हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८७ – देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८७ ☆ देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त चित्र वर्षा ऋतु में होने वाली वर्षा से ठंडे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रभावित करता हुआ बता रहा हैं।अब समय बदल चुका हैं।हम सब तो प्रकृति के विरुद्ध शंखनाद बजा चुके हैं। सर्दी के मौसम में रजाई में बैठ कर हीटर की गर्मी के पूरे मज़े लेने के लिए आइसक्रीम खाना आम बात हो चुकी है।

छाता खरीद कर अब लोग आइसक्रीम खाते हैं, इससे छाता विक्रेता भी खुश रहता है, और आइसक्रीम विक्रेता भी खुश। हम सब ने प्रकृति को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कोल्ड ड्रिंक आदि ठंडे पेय का अब कभी भी ऑफ सीज़न नहीं होता है। ठंड में विवाह के समय मुफ्त के गर्म गुलाब जामुन के साथ वनिला आइसक्रीम की जुगलबंदी कुछ दशकों से लोक प्रिय हो चुकी हैं। गर्म खाद्य पदार्थ के बाद चिल्ड पानी पीना हो या ठंडी बियर के बाद  गरमा गर्म मुर्गा हलक से नीचे करने में हमारा स्वास्थ्य भी खराब नहीं होता है।

हमारा शरीर भी विचार करता होगा, हमें क्या जो करेगा वो ही ना भरेगा। रोग होने पर मौसम और हवा पर दोषारोपण कर हम  पाक साफ बन जाते हैं।

साठ के दशक यानि हमारे बचपन की बाते यदि आज के किसी जेन ज़ी से करो तो उल्टा जवाब मिलता है, “यू ओल्डीज़” हमेशा आदि मानव की तरह क्यों बिहेव करते हैं?

हमारी दादी तो गर्म भोजन करने के पश्चात तुरंत ठंडे जल से हाथ तक धोने के लिए मना करती थी। किसी भी मौसम में बाहर से घर प्रवेश के दस मिनट के बाद ही साधारण जल तक ग्रहण करने दिया जाता था। कारण पूछने पर परिवार के बड़े, बाहर और घर के टेम्प्रेचर के अंतर को शरीर को एडजेस्ट करने का कूलिंग पीरियड बता कर घर के छोटे बच्चों की जिज्ञासा को वैज्ञानिक तथ्य से शांत कर दिया करते थे। आज की युवा पीढ़ी तो गूगल की दलीलों से बुजर्गों की खिल्ली उड़ा देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३६ ☆ भिडले लोचन… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३६ ?

☆ भिडले लोचन… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

कसे अचानक जलधारांनी घिरले लोचन

आनंदाची वर्षा होता झरले लोचन

*

जे दिसले ते ह्या डोळ्यांना मृगजळ होते

फसवे पाणी फसवत होते फसले लोचन

*

चंद्र सूर्य अन् कुणीच साक्षी नव्हते तेव्हा

या प्रेमाचे केवळ साक्षी ठरले लोचन

*

मूक युद्ध हे दोघांमध्ये चालू होते

तेव्हा तेव्हा प्राणपणाने भिडले लोचन

*

दोघांचेही दुःख सारखे होते तरिही

तुझेच केवळ सहजपणाने रडले लोचन

*

डोळ्यांमधले सुख पाहू मी नाही शकलो

ओठांवरती ओठ ठेवता मिटले लोचन

*

शृंगाराची ती श्रीमंती उधळत गेली

असा अचानक धनाढ्य झालो हसले लोचन

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९७ – प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९७ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

और

जो प्रायमरी का मास्टर है

वो तो है और भी अधिक असहाय।

 

कोई धनी धोरी नहीं है उसका

उससे ज्यादा रुतबेदार होता है

सिपाही पुलिस का।

 

जाने उसकी किस्मत में

क्या बदा है,

आज वो गुरू नहीं

सिर्फ गधा है

जिसके ऊपर अनावश्यक

आदेशों और प्रतिबन्धों का

भारी बोझा लदा है।

वो जाता है स्कूल

तपती दोपहर में

या कि फिर तड़के।

थोड़ी सी जगह में बैठकर

उससे कोई दीक्षा नहीं लेता,

वो किसी को शिक्षा नहीं देता।

वो तो बढ़ाता है भीड़ को।

 

पढ़ाता है वो पचास लड़के।

और आगे चलकर

वही भीड़ नष्ट करने लगती है

प्रजातांत्रिक नीड़ को।

 

छूटता है स्कूल

तो लगता है जैसे

छूटा हो कोई खिरका,

कोई ठेका नहीं ले सकता क्या

इनकी फिकर का ?

