हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८१ – व्यंग्य – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८१ – व्यंग्य  – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

ज्ञापन संख्या: इश्क/001 – राजकीय प्रेम एवं अनुशासनिक कार्रवाई 

महोदया, उपर्युक्त विषयांतर्गत सादर निवेदन है कि जब से आपने इस कार्यालय के धूल-धूसरित गलियारों में अपनी सैंडलों की ‘टिक-टिक’ के साथ आमद दी है, यहाँ का प्रशासनिक ढांचा किसी ढीले पड़े तंबू की तरह डगमगा गया है। नियमानुसार एक कनिष्ठ कर्मचारी की दृष्टि केवल सरकारी पंजियों के मलबे में दबी होनी चाहिए, किंतु आपकी आँखों का ‘रडार’ पिछले कई पखवाड़ों से लगातार मेरी ‘स्थापना प्रभारी’ वाली कुर्सी की ओर ही लक्षित पाया गया है। आपकी आँखों का यह अनधिकृत संचरण उस गुप्तचर की भांति है जो सीमा पार की गतिविधियों पर नजर रखता है, जबकि मेरा हृदय कोई प्रतिबंधित क्षेत्र नहीं है। आपके इस निरंतर ‘दृष्टि-आक्रमण’ ने मेरे भीतर के अनुशासन को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया है, जैसे कोई आवारा सांड लहलहाती फसल को तहस-नहस कर देता है। आपके इस कृत्य से मेरे कार्य-निष्पादन की क्षमता में गिरावट आई है और मेरी गंभीरता किसी फटे हुए ढोल की तरह बजने लगी है।

आपके टाइपिंग करने की शैली भी किसी सामान्य लिपिक जैसी नहीं, बल्कि किसी युद्धघोष जैसी प्रतीत होती है। जब आप की-बोर्ड पर उंगलियाँ चलाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे हृदय के किसी कोने में कोई ‘नोटशीट’ टाइप हो रही हो। टाइपिंग से अधिक समय आप मेरी भाव-भंगिमाओं के ‘निरीक्षण’ और ‘समीक्षा’ में व्यतीत कर रही हैं, जो सीधे तौर पर राजकीय समय का दुरुपयोग है। वरिष्ठ अधिकारी के चेहरे को इतनी गहराई से पढ़ना, जितना कि आप पढ़ रही हैं, केवल ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ का काम है, किसी कनिष्ठ सहायक का नहीं। आपकी इस खोजी दृष्टि ने मुझे इस कदर विचलित कर दिया है कि कल मैंने आकस्मिक अवकाश की अर्जी पर हस्ताक्षर करने के बजाय गलती से ‘आई लव यू’ लिखकर डिस्पैच कर दिया। यह स्थिति किसी भी लोक सेवक के लिए वैसी ही लज्जास्पद है जैसे किसी पटवारी का रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाना।

अब बात करते हैं उस ‘मुस्कराहट’ की, जो आपकी लबों पर किसी सरकारी वादे की तरह अधूरी और रहस्यमयी बनी रहती है। यह मुस्कराहट न तो पूर्णतः ‘साधारण शिष्टाचार’ की श्रेणी में आती है और न ही इसे ‘विभागीय सौजन्य’ माना जा सकता है। यह तो उस सूक्ष्म भ्रष्टाचार की तरह है जो फाइल के साथ नत्थी होकर आता है और हृदय की तिजोरी में सेंध लगा देता है। आपके इस अधर-प्रदर्शन से मेरे रक्तचाप में वह ‘उछाल’ दर्ज किया गया है, जो शेयर बाजार के सेंसेक्स में भी विरल ही देखा जाता है। दफ्तर में हंसी-मजाक की एक सीमा होती है, किंतु आपकी मुस्कराहट तो उस ‘परमिट’ की तरह है जो बिना किसी जांच के सीधे दिल के रास्ते को ग्रीन सिग्नल दे देती है। यदि यही स्थिति रही, तो मुझे आशंका है कि हमारे विभाग का बजट घाटा कम हो न हो, मेरे हृदय का सुकून जरूर दिवालिया घोषित हो जाएगा।

अतः आपको इस ‘कारण बताओ नोटिस’ के माध्यम से निर्देशित किया जाता है कि आप आगामी तीन कार्यदिवसों के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। आपकी इस मुस्कराहट को ‘शिष्टाचार’ के बस्ते में डालकर रद्दी में फेंक दिया जाए या इसे ‘शुद्ध प्रेम’ की श्रेणी में वर्गीकृत कर एक नया रजिस्टर खोल दिया जाए? प्रशासन में अनिश्चितता किसी महामारी से कम नहीं होती, इसलिए वस्तुस्थिति का स्पष्टीकरण अनिवार्य है। यदि यह प्रेम है, तो इसे मौखिक या लिखित रूप से ‘सबमिट’ करने में इतनी देरी क्यों? क्या आप भी किसी सरकारी टेंडर की तरह ‘लोएस्ट बिडर’ (न्यूनतम बोली लगाने वाले) का इंतजार कर रही हैं? याद रखिए, प्रेम का आवेदन यदि समय पर नहीं मिला, तो मैं इसे ‘लैप्स’ (व्यपगत) मान लूंगा और फिर आपको अपील करने के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने पड़ेंगे, जहाँ का बाबू मुझसे भी बड़ा सनकी है।

गजानन बाबू की कलम यहाँ और भी पैनी हो गई जब उन्होंने लिखा कि प्रेम की इस फाइल पर धूल जमने से पहले ही इस पर कोई ‘एक्शन’ लिया जाना चाहिए। आप कनिष्ठ सहायक हैं, इसका अर्थ यह कतई नहीं कि आप वरिष्ठों के हृदय के साथ ‘ऑडिट’ खेलें। प्रशासन की फाइलें तो सालों-साल चलती हैं, मगर भावनाएं कोई ‘पेंशन योजना’ नहीं हैं जो मरने के बाद भी मिलती रहें। यदि आपकी नियत में खोट नहीं है और आँखों का यह रडार किसी गंभीर ‘प्रोजेक्ट’ का हिस्सा है, तो कृपया अपनी भावनाओं का ‘एफिडेविट’ (शपथ-पत्र) बनवाकर पेश करें। दफ्तर में प्रेम का अंकुर फूटते ही ईर्ष्या की लपटें उठने लगती हैं, और मैं नहीं चाहता कि हमारे इस ‘गुपचुप गठबंधन’ की खबर किसी चपरासी के माध्यम से कैंटीन तक पहुंचे। इसलिए जो भी कहना है, उसे ‘अर्जेंट’ मार्क करके सीधे मेरी मेज पर पटक दें।

आपके जवाब के आधार पर ही भविष्य की ‘कार्य-योजना’ तैयार की जाएगी। यदि उत्तर सकारात्मक रहा, तो हम लंच ब्रेक के समय को ‘विशेष चर्चा सत्र’ में बदल देंगे और शाम की चाय को ‘साझा निवेश’ के रूप में देखेंगे। यदि यह नकारात्मक रहा, तो मुझे अपनी कुर्सी की दिशा बदलनी पड़ेगी ताकि आपकी आँखों की ‘लेजर किरणों’ से मेरा बचाव हो सके। दफ्तर की राजनीति में वैसे ही बहुत झमेले हैं, अब यह प्रेम का नया ‘सर्कुलर’ मुझे किसी बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। मैं एक जिम्मेदार पद पर हूँ, और मेरा दिल कोई ‘धर्मशाला’ नहीं है जहाँ कोई भी आकर बिना अनुमति के मुस्कुरा दे। अपनी स्पष्टवादिता का परिचय दें, क्योंकि शासन में पारदर्शिता ही सफलता की कुंजी है। यदि आपने चुप्पी साधे रखी, तो इसे आपकी ‘मौन स्वीकृति’ मानकर मैं स्वयं ही इस प्रेम-विवाह का ‘गैजेट नोटिफिकेशन’ जारी कर दूंगा।

लेकिन यहाँ एक बड़ा सस्पेंस है जिसे पढ़कर आपके पैरों तले की जमीन खिसक जाएगी। असल में, गजानन बाबू जिस मुस्कराहट को प्रेम समझ रहे थे, उसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी। चपला दरअसल गजानन बाबू के चेहरे के उस बड़े से ‘मस्से’ को देख रही थी, जिस पर सुबह से एक मक्खी बार-बार आकर बैठ रही थी और गजानन बाबू उसे फाइल से उड़ाने के चक्कर में खुद को किसी रोमन सम्राट जैसा महसूस कर रहे थे। चपला की मुस्कराहट प्रेम का आमंत्रण नहीं, बल्कि उस मक्खी और गजानन बाबू के बीच चल रहे ‘कुश्ती’ के मुकाबले का लाइव टेलीकास्ट देख रही थी। वह तो बस यह सोचकर हंस रही थी कि कैसे एक ‘स्थापना प्रभारी’ एक छोटी सी मक्खी के सामने अपनी सारी सत्ता और गरिमा हार चुका है। यह खुलासा होने के बाद गजानन बाबू का सारा प्रशासनिक ईगो किसी फटे हुए टायर की तरह फुस्स होने ही वाला था।

