हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१२ – फागुन के दिन आ गये… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “फागुन के दिन आ गये…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१२ – फागुन के दिन आ गये… ☆

☆

फागुन के दिन आ गये, मन में उठे तरंग।

हँसी-ठहा के गूँजते, नगर गाँव हुड़दंग ।।

कि होली आई है, रंगों को लाई है ।।

बसंती ऋतु छाई, सभी के मन-भाई

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

* 

अरहर झूमे खेत में, पहन आम सिरमौर।

मधुमासी मस्ती लिये, नाचे मन का मोर।

गाँव की किस्मत चमकी, घरों में खुशियाँ दमकीं।

ये बालें पक आईं, खेत में लहराईं

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

जंगल में टेसू खिले, प्रकृति करे शृंगार।

चम्पा महके बाग में, गाँव शहर गुलजार।।

वो कोयल कूक रही है, मधुरिमा घोल रही है।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

प्रेम रंग में डूब कर, कृष्ण बजावें चंग ।

राधा पिचकारी लिये, डाल रही है रंग।।

कृष्ण-राधे की जोड़ी, खेलती बृज में होली

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

लट्ठ मार होली हुई, लड्डू की बौछार।

रंग डालते प्यार से, पहनाएं गल-हार।।

नाचती रसिया टोली, करें मिल हँसी ठिठोली।।

यही मथुरा की होली, यही वृज की है होली।।

 *

दाऊ पहने झूमरो, झूमें मस्त मलंग।

होरी गा-गा झूमते, टिमकी और मृदंग।।

ग्वाले सब घर हैं जाते, नाच गा धूम मचाते।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

महिलाओं की टोलियाँ, हम जोली के संग।

बैर बुराई भूलकर, खेल रहीं हैं रंग ।।

यही संस्कृती हमारी, रही दुनिया से न्यारी

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

फाग-ईसुरी गा रहे, गाँव शहर के लोग।

बासंति पुरवाई में, मिटें दिलों के रोग।।

चलो जी हँसलो भाई, भुला दो सभी लड़ाई।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

जीवन में हर रंग का, अपना है सुरताल ।

पर होली में रंग सब, मिलें गले हर साल ।।

सहिष्णुता हमें लुभाई, सभी हम भाई भाई

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

दहन करें मिल होलिका, मन के जलें मलाल ।

गले मिलें हम प्रेम से, घर-घर उड़े गुलाल ।।

कि एकता हर्षाई, प्रगति की डगर दिखाई

सुनो प्रिय श्रोता भाई,बजाओ मिलकर ताली

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ – होलिका दहन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “होलिका दहन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ ☆

🌻लघु कथा🌻 🔥 होलिका दहन🔥

मोहल्ले में होलिका रखी गई थी। साज सजावट, डीजे की धुन, आनंद उल्लास, उमंग को बढ़ा रही थी। मस्ती में झूमते सभी नजर आ रहे थे।

फूल बताशामाला, धूप, कच्चा धागा, हल्दी गाँठ लाईलावा, सुखे श्रीफल, मावा की थाली, सजा सभी महिला पुरुष होली पूजन के लिए जाने लगे।

देखते- देखते पूरा प्रांगण भर उठा सृष्टि अभी दो महिने ही हुए थे पति का स्वर्गवास हो गया था। छोड़ गए थे अपने पीछे यौवन से भरपूर सृष्टि और दो मासूम बच्चे।

बच्चों को लेकर वह भी थाल सजा होलिका पूजन में पहुंच गई। अरे यह क्या?? सभी की निगाहें सृष्टि की तरफ – – बातें बनने लगी इशारे इशारों में सभी तानों की फाग छेड़ने लगे।

गाना बज रहा था। माइक पर पंडित जी बैठे शुभ मुहूर्त का समय और होली की पौराणिक कथा बता रहे थे। सृष्टि ने हाथ जोड़ माईक हाथ में ले लिया। बड़े विनम्र भाव से सभी को प्रणाम कर कहने लगी— आप सभी मेरे आत्मिय और मार्गदर्शक है। मुझे बता दे क्या मैं अपने बच्चों के लिए जी नहीं सकती।

यदि आप में से कोई इनका भरण-पोषण भविष्य बनाने के लिए तैयार हैं, तो मैं यहीं पर आज इसी होलिका में अपने आप को दहन कर लूंगी।

परंपरा और रीत जीवंत तो उठेगी। यदि नहीं तो मुझे भी रंगों के साथ  जीने दीजिए और बच्चों के लिए दोहरी भूमिका निभाने दीजिए।

पंडित जी ने माइक हाथ में ले, दूसरे हाथ से गुलाल उड़ा होली की शुभ बधाई देने लगे। देखते-देखते सृष्टि की श्वेत साड़ी गुलाबी, लाल हो चली।

बच्चे खूब ताली बजा- बजा कर नाच रहे थे। रूढ़िता, द्वेष, ईर्ष्या, होलिका में दहन हो गई। सृष्टि को जीने का रंग मिल गया।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६८ – देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६८ ☆ देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

चाय की चाहत तो हर समय रहती हैं। मोबाइल के आ जाने से चाहत कुछ कम तो हो गई है, परन्तु चाय अभी भी सबसे पसंदीदा पेय हैं।

चाय के भी अनेक नाम, रंग रूप और स्वाद होते हैं। प्रातः काल खटिया पर पी जाने वाली चाय अंग्रेज हमें “बेड टी” के नाम से छोड़ गए हैं। दूसरा चाय का कप “हैंगओवर ब्रेक टी” के नाम रहता हैं। ब्रेकफास्ट टी के बिना ब्रेकफास्ट अधूरा कहलाता हैं।

11 बजे ऑफिस की पहली चाय के बाद ही सरकारी दफ्तरों में कार्य करने के लिए मानस बनाना आरंभ होता हैं। दोपहर के भोजन पश्चात “नींद भगाओ चाय” के बाद ही सरकारी कर्मचारी अपना आसन ग्रहण करते है। सांय के चार बजे के लिए अंग्रेज़ “इवनिंग टी” का ज्ञान दे कर चले गए थे।

सांय छः बजे पत्नी के हाथ से बनी हुई घर की चाय के साथ हल्का नाश्ता आपकी रात्रि भोजन की मात्रा को कम करने का राम बाण फार्मूला हैं।

चाय के बहुत सारे रंग तो हम सब जानते ही हैं, जिनमें लाल, काली, सफेद चाय यानी शुद्ध दूध में थोड़ी सी पत्ती को उबाल कर पिया जाता हैं। विगत कुछ वर्षों से “हरी चाय” भी हम सब के घरों में अपने पैर जमा चुकी हैं।

कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने पूछा नीली चाय पियोगे क्या ? वज़न कम हो जाता हैं। उसके भाव सुनकर ही हमारी जेब का वजन अवश्य कम हो गया हैं। मित्र ने हंसते हुए बोला कोई बात नहीं तुमको “ठंडी चाय” ही पिलाते हैं। आप गलत दिशा में विचार करने लगें है। मित्र ने बिना दूध की चाय को ठंडा कर उसमें बर्फ के कुछ टुकड़े डाल कर “आइस टी” परोस कर इतिश्री कर ली।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१९ ☆ षड्रिपूंची होळी… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१९ ?

☆ षड्रिपूंची होळी… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

लाकडाची वाटतो हा देह मोळी

जाळणारच षड्रिपूंची आज होळी

 *

अर्पिला नैवेद्य मी होळीस आणिक

माय माझी वाढते बघ तूप पोळी

 *

डोस थोडा वाढवावा लागणारच

टाळता ही येत नाही रोज गोळी

 *

राख फासत एकमेकाला उद्याला

गावभर फिरणार आहे मस्त टोळी

 *

रंग होता लावण्याचा बेत माझा

अन् तिने तर घातलेली शुभ्र चोळी

 *

हो तिलाही शौक आहे रंगण्याचा

शोधते संधी अशी ती नार भोळी

 *

रंग इतका फेक माझ्यावर सख्या तू

त्याच रंगाने भरावी पूर्ण झोळी

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम् ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – वन्देमातरम्…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम् ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

प्रतिध्वनि टकराती है कानों से

झंकार उठती है प्राणों से

वन्देमातरम्! वन्देमातरम्!

और मैं

कुछ जागा सा,

कुछ

सोया सा

अतीत में खोया सा- देखता हूँ

मानवों का महासागर

उत्ताल तरंगों से नक्कारे और नारे

तरह तरह की बोलियाँ

चलती हुई गोलियाँ

और

पूरे जोश से उच्चरित होता- वन्देमातरम्।

आज लगता है

हम तुम ये वे सब

वन्देमातरम् का मर्म भूल गये

वे कौन थे. कैसे थे

जो वन्देमातरम् गाकर

फाँसी पर झूल गये?

वे भारत माँ की संतानें

हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख

या नहीं ईसाई थे

वे तो राष्ट्रभक्त इंसान थे

भाई-भाई थे।

उन्होनें जीवन में उतारा था

जननी जन्भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

का महामन्त्र

और विफल किये थे

अंग्रेजी सल्तनत के षड्यन्त्र ।

हम

मन्त्ररहित होकर

षडयन्त्रों में घिर गये हैं

गिर गये हैं- दलों के दलदल में

बहुत नीचे

और आँख मींचे

बैठे हैं शुतुरमुर्ग की मुद्रा

हमें दिखाई नहीं देती

में।

कृ

प्रपा

पूर्वोत्तर की आग

या केसर क्यारी के नाग

हम तो

छाती से चिपटाये हैं

जाति-धर्म-भाषा और प्रदेश

हमें कैसे याद रहेगा

वन्देमातरम् का सन्देश ।

है

एक ओर है हमारा क्षुद्र अहम्

ओर दूसरी ओर है

वन्देमातरम्!

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७३ – “गाती है राग यमन…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “गाती है राग यमन...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “गाती है राग यमन...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

आहिस्ता सुना कल

जब रात तुम्हे फोन पर ।

लगा तुंगभद्रा तट –

गाती है राग यमन

किशोरी अमोनकर ॥

 

स्वप्न पंख ओढ

थाट का लहरा ।

मींड मंद्र द्रुत का

झंडा फहरा ।

 

जिक्र हुआ तेरा

सब पूछते हैं –

घराना यह किराना

या जौनपुर ॥

 

स्मृतियों का

खयाल गायन है ।

सरगम में छुपा

शब्द सावन है ।

 

मधुर कण्ठ ले

ज्यों आलाप लगा –

वीणा में ठहर

गये मौन पर ॥

 

स्थायी अंतरा

सम्हाल कर ।

स्वर भरते गत में

हर ताल पर ।

 

जैसे  हो अटक

गया स्वाद कहीं –

प्रीतिभोज का किंचित

नोंन पर ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 21-02-2026

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆ # “होली के रंग में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “होली के रंग में…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆

☆ # “होली के रंग में…” # ☆

☆ 

रंग-बिरंगी पिचकारी में

रंग-बिरंगे रंग है

पिचकारी के रंगों से

भीग रहे अंग अंग है

 

गली गली में हुड़दंग है

तरुणाई  तो उदंड है

रंग गुलाल लगा नाच रहे हैं

जोश इनमें प्रचंड है

 

सजनी की है कंचन काया

साजन ने है रंग लगाया

आरक्त हो गए गाल गुलाबी

निखर गई है सजनी की काया

 

दोनों रंगों में घुल गए हैं

दिन दुनिया को भूल गए हैं

डूबे हुए हैं फाग की मस्ती में

बाहों में एक दूजे के झूल गए

 

भांग खाओ या मिठाई

या पी जाओ खूब ठंडाई

भांग की मस्ती जब चढ़ती है

तो बस चढ़ती है जाती है भाई

 

खूब रंगों से खेलो होली

संग हो प्रीतम या हमजोली

अभद्र आचरण को त्याग कर

भाई बोलो प्रेम की बोली

 

रंगों से है रंगीन जवानी

रंग नहीं तो जीवन है फानी

रंग है जीवन का मर्म

रंग बिना अधूरी है कहानी

 

रंगों में डूब जाओ यारों

रंगों में सब भूल जाओ यारों

एक गुलाल का टीका लगाकर

सबको गले लगाओ यारों /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९७ – कान्हा तेरी बंशी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कान्हा तेरी बंशी…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ९७ ☆ कान्हा तेरी बंशी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

कान्हा तेरी बंशी मन बिसराए,

सारे जगत में सबको भाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जब जब राधा तान सुने ये,

दौड़ के जमना तट को आए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जमना जल भी रुक रुक जाए,

बंशी बजाके रास रचाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

पशु पक्षी भी राह तकत हैं,

कब तू अपनी बंशी बजाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

बंशी तेरी,पर तू सबका,

सबका मन हर्षाए,

कान्हा तेरी बंशी..

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – २ – रेडियो -☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – २ – रेडिओ – ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆

“नमस्कार श्रोतेहो… हे आकाशवाणीचे पुणे केंद्र आहे. सकाळचे पाच वाजून सत्तावन्न मिनिटे आणि बारा सेकंद झाले आहेत. आपल्या आजच्या सभेला सुरुवात करु या मंगलध्वनीने…

आणि मग तो मंगलध्वनी सुरु व्हायचा. अगदी लहानपणी पासून दिवसाची सुरूवात अशीच होते. आणि दर पाच मिनिटांनी बदलणारे कार्यक्रम वेळ सांगतात. सकाळच्या घाईत घड्याळ बघावे लागत नाही. ते काम रेडिओ ऐकला की आपोआप होते. शिवाय ते कार्यक्रम ज्ञानात भर घालतात हा खूप मोठा आणि महत्वाचा फायदा! आजही मला लहानपणी निवेदन करणारे निवेदक व त्यांचे निवेदन आठवते. सुधा नरवणे प्रादेशिक बातम्या द्यायला आल्या की शाळा कॉलेजला निघायची योग्य वेळ झाली हे लक्षात यायचे. आणि त्या बातम्या संपल्या की उशीर झाला असे समजायचे.

सकाळी सकाळी रेडिओ लावायची जुनी सवय बऱ्याच जुन्या आठवणी जाग्या करते. आज गाणे ऐकले शब्द शब्द जपून ठेव एकीकडे काम चालू होते. आणि इतके अर्थपूर्ण गाणे ऐकत असताना माझ्या मनात कसे विचार येतात याचे हसू आले. आणि जपून ठेवलेल्या वस्तू आठवायला लागल्या. आणि कुठे कुठे जीव अडकतो याची गंमत वाटली.

परवा सहज कपाट आवरताना जरा पिवळसर पडलेली कॅरीबॅग सापडली. उघडून बघितले तर रेडिओचे लायसन सापडले. आता असे वाटेल हा काय प्रकार आहे? पण पूर्वी (मी लहान असताना) रेडिओ साठी परवाना आवश्यक होता. एका वर्षा साठी १/२ रुपये पोस्टात भरून त्या पुस्तकावर तिकीट लावून आणावे लागायचे. आणि घरात टेबल सारखे मोठे रेडिओ असायचे तो नीट ऐकण्यासाठी ३/४ फूट लांबीची व २/३ इंचाची तांब्याची जाळी असलेली पट्टी घरात लावावी लागायची. आणि छोटा रेडिओ (ट्रांझिस्टर) सायकलच्या हॅण्डलला लावून लोक ऐटीत फिरायचे. आणि ज्याच्याकडे लायसन नसेल तो लपवून ट्रांझिस्टर नेत असे.

हे सर्वच रेडिओ मात्र नवनवीन कपडे घालायचे.

त्यात गृहिणीची कलाकुसर व दृष्टी याची जणू परीक्षा व्हायची. काही जणी तर त्यावर स्वहस्ते भरतकाम करायच्या आणि कौतुक मिळवायच्या.

आमच्या कडे मोठ्ठा रेडिओ होता. लांबून बघितले तर पुस्तकांचे कपाट वाटावे असा होता. मी कायम त्याच्या बटणावर पाय ठेवून वर चढून दूध प्यायला बसायची. मग जेवायला बसायची. ही बाल सवय त्याचा उपयोग कळायला लागल्यावर सुटली.

विशेष म्हणजे या रेडिओचे सर्वत्र दर्शन होते. शेतात, मळ्यात, चौकात, पारावर, बागेत कुठेही सूर ऐकू येतात. मधल्या काही काळात असे भय वाटत होते की सगळ्या आधुनिक साधनांच्या गदारोळात आपला रेडिओ लुप्त होईल का? पण रेडिओने आपले स्थान कायम ठेवले आहे. स्वरूप बदलले आहे. सुटसुटीत झाले आहे. पूर्वीच्या अडचणी (रेडिओ वापरातील) आता नाहीत. त्याने प्रत्येकाच्या मोबाईल मध्ये स्थान मिळवले आहे. आणि पेन सारखे छोटे स्वरूपही धारण केले आहे. आणि आता ऐकू येणारी स्टेशन्स सुद्धा वाढली आहेत.

काही वर्षांपूर्वी प्रसारित होणारे कार्यक्रम आधुनिक स्वरूप धारण करून पुन्हा प्रसारित होऊ लागले आहेत.

या रेडिओच्या अनंत आठवणी बऱ्याच जणांच्या मनात जागृत असतील.

रेडिओवर एक जाहिरात लागते. एक सखी दुसरीला विचारते, “कुटं ग शिकलिस एवढं ग्यान? ” लगेच दुसरी उत्तरते, “आपल्या रेडिओनं श्यानं केलंय की, तू बी ऐकत जा. ” हे ऐकून अगदी पटले. खरेच जे नियमित रेडिओ ऐकतात त्यांचे मन विविध माहिती, ज्ञान, आरोग्य, गृहिणींना मार्गदर्शन, मनोरंजन, यांनी भरून जाते. आणि या साठी वेगळा वेळ द्यावा लागत नाही. शिवाय डोळेही बिघडत नाहीत.

या रेडिओची सुरुवात भारतात १९२३ साली झाली. पण ती खाजगी कंपनी होती. आणि ती दिवाळखोरीत निघाली. नंतर १९३६ मध्ये ही कंपनी सरकारने ताब्यात घेतली आणि ऑल इंडिया रेडिओ असे नामकरण केले.

प्रासंगिक कार्यक्रम सादर करणे. हे तर रेडिओचे खास वैशिष्ट्य आहे.

रेडिओवर प्रसारित होणाऱ्या कार्यक्रमांवर लिहायचे म्हंटले तर एक वेगळाच लेख होईल.

आज जागतिक रेडिओ दिनाच्या निमित्ताने भारतातील रेडिओ विषयी काही लिहिण्याचा प्रयत्न केला आहे. हा विषय खूप मोठा आहे. जे माझ्या सारखे रेडिओ प्रेमी आहेत त्यांना नक्कीच असे वाटते, हा रेडिओ अजरामर होवो. या मनापासून शुभेच्छा!

© सुश्री विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२५ ☆ व्यंग्य – विदेश का गड़बड़झाला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘विदेश का गड़बड़झाला‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विदेश का गड़बड़झाला ☆  

ऑस्ट्रेलिया से एक भारतीय लड़की ने वीडियो डाला। लड़की ने वहां के सिस्टम के बारे में जो बताया उसे सुनकर बहुत परेशान हूं। बताया कि  वहां भुगतान मेहनत के हिसाब से मिलता है, शैक्षणिक योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं। एक घंटे के श्रम के 25 डॉलर मिल जाते हैं और आदमी दिन में कम से कम 50 डॉलर कमा ही लेता है।

लड़की ने यह भी बताया कि वहां सबसे ज़्यादा भुगतान शारीरिक श्रम करने वालों— जैसे प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, खदान श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों— को मिलता है। इन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ का नाम दिया जाता है, और समाज में सबको बराबर सम्मान मिलता है, कोई ऊंचा नीचा का भेद नहीं।

लड़की की बात सुनकर दिमाग ख़राब हो गया। यह कैसा देश है, भाई, जहां पांचों उंगलियों को बराबर माना जाता है। हमारे देश में ऐसा हो जाए तो हाहाकार मच जाए। फिर जाति- प्रथा का मतलब ही क्या रह जाएगा? ऑस्ट्रेलिया में जिन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ कह कर अच्छा वेतन देते हैं उन्हें यहां दिन में चार-पांच सौ कमाने में देवता याद आ जाते हैं। समाज में इज़्ज़त पाने की बात करें तो  देश में इन ‘प्रोफेशनल्स’ को कोई बैठने के लिए स्टूल नहीं देता, कुर्सी की बात छोड़ दीजिए। ज़्यादातर को शस्य श्यामला भूमि पर ही आसन मिलता है। ‘डिगनिटी ऑफ लेबर’ यानी श्रम की प्रतिष्ठा का यह हाल है कि बड़ा आदमी वही माना जाता है जो अपने हाथ से लेकर पानी भी न पिये।

ऑस्ट्रेलिया जैसा किस्सा न्यूज़ीलैंड का भी सुनने को मिला था जहां मेरे एक परिचित प्रोफेसर किसी अध्ययन के लिए गये थे। वहां उनके दफ्तर में सफाई कर्मी आता था जिसे ‘जेनिटर’ कहते थे। जब प्रोफेसर साहब के भारत लौटने का वक्त आया तो जेनिटर ने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया और शाम को उन्हें अपनी कार से घर ले गया। वहां उनके लिए विशेष तौर से शाकाहारी भोजन तैयार कराया गया था। मैंने सोचा कि यदि भारत में कोई सफाई कर्मचारी हमें भोजन के लिए आमंत्रित करे तो हम उस आमंत्रण से बचने की कोशिश करेंगे। सोचेंगे कि इस बंदे के पास खुद के खाने को है या नहीं, या हमें ऐसे ही न्योत रहा है। लगेगा कि उसका दिमाग़ चल गया है।

हमारे यहां सबसे अधिक पैसा उन्हें मिलता है जो कम से कम श्रम करते हैं। कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों का भुगतान लाखों में होता है, लेकिन काम का आकलन कोई नहीं। इसीलिए मोटापे और उच्च रक्तचाप का रोना आम है। शारीरिक श्रम करने वाले का जीवन एक-एक दिन के हिसाब से चलता है। कल का कोई भरोसा नहीं। कभी एक अधिकारी के बारे में सुना था जिन्होंने अपना एक कोट कुर्सी पर स्थायी रूप से टांग दिया था। वे खुद दफ्तर से ग़ायब रहते थे, लेकिन किसी के पूछने पर कोट की तरफ इशारा कर दिया जाता था कि ‘यहीं कहीं गये हैं।’ ऐसे ही नौकरी करते-करते वे वैतरणी पार कर गये।

कुर्सी की शोभा बढ़ाने वालों को तनख्वाह के अलावा एक और भत्ता मिलता है जिसे रिश्वत-कम-कमीशन भत्ता कहते हैं। जितना बड़ा और ताकतवर पद, उतना ही ज़्यादा रिश्वत-भत्ता। कई अफसर हर सरकार के प्रियपात्र बने रहते हैं तो कई हर सरकार की आंख में चुभते हैं। हरियाणा में आई. ए. एस. खेमका जी हर छः महीने में ट्रांसफर झेलते अंततः रिटायर हो गये। उनके रिटायर होने पर बहुतों ने राहत की सांस ली होगी।

दूसरी तरफ, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक को पूरी मज़दूरी मिल जाए, वही बहुत है। उसमें भी ठेकेदार का कमीशन कटता है। बिना सुरक्षा- उपकरण के कहीं बिजली के खंभे पर सुधार के लिए चढ़ा दिया जाता है तो कहीं बिना सुरक्षा- उपकरण के गैस से भरे सीवर में उतार दिया जाता है। ‘चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम।’

ऐसे में हमें लगता है कि हमें अपने देश से परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन की तरह कुछ अधिकारियों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में भेजना चाहिए जो वहां के सिस्टम में ज़रूरी सुधार करवा सकें। अभी तो लड़की की बातें सुनकर मेरे दिमाग़ ने काम करना बन्द कर दिया है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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