हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #14 ☆ परीक्षा ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “परीक्षा”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #14 ☆

 

☆ परीक्षा ☆

 

मैंने परीक्षाकक्ष में जा कर मैडम से कहा, “अब आप बाथरूम जा सकती है.”

मैडम ने “थैंक्स” कहा और बाहर चली गई और मैं परीक्षा कक्ष में घूमने लगा. मगर, मेरी निगाहें बरबस छात्रों की उत्तर पुस्तिका पर चली गई थी. सभी छात्रों ने वैकल्पिक प्रश्नों के सही उत्तर कांट कर गलत उत्तर लिख रखे थे. यानी सभी छात्रों ने एक साथ नकल की थी.

छात्रों के 20 अंकों के उत्तर गलत थे. मुझसे से रहा नहीं गया. एक छात्र से पूछ लिया,  “ये गलत उत्तर किस ने बताए हैं?”

सभी छात्र आवाक रह गए. और एक छात्र ने डरते डरते कहा, “मैडम ने!”

“ये सभी उत्तर गलत हैं”  मैं जोर से चिल्लाया, “सभी अपने उत्तर काट कर अपनी मरजी से उत्तर लिखो. वरना, इस परीक्षा में सब फेल हो जाओगे.”

तभी केंद्राध्यक्ष ने आ कर कहा, “क्यों भाई ! क्यों चिल्ला रहे हो? जानते नहीं हो कि ये परीक्षा है.”

मैं चुप हो गया. क्या जवाब देता. ये परीक्षा है?

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 14 – वासरू……! ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं।  मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ। पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  निश्चित ही श्री सुजित  जी इस सुंदर रचना के लिए भी बधाई के पात्र हैं। हमें भविष्य में उनकी ऐसी ही हृदयस्पर्शी कविताओं की अपेक्षा है। ऋण के बोझ तले दबे किसान को आत्महत्या करने से रोकने के लिए इससे बेहतर हृदयस्पर्शी कविता नहीं हो सकती ।  काश कोई उस किसान को उसके पुत्र/पुत्री की मनोव्यथा से अवगत करा सके।  प्रस्तुत है श्री सुजित जी की अपनी ही शैली में  हृदयस्पर्शी  कविता   “वासरू…! ”। )

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #14☆ 

 

☆ वासरू…! ☆ 

 

कसं सांगू

आजकाल शाळेत जायची सुद्धा

भिती वाटायला लागलीय…

जेव्हा पासून

माझ्या मित्राच्या बानं

कर्जापाई आत्महत्या केलीय ना

तेव्हापासून तर . . .

जरा जास्तच…,

शाळा सुटल्यावर कधी एकदा घरी येऊन

बापाला पाहतेय असं होत..

अन् बापाच्या कुशीत शिरल्यावर

काळजीचं भूत एकाएकी गायब होतं….

खरंच सांगतो बा मला

काहीच नको देऊ…

आणि आम्हाला सोडून बा . . .

तू कुठंच नको जाऊ….

दोन दिवस झाले बा. . . मी

कासरा दप्तरात घेऊन फिरतोय….

अन् तुझ्यासाठी जीव माझा

आतून हुंदके देऊन रडतोय…

बा.. तू समोर असलास ना

की भूक सुध्दा लागत नाही

अन् तुझ्या काळजीने

रात्र रात्र झोप सुध्दा

लागत नाही…..

काही झालं तरी बा…

आत्महत्ये सारखा विचार तू

डोक्यामध्ये सुध्दा आणू नको…

आणि तुझं हे वासरू

तुझ्यासाठी झुरतय इतकं

विसरू नको. . . !

 

© सुजित कदम, पुणे 

मो.7276282626

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य – # 12 – स्वयं से सदा लड़े हैं…..☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  गीत – कविता   “स्वयं से सदा लड़े हैं…..। )

(अग्रज डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी की फेसबुक से साभार)

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 12 ☆

 

☆ स्वयं से सदा लड़े हैं….. ☆  

 

जग में रह कर भी,

जग से हम अलग खड़े हैं

हम दूजों से नहीं

स्वयं से सदा लड़े हैं।

 

राम-राम, सत श्री अकाल

प्रभु ईश, सलाम

चर्च, गुरु द्वारा, मस्जिद

सह चारों धाम,

नहीं कहीं सद्भाव परस्पर

ही झगड़े हैं।

हम दूजों से नहीं स्वयं से सदा…….

