हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५५ – “खुद की छबि की परछाईं-…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “खुद की छबि की परछाईं –...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “खुद की छबि की परछाईं –...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

गीलेतन पर चिपक

गयासाड़ी का हर रेशा ।

वही हुआ जो शंकित

मन में था इक अन्देशा ॥

 

ओट पेड़ की लेगी

सोचे डूबी पानी से।

तभी वचा सकती है

खुद को नई कहानी से।

 

नई नई तरकीबे

बचने की पानी बाहर –

फैलायेगी छाती पर

बालों को अन्वेषा ॥

 

लोग बहुत चालाक

“नहीं देखा” अभिनय करते ।

मनमें सुगठित देहयष्टि से

यों परिचय करते ।

 

अतिशय यौवनपर किंचित

साडी का आच्छादन –

पुरुष हृदय पर छायी वह

अभिनव अनुपम वेशा ॥

 

कभी गलेतक जल में

ठहरी बाल झटकती है।

कभी सतह पर जल की

हलके थाप पटकती है ।

 

कभी उभरकर आती

खुद की छबि की परछाईं –

से, लहरों संग बातें करती

क्षुब्ध दीर्घ केशा ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16 – 10 – 2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १५ – हास्य-व्यंग्य – “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

मैं सुबह अपने कम्पाउन्ड में टहलता हुआ टी वी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की भांति अपने दांतों पर टूथब्रश रगड़ रहा था। अचानक मुझे अपने पड़ोसी वर्मा जी का दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई दी। वे जल्दी में अपना स्कूटर बाहर निकल रहे थे। मैने उन्हें जोरदार नमस्कार ठोंकते हुए कहा “भाई जी आज रविवार को छुट्टी के दिन इतनी सुबह कहां की सैर पर निकल पड़े ?” स्कूटर में किक मारने को तैयार वर्मा जी मेरी बात सुनकर रुक गए, बोले “भैया क्यों मजाक उड़ा रहे हो ? आपको तो मालूम है कि इसी माह मुझे यह मकान खाली करना है अतः किराए के नए मकान की तलाश में निकल रहा हूं। ” उनकी बात सुनकर मैंने आश्चर्य से कहा – अरे, अभी सूरज भी नहीं उग पाया है, आदमी की संगत और शहरी आबोहवा में बिगड़ चुके पशु – पक्षी भी अभी सो कर नहीं उठे हैं, सड़क पर झाड़ू मारने वाला और दूध वाला भी अभी नहीं आ पाया है, सामने लगे सरकारी नल पर पानी का इंतजार करने वाली भीड़ भी अभी इकट्ठी नहीं हुई है, रेडियो का प्रसारण भी अभी शुरू नहीं हो पाया है और आप किराए का मकान ढूंढने निकल पड़े!

वे मेरे निकट आते हुए बोले – आप ठीक कहते हैं बड़े भाई, अभी सूरज भले ही नहीं उगा और सरकारी नल से दूध वाले तक जो भी आपने गिनाए हैं वे भी नहीं आए, लेकिन मेरे घर समाचार पत्र आ चुका है और मैं उसमें छपे किराए के मकानों संबंधी सभी विज्ञापन पढ़ कर नोट कर चुका हूं। अब यदि आपने अपनी बातों के जाल में फंसा कर मुझे निकलने में देर करवा दी तो निराशा ही हाथ लगेगी, इसलिए मेरा नमस्कार स्वीकार करें और मुझे जाने दें।

