हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१९ ☆ लन्दन से >> सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१९ ☆

?  लन्दन से >> आलेख – सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्यिक विमर्श में यह प्रश्न एक अनुत्तरित पहेली की भाँति उपस्थित रहता है, कि क्या आलोचना वास्तव में सृजन है?

सृजन (रचनाकर्म) क्रिएटिव और मौलिक होता है, जबकि आलोचना उसी सृजन का प्रतिबिंब। किंतु, यदि हम ‘सृजन’ शब्द को केवल ‘कुछ नया रचने’ के संकुचित अर्थ से मुक्त कर ‘अर्थ के नए आयाम उद्घाटित करने’ के व्यापक संदर्भ में देखें, तो समालोचना का स्वरूप नितांत भिन्न हो जाता है।

समालोचक भी अनुवादक की तरह मूल लेखक में परकाया प्रवेश कर एक दार्शनिक और वैचारिक यात्रा करता है।

आलोचना केवल रचयिता की त्रुटियों का लेखा-जोखा या ‘नीर क्षीर’ विवेक करने वाली कोई दंडात्मक प्रक्रिया नहीं है। यह एक जटिल और रचनात्मक अनुशासित प्रक्रिया है। एक आलोचक के लिए केवल प्रखर बुद्धि या भाषाई सामर्थ्य ही पर्याप्त नहीं है, उसे गूढ़ गंभीर साहित्यिक दृष्टि, प्रभूत ज्ञान, तार्किक क्षमता और उच्च स्तरीय संवेदनशीलता का धनी होना पड़ता है।

जब कोई आलोचक किसी कृति का विश्लेषण करता है, तो वह केवल शब्दार्थ नहीं करता, बल्कि वह उस कृति के पीछे के मनोविज्ञान, तत्कालीन परिवेश, निहित सिद्धांतों और अपनी पांडित्यपूर्ण अंतर्दृष्टि के माध्यम से उस कृति को एक नई दृष्टि प्रदान करता है। यहाँ आलोचक का कार्य एक ‘व्याख्याता’ से ऊपर उठकर एक ‘सह-स्रष्टा’ का हो जाता है। वह मूल रचना के अंतर्निहित भावों को अपनी विवेचना से  उन ऊँचाइयों पर ले जाता है जहाँ तक शायद सामान्य पाठक की दृष्टि न पहुँच सके। अतः, आलोचना, सृजन का प्रति सृजन (Re-creation) है।

साहित्य के क्षेत्र में अक्सर यह विवाद उठता है कि क्या आलोचक का मत अंतिम होता है? इस संदर्भ में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का मंतव्य आज भी  प्रासंगिक और वैचारिक रूप से प्रबुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि

“आलोचक हंस नहीं है। नीर-क्षीर की तरह सत्य-असत्य पर दिया हुआ उसका निर्णय ही अंतिम निर्णय नहीं हो सकता।”

यह कथन एक आलोचक की विनम्रता और उसके कार्य की सीमा को किसी हद में निर्धारित करता है। आलोचना का उद्देश्य किसी कृति पर ‘अंतिम मोहर’ लगाना नहीं, बल्कि समालोचना के पाठकों तथा मूल रचना के बीच एक ‘संवाद’ स्थापित करना है। साहित्य का प्रवाह निरंतर होता है। जैसे-जैसे समय बदलता है, समाज की दृष्टि बदलती है, और उसी के साथ एक ही कृति के नए अर्थ निकलकर सामने आते हैं। आलोचक का काम उस अर्थ की यात्रा को दिशा देना है, उसे किसी एक बिंदु पर स्थिर कर देना नहीं होता ।

भगवत गीता, रामायण, मानस, भागवत जैसे अमर ग्रन्थ इसीलिए अमर हैं, क्योंकि उन पर लगातार जाने कितने ही विद्वान सतत युग परिवर्तन के अनुरूप इन महान ग्रंथों की समालोचनाएं करते हुए इनके कथ्य और संस्कृति के संवाहक बने हुए हैं। गंभीरता से विचार करें, तो सृजन और आलोचना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक रचनाकार जब लिखता है, तो वह अनजाने में ही अपनी ही आलोचना भी रच रहा होता है । वह शब्दों का चयन करता है, काटता है, सँवारता है। दूसरी ओर, एक अच्छा आलोचक जब किसी कृति को परखता है, तो वह उस कृति की आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करता है।

