हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६८ – लघुकथा – रिश्तों की शवपेटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – रिश्तों की शवपेटी।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६८  – लघुकथा  – रिश्तों की शवपेटी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

रिश्ते कभी मंदिर की घंटियों की तरह मधुर बजते हैं और कभी अस्पताल की मॉर्चरी की चुप्पी की तरह डरावने हो जाते हैं; शुरुआत में उनका स्पर्श हर पल खिले गुलाब की पंखुड़ी जैसा नर्म लगता है, लेकिन समय के साथ वही पंखुड़ियाँ सूखकर काँटे बन जाती हैं और भीतर तक चुभने लगती हैं। पहले मैं उसकी बातों में मिठास खोजता था, उसके नखरों में अपनापन और उसके तुनकमिजाजी को मासूमियत का आवरण मान लेता था; पर यह सब धीरे-धीरे शक, उसके बाद कड़वाहट और अंततः दमघोंटू कैद में बदल गया। मैंने जब उसे एक कैफे में बुलाया तो आसपास संगीत बह रहा था पर मुझे लग रहा था जैसे हत्या के बाद खून धोने के लिए नल खुला हो और पानी फालतू बह रहा हो। मैंने शांत स्वर में कहा—“जब इस ब्रह्मांड में असंगति ही अंतिम लय है तो रिश्ते कैसे निष्कलंक संगीत हो सकते हैं! सांस बिना जीवन नहीं और विश्वास बिना रिश्ता नहीं, और जब ये टूटते हैं तो सिर्फ शरीर बाकी रह जाता है, आत्मा कब्र में चली जाती है।” उसका चेहरा देखने में उतना ही सरल था जितना किसी निर्दोष भक्त का, मगर उसकी आँखों में वही भय था जो पेशी पर खड़े अपराधी की पुतलियों में लिखा होता है। उसने ठंडी आवाज़ में पूछा—“क्यों?” और यह ‘क्यों’ पेट की अंदरूनी आंतों को निचोड़ने वाला होता है, क्योंकि इसका जवाब मृत्यु प्रमाणपत्र के हस्ताक्षर जैसा अंतिम होता है। मैंने हल्की हँसी के व्यंग्य में कराह छिपाते हुए कहा—“इसे ‘नैचरल डेथ’ समझो; ताकि किसी पर दोष न चढ़े।” और यह कहकर मैं बाहर निकल आया, जैसे कोई डॉक्टर लाश के पास से निकल जाए और घोषणा कर दे कि इलाज संभव नहीं था। बाहर की सड़क पर अनगिनत लोग आ-जा रहे थे, हज़ारों रौशनी जल रही थीं, पर मुझे लगा पूरी दुनिया अंधेरी हो गई है और जो रौशनी थी, वह किसी शवपेटिका में रखे शरीर पर जलते बल्ब की तरह निर्बल और अर्थहीन। भीतर व्यंग्य मुस्कुरा रहा था कि देखो, हमने बड़े सलीके से एक मौत को ‘प्राकृतिक’ बता दिया, पर आत्मा कराह रही थी कि यह मौत प्राकृतिक नहीं, निर्मम हत्या थी—और हत्यारा भी वही था जिसने इसे ‘स्वाभाविक’ लिखकर सच से चुप्पी का सौदा कर डाला।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७९ ☆ व्यंग्य – “लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो !” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७९ ☆

?  व्यंग्य – लाइक करो, शेयर करो, और फॉलो करो ! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वो जमाना गया जब लोग अख़बार में “आज का विचार” पढ़कर दिन की शुरुआत करते थे। अब लोग सुबह उठते ही मोबाइल उठाकर “आज की वायरल रील” देखते हैं  जिसमें कोई बाल सुखा रहा है, कोई नाच रहा है, और कोई तो बिना वजह ही होंठ चबा कर भद्दे इशारे रही है। गोया कि होंठ चबाना भी कोई राष्ट्रीय खेल बन गया हो। टिकटॉक और रील्स ने दुनिया को ऐसा उलझाया है कि लोग अब रील्स पर दिखाने के लिए कपड़े बदलते हैं। एक आउटफिट से तीन-तीन रील्स!  कपड़ों की एक्सपायरी डेट नहीं होती पर रील्स की होती है । “अरे ये वाला तो कल ही पोस्ट किया था, आज दूसरा पहनना पड़ेगा, नहीं तो लोग ट्रोल करेंगे।”

एक जमाना था जब लोग खाने से पहले “बिस्मिल्लाह” कहते थे, अब “वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन” करते हैं। यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ये खा रहे हैं, या इंस्टाग्राम पर दिखाने के लिए खाने की एक्टिंग  कर रहे हैं? खाना ठंडा हो जाए तो चलेगा, पर रील का एंगल परफेक्ट होना चाहिए। “अरे ज़रा चम्मच ऐसे पकड़ो, लाइट इधर से आ रही है… हाँ! परफेक्ट! अब चबाओ स्लो मोशन में।” खाना अब पेट नहीं, फोन भरता है। रील की इनकम पेट भर सकती है।

घर की दादी, जो पहले तक ‘व्हाट्सएप’ को ‘व्हाट्शैप’ कहती थीं, अब खुद ‘रील क्वीन’ बन चुकी हैं। चश्मा चढ़ाकर ट्रेंडिंग साउंड सुनती हैं और बोलती हैं  “बहू, ये वाला गाना तो हमारे ज़माने का है, इस पर हम भी रील बनाएंगे!” और फिर शुरू होता है परिवार का सामूहिक प्रोडक्शन हाउस। पोते कैमरामैन बनते हैं, बेटा डायरेक्टर, पति कैमरामैन और दादी हीरोइन। “दादी, एक बार और! इस बार हाथ थोड़ा ऊपर उठाना।” दादी की फिटनेस एक्सरसाइज अब योग से नहीं, रीटेक से हो रही है।

“आज ये डायलॉग ट्रेंड में है, इसका वीडियो बना दो ज़रा”, पत्नी कहती हैं, और फिर शुरू होता है उनका गायन सह अभिनय जिसे यदि शंकर महादेवन देख लें तो सुर की समाधि में चले जाएं। “अरे सुनो न, लिप सिंक गड़बड़ हो गया, एक बार और!” पति जो पहले ऑफिस में बॉस की डाँट खाते थे, अब घर में ‘डायरेक्टर बीवी’ की सुनते हैं। “तुमने फोन हिला दिया! फोकस बिगड़ गया! तुमसे एक काम सही से नहीं होता!” अब शादी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पति कितनी अच्छी रील बना देता है।

दुनिया हकीकत से अधिक, कैमरे में जी रही है। कभी लोग पार्क में टहलने जाते थे, अब ट्राइपॉड लेकर रील्स बनाने जाते हैं। पेड़-पौधों से बात नहीं करते, उनके पीछे खड़े होकर डांस करते हैं। वो  पेड़ भी सोचता होगा  “मुझे ऑक्सीजन देने दो या बैकड्रॉप बनने दो, कुछ एक तो तय करो!” और अगर गलती से कोई इनकी शूटिंग के बीच से निकल जाए, तो उसे ऐसे घूरते हैं जैसे उसने फ़िल्मफेयर अवार्ड छीन लिया हो। “अरे भाई, दिखता नहीं शूटिंग चल रही है? अब पूरा फिर से बनाना पड़ेगा!” वो बेचारा सोचता है  “ये पार्क है या मल्टीप्लेक्स शूट स्टूडियो?”