मैं फुर्सत में था अतः बात को आगे बढ़ाता हुआ बोला – “प्यारे भाई मैं आपको कहां रोक रहा हूं ? आप जाएं और आज किराये का मकान ढूंढने में अवश्य सफल हों ऐसी मेरी कामना है, लेकिन अनुरोध केवल इतना है कि मेरे साथ एक प्याली चाय पीने से इंकार न करें। ” चाय प्रेमी वर्मा जी मेरा अनुरोध नहीं ठुकरा पाए और स्कूटर में ताला मारते हुए बोले – ” चलिए, लेकिन चाय के बाद सिगरेट भी पियूंगा। ” मैंने कहा – ऐसी भी क्या बात है भाई जी आप थोड़ा रुकें तो आपको नाश्ता भी करवाता हूं। नाश्ते के आग्रह से उन्हें मकान ढूंढने का काम फिर याद आ गया। वे चिंतामग्न होकर बोले – बड़े भाई नाश्ता भले ही न कराएं , किराए का मकान दिलवा दें। मैंने कहा चिंता न करें किराए का मकान आपको अवश्य मिलेगा और वर्तमान मकान से अच्छा मिलेगा। जब खाली मकानों की सूची आपकी जेब में है तो चिंता किस बात की ? वर्मा जी से इतना कहते हुए मैंने अपने कम्पाउन्ड में लगे नल से मुंह धोया और चेहरे पर तौलिया फिराता हुआ पुनः उनकी ओर घूमा। वर्मा जी वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ चुके थे और मेरी पत्नी के हाथों से चाय का प्याला ग्रहण करते हुए उनसे किराए के मकानों की समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे। मैंने भी चाय का प्याला उठाया और चुस्की मारता हुआ अपनी पत्नी से बोला – देखो तो इन्हें, ये किराए के मकानों की सूची जेब में रखकर भी इतना परेशान हो रहे हैं। मेरी बात सुनकर वर्मा जी झुंझला उठे, कहने लगे बड़े भाई – चूंकि आप स्वयं अपने मकान के मालिक हैं अतः आपको किरायेदारों की तकलीफें, खासकर जिन्हें शीघ्र ही नया मकान खोजना हो समझ में नहीं आ सकतीं।

मैंने कहा, यार मेरे ही घर में मेरी ही चाय पीते हुए मेरी “समझ” पर शक कर रहे हो जबकि तुम्हें अभी मुझसे मांगकर सिगरेट भी पीना है। मेरी बात पर उन्होंने हें – हें करते हुए खाली प्याला नीचे रखा और मेरे द्वारा बढ़ाई गई सिगरेट झटकते हुए बोले – बड़े भाई, किराए के खाली मकानों की सूची अवश्य मेरी जेब में है और मैं उन्हें देखने भी जा रहा हूं, लेकिन उम्मीद नहीं है कि उनमें से मुझे कोई मकान मिलेगा।

मैंने माथे पर बल डालते हुए, आँखें सिकोड़ कर आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा – भाई जी कार्य शुरू करने के पहले ही आप निराशा में जकड़े जा रहे हैं, यह तो अच्छी बात नहीं है। हौसला रखकर जाइए कि आपको मकान मिलेगा। वे बोले – जा तो हौसले से ही रहा हूं लेकिन बात यह है कि सामान्यतः अखबारों में छपे किराए के खाली मकानों के विज्ञापन बैंक, एल आई सी तथा सरकारी कर्मचारियों के लिए होते हैं और मैं सिर्फ कर्मचारी हूं, सरकारी कर्मचारी नहीं। मैंने कहा, भाई जी गजब करते हैं आप भी! क्या आम आदमी को किराए का मकान मिलता ही नहीं है ? आखिर अभी तक भी आप किराए के मकानों में ही रह रहे हैं। वर्मा जी बोले – आपने सही फरमाया भाई साहब, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुझे मात्र तीन माह में यह मकान क्यों छोड़ना पड़ रहा है और पिछले 10 वर्षों में मुझे 12 मकान क्यों बदलना पड़े ?