जब चपला ने इस ज्ञापन का जवाब दिया, तो वह सस्पेंस और भी गहरा गया। चपला ने लिखा कि “महोदय, मेरा रडार आपकी कुर्सी पर नहीं, बल्कि आपकी कुर्सी के ठीक पीछे वाली दीवार पर टंगे उस ‘सरकारी कैलेंडर’ पर था, जिसमें छुट्टियों की सूची दी गई है। रही बात मुस्कराहट की, तो वह आपकी उस ‘खुली हुई जिप’ को देखकर थी, जिसे आप अपनी ‘वरिष्ठता’ के अहंकार में बंद करना भूल गए थे।” गजानन बाबू ने जैसे ही यह पढ़ा, उनके चेहरे का रंग किसी कच्ची ईंट जैसा पीला पड़ गया। उन्होंने तुरंत अपनी फाइलों का ढेर सामने कर लिया और उस दिन के बाद से कभी किसी कनिष्ठ सहायक की मुस्कराहट का ‘वर्गीकरण’ करने की जुर्रत नहीं की। सस्पेंस तो यह है कि अब गजानन बाबू खुद चश्मा पहनकर केवल फाइलों के पन्ने पलटते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं अगली बार उनकी ‘कार्य-योजना’ का कोई नया छेद सार्वजनिक न हो जाए।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२२ ☆ व्यंग्य – ये इश्क़ नहीं आसां ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘ये इश्क़ नहीं आसां‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ये इश्क़ नहीं आसां

कुछ समय पहले मैंने महाराष्ट्र के एक स्कूल के प्राचार्य के बारे में लिखा था, जिन्होंने छात्राओं को शपथ दिलायी थी कि वे प्रेम-विवाह नहीं करेंगीं। अभी टीवी पर देखा कि मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के एक गांव में गांववालों ने लड़कियों के भाग कर शादी कर लेने से त्रस्त होकर ऐसे लड़कों-लड़कियों और उनके परिवार वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।

गांव के एक प्रवक्ता ने घोषणा की है कि भाग कर शादी करने वाले लड़के लड़कियों का सामाजिक बहिष्कार होगा। उनके परिवार को कोई मज़दूरी नहीं देगा, दूध और किराने का सामान, पंडित-नाई उन्हें मुहैया नहीं होंगे। इसके अलावा कोई ऐसे परिवारों की ज़मीन को लीज़ पर नहीं लेगा। गनीमत है कि प्रेमियों को सबक सिखाने के लिए गांव वालों ने कोई और बड़ा नुस्खा नहीं निकाला। गांव के एक पिताजी ने बताया कि उन्होंने अपनी दो बेटियों की पढ़ाई छुड़ा कर उन्हें घर में बैठा लिया है ताकि वे प्रेम के प्रदूषण से बची रहें। सुनकर बेगम अख़्तर की ग़ज़ल याद आ गयी— ‘अय मुहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया।’

चचा ‘ग़ालिब’ ने नाहक ही लिखा— ‘इश्क पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाये न लगे और बुझाये न बने।’ अब इंतज़ाम हो रहा है कि यह मनहूस आग लग ही न पाये और अगर लग ही जाए तो तुरन्त ‘फ़ायर एक्सटिंग्विशर’ का इस्तेमाल किया जाए। कबीर भी फालतू ही लिख गये कि ‘जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान; जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान।’ उधर मरहूम मेंहदी हसन व्यर्थ  की टेर लगाये हैं— ‘दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं।’ बुल्ले शाह भी अरण्य रॊदन कर रहे हैं— ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो।’

हमारे देश के कानून के हिसाब से लड़का लड़की 18 की उम्र पर पहुंचने पर ख़ुद मुख़्तार हो जाते हैं, यानी वे खुद निर्णय लेने और अपने निर्णय की जवाबदारी लेने में सक्षम हो जाते हैं। पश्चिमी देशों में युवा अपनी शादी होने पर अपना अलग घर बसा लेते हैं। वे अपनी ज़िन्दगी के निर्णय स्वयं लेते हैं। लेकिन हमारे यहां नाक का सवाल ज़िन्दगी भर बना रहता है। लड़का-लड़की को वही काम करना पड़ता है जिसमें ख़ानदान की नाक सलामत रहे। नाक की रक्षा में ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं होती रहती हैं। परिवार के साथ-साथ समाज की नाक का भी ख़याल रखना पड़ता है। इसीलिए कई प्रेमी शादी के बाद अपनी जान बचाते फिरते हैं।

मुश्किल यह है कि प्रकृति ने सिर्फ नर- मादा पैदा किये, परिवार और विवाह संस्थाएं आदमी ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनायीं। अब संस्थाएं आदमी के ऊपर हावी हैं। प्रकृति का संदेश स्पष्ट है कि नर-मादा मिलें और अपनी प्रजाति को जीवित रखें। इसीलिए प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के बीच में आकर्षण पैदा किया है।

हम लैला-मजनूं, शीरीं-फ़रहाद, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट के प्रेम की गाथाओं पर झूमने वाले लोग हैं। राजस्थान में श्रीगंगानगर के पास लैला मजनूं के मज़ार हैं जहां हर साल जून में मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर मन्नत मानते हैं। लेकिन जब अपने घर में कोई लैला,शीरीं या सोहनी पैदा हो जाती है तो संकट खड़ा हो जाता है।

प्रेम आदमी को कैसा मजबूर और बेबस करता है इसके संबंध में मुझे दीवान जर्मनी दास द्वारा लिखित ‘महाराजा’ पुस्तक का एक प्रसंग याद आता है। पंजाब की एक रियासत की राजकुमारी अपने राज्य के एक अधिकारी के प्रेम में पड़ गयी थी। राजकुमारी के महल के पीछे की चारदीवारी से सटा एक कुआं था। राजकुमारी के प्रेमी ने दीवार में एक सूराख बना लिया था जिसके द्वारा वह कुएं में उतरता था और फिर दूसरी ओर से राजकुमारी की परिचारिकाएं उसे ऊपर खींच लेती थींं। यह प्रेम प्रसंग बहुत दिनों तक चला, फिर प्रेमी के एक शत्रु ने भांडा फोड़ दिया और प्रेमियों की पकड़-धकड़ की कार्यवाही होने लगी। राजकुमारी प्रेमी के साथ कुएं में उतरकर महल से बाहर निकल गयी और वे राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल गये। अंत में इन प्रेमियों की ज़िन्दगी बहुत अभावों और कष्टों में गुज़री।

इन प्रेमियों की कथा पढ़कर सोहनी- महिवाल की कथा याद आती है। फ़र्क यही है कि राजकुमारी की कथा में प्रेमी कुएं में उतरता था जबकि सोहनी अपने प्रेमी से मिलने के लिए घड़े के सहारे चिनाब नदी पार करती थी। मशहूर शायर ‘जिगर’ ने इश्क़ के बारे में लिखा, ‘ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इन दोनों  कथाओं में आग की जगह पानी ने ले ली है।

इसी सिलसिले में इंग्लैंड के सम्राट एडवर्ड अष्टम याद आते हैं जिन्होंने अपनी तलाकशुदा प्रेमिका वालिस सिंपसन से शादी करने के लिए इंग्लैंड की गद्दी छोड़ दी थी।

प्रेमियों से हमदर्दी रखने वाले भी बहुत से लोग होते हैं। मेरे एक मित्र शादी से पहले अपनी पत्नी के बॉयफ्रेंड हुआ करते थे। पत्नी तब एक स्कूल में अध्यापिका थीं और प्रेमी जी रोज़ सड़क के किनारे धूप में खड़े होकर उनका इंतज़ार करते थे। जिस मकान के सामने वे खड़े रहते थे उसके मालिक ने द्रवित होकर एक दिन उनके लिए कुर्सी भेज दी थी।