अब रील्स ही असली हैं,ज़िंदगी बैकग्राउंड में चल रही है। शादी हो तो पहले पंडित नहीं, कैमरामैन बुलाओ। “बेटे की शादी में तो पाँच रीलमेकर रखे थे, हर एंगल से कवर हो!” लड़का लड़की एक दूसरे को नहीं, कैमरे को देख रहे होते हैं। फेरे ले रहे हैं, पर निगाह फोन पर होती हैं । लाइव पर “कितने व्यूज आए?” मेहमान खाना नहीं खा रहे, रील बना रहे हैं। “अरे पनीर  टिक्का कैसा लग रहा है फ्रेम में?”

टिकटॉक बंद हुआ तो लगा कुछ चैन मिलेगा, पर इंस्टाग्राम छा गया। और यूट्यूब शॉर्ट्स ने तो जैसे कसम खा ली है “हर इंसान को कम से कम एक वीडियो ज़रूर बनवा कर ही मानेंगे।” अब तो फेसबुक भी रील्स लेकर आ गया। यानी, भागो कहीं भी, रील्स का भूत पीछा करेगा ही। लिंक्डइन पर भी लोग प्रोफेशनल रील्स बना रहे हैं “देखिए कैसे मैं ऑफिस में कॉफी पीते हुए प्रोडक्टिव रहता  हूँ।”

बुद्धिजीवी अब ‘बुक क्लब’ नहीं, ‘रील क्लब’ में शामिल हैं। “कैसे बनाएं वायरल वीडियो?” पर सेमिनार होते हैं। “लाइक नहीं आए तो आत्ममंथन करें”  ये आज का गंभीर विषय है। प्रकाशक मुझसे बोला सर कविता कहां ले आए ? कुछ युवाओं के लायक लिखी पांडुलिपि लाइये मसलन ” रील से पैसे कैसे बनाएं”

इंजिनियरिंग कॉलेज  में पहले इंजीनियरिंग पढ़ाई जाती थी, अब “वायरल मार्केटिंग 101” कोर्स शुरू होने वाला है। MBA की डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी है “10 लाख फॉलोअर्स”। नौकरी के इंटरव्यू में अब पूछा जाता है  “आपके इंस्टाग्राम पर कितने फॉलोअर्स हैं?” बायोडाटा में लिखा होता है ,  “अनुभव: 5 साल, वायरल रील्स: 12″।

अब लोग परीक्षा में कम नंबर आने पर नहीं, वीडियो पर कम लाइक्स आने पर बच्चे डिप्रेशन में जाने लगे हैं। “मम्मी, मेरी रील पर सिर्फ 200 लाइक्स आए!” माँ दिलासा देती है “बेटा, टाइमिंग गलत थी, शाम को पोस्ट करना था।” पहले बच्चे बोर्ड एग्ज़ाम के रिज़ल्ट से डरते थे, अब रील के व्यूज से। काउंसलर भी अब नई समस्याओं से जूझ रहे हैं “डॉक्टर साहब, मेरी रील वायरल नहीं हो रही, मुझे लगता है मैं असफल हूँ।”

सोचता हूँ, ये रील बनाने वाले आखिर करते क्या हैं? तो जवाब आता है  “रील बनाते हैं, और वही करते हैं।” दिन की शुरुआत रील से, अंत रील से। सुबह उठे  “गुड मॉर्निंग “। नाश्ता किया  “ब्रेकफास्ट रील”। ऑफिस गए  तो भी रील”। लंच किया  “फूड रील”। शाम को जिम किया तो “वर्कआउट रील”। रात को सोए  “गुडनाइट रूटीन रील”। यानी, ज़िंदगी एक बड़ी रील है और हम सब उसमें महज एक्स्ट्रा किरदार हैं।

घर में बर्तन गिरते हैं तो पत्नी चिल्लाती नहीं, कहती है  “सुनो न, मैं फिर से गिराती हूं, जरा इसका स्लो मोशन बना लो!” नया आइडिया है। है न! बच्चा रो रहा है तो पहले फोन उठाओ। “अरे रुको, रिकॉर्डिंग ऑन करने दो, ये ‘क्यूट बेबी क्राइंग’ रील बनेगी।” बच्चा चुप हो गया तो बोलो “बेटा, फिर से रो ले, एंगल गड़बड़ हो गया था।” प्यार भी अब रिहर्सल माँगता है।

पढ़ाई छोड़, करियर छोड़, रिश्तेदार छोड़ ,  सब छोड़ कर लोग अब केवल “वायरल होने” की साधना कर रहे हैं। गुरुकुल में अब योगासन नहीं, “कंटेंट स्ट्रैटेजी” सिखाई जाती है। संन्यासी भी अब हिमालय नहीं, स्टूडियो में वर्चुअल ध्यान करते हैं  “फॉलोअर्स बढ़ाने का मंत्र, अगली रील में।” गलती से जो कोई वीडियो चल गया, तो समझो  “ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया।” तब फिर क्या, बाकी ज़िंदगी वही फॉर्मूला रिपीट करो। “वो वाला ही डांस फिर करो, वही बैकग्राउंड, वही ओछे चमकीले  कपड़े!”

हाल यह है कि दुनिया के बड़े-बड़े सवालों के जवाब हमें शॉर्ट वीडियो में मिलते हैं। चाहे जीवन का उद्देश्य हो, या सिक्स पैक ऐब्स बनाने की शिक्षा । सब कुछ 30 सेकंड में समझा दिया जाता है। “क्वांटम फिजिक्स समझें 60 सेकंड में!” “महाभारत की पूरी कहानी  एक रील में!” ज्ञान की गहराई अब 30 सेकंड की है। पहले गुरु कहते थे  “बेटा, वर्षों लगेंगे समझने में”, अब रील गुरु कहते हैं  “बस एक मिनट दो, सब क्लियर हो जाएगा।” यानी, ज्ञान अब ज्ञान नहीं  कंटेंट बन गया है। और सबसे बड़ी बात  “फॉलो करना मत भूलना!”

