हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 3 – हिन्द स्वराज से ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

 

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अगला आलेख  “हिन्द स्वराज से”.)

☆ गांधी चर्चा # 3 – हिन्द स्वराज से  ☆ 

 

प्रश्न :- अब तो मुसलामानों,पारसियों, ईसाईयों की हिन्दुस्तान में बड़ी संख्या है। वे एक राष्ट्र नहीं हो सकते। कहा जाता है कि हिन्दू-मुसलमानों में कट्टर वैर है। हमारी कहावते भी ऐसी हैं । ‘मियां और महादेव की नहीं बनेगी’। हिन्दू पूर्व में ईश्वर को पूजता है तो मुस्लिम पश्चिम में पूजता है।  मुसलमान हिन्दू को बुतपरस्त – मूर्तिपूजक- मानकर उससे नफरत करता है। हिन्दू मूर्तिपूजक है, मुसलमान मूर्ति को तोडनेवाला है। हिन्दू गाय को पूजता है, मुसलमान उसे मारता है। हिन्दू अहिंसक है मुसलमान हिंसक है। यो पग-पगपर जो विरोध है, वह कैसे मिटे और हिन्दुस्तान एक कैसे हो?

उत्तर :- हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी लिखते हैं : “आपका आखरी सवाल बड़ा गंभीर मालुम होता है। लेकिन सोचने पर वह सरल मालुम होगा।  हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते हैं; उससे वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नए लोग उसमे दाखिल होते हैं वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुल मिल जाते हैं। ऐसा हो तभी कोई मुल्क एक-राष्ट्र माना जायेगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगो का समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यों तो जितने आदमी उतने धर्म मान सकते हैं। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दुसरे के धर्म में दखल नहीं देते; अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने के लायक नहीं हैं। अगर हिन्दू माने कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दुओं से भरा होना चाहिए, तो यह निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा माने कि उसमे सिर्फ मुसलमान रहें, तो उसे भी सपना ही समझिये। फिर भी हिन्दू, मुसलामान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक मुल्की हैं; वे देशी-भाई हैं; और उन्हें  एक दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पडेगा।“

“दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है; हिन्दुस्तान तो ऐसा था ही नहीं।“

दोनों कौमों के कट्टर वैर पर महात्मा गांधी कहते हैं कि; ”कट्टर वैर दोनों के दुश्मन ने खोज निकाला है। जब हिन्दू मुसलमान झगड़ते थे तब वे ऐसी बातें भी करते थे। झगडा तो हमारा कब का बंद हो गया है। फिर कट्टर वैर काहे का? और इतना याद रखिये कि अंग्रेजों के आने के बाद ही हमारा झगडा बंद हुआ ऐसा नहीं है। हिन्दू लोग मुसलमान बादशाहों के मातहत और मुसलमान हिन्दू राजाओं के मातहत रहते आयें हैं। दोनों को बाद में समझ में आ गया कि झगड़ने से कोई फ़ायदा नहीं; लड़ाई से कोई अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे और कोई अपनी जिद भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए दोनों ने मिलकर रहने का फैसला किया। झगडे तो फिर अंग्रेजों ने शुरू करवाए।“

“मियां और महादेव की नहीं बनती इस कहावत का भी ऐसा ही समझिये। कुछ कहावतें हमेशा के लिए रह जाती हैं और नुकसान करती ही रहती हैं। हम कहावतों की धुन में इतना भी याद नहीं रखते कि बहुतेरे हिन्दुओं और मुसलामानों के बाप-दादे एक ही थे, हमारे अन्दर एक ही खून है। क्या धर्म बदला इसलिए हम आपस में दुश्मन बन गए? धर्म तो एक ही जगह पहुचने के अलग-अलग रास्ते हैं। हम दोनों अलग-अलग रास्ते लें, इससे क्या हो गया उसमे लड़ाई काहे की” ?

“और ऐसी कहावते तो शैव और वैष्णवों में भी चलती हैं; पर इससे कोई यह नहीं कहेगा कि वे एक राष्ट्र नहीं है। वेद्धर्मियों और जैनों के बीच बहुत फर्क माना जाता है; फिर भी इससे वे अलग राष्ट्र नहीं बन जाते। हम गुलाम हो गए इसलिए अपने झगड़े हम तीसरे के पास ले जाते हैं।“

“जैसे मुसलमान मूर्ति का खंडन करने वाले हैं, वैसे हिन्दुओं में भी मूर्ति का खंडन करने वाला एक वर्ग देखने में आता है। ज्यों-ज्यों सही ज्ञान बढेगा त्यों-त्यों हम समझते जायेंगे कि हमें पसंद न आने वाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे वैर भाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं; हम उस पर जबरदस्ती न करें।”

