हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८१ – व्यंग्य – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८१ – व्यंग्य  – सरकारी दफ्तर में ईलू-ईलू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

ज्ञापन संख्या: इश्क/001 – राजकीय प्रेम एवं अनुशासनिक कार्रवाई 

महोदया, उपर्युक्त विषयांतर्गत सादर निवेदन है कि जब से आपने इस कार्यालय के धूल-धूसरित गलियारों में अपनी सैंडलों की ‘टिक-टिक’ के साथ आमद दी है, यहाँ का प्रशासनिक ढांचा किसी ढीले पड़े तंबू की तरह डगमगा गया है। नियमानुसार एक कनिष्ठ कर्मचारी की दृष्टि केवल सरकारी पंजियों के मलबे में दबी होनी चाहिए, किंतु आपकी आँखों का ‘रडार’ पिछले कई पखवाड़ों से लगातार मेरी ‘स्थापना प्रभारी’ वाली कुर्सी की ओर ही लक्षित पाया गया है। आपकी आँखों का यह अनधिकृत संचरण उस गुप्तचर की भांति है जो सीमा पार की गतिविधियों पर नजर रखता है, जबकि मेरा हृदय कोई प्रतिबंधित क्षेत्र नहीं है। आपके इस निरंतर ‘दृष्टि-आक्रमण’ ने मेरे भीतर के अनुशासन को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया है, जैसे कोई आवारा सांड लहलहाती फसल को तहस-नहस कर देता है। आपके इस कृत्य से मेरे कार्य-निष्पादन की क्षमता में गिरावट आई है और मेरी गंभीरता किसी फटे हुए ढोल की तरह बजने लगी है।

आपके टाइपिंग करने की शैली भी किसी सामान्य लिपिक जैसी नहीं, बल्कि किसी युद्धघोष जैसी प्रतीत होती है। जब आप की-बोर्ड पर उंगलियाँ चलाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे हृदय के किसी कोने में कोई ‘नोटशीट’ टाइप हो रही हो। टाइपिंग से अधिक समय आप मेरी भाव-भंगिमाओं के ‘निरीक्षण’ और ‘समीक्षा’ में व्यतीत कर रही हैं, जो सीधे तौर पर राजकीय समय का दुरुपयोग है। वरिष्ठ अधिकारी के चेहरे को इतनी गहराई से पढ़ना, जितना कि आप पढ़ रही हैं, केवल ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ का काम है, किसी कनिष्ठ सहायक का नहीं। आपकी इस खोजी दृष्टि ने मुझे इस कदर विचलित कर दिया है कि कल मैंने आकस्मिक अवकाश की अर्जी पर हस्ताक्षर करने के बजाय गलती से ‘आई लव यू’ लिखकर डिस्पैच कर दिया। यह स्थिति किसी भी लोक सेवक के लिए वैसी ही लज्जास्पद है जैसे किसी पटवारी का रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाना।

अब बात करते हैं उस ‘मुस्कराहट’ की, जो आपकी लबों पर किसी सरकारी वादे की तरह अधूरी और रहस्यमयी बनी रहती है। यह मुस्कराहट न तो पूर्णतः ‘साधारण शिष्टाचार’ की श्रेणी में आती है और न ही इसे ‘विभागीय सौजन्य’ माना जा सकता है। यह तो उस सूक्ष्म भ्रष्टाचार की तरह है जो फाइल के साथ नत्थी होकर आता है और हृदय की तिजोरी में सेंध लगा देता है। आपके इस अधर-प्रदर्शन से मेरे रक्तचाप में वह ‘उछाल’ दर्ज किया गया है, जो शेयर बाजार के सेंसेक्स में भी विरल ही देखा जाता है। दफ्तर में हंसी-मजाक की एक सीमा होती है, किंतु आपकी मुस्कराहट तो उस ‘परमिट’ की तरह है जो बिना किसी जांच के सीधे दिल के रास्ते को ग्रीन सिग्नल दे देती है। यदि यही स्थिति रही, तो मुझे आशंका है कि हमारे विभाग का बजट घाटा कम हो न हो, मेरे हृदय का सुकून जरूर दिवालिया घोषित हो जाएगा।