ऊपर की ओर स्क्रॉल करते हुए समय कब बीत जाता है, किसे पता चलता है। सुबह 10 बजे फोन खोला  सोचकर  “बस एक रील देखूँ।” अचानक नज़र घड़ी पर  दोपहर के 2 बज गए! ये कौन-सी आइंस्टीन की थ्योरी है जिसमें 10 मिनट    4 घंटे के बराबर हो रहे हैं? रील्स में टाइम ट्रैवल होता है, बस भविष्य की तरफ ही। वापस नहीं आ सकते। लोगों की नींद उड़ गई है, टाइम पास हो रहा है। सोने जा रहे हो  “चलो सोते हैं, पर पहले एक रील।” फिर एक, फिर एक, और सुबह की नमस्ते! रात 2 बजे अचानक याद आता है  “अरे, कल मीटिंग है!” पर फिर सोच “चलो एक और लास्ट देख लेते हैं।”

हम सब डिजिटल कंटेंट क्रिएटर बनकर उस डॉलर की प्रतीक्षा में हैं जो हमारी रील्स के व्यूज, लाइक, रीपोस्ट और सब्सक्राइब से टोटल टाइम ऑफ वॉचिंग से आएगा। बच्चे अब डॉक्टर इंजीनियर से अधिक बड़े  “इन्फ्लुएंसर” बनना चाहते हैं। “मम्मी, मैं बड़ा होकर यूट्यूबर बनूँगा!” पहले माता-पिता कहते थे  “बेटा, पढ़-लिख कर कुछ बनो”, अब बच्चे कहते हैं  “पापा, आपको नहीं पता, मेरे 5000 फॉलोअर्स हैं!” और पापा गर्व से कहते हैं “हमारा बेटा इन्फ्लुएंसर है!”

जिस दिन इंटरनेट डाउन हो गया, उस दिन ये पूरी रील असेंबली पूछेगी , “अब मैं क्या करूं, जाऊं तो जाऊं कहाँ?” लोग सड़कों पर भटकेंगे, हाथ में फोन लिए, निगाह खाली स्क्रीन पर। “नेटवर्क कब आएगा?” ये नया राष्ट्रीय प्रश्न बन जाएगा। बच्चे रोएंगे, बड़े घबराएंगे, और दादी बोलेंगी  “हमारे ज़माने में तो बिजली जाती थी, फिर भी हम  रहते थे।” पर कोई सुनेगा नहीं, क्योंकि बिना रील्स के सुनने की आदत ही खत्म हो गई है।

असली ज़िंदगी अब “अनस्क्रिप्टेड कंटेंट” लगने लगी है , बोरिंग, बिना एडिट का, बिना फिल्टर का। “अरे ये तो रियल लाइफ है, कौन देखेगा इसे?” रिश्ते अब “कोलैबोरेशन” हैं। “चलो मिलते हैं और एक साथ मस्त रील बनाते हैं।” दोस्ती की परिभाषा बदल गई  “जो तुम्हारी हर रील पर पहला कमेंट करे, वही सच्चा दोस्त।”

और हाँ, सबसे बड़ी बात,  अब तो शादियों में भी लड़के लड़की एक दूसरे के इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखते हैं। “लड़की है तो अच्छी, पर फॉलोअर्स कम हैं।” “लड़का कमा तो अच्छा रहा है, पर एस्थेटिक सेंस नहीं है, रील्स देखो इसकी।” बायोडाटा में अब लिखा होता है  “नेट वर्थ: 50 लाख, फॉलोअर्स: 1 लाख”। और सास-बहू की पहली बातचीत “बेटा, तुम रील्स बनाती हो? हमारे घर की पारंपरिक पोशाक पहनकर एक बना देना, वायरल हो जाएगी!”

@ कैमरा ऑफ. लेखक ऑफ. दिमाग स्टैंड बाई मोड पर।

पर रुकिए… ये आर्टिकल तो बहुत लंबा हो गया। अब इसे भी 30-30 सेकंड के पार्ट में बाँटना पड़ेगा। क्योंकि अब कोई पूरा आर्टिकल पढ़ता ही कहाँ है? सब रील में चाहिए। तो अगली रील में मिलते हैं  “व्यंग्य, पर शॉर्ट फॉर्म में!”लाइक करो, शेयर करो, और हाँ… फॉलो करना मत भूलना!

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७८ ☆ व्यंग्य – “जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७८ ☆

? व्यंग्य – जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

जेन जी ने एक ऐसी भाषा गढ़ी है जिसने व्याकरण नामक चीज को सीधे तौर पर चैलेंज कर दिखाया है। यह भाषा नहीं, एक क्रांति है, जिसे हम ‘जेन जी’ यानि जनरेशन जी की ‘लोल’ भाषा कह सकते हैं। यह भाषा मोबाइल और चैट की दुनिया की वह शॉर्टहैंड है जहां शब्दों का मतलब बदल जाता है, वर्ण विलीन हो जाते हैं और इमोजी एक पूरी वाक्य की भूमिका निभाने लगते हैं। इसे समझने के लिए आपको किसी डिक्शनरी की नहीं, बल्कि संदर्भ के अनुरूप एक विशेष समझ की जरूरत होती है।

इस भाषा का मूल सिद्धांत है ‘जो दिखे सो नहीं, जो लिखे सो है’। मसलन, ‘यू’ ‘आप’ नहीं, ‘तू’ हो जाता है। ‘आर’ ‘हैं’ नहीं, ‘हो’ बन जाता है। और ‘लोल’? अरे भाई, ‘लोल’ तो हंसने की आवाज़ नहीं, जीवन जीने का एक तरीका है! लाफ आउट लाउडली। यह भाषा इतनी लचीली है कि इसमें ‘थैंक्यू’ ‘थेंक्स’ बनता है, फिर ‘थैंक्स’ से ‘टी.एन.एक्स’ और फिर सीधे ‘टी.क्यू’ तक पहुंच जाता है। यानी, जाकी रही भावना जैसी , वह समझे बोली वैसी।  शब्दों में अक्षरों का वजन घटता चला जाता है। क्लासिक टेस्ट क्रिकेट, फिफ्टी फिफ्टी, 20 .. 20 से होते हुए इस भाषा में सुपर ओवर बन जाता है। युवाओं की इस भाषा में अक्षरों की बलि चढ़ाना आम बात है। स्वरों को तो जैसे दरबार से निकाल बाहर किया गया है। ‘व्हाट आर यू डूइंग?’ जैसा भद्दा और लंबा वाक्य इस नई भाषा में ‘व्हाट आर यू डूइंग?’ न रहकर ‘वट आर यू डूइंग?’ बन जाता है और फिर धीरे-धीरे ‘वट आर यू डूइन’ और अंततः ‘डूइन वट?’ तक सिमट चुका है। यह एक तरह से भाषा का मिनिमलिज्म है, जहां कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा भाव अभिव्यक्त हो रहे हैं।