टिप्पणी : मैं इतना योग्य नहीं हूँ कि बापू के इस कथन पर कुछ कहूं। शुरुआत का वह हिस्सा जिसमे बापू हिन्दू मुसलमान की इस फसाद का दोष रेल वकील और डाक्टर को देते हैं। इसे मैंने नहीं लिखा और न इसे मैं समझ पाया हूँ। मैं नहीं मानता कि रेलगाड़ी आने से हिन्दू मुस्लिम के बीच या इंसान इंसान के बीच खाई पैदा हुई, वरन आवागमन के साधनों ने तो मेलजोल बढाने में मदद की है। कोई गांधी दर्शन का ज्ञानी इस पर अपने विचार विश्लेषण के साथ रखे, तो हमें बापू की यह बात समझने में मदद मिलेगी। महात्मा गांधी कई महत्वपूर्ण बातें हमें बताते हैं, कुछ तो मैंने रेखांकित की हैं। महात्माजी जो बातें ११० वर्ष पहले कह गए हैं और वही बातें हम आज भी हिन्दू संगठनों के नेतृत्व से भी सुनते हैं, दोनों में अंतर नहीं है। प्रश्न यह है कि फिर गांधीजी की बात मुसलमान क्यों मानते हैं उसका प्रतिवाद वे क्यों नहीं करते जबकि हिन्दू संगठनों की यही बाते उन्हें इतनी बुरी लगती हैं कि आज भे टीव्ही डिबेट के दौरान मरने मारने की बातें होने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है कि सड़क पर कुछ लोग किसी धर्म विशेष के व्यक्ति को घेर लेते हैं और फिर दोनों पक्षों में फसाद शुरू हो जाता है। क्यों महात्मा गांधी नोआखाली में कोलकाता में शान्ति स्थापित करने में सफल हो जाते हैं और उधर पश्चिमी भारत में पुलिस की पर्याप्त व्यवस्था भी हिन्दू-मुसलमानों का कत्ले आम नहीं रोक पाती। यह बड़े प्रश्न हैं और इसका उत्तर यही है कि गांधीजी के हावभाव (body language)  सरल व सामान्य थे, वे धमकी की भाषा के जगह प्रेम की वाणी बोलते थे, उन्होंने लोगों का दिल जीता जहाँ कहीं लगा ह्रदय परिवर्तन का मार्ग अपनाया और कभी किसी पर जबरदस्ती नहीं की, अपनी बात थोपने का प्रयास नहीं किया। लोगों को उन्होंने समझाने का प्रयास किया, लोग अगर सत्य को समझ गए और मान गए तो ठीक अन्यथा उन्होंने सत्याग्रह का मार्ग अपनाया, अनशन कर लोगों से सत्य को स्वीकार करने प्रेरित किया। हमेशा वे सफल हुए ऐसा भी नहीं है पर असफलताएँ उन्हें उनके मार्ग से डिगा नहीं सकी।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 16 ☆ पुरानी दोस्त ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “पुरानी दोस्त”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 16 ☆

☆ पुरानी दोस्त

कभी

वो तुम्हारी पक्की सहेली हुआ करती होगी,

एक दूसरे का हाथ थामे हुए

तुम दोनों साथ चला करते होगे,

ढलती शामों में तो

अक्सर तुम उसके कंधों पर अपना सर रख

उससे घंटों बातें किया करते होगे,

और सीली रातों में

उसकी साँसों में तुम्हारी साँस

घुल जाया करती होगी…

 

तब तुम्हें यूँ लगता होगा

तुम जन्मों के बिछुड़े दीवाने हो

और बिलकुल ऐसे

जैसे तुम दोनों बरसों बाद मिले हो

तुम उसे अपने गले लगा लिया करते होगे…

 

तुम उसे दोस्त समझा करते थे,

पर वो तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन थी!