आलोचना का ‘सृजन’ होना इस बात में निहित है कि वह पाठक और कृति के बीच एक सेतु बनाती है। वह साहित्य के सिद्धांतों, दर्शन और समाजशास्त्र के उपकरणों से सुसज्जित होकर रचना को व्यापक फलक प्रदान करती है। वह स्वयं एक साहित्यिक विधा के रूप में ‘ललित’ और ‘गंभीर’ दोनों है।

“आलोचना”, यदि “समालोचक” हो तो उसे ‘सृजन’ मानने में संकोच का अर्थ साहित्य को संकुचित दृष्टि से देखना है।

समालोचना न केवल साहित्य की सुरक्षा करती है, अपितु उसे नवाचार की ऊर्जा भी देती है। समालोचक वह दीपक है जो कृति के उन कोनों को प्रकाशित कर देता है जहाँ तक लेखक की स्वयं की दृष्टि नहीं पहुँच सकी थी, या जिसे पाठक उपेक्षित कर बैठे थे।

अंततः, हम यह कह सकते हैं कि आलोचना का कार्य अंतिम निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि प्रश्नों की एक शोध श्रृंखला खड़ी करना है। और जहाँ प्रश्न होते हैं, वहीं जिज्ञासा होती है, और जहाँ जिज्ञासा है, वहीं सृजन की अनंत संभावनाएं निहित हैं। समालोचना, इस अर्थ में, एक सतत चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है जो साहित्य को जड़ होने से बचाती है।

आलोचक को यदि उसकी विवेचना को सृजन के समानांतर बनाना है तो उसे लेखक की चाटुकारिता एवं रचना के प्रति पूर्वाग्रह, से बचना चाहिए। उसे स्वयं विषय का विद्वान बनना चाहिए, उसे लेखकीय काया प्रवेश का गुण धर्म आना चाहिए, तभी वह ऐसी समालोचना कर सकता है, जिसे विधा के स्वरूप में मान्यता है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १०८ – व्यंग्य – विज्ञापित स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – विज्ञापित स्वर्ग)  

☆  चुभते तीर # १०८ – व्यंग्य  – विज्ञापित स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शहर के मुख्य चौराहे पर लगे उस अस्सी फीट ऊँचे डिजिटल होर्डिंग ने पिछले एक पखवाड़े से जनता की रातों की नींद और दिन का चैन छीन रखा था, क्योंकि उस पर ‘अंतिम मोक्ष टावर्स’ की बुकिंग का विज्ञापन इस कदर चमक रहा था जैसे साक्षात चित्रगुप्त ने अपना नया स्टार्टअप खोल लिया हो। बिल्डर महोदय की मुस्कुराहट विज्ञापन में इतनी मखमली थी कि उसे देखकर मोहल्ले के वे लोग भी अपनी वसीयत बदलने पर विचार करने लगे थे, जिनके पास अपनी साइकिल के टायर बदलवाने के पैसे तक नहीं थे। उस ‘स्वर्गीय’ सोसाइटी के ब्रोशर में स्विमिंग पूल का पानी इतना नीला दिखाया गया था कि उसे देखकर समुद्र को भी अपने खारेपन पर शर्म आ जाए, और जिम की मशीनों को देखकर ऐसा लगता था कि वहाँ कसरत करने मात्र से इंसान की उम्र रिवर्स गियर में चलने लगेगी। दफ्तरों में बाबू लोग अपनी फाइलों को ताक पर रखकर इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या किश्तों में स्वर्ग खरीदा जा सकता है, जबकि हकीकत में उनकी पगार महीने के दसवें दिन ही आईसीयू में भर्ती हो जाती थी। सपनों का यह सौदागर शहर की हर दीवार पर अपनी कामयाबी के ऐसे पोस्टर चिपका रहा था, मानो वह कंक्रीट के जंगल में नहीं बल्कि बादलों के ऊपर कॉलोनी काट रहा हो, जहाँ प्रदूषण के बजाय केवल इत्र की बारिश होने का वादा किया गया था।