रही सही कसर असर दार इमोजी निकाल रहे हैं। इमोजी इस मजेदार भाषा की आत्मा हैं। एक हंसता हुआ चेहरा जिसकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं (एल.ओ.एल.) वह खुशी, गम, हैरानी, या फिर सिर्फ ‘यार, मजाक था’ तक का संदेश दे सकता है।

एक लाल दिल (लव) प्यार, दोस्ती, शुभकामना या फिर ‘ओके, बाय’ का इशारा कर सकता है। यह एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है जो देश, काल, जाति, धर्म के बंधन तोड़कर सीधे दिल से दिल तक रात बिरात बात पहुंचाती नजर आती है।

इस भाषा ने एक नए प्रकार के सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है। वे जो इस कोड को समझते हैं और वे जो नहीं समझते। एक मां का अपने बेटे के मैसेज ‘पी.सी.एम., जी.एन., टी.सी., आई.एल.वाय’ को देखकर हैरान होना और फिर उसे समझने के लिए इंटरनेट की मदद लेना, आज के दौर की एक सामान्य घटना है। ‘पी.सी.एम.’ यानी ‘पेरेंटल कंट्रोल मच’, ‘जी.एन.’ यानी ‘गुड नाइट’, ‘टी.सी.’ यानी ‘टेक केयर’ और ‘आई.एल.वाय’ यानी ‘आई लव यू’। यह एक छोटा सा संदेश एक पूरी भावनात्मक बातचीत को समेटे हुए है। इसके सम्मुख बंद हो चुके मार्स कोड वाला टेलीग्राम पानी भर रहे हैं।

निष्कर्ष के तौर पर, यह ‘लोल’ भाषा महज शब्दों का संक्षिप्तिकरण नहीं है। यह एक सांस्कृतिक बदलाव है, जो तकनीक और समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश है। युवाओं के पास समय का अभाव हो सकता है, या उनकी आयोडीन नमक सेवन वाली बुद्धि की कुशाग्र समझ का परिणाम हो सकता है ।  पुरानी पीढ़ी को यह अजीब लगे, लेकिन यह नई पीढ़ी की अपनी मौलिकनपहचान है।

इसलिए अगली बार जब कोई आपको ‘आई.डी.के.’ (आई डोंट नो) लिखे, तो नाराज न हों। बस ‘एस.एम.एच.’ (शेकिंग माय हेड) करते हुए ‘टी.टी.वाय.एल.’ (टॉक टू यू लेटर) लिख दें। क्योंकि अगर आपने इस भाषा का विरोध किया, तो ‘जी.ओ.ए.टी.’ (ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम) जनरेशन आपको ‘टी.एल.डी.आर.’ (टू लॉन्ग, डिड नॉट रीड) कहकर नजरअंदाज कर देगी। और हां, ‘एफ.वाय.आई’ (फॉर यूअर इनफार्मेशन), इस पूरे लेख को पढ़ने के लिए ‘टी.वाय’ (थैंक यू)!

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ – हास्य-व्यंग्य – “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  उई… छिपकली…

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

उस दिन मैं अपने कार्यालय के स्टाफ रूम में सहकर्मियों के बीच बैठा कहकहों के साथ चाय पी रहा था कि अचानक ऊपर से एक छिपकली मेरे सिर पर आ गिरी। छिपकली का मेरे सिर पर गिरना इतना अप्रत्याशित था कि मैं सिर को झटका देता हुआ उठ खड़ा हुआ। छिपकली जिस ओर भागी उस ओर बैठे लोग कुर्सियों से उचक कर किनारे खड़े हो गए। शरीर से हट्टी – कट्टी किंतु हृदय से कमजोर कुछ महिलाओं की चीख निकल गई – उई…. छिपकली….।

लोग अपनी घबराहट छिपाने हंसते हुए छिपकली को देख रहे थे जो पुनः दीवार पर चढ़ कर एक कीड़े को पकड़ने के लिए शिकारी की मुद्रा बना चुकी थी। छिपकली के लिए आदमी के ऊपर गिर जाना भले ही कोई उल्लेखनीय घटना न हो किंतु आदमी के लिए छिपकली का उसके ऊपर गिरना विशेष बात है।

छिपकली कितने बजे गिरी, उस समय का चौघड़िया क्या था, छिपकली शरीर के किस अंग में गिरी, किस दिशा से गिरी, गिर कर किस दिशा में भागी, उसका रंग – रूप क्या था, आदि – आदि बहुत सी ऐसी बातें हैं जो छिपकली के गिरते ही आदमी के मन में उठती हैं क्योंकि इन तमाम बातों के गणित से ही छिपकली के गिरने पर प्राप्त होने वाला शुभ – अशुभ फल निकाला जाता है।

बुजुर्गों का कहना है कि छिपकली के ऊपर गिरते ही स्नान करके भोले शंकर की स्तुति करना हितकर होता है। भोले के स्मरण से जहरीली छिपकली के गिरने से उत्पन्न होने वाले अशुभ फलों की आशंका समाप्त हो जाती है। यों पहले भी मेरे ऊपर दो – चार बार छिपकली गिर चुकी है किंतु यह पहला अवसर था जब कोई छिपकली दस लोगों की उपस्थिति में मेरे ऊपर गिरी और तरह – तरह के प्रश्न खड़े कर गई। मैं सोचता हूं कि न जाने उस छिपकली की मुझसे क्या दुश्मनी थी अथवा इतने लोगों के बीच उसने मुझमें क्या पाया जो वह सबके सामने मेरे सिर पर आ गिरी, अरे उसे गिरना ही था तो पूर्व छिपकलियों की भांति अकेले में मुझ पर गिर कर अपनी इच्छा पूरी कर लेती। जब से मुझ पर छिपकली गिरी है मैं बहुत परेशान हूं। मुझे तरह – तरह के सुझाव मिलना प्रारम्भ हो गए।

सर्वप्रथम मुझे अपने स्टाफ की महिला सदस्यों से सलाह मिली कि जहां भी बैठना हो पहले ऊपर देख लेना चाहिये कहीं ऊपर छिपकली तो नहीं है। कुछ महिलाओं ने तो यह भी कहा कि हम जहां भी बैठें थोड़ी – थोड़ी देर में ऊपर देखते रहें तो छिपकली के ऊपर गिरने से बच सकते हैं। मैं उनकी सूझबूझ और दूरदर्शिता पर हैरान था कि जिनके ऊपर जीवन में कभी छिपकली नहीं गिरी वे भी छिपकली को लेकर कितनी सतर्क हैं और एक मैं हूं जिस पर अनेक बार छिपकली गिर चुकी है फिर भी उससे बचने का उपाय नहीं सोच पाया।