 

यह तो अब

तुमने बरसों बाद जाना है

कि तनहाई का

कोई अस्तित्व था ही नहीं,

ये तो तुम्हारे अन्दर में बसी थी

और तुम्हारे कहने पर ही निकलती थी…

 

सुनो,

एक दिन तुम उठा लेना एक तलवार

और उसके तब तक टुकड़े करते रहना

जब तक वो पूरी तरह ख़त्म नहीं हो जाए…

 

उसके मरते ही

तुम्हारे ज़हन में

जुस्तजू जनम लेगी

और तब तुम्हें

तनहाई नामक उस पुरानी सहेली की

याद भी नहीं आएगी…

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 13 ☆ मेलुहा के मृत्युंजय ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  विश्वप्रसिद्ध पुस्तक “मेलुहा के मृत्युंजय ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा .  श्री विवेक जी द्वारा प्रेषित  विगत पुस्तक चर्चाएं वास्तव में “बैक टू बैक ” पढ़ने लायक पुस्तकें हैं ।श्री विवेक जी  का ह्रदय से आभार जो वे प्रति सप्ताह एक उत्कृष्ट  एवं विश्व प्रसिद्ध पुस्तक की चर्चा  कर हमें पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 13  ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – मेलुहा के मृत्युंजय   

पुस्तक – मेलुहा के मृत्युंजय 

हिन्दी अनुवाद –  The Immortals of Meluha 

लेखक – अमीष त्रिपाठी 

मूल्य –  195 रु

प्रकाशक –  वेस्टलैंड लिमिटेड

ISBN 978-93-80658-82-7

 

☆ मेलुहा के मृत्युंजय – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

 

पौराणिक साहित्य पर अनेक उपन्यास , महाकाव्य आदि लिखे गये हैं. अमीश त्रिपाठी ऐसे महान लेखक हैं जिन्होने भारतीय जनमानस में व्याप्त आध्यात्मिक कथाओ को एक सूत्र में पिरोकर अपनी लेखनी से चित्रमय झांकी बनाकर प्रस्तुत करने में सफलता पाई है.

उनके लिखे उपन्यास मेलूहा के मृत्युंजय भगवान शिव की भारतीय कल्पना को साकार रूप देकर एक महानायक के रूप मे वर्णित करती है. आज का अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत का पश्चिमोत्तर भाग जहां सरस्वती नदी बहा करती थी मेलूहा भू भाग के रूप में वर्णित है. इस कथानक में अमीश जी ने साहसिक लेखन करते हुये शिव को भावुक प्रेमी, भीषण योद्धा, चमत्कारी मार्गदर्शक, प्रबल नर्तक के रूप में एक सच्चरित्र शक्तिमान व्यक्ति के रूप में  केंद्र में रखते हुये ३ उपन्यास लिख डाले हैं. इसी श्रंखला के अन्य दो उपन्यास हैं नागाओ का रहस्य व वायुपुत्रो की शपथ. किताबें मूलतः सरल अंग्रेजी में लिखी गई थी फिर उनके अनुवाद हिन्दी सहित कई भाषाओ में हुये और पुस्तकें बेस्ट सेलर रही हैं.

मैंने गहराई से तीनो ही पुस्तकें पढ़ी.  १९०० ई पू की देश काल परिस्थिति में स्वयं को उतारकर धार्मिक विषय पर लिख पाना कठिन कार्य था जिसे अमीश ने बखूबी कर दिखाया है.

आज जब अदालतें ये सबूत मांगती हैं कि राम हुये थे या नही? ये उपन्यास एक जोरदार जबाब हैं, जिनमें ४००० वर्ष पहले शिव को एक भगवान नही एक महान व्यक्ति के रूप में कथानायक बनाया गया है. पुस्तक  पठनीय व संग्रहणीय है

 

चर्चाकार.. विवेक रंजन श्रीवास्तव, ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर

मो ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #23 – उध्वस्त जगणे ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक  भावप्रवण कविता  “उध्वस्त जगणे”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 23 ☆

 

☆ उध्वस्त जगणे ☆

 

जे लिहावे वाटले ते, मी लिहू शकलो कुठे ?

आशयाच्या दर्पणातुन, मी खरा दिसलो कुठे

 

कायद्याच्या चौकटीचे, दार मी ठोठावले

आंधळ्या न्यायापुढे या, सांग मी टिकलो कुठे ?

 

मी सुनामी वादळांना, भीक नाही घातली

जाहले उध्वस्त जगणे, मी तरी खचलो कुठे

 

गजल का नाराज आहे, शेवटी कळले मला

जीवनाच्या अनुभवाला, मी खरा भिडलो कुठे

 

एवढ्यासाठीच माझी, जिंदगी रागावली

मी व्यथेसाठी जगाच्या, या इथे झटलो कुठे

 

टाकले वाळीत का हे, सत्य माझे लोक हो

सांग ना दुनिये मला तू, मी इथे चुकलो कुठे

 

सरण माझे पेटताना, शेवटी कळले मला

जगुनही मेलो खरा मी, मरुनही जगलो कुठे

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 23 – राम और राम ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक अतिसुन्दर  एवं भावुक लघुकथा “राम और राम”। 

 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 23 ☆

 