मैंने कहा, भाई मुझे कैसे मालूम होगा। न कभी मैंने आपसे आपके किराए के मकानों का इतिहास पूछा और न ही आपने बताया। न तो मुझे किसी किरायेदार का मकान मालिक होने का अनुभव है न ही किसी मकान मालिक के किरायेदार होने का। पिछले किसी जनम का पुण्य रहा होगा सो पिताजी मकान बनवा गए। मेरी वर्मा जी से हो रही रोचक बातचीत में रुचि लेते हुए न जाने कब मेरे पीछे मेरी पत्नी भी आकर खड़ी हो गई, अचानक वो बीच में बोल उठी – भाई साहब ये इतना अच्छा मकान आप क्यों छोड़ रहे हैं। इसके तो मकान मालिक भी यहां नहीं रहते, किसी से कोई ख़िटखिट नहीं। वर्मा जी ने कहा – ये मकान मालिक भी अजीब होते हैं भाभी जी! आज तक इनके नियम – कानून, धाराएं, इच्छाएं कोई किरायेदार नहीं समझ सका फिर मैं क्या चीज हूं। आप मेरे वर्तमान मकान छोड़ने का कारण सुनेंगी तो आश्चर्य करेंगी। अगर मकान मालिक पहले ही अपनी मंशा प्रगट कर देता तो मैं यह मकान किराए पर लेता ही क्यों ? अपने मकान मालिक के प्रति वर्मा जी की बातें  यद्यपि मेरी उत्सुकता बढ़ा रही थीं तथापि मैंने उसे प्रगट न करते हुए कहा – ऐसी क्या विशेष बात हो गई वर्मा जी, किरायेदारों के लिए तो सभी मकान मालिकों के नियम एक जैसे होते हैं जो अनुबंध पत्र के साथ – साथ किराए की मासिक रसीद के पीछे भी छपे रहते हैं। जैसे किरायेदार सुबह 8 के पहले और रात्रि 9 बजे के बाद रेडियो – टी वी नहीं चलाएगा। ज्यादा बिजली – पानी खर्च नहीं करेगा। घर में ऊंची आवाज में बात नहीं करेगा। किराएदार के बच्चे शोर नहीं करेंगे। उसके घर अक्सर और अधिक मेहमान नहीं आएंगे। वह घर की दीवारों पर कील नहीं ठोकेगा। ठीक समय पर किराया देगा। जब कहा जाएगा तब मकान खाली कर देगा आदि आदि। एक अलिखित नियम भी रहता है – मौका आने पर अकेली विवाहित/अविवाहित महिला को मकान किराए पर दिया जा सकता है किंतु अविवाहित अथवा अकेले पुरुष को नहीं। आपने अपने मकान मालिक के इसी तरह के किसी कानून को ठेंगा दिखा दिया होगा अथवा उसकी धज्जियां उड़ा दी होंगी, बस हो गई मकान मालिक की भृकुटि टेढ़ी और आप निकल पड़े नए मकान की तलाश में। भाई मेरी समझ में तो मकान मालिक – किरायेदार का सम्बन्ध भी सास – बहू या ननद – भौजाई की तरह ही है जिनमें ज्यादा देर नहीं पटती।

वर्मा जी पूरी शांति से मेरी बात सुन रहे थे। मेरी बात में विराम लगता देख वे फुर्ती से बोल पड़े – बड़े भाई यदि आपकी बात पूरी हो गई हो तो अब मैं अर्ज करूं। मैंने कहा, जरूर करिए। आप जितने विस्तार से अर्ज करेंगे, मेरा मकान मालिक – किरायेदार सम्बन्धी ज्ञान उतना ही बढ़ेगा। वर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले – भाई साहब वास्तव में अभी आप मकान मालिकों की नियमावली व चरित्र से आंशिक रूप से ही परिचित हैं। मेरी पत्नी ने वर्मा जी की बात में हस्तक्षेप करते हुए कहा – ठीक है भाई साहब आप ही उनकी नियमावली पूरी करते हुए उनके विविध चरित्रों पर प्रकाश डाल दीजिए। बताइए आप यह मकान इतनी जल्दी क्यों छोड़ रहे हैं, कौन किससे और किस कारण से अलसेट में आ गया। वर्मा जी बोले – भाभी जी अलसेट में तो आमतौर पर किरायेदार को ही आना पड़ता है, उदाहरण के रूप में मैं आपके सामने हूं। मेरे मकान मालिक अभी 15 दिन पहले तक मुझसे शुद्ध घी में तली और शक्कर में पगी वाणी में बोलते थे। कारण था मेरा छोटा भाई, जिससे वे अपनी बेडौल और मंदबुद्धि लड़की की शादी करना चाहते थे। उनका प्रस्ताव था कि वे यह मकान भी छोटे भाई के नाम लिख देंगे। उनका बार बार का यह प्रस्ताव जब मैंने ठुकरा दिया तभी उन्होंने मुझसे कह दिया कि अब आप जल्दी ही दूसरा मकान ढूंढ लें। इसके पहले वाला मकान भी मुझे मकान मालिक की लड़की से भाई की शादी न करने के कारण ही छोड़ना पड़ा था। उसके पहले मैं जिस मकान में रहता था वहां के मालिक ने मुझे इसलिए निकाल दिया कि वे टेलीफोन वाले किरायेदार को रखना चाहते थे, मैं टेलीफोन नहीं लगवा सका। एक मकान सिर्फ इसलिए छूटा की मैंने मकान मालिक की बूढ़ी माता जी को रामायण सुनाने में नागा करना शुरू कर दिया था और उन्हें प्रतिदिन रात्रि में रामायण सुनना मकान मालिक की शर्त थी। इसके पहले तो एक मकान केवल इसलिए छोड़ना पड़ा कि मकान मालिक के कुत्ते को मैं पसंद नहीं आया। वहां रहते हुए महीनों हो जाने के बाद भी वह मुझे देखकर दुश्मनों की भांति भोंकता और मौका मिलते ही दौड़ा भी देता था। मुझे कुत्ते से डरता देख कर मकान मालिक की बीबी व बच्चे हंसते और ताली बजाते, किंतु मुझे गुस्सा आता। जब मैंने कुत्ते वाला मकान छोड़ने का फैसला किया तब मकान मालिक ने अपनी बीबी – बच्चों और अपने कुत्ते की खुशी के लिए किराया कम करने का लालच देकर मुझे रोकने का प्रयास भी किया था, लेकिन मैं भयभीत था। वर्मा जी की बात सुनकर मैं ठहाका लगाकर हंस पड़ा। मुझे हंसता देख कर वर्मा जी नाराज होकर जाने के लिए उठ खड़े हुए, किंतु उसी समय मेरी पत्नी नाश्ता लेकर प्रगट हुई। गर्म नाश्ते की खुशबू ने वर्मा जी का गुस्सा दूर कर दिया वे पुनः कुर्सी पर बैठ गए और एक पकौड़ा मुँह में डालते हुए बोले – भाई साहब, 5/6 वर्ष पूर्व मुझे एक मकान सिर्फ इसलिए छोड़ना पड़ा कि मेरे लिए मेरी  मकान मालकिन की मुस्कानें बढ़ती जा रहीं थीं यह बात मेरी बीबी को बिल्कुल पसंद नहीं आई। इससे भी पहले वाले मकान में हम किरायेदार के साथ – साथ मकान मालिक के बच्चों की देखरेख करने वाले नौकर भी हो गए थे। मकान मालिक एक जवान जोड़ा था जो अपने दो छोटे बच्चों को रोज हमें थमा कर घूमने – फिरने या सिनेमा देखने चला जाता था। वर्मा जी की प्लेट के पकौड़े खत्म हो गए थे अतः उन्हें याद आ गया कि वे अखबार में छपे किराए के खाली मकानों की सूची साथ लेकर मकान खोजने निकले हैं। उन्होंने घड़ी देखते हुए मुझसे नमस्कार किया और निकल पड़े नए मकान की खोज में।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३७ ☆ # “रोशनी के दीए जलते हैं…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रोशनी के दीए जलते हैं…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३७ ☆