लंच का समय समाप्त होने के कुछ ही देर बाद पूरे ऑफिस में यह खबर फैल चुकी थी कि आज स्टाफ रूम में मेरे सिर पर छिपकली गिर गई। मेरा अपनी कुर्सी पर बैठ कर कार्य करना मुश्किल हो रहा था। दो – दो, तीन – तीन के दल में सहकर्मी मुझसे मुलाकात करने आ रहे थे और मेरे प्रति मंगलभाव व्यक्त करते हुए मुझसे विस्तार में छिपकली प्रसंग सुनना चाह रहे थे। कुछ लोग छिपकली के ऊपर गिरने संबंधी स्वतः के अनुभव मुझे सुना रहे थे। कुछ महिलाएं और उनके स्वभाव से मेल खाते पुरुष स्टाफ रूम में जा जाकर उस दुस्साहसी छिपकली को देख रहे थे जो कुछ देर पहले मुझ पर गिरी थी। पूरे ऑफिस में छिपकली कांड गूंज रहा था। बड़े बाबू अपने आसपास बैठने वाले कर्मचारियों को बता रहे थे कि हम भारतीय हर मामले में पीछे हैं। हमारे यहां की छिपकलियां भी कोई छिपकलियां हैं अरे, छिपकलियां तो अफ्रीका में होती हैं जो गिरना नहीं उड़ना जानती हैं।

कुछ देर बाद मेरे सामने कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष व कुछ अन्य पदाधिकारी खड़े थे। अध्यक्ष महोदय मुझसे कह रहे थे – प्यारे भाई, चिंता मत करो छिपकली क्या चीज है यदि पहाड़ भी तुम्हारे ऊपर गिर जाए तो भी हम तुम्हारा बाल बांका नहीं होने देंगे। छिपकली शायद हमारी एकता और ताकत से परिचित नहीं थी। उन्होंने आवाज लगाई – कर्मचारी एकता, साथियों ने जवाब दिया – जिंदाबाद, जिंदाबाद। उन्होंने फिर आवाज लगाई – जो हमसे टकराएगा, साथियों ने जवाब दिया – चूर चूर हो जाएगा। मैंने अपने सुख – दुख के साथियों को चाय पिलाकर विदा किया।

इतने में मेरे एक बुजुर्ग साथी जो घर पर होमियोपैथी द्वारा लोगों का इलाज करते थे और दवाओं की एक इमरजेंसी पेटी ऑफिस में भी रखते थे मेरे पास आ पहुंचे। उन्होंने मुझे दवा की एक पुड़िया देते हुए कहा – यह लो इसे अभी एक गिलास पानी के साथ पी लो और किसी भी तरह के इन्फेक्शन की ओर से निश्चिंत हो जाओ। मैं दवा लेने से बचना चाहता था किंतु वे दवा देने का हाथ आया मौका खोना नहीं चाहते थे। अंततः वे विजयी हुए। इसी समय चपरासी ने आकर मुझसे कहा कि आपको फौरन साहब ने बुलाया है।

मैं हाथ जोड़े साहब के सामने खड़ा था। “सुना है तुम्हारे ऊपर छिपकली गिर गई”, साहब ने प्रश्न किया। मैंने कहा जी हां। वे बोले – यह बात तुम्हें सबसे पहले मुझे बताना थी। मेरे ऑफिस में क्या हो रहा है इसकी जानकारी मुझे इतनी देर से दूसरों के द्वारा मिल रही है। आप जानते नहीं कि मुझसे जानकारी छुपाने पर मैं आपको सस्पेंड भी कर सकता हूं। मैने कहा – सर मामूली सी घटना थी इसलिए….। वे बोले – घटना मामूली है या गंभीर यह तुम तय करोगे तो फिर मैं यहां किसलिए हूं। मैंने कहा, क्षमा करें सर गलती हो गई। उन्होंने कहा ध्यान रखिए आइंदा ऐसी गलती न हो। मैं जी सर कहकर वापस जाने को मुड़ा। वे बोले,  ठहरो आधे दिन के अवकाश का आवेदन देकर घर जाओ, स्नान करो, भगवान को अगरबत्ती लगाओ। छिपकली गिरने के बाद किसी को स्पर्श तो नहीं किया। मैंने कहा, जी नहीं सर। वे बोले – गुड। मैं आधे दिन का अवकाश लेकर घर की ओर बढ़ चला। डोरवेल सुनकर अम्मा जी ने दरवाजा खोला। “बेटा आज जल्दी आ गए”। हां अम्मा सिर पर छिपकली गिर गई थी इसलिए, ऐसा कहते हुए मैंने घर के अंदर प्रवेश करने कदम बढ़ाए ही थे तभी अम्मा ने कड़क आवाज में कहा – बहू से पानी भेज रही हूं बाहर से नहाकर ही घर के अंदर घुसना। मैं नहाने के लिए घर के बाहर दरवाजे पर खड़ा छिपकली को कोसता हुआ पानी आने की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०७ ☆ लघु व्यंग्य – उधार के रिश्ते ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघु व्यंग्य  – ‘उधार के रिश्ते’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०७ ☆

☆ लघु व्यंग्य ☆ उधार के रिश्ते

‘किराने का सामान कहां से लेते हो?’

‘सुल्तान किराना स्टोर से।’

‘उसकी दूकान से मत लो। वह दूसरे धरम का है। गुरूजी ने इन लोगों की दूकान का सामान लेने से मना किया है।’

‘हमें नहीं मालूम। कभी उसका धरम पूछा नहीं। आदमी ठीक है।’

‘तो क्या गुरूजी की बात नहीं मानोगे?’

‘मान लेंगे। फिर सामान कहां से खरीदें?’

‘हमारी दूकान से खरीदो। एकदम खालिस माल मिलेगा। दाम भी सही।’

‘ठीक है, लेकिन उसके यहां हमारा उधार चलता है। कभी टोकता नहीं। तुम्हारे यहां चलेगा क्या?’