 

चाह बड़े होने की मन में

सदा रही है

कब सोचा यह सही और

यह सही नहीं है

श्रेय-प्रेय के संशय में

खुद से बिछड़े हैं

हम दूजों से नहीं, स्वयं से सदा…….

 

खण्ड-खंड कर अपने को

हम रहे बांटते

दिखी दरार जहां भी

उसको रहे पाटते,

नहीं रहे दुर्भाव, कौन

अगड़े पिछड़े हैं

हम दूजों से नहीं, स्वयं से सदा…….

 

है मन में संतोष, सुखद

जो लिया-दिया है

सम्यक भावों से जीवन को

सही जिया है,

मेरे-तेरे के घेरों से

अलग खड़े हैं

हम दूजों से नहीं, स्वयं से सदा…….

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ काव्य कुञ्ज – # 3 – सवाल अभी बाकी हैं… ☆ – श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

(श्री मच्छिंद्र बापू भिसे जी की अभिरुचिअध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ साहित्य वाचन, लेखन एवं समकालीन साहित्यकारों से सुसंवाद करना- कराना है। यह निश्चित ही एक उत्कृष्ट  एवं सर्वप्रिय व्याख्याता तथा एक विशिष्ट साहित्यकार की छवि है। आप विभिन्न विधाओं जैसे कविता, हाइकु, गीत, क्षणिकाएँ, आलेख, एकांकी, कहानी, समीक्षा आदि के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं एवं ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं।  आप महाराष्ट्र राज्य हिंदी शिक्षक महामंडल द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी अध्यापक मित्र’ त्रैमासिक पत्रिका के सहसंपादक हैं। अब आप प्रत्येक बुधवार उनका साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज पढ़ सकेंगे । आज प्रस्तुत है उनकी नवसृजित कविता “सवाल अभी बाकी हैं…”

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज – # 3☆

 

☆ सवाल अभी बाकी हैं…

 

कहीं धूप तो कहीं छाँव,

कहीं सुख तो कहीं दुःख,

कहीं जन्म तो कहीं मृत्यु,

कहीं अपना और कहीं दूजा भी है,

कभी मेरा है कभी तेरा है,

कभी मैं-मैं और कभी तू-तू है,

न जाने कितना कहीं

और कितना क्या-क्या है.

 

इस पहेली को सुलझाने के पीछे हर एक है,

शायद कहीं की हाँ और ना,

भविष्य की सोच में,

है और था में,

खुद को भूल गया,

आज हर एक है,

सँभालो मेरे प्यारों!

अभी का वक्त अपना-अपना,

इसे बनाए शाश्वत जीवन सपना.

 

न जाने कब साँस छूटे एक पल में,

और तमाशा देखनेवाले खुदा करें,

अपना ही तमाशा बना न करें,

चलो आज के पल में कुछ ऐसा करें,

हर दिल में अपना एहसास भरें,

फिर चाहे साँस का साथ लूटे,

चाहे अपनों का हाथ छूटे.

 

फिर देखना तमाशबीन और चिता की लौ को,

और भी धधकेगी कि वह,

आक्रोश और क्रंदन से,

नफरत के बदले प्यार में,

हर आँसू टपकेगा तुम्हारी याद में,

देखकर तेरे जीवन का शाश्वत तमाशा,

ऊपरवाला तमाशबीन रो पड़ेगा इस द्वंद्व में,

क्यों बनी मेरी हाथ से यह सूरत,

जिसकी बनेगी मेरे कारण धरती पर मूरत,

क्या हक है उसके अधीन विश्वास को तोड़ने का ?

हर एक रिश्ते को बिखरने का ?

 

वह ईश भी सोच में पड़े,

ऐसा चलो एक काम करें,

उस ईश पर हम हँस पड़े,

होकर उसके सामने खड़े,

करें एक सवाल उसे,

क्यों यह दुनियावाले फिर

क्षणिक सुख के पीछे है पड़े?

कई सवाल करेंगे,

कई बवाल करेंगे,

पर क्या मानव अपने रास्ते,

खुद ही चुनेंगे?

सवाल अभी बाकी हैं……….