अतः आपको इस ‘कारण बताओ नोटिस’ के माध्यम से निर्देशित किया जाता है कि आप आगामी तीन कार्यदिवसों के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। आपकी इस मुस्कराहट को ‘शिष्टाचार’ के बस्ते में डालकर रद्दी में फेंक दिया जाए या इसे ‘शुद्ध प्रेम’ की श्रेणी में वर्गीकृत कर एक नया रजिस्टर खोल दिया जाए? प्रशासन में अनिश्चितता किसी महामारी से कम नहीं होती, इसलिए वस्तुस्थिति का स्पष्टीकरण अनिवार्य है। यदि यह प्रेम है, तो इसे मौखिक या लिखित रूप से ‘सबमिट’ करने में इतनी देरी क्यों? क्या आप भी किसी सरकारी टेंडर की तरह ‘लोएस्ट बिडर’ (न्यूनतम बोली लगाने वाले) का इंतजार कर रही हैं? याद रखिए, प्रेम का आवेदन यदि समय पर नहीं मिला, तो मैं इसे ‘लैप्स’ (व्यपगत) मान लूंगा और फिर आपको अपील करने के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने पड़ेंगे, जहाँ का बाबू मुझसे भी बड़ा सनकी है।

गजानन बाबू की कलम यहाँ और भी पैनी हो गई जब उन्होंने लिखा कि प्रेम की इस फाइल पर धूल जमने से पहले ही इस पर कोई ‘एक्शन’ लिया जाना चाहिए। आप कनिष्ठ सहायक हैं, इसका अर्थ यह कतई नहीं कि आप वरिष्ठों के हृदय के साथ ‘ऑडिट’ खेलें। प्रशासन की फाइलें तो सालों-साल चलती हैं, मगर भावनाएं कोई ‘पेंशन योजना’ नहीं हैं जो मरने के बाद भी मिलती रहें। यदि आपकी नियत में खोट नहीं है और आँखों का यह रडार किसी गंभीर ‘प्रोजेक्ट’ का हिस्सा है, तो कृपया अपनी भावनाओं का ‘एफिडेविट’ (शपथ-पत्र) बनवाकर पेश करें। दफ्तर में प्रेम का अंकुर फूटते ही ईर्ष्या की लपटें उठने लगती हैं, और मैं नहीं चाहता कि हमारे इस ‘गुपचुप गठबंधन’ की खबर किसी चपरासी के माध्यम से कैंटीन तक पहुंचे। इसलिए जो भी कहना है, उसे ‘अर्जेंट’ मार्क करके सीधे मेरी मेज पर पटक दें।

आपके जवाब के आधार पर ही भविष्य की ‘कार्य-योजना’ तैयार की जाएगी। यदि उत्तर सकारात्मक रहा, तो हम लंच ब्रेक के समय को ‘विशेष चर्चा सत्र’ में बदल देंगे और शाम की चाय को ‘साझा निवेश’ के रूप में देखेंगे। यदि यह नकारात्मक रहा, तो मुझे अपनी कुर्सी की दिशा बदलनी पड़ेगी ताकि आपकी आँखों की ‘लेजर किरणों’ से मेरा बचाव हो सके। दफ्तर की राजनीति में वैसे ही बहुत झमेले हैं, अब यह प्रेम का नया ‘सर्कुलर’ मुझे किसी बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। मैं एक जिम्मेदार पद पर हूँ, और मेरा दिल कोई ‘धर्मशाला’ नहीं है जहाँ कोई भी आकर बिना अनुमति के मुस्कुरा दे। अपनी स्पष्टवादिता का परिचय दें, क्योंकि शासन में पारदर्शिता ही सफलता की कुंजी है। यदि आपने चुप्पी साधे रखी, तो इसे आपकी ‘मौन स्वीकृति’ मानकर मैं स्वयं ही इस प्रेम-विवाह का ‘गैजेट नोटिफिकेशन’ जारी कर दूंगा।