‘ना भइया, अपने यहां उधार वुधार नहीं चलता। तुम उसी दूकान से खरीदो। ये गुरू लोग तो फालतू बरगलाते रहते हैं। इनके फेर में मत पड़ो।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७७ ☆ व्यंग्य – “बुरा जो देखन मैं चला” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७७ ☆

?  व्यंग्य – बुरा जो देखन मैं चला ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कबीर दास जी ने कहा था  ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’  सीधा सा अर्थ है कि दुनिया में बुराई ढूंढने निकलोगे तो शायद ही मिले, लेकिन अगर अपने अंदर झांकोगे तो पाओगे कि सबसे बड़ी बुराई तो हमारे भीतर ही विद्यमान है। पर आज का मनुष्य इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं। वह दुनिया को कोसता है, व्यवस्था को गाली देता है, पर अपने अंदर झाँककर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।

श्रीमान सच्चिदानंद जी की आईने की दुकान सूनी पड़ी थी, जबकि ठीक सामने, ‘मॉडर्न मुखौटा एम्पोरियम’ में भीड़ ही भीड़ है ।

एक दिन मैं सच्चिदानंद जी से मिलने पहुँचा। दुकान के अंदर अलग अलग आकार प्रकार के आईने लटके हुए थे, जिन पर धूल की हल्की परत  जम गई थी। सच्चिदानंद जी चश्मे के पीछे से किसी किताब का अध्ययन कर रहे थे, दुनिया की इस भीड़-भाड़ से कोसों दूर वे खुद से साक्षात्कार कर रहे थे।

मेरे पूछने पर कि व्यवसाय कैसा चल रहा है, उन्होंने  गहरी सांस ली और एक तीखी, परन्तु शांत मुस्कान के साथ बोले, “आजकल लोगों को अपना चेहरा देखने से डर लगता है। वे आईने में नहीं, सेल्फी तक ‘फिल्टर’ में देखने के आदी हो गए हैं।”

सामने वाली दुकान में तरह-तरह के मुखौटे सजे थे। ‘सेल्फी-रेडी स्माइल’ वाला मुखौटा सबसे ज्यादा बिक रहा था, जो हमेशा एक जैसी, बिना दिल की चमकती हुई हंसी दिखाता। फिर था ‘सोशल मीडिया संजीदगी’ का मुखौटा, जिसे पहनकर लोग दुनिया को ज्ञान बाँटते नज़र आते, भले ही अंदर से खोखले हों। ‘कार्यालयीन कर्मयोगी’ का मुखौटा, ‘शादी-पार्टी में रिश्तेदारी का भाव’ वाला मुखौटा, और तो और छोटे-बड़े का भेद भाव हटाता मुस्कुराता  मुखौटा भी खूब चलन में था। लोग बड़े चाव से अपने लिए वक्त जरूरत के हिसाब से उपयोग के लिए कई कई मुखौटे चुन रहे थे, उसे पहनते, देखते और संतुष्ट होकर ले जाते।

सच्चिदानंद जी ने बताया, “पहले लोग आते थे। आईने के सामने खड़े होते, अपने चेहरे पर पड़ रही झुर्रियों, आँखों के नीचे के काले घेरों, या फिर मन के भावों को निहारते। कभी शर्मिंदा होते, कभी खुश। अपने आप से मिलते,  अपनी कमियाँ सुधारने का संकल्प लेते। अब तो लोग अपनी सच्चाई से ही भाग रहे हैं। असली चेहरा तो शायद याद ही नहीं रहता।”

यह विसंगति सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं है। यह तो हमारे सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन गई है। हम सुबह उठते ही मुखौटे पहनना शुरू कर देते हैं। ऑफिस जाते वक्त ‘आदर्श कर्मचारी’ का मुखौटा, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ वाला मुखौटा, दोस्तों के बीच ‘हैप्पी-गो-लकी’ का मुखौटा। हमने इतने मुखौटे ओढ़ लिए हैं कि असली चेहरा कौन सा था, यह भूल रहे हैं। आईना दिखाने वाले को हम दुश्मन समझने लगते हैं, क्योंकि वह हमें हमारा वह रूप दिखा देता है, जिसे हमने कब का दफन कर दिया है।

खुद की सच्चाई से सामना सबसे डरावना काम है।

मुखौटों की इस दुकान ने एक नया धंधा खोल दिया है , ‘मुँह देखी बातों’ का। यहाँ हर मुखौटे के लिए एक प्री रिकॉर्डेड बातें भी  हैं। ‘कैसे हो?’ के जवाब में ‘बढ़िया’ की रिकॉर्डिंग, ‘काम कैसा चल रहा है?’ के उत्तर में’ऑल इज वेल’ की आवाज। असलियत चाहे जो भी हो, मुखौटे और उसकी आवाज़ हमेशा लगभग एक जैसी रहती है। लोग इसी बनावटीपन में खुशी महसूस करते हैं। सच्चाई का सामना करने के लिए साहस चाहिए वह गुमशुदा है।

सच्चिदानंद जी की दुकान सूनी है, लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनका कहना है, “जिस दिन किसी  का मुखौटा टूटेगा, जब उसे अपनी असलियत का अहसास होगा, तो वह जरूर यहाँ आएगा। शायद तब वह खुद से मिल पाएगा।”

आज भले समाज का यह सामान्य चरित्र बन गया है कि हम दिखावे की इमारत खड़ी करने में मशगूल हैं, जबकि भीतर से हम  टूट रहे है। आईना हमें वास्तविकता से वाकिफ कर टूटने से बचा सकता है, लेकिन हमने तो मुखौटों के सहारे जीना सीख लिया है। सवाल यह है कि क्या हम कभी अपने वास्तविक चेहरे को देखने की हिम्मत जुटा पाएंगे? या फिर मुखौटों की यह भीड़ ही हमारी पहचान बनकर रह जाएगी? शायद, जब तक हम कबीर की उक्ति को अपने ऊपर लागू नहीं करेंगे, तब तक हम सच्चिदानंद जी की दुकान तक नहीं पहुँच पाएंगे। और तब तक, मुखौटे की दुकान की भीड़ बढ़ती ही जाएगी।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२४ – व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२४ 

☆ व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)

जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।

वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।

मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।

उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।

मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।

मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।

जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?

यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।

तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।

तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/05/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ इब्नबतूता पहन के जूता ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ इब्नबतूता पहन के जूता ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

इससे क्या फर्क पड़ता है कि जूता नाइकी, रीबोक, बाटा या अडीडास का है। मकसद सिर्फ एक है पाँवों की रक्षा करना। झाड़ झंखाड़ , काँटे, तपती रेत कीचड़,आदि से अलिप्त रखना।फिर वह मखमली, हीरेमोती जड़ित, चमड़े प्लास्टिक या कैनवास का साधारण कारीगर द्वारा बनाया गया भी हो सकता है।  रूप रंग और कीमत में भेद हो सकता है।ये अलग बात है कि कुछ लोग रंगों से उलझते हैं , कुछ रूप में तो कुछ कीमत के अहंकार में।