☆ # “रोशनी के दीए जलते हैं…” # ☆

☆

देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते हैं

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

 

कितना सुकून है कितनी यहां शांति है

ना कोई पाखंड ना कोई भ्रांति है

हजारों दीपक एक साथ जल रहे हैं यहां

तम की दुनिया में रोशनी की यह नई क्रांति है

अंधेरे के पोषक तत्व अब हाथ मलते हैं

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

 देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते हैं

 

दिया और बाती का यह कैसा मेल है

दोनों में प्रेम भरता यह दिए का तेल है

जहां पतंगा खुशी-खुशी जल जाए, उफ्फ ना करें

प्रीत का यह कैसा अद्भुत खेल है

प्रीत को अमर करने पतंगे

 हर बार यूं ही जलते हैं

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते हैं

 

यह जलते दीपक प्रेम का संदेश लाए हैं

अंधकार में डूबे दीलों में रोशनी का दिया जलाए हैं

तुम भी एक दीपक किसी के दिल में जलाओ दोस्तों

समझ लो जीवन भर तुम्हारे साथ उसकी दुआएं हैं

यही मुक्ति है यही मोक्ष है

फिर हम क्यों खुद को छलते है

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ और क्या होता ?… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘और क्या होता ?…‘।)

☆ कविता – और क्या होता ?… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

क्या होता,क्या न होता,

होता तो ये,कैसे होता,

गर होता तो क्या होता,

क्या बतलाएं,क्या होता,

ऐसा होता,वैसा होता,

जाने कैसे कैसे होता,

क्या सब कुछ अच्छा होता,

या कुछ बुरा भी होता,

सब कुछ अच्छा अच्छा होता,

नहीं बुरा कुछ भी होता.

कुछ क्या होता,

कुछ भी होता,

न जाने फिर कैसे होता,

जब भी होता,अच्छा होता,

और क्या होता ???