परसाई जी ने ‘सुशीला’ उस लड़की को कहा था जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पी.एफ. का पैसा उनके  बुढ़ापे के लिए बचा लेती है। लेकिन ज़ाहिर है बहुत से बापों को परसाई जी यह परिभाषा रास नहीं आती। अभी तो लगता है कि जल्दी ही ऐसी स्थिति बनेगी जहां बिना वालदैन के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के शादी मुकम्मल नहीं मानी जाएगी। शादी कराने वाले पंडित जी को भी दोनों पक्ष के मां-बाप की सहमति के बिना शादी कराने की मुमानियत होगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८० – व्यंग्य – नत्थू लाल की ‘अमर’ बूटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – नत्थू लाल की ‘अमर’ बूटी।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८० – व्यंग्य  – नत्थू लाल की ‘अमर’ बूटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

नमस्कार, मैं हूँ आपका होस्ट। आज ‘डिस्कवरी: डार्क साइड’ के कैमरे उस अंधेरी गली में मुड़ रहे हैं जहाँ मौत भी यू-टर्न लेने पर मजबूर हो जाती है। मिलिए नत्थू लाल से—चिकित्सा जगत का वह ‘ग्लिच’ जिसे विज्ञान नहीं समझा सका और यमराज ने अब तक इग्नोर किया है। नत्थू लाल का क्लिनिक किसी अस्पताल जैसा नहीं, बल्कि किसी ‘कबाड़खाने’ जैसा दिखता है, जहाँ टूटी हुई सांसों की वेल्डिंग की जाती है। नत्थू लाल ने मेडिकल की पढ़ाई नहीं की, उन्होंने बस मौत को करीब से ‘घूरा’ है। इनका दावा है कि इनका इलाज यमराज की भैंस को भी पीछे मुड़ने पर मजबूर कर देता है।

नत्थू लाल का आत्मविश्वास किसी पहाड़ जैसा है। इनके पास ‘मरा हुआ’ आदमी लाना वैसा ही है जैसे किसी पुराने फोन को री-बूट कराना। ये नब्ज नहीं देखते, ये सीधे रूह को आवाज देते हैं—”अबे ओ! उठ, उधार बाकी है तेरा!” और ताज्जुब देखिए, मुर्दा उठ खड़ा होता है। नत्थू लाल का तर्क बड़ा सीधा है: “इंसान मरता नहीं है, बस वो इस दुनिया की बढ़ती महंगाई और बीवी के क्लेश से डरकर थोड़ी देर के लिए ‘लॉग-आउट’ हो जाता है, मैं बस उसे दोबारा ‘लॉग-इन’ करा देता हूँ।” यह चिकित्सा नहीं, यह तो ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ‘हैकिंग’ ऑपरेशन है।

मेरा तो यह मानना है कि नत्थू लाल जैसे टैलेंट को मोहल्ले में बर्बाद नहीं करना चाहिए। इन्हें सीधे ‘नेशनल स्टॉक एक्सचेंज’ के पास बिठाना चाहिए, ताकि जब मार्केट गिरे, तो ये उसे भी संजीवनी दे सकें। सरकार को चाहिए कि इन्हें ‘परलोक वापसी मंत्रालय’ का प्रभार सौंप दे। आखिर जो बंदा बिना किसी लैब के, सिर्फ एक पुड़िया और दो गालियों से मुर्दे में जान फूंक दे, वह किसी नोबेल प्राइज से कम नहीं। नत्थू लाल के पास आने वाले मरीज की फाइल में ‘बिमारी’ नहीं, ‘उम्मीद’ लिखी होती है। इनका ‘सक्सेस रेट’ यमराज के ‘बीपी’ को बढ़ा रहा है।

लेकिन, इस महानता के पीछे एक ऐसा राज छुपा है जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा। पिछले हफ्ते नत्थू लाल के पास एक ‘बॉडी’ लाई गई। आदमी पूरी तरह ठंडा, सांसे गायब, घरवाले विलाप कर रहे थे। नत्थू लाल ने हमेशा की तरह अपनी ‘स्पेशल घुट्टी’ मुर्दे के कान में डाली। अचानक मुर्दा उठा, नत्थू लाल को जोर का धक्का दिया और खिड़की से कूदकर भाग गया। भीड़ दंग थी—चमत्कार! साक्षात चमत्कार! लोगों ने नत्थू लाल को कंधे पर उठा लिया। पर सस्पेंस ये नहीं था कि मुर्दा जिंदा हुआ। सस्पेंस ये था कि वह आदमी मरा ही नहीं था।

वह असल में ‘इनकम टैक्स’ का इंस्पेक्टर था जो नत्थू लाल के काले धन का पता लगाने ‘मुर्दा’ बनकर आया था। जैसे ही नत्थू लाल ने उसके कान में कहा—”उठ जा भाई, वरना तेरी जेब से पांच सौ का नोट निकाल लूँगा,” इंस्पेक्टर की ईमानदारी जाग गई और वह अपनी जान और इज्जत बचाकर भाग निकला। नत्थू लाल आज भी इसे अपनी चिकित्सा की जीत बताते हैं। उनका कहना है—”देखा? मेरी दवा में इतनी शक्ति है कि भ्रष्ट आदमी भी ड्यूटी पर वापस लौट जाता है।”

नत्थू लाल बेस्ट हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इस देश में आदमी मौत से नहीं, ‘नुकसान’ से डरता है। वे इलाज नहीं करते, वे बस आपको याद दिलाते हैं कि अभी आपके बिजली के बिल बाकी हैं। नत्थू लाल का ‘पुनर्जीवन उद्योग’ अब ग्लोबल होने वाला है। सुना है यमराज ने भी अब नत्थू लाल के डर से ‘वीआरएस’ के लिए अप्लाई कर दिया है। तो अगली बार जब आप मरें, तो टेंशन मत लीजिएगा, बस नत्थू लाल का पता अपनी हथेली पर लिखवा लीजिएगा।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, https://hi.wikipedia.org/s/1ptf ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ शर्म को भी शर्म आने लगी है… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ शर्म को भी शर्म आने लगी है… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कितने ही लोग आजकल शर्म का पता ढूंढने में लगे हैं। युद्ध स्तर पर खोज जारी है। इतनी शिद्दत से तो लोग रूठी हुई महबूबा का पता भी नहीं ढूंढते। वैसे तो हिंदुस्तानी हर दिन किसी न किसी गड़े मुर्दे का पता ढूंढ लाते हैं। महारत है उन्हें इस खोज में।

सदियों पहले जो अपने वजूद पर इतराती थी, नारियों का गहना कहलाती थी, या किसी गुनहगार की आत्मा जागने पर उसे पछतावा होता तो उसकी आँखें शर्म से झुका देती थीं, अब न जाने कहाँ गायब हो गई। इतनी तेजी से तो गधे के सिर से सींग भी गायब नहीं होते। थक हार कर गूगल की शरणागति स्वीकार की पर उसने भी हाथ खड़े कर दिए।

दिमाग पर कुछ और जोर डाला तो याद आया कि टी वी पर पैनल डिस्कशन में कुछ पैनलिस्ट अक्सर शर्म शर्म कहते हुए पाए गए थे। सिलसिला जारी है। लगा कि शायद ये जानते होंगे पर मायूसी ही हाथ लगी।

इधर न्याय की देवी की आँखों से पट्टी हटी और उधर शर्म बहरी हो गई। सालों पहले शर्म से मुलाकात हुई थी। मैंने पूछा था-कैसी हो तुम ? उसका जवाब था वैसी ही हूँ जैसे रहना चाहिए। मैंने कहा– तुम्हें जहाँ होना चाहिए वहाँ क्यों नहीं रहती हो? नाहक भटकती हो बंजारों की तरह? क्या तुम्हें अपना देश प्यारा नहीं? तुम में जरा सी भी देशभक्ति नहीं है? अन्यथा तुम ऐसा तो न करतीं। वो बोली मुझे तुमसे देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। मुझे पानीदार आँखें पसंद हैं। सूखी आँखों में मेरा गुजारा नहीं होता। मुझे उसकी बातें सही लगीं।

शर्म किसी जहाँपनाह की बांदी तो है नहीं। उसका अपना अस्तित्व है। वह भी आजाद मुल्क की रहिवासी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसके पास भी है। संगोल युग में उसका मन नहीं है संसद में रहने का, तो उसकी मर्जी। हम कौन होते हैं उसे विवश करने वाले? शर्म उन आँखों की तलाश में हलाकान हो गई है, जहाँ वह पूरी इज्जत से रह सके। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, खेल, पुलिस, न्याय, राजनीति, फिल्म, बैंक, पोस्ट वह हर विभाग का चक्कर लगा आई पर कहीं भी उसे आशियाना न मिला। कहीं कहीं तो लोगों ने शर्म शब्द ही नहीं सुना है। किसी ने तो ये पूछा—ये किस चिड़िया का नाम है ? शर्म शब्द के मानी क्या हैं?