☆ राम और राम ☆

 

‘लक्ष्मी चरण’ दीपावली के दिन पैदा होने के कारण माँ पिताजी ने प्यार से नाम रखा। खेती बाड़ी का काम और अपने छोटे से परिवार को लेकर बहुत खुश रहते थे। आम के बगीचे में घंटों काम करना, जो दादा परदादा लगाकर गए थे। अपनी जिंदगी से बहुत खुश थे।

लक्ष्मी चरण के यहां एक छोटा सा मंदिर श्री राम दरबार था। पूजा पाठ में ज्यादा मन नहीं लगाते थे। उनका अपना परिवार पत्नी, तीन पुत्रियां और एक पुत्र। पुत्र की मोह उन्हें राजा दशरथ जैसे थी। उन्होंने अपने बेटे का नाम रामकुमार रखा।

नित्य प्रति सभी काम होता रहा। सभी अपने अपने परिवार में खुश थे। अपने बेटे को भगवान राम से भी बड़ा मानते थे। धीरे धीरे समय गुजरता गया। लक्ष्मी चरण भी सयाने हो गए। नाती पोते वाला घर हो गया। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी।

अक्सर उनके हमउम्र आकर मंदिर में रामायण का पाठ करते परंतु उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं रहती थी। सभी कहते कुछ तो कर लिया करो भगवान के लिए आखिर समय में काम आएगा। परंतु लक्ष्मी चरण हंस कर टाल जाते थे। बेटे से मोह इतना कि भगवान की प्रतिमा से पहले अपने बेटे का मुंह देखना पसंद करते थे। बेटा भी बहुत ही होनहार हर तरह से पिताजी माताजी का ध्यान रखने वाला।

एक समय रामकुमार शहर से बाहर गया हुआ था। घर में पूजन त्यौहार के समय राम दरबार में भोग लगाते समय सभी ने कहा- कि भगवान को भोग लगा दो। भोग लगाया गया। सभी से प्रेम पूर्वक भोजन करने के लिए कहा गए। परंतु लक्ष्मी चरण भोजन को हाथ नहीं लगाए, कहे आज इस त्यौहार पर मेरे राम को खाना नहीं मिला है मैं भोजन नहीं करूंगा। घर के सभी सदस्यों ने कहा कि भगवान को भोग लगा दिया गया है। परंतु लक्ष्मी चरण नहीं माने। उन्होंने जिद्द ठान ली कि जो बना है सब थाली में मेरे राम के लिए निकाल कर रख दो बाकी सब लोग खाना खा लें। सयानी अवस्था के कारण हाँ कह कर सभी ने भोजन थाली में निकाल कर रख दिए। रात हुई तब तक लक्ष्मी चरण भोजन को हाथ नहीं लगाए।

सुबह भोर होते होते उनका बेटा घर वापस आया। पूछने पर पता चला दिन भर से जिस गांव गया था वहां पर खाने का कोई इंतजाम नहीं हो पाया। सारा दिन भूखा रहना पड़ा। पिताजी थाली में भोजन निकाल रखे हैं। ऐसा बताया गया। सभी को बहुत आश्चर्य हुआ कि उनका राम अभी तक खाना नहीं खा पाया है। दिन भर का भूखा प्यासा घर आकर सब बातें सुनकर अधीर हो वह रोने लगा। लक्ष्मी चरण कहने लगे मैं कहता था ना कि आज मेरे राम को भोग नहीं लगाया गया है।

ऐसा पुत्र मोह अब देखने सुनने को भी नहीं मिलता है। लक्ष्मी चरण कहते थे यह पत्थर की मूरत खड़े-खड़े क्या करेंगे? जो करेगा मेरा राम करेगा। मेरी गति मुक्ति और मेरा सारा ध्यान मेरा राम ही तो रखता है। बाकी सब तो देखने वाले हैं। धन्य हैं उनका पुत्र मोह और राम पर विश्वास। जय श्री राम।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – उत्सवधर्मी ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

☆ संजय दृष्टि  –  उत्सवधर्मी

जीवन की अंतिम घड़ी

श्यामल छाया सम्मुख खड़ी,
चित्र चक्र-सा घूमा
क्षण भर भी विहँसा
छाया के संग चल पड़ा,
छाया विस्मित..!
जीवन से वितृष्णा
या जीवन से प्रीत?
न वितृष्णा न प्रीत
ब्रह्मांड की सनातन रीत,
अंत नहीं तो आरंभ नहीं
गमन नहीं तो आगमन नहीं,
मैं आदि सूत्रधार हूँ
आत्मा का भौतिक आकार हूँ
सृष्टि के मंच का रंगकर्मी हूँ
सृजन का सनातन उत्सवधर्मी हूँ!

उत्सवधर्मिता बनी रहे।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 20 – कथा कहानी – नोटों वाली कथरी ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

 

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनकी एक कहानी “नोटों वाली कथरी। आप प्रत्येक सोमवार उनके  साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।)

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 20☆

 

☆ कथा कहानी – नोटों वाली कथरी  

 

सबकी अपनी-अपनी ठंड है और ठंड दूर करने के लिए सबकी अलग अपने तरीके की कथरी होती है। संसार का मायाजाल मकड़ी के जाल की भांति है जो जीव इसमें एक बार फंस जाता है वह निकल नहीं पाता है, ऐसी  पूस की कंपकपाती रात में खेत की मेढ़ में फटी कथरी के छेद से धुआंधार मंहगाई घुस जाती थी और भूखे पेट गंगू के दांत कटकटाने लगते थे। गंगू का एक मात्र साथी भूखा कुत्ता ठंड से कूं… कूं करते हुए कथरी के चारों ओर रात भर घूमता था और रातें और लंबी हो जातीं थीं, पर इस साल ठण्ड में कुछ राहत इसलिए मिली कि नोटबंदी के चक्कर में कोई बोरा भर नोट खेत में फेंक गया और गंगू ने बोरा भर नोट के साथ थोड़ी पुरानी रुई को मिलाकर नयी कथरी सिल ली थी नयी कथरी में नोटों की गर्मी भर गई थी जिससे जाड़े में राहत मिली थी। इस कथरी से ठंड जरूर कम हुई थी पर अनजाना डर बढ़ गया था जो सोने में दिक्कत दे रहा था।

डर के मारे गंगू ने थानेदार को चिठ्ठी लिखी कि साहब हमारी गलती नहीं है, कड़कड़ाती ठंड की रात में कोई बोरा भर नोट खेत में फेंक गया, तब से डर के मारे नींद नहीं आती रात दिन चिंता सताती है कि थानेदार साहब हमको जेल में बंद करके ठुकाई न कर दें इसीलिए जे चिठ्ठी में साफ साफ लिख रहे हैं कि हमारा कोई दोष नहीं है और न हमारे ये नोट हैं। हाँ जे जरूर है कि नोट चोरी न जाऐं इसलिए हमने इनको छुपा के कथरी के अंदर सिल लिया। सच में थानेदार साब पूस की ठंड में जे कथरी ओढ़ने में गजब की गरमी देती है पर आपके डण्डे से पिटने का डर और मंहगाई डायन खाये जात है।

एक दिन गांव की चौपाल में चर्चा चल रही थी…. कि नोटबंदी के बाद बंद हुए पुराने नोट पकडे़ जाने पर सजा का प्रावधान है। इसीलिए हमने जे बात जे चिठ्ठी में लिख दई है अब आपके समझ में आये चाहे न आये। हमारी कहीं से कोई गलती नहीं है लिख दिया तो सनद रहे और वक्त जरूरत पे काम आये। और साहब एक बात और है कि भगवान की कृपा से पहली बार नोटभरी रजाई सिली और ठंड में राहत भी मिली पर ये साले चूहे बहुत बदमाशी करते हैं कभी रजाई को काट दिया तो नोट बाहर दिखने लगेंगे और रजाई जब्त हो जाएगी, और फिर जबरदस्ती में हमारो नाम लग जाहे सो हम बार बार बताये दे रहे हैं कि जे नोट हमारे नहीं आयें न इन नोटों को हमने कभी जमीन में गाड़ा भी नहीं। थानेदार साहब हम गरीबी में पैदा भये और लंगोटी लगाये अभी भी आपके एरिया में रह रहे हैं आपको विश्वास न होय तो दो डण्डा मारके हमारी लंगोटी भी छुड़ाय लो, पर हम साफ बताय दे रहे हैं कि इतने सारे नोट हम पहली बार देखें हैं।

सरकार बाकी सब खैरियत है। आप खुद समझदार हैं। मोर गरीब को ध्यान रखियो मोरी कोई गलती नहीं आं।

आपका सेवक

गंगू

सुबह-सुबह खेत की मेढ़ में गंगू की लाश के सिरहाने मिली चिठ्ठी से गांव में हड़कंप मचा हुआ है और थानेदार कथरी में भरे नोट देख-देखकर गांव के सेठ पर शक कर रहे हैं…..

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य- लघुकथा – ☆ सोच ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक 

 

(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा रचित एक सार्थक एवं सटीक  लघुकथा   “सोच”.)