लेकिन यहाँ एक बड़ा सस्पेंस है जिसे पढ़कर आपके पैरों तले की जमीन खिसक जाएगी। असल में, गजानन बाबू जिस मुस्कराहट को प्रेम समझ रहे थे, उसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी। चपला दरअसल गजानन बाबू के चेहरे के उस बड़े से ‘मस्से’ को देख रही थी, जिस पर सुबह से एक मक्खी बार-बार आकर बैठ रही थी और गजानन बाबू उसे फाइल से उड़ाने के चक्कर में खुद को किसी रोमन सम्राट जैसा महसूस कर रहे थे। चपला की मुस्कराहट प्रेम का आमंत्रण नहीं, बल्कि उस मक्खी और गजानन बाबू के बीच चल रहे ‘कुश्ती’ के मुकाबले का लाइव टेलीकास्ट देख रही थी। वह तो बस यह सोचकर हंस रही थी कि कैसे एक ‘स्थापना प्रभारी’ एक छोटी सी मक्खी के सामने अपनी सारी सत्ता और गरिमा हार चुका है। यह खुलासा होने के बाद गजानन बाबू का सारा प्रशासनिक ईगो किसी फटे हुए टायर की तरह फुस्स होने ही वाला था।

जब चपला ने इस ज्ञापन का जवाब दिया, तो वह सस्पेंस और भी गहरा गया। चपला ने लिखा कि “महोदय, मेरा रडार आपकी कुर्सी पर नहीं, बल्कि आपकी कुर्सी के ठीक पीछे वाली दीवार पर टंगे उस ‘सरकारी कैलेंडर’ पर था, जिसमें छुट्टियों की सूची दी गई है। रही बात मुस्कराहट की, तो वह आपकी उस ‘खुली हुई जिप’ को देखकर थी, जिसे आप अपनी ‘वरिष्ठता’ के अहंकार में बंद करना भूल गए थे।” गजानन बाबू ने जैसे ही यह पढ़ा, उनके चेहरे का रंग किसी कच्ची ईंट जैसा पीला पड़ गया। उन्होंने तुरंत अपनी फाइलों का ढेर सामने कर लिया और उस दिन के बाद से कभी किसी कनिष्ठ सहायक की मुस्कराहट का ‘वर्गीकरण’ करने की जुर्रत नहीं की। सस्पेंस तो यह है कि अब गजानन बाबू खुद चश्मा पहनकर केवल फाइलों के पन्ने पलटते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं अगली बार उनकी ‘कार्य-योजना’ का कोई नया छेद सार्वजनिक न हो जाए।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८५ ☆ गीत – तुझको स्वयं बदलना होगा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८५ ☆ 

☆ गीत – तुझको स्वयं बदलना होगा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।

जीवन की हर बाधाओं से

हँसते – हँसते लड़ना होगा।।

 *

कर्तव्यों से हीन मनुज जो

अधिकारों की लड़े लड़ाई।

प्रकृति के अनुकूल न चलता

आत्ममुग्ध हो करे बड़ाई।

झूठे सुख के लिए सदा ही

देख रहा ना पर्वत – खाई।

धन  – संग्रह की होड़ लगी है

मन कपटी है चिपटी काई।

 *

हे मानव ! तू सँभल ले अब भी

तुझको स्वयं भुगतना होगा।

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।।

 *

जो सन्तोषी इस धरती पर

वह ही सुख का मूल्य समझता।

वैभवशाली, धनशाली का

सबका ही सिंहासन हिलता।

उद्यम कर, पर चैन न खोना

अपना लक्ष्य बनाकर चलना।

परहित – सा कोई धर्म नहीं है

देवदूत बन सबसे मिलना।

 *

समय कीमती व्यर्थ न खोना

तुझको स्वयं समझना होगा।

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।।

 *

सामानों की भीड़ लगाकर

अपने घर को नरक बनाए।

सारा बोझा छूटे एक दिन

उल्टे – पुल्टे तरक चलाए।

उगते सूरज योग करें जो

उनकी किस्मत स्वयं बदलती।

कर्म और पुरुषार्थ, भलाई

यहाँ – वहाँ ये साथ हैं चलतीं।

 *

परिस्थितियां जो भी हों साथी

तुझको स्वयं ही ढलना होगा।

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३९ – बाल कहानी — जादूई पेन – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी — जादूई पेन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३९

बाल कहानी — जादूई पेन ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

दादीजी सुबह जल्दी उठीं। देखा, श्रेया को बुखार था। 

‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था। 

‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’ 

‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा। 

मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी। 

कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’ 

‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा। 

तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’ 

‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया। 

‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’ 

‘‘जादूई पेन!’’ 

‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’ 

‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’ 

‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’ 

‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई। 

आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था। 

श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी। 

वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’ 

‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं। 

श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं। 

जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’ 

उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’ 

‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा। 

लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’ 

यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’ 

इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’ 

‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’ 

‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’ 

‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’ 

‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया। 

—–  

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

दिनांक- 10.01.2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९१ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९१ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- मी तोवर कधी कल्पनाही न केलेल्या एका अनोख्या अशा घटनेच्या पाऊलखुणांचे धागेदोरे सुद्धा या प्रकाशन समारंभाशीच जोडले जाणार आहेत आणि याचा मुख्य दुवा शांतपणे वाचण्यासाठी ऑफिसमधून घरी येताना सोबत आणलेल्या त्या सर्क्युलर मधेच लपलेला आहे हे त्या क्षणी तरी मला जाणवलेलं नव्हतं एवढं खरं! )

नितिन देशपांडे यांच्याशी फोनवर बोलल्यानंतर पूर्णतः निश्चिंत झालेल्या मनाने मी घरी परत आलो. आईने दार उघडलं तेव्हा समोरचं दृश्य बघून माझ्या आनंदाला पारावरच राहिला नाही. आमचा संपूर्ण हॉल माझ्या ‘आपल्या’ माणसांनी गच्च भरून गेलेला होता! मी फोन करण्यासाठी बाहेर पडल्यापासून परत येईपर्यंतच्या फार फार तर दहा-पंधरा मिनिटात घरातलं चित्र पूर्णतः बदलूनच गेलं होतं! आरती/सलिल तर आले होतेच, तसेच माझे सासूसासरे, बहिण, मेहुणे, हे ही सगळे! सर्वांच्या उपस्थितीनेच एरवी फारसा वावर नसलेलं ते घर आनंद आणि उत्साहाने भरूनच गेलं एकदम!

प्रकाशन समारंभ दुसऱ्या दिवशी संध्याकाळी चार वाजता होता. अगदी लवकर म्हटलं तरी दुपारी तीन वाजेपर्यंत मी हॉलवर पोचलो तरी पुरेसं होतं. शं. ना. नवरेंना सकाळी स्टेशनवर उतरून घेऊन लॉजवर पोचवणे, त्यांचा चहा, नाष्टा, आणि दुपारचं जेवण होईपर्यंत अधूनमधून इतर बाहेरची कामं आवरण्यापुरतं थोडा वेळ बाहेर जाऊन एरवी नितिन शं. ना. ना पूर्ण वेळ कंपनी देऊन संध्याकाळी बरोबर पावणेचारला त्यांना घेऊन हाॅलवर येणार होता. फोन उपलब्ध नसल्याने या सर्व कामांमधे एखाद्या वेळी कांही अडचण/ अडथळे आलेच तर आमच्यात कम्युनिकेशन गॅप रहाण्याची शक्यता गृहीत धरून नितिनने आधीच ‘कांही अडचण आलीच तर ती मी परस्पर निभावून नेईन’ असं सांगून मला पूर्णतः निश्चिंत केलेलं होतं. त्यामुळे मी अतिशय मोकळेपणाने समोरच्या माझ्या माणसांमधे आनंदाने मिसळून गेलो!

रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली आणि मला अचानक ऑफिसमधून घरी आणलेल्या त्या सर्क्युलरची आठवण झाली! तोवर सर्वांची निजानिज झालेली होती. उद्याच्या कार्यक्रमाचंही माझ्या मनावर कसलंच दडपण नव्हतं. त्यामुळे या निश्चिंततेच त्या सर्क्युलरच्या विचाराने हळूच डोकं वर काढत माझ्या मनाचा ताबा घ्यायला सुरूवात केली. सोमवारी ऑफिसला जाण्यापूर्वी हे सर्क्युलर लक्षपूर्वक वाचून त्यातले महत्त्वाचे मुद्दे डायरीत नोंद करून ठेवणं अत्यावश्यक होतं, पण ते करायचं कधी? उद्याचा पूर्ण दिवस घरातली सर्वांची लगबग, माझ्या मनातली प्रकाशन समारंभाची व्यवधानं आणि दिवसभराच्या दमणुकीनंतर कार्यक्रम संपवून मला घरी परत यायला उशीर झाला तर ते सर्क्युलर वाचणं शांतपणे होणार कधी आणि कसं? … या विचाराने तर मला झोपच लागेना. अखेर कंटाळून मी अंथरूण सोडलं. माझी ब्रिफकेस घेऊन किचनमधे गेलो. डायनिंग टेबल जवळचा लाईट आॅन करून ब्रिफकेसमधलं सर्क्युलर बाहेर काढलं. डायरी आणि पेन सोबत घेऊन ते सर्क्युलर वाचायला सुरुवात केली…! ती आठ-दहा पानं म्हणजे सर्व स्तरावरील बॅंक कर्मचाऱ्यांसाठी सुरू झालेली ‘स्वेच्छानिवृत्ती’ साठीची अतिशय आकर्षक अशी नवीन योजना होती! जे या योजनेच्या विविध नियम आणि अटीत बसत असतील ते या योजनेचा लाभ घेऊ शकणार होते! हे सर्क्युलर वाचल्यानंतर त्यातील मुख्य मुद्द्यांची नोंद मी डायरीत करून ठेवली तेव्हा कुठे मी रिलॅक्स झालो. आता काळजी करण्यासारखं काही नव्हतं. या योजनेबाबत विविध शंका विचारणारे असंख्य फोन्स सोमवारी ब्रॅंचेस् आणि रिजनल आॅफिसकडून दिवसभर येत रहाणार होते पण मला आता त्याचं दडपण वाटेना! तरीही यानंतरचा जवळजवळ महिनाभर ही स्टाफ-मॅटर असल्याने माझं अख्खं डिपार्टमेंट यासंबंधीच्या कामातच पूर्णतः व्यस्त रहाणार होतं पण ती नंतरची गोष्ट! या क्षणी तरी आता पूर्णतः माझ्या कथासंग्रहाच्या प्रकाशन समारंभाचा आनंद मला घेता येणार असल्याचं समाधान माझ्यासाठी पुरेसं होतं.

अंथरूणावर पाठ टेकताच हळूहळू झोप येऊ लागली तरी त्या अधांतरी अवस्थेत हे सर्क्युलर, त्यातले विविध मुद्दे, या योजनेव्दारा स्वेच्छानिवृत्ती स्वीकारणाऱ्यांसाठी देऊ केलेले अतिरिक्त आर्थिक लाभ, स्वेच्छानिवृत्ती योजना स्वीकारण्यास पात्र असलेल्यांच्या साठी ती स्वीकारणं आणि न स्वीकारणं तो दोन्ही दृष्टीकोनातून आवश्यक असणारा तुलनात्मक अभ्यास अशाच सगळ्या गोष्टींचे

उलटसुलट विचार बॅक आॅफ द माईंड सुरू झाले असल्यासारखं पहाटे पहाटे मला एक स्वप्न पडलं. स्वप्नात मी या योजनांतर्गत स्वेच्छानिवृत्तीचा पर्याय स्विकारल्यानंतर रिलीव्ह होतानाच्या माझ्या सेंडआॅफचं संपूर्ण दृश्य मला दिसलं आणि ते स्वप्न सुरू असतानाच आईनं मला हलवून जागं केलं. माझ्या आधीच सर्वजण उठले होते आणि किचनमधे पहिल्या चहाची गडबड सुरू झालेली होती! ‘मनी वसे ते स्वप्नी दिसे’ म्हणतात, पण माझ्या कौटुंबिक जबाबदाऱ्या अद्याप पूर्ण व्हायच्या असताना मी स्वत:साठी ही योजना स्वीकारण्याचा विचार करणं शक्य तरी होतं कां? माझं मलाच हसू आलं आणि प्रसन्न मनानं मी अंथरूण सोडलं तसा त्या सर्क्युलरचा विचार आपोआपच पुसला गेला. त्या क्षणापासून मात्र मी अगदी मनापासून माझ्या कथासंग्रहाच्या प्रकाशन समारंभाचा विचार करायला मोकळा झालो!

मी, आरती आणि सलिल ठरल्याप्रमाणे दुपारी तीन वाजता हाॅलवर जाऊन पोचलो. घरची बाकी मंडळी त्या सर्वांचं आवरलं कीं पाठोपाठ येणार होतेच. माझ्या आजोळचे अनेक नातेवाईक पुण्यातच होते. माझ्या मावसभावाने त्या सर्वांकडे आमंत्रण पोचवायची जबाबदारी स्वेच्छेने स्वीकारली होती आणि मनापासून पारही पाडली होती. ते सर्वच नातेवाईक अगदी त्यांच्यातले माझा फारसा सहवास नसलेले या पिढीतले ही बरेचजण आवर्जून आले होते. हे सर्वजण बऱ्यापैकी वेळेपूर्वी आल्याने सर्वांशी मला मोकळेपणाने बोलता आल्याचा आनंद कधीच विसरता न येणारं समाधान देणारा होता!