पुरुष मुक्ति आंदोलन की मुखिया एक स्त्री को देखा जो व्यभिचारी के हक में रैली निकाल रही थी तो उसके पाँवों तले ज़मीन खिसक गई। उसे बड़ी उम्मीद थी महिलाओं से पर वो भी ध्वस्त हो गई।

मीडिया की आंखें तो कुबेरों के यहां गिरवी पड़ी हैं। शर्म को लग रहा है कि वह रेतीली आंखों से घिर गई है। वह अतीत की यादों में बिसूरने लगी– जाने कहाँ गए वो दिन— जब शर्म गहना हुआ करती थी। मनोचकित्सक इसे आत्मविश्वास की कमी कहते हैं कहते रहें पर वे उसकी महिमा को नहीं जानते। कवि रहीम कहते हैं —“रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै मोती मानुस चून।। “

अब उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। मुल्क के हालात देख कर शर्म को भी शर्म आने लगी है।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२० ☆ व्यंग्य – स्नान पर गंभीर चिन्तन ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘स्नान पर गंभीर चिन्तन‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२० ☆

☆ व्यंग्य ☆ स्नान पर गंभीर चिन्तन

दो दिन पहले छपी एक खबर पढ़ कर दिल बाग़-बाग़ है। जो बात मैं बिना किसी मेडिकल डिग्री के दशकों से सिर्फ अपनी आत्मा की आवाज़ के हवाले से कह रहा था वही अब बड़े-बड़े मेडिकल डिग्री वाले दुहरा रहे हैं। ‘बड़ी देर की मेहरबां आते आते।’  फिर सोचता हूं ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ और ‘जब जागे तभी सवेरा’।

मसला यह है कि अमेरिका के दो त्वचा- विशेषज्ञों ने राय दी है कि आदमी के लिए नहाना कतई ज़रूरी नहीं है। उनके अनुसार नहाना उन्हीं के लिए ज़रूरी है जो शारीरिक श्रम करके पसीना बहाते हैं या धूल-मिट्टी में सनते हैं। बाकी लोगों के लिए अकारण नहाना पानी की बरबादी है। इन विशेषज्ञों का कहना है कि नहाने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटती है, त्वचा के रोग पैदा होते हैं और रोम- छिद्र बन्द हो जाते हैं। एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के अध्ययन में सामने आया कि अत्यधिक स्नान से शरीर के सुरक्षा-कवच को हानि होती है और पाचन-तंत्र निर्बल होता है। इस अध्ययन के अनुसार ठंड में नहाना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

एक भारतीय वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार भी स्नान जो है वह शरीर की ‘इम्युनिटी’ पर प्रतिकूल असर डालता है, रोगों से लड़ने की क्षमता को प्रभावित करता है और त्वचा संबंधी समस्याएं पैदा करता है। इन चिकित्सक महोदय का सुझाव है कि आदमी को हफ्ते में पांच दिन ही नहाना चाहिए। वैसे मेरा सोच है कि इस सुझाव को उल्टा करके दो दिन नहाने और पांच दिन न नहाने के मुकर्रर किये जाएं तो बेहतर होगा।

मुझे पता है कि इन डाक्टरों की राय पर मैं कितनी भी बगलें बजाऊं, मेरे देश के लोग नहाने के खिलाफ कही गयी इन बातों पर कान देने वाले नहीं हैं। वजह यह है कि हमारे देश में नहाने को धर्म से जोड़ दिया गया है। यहां स्नान के बड़े-बड़े उत्सव होते हैं। बिना नहाये देवता की पूजा करने या मन्दिर जाने की मुमानियत है। दो कदम और आगे बढ़कर मान लिया गया है कि पवित्र नदियों में नहाने से आदमी के जनम-जनम के पाप कट जाते हैं। अब ऐसी स्थिति में अमेरिका के डाक्टरों की फालतू  नसीहत कौन मानेगा? मुझे भरोसा है कि अब तक देश के सभी घोषित- अघोषित पापी, उजागर या छिप कर, गंगा-स्नान करके पाप-मुक्त हो चुके होंगे। ये पापी यहां भले ही अपराधी माने जाएं, ‘वहां’ दूध के धुले बनकर, मूंछों पर ताव देते हुए जाएंगे और पहुंचते ही स्वर्ग में अपना दावा ठोकेंगे।

दुनिया की स्त्रियों को यह भ्रम है कि नहाने से उनका रूप-सौंदर्य महफूज़ रहता है। भ्रम-निवारण के लिए बताना ज़रूरी है कि मैंने एक लेख में पढ़ा था कि मध्यकाल में फ्रांस की स्त्रियां जीवन भर अपनी काया को पानी का स्पर्श नहीं होने देती थीं। पुरुष भी जीवन में एकाध बार ही नहाते थे। इसके बावजूद पूरी दुनिया में फ्रांसीसी महिलाओं के रूप और नफ़ासत का डंका बजता था। साबित होता है कि सौंदर्य की रक्षा के लिए स्नान बिलकुल ज़रूरी नहीं है।

एक अखबार में यह भी पढ़ा था कि इंडियाना में सर्दियों में नहाना कानून के खिलाफ़ है और बोस्टन में डाक्टर की सलाह के बिना नहाना गैरकानूनी है। हमारे देश में भी कुछ ऐसा ही कानून बन जाए तो स्नान-विमुख लोगों का मनोबल गिरने की स्थिति न बने। लेकिन उसी अखबार में यह भी पढ़ा कि इज़राइल में मुर्गियों के लिए शुक्रवार और शनिवार को अंडे देना गैरकानूनी है।

मैं तो फिलहाल तीन फुट आठ इंच के छोटू बाबा को अपना गुरू मान चुका हूं जो पिछले महाकुंभ में पधारे थे और जिन्होंने बत्तीस साल से स्नान नहीं किया था। उनका कहना था कि उन्होंने कोई व्रत लिया था और उसके पूरे होने पर उज्जैन में अपने गुरू के साथ स्नान करेंगे। उन्होंने अपने गुरू का नाम नहीं बताया, न ही बताया कि गुरूजी ने कितने दिन से स्नान नहीं किया। निश्चय ही गुरूजी चेले से दो चार हाथ आगे ही होंगे। छोटू बाबा ने यह भी नहीं बताया कि जब उन्हें महाकुंभ में नहाना नहीं था तो वे वहां किस लिए पधारे थे। जो भी हो, भक्त छोटू बाबा के चरण छूने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए उमड़ते रहे। बाबा जी ने सिद्ध किया कि नहाये बिना भी आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल की जा सकती है।

जो भी हो, मेरी इस तकरीर या तकरार से यह न समझा जाए कि मैं नहाने के खिलाफ हूं। मुझे पता है कि यह स्नान-भक्तों का देश है और पानी में रहकर मगर से बैर लेना भला कौन चाहेगा?

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७८ – व्यंग्य – आयुष्मान भव अमित बेटा ! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – आयुष्मान भव अमित बेटा !)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७८ – व्यंग्य  – आयुष्मान भव अमित बेटा ! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

आयुष्मान भव अमित बेटा,

तेरा लंबा-चौड़ा ‘शोक संदेश’ मिला। उसे पढ़कर ऐसा लगा जैसे हमने घर की सफाई नहीं की, बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई पुरानी लाइब्रेरी जला दी हो। तूने शहर में रहकर शब्दों की खेती तो अच्छी सीख ली है, पर ये भूल गया कि खेत जब तक जोता न जाए, तब तक उसमें अगली फसल नहीं उगती। तू कह रहा है कि हमने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी? बेटा, ये तो मामूली ‘डस्टिंग’ थी, असली स्ट्राइक तो तूने उस दिन की थी जब तूने यहाँ की यादें एक सूटकेस में ठूँसी थीं और शहर जाकर ‘सेट’ हो गया था। तूने तो वाट्सएप पर फोटो देखकर घर को ‘ऑपरेशन थिएटर’ बता दिया, पर कभी उस सन्नाटे को महसूस किया है जो उन अस्सी के दशक के अखबारों में दीमक बनकर रेंग रहा था? तूने तो इसे ‘मिनिमलिज्म’ का नाम दे दिया, पर हम इसे ‘बोझ उतारना’ कहते हैं।

