हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆

*

कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें। ।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला। ।

*

पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी  की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय  (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२६ – व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२६ ☆

☆ व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)

जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।

वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।

मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।

उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।

मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।

मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।

जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?

यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।

तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।

तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/05/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७१ ☆ बाल कविता – मीठे सपने लाएँ हम-तुम… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७१ ☆ 

☆ बाल कविता – मीठे सपने लाएँ हम-तुम… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

परियों की रानी से मिलकर

मीठे सपने लाएँ हम-तुम।

सबको ही हम मित्र बनाकर,

खुशियों को महकाएँ हम-तुम।।

* 

सपने चाँद सितारों वाले।

नदियाँ, पर्वत , झरनों वाले।

मन में नई उमंगें पाले।

सरगम वाले गीत सुना ले।

 *

नेह प्यार से रहें सभी हम

मस्ती में खो जाएँ हम -तुम।।

 **

 हिरण चौकड़ी भरें वनों में

मोर नाचते अलबेले-से।

गौरइयाँ, बुलबुल भी गाएँ

लगें हर जगह ही मेले -से ।।

* 

चंदा जी से हँस बतलाएँ

फूलों-से खिल जाएँ हम-तुम।।

 **

 धूप सुनहरी सूरज भेजें

खेतों में उपजेगा सोना।

हरी चुनरिया धरती ओढ़े

भर देगी मोती – सा दोना।।

* 

सुख की शीतल रातों में सब

सपनों में खो जाएँ हम-तुम।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #२९९ – कविता – ☆ धूप-छांव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “धूप-छांव…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #२९९ ☆

☆ धूप-छांव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

जीवन में दिन हैं तो, फिर रातें भी है

है मनमोहक फूल तो फिर कांटे भी है।

कुछ खोया तो, बदले में कुछ पाना है

कहीं रूठना है तो, कहीं मनाना है,

हुए मौन तो, मन में कुछ बातें भी है

जीवन में दिन————–

*

मिलन जुदाई का, आपस में नाता है

सम्बन्धों का मूल्य, समझ तब आता है

टूटे रिश्ते तो, नवीन नाते भी हैं

जीवन में दिन————-

*

है विश्वास अगर तो, शंकाएं भी है

मन में है यदि अवध तो,लंकायें भी है

प्रेम समन्वय भी, अन्तरघातें भी हैं

जीवन में दिन…………….

*

है पूनम प्रकाश तो, फिर मावस भी है

शुष्क मरुस्थल कहीं,कहीं पावस भी है

तृषित कभी तो, तृप्त कभी पाते भी हैं

जीवन में दिन………………

*

है पतझड़ आंगन में तो, बसन्त भी है

जन्में हैं तो, इस जीवन का अंत भी है

रुदन अगर दुख में, सुख में गाते भी हैं

जीवन में दिन————–

*

टूट टूट जो, जुड़ते और संवरते हैं

पीड़ाओं में गीत, मधुरतम गढ़ते हैं

व्यथित हृदय, दर्दों को सहलाते भी हैं

जीवन में दिन है तो फिर रातें भी है

है मनमोहक फूल तो फिर कांटे भी हैं।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२० ☆ माटी खूब महकती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “माटी खूब महकती है” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२० ☆ माटी खूब महकती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

गाँव अभी भी

अपने जैसे लगते हैं ।

माना थोड़ी

हवा लगी है शहरों की

पर माटी की

ख़ुशबू खूब महकती है

थोड़े अपनी

आँखों में सपने पाले

हँसी चिरैया

होंठों बीच चहकती है

आँगन अब भी

नहीं पराए लगते हैं ।

खिंची दिवारें

नहीं बँटे रिश्ते नाते

मन की चौखट

लाँघ हुआ करतीं बातें

तारों वाली

ओढ़ रज़ाई नभ नीचे

खाट-खटोला

और चाँदनी की रातें

चूल्हे सुलगे

प्यार दुलार मचलते हैं ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२४ ☆ शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२४ ☆

