श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपनापन खो गया यहीं पर” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२६ ☆ अपनापन खो गया यहीं पर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

मन के भीतर कितना डर है

डर के आगे खड़ी उमर है।

*

चिपकी है भटकन पाँवों से

कितना लंबा हुआ सफ़र है।

*

जिसको सपनों में देखा था

वह तो मेरा अपना घर है।

*

अपनापन खो गया यहीं पर

यह कोई अनजान शहर है।

*

महँगाई के इस आलम में

मुश्किल कितनी गुज़र-बसर है।

*

सज़ा लिखे ख़ुद जुर्म यहाँ पर

रपट फ़ैसले पर निर्भर है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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