रही बात उन अखबारों की ‘बौद्धिक जागीर’ की, तो बेटा, ज्ञान जब रद्दी बन जाए तो उसे बेच देना ही बुद्धिमानी है। उन अखबारों में ‘उम्मीदें जवान’ थीं, ये सच है, पर उन उम्मीदों पर तीस साल की धूल जम चुकी थी। तू शहर में बैठकर ‘क्लाउड’ की बातें कर रहा है, यहाँ ज़मीन पर उन अखबारों के नीचे बिच्छू पल रहे थे। तू चाहता था कि मैं महासिंह को वे खबरें सुनाऊँ जो अब इतिहास के कूड़ेदान में जा चुकी हैं? अब महासिंह खुद ‘डिजिटल’ हो गया है, वह अब अखबार की सुर्ख़ियों से नहीं, अपनी पेंशन की ‘ओटीपी’ से डरता है। जिसे तू ‘यादों का इलाज’ कह रहा है, वह दरअसल पुरानी कब्ज थी, जिसे संक्रांति के बहाने हमने साफ कर दिया। अब घर में सन्नाटा नहीं, चैन की सांस गूँजती है।

तेरी माँ की पीतल की परात पर तो तूने पूरा ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ ही पेश कर दिया। तू कह रहा है कि वह खानदान की ‘जीडीपी’ थी? अरे मूर्ख, उस परात का वज़न इतना था कि तेरी माँ की कमर ‘आर्थिक मंदी’ का शिकार हो गई थी। तूने तो उसे ‘उत्सव की खनक’ कह दिया, पर उसे माँजते-माँजते तेरी माँ के हाथों की लकीरें मिट गईं, वह तुझे कभी नहीं दिखा। तू जिसे ‘बचपन की चिपचिपाहट’ कह रहा है, उसे यहाँ ‘गंदगी’ कहते हैं। तू शहर में नॉन-स्टिक पैन में ‘ऑमलेट’ खाता है और हमें यहाँ पीतल की भारी गुलामी की सलाह दे रहा है? यह वैसा ही है जैसे कोई खुद तो मर्सिडीज़ में घूमे और अपने बाप को उपदेश दे कि ‘बाबू जी, पैदल चलने में जो मिट्टी की सोंधी खुशबू है, वह कार में कहाँ!’

वह ‘सस्पेंस वाला संदूक’ तुझे अभी भी याद है? शुक्र कर कि उसे नहीं खोला, वरना उसमें तेरी उन ‘बौद्धिक जागीरों’ का कच्चा चिट्ठा निकलता जिसे तू यादों के नाम पर यहाँ छोड़ गया था। उसमें तेरी वे फटी कमीजें नहीं, तेरा वह आलस बंद है जिसे तू कभी समेटकर नहीं ले गया। तू कह रहा है कि हमने खुद को ‘म्यूजियम का चौकीदार’ बना लिया है? बेटा, म्यूजियम में वे चीजें रखी जाती हैं जिनका वर्तमान मर चुका हो। हम तो घर को ‘घर’ बना रहे हैं, ‘कबाड़खाना’ नहीं। तुझे अगर म्यूजियम ही देखना है तो कभी अपने उस शहर वाले फ्लैट के स्टोर रूम में झाँकना, जहाँ तूने आधी किस्तों पर लिया हुआ सामान ‘स्टेटस सिंबल’ के नाम पर ठूँस रखा है।

तूने लिखा है कि फर्श पर ‘फिसलने’ से बचना। बेटा, फर्श पर वे फिसलते हैं जिनके पैर ज़मीन पर नहीं होते। हम तो सालों से इसी मिट्टी पर टिके हैं। तुझे डर है कि रद्दी के ढेर नहीं होंगे तो गिरने पर हमें कौन बचाएगा? अरे, गिरने का डर उन्हें होता है जो ‘मिनिमलिज्म’ का ढोंग करते हैं, हम तो उस पीढ़ी के लोग हैं जो गिरकर खुद संभलना जानते हैं। तूने जिसे ‘सन्नाटे की गूँज’ कहा है, वह दरअसल ‘शांति’ है, जो तुझे शहर के ट्रैफिक और ऑफिस की किच-किच में कभी समझ नहीं आएगी। तुझे शोर में रहने की इतनी आदत हो गई है कि तुझे सुकून भी ‘बीमारी’ जैसा लग रहा है।

तू कहता है कि बिना कबाड़ के घर ‘सैंपल फ्लैट’ लगता है। तो सुन, यह ‘सैंपल फ्लैट’ कम से कम उस ‘गोदाम’ से तो बेहतर है जिसमें हम सालों से साँस ले रहे थे। तू शहर में ‘स्पेस’ (Space) के लिए लाखों रुपये लुटाता है, और हमें यहाँ चार कोने साफ करने पर ‘दर्शनशास्त्र’ पढ़ा रहा है? ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’ वाली कहावत तूने अच्छी झाड़ी, पर यह भी याद रख कि ‘पुरानी जूती काटती ज्यादा है’। हमने जो निकाला, वह कचरा था; और जिसे तू ‘याद’ कह रहा है, वह तेरा मोह है जो तूने यहाँ डंप कर रखा था ताकि खुद शहर में आज़ाद रह सके।

महासिंह और मेरी पंचायत की चिंता तू मत कर। अब हम पुराने अखबारों पर नहीं, नई तकनीक पर चर्चा करते हैं। कल ही महासिंह कह रहा था कि अमित का पत्र आया है, लड़का बहुत भावुक हो गया है। मैंने कहा—’भावुक नहीं हुआ है, उसे डर है कि जब वह अगली बार आएगा तो उसे अपना पुराना कबाड़ यहाँ नहीं मिलेगा जिसे देखकर वह अपनी महानता के किस्से सुनाता था।’ तू चाहता है कि हम तेरी पुरानी फटी कमीजों की पूजा करें ताकि तुझे लगे कि तेरा बचपन सुरक्षित है? बेटा, यादें दिल में होती हैं, दीमक लगे कागजों में नहीं।

तेरी माँ ने जो नॉन-स्टिक पैन लिया है, उसमें वह ‘चिपचिपाहट’ वाकई नहीं है जिसकी तू वकालत कर रहा है। वह चिपचिपाहट तो उस तेल की थी जिसे खा-खाकर तू शहर जाकर ‘जिम’ की सदस्यता ले चुका है। तू यहाँ की रसोई में ‘संस्कार’ ढूँढ रहा है और खुद वहाँ ‘माइक्रोवेव’ की प्लास्टिक की थालियों में खाना गरम करता है। यह दोगलापन शहर की हवा में है या तेरे शब्दों में? माँ कह रही है कि ‘अमित से कहना कि अब उस स्टील के कटोरे में खाना खाएगा तो शायद उसकी बुद्धि भी थोड़ी स्टील जैसी साफ़ और मज़बूत हो जाए।’

बेटा, घर ‘बौद्धिक रूप से दिवालिया’ नहीं हुआ है, बल्कि ‘मानसिक रूप से अमीर’ हुआ है। हमने अपनी पहचान उन पुरानी चीजों से नहीं बनाई थी। हमारी पहचान तो तू है, पर तू तो खुद को ‘शहर में सेट’ बताकर हमसे अलग कर चुका है। तू जब आता है, तो यहाँ की हर चीज़ को ‘एंटीक’ नज़र से देखता है, जैसे तू किसी विदेशी दौरे पर आया हो। हमें ‘शो-पीस’ बनकर रहने का शौक नहीं है। हम तो चाहते थे कि तू आए तो तुझे एक साफ कमरा मिले, पर तुझे तो उस धूल से प्यार है जिसे तू खुद झाड़ना नहीं चाहता।

तूने लिखा है कि तू ‘नया कबाड़’ लेकर आएगा। शौक़ से लाना, पर याद रखना कि इस बार कबाड़ रखने का ‘किराया’ लगेगा। तू शहर का कचरा यहाँ डंप करेगा और हम उसे ‘संस्कृति’ मानकर सहलाते रहेंगे, ये दिन अब लद गए। संक्रांति पर हमने सिर्फ घर की सफाई नहीं की, अपनी सोच की भी झाड़-पोछ की है। अब यहाँ सन्नाटा नहीं, वह सुकून है जिसकी तलाश में तू ‘मेडिटेशन’ के ऐप डाउनलोड करता फिरता है। अगली बार आए तो यादों का गट्ठर नहीं, अपनापन लेकर आना—बिना किसी व्यंग्य के।

तेरा ‘घर में सेट’ हो चुका, बाबू जी।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१९ ☆ व्यंग्य – क्रान्तिकारी ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘क्रान्तिकारी‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ क्रान्तिकारी

राशन की दूकान के सामने धक्कम धक्का और चीख पुकार मची हुई थी। कतार खूब लंबी थी। खुली धूप में खड़े लोगों के मुंह और कपड़े पसीने से गीले हो रहे थे।

लाइन में से एक मूंछों वाला युवक चिल्लाया, ‘अबे, इतनी देर क्यों हो रही है? जल्दी हाथ नहीं चला सकते क्या? एक आदमी पन्द्रह मिनट में निबट रहा है।’

अंदर से विक्रेता ने अपना चेहरा भीड़ से ऊपर उठाया, आंखें सिकोड़ कर बोला, ‘काम ही तो कर रहे हैं। मशीन बन जाएं क्या?’