उस प्रोजेक्ट के लिए जिस जमीन का अधिग्रहण किया गया था, वह दरअसल शहर का वह पुराना कब्रिस्तान था जहाँ कभी शांति का साम्राज्य हुआ करता था, पर अब वहाँ ‘प्रगति’ का शोर गूँजने वाला था। आर्किटेक्ट ने नक्शे में इस तरह की बाजीगरी दिखाई थी कि पच्चीस बाई पचास के प्लॉट में भी उसे गोल्फ कोर्स और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नजर आ रहा था, जिसे देखकर भौतिक विज्ञान के सिद्धांत भी आत्मग्लानि से भर उठे थे। रेरा के नियमों को उस फाइल में इस तरह दबाया गया था जैसे किसी अपराधी को कालकोठरी में डाल दिया जाता है, और मंजूरी देने वाले अधिकारी के चेहरे पर वह दिव्य तेज था जो केवल करोड़ों के वारे-न्यारे होने के बाद ही अवतरित होता है। लोग अपनी जीवन भर की जमापूँजी उस काल्पनिक खिड़की के लिए लुटा रहे थे, जहाँ से बिल्डर ने ‘हिमालय के दर्शन’ कराने का वादा किया था, जबकि असल में वहाँ से केवल बगल वाले नाले की दुर्गंध और पड़ोसी के फटे हुए बनियान ही नजर आने वाले थे। विज्ञापनों की उस मायावी दुनिया में नैतिकता एक ऐसी वस्तु बन चुकी थी, जिसे सेल में भी कोई खरीदने को तैयार नहीं था, और मध्यमवर्ग अपनी ईएमआई के बोझ तले दबकर उस ‘अंतिम मोक्ष’ की प्रतीक्षा में अभी से ही अधमरा हुआ जा रहा था।

‘अंतिम मोक्ष टावर्स’ के उद्घाटन समारोह में स्वयं सूबे के सबसे बड़े रईस को रिबन काटने के लिए बुलाया गया और जैसे ही उन्होंने सोने की कैंची चलाई, वह डिजिटल होर्डिंग अचानक फट पड़ा। लोग घबराकर पीछे हटे, लेकिन वहाँ से धुआँ नहीं बल्कि हजारों की तादाद में असली सफेद कबूतर निकले जो देखते ही देखते काले कौवों में तब्दील होकर पूरे प्रशासन पर हमला करने लगे। ताज्जुब तो तब हुआ जब वह नवनिर्मित बिल्डिंग अपनी जगह से किसी रॉकेट की तरह ऊपर उठी और हवा में लटक गई, जहाँ से बिल्डर की आवाज गूँजी कि ‘पैसे पूरे मिल चुके हैं, अब फ्लैट भी स्वर्ग में ही मिलेंगे’। हतप्रभ भीड़ ने देखा कि वह पूरी बिल्डिंग अब कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी और उसके भीतर वे सभी अधिकारी और नेता कैद थे जिन्होंने इस फर्जीवाड़े में हिस्सा लिया था, जो अब हाथ जोड़कर नीचे उतरने की भीख माँग रहे थे। अंत में, वह पूरी इमारत एक विशाल बुलबुले की तरह फूटी और आसमान से नोटों की बारिश होने लगी, पर वे नोट असली नहीं बल्कि उन मासूमों की ‘बददुआओं’ के कागजी टुकड़े थे जिन्हें घर के नाम पर बेघर कर दिया गया था। पूरा शहर इस भयावह और चमत्कारी दृश्य को देखकर जड़ हो गया था, क्योंकि स्वर्ग की बुकिंग कराने वाले अब नरक के दरवाजे पर अपनी रसीदें लिए कतार में खड़े थे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०१ ☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०१ ☆ 

☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सुखद मृत्यु ही गीत सुनाए,

शुभ कर्मों को कर लेना।

मत करना अपमान साधु का,

ईश्वर से कुछ डर लेना।

 **

पैसा-पैसा खूब कमाया,

जोड़-जोड़ जीवन बीता।

नहीं किसी की करी भलाई,

जाता फिर रोता, रीता।

 *

मत घमंड पैसे का करना,

दान, पुण्य कर तर लेना।

 **

त्रुटियाँ तो सबसे हो जाएँ,

पर स्वीकार करो इनको।

क्षमा शक्ति है यहाँ अपरिमित,

कर लो तुम अच्छे कल को।

 *

हँसते और हँसाते रहना,

झरनों-सा तुम झर लेना।

 **

अंत समय में किए कर्म सब,

आ जाते मन, आँखों में।

दृश्य हजारों घूम-घूम कर,

दर्शाते हैं लाखों में।

 *

पश्चाताप न रहे किसी का,

हँसते-हँसते मर लेना।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆ —

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ज़रूरतमंद” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆

☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शहर के हर चौराहे पर

आज भी इकट्ठे होते हैं लोग

काम की तलाश में

कहीं भटकते नहीं है

बस खड़े रहते है

इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद

आकर उन्हें ले जाएगा

अपने साथ लेकर चलते हैं

दिन भर का भोजन पानी

जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है

उनकी आस उसी तरह

कम होती जाती है

सर्वहारा वर्ग आज भी

आशाओं और व्यवस्था के बीच

झूलता लटकता अपना और

अपने परिवार का बोझ ढोता

ज़िंदा है इस कायनात में

इन असंगठित लोगों के लिए

सरकारों की प्रतिबद्धता

सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में

जो शायद ही कोई

साकार रूप ले पाती है

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५७ ☆ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५७ ☆

✍ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

हिस्से में  खेत  घर न ही खलिहान चाहिए

ख़िदमत को माँ पिता मेरे भगवान चाहिए

 *

रब रूठ जाए मुझसे तो परवाह कब मुझे

माँ जैसा सिर्फ़ एक निगहबान चाहिए

 *

सर जिसके सामने न  उठा उम्र भर सकूँ

ऐसे बशर का कोई न अहसान चाहिए

 *

हालात हों बुरे तो उसूलों पे ही रहूँ

क़ायम मुझे पहाड़ सा ईमान चाहिए

 *

हर रंग के गुलों से महकता जो  हर समय

दुनिया बने इक एक ऐसा ही गुलदान चाहिए

 *

मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों

इंसान को  हयात पै आसान चाहिए

 *

गद्दार है जो देश के माफिक न सोचते

हमको वतन परस्त ही इंसान चाहिए

 *

क्या अगले पल हो इसका भरोसा नहीं है पर

सौ वर्ष का बशर को है सामान चाहिए

 *

ग़ैरों का ग़मगुसार खुदाया मैं हो सकूँ

मालिक मेरे अरुण को ये इमकान चाहिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६१ – खामोश गूँज… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – खामोश गूँज।)

☆ हेमंत साहित्य # ६१ ☆

✍ खामोश गूँज… ☆ श्री हेमंत तारे  

कोई नहीं सीखाता

खामोशियों को पढना

यां कि

उन्हें सुनना, समझना, सुलझाना |

 

खामोशियों का होता है

स्वरचित व्याकरण, गणित

और

हिज्जों का खेल,

जो आ ही जाता है

हर किसी को, देर – सबेर

जीवन पाठशाला के

मुडे – तुडे पन्नों में सिमटे पाठों से

जिन्हें बार – बार पढा जाते हैं

जाने अन्जाने में,

गुरू घंटाल बहुतेरे |

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६९ ☆ पर्यावरण मुक्तक ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “पर्यावरण मुक्तक“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६९ ☆

✍ पर्यावरण मुक्तक ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

पर हाँ इनकी अपनी कोई बंदगी नहीं होती।

धूप में खड़े सरे राह सबको बाँटते हैं छाँव

इतनी बड़ी मिसाल जहान में कहीं नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

हर डाल पर कुदरत की रोशनी नहीं होती।

पक्षियों का बसेरा, राहगीरों का भी सहारा,

बिन इनके धरा पर कभी हरियाली नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

इनके मन की भाषा किसी ने यूँ सुनी होती।

पतझड़ में भी हँसी नवपल्लव की सजावटें

हार मान लेना तो इनकी रवानी नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

इनकी कथा किसी किताब में लिखी नहीं होती।

फल फूल छाँव दे जीवन सँवारना ही किताब है

बिना इस किताब के कोई जिंदगी नहीं होती।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२० ☆ जीवलगा… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२० ?

☆ जीवलगा ☆  प्रभा सोनवणे ☆

रात्र काजळी

भासते आगळी

तू असता जवळी

जीवलगा!

 

पहाट प्राजक्ती

तुझीच आसक्ती

तूच माझी प्रीती

जीवलगा!

 

सकाळ सोनेरी

येता सामोरी

नाव तुझे अधरी

जीवना!

 

येता दुपार

तुझाच विचार

न पडे विसर

जीवलगा!

 

सांज कातर

गेलास तू दूर

मनी हुरहूर

जीवलगा  !