✍ शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

क़द्र घर में न किसी भी बशर की होती है

और की नजरों में कीमत हुनर की होती है

 *

फूल माला न गलीचों से खैर मक़दम हो

भूमिका खास समझ ले नजर की होती है

 *

चोट खाके भी हमें जो अता समर करता

आदमी की नहीं फ़ितरत शज़र की होती है

 *

सात तालों में वो महफ़ूज रखने बंद करे

जिस किसी के लिए कीमत गुहर की होती है

 *

शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती

बात बस उंसके दिलों पर असर की होती है

 *

जब भी डूबी है कोई नाँव बीच दरिया में

इसमें साज़िश रची अकसर भँवर की होती है

 *

कौन फैला रहा नफरत पड़ोसियों में अरुण

ये शरारत न इधर की उधर की होती है

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३१ – विजेता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – विजेता…।)

✍ विजेता… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

कभी-कभी,

जीत कर भी,

विजेता,

होता नहीं,  बहुत खुश,

क्यों कि,

पता है उसे

जीता नहीं है वो,

जीता है, प्रारब्ध उसका,

कमतर थी कूबत उसकी

अपने ही प्रतिद्वंदी से,

जो,

पराजित, कुंठित और अपमानित बैठा है

किसी ठौर ।

 

कुरूक्षेत्र में

पराजित हुआ कर्ण,

विजीत हुआ अर्जुन,

प्रारब्ध था दोनो का, अपना – अपना,

अपनी – अपनी

योग्यता और कौशल्य से परे ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆ कविता – तलाश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता  – “तलाश… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆

✍ कविता – तलाश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

अस्तित्व की तलाश

मैं से शुरू होकर

तू तक पहुंची तो

पर

मैं के साथ अहम् जागा

और तू के साथ मैं मद।

 

अहम् की कारा में कैद

अस्तित्व को ढूंढ़ता हूं

परिधानों के कहीं सूक्ष्म

शब्दजाल और यशाकांक्षा

दूर ले जाती है

जहां न मैं रहता हूं, न तुम।

 

तुम कण कण में हो

आप्त वचन है

फिर

एक ही प्रस्तर में क्यों?

न शून्य होता हूँ

न शून्य का विस्तार होता है,

मेरा मैं

इसी ऊहापोह में

समय के कगार पर

खड़ा रहता है,

अस्तित्वगत।

 

निरालंब होने हेतु

ढूंढ़ता हूं अवलंब

संकल्प विकल्पों से

आवृत्त मार्ग

लक्ष्य से पूर्व

तान देता है

एक झीनी चादर

और मैं उस चादर में

लिपट जाता हूं,

अंदर बाहर के सत्य में

उलझ जाता हूं।

 

फिर भी

तलाश जारी रहती है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८८ – परहित… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – परहित।)

☆ लघुकथा # ८८ – परहित ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

क्या बात है सब बच्चे चले गए पर यह अचानक देवेंद्र क्यों यहां पर आ पड़ा है क्लास के अंदर जाकर दिवाकर जी ने देखा।

आज घर नहीं जाना क्या?

दिवाकर जी ने जोर से देवेंद्र को उठाया।

हां सर मेरी आंख लग गई थी पता नहीं क्यों अच्छा किया आपने उठा दिया अब मैं घर जाता हूं चलो मैं छोड़ देता हूं तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही है तुम मुझसे क्यों नजरे चुरा रहे हो?

कोई बात नहीं है सर।

तुमने मुंह पर कपड़ा क्यों बांधा है और आंखें भी तुम्हारी लाल लग रही है। कोई कारण और बात हो तो मुझे बताओ?

क्या तुमने नशा किया है?

नहीं सर मैं नशा नहीं किया है.