मूंछों वाला फिर चिल्लाया, ‘यहां धूप में दो घंटे से सिंक रहे हैं। तुमको क्या है, तुम तो आराम से अंदर बैठे हो।’

जवाब मिला, ‘माल लेना है तो धूप पानी सब सहना पड़ेगा। यहां बहस करने की जरूरत नहीं है, जो कहना है जाकर अफसरों से कहो।’

मूंछों वाला ताव खाकर लाइन से बाहर आ या, हाथ नचा कर बोला, ‘अरे हम सब समझते हैं। बड़े बगुला भगत बनते हो। सब माल पीछे के दरवाजे से बाहर जाता है और जनता को बेवकूफ बनाया जाता है। भूल गये बेटा, जब सात दिन बड़ी हवेली में रहे थे।’

दूकान वाला आगबबूला हो गया, बोला, ‘यहां फालतू बातों की जरूरत नहीं है। माल लेना है तो चुपचाप लो, नहीं तो जाओ।’

बाकी लोग प्रशंसा के भाव से इस क्रांतिकारी को देख रहे थे जो दूकान वाले की बखिया उधेड़ रहा था।

मूंछों वाला फिर बोला, ‘देखूंगा बेटा, मैं फूड ऑफिसर के पास जाकर तेरी एक-एक पोल खोलूंगा। मैं तेरी रग-रग जानता हूं।’

तभी दूकान के भीतर से एक दूसरा आदमी आया और क्रांतिकारी की बांह थाम कर उसे अलग ले गया। दूर ले जाकर उसने क्रांतिकारी से रुपये, कार्ड और थैला ले लिये। फिर क्रांतिकारी को वहीं खड़ा छोड़कर वह दूकान में आया और रजिस्टर में उसका नाम चढ़ा कर उसका राशन तौलवाया। फिर उसने जाकर चुपचाप थैला, लोगों की ओर पीठ करके खड़े क्रांतिकारी को थमा दिया।

क्रांतिकारी ने शरीर की ओट में थैला छिपा लिया और फिर कनखियों से ‘क्यू’ में खड़ी जनता की ओर देखता हुआ वहां से खिसक गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५९ ☆ व्यंग्य – “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू…” ।)

☆ शेष कुशल # ५९ ☆

☆ व्यंग्य – “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू – शांतिलाल जैन 

यकीन मानिए भाईसाहब, अठारह लाख रूपए प्लस तीन साल के ब्याज का नुकसान हो गया अपन की फेमेली को. रीसेंटली भागीरथपुरे का पानी पी के मरे हैं अपन,  मुआवज़ा मिला दो लाख. जो लोग तीन साल पहले मोरबी के पुल से गुजरते हुए मरे उनको मिला था बीस लाख. अठारह लाख का सीधासट्ट लॉस. पहले पता होता तो अपन भी यमराज को रिक्वेस्ट करके वहीं जा के मर लेते. वैसे भी तीन साल ज्यादा जी के कर क्या लिया अपन ने?  घरवालों की जान खाते रहे,  खाना खर्चा बढ़ाया सो अलग. यमदूत ने भाँप लिया कि मेरे मन में क्या चल रहा है. वह बोला – ‘जीवन की अवधि तय है शांतिबाबू. रिक्वेस्ट करके कुछ हफ़्तों-महीनों का एडजस्टमेंट हो भी जाता,  मगर तीन साल पहले कैसे ले जाते हम तुम्हें?’

मैंने कहा – ‘तो फिर गुजरात के गंभीरा पुल के गिरने में ले जाना था. अभी जुलाई, 2025 में ही गिरा है. उधर मरनेवाले को छह लाख मिले. भले मोरबी से सत्तर परसेंट कम मिलता मगर वह भी इंदौर के से तो तीन सौ परसेंट ज्यादा ही होता. मिलने को तो एक करोड़ भी मिल सकते थे जो अपन एयर इंडिया के हादसे में अहमदाबाद में मरते.’

‘ये मुँह और मसूर की दाल!! मुंसीपाल्टी के बम्बे का पानी पीने वालों को मुआवज़े करोड़ों में नहीं मिला करते.’

‘अच्छा एक बात तो बताओ. जो लोग एयर इंडिया के हादसे में मरे उनको भी तुम इस पैसेंजर भैंसे पर ले कर गए थे!!  उनके लिए वन्दे-भारत भैंसा एक्सप्रेस जैसी अलग से कोई वीआईपी फेसेलिटी नहीं है तुम्हारे पास, पीठ पर एसी फस्ट-क्लास कूपे टाइप लगा हुआ हो कुछ?’ – मैंने पूछा.

‘तुम्हारे निज़ाम की तरह हम जान जान की कीमत में अंतर नहीं किया करते, शांतिबाबू.  इहलोक से आत्मा निकाल लेने के बाद हर जान का मोल एक बराबर है. आत्माएँ तो हम मुंबई की लोकल ट्रेन में लटककर मरने वालों की भी ले जाते हैं,  कुपोषण से मरनेवालों की भी,  बिहार की बाढ़ में बहकर मरनेवालों की भी,  पूस की रात फुटपाथ पर ठण्ड से या जेठ कि दुपहरी में मजदूरी करते करते लू से मरनोंवालों की भी ले जाते हैं. कभी एक धेला मुआवज़ा भी मिला है इनमें से किसी को? तुम्हारे निज़ाम में ख़ामोश हादसों में मरनेवालों को मुआवज़े नहीं मिला करते. वे उन्हीं मामलों में मिला करते हैं जिनमें मिडिया में हो-हल्ला मच जाता है. जितना हल्ला ज्यादा उतना मुआवज़ा ज्यादा.’

कमाल का यमदूत था वो. आया परलोक से था मगर हमारे सिस्टम के बारे में हम से ज्यादा जानता था. उसी ने रेखांकित किया – ‘आर्यावर्त में मनुष्य की जिंदगी का मोल बस कुछेक लाख रुपए रह गया है. हर बड़ी आपदा के बाद अनुग्रह राशि पर घोषित कर के गंगा नहा लेता है शासन प्रशासन. जवाबदेही किसी की नहीं. निज़ाम है कि अपने मरे हुए नागरिकों की गिनती रुपयों में करता है.’

मैं क्या कहता!! बस इतना और पूछ लिया – ‘जो मुझे नरक अलॉट हुआ तो खाने पीने की बैवस्था कैसी रहेगी?’

‘बेफिक्र रहो. एक बार मर लिए हो, अब वहाँ कुपोषण से तो नहीं ही मरोगे और पानी भागीरथपुरे से ज्यादा साफ़ आएगा. कढ़ाई में, जिस तेल में तुम तले जाओगे शांतिबाबू, वो मिलावटी नहीं होगा. कभी सुने हो नरक के किसी स्कूल में मिड-डे मील खाकर पचास शिशु आत्माएँ अवधि पूरी होने से पहले ही गुजर गईं. नरक है तो क्या! हर मुलाज़िम की एक की जवाबदेही तय है. यमलोक का लॉ ऑफ़ टॉर्ट्स अर्यावार्त के क़ानून जितना लचर नहीं है. तुम्हारे देश में ऐसे हादसों के किसी जिम्मेदार ओहदेदार को सज़ा हुई है कभी?’