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९४ – “ताप रहे हैं दुख अपने सब…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत ताप रहे हैं दुख अपने सब...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ताप रहे हैं दुख अपने सब...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

सहज उमीदों के आँगन में

पगड़ी लिये पिता ।

ताप रहे हैं दुख अपने सब

सिगड़ी लिये पिता ॥

 

रहा वेग आँसू का

तय फिर कैसे कर लेते ।

बाहों में आकार नदी का

कैसे कर लेते ।

 

ऊँचाई पर जा सकने की

चाह रही उनकी –

सुविधाओं की कितु नसेनी

लँगड़ी लिए पिता ॥

 

दर्द नहीं रोया कितना हो

आगे कठिन समय ।

पास नहीं फटका उनके ज्यों

अप्रत्याशित भय ।

 

जीवनराग रहे वे गाते

बस प्रसन्न होकर –

नये हौसलों की छोटी सी

खँजडी लिये पिता ॥

 

प्रतिभायें सब उनके

पद चिन्हो पर थीं चलती ।

सबकी आशायें प्रकाश में

थीं उनके पलती ।

 

उनके ही संदर्भ सभी को

रहे मार्ग दर्शक –

चलते रहे व्यवस्थायें

सब पिछड़ी लिये पिता ॥       

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ – हास्य-व्यंग्य – “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ 

☆ व्यंग्य ☆ “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

झब्बूलाल ने पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ाया और हमेशा की तरह मेरे सामने एक लंबा प्रश्न पटक दिया। भाई साहब, देवभूमि भारत में कदम-कदम पर देवालय हैं, जहां प्रति दिन शंख और घंटों की ध्वनि के बीच दिन भर ईश्वर की आराधना होती है, साधु-संतों, महंतों, जगत गुरुओं के प्रवचन होते हैं, देवी-देवताओं की शोभा यात्राएं निकलती हैं। लाउडस्पीकर लगा कर अखंड रामायण, भागवत पाठ, नर्मदा, शिव, विष्णु एवं गरुड़ पुराण होते हैं, भंडारे होते हैं, उस भारत भूमि वासियों से देवराज इंद्र के सम्मान में क्या गुस्ताख़ी हो गई जो इस वर्ष वे कहीं तो सिर्फ छिड़काव कर रहे हैं और कहीं बेहिसाब पानी उड़ेल रहे हैं ?

मैंने कहा, झब्बू भाई, मैं ऑफिस जाने के लिए घर से निकला हूं मुझे प्रश्नों के जाल में मत उलझाओ। वह बोला, भैया मैं कल से इस बारे में कई लोगों से पूंछ चुका हूं, किसी ने संतोषजनक समाधान नहीं किया। आप पत्रकार हैं कुछ तो बताएं। जब तक मैं आपके ऑफिस के लिए पानों की पुड़िया बनाता हूं। मैंने कहा, झब्बू भाई मैं पृथ्वी लोक का पत्रकार हूं। ट्रंप, पुतिन, मोदी, योगी, राहुल की प्रसन्नता, दुख  और नाराजी की वजह बता सकता हूं देवलोक वासी इंद्र की नाराजी अथवा उनके मूड के बारे में जानने के लिए तो तुम्हें देवलोक के पत्रकार नारद जी से संपर्क करना होगा। यदि लोगों को ऐसा लग रहा है कि देवराज रुष्ठ हैं इसलिए वर्षा को प्रभावित कर रहे हैं तो उन्हें खुश करने का प्रयत्न करें।

झब्बू बोला, भाई साहब अखबारों में छप रहा है कि अच्छी वर्षा के लिए लोग जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ करवा रहे हैं। टोना टोटके भी हो रहे हैं, कहीं गधों को गुलाबजामुन खिलाए जा रहे हैं, कहीं मेंढक-मेंढकी के विवाह कराए जा रहे हैं, जमीन में उल्टे घड़े गड़ाए जा रहे हैं फिर भी इंद्र देव खुश नहीं हो रहे!