☆ लघुकथा – सोच

मेहता जी बदहवास से हांफते हुए आये और बोले — “सिंह साहब मेरे साथ थाने चलिये , रिपोर्ट लिखवाना है।”

सिंह साहब ने उनकी ओर आश्चर्य से देखते हुए पूछा – “रिपोर्ट किस बात की?”

“लड़के की मोटर साइकिल चोरी हो गयी है। वह कलेक्ट्रेट किसी काम से गया था , उसने मोटरसाइकिल, वाहन स्टैंड पर खड़ी न करके बाहर ही खड़ी कर दी थी । पांच मिनिट का ही काम था , बस गया और आया । इतने में ही गाड़ी चोरी हो गयी।”

मेहता जी ने अभी दो महीने पहले ही प्राविडेंट फंड से पचास हजार रुपये निकाल कर लड़के को मोटरसाइकिल खरीदकर दी थी ।

अक्सर वाहन स्टैंड वाले  के साथ पांच -दस रुपये देने के नाम पर आम लोगों से किचकिच होते सिंह साहब ने देखी है । स्टैंड के पांच -दस रुपये बचाने के चक्कर में उसने  पचास हजार रुपये की बाइक  खो दी । यह आम लोगों की  कैसी सोच है ?

सिंह साहब  इसी सोच में डूबे मेहता जी के साथ रिपोर्ट लिखवाने थाने की ओर चल दिये ।

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सकारात्मक सपने – #23 – तोड़ फोड़ राष्ट्रीय अपव्यय ☆ सुश्री अनुभा श्रीवास्तव

सुश्री अनुभा श्रीवास्तव 

(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी  सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी  के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति को  म. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज अगली कड़ी में प्रस्तुत है  “तोड़ फोड़ राष्ट्रीय अपव्यय”।  इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)  

 

Amazon Link for eBook :  सकारात्मक सपने

 

Kobo Link for eBook        : सकारात्मक सपने

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने  # 23 ☆

 

☆ तोड़ फोड़ राष्ट्रीय अपव्यय 

 

जब तब देखने में आता है कि कथित रूप से निकयम विरुद्ध बना कोई बड़ा व्यापारिक माल, तो कही कोई भव्य बहुमंजिला ईमारत ढ़हा कर सरकार बेहद खुश होती है, सरकारी कर्मचारी जो कुछ समय पहले तक ऐसे निर्माण करने की अनुमति देने के लिये बिल्डरों से गठजोड़ करके काला धन बटोर रहे थे, ऐसी सम्पत्तियो को नियम विरुद्ध होने से बचाने के लिये चिन्हित न करने के एवज में मोटी रकम बटोरते हैं.

लोगों की गाढ़ी कमाई, उनकी आजीविका, अनुमति देने वाली एजेंसियो, प्रापर्टी सही है या नही इसकी सचाई की जानकारी के बिना, मोटी फीस वसूल कर वास्तविक कीमत से कम कीमत की रजिस्ट्री करने वाले  रजिस्ट्रार कार्यालय के अमले, बिना किसी जिम्मेदारी के सर्च रिपोर्ट बनवाकर फाइनेंस करने वाले बैंको की कार्य प्रणाली, और व्यक्तिगत रंजिश के चलते, राजनैतिक प्रभाव का उपयोग कर आहें बटोरने वाले मंत्रियो पर काफी कुछ लिखा जाता रहा है. नियम विरुद्ध बताकर तोड़ फोड़, न्यायालयों के स्टे, फिर कथित कड़े निर्णयो और सरकार की  अचानक कार्यवाही के पक्ष विपक्ष में बहुत कुछ लिखा जाता रहा है. जिनका व्यक्तिगत कुछ बिगड़ता नही, वे ऐसी तोड़ फोड़ से प्रसन्न होते है, व ऐसे कदमो को सरकार का सही कदम बताने से नही चूकते. निरीह आम जनता को उजाड़ने में सरकारी अमले को पैशाचिक सुख  मिलता है.

मै एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत के “रामभरोसे ” जी रहे आम नागरिक होने के नाते इस समूचे घटनाक्रम को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखना चाहती हूँ. एक आम आदमी जिसे मकान लेना है उसके पास खरीदी जा रही प्रापर्टी की कानूनी वैद्यता जानने के लिये बिल्डर द्वारा दिखाये जा रहे सरकारी विभागों से  पास नक्शे एवं बाजू में किसी अन्य के द्वारा खरीदे गये वैसे ही मकान की रजिस्ट्री,बैंक की सर्च रिपोर्ट  तथा बिल्डर के निर्माण की गुणवत्ता के सिवाये और क्या होता है ? इस सबके बाद जब वह मकान खरीद कर दसो वर्षों से निश्चिंत वहां रह रहा होता है, नगर निगम उससे प्रसन्नता पूर्वक सालाना टेक्स वसूल रही होती है, टैक्स जमा करने में किंचित विलंब पर पैनाल्टी भी लगा रही होती है, उसे बिजली, पानी के कनेक्शन आदि जैसी प्राथमिक नागरिक सुविधायें मिल रही होती हैं तब अचानक एक सुबह कोई पटवारी उसके घर को अवैध  निर्माण चिंहित कर दे, इतना ही नही सरकार अपनी वाहवाही और रुतबा बनाने के लिये उसे वह दुकान या मकान खाली करने के लिये एक घंटे की मोहलत तक न दे तो इसे क्या कहा जाना चाहिये ? क्या इतने पर भी यह मानना चाहिये कि हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं ?

अवैध निर्माण को प्रोत्साहित भी सरकारो ने ही किया, कभी राजनैतिक संरक्षण देकर तो कभी पट्टे बांटकर, किसी के साथ कुछ तो कभी किसी और के साथ कुछ अन्य नीति आखिर क्या बताती है ? अक्सर देखा जाता है कि अमुक शहर  में अतिक्रमण विरोधी कार्यवाही में हजारो गरीबों के झोपड़े उजाड़ दिये गये, इस कार्यवाही में कुछ लोगो की मौत भी हो जाती है. क्या यह सही नही है कि ये अतिक्रमण करवाते समय नेताजी ने, तहसीलदार जी ने और लोकल गुंडो ने इन गरीबों का भरपूर दोहन किया था ?

जो लोग इस आनन फानन में की गई तोड़फोड़ की प्रशंसा करते हैं मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि मेरे घर में एक चिड़िया ने एक फोटो फ्रेम के पीछे घोंसला बना लिया था, मैं छोटी था, घोंसले के तिनके चिड़िया की आवाजाही से गिरते थे, उस कचरे से बचने के लिये जब मैने वह घोसला हटाना चाहा तो उस घोंसले तक को हटाने के लिये, चिड़िया के बच्चो को बड़ा होकर उड़ जाने तक का समय देने की हिदायत मेरे पिताजी ने मुझे दी थी. संवेदनशीलता के इस स्तर पर जी रहे मुझ जैसो को सरकार की इस कार्यवाही की आलोचना का नैतिक आधिकार है ना ? चिड़िया के घोसले से फैल रहे कचरे से तो हमारा घर सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा था, पर मेरा प्रश्न है कि किसी माल या इस जैसी अन्य तोड़ फोड़ से खाली जमीन का सरकार ने उससे बेहतर क्या उपयोग करके दिखाया  है ? पर्यावरण की रक्षा में बड़े बड़े कानून बनाने वाले क्या मुझे यह बतायेंगे कि तोड़े गये निर्माण में लगा श्रम, सीमेंट, लोहा, अन्य निर्माण सामग्री नेशनल वेस्ट नही है ? उस सीमेंट, कांच व अन्य सामग्री के निर्माण से हुये प्रदूषण के एवज में समाज को क्या मिला ? इस क्रिमिनल वेस्ट का जबाबदार आखिर कौन है ? इगोइस्ट मंत्री जी ? नाम कमाने की इच्छा से प्रेरित आई ए एस अधिकारी ? क्या ऐसी कार्यवाहियो की अनुमति देने के लिये एक डिप्टी कलेक्टर स्तर के अधिकारी के हस्ताक्षर पर्याप्त हैं ? यह सब चिंतन और मनन के मुद्दे हैं.

मैं नही कहती कि अवैध निर्माण को प्रोत्साहन दिया जावे. सरकार ने यदि उन लोगो पर कड़ी कार्यवाही की होती, जिन्होने ऐसे निर्माणो की अनुमति दी थी तो भी भविष्य में ऐसे निर्माण रुक सकते थे. रजिस्ट्रार कार्यालय बहुत बड़े बड़े विज्ञापन छापता है जिनमें सम्पत्ति के मालिकाना हक के लिये वैध रजिस्ट्री होना जरूरी बताया जाता है, रजिस्ट्री से प्राप्त फीस सरकारी राजस्व का बहुत बड़ा अंश होता है, तो क्या इस विभाग को इतना सक्षम बनाना जरूरी नही है कि गलत संपत्तियो की रजिस्ट्री न हो सके, और यदि एक बार रजिस्ट्री हो जावे तो उसे कानूनी वैधता हासिल हो. आखिर हम सरकार क्यो चुनते हैं, सरकार से सुरक्षा पाने के लिये या हमारे ही घरो को तोड़ने के लिये ?