वह मुझे निरुत्तर करके अंतरिक्ष में प्रवेश कर गया.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७७ – व्यंग्य – अंतिम विदाई का इवेंट मैनेजर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – अंतिम विदाई का इवेंट मैनेजर)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७६ – व्यंग्य  – अंतिम विदाई का इवेंट मैनेजर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

उस वृद्ध पिता की आँखों में अब आंसू भी नहीं बचे थे, बस एक पथराई हुई शून्यता थी जो अपने इकलौते बेटे की ‘सफलता’ को देख रही थी। बेटा विदेश से लौटा था, पर संवेदनाएँ शायद कस्टम ड्यूटी पर ही छोड़ आया था। उसने पिता के मरणासन्न शरीर के पास बैठकर दुख जताने के बजाय अपने आईफोन पर ‘फ्यूनरल प्लानर’ से बात करना बेहतर समझा, क्योंकि उसे डर था कि कहीं पिता की अंतिम विदाई उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप ‘ग्रैंड’ न हो जाए। व्यंग्य तो देखिए, जिस पिता ने अपनी पूरी उम्र फटे जूतों में काटकर बेटे को ब्रांडेड जूते पहनाए, आज वही बेटा पिता के मृत शरीर के लिए सबसे महंगे ‘इको-फ्रेंडली’ चंदन के ताबूत का मोलभाव कर रहा था। घर में मातम से ज्यादा शोर इस बात का था कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर शोक संदेश की ड्राफ्टिंग कैसी हो, ताकि फॉलोअर्स को बेटे के ‘अगाध प्रेम’ का पता चल सके। कारुणिक दृश्य वह नहीं था कि एक वृद्ध शरीर शांत पड़ा था, बल्कि वह था जहाँ एक जीवित आत्मा अपने पिता की अर्थी को एक ‘इवेंट’ में बदल रही थी।

अंतिम संस्कार के दिन श्मशान घाट किसी फिल्म के सेट जैसा प्रतीत हो रहा था, जहाँ सफेद लिबास में आए लोग दुख मनाने नहीं, बल्कि अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आए थे। बेटे ने विशेष रूप से एक ‘कैटरिंग सर्विस’ का इंतजाम किया था, क्योंकि उसके अनुसार “आने वाले मेहमानों को खाली पेट नहीं भेजना चाहिए, यह हमारी इमेज का सवाल है।” लोग जलती हुई चिता के पास खड़े होकर शोक संतप्त होने का नाटक कर रहे थे, लेकिन उनकी चर्चाओं के केंद्र में शेयर बाजार की गिरावट और शहर के नए खुले रेस्तरां थे। व्यंग्य की पराकाष्ठा तब हुई जब एक सज्जन ने अर्थी के पास खड़े होकर सेल्फी ली और कैप्शन लिखा—’फीलिंग इमोशनल विद ब्रदर’। चिता की आग अभी पूरी तरह सुलगी भी नहीं थी कि रिश्तेदारों के बीच इस बात पर कानाफूसी शुरू हो गई कि बूढ़े की वसीयत में शहर वाली जमीन किसके नाम होगी। वह आग जो शरीर को पंचतत्व में विलीन कर रही थी, उससे कहीं ज्यादा भयंकर आग उन सगे-संबंधियों के भीतर लालच की धधक रही थी, जो सिर्फ रस्म अदायगी के लिए वहां मौजूद थे।

तेरहवीं का दिन आया, जिसे बेटे ने ‘सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ’ का नाम देकर एक आलीशान बैंकेट हॉल में आयोजित किया। वहां दुख की जगह ऐश्वर्य का प्रदर्शन था; दीवार पर पिता की एक विशाल तेल-चित्र वाली तस्वीर टंगी थी, जिसे मोगरे के महंगे फूलों से सजाया गया था। बेटा स्टेज पर खड़े होकर हाथ में माइक लेकर पिता के संघर्षों पर एक ‘इमोशनल स्पीच’ दे रहा था, जो उसने एक प्रोफेशनल राइटर से पांच हजार रुपये देकर लिखवाई थी। उसकी आवाज में वह कंपन नहीं था जो दिल से निकलता है, बल्कि वह सधा हुआ अभिनय था जो तालियाँ बटोरने के लिए किया जाता है। मेहमान पनीर टिक्का और रसमलाई का लुत्फ उठाते हुए कह रहे थे, “वाह! क्या व्यवस्था है, बेटे ने पिता का मान रख लिया।” यह विडंबना ही थी कि जिस पिता ने जीवन भर सूखी रोटियाँ खाकर बेटे की फीस भरी, आज उसी की मृत्यु के भोज में छत्तीस प्रकार के व्यंजन परोसे जा रहे थे, जिन्हें वह पिता जीते जी कभी चख भी न सका था।

समारोह खत्म होने के बाद, जब सब मेहमान विदा हो गए, तो बेटा अपने आलीशान ड्राइंग रूम में सोफे पर पसर गया और हिसाब लगाने लगा कि कुल कितना खर्च हुआ और कितने का ‘शगुन’ वापस आया। उसने पिता की उस तस्वीर को, जिसे चंद घंटों पहले वह पूज रहा था, एक कोने में रख दिया क्योंकि वह उसके घर के मॉडर्न इंटीरियर से मेल नहीं खा रही थी। तभी उसे अपनी माँ की याद आई, जो पिछले तीन दिनों से एक कोने में बैठी बस शून्य को निहार रही थी। उसने माँ के पास जाकर सांत्वना देने के बजाय कहा, “मम्मी, अब आप अकेले यहाँ बोर होंगी, मैंने आपके लिए शहर के सबसे अच्छे ‘लक्जरी ओल्ड एज होम’ में बात कर ली है, वहां आपकी उम्र के बहुत लोग मिलेंगे।” यह सुनते ही माँ की आँखों से वह एक कतरा आंसू टपक पड़ा जो पिता की मृत्यु पर भी नहीं गिरा था। यह उस आधुनिक समाज का क्रूर व्यंग्य था जहाँ रिश्तों को ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ के तराजू पर तौला जाता है और बुजुर्गों को अनुपयोगी फर्नीचर समझकर बाहर कर दिया जाता है।

अंततः, उस बड़े बंगले की चकाचौंध में सन्नाटा पसर गया, सिर्फ पिता की तस्वीर पर टंगी माला के फूल धीरे-धीरे सूखकर गिर रहे थे। बेटा अगले दिन की फ्लाइट पकड़कर वापस अपनी ‘सफल’ दुनिया में जाने की तैयारी कर रहा था, जहाँ भावनाएँ नहीं, सिर्फ टारगेट और अचीवमेंट मायने रखते थे। उसने पिता की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने का काम भी एक एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया था, क्योंकि उसके पास समय की कमी थी। यह कहानी उस मरे हुए पिता की नहीं है, बल्कि उस मर चुकी संवेदना की है जो आज के चमक-धमक वाले दौर में हम सबके भीतर दफन हो रही है। हम अंतिम विदाई को भव्य बना सकते हैं, हम दिखावे के आंसू बहा सकते हैं, लेकिन उस रिक्तता को कभी नहीं भर सकते जो पिता के जाने से नहीं, बल्कि हमारे भीतर की मनुष्यता के मरने से पैदा हुई है। व्यंग्य यह नहीं है कि पिता मर गया, व्यंग्य यह है कि बेटा अब भी खुद को एक ‘सफल इंसान’ मान रहा है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५९ ☆ व्यंग्य – “आर्यावर्त में बरस छब्बीस के सामने चुनौतियाँ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  आर्यावर्त में बरस छब्बीस के सामने चुनौतियाँ…” ।)

☆ शेष कुशल # ५९ ☆

☆ व्यंग्य – “आर्यावर्त में बरस छब्बीस के सामने चुनौतियाँ – शांतिलाल जैन 

हैलो 1 जनवरी, 2026,

मैं 2025 बोल रहा हूँ. जा रहा हूँ मैं,  मगर बताता चलूँ कि तुम साल भले नए हो चुनौतियाँ तुम्हारे सामने वे ही पुरानी हैं. बस उसका स्केल बढ़ाते जाना है. बीते पूरे बरस अनैतिकताओं की खाईयों में आर्यावर्त के गिरते रहने का मैंने सिलसिला थमने नहीं दिया, बल्कि उसे बढ़ाया ही है. 2024 के बरक्स मैंने झूठ, कपट, छल, धोखे के नए कीर्तिमान गढ़े हैं, अब बैटन तुम्हारे हाथ है, निचाईयों के नए कीर्तिमान गढ़ने की चुनौती है तुम्हारे सामने.

मैंने रिहा करवाए हत्याओं के, बलात्कार के सज़ायाफ्ता मुजरिम. जिन्हें मु’आफ़ नहीं करा सका उनको परोल पर बाहर लाकर दिखाया है. संख्या में वे दस-बीस हैं मगर हैं रसूखवाले. धार्मिक और संस्कारी इस कदर कि परोल पर भी आते हैं तो सत्संग-कथा करना नहीं भूलते. वे उन लाखों कैदियों से अलग हैं जिनके पास न वकील की फीस है न मुचलका भरने का पैसा. वे विचाराधीन हैं मगर उनको न्याय दिलानेवाला सिस्टम विचारशून्य. उनकी चुनौती तो चुनौती है भी नहीं. असल खेल तो रसूखदारों को आज़ाद करने करवाने का है. इससे बड़ी चुनौती रसूखदारों को कानून की पहली सीढ़ी से ही बचा ले जाने की है. कामियाब रहा हूँ मैं. तुम कर सकोगे?