पान लगाते हुए झब्बू ने मेरी ओर नजर फेंकी और पुनः कहा, भाई साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन देशों ने हमारे देश के खिलाफ इंद्र के कान भर दिए हों? मैंने कहा यह भी हो सकता भाई जी क्योंकि हमारे देश के कुछ नेता भारत को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं जबकि अनेक देश हमें गुरु नहीं मानना चाहते।

झब्बू बोला – भाई साहब, इंद्र देव की नाराजी के और क्या कारण हो सकते हैं ? मैंने झब्बू से पान की पुड़िया ली और कहा प्यारे भाई, जाने के पहले मुझसे इंद्र देव की नाराजी का सबसे बड़ा कारण सुन लो। झब्बू मेरी ओर झुका, मैंने धीरे से कहा – तुमने सुना होगा कि जब-जब भारत भूमि पर कोई धर्मनिष्ठ, तपस्वी, लोकप्रिय राजा हुआ है तब-तब इंद्रासन डोला है। इंद्र के मन में आशंका पैदा हुई है कि भारत का वह धर्मनिष्ठ राजा कहीं उनसे उनका सिंहासन न छीन ले, तो भाई शायद यही आशंका इस समय भी इंद्र के मन में समा गई है और संभवतः इंद्र देव इस कारण ही कुपित होकर वर्षा को अस्त्र बना कर भारत भूमि के शासक को अशक्त करके उससे अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं। मेरी बात सुनकर झब्बूलाल की आँखें खुली रह गईं। मैंने उसे हतप्रभ छोड़ कर अपने स्कूटर में किक मारा और आगे बढ़ गया।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६ ☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता सावन आ गया है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६

☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

यह तरुवर से कैसी

लिपटती हुई बेलें

प्रीत का नया

सावन में खेल खेलें

यह अठखेलियां

कर रही तुमको इशारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

वर्ष कि यह

लंबी लंबी झड़ियाँ

बूंदों की यह

लंबी-लंबी लड़ियाँ

यह लड़ियाँ यह झड़ियाँ

सब रंग है तुम्हारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन है मधुरस

पीने का मौसम

मदहोशी में गाफिल

जीने का मौसम

रस से भरे हैं

तुम्हारे नैन कटोरे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन आ गया है

अब तुम भी आ जाओ

व्याकुल है मन

अब ना तरसाओ

भीगकर बारिश में

संग कुछ वक्त गुज़ारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२० – घिर आई काली काली बदरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता घिर आई काली काली बदरी।)

☆ अभिव्यक्ति # १२० ☆

☆ घिर आई काली काली बदरी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

घिर आई काली काली बदरी,

खाली गागर, वाली बदरी.

न धरती की प्यास बुझेगी,

सूखी सूखी काली बदरी.

घिर आई काली काली बदरी,

*

प्यासी धरती, बंजर धरती.

किसका पेट भरेगी धरती,

धरती को कैसे सहलाए.

खुद भी तो है प्यासी बदरी,

घिर आई काली काली बदरी.

*

हम सब तुमसे,यही मनायें,

सागर से गागर, भर लायें.

फिर धरती पर बरस बरस कर,

इस धरती की प्यास बुझायें.

बन जाओ जीवन दाता बदरी,

घिर आई काली काली बदरी.