सब मुझे बेचारा नौकर इस तरह से बोलते हैं मैं गरीब झोपड़ी से आता हूं ना इसलिए लग रहा है आप भी मेरा अपमान करना चाह रहे हैं।

दिवाकर ने कहा – देखो तुम बहाने मत बनाओ और नौटंकी मत करो मुझे सब पता है तुम लोगों ने जरूर बियर पिया है।

यह सुनकर देवेंद्र सन्न रह गया कुछ देर गुमसुम रहा।

और बोल कर यह शराब थोड़ी ना होती है। पर शुरुआत तो ऐसे ही होती है तुम बोल रहे हो कि तुम गरीब हो मेहनत करके तुम्हें कुछ बनना है तो क्या तुम इस तरह बनोगे कॉलेज में आकर अय्याशी करके।

चुपचाप मेरे साथ चलो उसे अपने घर लेकर गए और नींबू पानी पिलाया, दिवाकर जी ने और समझाया अपना काम खुद करना चाहिए दूसरों पर हमें निर्भर नहीं रहना चाहिए और दूसरे क्या करते हैं उस बारे में सोचोगे तो कभी जीवन में कुछ नहीं कर पाओगे मैं तो तुम्हें होनहार और अच्छा बच्चा समझता था थोड़ी देर सो जाओ नशा कम हो जाएगा तब घर जाना अपनी मां बहन को तो दुख मत दो।

मेरा तो तुमने दिल तोड़ा ही है कम से कम उनके मन में तो एक गलतफहमी की ख्वाहिश रहने दो कि तुम उन्हें एक अच्छा जीवन दोगे लेकिन तुम्हारा ही भविष्य अब मुझे अंधकार में दिख रहा है।

सर बस बहुत हुआ। आप मुझे बहुत सूना चुके। देवेंद्र ने कहा।

आप ही इतनी होशियार और आदर्शवादी थे तो क्यों नहीं जज, मजिस्ट्रेट, जज कलेक्टर किसी अच्छी पोस्ट पर चले गए रहते। आप तो हो गए शिक्षक ना और ज्ञान मुझे दे रहे हो इतना परहित करना छोड़ दो अपना भला बुरा मैं स्वयं समझ लूंगा।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५५ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ६ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५५ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ६ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

☆

नौ चर दस तक गिनत गय, परै चरन लपटाय ।

नौ पर खे आये सरन, बरन न पूँछो जाय ||

*

मिलत मिलत मन मिलत है, लगत लगत लग जात।

दघि मिसरी कितनउ मिलै, पै मन नई अघात ||

*

माँग कुँआरी लै गई, मान-सरोवर गैल ।

पाप गलाये जुगत में, सुदर गये बिगरैल ||

*

मंजु मधुर फिर मद भरे, भरे भरे अधरान ।

छू अत ही छिद जात मन, खैंचे बिना कमान ॥

*

मुसुक मुलक जाहर भयी, जैसे लछमन रेख ।

बिजुरी घाँईं गिर परै, बचै न बाँमन-सेव ॥

*

माखन घाँईं गात है, मिसरी सी मुस्कान |

बोली बानी सहद-सी, कलपतरू सो धियान ||

*

मुख दरपन, मुखमंजरी, मुख मोती दरसाय ।

मुख में मौआ गुरीरो, मुख से कओ न जाय ||

*

जानें कैंसो लग रओ, हो रइ देह सकाम ।

पवन पलागन कै गई, लयें पिया कौ नाम ॥

*

जो बौड़ी फूलन लगी, लगी भौंर की भीर ।

रितु राजा ने आय कें, बदल दई तासीर ॥

*

जे आयॆ बॆ कढ़ गये, भये पसीना-पूर 1

दोउ ग्रहन के बीच में, धरती धारें घूर ॥

*

देखें सें ठंडक मिलै, मिलबे पे गरमाय ।

बिना मिले सूखो परै, याद करै सरसाय ॥

*

मनरथ जब समरथ भओ, दसरथ पाओ नाम ।

अमर अजर मन अजुध्या, जस जोती श्रीराम ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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