मैं न तो कोई कानूनविद् हूं और न ही किसी राजनैतिक पार्टी की प्रतिनिधि. मैं नैसर्गिक न्याय के लिये इनोसेंट नागरिको की ओर से पूरी जबाबदारी से लिखना चाहती हूं कि यदि किसी माल एवं उस जैसी अन्य तोड़फोड़ की जगह उससे बेहतर कोई प्रोजेक्ट सरकार जनता के सामने नही ला पाती है तो यह तोड़फोड़ शर्मनाक है. क्रिमिनल वेस्ट है. यदि देश की सर्वोत्तम कालोनियो में इस तरह की कार्यवाही हो सकती है तो भला कौन इंटरप्रेनर प्रदेश में निवेश करने आयेगा ? यह कार्यवाही निवेशको को प्रदेश में बुलाने के लुभावने सरकारी वादो के नितांत विपरीत है. आम आदमी से धोखा है, इसका जो खामियाजा सरकार अगले चुनावो में भुगतती वह तो बाद की बात है, पर आज कानून क्या कर रहा है ? क्या हम इतने नपुंसक समाज के निवासी है कि एक मंत्री अपने व्यक्तिगत वैमनस्य के लिये आम लोगो को घंटे भर में उजाड़ सकता है, और सब मूक दर्शक बने रहेंगे ? क्या इन असहाय लोगो के साथ अन्याय होता रहने दिया जावे क्योकि वे संख्या में कम हैं, मजबूर हैं और व्यवस्था न होने के चलते अज्ञानता से वे इन मकानो के मालिक हैं. ऐसे इंनोसेंट लोगो पर कार्यवाही करके सरकार कौन सी मर्दानगी दिखा रही है, और क्या इससे यह प्रमाणित नही होता है कि यह सब दुर्भावना पूर्ण है, जब बिल्डर से सौदा नही बना तो तोड़फोड़ शुरू, अधिकारो के ऐसे दुष्प्रयोग जनतांत्रिक देश में असहनीय हैं. एक ओर आतंकवादियो और नक्सलवादियो तक को क्षमा दी जा रही है तो दूसरी ओर लोगो को बिना वजह बेघर  किया जा रहा है, क्योकि बिल्डर की गलती थी. बेहतर हो कि कानूनी कार्यवाही व सजा बिल्डर और निर्माण की अनुमति देने वाले अधिकारियो पर की जावे. बिल्डर पर बड़ा आर्थिक दण्ड लगाकर सरकारी खजाना भरा जावे.

दुष्यंत कुमार की पंक्तियां हैं

लोग जिंदगी लगा देते हैं एक घर बसाने में

उन्हें पल भर भी नही लगता बस्तियां जलाने में

यद्यपि इन पंक्तियो का संदर्भ भिन्न है, पर फिर भी यह ऐसी सरकारी नादिरशाही की दृष्टि से प्रासंगिक ही हैं. व्यापक लोकहित तथा राष्ट्र हित में उदारता से विचार कर लोगो को बेघर न करें, बिल्डर पर जो भी पेनाल्टी लगानी हो वह लगाकर यदि कोई अच्छा निर्माण कतिपय रूप से अवैधानिक भी है तो उसका नियमतीकरण करने की जरूरत है. हर तरह की तोड़ फोड़ राष्ट्रीय अपव्यय है, जिसका परोक्ष प्रभाव आम आदमी की जेब पर जरूर पड़ता है.

 

© अनुभा श्रीवास्तव

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ रंजना जी यांचे साहित्य #- 22 – तुझे रूप दाता ☆ – श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

 

(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज  प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  – “तुझे रूप दाता । )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य # 22☆ 

 

 ☆ तुझे रूप दाता  ☆

 

तुझे रूप दाता स्मरावे किती रे ।

नव्यानेच आता भजावे  किती रे।

 

अहंकार माझा मला साद घाली ।

सदाचार त्याला जपावे  किती रे।

 

नवी रोज स्पर्धा  इथे जन्म घेते।

कशाला उगा मी पळावे किती रे ।

 

नवी रोज दुःखे  नव्या रोज  व्याधी।

मनालाच माझ्या छळावे किती रे।

 

कधी हात देई कुणी सावराया।

बहाणेच सारे कळावे किती रे ।

 

पहा  सापळे हे जनी पेरलेले ।

कुणाला कसे पारखावे किती रे।

 

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

Please share your Post !

Shares