पावणे चारच्या आधीच पाच मिनिटं नितिन शन्नांना घेऊन आला. आत येताच खचाखच भरलेला हाॅल पाहून त्यांना झालेला आनंद त्यांनी त्यांच्या मिष्किल शैलीत व्यक्त करूनच आपल्या भाषणाची सुरूवात केली होती!

अर्थात त्यांच्या आधी प्रकाशक म्हणून राजलक्ष्मी बोलली. तिच्यानंतर मला लेखकाचं मनोगत व्यक्त करायचं होतं. राजलक्ष्मी अतिशय मुद्देसूद आणि समर्पक बोलली. मनोगत व्यक्त करताना आपण काय बोलायचं हे नेमकेपणाने मनाशी ठरवायला मला वेळच मिळाला नव्हता. एरवीही उत्स्फूर्तपणे माझ्या कथालेखन प्रवासा दरम्यान मला आलेल्या अनुभवांबद्दलच मी बोललो असतो, त्याच अनुषंगाने मी माझं मनोगत थोडक्यांत व्यक्त केलं आणि शेवटी माझ्या कथासंग्रहातल्या अर्पणपत्रिकेचा आवर्जून उल्लेख केला.

“माझा ‘जगावेगळी’ हा पहिला कथासंग्रह मी माझ्या बाबांच्या स्मृतींना आणि माझ्या आईला अर्पण केला होता आणि आजचा ‘स्पर्श प्रकाशाचा’ हा कथासंग्रह मी कृतज्ञतापूर्वक अर्पण करीत आहे… ” असं म्हणून मी अर्पणपत्रिका वाचून दाखवली…

‘ पुष्पाताई आणि आनंदास,

तुमच्या कोवळ्या वयापासून या लहान भावासाठी तुम्ही दोघांनी केलेल्या कष्टांना आणि त्यागाला हा ‘स्पर्श प्रकाशाचा’ कृतज्ञतापूर्वक अर्पण… ‘ हे वाचतानाही माझा आवाज भरून आला होता. वाचन संपलं आणि व्यासपीठावरून खाली उतरून पहिल्या रांगेत आईजवळच बसलेल्या माझ्या बहिण आणि भावाला मी कथासंग्रहातील प्रत स्वत: नेऊन दिली तेव्हा आम्हा सर्व कुटुंबियांच्या आजवरच्या प्रवासास साक्षी असलेल्या माझ्या आजोळच्या नातेवाईकांबरोबरच इतरही उपस्थितांनी टाळ्यांच्या कडकडातांनी दिलेला उत्स्फूर्त प्रतिसाद आईबरोबरच त्या दोघांच्याही डोळ्यांत कृतार्थतेचे अश्रू आणणारा ठरला होता!

शन्नांचं मिष्किल आणि सविस्तर भाषण हे तर त्या संपूर्ण समारंभाचं सर्वात लक्षवेधी वैशिष्ट्य ठरलं होतं!

उपस्थित सर्वांनीच कथासंग्रहाच्या प्रति विकत घेऊन त्यावर माझ्या सहीचा आग्रह धरणं ही त्यांनी मला कौतुकानं दिलेली शाबासकीच होती!!

उपहार आणि चहाकाॅफी सोबत सर्वांशी झालेल्या मनमोकळ्या गप्पांनी त्या समारंभाची सांगता झाली पण त्या आठवणी मात्र इतकी वर्षं उलटून गेल्यानंतर आजही तितक्याच ताज्या आहेत!

याला कारण ठरलंय ते या कार्यक्रमाचं नियोजन जसं तसंच या समारंभाच्या निमित्ताने माझ्या उर्वरीत आयुष्याला मिळालेलं अनोखं वळण सुध्दा! हे वळण म्हणजे त्या दिवशीच्या पहाटे मला पडलेल्या त्या स्वप्नाचं ‘त्या’च्या कृपेने अकल्पितपणे सत्यात परावर्तित होणंच होतं!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१२ – कविता – ☆ विचलित मधुमास… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “विचलित मधुमास…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१२ 

☆ विचलित मधुमास… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

मिश्रित आवाजों की गंध से

विचलित मधुमास

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

 