अपने समयकाल में पूरी शिद्दत से मैंने रिश्वतें कम नहीं होने दीं. लेने वालों में जिनको बचाना था उनको बचाए भी रखा. जिन्हें यहाँ महफूज़ नहीं रख सका उन्हें सात समंदर पार बसा दिया है. सीढ़ीयाँ मुहैया करवाईं कि कुछ लोग अमीरी के टॉप इतने या टॉप उतने में पहुँच सकें, गरीबी की खाईयाँ गहरी-चौड़ी करवाईं कि जो किसी तरह मुहाने पर खड़े हैं वे गिर सकें, जो गिरे हैं गिरे रहें. चुनौती है तुम्हारे सामने हमारे समय के रसूख़दार कितना भी भ्रष्ट आचरण करें मगर रहें क़ानून की गिरफ्त से दूर-दूर. इसे तुम हलके में मत लेना डियर, बचाने का एक ही पैमाना रखना –‘वो उनके साथ है, वो उनके साथ नहीं  है.’

ओ छब्बीस, सुनिश्चित करना कि नफरतों के परनालों का उफान कायम रहे. रंग बेशर्म हो न हो रंगदार बेशर्म हों, रंगदारी बेशर्म हो. जातियों, धर्मों, भाषाओं के पचड़े में इंसान भूल जाए कि वो इंसान है और एक इंसान को बरत रहा है. इंसान का खून काऊ-यूरिन से सस्ता हो. वो शंका-आशंका में भीड़ बनाकर किसी को भी मार डाले, वो होस्टल में नारे लगाने, नहीं लगाने की हिंसा का शिकारहो. वो किताबों से ज्यादा कपड़ों पर आन्दोलन करे. जिससे प्यार करे उसके टुकड़े टुकड़े जंगलों में फैला दे. जिसे नहीं कर पाए उस पर एसिड अटैक कर डाले. महिलाएँ बचनी नहीं चाहिए. अबला किसी भी धरम की हो, जाति की हो, उम्र की हो–उस पर अत्याचार कम मत होने देना ओ अनुवर्ती बरस.

नफरत के पुआल में लगी चिंगारी को मैंने बहुत कुछ हवा तो दी मगर आर्यावर्त अभी पूरी तरह जलना बाकी है. तुम्हें करना है. शांति, करूणा, अहिंसा, सहिष्णुता के पाठ पढ़ानेवाले धर्म के नाम पर अशांति, घृणा, हिंसा का बोलबाला हो. देश आहत आस्थाओं का देश बना रहे. विश्वास अंधविश्वास में बदलता रहे. तारीख़ इक्कीसवीं सदी की हो, तवारीख़ सोलहवीं सदी की. तर्क और विज्ञान कुरीतियों के समक्ष नाक रगड़ते आएँ. शिक्षा मिले तो मदरसों, मिशनरियों, आश्रमों में मिले. जहां भी मिले मध्ययुगीन मिले. पढ़े-लिखे लोग भी गंडे-ताबीज़ में भरोसा रखें. सोच दकियानूसी बने और जनमानस तांत्रिकों के फेर में अकर्मण्य. बारह मास बाद एक नफरतों से जलता मुल्क देते हुए जाना डियर.

मैंने अपने पूरे साल में कीमतों के आकाशगामी होने को बनाए रखा. अब तुम्हारे सामने दोहरी चुनौती है – जरूरी जिंसों के दाम अव्वल तो कम न हों बल्कि बढ़ें. रहें तो मेरे लेवल से उपर ही रहें. निज़ाम जैसे जैसे नियंत्रण में होने के बयान दे वैसे वैसे दाम बढ़ते रहें. सिक्का लुढ़कने की नई निचाईयों को छुए. जो रोज़गार में हैं वे छटनियों के शिकार हों, जो रोजगार में नहीं हैं वे पंखों से रस्सी डालकर झूलते रहें. नए साल में आरक्षण का नया उत्साह हो, प्रतिशत निनानवे हो मगर नौकरियाँ हो ही नहीं. रिजर्वेशन कन्फर्म, ट्रेन केंसिल. एक रात में हज़ारों की छटनीं हो जाए और लेबर मिनिस्टर की उफ़ भी सुनाई न दे. छलावे के नए कीर्तिमान रचने की चुनौती है तुम्हारे सामने डियर ट्वेंटी सिक्स. मरें तो अकेले बेरोजगार क्यों मरें, किसान भी क्यों न मरे, करियर बनाने के दबाव में युवा भी मरे, क़र्ज़ वसूली से परेशान भी मरे, ले-ऑफ़ का शिकार भी मरे? बरस छब्बीस तुम्हें चैलेंज है – किस पेशे से कितनी हाराकीरी करवा पाते हो तुम.

और हाँ, सरकार के भरोसे मत रहना. सरकारें चुनौतियाँ उनको मानती हैं जो उनकी सत्ता को होती है. वे संविधान के प्रावधानों में गली ढूंढकर संविधान की आत्मा मारते रहें तभी तुम्हारे आनेवाले बावन सप्ताह सफल मानियो. मैं सफल रहा कि जो इंसान के मूल अधिकारों के लिए लड़ते रहे वे कारावास से बाहर न आ सके, तुम और अधिक सड़ा सको उन्हें. एक ऐसा समाज गढ़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना है तुम्हें जहाँ बुद्धिजिवियों को देश का दुश्मन माना जाने लगे. जो पर्यावरण बचाने की लड़ाई लड़ें उन्हें कारावास हो. जल, जंगल, जमीन बचे नहीं, बिके. हवा की गुणवत्ता बद से बदतर  होती जाए. निनानवे मीटर तक ऊँचा पहाड़ पहाड़ न माना  जाए. पानी जमीन के नीचे का नहीं आँखों का भी निरंतर सूखता रहे.

न्यूजट्वंटी-फोर-बाय-सेवेन मिले मगर उसमें समाचार न हो. मिडिया आगे बढ़े ऐसे जैसे केंचुआ बढ़ता है. हड्डियों से परहेज़ रखना दोस्त दरबार में रेंगने में बाधा उत्पन्न होती है. महानगर की सड़कों पर पानी भर जाए तो मिडिया आसमान सर पर उठाले मगर दूर देश में लाखों लोग हफ़्तों बाढ़ में घिरे रहें, बेघर हो जाएँ और तूती भी आवाज़ न करे. इंडेक्स शेयर बाज़ार का बढ़े डेमोक्रेसी का गिरे, प्रेस फ्रीडम का गिरे, भुखमरी का गिरे, करप्शन का गिरे.

न्याय अदालतों से नहीं जेसीबी से मिले. राज़ पुलिस का हो, न्याय जंगल का, मुकदमें कंगारू कोर्ट में निपटाएँ जाएँ. मैं तो नहीं कर सका मगर तुम कर सकते हो–इसी बरस आला अदालत को सरकार-ए-हिन्द की बांदी बना सको तो. चैलेंज कठिन है मगर तुम कर सकते हो.

ओ अनुवर्ती वर्ष, तुम तैयार रहना आतंकी हमलों से लेकर अचानक बाढ़ तक सहने के लिए, हिमस्खलन से लेकर पुल तक के गिरने के लिए, विमान दुर्घटना से लेकर भगदड़ तक में मरने के लिए, भूस्खलन से लेकर फैक्ट्री विस्फोट तक में मरने के लिए. तुम तैयार रहना युद्ध के लिए, वनों की कटाई, पहाड़ों की खुदाई के लिए, अत्यधिक भ्रष्टाचार के लिए, डिजिटल अरेस्ट के लिए, साइबर धोखाधड़ी के लिए, हवाई अड्डे पर अटके रहने के लिए, रेल के निरस्त हो जाने के लिए, नए श्रम क़ानून से पिटने के लिए, वोटर लिस्ट से कटा नाम जुड़वाने की लाइन में लगने के लिए. मैं यकीन से कह सकता हूँ – ये देश तुम्हारी बढ़ती ज्यादतियों पर उफ़्फ़ भी नहीं करेगा.

बहरहाल, समय कम है चुनौतियाँ अधिक, महज़ तीन सौ पैंसठ दिन हैं तुम्हारे पास. अपनी फितरतों, हरकतों, कारनामों, कमीनगियों, गिरावटों के मेरे कीर्तिमानों से तुम कितना और नीचे गिर सकते हो डियर ट्वेंटी सिक्स इसका आकलन हम 31 दिसंबर, 2026 की शाम करेंगे. भरोसा है मुझे, तुम मुझे निराश नहीं करोगे. अलविदा और मुबारकें.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares