☆ “पर्यावरण शिबीर… 3023… ” ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर☆
“… मित्रांनो! हे जे चित्र दिसतय त्याला वृक्ष किंवा झाडं असे फार फार पूर्वी म्हणायचे. हे झाड निसर्गाचा एक महत्वाचा घटक म्हणून ओळखला जात होता.आज जो आपल्याला प्राणवायू नळकांड्यातून घ्यावा लागतोय ना त्यावेळी प्राणवायू मुबलक होता आणि तोही झाडांमुळे.चराचराच्या आरंभापासून झाडांचे अस्तित्व अबाधित होते.निसर्गातला तो उपयुक्त घटक..पान, फूल, फळा बरोबर सावली, शुध्द हवा, वेळेवर पाऊस, जमिनीची धूप कमीत कमी धूप, अन्नधान्य, गरजेचा लाकूडफाटा, वनोंषौधी इ.इ.अगणित फायदे तेव्हा आपल्या पूर्वजांना मिळाले होते.त्यांनीही त्याचं जिवापाड जतन, संवर्धन केलेले होते.त्याला देवत्व बहाल करून त्याची पूजा करत होते.
आज आपण जिथे बसलो आहोत याच जागेवर हजारो वर्षांपासून या पर्यावरण विषयक अगणित शिबिरे, चर्चासत्र, परिसंवाद घडत आलेले आहेत.आपल्या सारख्या काही अतिसंवेदनशील,
पर्यावरणप्रेमी मित्रांनी या पर्यावरणाच्या संरक्षणासाठी इथेच तीव्र आंदोलन, धरणं, मुक मोर्चा काढले होते.तर सांगायचा महत्त्वाचा मुद्दा असा आहे की ही पर्यावरण बचाव मोहीम आजही तशीच तितक्या गांभीर्याने पुढे सुरू आहे.मित्रांनो! हा प्रवास, हा लढा, हा संघर्ष अजूनही फलद्रूप ठरलेला नाही.याचं कारण काय म्हणून विचाराल तर हा आपलाच लढा आपल्याशी आपण करत आहोत.ऐकायला थोडसं विचित्र वाटेल.पण सत्य नजरे आड करू शकत नाही.आज आपण जिथे जमलो आहोत तोच भू भाग ऐके काळी हिरव्या हिरव्या घनदाट जंगलांनी व्यापलेला होता.केव्हढी प्रचंड जंगल संपत्ती होती तेव्हा, त्याचबरोबर जलसंपत्ती, वनौषधी संपत्ती, अन्नधान्य-फल संपत्ती, पशुपक्षी, कृमी किटक, इ. इ. अक्षय असा अवाढव्य संपत्तीचा साठा भरलेला होता.कशाचीच कमतरता कधीच भासली नव्हती, तेव्हा पर्जन्यमान भरपूर प्रमाणात वेळेवरच पडत असे, जमीनीची धूप होत नसे, ओढे, नाले, तळी, विहीरी जलाने तुडुंब भरलेल्या असत.पांथस्थांना गर्द सावलीचा निवारा मिळत असे.आणि आपल्या पूर्वजांची वस्ती या जंगलाच्या आसपासच्या परिसरापासून दूर दूर च्या मैलोगणती प्रांतात पसरली होती.आपले पूर्वज निसर्गप्रेमी होते.ते स्वतः बरोबर या पर्यावरणाची काळजी घेत .त्याचं संवर्धन करत असत.एकंदरीत त्यावेळी भूतलावर स्वर्गीचे नंदनवनच अवतरले होते म्हणाना.शुष्क काष्ठ झालेले वठलेलं एक झाडं तोडायचं त्यांच्या जीवावर येई.त्याच्यापायी असलेली कृतज्ञता त्याला असलं कृतघ्नपणाचं कामं करण्यास परावृत्त करीत असे.पण निसर्गाच्या नियमात नव्या कोंबाला विकास साधायला जुन्या खोडांना नेस्तनाबूत होण्या शिवाय पर्याय नाही. त्यामुळे अशी शुष्क काष्ठ झालेले वठलेलं एकेक झाडं कामाला येई.पण पण हे कृत्य करत असताना आपले पूर्वज एकाच्या ठिकाणी चार चार झाडं लावत गेले.आपली जशी आबादी जपली तशीच निर्सगाची सुद्धा.याचा इष्ट तो परिणाम त्यांना दिसून येत असे.सगळीकडे समृद्धी, आनंद सुख शांती अनुभवता येत असे.एक आनंदघन संगित निसर्गात गुंजत राहत असे.
पण हळूहळू काळ बदलत गेला… गुगल नि नेटचं जंगलाच़ जाळं पसरत गेलं… आणि पूर्वजांच्या नव्या नव्या पिढ्या पटी पटीने वाढत गेल्या त्यांचं जंगलामुळे जीवीतमान वाढत गेले तसे त्यांना जागेची टंचाई भासू लागली… एक झाड तोडले म्हणून काही जंगल नामशेष होत नाही ही स्वताची समजुत आपल्या हव्यासापायी त्याने घालून घेतली नि हळूहळू एकेक करत जंगलाची कत्तल तोड सुरू झाली… कलीने ग्रासले… हव्यास, स्वार्थ, सारख्या षड्रिपूंने निर्सगाचे ओरबाडणे सुरू केले.जंगलतोड, लाकुडतोड, चंदन, औषधी, साग, साल झाडाची कत्तल करण्यात आली, ..जळणासाठी, विक्री साठी, ..हे कमी होतं त्यात जंगलसपाट करून भू भाग बळकाविण्यासाठी ऐनकेन प्रकार अवलंबिले गेले… इतकचं काय आता ज्याच्यावर तुम्ही बसला आहात ते सुद्धा एकेकाळचे वटवृक्ष होते… पण ते त्यावेळी ठेकेदार, वनरक्षक, शासनबाबू, दरबारी यंत्रणा नियमांचे कागदी फुसके घोडे नाचवून तोडून टाकले गेलेले असे आहेत… कागदावर झाडांची नि जंगलाची संख्या वारेमाप दिसते.पण प्रत्यक्षात मात्र तिथे उजाड माळ नि वाळवंट आहे… सिमेंटची जंगलं उभा राहू लागली… नि नैसर्गिक जंगल सपाट झाली.. विकासाचा विधायक मार्ग जंगल बचावच्या इच्छाशक्तीच्या अभावी विघाताच्या विचारानुसार गेला… पर्यावरणाचा र्हास झाला प्रदुषणाचा विळखा पडला… साधी शुद्ध ताजी, प्राणवायूची हवा मिळेनाशी झाली, पाणी आटले, वनस्पती नाहीशी झाली, वन्यजीव उध्वस्त झाले..शिकार वाढली.अवैध धंदे वाढले… पर्जन्य घटले…
… या चित्रात तुम्ही पाहता आहात त्याला वृक्ष, झाडं असे नावाने ओळखले जात असे… आता ते आपल्याला कुठेच दिसत नाही… आणि हे वृक्षारोपण पुन्हा आपल्याला नव्याने सुरू करायला हवे… आता सुरुवात केली तर आपल्या नातवंड पतवंडानां सुखाचे जाईल… जी चूक आमच्या वाडवडिलांच्यापासून त्यांनी केली फक्त वृक्षारोपणाचे फक्त फोटोच मागे राहिले आणि वृक्ष जगलेच नाहीत, जगवलेच नाहीत… विकासाच्या कार्यात वृक्षतोड करताना एकास चार वृक्ष लावण्याची अट घातली गेली होती .पण तेही एकाचे चार फक्त कागदावर दाखवून पैका मात्र खोऱ्याने ओढला गेला… गळा मात्र सगळयांनी एकाच सुरात लावला… निसर्ग कोपला कोपला… झाडे लावा झाडे जगवा घोषणा मात्र दुमदमल्या नि भिंती भिंती रंगल्या… पण एक झाड काही जगले नाही ते नाहीच.या दुष्परिणामाला आपण बळी पडत आहोत.पण आपण हि चुक सुधारायाचा प्रयत्न केला पाहिजे… तर हि वसुंधरा तरेल आणि आपल्या वारसांना तारेल… नाहीतर जगणं या चित्रात दिसतय तस वाळवंट होईल… ”
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरण – “प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२९ ☆
संस्मरण – प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हैरो, लंदन का इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर एक स्थान, जिस भवन में आज आरती होती है, मंत्र गूँजते हैं, दीप जलते हैं और भारतीय संस्कृति से जुड़े आयोजन होते हैं, वहाँ कभी Baptist चर्च था, बाद में वह भवन Salvation Army का आराधना स्थल भी रहा। आज यही स्थान सिद्धाश्रम का मंदिर और सामुदायिक केंद्र है।
इस धार्मिक वैभिन्य के इतिहास में कोई धार्मिक टकराव नहीं दिखाई दिया। लगा प्रार्थना कक्ष की दीवारों का धर्म मानवीयता ही होता है। धर्म मनुष्य के मन में होता है, ईंट पत्थर में नहीं।
एक ही छत ने अलग-अलग समय में अलग-अलग आस्था के लोगों की प्रार्थनाएँ सुनीं। भाषा बदली, पूजा की विधि बदली, आस्था की अभिव्यक्ति बदली, लेकिन प्रार्थना में उस अदृश्य परम शक्ति से तादात्म्य स्थापित करने की मनुष्य की वही तलाश बनी रही।
यही बात भारत के संदर्भ में भी सोचने को विवश करती है। हम कभी-कभी धर्मस्थलों की दीवारों के नीचे दबे इतिहास को खोजते-खोजते वर्तमान की शांति से बहुत दूर निकल जाते हैं। कौन-सा भवन पहले क्या था, किसका था और किसने क्या बनाया, ये प्रश्न इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें वर्तमान के वैमनस्य का कारण बनना चाहिए? हमें इन्हें अदालतों में हल करना पड़ रहा है!
लंदन में यह भवन उसी तरह के इतिहास का एक शांत उत्तर देता दिखाई देता है। किसी ने अतीत को मिटाकर वर्तमान नहीं बनाया , वर्तमान ने अतीत को अपने भीतर समेट लिया।
लंदन की बहुधार्मिक समभावी संस्कृति का यह पक्ष मुझे विशेष रूप से आत्मीय लगा। अपनी आस्था को पूरी श्रद्धा से जीना और दूसरे की आस्था के लिए भी स्थान छोड़ना।
सिद्धाश्रम की गतिविधियाँ भी पूजा तक सीमित नहीं, समुदाय और मानवता की सेवा से जुड़ी हुई हैं।
हमारे यहाँ भी तो प्रार्थना का मूल भाव है, सर्वे भवन्तु सुखिनः। फिर धर्म की आत्मा से अधिक उसकी जमीन, दीवार और इतिहास के स्वामित्व को लेकर, प्रतिक्रिया में लोग इतने बेचैन क्यों हो जाते हैं?
जिस स्थान पर आज कोई आरती कर रहा है, वहाँ कल किसी और ने प्रार्थना की थी, तो क्या ईश्वर कल वहाँ कम थे और आज अधिक हैं? शायद नहीं।
ईश्वर नहीं , केवल भक्तों के उन्हें पूजने के रास्ते बदलते है।
सिद्धाश्रम के इस भवन के इतिहास ने यही छोटी-सी, लेकिन गहरी बात सिखाई। आस्था को मन में रखिए, इतिहास को इतिहास में और वर्तमान को प्रेम से जीना ही पूजा है। इसी को सह-अस्तित्व कहते हैं।
22 Palmerston Road, मंदिर से लौटते हुए लगा कि इस भवन में आज दैदीप्य भारतीय संस्कृति का दीप केवल सनातन आस्था का दीप नहीं है। वह उन तमाम प्रार्थनाओं की निरंतरता का दीप है, जिन्हें इन दीवारों ने वर्षों से अपने भीतर सँजोया है।
मंदिर-मस्जिद-गिरजे बदलते रहते हैं,
प्रार्थना करने वाला मन वही रहता है।
इस इतिहास को समझने के उपरांत हैरो , लंदन के इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर में 5 सितंबर की शाम कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद लौटते हुए वह शाम मेरे लिए लंदन में इतिहास, आस्था और सह-अस्तित्व को एक ही छत के नीचे देखने की शाम थी।
फिर मिलूँगा, लंदन की किसी ऐसी ही कहानी के साथ, जिसे सबने देखा है, पर शायद अनदेखा कर दिया है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५०☆
☆ आलेख – बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
“कल से प्रार्थना सभा में एक लड़के को एक कहानी सुनानी होगी। ” शिक्षक ने यह कहा मगर पहले दिन एक ही लड़के ने नाम लिखवाया। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में पहले लड़के ने कहानी सुनाई। तब दूसरा बोल उठा, ” सर! मैं भी कहानी सुना सकता हूं?”
” हां। क्यों नहीं,” शिक्षक ने कहा और लड़के ने कहानी सुना दी।
तीसरे दिन 5 बच्चे कहानी सुनाने के लिए तैयार हो गए। अंतत शिक्षक को कहना पड़ा, ” एक दिन में तीन से ज्यादा लड़के कहानी नहीं सुनाएंगे। “
बच्चों को स्वप्रेरित कीजिए—
बच्चे एक दूसरे से हौड़ करते हैं। उन्हें एक दूसरे से बढ़-चढ़कर काम करने में मजा आता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इसे हम स्वप्रेरणा भी कह सकते हैं। जिसकी वजह से बच्चे बढ़-चढ़कर कहानी सुनाने में भाग लेने लगे थे।
इस स्वप्रेरणा की बदौलत बच्चे अगले दिन से पुस्तकों में से कहानी ढूंढने लगे थे। कुछ माता-पिता से कहानी सुनकर आते। धीरे-धीरे बच्चों में एक से बढ़कर एक कहानी सुनाने की होड़ होने लगने लगी। जो बेहतर कहानी सुनाता उसे शिक्षक शाबाशी देते। हरेक बच्चे की कहानी सुनाने की किसी ना किसी बात की शिक्षक प्रशंसा करते। इससे सभी बच्चे स्व प्रेरित हो रहे थे।
इस तरह प्रार्थना सभा में कहानी सुनाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया। इसका असर यह हुआ कि जो बच्चे पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते थे वे कहानी सुनाने में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे।
उन्हें पुस्तकालय तक स्वतः ले जाइए—
कुछ बच्चे तो स्वयं पुस्तकालय में जाने लगे। कुछ बच्चों ने शुरु-शुरु प्रश्न किया था, ” सरजी! कहानी कहां मिलेगी ? हम भी सुनाना चाहते हैं,” तब शिक्षक ने कहा, ” अपनी पाठ्यपुस्तक में या पुस्तकालय की किसी पुस्तक में मिलेगी। चाहो तो मम्मी-पापा या दादा-दादी से भी कहानी सुनकर यहां सुना सकते हो। “
बचे हुए बच्चे शिक्षक की इस प्रेरणा से पुस्तकालय तक पहुंचने लगे। उन्हें यह नहीं कहना पड़ा कि तुम पुस्तकालय की पुस्तकें पढ़ो। वह स्वयं पुस्तकालय की पुस्तकें टटोलने व पढ़ने लगे। उन्हें अब पढ़ने में मजा आने लगा था। क्योंकि उन्हें एक-दूसरे से बेहतर कहानी प्रार्थना सभा में सुनानी थी।
बच्चों में प्रतियोगिता करवाइए—
कौन बढ़िया कहानी सुना सकता है? जैसे प्रश्न उन्हें प्रतियोगिता के लिए उकसाते हैं। तब वे स्वयं ही एक दूसरे से प्रतियोगिता करने लगते हैं। एक छात्र ने अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई तो दूसरा उससे अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाने की चेष्टा करता है। यही स्वत: चलने वाली प्रक्रिया है। प्रार्थना सभा में इसकी होड़ को आसानी से देखा जा सकता है।
मोहल्ले को आनंद का मैदान बनाइए—
शाम के समय मोहल्ले में इस तरह की गतिविधियां कराई जा सकती है। कभी चुटकुले प्रतियोगिता रखी जा सकती है। बच्चे चुटकुले ढूंढने या पढ़ने के लिए किताबों का सहारा ले सकते हैं। ऐसे समय पर प्रतियोगिता स्थल पर कुछ पुस्तकें, अखबार, चुटकुले की पुस्तकें रखी जा सकती है। आधे घंटे का यह कार्यक्रम मोहल्ले को आनंद से भर सकता है। बच्चों में उत्साह और संचार के लिए बहुत ही बढ़िया गतिविधि है।
बच्चों का कवि सम्मेलन करें—
आप साप्ताहिक या मासिक रूप से इस गतिविधि का आयोजन किया जा सकता है। किसी भी कवि की रचना या कविता उसके नाम सहित सुनाना होगी। यह शर्त रखी जा सकती है। मोहल्ले के दो चार व्यक्ति को जज बनाया जा सकता है। प्रतियोगिता में पांच ₹ का प्रवेश शुल्क लिया जा सकता है। यह एकत्रित शुल्क प्रतियोगिता इनाम के तौर पर विजेता को भी दिया जा सकता है।
सुंदर लेखन प्रतियोगिता करवाएं—
हर बार अलग-अलग प्रतियोगिता करवाने से रोचकता व उत्साह बना रहता है। कभी सुंदर-लेखन प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इसमें सबसे सुंदर लिखने वाले को विजेता घोषित किया जा सकता है। कभी आप श्रुत-लेखन प्रतियोगिता करवा सकते हैं। इसमें सबसे अच्छे अक्षर, जिसमें कम से कम गलती हो उसे विजेता घोषित कर सकते हैं।
नाटक का आयोजन करवाएं—
बच्चों को नाटक के लिए तैयार करें। उनसे कहे- उनके लिए नाटक प्रतियोगिता आयोजन किया जा रहा है। उन्हीं में से एक निर्देशक बनाएं। वही अपना काम निभाए।
इस तरह अलग-अलग प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इन सब बातों से बच्चों की नजर बदल जाएगी। पांच-छह माह इसे करके देखिए। उसका नजरिया बदल जाएगा। तब आप यह कभी नहीं कहेंगे कि बच्चे पढ़ने से दूर हो रहे हैं। बस, पहल आपको करनी है। चाहे आप रचनाकार हो, शिक्षक हो, माता-पिता हो या अभिभावक हो। तब देखिए आप कहेंगे कि बालक पढ़ने से दूर नहीं हुए हैं आपने उन्हें पढ़ने से दूर कर दिया था।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
☆ महावस्त्राचे पदर – भाग ९ : काका (कुटुंबाचा भक्कम आधारस्तंभ) ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
(‘या लेखमालेचे आतापर्यंत आठ भाग झाले आहेत. त्यात पहिली सुरुवात अर्थातच विश्वातील सर्वात महत्त्वाचे नाते म्हणजे आईपासून झाली. नंतर क्रमाक्रमाने बाबा, आजी, आजोबा, मामा, मावशी आणि आत्या या नात्यांचा विस्तार आपण पाहिला. हे सगळे नात्यांचे एकेक रेशमी पदर आहेत. ते उलगडण्याचा आणि त्यांची झळाळी दाखवण्याचा आपण प्रयत्न केला. असाच एक समृद्ध पदर म्हणजे काका. त्यांच्याबद्दलच आज जाणून घेऊ या.)
‘काका’ म्हटलं की वडिलांसारखीच माया करणारी एक प्रेमळ व्यक्ती डोळ्यांसमोर येते. पूर्वी एकत्र कुटुंब पद्धती होती. घरात अनेक माणसे असत. त्यात वडील, काका आदी मायेची माणसे एकत्र असत. एकत्र शेती करणे, व्यवसाय करणे, आई-वडिलांकडे लक्ष देणे या गोष्टी ते आपुलकीने करीत असत. कधी आवश्यकतेनुसार एखादा भाऊ नोकरीनिमित्त शहरात गेला, तर दुसरा भाऊ शेती किंवा व्यवसाय सांभाळत असे; पण त्यांच्या प्रेमात कधी अंतर पडत नव्हतं. अशा वेळी काकांचं हे नातं रक्ताच्या पलीकडे जाऊन प्रेम, कर्तव्य आणि माणुसकी यांचं सुंदर प्रतीक बनतं. अशी नाती कुटुंबाला समृद्ध बनवतात.
आमची गावाकडे थोडीशी शेती होती. माझे वडील त्यांची शहरातील नोकरी सोडून शेती करण्यासाठी गावाकडे आले आणि तेथेच स्थायिक झाले. माझे दोन्ही काका नोकरीनिमित्त शहरात होते. एक काका मोठे आणि दुसरे लहान; माझे वडील मधले. काका कधी कधी सुट्टी मिळाली की गावी येत असत. काका आले की आम्हाला कोण आनंद व्हायचा! मग काकांबरोबर दोन-चार दिवस मजा असायची. कधी सुट्टीत काकांकडे राहायलाही जायचो.
काकांच्या प्रेमाचे अनेक प्रसंग आजही आठवतात. त्यांनी शहरात राहूनही खेड्यात राहणाऱ्या आणि शेतीत राबणाऱ्या माझ्या वडिलांना वेळोवेळी मदत केली. कारण शेती थोडी असल्याने फार पैसा पदरात पडत नव्हता. कधी ओला दुष्काळ, तर कधी कोरडा दुष्काळ! पीक चांगले आले तर बाजारात भाव पडलेले असायचे. अशा वेळी काका पैसे पाठवून मदतीचा हात देत. एकदा तर माझे वडील खूप आजारी झाले होते. आमचं गाव म्हणजे एक छोटं खेडं असल्याने वैद्यकीय उपचारांची सोय नव्हती. तेव्हा काका गावी येऊन वडिलांना आपल्या सोबत घेऊन गेले. त्यांना चांगल्या दवाखान्यात दाखल केले, त्यांची शुश्रूषा केली. असे अनेक प्रसंग आहेत. त्यामुळे काका म्हणजे मदतीचा हात, काका म्हणजे प्रेम या गोष्टी मनात पक्क्या झाल्या. पण काकांनी प्रेम लावले तसेच संस्कारही केले, शिस्तही लावली. त्यांच्याजवळून अनेक गोष्टी शिकायला मिळाल्या. म्हणून नात्यांच्या महावस्त्रातील अतिशय महत्त्वाचा असा हा पदर आहे. माझ्या वडिलांनी देखील त्यांच्या पुतण्यांवर जीवापाड प्रेम केलं. त्यांच्या आजारपणात त्यांच्या जवळ राहून सुश्रुषा केली.
मला दोन भाऊ, दोघेही माझ्यापेक्षा लहान. त्यामुळे माझ्या मुलांना लहानपणापासून त्यांचे प्रेम लाभले. त्यामुळे काका म्हणजे त्यांची अतिशय जिव्हाळ्याची व्यक्ती. घरात कुठलेही कार्य असो, काका सगळ्या प्रसंगात खंबीरपणे उभे राहायचे. एखादी जबाबदारी त्यांच्यावर सोपवली की मी निश्चिंत असायचो. सायकल शिकवणारे, पहिल्यांदा पोहायला घेऊन जाणारे, जत्रेत फिरवणारे किंवा छोटीशी चूकही समजावून सांगणारे काका माझ्या मुलांच्या बालपणाच्या आठवणींचं केंद्र आहेत. माझी मुलगी जेव्हा जीवावरच्या आजारातून उठली, तेव्हा या दोन्ही भावांच्या डोळ्यातील पाणी मी पाहिले आहे. तिच्या लग्नात माझ्यासारखेच पाणी या दोघांच्या डोळ्यांत तिला सासरी पाठवताना होते. अशा वेळी नात्याची खोली, उबदारपणा आणि महत्त्व जाणवते.
अनेक भारतीय कुटुंबांत काकाला वडिलांप्रमाणेच आदराचे स्थान दिले जाते. काका हे केवळ नातं नसतं, तर ती कुटुंबाची एक भक्कम ढाल असते. दुर्दैवाने ऐनवेळी कुटुंबातील कर्ता पुरुष म्हणजे मुलांचे वडील जग सोडून गेले, तर विस्कटलेल्या घराला सावरणारे आणि वडिलांची जागा घेऊन पुतण्या-पुतणीचा स्वतःच्या मुलांप्रमाणे सांभाळ करणारे अनेक काका आपण समाजात पाहिले आहेत. मुलांचे शिक्षण, त्यांचे संस्कार आणि त्यांच्या पायावर उभे राहीपर्यंत स्वतःचे सुख बाजूला ठेवून कर्तव्य निभावणारे काका हे ‘ पितृतुल्य ‘ असण्याचे खरेखुरे प्रमाण असतात.
आपल्या संस्कृतीत ‘काका’ हे संबोधन रक्ताच्या नात्यापलीकडेही आदराने दिलं गेलं आहे. समाजासाठी आणि राष्ट्रासाठी झटणाऱ्या थोर व्यक्तींना समाजाने प्रेमाने ‘काका’ किंवा ‘काकासाहेब’ म्हणून गौरवले आहे. वारकरी संप्रदायातील थोर संत गोरोबा कुंभार यांना आपण आदराने ‘गोरोबा काका’ म्हणतो, तर संपूर्ण जीवन समाजासाठी अर्पण करून स्वदेशीचा पुरस्कार करणारे गणेश वासुदेव जोशी ‘सार्वजनिक काका’ म्हणून ओळखले जातात. थोर गांधीवादी विचारवंत व लेखक काका कालेलकर, स्वातंत्र्यलढ्यातील नेते व साहित्यिक काकासाहेब गाडगीळ, टिळकांचे विश्वासू सहकारी व झुंजार पत्रकार काकासाहेब खाडिलकर, तसेच बालकांवरील प्रेमापोटी भारताचे पहिले पंतप्रधान पंडित नेहरू हे ‘चाचा (काका) नेहरू’ म्हणूनच जनमानसात अमर झाले. अगदी आमच्या चाळीसगावमध्येही वैद्यकीय सेवेसोबतच शैक्षणिक कार्य करणारे, अगदी वाघ, सिंहासारख्या वन्य प्राण्यांवर जिवापाड प्रेम करत पुण्याच्या पेशवे पार्कला स्वतः पाळलेली ‘सोनाली सिंहीण’ देणारे डॉ. वा. ग. पूर्णपात्रे यांनाही सर्वजण आदराने ‘काका’ म्हणूनच ओळखत असत.
इतिहासात राघोबादादांसारखी क्वचितच काही व्यक्तिमत्त्वे दिसतात ज्यांनी काकाच्या प्रेमळ नात्याला कलंक लावला आहे; पण सांस्कृतिक परंपरेत काका हे प्रेम, संरक्षण आणि कर्तव्याचं प्रतीकच आहे. आपल्या संस्कृतीत काका म्हणजे नेहमीच कुटुंबाचा आधारवड आणि समाजाचा मार्गदर्शक राहिला आहे. आज विभक्त कुटुंब पद्धतीमुळे एकत्र राहणं कमी झालं असलं, तरीही काका या नात्याबद्दलची आत्मीयता, जिव्हाळा आणि आदर तितकाच जिवंत आहे. नात्यांच्या या भरजरी महावस्त्रातील ‘काका’ नावाचा पदर कुटुंबाला सुरक्षिततेची ऊब, एकतेची ताकद आणि प्रेमाचा आधार देतो. हा पदर जेवढा जपला जाईल, तितकीच आपली नाती अधिक घट्ट, समृद्ध आणि सुंदर होत जातील.
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “एक गीतिका” ।)
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – नतमस्तक शक्तिमान है…!
☆ ॥ कविता॥ नतमस्तक शक्तिमान है…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मरकर अमर वो हो गया…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – गर इश्क है उर्दू से…।)