जूता अपने निर्माता की मंशा जानता है।जूते का दर्द , मुकुट किरीट या ताज नहीं अनुभव कर सकता क्योंकि वह सिर पर सवार होकर हुकूमत का नशा महसूस करवाता है। जो संसार के हर नशे में अव्वल है।ये भी उतना ही सच है कि हर मुकुटधारी का काम जूते के बिना नहीं चल सकता।पाँव उसके भी होते हैं।तलुए उसके भी चोटिल हो सकते हैं।ये और बात है कि वह मखमली कालीन पर चलते हुए भी चुभन महसूस कर सकता है।तब भी उसे लाखों के जूते चाहिए।

जूता केवल वस्तु नहीं है।उसका भी दिल है।वह बेहद खुश था जब जैदी ने उसे जाॅर्ज बुश पर उछाला था।इराक में मचाए गये महानाश का प्रतिशोध फिर भी कम था।जूता तब बेहद गर्वित अनुभव कर रहा था,इराकी मजलूमों की आवाज़ बनकर।फेंकनेवाले की नीयत का पता था उसे।पहली बार  खुद के बेशकीमती होने का एहसास हुआ था उसे।अपने निर्माता को मन ही मन धन्यवाद किया था उसने।

पर अब—-जूता उदास है, दुःखी है कि वह न्याय की आसंदी पर उछाला गया है।उसकी सिसकी हवाओं में घुल गयी है।इस गुजारिश के साथ कि कारीगरों ,शिल्पियों, शोषितों की आखिरी उम्मीद को  सूली पर मत चढ़ाओ।

अजीब बात है।थोड़ा वक्त ही बीता है न्याय की देवी को आँखों पर चढ़ाई गयी काली पट्टी को हटाए हुये।उसके दिव्य ही नहीं चर्म चक्षु भी खुल गये हैं।हैरानी है , फिर भी वह पहले से बेहतर नहीं देख पा रही है।वह देखना नहीं चाहती या देखकर भी अनदेखा कर रही है।वैसे भी प्रतिमाओं में न दिल होता है, न धड़कन।

सर्वत्र फैले तमस ने दृष्टि को बाधा पहुँचाई है।ऐसे में आँखों का क्या कसूर ?दिन में चिरागों की जरूरत पड़ रही है।बचपन में पढ़ी हुई पंक्तियां बेसाख्ता याद आ रही हैं—मोरक्को के–

“इब्नबतूता पहन के जूता

निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गयी

थोड़ी घुस गई कान में।।”

इसमें तूफान शब्द सांय सांय कर रहा है।हड़कंप मचा रहा है।

तूफान और जूते के संबंध और आदतों के बारे में कुछ भी छिपा हुआ तो नहीं है।तूफान शान्तिदूत बनकर तो आते नहीं।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 13 – हास्य-व्यंग्य – “”मूड” की बीमारी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  “मूड” की बीमारी

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 13 

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूड” की बीमारी ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

दुनिया के सभी डाक्टरों, वैद्यों, हकीमों, मनोवैज्ञानिकों और जादू – टोना जानने वालों से “मूड नामक बीमारी” से पीड़ित मुझ जैसे लाखों करोड़ों भाई – बहिनों का हाथ जोड़ कर निवेदन है कि वे जल्दी से जल्दी इस बीमारी का सस्ता और टिकाऊ इलाज ढूंढें। आज के युग में हृदय रोग और कैंसर की भांति “मूड” नामक बीमारी भी बड़ी तेज गति से फैलती हुई लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ रही है। इसके लिए लिंग और उम्र का बंधन नहीं है। बच्चे, जवान, बूढ़े सभी महिलाएं और पुरुष इसका शिकार हो रहे हैं। प्रेमी अथवा प्रेमिका के खराब मूड के कारण न जाने कितने प्रेमी जोड़े बिछुड़ के विरह गीत गाने लगते हैं तो अच्छा मूड लोगों को मिला भी देता है।

ख़िलाफ़-ए-मा’मूल मूड अच्छा है आज मेरा मैं कह रही हूं

फिर कभी मुझसे करते रहना ये भाव – ताव मुझे मनाओ

मजे की बात तो यह है कि मूड से जो पीड़ित हैं उन्हें तो नुकसान होता ही है, जो उनके संपर्क में आते हैं उन्हें भी नुकसान उठाना पड़ता है। घर के मुखिया का मूड खराब तो सारा घर परेशान, ऑफीसर का मूड खराब तो सारे कर्मचारी और यदि नेता का मूड खराब तो जनता परेशान। सब जानते हैं कि जनता का अच्छा/बुरा मूड यदि किसी को नेता बना देता है तो उसे गद्दी से उतार भी देता है। न जाने क्या बला है यह, कहां से आती है यह मूड की बीमारी और काम बनाकर अथवा बिगाड़ कर कहां चली जाती है।

कितनी भी कोशिश कर लो

            खुश रहने की…..

    मगर कोई न कोई कुछ कह कर…..

            मूड ऑफ कर ही देता है…..

मूड नहीं है तो आफत, मूड है तो आफत, दोनों तरफ से आफत। यदि मूड है तो पता नहीं आदमी क्या कर डाले, यदि मूड नहीं है तो भी पता नहीं आदमी क्या कर डाले। आजकल बिना मूड के कोई कुछ करना ही नहीं चाहता। काम तभी होगा जब मूड होगा।

प्रश्न उठता है कि मूड कब होगा, कैसे होगा ? कुछ लोग भाग्यवादी होते हैं। ऐसे लोग उस समय तक के लिए काम बंद कर देते हैं जब तक “मूड” नहीं आता, जब भूले भटके कहीं से मूड आता है और ऐसे लोगों के दिमाग की सांकल खटखटाता है तब ये लोग काम करते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो भाग्यवादी नहीं कर्मवादी हैं। ऐसे लोग मूड के आने का रास्ता नहीं देखते बल्कि तरह – तरह के उपायों से मूड बनाने का प्रयत्न करते हैं। कोई गीत – संगीत सुनकर, कोई चाय – कॉफी, सिगरेट पीकर, तमाखू खाकर, कोई एकांत में, कोई भीड़ में, तो कोई किसी बार में  2/4 पैग पीकर अपना मूड बनाते हैं। किसी का मूड किसी व्यक्ति विशेष, अपने परिजनों अथवा अपने पड़ोसियों या अधीनस्थों को डांटने – फटकारने, चीखने – चिल्लाने से ठीक हो जाता है तो कुछ लोगों का उछल – कूद करता मूड किसी से अपमानित होकर, जूते खाकर ठीक हो जाता है। कुछ बेचारे ऐसे भी हैं जिन्हें हर मानसिक परिस्थिति में काम करना पड़ता है –

जिंदगी ऐसी गुजर रही है कि

      मूड ऑफ़ होने पर भी…..

हंसना पड़ता है ताकि किसी….

      को पता न चले…..!!