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०८ ☆ आलेख – ‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – ‘‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी)। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०८ ☆

☆ आलेख ☆ ‘शिव’ की भूमिका में आदमी  (वैचारिकी) ☆

मनुष्य को सब जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। गोसाईं जी कह गये हैं— ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुरलभ सदग्रंथन गावा।’ यानी मनुष्य का जन्म बड़े भाग्य से मिलता है और मनुष्य की योनि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

वानर की प्रजाति में जन्म लेकर मनुष्य ने अभूतपूर्व प्रगति की। हाथों को चलने की क्रिया से मुक्त किया, पत्थर और लोहे के औज़ार बनाये, परिवार बनाया, खेती-किसानी सीखी। मनुष्य की प्रतिभा और उसके श्रम ने दुनिया की सूरत बदल दी। मनुष्य के लिए नैतिकता के मानदंड बने, नियम बने, कानून बने। नतीजतन मनुष्य को सभी जीवों में सबसे बुद्धिमान,सबसे ताकतवर, सबसे सभ्य और  नैतिकता का अनुसरण करने वाला माना जाने लगा। सभी देशों को परस्पर जोड़ने और उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्तर पर संस्थान स्थापित हुए।

लेकिन कुल मिलाकर समझ में आया कि मनुष्य की झगड़ालू प्रवृत्ति  यथावत है। हर समय दुनिया के किसी न किसी कोने में आदमी आदमी से जूझता रहता है। आदमी ने ऐसे घातक उपकरण विकसित कर लिये हैं कि मिनटों में लाखों जीवन को समाप्त किया जा सकता है। हिरोशिमा और नागासाकी उदाहरण हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण दो विश्वयुद्ध हुए और लाखों जानें गयीं। नेपोलियन ने 1812 में रूस पर आक्रमण किया। उसके छः लाख सैनिक इस अभियान में गये, सिर्फ एक लाख ही वापस लौट पाये। पांच लाख रूस की मिट्टी में दफ़न हो गये। इसका विशद वर्णन टाल्सटाय के महान उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ में मिलता है। इतने जीवन नष्ट होने के बाद भी हिटलर जैसे राष्ट्राध्यक्षों के दिमाग़ से युद्ध का भूत नहीं उतरा। दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में 1941 में जर्मनी ने रूस पर आक्रमण किया। युद्ध में दोनों पक्षों के करीब अस्सी लाख सैनिक और नागरिक मारे गये।

फिलहाल फिलिस्तीन की ज़मीन पर इज़रायल और हमास का युद्ध चल रहा है जिसमें 68000 निर्दोष लोग बलि चढ़ चुके हैं, जिनमें से 20- 25 हज़ार बच्चे थे जो दुनिया को आंख भर देखे बिना ही विदा हो गये। बड़ी-बड़ी इमारतें  मलबे में बदल गयीं, पूरी बस्ती श्मशान में तब्दील हो गयी, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। भोजन के लिए बर्तन लेकर लाइन में लगे भूखे बच्चों पर गोलियां चलीं। परिवार के परिवार साफ हो गये। इन मौतों पर रोने वाला कोई नहीं। उधर रूस और यूक्रेन के युद्ध में भी लोग रोज़ मर रहे हैं। दोनों तरफ तर्क दिया जाता है कि भविष्य में उनके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, इसलिए मारना जायज़ है।इन प्रकरणों में दुनिया का चौधरी, संयुक्त राष्ट्र संघ, लाचार बना बैठा है।

शेर को प्रकृति ने मांसाहारी बनाया है, हम उसे हिंसक कहते हैं। लेकिन वह दूसरे जीवों की हत्या तभी करता है जब उसे क्षुधा सताती है। पेट भरा होने पर वह अन्य जीवों की तरफ देखता भी नहीं। लेकिन आदमी की हिंसा की भूख के लिए कोई कारण ढूंढ़ पाना मुश्किल है। कई बार आदमी को मनोरंजन के लिए भी मार दिया जाता है। पुराने ज़माने में कुछ देशों में अपराधियों को शेर का सामना करने के लिए छोड़ दिया जाता था। इससे दंड की प्रक्रिया भी पूरी होती थी और तमाशबीनों का पर्याप्त मनोरंजन भी होता था।

आदमी ने अपनी हरकतों से सिद्ध किया है कि वह सभ्य, सुशिक्षित, संवेदनशील होने का कितना भी ढिंढोरा पीट ले, भीतर से वह वही है जो  वह लाखों साल पहले था, जब रक्त-प्रवाह देखकर वह आनंदित होता था।