 

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४४ ☆ व्यंग्य – शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘शीतल भाई और शान्ति  की खोज’ इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शीतल भाई रिटायर हुए तो पानी से निकली मछली हो गये। लगा जैसे पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। समझना मुश्किल हो गया कि क्या करें और कहां जाएं। पहले सवेरे आठ बजे उठकर दफ्तर की तैयारी में लग जाते थे। टहलने- घूमने, पूजा-पाठ में कभी रुचि नहीं रही। ‘जेही विधि राखे राम, तेही विधि रहिए’ की नीति पर चलते रहे। शरीर को ज़्यादा कष्ट देने के कभी पक्षधर नहीं रहे।

अब रिटायर हुए तो नौ बजे तक पलंग पर ही लुढ़कते-पुढ़कते रहते। जब पत्नी उलाहना देती, ‘क्या अहदी बने पड़े हो, दिन कितना चढ़ गया, उठो’, तब उठते।

आदत के मारे कभी-कभी अपने पुराने दफ्तर में पहुंच जाते। कुर्सी लेकर किसी कर्मचारी के बगल में गपियाने को बैठ जाते। लेकिन कुछ दिन बाद वे प्रबंधकों की नज़र में खटकने लगे। आदेश निकल गया कि कर्मचारी किसी भी बाहरी आदमी को बगल में बैठने न दें।

दफ्तर में कार्यरत साथी भी अब उनसे कटने लगे थे। रिटायर्ड आदमी से क्या बात की जाए? शीतल भाई किसी कर्मचारी को फोन लगाते तो वह थोड़ी देर बाद ही बात बन्द करने के बहाने ढूंढ़ने लगता।

अब शीतल भाई को गांव की याद आने लगी। सोच लिया कुछ दिन गांव में रहेंगे तो मन बहलेगा। ताज़ा हवा मिलेगी, शान्ति मिलेगी। वहां अभी रिश्तेदार थे, पुराना पैतृक मकान था। पिता-माता के जीवन काल में साल दो साल में चक्कर लगाते थे, लेकिन वहां मन नहीं लगता था। शहर और दफ्तर बुलाता रहता था। एक-दो दिन में ही ऊब कर भाग खड़े होते। लेकिन अब दफ्तर का दबाव नहीं है। जाएंगे और जब तक मन लगेगा, रहेंगे।

पत्नी से पूछा तो उन्होंने अपनी गठिया का हवाला देकर जाने से मना कर दिया। शीतल भाई अकेले ही निकल पड़े। गांव पहुंचे तो भाइयों, भतीजों ने स्वागत किया। हाल-चाल का लेनदेन हुआ। पुरानी पोथियों के पन्ने पलटे गये।

रात को शीतल भाई आंगन में लेटे तो तारों से भरा आकाश दिखा। शीतल भाई चौंके। ऐसा आकाश अभी तक कहां था? शहर में तो यह कभी दिखा नहीं।

सवेरे गांव में निकले तो पाया कि गांव बदल गया है। अब उन्हें पहचानने वाला कोई नज़र नहीं आता। ढूंढ़ते हुए दो-तीन परिचितों के घर पहुंचे तो लोग उन्हें परिचय देने के बाद ही पहचान पाये। जो ठीक से पहचान पाये वे काफी बूढ़े हो चुके थे।

शीतल भाई को लगा कि यहां आकर ज़िन्दगी जैसे ठहर गयी है। सब कुछ मंथर गति से चलता है, कहीं कोई जल्दबाज़ी नहीं।

शाम को डेढ़ दो किलोमीटर टहलने निकल गये। सड़क के दोनों तरफ खेत दिखते थे। दूर जाकर नदी के पुल पर बैठ गये। बगल में पुराना मन्दिर था। सब तरफ सन्नाटा था। दो चार लोग मन्दिर में आते जाते दिखते थे। थोड़ी देर बैठकर शीतल भाई ऊब कर उठ आये।

शीतल भाई के घर से थोड़ी दूर एक सेठ की किराने की दुकान और मकान था। दूसरी रात को वहां से किसी के गुस्से से बकने- झकने की आवाज़ें आने लगीं। पूछने पर पता चला कि गांव के एक बिगड़े रईस अक्सर शराब पीकर सेठ को गालियां सुनाते हैं और सेठ जी शांत चित्त से सुनते हैं। कारण यह बताया गया कि सवेरे यही सज्जन सेठ के पास हाथ जोड़ते हुए आते थे और घर  की चीज़ें उनके पास गिरवी रख जाते थे। इस क्रम में सेठ जी उनकी खेती की ज़मीन और घर की बहुत सी चीजों के मालिक हो गये थे। इसीलिए वह गालियां सुनकर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते थे।