 

© मच्छिंद्र बापू भिसे

भिराडाचीवाडी, डाक भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा – ४१५ ५१५ (महाराष्ट्र)

मोबाईल नं.:9730491952 / 9545840063

ई-मेलmachhindra.3585@gmail.com , hindiadhyapakmitra@gmail.com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 14 – मानकुँवर ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी ह्रदय स्पर्शी कविता मानकुँवर. सुश्री प्रभा जी जानती हैं  कि समय गहरे  से गहरे घाव भी भर देता है. किन्तु, एक नारी ह्रदय ही नारी की व्यथा को समझ सकती है. ऐसा नहीं कि सभी पुरुष संवेदनहीन होते हैं. महत्वपूर्ण यह है कि  ऐसी कविता की रचना का होना उनके संवेदनशील  ह्रदय  में  एक संवेदनशील  साहित्यकार का  जीवित होना है.  ऐसी रचना के लिए उस पात्र को जीना होता है और इतिहास के पात्रों को वर्तमान के पात्र के मध्य सामंजस्य बनाना होता है. 

सुश्री प्रभा जी का साहित्य जैसे -जैसे पढ़ने का अवसर मिल रहा है वैसे-वैसे मैं निःशब्द होता जा रहा हूँ। हृदय के उद्गार इतना सहज लिखने के लिए निश्चित ही सुश्री प्रभा जी के साहित्य की गूढ़ता को समझना आवश्यक है। यह  गूढ़ता एक सहज पहेली सी प्रतीत होती है। आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 14 ☆

 

☆ मानकुँवर ☆

 

आज अचानक  आठवलीस तू

 

मानकुँवर —-

 

पब्लिक  मेमरी शॉर्ट असते म्हणतात, ते अगदी  खरं आहे  !

 

किती  अस्वस्थ  झाले  होते  मी,

वर्तमानपत्रातल्या तुझ्या  हत्येच्या

बातमी नं !

 

नखशिखांत हादरलेच होते,

ज्यांनी  केला तुझा  खून ते तुझे बाप, भाऊच सख्ये !

 

आणि  तुझा गुन्हा तरी काय ??

 

तू केलंस प्रेम–

जातिधर्मात किंचित  फरक असलेल्या—

तुला आवडलेल्या  तरूणावर !

 

मानकुँवर

तू होतीस उच्चशिक्षित–

डॉक्टर !!

 

तुझं नाव मानकुँवर ठेवणारांनी

तुला मानानं जगूच दिलं नाही,

आणि  मरण ही किती  अपमानास्पद  !

 

मानकुँवर आज आठवलीस तू,

“भूले बिसरे गीत” मधल्या दर्दभ-या गाण्या सारखी!

 

मानकुँवर —

तू खानदान की ईज्जत,

तू शालीनता, तू मर्यादा,

तू नंदिनी  तू बंदिनी ——-

 

युगानुयुगे भळभळणारी एक जखम —-

स्री जाती च्या प्रारब्धावरची !

तू चिरंजीवी ——

तुला मरण नाही !

 

पण तू मागत नाहीस तेल—-

द्रौपदी च्या  पाच पुत्रांना मारणा-या पापी आश्वत्थाम्यासारखी,

 

कारण तू स्री आहेस,

तू ब-या करतेस स्वतःच्या जखमा,युगानुयुगे—-

 

आणि  ते करतच आहेत  वार  आजतागायत  !

 

डॉ. मानकुँवर सहगल  !!

 

© प्रभा सोनवणे,  

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 6 ☆ दो लफ़्ज़ों की कहानी ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा ☆

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “दो लफ़्ज़ों की कहानी”। )

 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 6  

☆ दो लफ़्ज़ों की कहानी 

 

दो लफ़्ज़ों की ही ये कहानी होती

कितनी आसान ये जिंदगानी होती

 

न ही कोई ग़म, न ज़ख्म होता

कितनी खूबसूरत ये रवानी होती

 

यूँ ही ख़ुशी गले से लिपट जाती

मासूम सी ज़िंदगी की कहानी होती

 

ये सितारे हरदम झिलमिलाते रहते

रात कितनी हसीं और सुहानी होती

 

हाँ, मुहब्बत भी अमर हो जाती

शाम की कहकशां आशिकानी होती

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 2 ☆ बाल साहित्य – रोचक विज्ञान बाल कहानियां ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।  अब आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  की पुस्तक चर्चा  “रोचक विज्ञान बाल कहानियां।)

यह एक संयोग ही है क़ि पुस्तक के लेखक श्री ओम प्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी को 2 सितम्बर 2019 को ही शब्द निष्ठा सम्मान से सम्मानित किया गया.

