लें? अब बताइए इनको नरक में न भेजें तो क्या करें? एकदम ओपिन एंड शट केस है।
‘इनका यह भी कहना है कि वे नास्तिक नहीं, तर्कवादी हैं। असली नास्तिक वे हैं जो ऊपर से भगवान को मानने का ढोंग करते हैं, लेकिन भीतर से उन पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते। जो भगवान का नाम जपते हैं, लेकिन धर्मस्थलों के दान-पात्रों से सारा चढ़ावा, बिना भगवान से डरे, गायब कर देते हैं। इनकी नज़र में नास्तिक वे नेता भी हैं जो जनता को दिखाने के लिए मंदिर में पूजा करते हैं, मंदिर बनवाते हैं, लेकिन जनता को मूर्ख बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो दिन भर झूठ बोलते हैं, झूठे आश्वासन देते हैं। नास्तिक वे धर्मगुरु हैं जो धर्म को धंधा समझते हैं, जो भगवान पर भरोसा करने का उपदेश देते हैं लेकिन अपने साथ सशस्त्र सुरक्षाकर्मी लेकर चलते हैं। ये सब भगवान की मूर्ति को मिट्टी के पुतले से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। इनकी नज़र में असली नास्तिक वे हैं जो भगवान का नाम लेकर हत्या और अपराध करते हैं।’
सयाने यमराज बोले, ‘ये लोग गलत नहीं कहते। शंका करने मात्र से कोई नास्तिक नहीं हो जाता। अगर कोई उनकी शंका का समाधान नहीं कर पाता तो उसमें उनका क्या दोष है? असली नास्तिक वही है जो ऊपर से ईश्वर को मानने का दिखावा करता है, लेकिन भीतर से नहीं मानता। यदि इन शंकालु लोगों ने कोई अन्य पाप नहीं किया, किसी को लूटा सताया नहीं, समाज का अहित नहीं किया, तो इन्हें नरक में भेजना उचित नहीं। इन्हें ऐसी जगह स्थान दिया जाए जहां इन्हें हमारी व्यवस्था को समझने का अवसर मिले और इनकी शंकाओं का समाधान हो। आगे से यह भी ध्यान रखें कि मुंह में राम और बगल में छुरी रखने वाले ढोंगी स्वर्ग में जगह न पा जाएं।’
चित्रगुप्त जी को ऐसी हिदायत देकर यमराज आगे बढ़ गये।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय व्यंग्य “बाढ़ में बन्दर-बाँट…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # १३
बाढ़ में बन्दर-बाँट… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
एक बाढ़ आई… दर्जनों पुल ढहे… सैकड़ों घर डूबे… हजारों बहे…लाखों मरे… करोड़ों का नुक़सान हुआ…अरबों की मदद चाहिए… l… नतीज़ा ?.. अरबों की मदद सेंक्शन हुई… करोड़ों जमा हुए… लाखों बाँटे गये… हजारों बँटे… सैकड़ों हिस्से में आये… दर्ज़ेनों में बन्दर-बाँट हुआ… एक… सिर्फ़ एक पल्ले पड़ा है… उसी एक रूपये की रेवेन्यु टिकट लेकर आम आदमी लाइन में खड़ा है… l
आपदा प्रबंधन, बाढ़ राहत कोष, हवाई सर्वेक्षण और बाढ़ आकलन पुनर्वास… इन चार स्कन्धों पर बाढ़-ग्रस्त अभिशप्त जनों की लाशें ढोई जाने की रस्में बख़ूबी अदायगी होती हैं l पूर्व चेतावनी प्रणाली, नियंत्रित संरचना ये सब इस शव-यात्रा में अनिवार्यतः शामिल होते हैं.. l…
“ज़नाज़े में बहुत हैं तमाशाई देखो
चूना लगाके अहा!रोशनाई देखो”
नज़ारा देखो… कितने स्कूलों की छत भरभराकर नौनिहालों की इहलीला समाप्त कर गई… सरकारी निर्माण को परखने, एन.ओ.सी. देने हेतु विशेषज्ञ अभियंता हैं… तो बीच में विश्वसनीय मापक बन काहे टाँग अड़ाती हैं ये अतिवृष्टि एवं बाढ़..?
“पुलिया टूटी, सड़क बही,
हर ओर तबाही का मंज़र
सीधी – सादी आबादी,
आँसू पीने की आदी है”
चमचासान की मुद्रा में बैठे, मौक़ा-परस्त चमचे नियमों को परास्त कर, लोकतंत्र के गाल पर तमाचा जड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकते… आपको तो विदित है ही कि, “चमचा जिस बर्तन में रहता है, उसे खाली कर देता है… l “क्या कुछ ग़ायब नहीं हो जाता…?…
गोदाम से ग़ायब हुआ, अनाज देखिये,
‘राजेश’ इस वतन का उफ़ रिवाज देखिये…!
“चले केन्द्र से पूरे एक सौ
आते-आते पचपन ग़ायब
सावन ग़ायब, बचपन ग़ायब
मेल-जोल अपनापन ग़ायब”
किसी को रूखा-सूखा नसीब हुआ है, इसका तात्पर्य ही यही है कि कोई कथरी ओढ़कर घी चुपड़ी हथिया चुका है—
“जिनके हिस्से बारिश आई, सर से पाँव तर-बतर हुए
आम आदमी के हिस्से में केवल बूँदा-बाँदी है”
बाढ़ आकर तबाही मचाकर अलविदा हो जाती है… परन्तु ऐसे बहुतायत हैं, जिनकी आँखों में निश-दिन बाढ़ है, जिनका जीवन ही बारामासी आषाढ़ है…!
बाढ़ आई-गई, अपनी बला से!…तथाकथितों के सर कड़ाही में और पाँचों उँगलियाँ घी में सराबोर रहे! तभी तो इस व्यंग्यकार ने उवाचा है —