पैरों में छिपने को, आतुर परछाइयाँ

शंकित सरगम, सूनी-सूनी शहनाइयाँ

कोमल कलिकाओं के आहत मन

भूले परिहास

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

 

स्नेह रहित शैशव की, तेज हुई सिसकियाँ

बाती के हक का घी, दीपक ने पी लिया

सठियाते यौवन के आँगन में

सूखता पलाश

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

 

छंदों के चौखट पर तालों के जमघट हैं

प्यासी नदिया निर्जीव तट सूने पनघट हैं

ऋतुओं के गंधमयी गीतों पर

छाया सन्यास

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दीप जलाओ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

लो फिर साँझ हुई मटमैली

तुम देहरी पर दीप जलाओ।

 

सूरज डूबा बुझी आग सा

लटका खूँटी पर दिन,

चिड़ियों के स्वर वापस लौटे

लेकर ख़ुशियाँ अनगिन,

रात आँख में लगे कसैली

तुम आकर मत नींद चुराओ।

 

मंदिर की सीढ़ी पर नदिया

ठहर आरती गाये,

पावन पूजा कर्म पुजारी

धर्म ध्वजा लहराये,

बहती नावें लहरें मैली

तुम तट की पीड़ा दुलराओ।

 

चुप्पी साधे पेड़ खड़े हैं

पसर गया सारा तम,

तारों की चादर पर लेटा

उजयारे का है भ्रम,

ख़ामोशी राहों में फैली

तुम यात्रा के अलख जगाओ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४४ – लौट आया है वसंत… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – लौट आया है वसंत।)

✍ लौट आया है वसंत… ☆ श्री हेमंत तारे  

सुनी है,

एक साल बाद

फागुन की पदचाप,

गुम हुआ जाड़ा,

कुछ कुछ तपने लगे दिन,

एक साल बाद,

लौट आया है वसंत l

 

यहां वहां ठाडे

युवा – बूढे

सभी पेड़ों को

कर गया था नंगा

निर्लज्ज पतझड़

और

खड़े थे नंगे

यूँ ही

ये पेड़

बाट जोहते

वसंत की I

 

अब  फूट पड़ेगी

कोपलें नयी

आयेंगे पात नये

घुल रहीं मादकता

यहाँ – वहाँ,

चहुंओर

कि

लौट आया है वसंत

एक साल बाद।

 

घर से दूर,

जहाँ शुरू होती है

कच्ची – पक्की, पगडंडियाँ

वहाँ खिल रहे हैं

पलाश

चटख

लाल पीले फूल ओढ़े

यहाँ – वहाँ, चहुंओर

कि

लौट आया है वसंत

एक साल बाद।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३८ ☆ प्यार है, हम कहा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “प्यार है हम कहा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३८ ☆

✍ प्यार है हम कहा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

शिकवे दिल में रखा नहीं करते

खातमा रब्त का नहीं करते

 *

प्यार है हम कहा नहीं करते

तुम ही चहरा पढा नहीं करते

कोई रस्मन वफ़ा नहीं करते

दिल लगाकर दग़ा नही करते

 *

जो नसीहत पे ध्यान  देते हैं

ठोकरों से गिरा नहीं करते

 *

हम गुमां पाल के न चुप बैठे

दिल मिले बिन खुला नहीं करते

 *

मौत जब आना होगी आएगी

उसके डर से भरा नहीं करते

 *

शमअ सा इश्क़ कर पिघलना क्यों

हम कभी रतजगा नहीं करते

 *

पाप ही बस गिनाते रहते हो

छू के तुम पारसा नहीं करते

 *

घाव भरता नहीं दिया उनका

हम ही इसकी दवा नहीं करते

 *

मसअलों को मज़ाक समझें जो

उनसे हम मशविरा नहीं करते

 *

पढ़के वन्नास वसवसों का बशर

जाने क्यूँ ख़ात्मा नहीं करते

 *

हमने अब तक ख़ुशी नहीं देखी

ज़िन्दगी से गिला नहीं करते

 *

अर्श को चूम गुमाँ जिनको अरुण

मुस्तकिल वो रहा नहीं करते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५२ ☆ कविता – रक्षा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी एक विचारणीय कविता – “रक्षा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५२ ☆