(शब्द निष्ठा सम्मान समारोह 2019 अजमेर में 2 सितम्बर 2019 को  बालसाहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ जी को सम्मानित करते हुए बाएँ से डॉ अजय अनुरागीजी, विमला भंडारीजी, आशा शर्माजी, (स्वयं) ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’,अनुविभगीय अधिकारी साहित्यकार सूरजसिंह नेगी जी संयोजक डॉ अखिलेश पालरिया जी। ई-अभिव्यक्ति की ओर से   श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ जी  को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं.)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 2 ☆ 

 

 ☆ बाल साहित्य – रोचक विज्ञान बाल कहानियां ☆

पुस्तक चर्चा

बाल साहित्य .. रोचक विज्ञान बाल कहानियां

लेखक.. ओम प्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पृष्ठ ६०, मूल्य  १०० रु,

संस्करण पेपर बैक

प्रकाशक.. रवीना प्रकाशन गंगा नगर दिल्ली ९४

 

☆ बाल साहित्य  – रोचक विज्ञान बाल कहानियां – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

 

मस्तिष्क की ग्रह्यता का सरल सिद्धांत है कि  कहकर बताई गई   या पढ़ाकर समझाई गई बात की अपेक्षा यदि उसे करके दिखाया जावे या चित्र से समझाया जावे तो वह अधिक सरलता से बेहतर रूप में समझ भी आती है और स्मरण में भी अधिक रहती है. इसी तरह खेल खेल में समझे गये सिद्धांत या कहानियो के द्वारा बताई गई बातें बच्चो पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं, क्योकि कहानियो मे कथ्य के साथ साथ बच्चे मन में एक छबि निर्मित करते जाते हैं

जो उन्हें किसी तथ्य को याद करने व समझने में सहायक होती है.

विज्ञान कथा कहानी की वह विधा है जिसमें वैज्ञानिक सिद्धांतो या परिकल्पनाओ को कहानी के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है. विज्ञान कथा के द्वारा लेखक अपनी वैज्ञानिक कल्पना को उड़ान दे पाता है. मैने अपनी १९८८ में लिखी विज्ञान कथा में कल्पना की थी कि सड़को में स्ट्रीट लाइट की जगह एक कम ऊंचाई पर छोटा सा भू स्थिर उपग्रह हर शहर के लिये छोड़ा जावे, मेरी यह कहानी विज्ञान प्रगति में छपी है. हाल ही चीन ने इस तरह की परियोजना को लगभग मूर्त रूप दे दिया है, जिसमें वे आर्टीफीशियल मून लांच कर रहे हैं. इसी तरह मेरी एक विज्ञान कथा में मैने सेटेलाईट में लगे कैमरे से अपराध नियंत्रण की कल्पना की थी जो अब लगभग साकार है. देखें बिना तार के रेडियेशन से एक जगह से दूसरी जगह बिजली  पहुंचाने की मेरी विज्ञान कथा में छपी हुई परिकल्पना कब साकार होती है.

ओम  प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश एक शिक्षक हैं. वे बच्चो को विज्ञान पढ़ाने के लिये रोचक कथा में पिरोकर उन्हें विज्ञान के गूढ़ सिद्धांत समझाते हैं. कहानी बुनने के लिये वे कभी बच्चे की नींद में देखे स्वप्न का सहारा लेते हैं तो कभी पशु पक्षियो, जानवरो को मानवीय स्वरूप देकर उनसे बातें करते हैं. संग्रह में कुल १७ छोटी छोटी कहानियां हैं, हर कहानी में एक कथ्य है. पहली कहानी ही  गुरुत्वाकर्षण का नियम समझाती है. इंद्रढ़नुष के सात रंग श्वेत रंग के ही अवयव हैं यह वैज्ञानिक तथ्य  बताने के साथ ही परस्पर मिलकर रहने की शिक्षा भी देते हुये इंद्रढ़नुष बिखर गया कहानी बुनी गई है. इसी तरह प्रत्येढ़क कहानी बच्चो पर अलग शैक्षिक प्रभाव छोड़ती है.