ऐसा लगता है कि त्रिदेव में से शिव की संहारक वाली भूमिका को मनुष्य अपने हाथ में लेने के लिए आतुर है। ज्ञानी कहते हैं कि जो जान नहीं देता उसे जान लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन मनुष्य की नज़र में ये बातें निरर्थक हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८० – मंत्री द्वारे — द्वारे… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मंत्री द्वारे — द्वारे…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८० — मंत्री द्वारे — द्वारे — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

दादी को पता चला शिक्षा मंत्री शिवचरण गाँव में आया है। उसने नाती सुरेश से पूछा, “चुनाव आया है क्या नाती?” चुनाव आया तो था। मंत्री शिवचरण द्वार — द्वार जाने की प्रक्रिया में इस द्वार भी आता। दादी के इस तरह आश्चर्यकित होने का रहस्य वहाँ से था पाँच साल पहले शिवचरण जब यहाँ आया था दादी के पाँवों पर तो बस माथा पटकता था। उसने दादी से वचन लिया था, “मुझे ही वोट देना दादी।”

© श्री रामदेव धुरंधर

25 – 10 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०८ – ताला ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०८ ☆ ताला… ?

दीपावली संपन्न हो चुकी है। त्योहार का ख़ुमार उतर रहा है। जीवन रोज़ के ढर्रे पर लौट रहा है।

लगभग पाँच दिन बाद आज संध्या भ्रमण के लिए निकला हूँ। बहुधा मैं लिफ्ट का प्रयोग नहीं करता। अपने फ्लैट से सीढ़ियों द्वारा नीचे की मंज़िलें उतरते हुए देखता हूँ कि अधिकांश फ्लैटों के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है। कामकाजी दिनों में सुबह से शाम तक ताला दिखता है। आज शाम को दिख रहा है। संभव है कि लोग अपने परिजनों या परिचितों से दीपावली मिलने गए हों। यह भी हो सकता है कि पिछले चार-पाँच रोज़ से घर में होने से उकताकर आज आउटिंग या बाहर भोजन के लिए चले गए हों। अलबत्ता घरों के दरवाज़े पर ताला अब ‘न्यू नॉर्मल’ है।

स्मरण हो आता है कि माँ ने हमेशा प्रयास किया कि घर पर ताला न लगे। घर वही जो सदा खुला रहे, अपनों के लिए और अतिथियों के लिए भी।

उनकी पीढ़ी ने वह समय देखा था जब दरवाज़े भोर के समय खुलते और रात को ही बंद होते। पथिक, पंछी, पशु सबके लिए घर में भोजन बनता। चींटियों को आटा डाला जाता। बिल्ली को प्रसव पर हलवा बनाकर खिलाया जाता। कुत्तों के लिए रोटी बनती। पंछियों को दाना चुगाया जाता। गौ-ग्रास तो सदैव प्रथम स्थान पर था ही।

सामूहिक परिवार, समय के साथ एकल हुए। गाँव के बड़े, खुले, हवादार मकान छूटे। आदमी फ्लैटों के दड़बे में घुसा। बदली हुई परिस्थितियों और घटते मानव संसाधन के बीच ताला घर के दरवाज़े पर अपना स्थान मजबूती से बनाता चला गया।

निर्विवाद सत्य है कि वर्तमान जीवन शैली में दरवाज़े पर ताला अपरिहार्य है। दरवाज़े पर लटका स्थूल ताला सामान्यत: भीतर कुछ आने नहीं देता। स्थूल का सूक्ष्म विश्लेषण करें कि ताला कहीं जड़ता की ओर तो नहीं ले जा रहा? हमारी सोच और मन पर जो ताला जड़ता जा रहा है, उससे बाहर कैसे आया जाए? इसे भावुक चिंतन कहकर खारिज़ किया जा सकता है। तथापि मनुष्य चिंतन नहीं करेगा तो कौन करेगा? इसी चिंतन के चलते आदमी ने आदिम से आधुनिक की यात्रा की है। फिर कोई किसी क्षेत्र में कितना ही अग्रगण्य हो जाए, परिष्कार और परिमार्जन की संभावना सदा बनी रहती है।

चिंतन का निष्कर्ष है कि एंग्जायटी, डिप्रेशन भी अब ‘न्यू नॉर्मल’ की सूची में शामिल हैं। छोटी-छोटी बातों के लिए आज कौंसिलर के पास जाना पड़ता है। सहज संवाद छूट चला है, केवल एकालाप ही बचा है। मानसिक विरेचन के लिए आवश्यक रिश्तों पर ताला लगा है।

इन तालों पर ‘बंदीगृह’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-

बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो,

कारागार अप्रासंगिक हो चुके।

मजबूत फाटकों पर टंगे विशाल ताले

जड़े जा चुके हैं मनुष्य के मन पर,

हथकड़ियॉं, हाथों में बेमानी लगती हैं,

वे, उग, जम, और कस, रही हैं नसों में,

पैरों की बेड़ियॉं गर्भस्थ शिशु के साथ ही

जन्मती और बढ़ती हैं, क्षण-प्रतिक्षण

…..बस बुढ़ाती नहीं।

विसंगतियों के फंदे

फॉंसी बनकर कसते जा रहे हैं,

यहॉं-वहॉं टहलते जानवर

रुपये के खूँटे से बंधे

आदमी पर तरस खा रहे हैं।

भूमंडलीकरण के दायरे में

सारा विश्व बड़े से बंदीगृह में

तब्दील हो चुका, इसलिए कहता हूँ-

बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो

कारागार अप्रासंगिक हो चुका।

मन पर जड़ते इन तालों को हथौड़े से तोड़ने की नहीं अपितु स्नेह, सामंजस्य और विश्वास की चाबी से खोलने की आवश्यकता है। माना कि एक आलेख भर से ताला टूटेगा नहीं, पर बीच-बीच में कुछ समय के लिए ही क्यों ना सही, दरवाज़ा खुला रखने का भाव भी जाग जाए तो चिंतन और लेखन सार्थक है।

इस वर्ष हम अपने-अपने, मन पर जड़े ताले खोलने की दिशा कुछ कदम भी आगे में बढ़ सकें तो चिरंजीव प्रकाश-उत्सव की आभा कई गुना बढ़ जाएगी।

शुभं अस्तु।

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 5:34 बजे, 25 अक्टूबर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५३ – नवगीत : परिवर्तन का मंचन ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – नवगीत : परिवर्तन का मंचन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५३ ☆

☆ नवगीत : परिवर्तन का मंचन ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

एक शाम

करना है मीत मुझे

अपने भी नाम

.

अपनों से,

सपनों से,

मन नहीं भरा.

अनजाने-

अनदेखे

से रहा डरा.

परिवर्तन का मंचन

जब कभी हुआ,

पिंजरे को

तोड़ उड़ा

चाह का सुआ.

अनुबंधों!

प्रतिबंधों!!

प्राण-मन कहें

तुम्हें राम-राम.

.

ज्यों की त्यों

चादर कब

रह सकी कहो?

दावानल-

बड़वानल

सह, नहीं दहो.

पत्थर का

वक्ष चीर

गंग

सलिल सम बहो.

पाये को

खोने का

कुछ मजा गहो.

सोनल संसार

हुआ कब कभी कहो

इस-उस के नाम?

.

संझा में

घिर आयें

याद मेघ ना

आशुतोष

मौन सहें

अकथ वेदना.

अंशुमान निरख रहे

कालचक्र-रेख.

किस्मत में

क्या लिखा?,

कौन सका देख??

पुष्पा ले जी भर तू

ओम-व्योम, दिग-दिगंत

श्रम कर निष्काम।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

बेंगलुरु, २२.९.२०१५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१४ ⇒ सुर की गति मैं क्या जानूं ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुर की गति मैं क्या जानूं …“।)

?अभी अभी # ८१४ ⇒ आलेख – सुर की गति मैं क्या जानूं ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक दुनिया गीत, संगीत की होती है, जहां सुर, ताल और लय की बात होती है, कभी कानों में शहनाई गूंजती है तो कभी बांसुरी की धुन।

धुन एक मन की दशा भी है, कुछ लोग धुन के पक्के होते हैं तो कुछ रियाज के।

हमारे कान हमेशा कुछ अच्छा सुनने के लिए लालायित रहते हैं। दूर कोई गाए, धुन ये सुनाए। हमारे आसपास इतनी आवाजें होती हैं, लेकिन हमारे कान उधर ही लगे रहते हैं, जहां हमारा ध्यान होता है। धुन और ध्यान के बिना कोई भी साधना संभव नहीं।

हर व्यक्ति सुर का जानकार नहीं होता, लेकिन कर्णप्रिय शब्द क्या है और कर्कश स्वर क्या है, यह वह अच्छी तरह जानता है। कानों को भी मीठे बोल ही सुहाते हैं, कड़वे वचन तो सिर्फ आचार्य तरुण सागर जी के ही भाते हैं। सुन साइबा सुन, प्यार की धुन।।