तीन-चार दिन में ही शीतल भाई गांव से उकताने लगे। यहां का सन्नाटा और जीवन की सुस्त रफ़्तार उन पर भारी पड़ रही थी। शहर में थे तो दिन भर गाड़ियों का आना-जाना, ट्रेनों का हूटर, पास-पड़ोस की खटर-पटर कानों में आती रहती थी। चौराहे पर खड़े आदमी को भी शहर अपनी रफ़्तार में लपेट लेता था। ज़िन्दगी उसी रफ़्तार की आदी हो गयी थी, इसलिए सुस्त गति वाली ज़िन्दगी में ‘एडजस्ट’ होना मुश्किल लग रहा था।

शीतल भाई को याद आया कई साल पहले वे मुंबई गये थे। वहां स्टेशन पर एक आदमी ने उनसे उनके शहर का नाम पूछा और फिर बताया कि एक बार वह तीन-चार घंटे के लिए उनके शहर में गया था और वहां की ज़िन्दगी उसे इतनी सुस्त लगी कि उसका जी घबराने लगा। उसकी बात याद करके शीतल भाई को लगा कि हर जगह की ज़िन्दगी की अपनी रफ़्तार होती है और एक रफ़्तार वाली जगह के आदी आदमी को दूसरी जगह समायोजित होना आसान नहीं होता।

एक हफ्ते बाद ही शीतल भाई वापस शहर पहुंच गये। पत्नी बोलीं, ‘बड़ी जल्दी वापस आ गये ? कुछ दिन और शान्ति से रह लेते।’

शीतल भाई ने जवाब दिया, ‘वहां शान्ति कुछ ज़्यादा ही है। हम शहर वालों को ज़्यादा शान्ति की आदत नहीं रही। ज़्यादा शान्ति हो तो मन घबराने लगता है। जैसा भी है हमारे लिए शहर ही ठीक है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११५ – लेन – देन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– लेन – देन …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११५  — लेन – देन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

एक ध्यातव्य ग्रामीण प्रसंग है। पड़ोसी देता था और लेने वाला पड़ोसी तो लौटाता ही नहीं था। देनदार पड़ोसी कशमकश अनुभव करता था किस चितवन से वापस मांगने का साहस कर पाए। उसकी पत्नी बड़ी गंभीरता से यह सब आँकती थी। इस मामले में अपने पति की अपेक्षा वह होशियार ही थी। उसने अपने पति से बात निकाल ली अपने घर से कुछ जाने का उसे दुख तो बहुत होता है। दुख की बात हुई तो उसने पति को सुख का नुस्खा सुझाया। तुम मांगने वाला फकीर बन जाओ। बाबा दो, लेकिन वापस पाने की आशा मत करना। पत्नी से सलाह पाने पर मांगने जैसे भाव से वह चेतन हो गया। पहली बार ही मांगे जाने पर उससे कहा गया, “मिंतर, तुमसे ली हुई कुल्हाड़ी मैं वापस कर दूँगा।” वह अंदर ही अंदर खुश हुआ। उसे तो याद ही न था अपनी कुल्हाड़ी कभी वहाँ गई थी। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

05  — 08 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८९ – जिंदगी गिरवी रखी☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८९ ☆

☆ सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

आबे जमजम

चाहते थे

जहर की बूँदें चखी।।

.

सात जन्मों के लिए

हों साथ हम

वादा किया।

चंद दिन में जुदा हो,

बतला उसे

जुमला दिया।

कह रहा मन चा

हिए तन नवल नूतन

नित सखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

.

कह रहा काक्रोच

पीड़ित को

अकड़ काजी जहाँ।

कहो कैसे राहतें

पाए दलित-पीड़ित वहाँ।

अशिक्षा ने भूख सह

शिक्षा गही

अब है दुखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

.

देश-हित को गौड़,

दल-हित को

प्रथम माना सदा।

अहंकारी वृत्ति

पद-मद, खुदी पर

खुद हैं फिदा।

लड़ पड़ोसी से

परेशां रात-दिन

मिथ्या मुखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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