किताब बहुत बढ़िया है व शालाओ में बड़ी उपयोगी है.

टिप्पणी… विवेक रंजन श्रीवास्तव, ए १, शिला कुंज नयागांव जबलपुर

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 14 – सुघड़ बहू ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “सुघड़ बहू ”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी की कलम को इस बेहतरीन लघुकथा के माध्यम से  समाज  को अभूतपूर्व संदेश देने के लिए  बधाई ।)

 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 14 ☆

 

☆ सुघड़ बहू ☆

 

माधवी  बहुत सुशील संस्कार वान लड़की शादी से दुल्हन बन कर ससुराल आई। कुछ दिनों के बाद सभी मेहमानों के जाने के बाद घर के सदस्य बच गये। वहां एक बहुत ही खराब आदत थी, खाना खाने के बाद उसी थाली में कुल्ली कर हाथ धोने की। जो माधवी को  कहीं से भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसने अपने पतिदेव से कही, उन्होंने भी कह दिया हमारे यहां सभी ऐसा ही करते है। तुम नया कुछ नहीं कर सकती।

माधवी ने भी सब को अच्छी आदत डालने का बीडा उठाया।

खाना परोसने के बाद वह वहीं खड़ी रहती। एक हाथ में पानी और दूसरे हाथ पर हाथ धोने वाला बर्तन। सबको हाथ धुलाती थी। और फिर बर्तन बाहर रख कर आ जाती थी। सबको बहुत बुरा लगता था। कई बातें भी बनती थी। परन्तु जो गलत था उसे वह सुधार रहीं थीं। धीरे-धीरे सभी को समझ आने लगा। वास्तव मे जो जूठे बर्तन उठाये जिसमें सुबह शाम हाथ धोकर कुल्ला किया जाये, तो उसको कितना खराब लगता होगा।

अब तो सब बाहर एक निश्चित जगह पर जाकर हाथ धोने लगे। पतिदेव भी खुश थे कि जो अच्छा काम है। उसे अपना लेना चाहिए। अब तो देखा-देखी सभी इस का ख्याल करने लगे।

माधवी सब के लिये अब “सुघड़ बहु ‘बन गई। उसे भी एक नयी पहल पर अच्छा लगा। अपनी जीत पर मुस्कुराने लगी।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #14 – शुद्र मागण्या* ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक सामयिक एवं सार्थक कविता  “शुद्र मागण्या*”।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 14 ☆

 

? शुद्र मागण्या* ?

 

हवा कशाला रंग नि कागद

हृदयावरती चित्र काढण्या

नजर एकदा टिपून घेते

साऱ्या बाबी अशा देखण्या

 

तुझे देखणे रूप मनोहर

नकोच अंबर नको चांदण्या

ओठांवरती मधाळ पोळे

पराग जाऊ कशा शोधण्या

 

पानामागे खरडुन पाने

हृदयी टोचू नको टाचण्या

हृदयाचे हृदयी प्रक्षेपण

नको पाठवू पत्र वाचण्या

 

अंधाराशी वाद न काही

त्याच्या काही शुद्र मागण्या

काळोखाशी भिडेल मी या

मिटून घे तू तुझ्या पापण्या

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

ashokbhambure123@gmail.com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ रंजना जी यांचे साहित्य #-13 – कविता – सांजवात ☆ – श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

 

(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।  आज  प्रस्तुत है संध्या -वंदना पर आधारित कविता  “सांजवात । )

 

? साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य #- 13? 

 

? सांजवात  ?

 

देवाजींच्या मंदिरात

तेवणारी सांजवात।

घोर अंधारल्या मना

देई उजाळा क्षणात।

 

प्रकाशली सांजवात

घरदार प्रकाशित ।

सायं प्रार्थना शमवी

विचारांचे झंजावात।

 

सांजवात लावूनिया

आळवावे योगेश्वरा।

विनाशावी शत्रू बुद्धी

सुख शांती येवो घरा।

 

मंद प्रकाश निर्मळ

धूप देई परिमळ।

सांजवात प्रकाशता

दूर पळे अमंगळ।

 

©  रंजना मधुकर लसणे✍

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

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