मुकेश का एक प्यारे गीत का मुखड़ा, आज के अभी अभी का शीर्षक है, सुर की गति मैं क्या जानूं, बस एक भजन करना जानूं। बस, बिल्कुल यही हाल मेरा भी है, मुझे सुर का पता नहीं, सरगम मुझे नहीं आती, अच्छा सुन लेता हूं, लेकिन गा नहीं पता, टेबल पर थाप देता रहता हूं, तबला बजाना मुझे नहीं आता, लेकिन जब यह पता चला कि मुकेश का यह प्रिय भजन राग हमीर पर आधारित है, तो अचानक मुझे फिल्म कोहिनूर का वह गीत याद आ गया, गिरधर की मुरलिया बाजे रे, मधुबन में राधिका नाचे रे। संगीत के रसिक और जानकार राग हमीर पर आधारित ऐसे कई गीत जानते होंगे, लेकिन मेरी स्थिति तो बस यही है, सुर ना सजे, क्या गाऊं मैं। फिर भी बस इतना जरूर मुझे पता है कि सुर के बिना जीवन सुना है।

ईश्वर को पाने के कई साधन हैं, कई रास्ते हैं, लेकिन सभी रास्ते प्रेम के मार्ग से ही होकर जाते हैं। जहां प्रेम है, वहां गीत है, संगीत है, सुर है, कहीं लता है तो कहीं जगजीत है। आने से उसके आए बहार, जाने से उसके जाए बहार। कहीं कोयल की कूक है, तो कहीं पपीहे की पीहू पीहू। जब शोर वाले किशोर गा उठते हैं, पायल वाली देखना, यहीं तो कहीं दिल है, पग तले आए ना, तो दांतों तले उंगली दबाने का मन करता है।।

मन्ना डे और किशोर कुमार का जबर्दस्त संघर्ष हमें एक चतुर नार में देखने को मिलता है। बेचारे मास्टर जी सुर ढूंढते ही रह जाते हैं और भोला बिंदु को ले उड़ता है। मनोरंजन से भरपूर, एक हास्य गीत होते हुए भी मन्ना डे, किशोर कुमार और पंचम अपना कमाल बता ही जाते हैं।

तुम नाचो, रस बरसे। बस यही सुर है, यही साधना है। मन मोर हुआ मतवाला, ये किसने जादू डाला। संगीत कान खोलकर और आंख मूंदकर सुनने की चीज है। मतवाली नार, ठुमक ठुमक चली जाए। रोक सको तो, रोक लो अपनी पायल की झंकार। साज हो तुम, आवाज हूं मैं। सुर सधे तो गाएं, साज बजे, तो बजाएं, बाकी हमारे साथ प्रेम की बांसुरी बजाएं, ईश्वरीय संगीत में खो जाएं। मेरे संग गा, गुनगुना। कोई गीत सुहाना, मेरे संग गा।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बासी धूप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बासी धूप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हम सभी साथी धूप में बैठे हुए थे। और दिनों की तरह लंच की छुट्टी में। हम हर रोज़ धूप में बैठते हैं। गप्पें हांकते हैं। मन बहलाते हैं। फिर सर्दियों की धूप भला किसे अच्छी नहीं लगती? मीठी धूप , प्यारी धूप , गर्माती हुई धूप , अपनी धूप और बराबर बंटती हुई धूप। आज भी एक गोल दायरे में कुर्सियां डाले हुए हम धूप सेंक रहे थे।

एकाएक चपरासी आया और बड़े साहब का संदेश सुना गया। यों यह संदेश न होकर हुक्म ही था -काला हुक्म। मानों बात न कह कर वह कोई बम फेंक गया हो। हम सभी के मध्य या उठाकर बीच सड़क में फेंक गया हो। निर्ममतापूर्वक किसी ट्रक तले। कुचलने के लिए।

बड़े साहब धूप सेंकना चाहते हैं। उन्होंने संदेश दिया है कि अपनी कुर्सियां यहां से हटा लें। कहीं और बैठ जायें। बड़े साहब धूप सेंकना चाहते हैं ,,,इसलिए हम कहीं और चले जायें। सभी दांतों में चबा चबा कर इसे दुहराते हुए कुर्सियां उठाने लगे थे। पर…धूप बराबर कहां बंट रही थी?

क्या मीठी धूप पर भी बड़े साहबों का ही हक है?

हम लोग बड़े साहबों द्वारा सेंकी जाने के बाद बची बासी धूप के ही हकदार हैं?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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