जी हां भाईयो, इस कठिन जीवन में तमाम अवरोधों और तनावों के बाद भी यदि आपका मूड अच्छा है तो आप भाग्यशाली हैं और यदि किसी कारण से आपका मूड खराब हो जाए तो अपनी मुख मुद्रा और वाणी से किसी को अपने खराब मूड का पता न लगने दें। सामने वाले को खुश और सामान्य दिखते हुए सहज व्यवहार करें। कहते हैं कि फायदा उठाने का मौका आने पर लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं। चापलूस और चमचों से सीखना चाहिए वे कितना अपमान सहकर लातें खाकर भी अपना मूड ठीक रखते हैं और काम के व्यक्ति की चरण वंदना जारी रख कर अपनी सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। हम और आप न जाने कितने ऐसे अयोग्य व्यक्तियों को जानते हैं जो अपने मूड को वश में करके शीर्ष पर पहुंच गए और इसके विपरीत न जाने कितने योग्य व्यक्ति मूड के वशीभूत होकर खाक में मिल गए। सावधान, यदि आप “मूड” के वश में आ गए तो नुकसान पक्का है और यदि “मूड” को वश में कर लिया तो सफलता की राह भी पक्की है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७६ ☆ व्यंग्य – “रावण के पुतले की शर्त” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७६ ☆

?  व्यंग्य – रावण के पुतले की शर्त ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

  

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

 

विजयादशमी की शाम थी, बस्ती बस्ती दशहरा मैदान, रामलीला ग्राउंड, स्टेडियम जैसे मैदानों में रावण, कुंभकरण, मेघनाथ के ऊंचे से ऊंचे पुतले खड़े थे। हर ऐसे तमाशे में बिना बुलाए भीड़ जुट ही जाती है। बच्चे गुब्बारों के लिए पिता से जिद कर रहे थे, चाट के ठेले के गिर्द महिलाओं की भीड़ थी। चाट वाला चुनावी बजट में वित्त मंत्री के प्रलोभन भरी घोषणाओं जैसी फुलकियां बांट रहा था। आसमान में बादल छाए थे और रामलीला मैदान में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले हेकड़ी और अकड़ के साथ खड़े थे। ज्यों ही मुख्य अतिथि ने रावण दहन की कोशिश की कहीं तेज बारिश ने उत्सव को भीगो दिया, तो कहीं हवा ने मंच उड़ा दिए लोग हैरान थे दियासलाई की तीलियां जल नहीं रही थी। किसी न किसी कारण से रावण जलने का नाम ही नहीं ले रहा था।

परेशान आयोजकों ने रावण को निहारा तो

 रावण के पुतले से आवाज आई “मैं तो जलने को तैयार हूँ, हर साल जला तो लेते ही हो मुझे, पर इस बार मेरी एक छोटी सी शर्त है।

वह क्या? आयोजक पूछ बैठा।

रावण ने कहा मुझे तो स्वयं श्रीराम विद्वान मान चुके हैं, पता है न।

हां तो, आयोजक बोले।

मेरी शर्त यह है कि मुझमें आग वही लगाए जिसमें राम की सी मर्यादा का अंश तो हो!”

मेघनाथ का पुतला झनझनाया “हाँ, हमें जलाना है तो लक्ष्मण-सा कोई लक्षण तो दिखे जलाने वाले में!”

यह सुनकर मैदान में हलचल मच गई। एक नेता जी आगे बढ़े, जो हमेशा धर्म की बात करते थे। उन्होंने माचिस उठाई, रावण हँसा “अरे नेता जी, आपके भाषणों भर में राम हैं पर स्वयं तय कर लें यदि आपके काम में भी राम हो तो ही तीली जलाना।

वरना आग लगते ही मैं तुम पर गिर पड़ूंगा और मेरे पुतले की सारी आतिश बाजी तुम्हें समेट लेगी, नेताजी बगलें झांकते खिसक लिए। एक बड़ा कारोबारी सामने आया, उसने पुतले पर नोट उड़ाते हुए, आग लगाने की कोशिश की तो भी पुतला नहीं जला, नोटो के बंडल जरूर जल गए। रावण बोला अपने हर काम रुपए की ताकत से करवाने वाले अभिमानी सेठ, मैं तो कुबेर से उसका पुष्पक विमान छीन चुका हूं, तुम क्या मुझे काले रुपयों से आग लगाने की कोशिश कर रहे हो।

 सारा दिन सोशल मीडिया पर धार्मिक पोस्ट करने वाला एक जेन जी पीढ़ी का नौजवान आगे बढ़कर रावण दहन को उद्यत हुआ पर उसकी माचिस भी काम नहीं आई, कुंभकरण उबासी लेते हुए बोला “तुम तो मुझसे भी बडे सोने वाले निकले, नौजवान तुम सोशल मीडिया के सपनों की गहरी नींद सो रहे हो।

तुम कुंभकरण सरकारों को आग लगाकर जगाना चाहते हो, असंभव है।

आयोजक गिड़गिड़ाए हे रावण आप तो असाधारण विद्वान हैं, स्वयं भगवान राम आपकी विद्वता का लोहा मानते हैं, हम निरीह आयोजक हैं जो साल दर साल राम लीला दोहराते हैं, हमारी लाज अब आपके हाथ है, आप साल दर साल जलते आए हैं, आप ही बताइए आप कैसे जलेंगे ?

 रावण की आवाज गूँजी “आह, दिन पर दिन बुराइयों के लंबे, रंगीन रावण के पुतले तो बना लेते ही, पर अपने अंदर के अहंकार के रावण को पनपने देते हो। बिजली की चकाचौंध और आतिशबाजी में तो लाखों रुपए उड़ा देते हैं, पर पड़ोसी की मदद के लिए समय नहीं निकाल पाते। विजयादशमी का असली अर्थ है बुराइयों पर विजय! अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को नहीं जलाओ, पुतले वाले बाहरी रावण का दहन तो सहज रस्म मात्र है। वास्तविक विजय तो तब होगी जब राम हमारे व्यवहार में दिखेंगे, सिर्फ मुखौटों में नहीं। नीलकंठ के दर्शन की दार्शनिकता समझो। जब लक्ष्मण का संयम और समर्पण हमारे व्यवहार में झलकेगा, मर्यादा हमारे चरित्र का हिस्सा बनेगी, तभी रावण दहन सार्थक होगा। विजयादशमी का पर्व ऐसा तमाशा बनकर न रह जाए जहाँ रावण जलने से पहले हमारी नैतिकता जलती नजर आती है। आखिर आयोजकों ने प्रतिकूल मौसम के बावजूद किसी तरह कपूर आदि तेज ज्वलनशील पदार्थों से किसी तरह रावण दहन कर ही डाला, एक और साल सार्वजनिक रामलीला पूरी हुई।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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