 

पंचप्राण माझे

तुलाच वाहिले

मुक्त मी जाहले

जीवलगा!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ३० ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ३० ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

गीतांजलीतील कविता वाचत असताना कवी आणि देव यांच्या भावनिक नात्यांतील वैविध्यतेचे पदर जसजसे उलगडत जातात तसतसा एक प्रश्न वाचकांच्या मनात रुंजी घालू लागतो; तो म्हणजे या दोघांचं नातं तरी कोणतं आहे? आणि आश्चर्य म्हणजे हाच प्रश्न टागोरांना देखील पडतो. गीत क्र. ७७ मधे ते देवाला म्हणतात, “तू माझा कोण आहेस? पिता आहेस? बंधू आहेस? सखा आहेस? तू आहेस तरी कोण? समजा मी तुला पिता मानलं तर या नात्यातला जो आदर आहे तो मला तुझ्यापासून लांब ठेवेल. मग मी तुझ्याजवळ कसा येऊ? तुझा हात कसा धरू? तुला जर सखा मानलं तर मी कायमचा तुझ्याजवळ राहू शकणार नाही. तुला जर बंधू मानलं तर माझं जे संचित आहे त्यात तुला वाटणी द्यावी लागेल. ती कशी देऊ? शेवटी कवी म्हणतो मी तुला सरळ माझं जीवन समर्पित करतो. म्हणजे या नात्याचा प्रश्नच निर्माण होणार नाही कारण मग मी तुझ्याशी एकरूप होऊन जाईन. ”

देव पिता म्हणून:-

ते देवाला पिता मानून प्रार्थना करतात की जिथे मनात भीती नसेल, मान ताठ असेल, जिथे ज्ञान मुक्त असेल, अशा स्वातंत्र्याच्या स्वर्गात मला घेऊन चल. तिथे सत्य, शांती, प्रेम, अहिंसा यांचेच राज्य असेल. (गीत ३५)

देव माता म्हणून:-

ते देवाला माता मानतात. त्यांना मातेला काहीतरी अर्पण करण्याची इच्छा होते. पण त्यांच्या लक्षात येतं की, सुख, आनंद, कीर्ती, संपत्ती या गोष्टी तर तिनेच दिल्या आहेत. त्याच तिला कशा परत द्यायच्या. त्यामुळे ते म्हणतात, माझ्या दुःखावर फक्त माझी सत्ता आहे. म्हणून त्या दुःखाश्रूंची माळच मी तुला वाहीन. ती तुझ्या वक्षावर रूळत राहील आणि तुझ्या हृदयाशी हितगुज करेल. (गीत ८३)

देव बालक म्हणून:-

त्यांना कधी कधी देव हा बालकाच्या रूपातही दिसतो. कवीने सागर किनारी वाळूत खेळणाऱ्या बालकांना वैश्विकरूप दिले आहे. त्या बालकांच्या निरागसपणात कवीला देव दिसतो. बालकांच्या हास्यात, नृत्यात, गोबऱ्या गालात त्यांना देवाची किमया दिसते, निसर्ग दिसतो आणि तो सर्व व्यापी परमेश्वर भेटतो. (गीत ६०, ६१)

देव पती म्हणून:-

मधुरा भक्ती ही आपल्या अध्यात्मात महत्त्वाची मानली जाते. त्याचे उत्तम उदाहरण म्हणजे चैतन्य महाप्रभू! या भक्तीमध्ये देव प्रियकर म्हणजे जोडीदार असतो. कवी स्वतः पत्नीच्या भूमिकेत जाऊन प्रियकराच्या रूपात देवाला पाहतो. या कवितेत (गीत ५२) कवीला म्हणजे पत्नीला वाटतं प्रियकराच्या गळ्यात असणारा हार खूप सुंदर आहे. पण त्याला विचारायचं कसं, देतोस कां म्हणून? पण सकाळ झाल्यावर तिला वाटतं तो आपल्यासाठी काहीतरी आठवण म्हणून नक्की ठेवून जाईल. तो जाता क्षणी ती धावत शेजेकडे येते. निदान एखादं फूल, निदान फुलाची‌ पाकळी ठेवून जाईल. प्रत्यक्ष पाहते तो एक तळपणारी तलवार ठेवलेली असते. प्रेयसी/पत्नी (म्हणजे कवी) खूप घाबरते. पण तिच्या लक्षात येतं की ज्याअर्थी प्रियकराने दिलेली वस्तू आहे त्या अर्थी त्यामागे काहीतरी त्याचा उद्देश असेल. या तलवारीने आता आपल्याला पाश तोडण्याची भीती वाटणार नाही आणि एकदा पाश तोडले की आपण आपलं सगळं आयुष्य त्याच्यावर ओवाळून टाकू शकतो. तोपर्यंत ही तलवार जपून ठेवायला हवी.