✍ कविता – रक्षा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

*

मत घबराना साथी

जब तक साँस चले,

अपना साथ बना रहे

चाहे कोई न साथ चले।

*

सत्य राह पर डटकर रहना

संकल्प लिए चलते रहना,

दिल में प्यार बसाए साथी

सदा प्यार ही बाँटते चलना।

*

जिस धरती ने जन्म दिया

 उसे न कभी गंदा करना,

तन मन को खुश रखने वाले

आकाश को तुम साफ रखना।

*

जल और वायु को शुद्ध रख

उनकी पूजा कराना व करना।

स्वच्छ रहना स्वच्छ रखना

अपने जीवन की रक्षा करना

सच्ची राह चलते रहना

खुश रहना खुशी बाँटना,

सबको बनाकर अपना

सबके जीवन की रक्षा करना।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०१ – मौन… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मौन।)

☆ लघुकथा # १०१ – मौन श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“माँ जल्दी करो अभी तक चाय नहीं बनाई है और न टिफिन दिया है कॉलेज जाने में देर हो रही है।”

रवि ने अपनी माँ कमला से कहा।

“बेटा आज बहुत ठंड है 8:00 बज गया अभी तक मेरा हाथ पैर सीधा नहीं हो रहा है?”

“कोई बात नहीं माँ मैं चाय बना ले रहा हूं और ब्रेड सेंक के तुम्हें देता हूं” मुस्कुराते हुए रवि ने कहा “माँ ब्रश कर लो।”

“माँ पता नहीं क्यों बाहर बहुत हल्ला हो रहा है?”

कमला जी ने कहा – “बेटा सड़क के किनारे घर हैं। आते जाते बहुत सारी आवाज़ सुनाई देती रहती है। “

रवि ने कहा – “मैं देखता हूँ क्यों बाहर भीड़ लगी है।”

“मां आप चिंता मत करो ऑनलाइन मैंने खाना ऑर्डर कर दिया है थोड़ी देर बाद आ जाएगा और मैं कॉलेज कैंटीन में खाना खा लूंगा।”

वह बाइक लेकर कॉलेज के लिए चला गया।

जब वह पहुंचा तो देखा कि एक वृद्ध ठंड के मारे कांप रहा था और एक फटा कंबल ओढ़ कर बैठा था,

लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे।

रवि ने एक चाय की दुकान से चाय और एक बिस्कुट का पैकेट लिया और उस बुजुर्ग आदमी को दिया।

तभी वहां पास खड़े एक व्यक्ति ने उसे डांटा- “क्या हम इसे भगा रहे हैं जानते हो कौन है और तुम इसे चाय पिला रहे हो?”

रवि ने मुस्कुराते हुए कहा -“अंकल जी कहिए तो आपको भी मैं चाय पिला दूं बेचारे ठंड से कांप रहे हैं पहले उनमे थोड़ा हिम्मत आये फिर हम पूछते हैं उन्हें कहाँ जाना है। “

वह वृद्ध आदमी बहुत खुश हुआ मुस्कुरा के उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया और बोला कि “मेरा सब कुछ कुछ महीने पहले ही बेटे-बहु सबने छीन लिया था बस यूं ही भटकता रहता हूं गली-गली, आज यहां आग तापते हुए सो गया और मेरी नींद लग गई थी तभी सुबह यह सब लोग मुझे परेशान करने लग गए और मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ ?”

“कोई बात नहीं अंकल जी आप यह बताइए मैं आपको कहां छोड़ दूं? “

“बेटा मुझे तो कुछ पता नहीं है” उसे वृद्ध ने कहा।

“मेरे कॉलेज के प्रिंसिपल सर भी बुजुर्गों की सेवा करते हैं।”

रवि ने कहा- “बाबा आप बाइक में बैठो।”

वृद्ध की आंखों में एक चमक आ गई और उसके शरीर में अचानक एक ऊर्जा भर गई।

वह उसकी बाइक में तन कर बैठ गया।

प्रिंसिपल सर बोले “अरे यह किसको ले आए कॉलेज!”

“सर बाबा के रहने का इंतजाम करना है इनके बच्चों ने इन्हें घर से निकाल दिया है”

“ठीक है अपने कॉलेज के थोड़ा सा दूरी पर जो वृद्ध आश्रम है उसका नाम है ‘अपना घर’ इन्हें वहां छोड़ आओ।”

वृद्ध की ऑंखों से ऑंसू निकल रहे थे मौन होकर भी ऑंखे आभार व्यक्त कर रही थी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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