(अपूर्ण, पुढील भागात)

—–

गीत : ८८

DEITY of the ruined temple! The broken strings of Vina sing no more your praise. The

bells in the evening proclaim not your time of worship. The air is still and silent about you.

In your desolate dwelling comes the vagrant spring breeze. It brings the tidings of

flowers ⎯ the flowers that for your worship are offered no more.

Your worshipper of old wanders ever longing for favour still refused. In the eventide, when fires and shadows mingle with the gloom of dust, he wearily comes back to the ruined temple with hunger in his heart.

Many a festival day comes to you in silence, deity of the ruined temple. Many a night of worship goes away with lamp unlit.

Many new images are built by masters of cunning art and carried to the holy stream of

oblivion when their time is come.

Only the deity of the ruined temple remains unworshipped in deathless neglect.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ८८

तुटल्या तारा अन् भग्न वीणा।

इथे न भाकित कोणी करूणा॥

*

पूजन, अर्चन कधी नसे जरी।

सहजच कोणी घंटानाद करी॥

*

भग्न तुझ्या या मंदिरी निर्जन।

उनाड वारा, बनुनी सज्जन॥

*

पुष्पांचा गंधीत निरोप आणी।

जी नच पडली तुझिया चरणी॥

*

जो होता कधी तुझा पुजारी।

कृपाप्रसादा वंचित तो मुरारी॥

*

मनःशांती त्या कुठे मिळेना।

म्हणुनि येई तुझिया स्तवना॥

*

येई परतुनि तो भग्न मंदिरी।

घेऊनि तशीच आर्तता उरी॥

*

संध्याप्रकाश अन् छाया जेंव्हा।

मिसळत धूलीकणांशी तेंव्हा॥

*

असो दिवाळी, दसरा, होळी।

कुणी न दर्शना ये वेळोवेळी॥

*

काळोख्या रात्री अंधारातून।

कोणी न लावी समई परतून॥

*

लबाड, व्यवहारी लोकांनी।

मंदिरे निर्मिली, जुनी त्यागुनि॥

*

विस्मरतील सारे, ती ही नंतर।

दुर्लक्षाचे दुर्लक्षित अंतर॥

*

भग्न न होई पुन्हा, भग्न ते।

मृतास पुन्हा, मरण न येते॥

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

गीत : ८९

NO more noisy, loud words from me ⎯ such is my master’s will. Henceforth I deal in

whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.

Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my

untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.

Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time and let the midday bees strike up their lazy hum.

Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the

pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him; and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ८९

हळुवार सुरांनी, गाईन गाणी

बोल हृदीचे, गीतात गुणगुणी॥

*

नित्यच येथे चाले, देणे घेणे

मी परि जाईन, येता बोलावणे॥

*

ऐनपणाच्या भरात असता

साद तयाची, कानी घुमता॥

*

वसंत नसता, फुले फुलावी

मधु त्यातला, भ्रमरा खुणवी॥

*

काळ जातो, भल्याबुर्‍या कलही

सखा सौंगडी, भेटो लवलाही॥

*

असे अचानक त्याचे बोलवणे

असो सार्थ वा अर्थहीन भेटणे॥

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

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गीत ९०

ON the day when death will knock at thy door what wilt thou offer to him?

Oh, I will set before my guest the full vessel of my life ⎯ I will never let him go with empty hands.

All the sweet vintage of all my autumn days and summer nights, all the earnings and gleanings of my busy life will I place before him at the close of my days when death will knock at my door.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ९०

पुसे मज आज, सखा पांडुरंग।

पाहुणा यमासम, येता दारी सांग॥

*

करिसि का स्वागता, तुझ्या घरी।

दडपुनि दार का, पाठवी माघारी॥

*

शिकवण हीच, देई मम संस्कृती।

पाहुणा न जाये, रिकाम्या हाती॥

*

दिस शरदाचे, ग्रीष्मातल्या रात्री।

गोड समजुनी, वाढीन मी पात्री॥

*

ठेवीन सामोरी आयुष्याचा पेला। 

कमाई नि कोठी देईन त्याजला॥

*

मृत्यूचे दूत, माझ्या दारी आले।

स्वागता तयांच्या, प्राण माझे दिले॥

*

– क्रमशः भाग ३०

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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