(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “तीन दिना की धरी कढ़ी है“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५४ ☆
☆ बुन्देली कविता – “तीन दिना की धरी कढ़ी है“☆ आचार्य भगवत दुबे
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ द्वारा सम्पादित “प्रबोध-बोध ” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०९ ☆
☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक – प्रबोध-बोध (प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित)
संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर ‘
प्रकाशक – साहित्यागार
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ प्रबोध जी पर विभिन्न एंगल से साहित्यिक सामाजिक शोध बोध – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
( इन दिनों लंदन से)
किसी लेखक पर लिखी गई पुस्तक तभी सार्थक बनती है जब वह केवल व्यक्ति का परिचय न दे, बल्कि उसके रचना संसार के भीतर छिपे उस जीवंत मनुष्य को भी सामने लाए जो अपने समय, समाज और संवेदनाओं से निरंतर संवाद करता है।
लेखक को समझने के लिए उसके परिवेश , का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है, इसीलिए रचना के साथ फुटनोट में सूक्ष्म लेखक परिचय प्रकाशित किया जाता है। पाठक और लेखक के बीच दूरी मिटाती यह पुस्तक स्वागतेय साहित्यबोध है।
प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित पुस्तक प्रबोध बोध इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज के रूप में अब पाठकों के साथ है।
यह पुस्तक प्रबोध जी के बहाने से उस रचनात्मक चेतना की पड़ताल है जिसने दशकों तक हिंदी साहित्य को अपनी विशिष्ट दृष्टि, वैचारिक निर्भीकता और मानवीय सरोकारों से समृद्ध किया है।समय के साथ लेखक के चश्मे के नम्बर , उनके फ्रेम परिस्थितियों की पृष्ठ भूमि बदलती रहती है, किंतु उसके लेखकीय लक्ष्य , उसका दृष्टिकोण उम्र की परिपक्वता के साथ विकसित होता चलता है।
इस पुस्तक का आकर्षक पक्ष यह है कि इसमें प्रबोध कुमार गोविल को केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं देखा गया है। उनके भीतर के मनुष्य, चिंतक, समाज दृष्टा और संवेदनशील रचनाकार को समान महत्त्व दिया गया है।
पुस्तक पढ़ते हुए यह अनुभव बार बार होता है कि साहित्य अंततः जीवन से ही जन्म लेता है और जीवन के विविध रंग ही किसी लेखक की रचनाओं में रूपांतरित होकर पाठक तक किताबों और स्फुट रचनाओं के माध्यम से पहुंचते हैं , यही लेखकीय यात्रा का जीवन संदेश बन जाता है।
प्रबोध कुमार गोविल का साहित्य अपने समय की धड़कनों को दर्ज करता है। उनके पात्र केवल कथा को आगे बढ़ाने वाले माध्यम नहीं हैं। वे समाज के भीतर छिपे प्रश्नों, अंतर्विरोधों, इच्छाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। पुस्तक इस तथ्य को अनेक दृष्टियों से प्रमाणित करती है। उनके लेखन में महानगरीय अकेलापन भी है। बदलते सामाजिक मूल्य भी हैं। संबंधों की जटिलताएँ भी हैं। मनुष्य की आंतरिक बेचैनियाँ भी हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य, पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता बल्कि उसे वैचारिक मंथन के लिए भी बाध्य करता है।
इस पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह लेखक की रचनात्मक यात्रा को उसके सामाजिक संदर्भों से जोड़कर देखती है। आज जब साहित्य को अक्सर केवल पाठ या विचार के रूप में पढ़ा जाता है, तब यह पुस्तक स्मरण कराती है कि हर रचना के पीछे एक जीवित अनुभव संसार होता है। प्रबोध कुमार गोविल ने जीवन को बहुत निकट से देखा है। समाज के विविध वर्गों, परिस्थितियों और मानवीय मनोदशाओं को समझा है। यही अनुभव उनकी रचनाओं को विश्वसनीय बनाते हैं।
पुस्तक में उनके व्यक्तित्व के जिन आयामों का उल्लेख किया गया है, वे भी कम रोचक नहीं हैं। सहजता, विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवीय आत्मीयता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरती हैं। यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान खींचता है कि उनकी रचनात्मकता केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं है। उसके पीछे मनुष्य और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में विचार और संवेदना साथ साथ चलते हैं।
प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य की चर्चा करते हुए पुस्तक के आलेख उनके कथा साहित्य, उपन्यासों, कविताओं तथा बाल साहित्य की ओर संकेत करती है। इससे उनके बहुआयामी रचनाकार होने का परिचय मिलता है। वे किसी एक विधा तक सीमित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनात्मक ऊर्जा अनेक साहित्यिक रूपों में व्यक्त हुई है। यह विस्तार उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की शक्ति को रेखांकित करता है।
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी भाषा और शिल्प पर किया गया विमर्श भी है। उनकी भाषा सरल है, पर साधारण नहीं। उसमें जीवन की सहजता है। संवाद की ऊष्मा है। विचार की स्पष्टता है। यही कारण है कि उनका साहित्य विद्वानों के साथ साथ सामान्य पाठकों तक भी पहुँचता है। साहित्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह पाठक के मन में उतर सके और उसके अनुभव का हिस्सा बन जाए।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह भी महसूस होता है कि लेखक के मूल्यांकन का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता। उसका वास्तविक उद्देश्य उसके साहित्यिक अवदान को समझना और समझाना होता है। प्रबोध बोध इस कसौटी पर खरी उतरती दिखाई देती है। यह पुस्तक प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का अवसर प्रदान करती है। साथ ही यह बताती है कि किसी लेखक की वास्तविक पहचान उसके पुरस्कारों से नहीं, उसकी रचनाओं की जीवंतता और समय से संवाद करने की क्षमता से निर्मित होती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो प्रबोध बोध एक ऐसी पुस्तक है जो व्यक्ति और कृतित्व के बीच सेतु का काम करती है। यह पाठक को लेखक के निकट ले जाती है। उसके साहित्य को नए सिरे से पढ़ने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह विश्वास भी जगाती है कि सच्चा साहित्य समय के साथ पुराना नहीं होता। वह हर युग में नए अर्थों के साथ पाठकों के सामने उपस्थित होता रहता है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता भी है।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ये वसुंधरा हरी-भरी…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२६ ☆
☆ ये वसुंधरा हरी-भरी…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८३ ☆ देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆
उपरोक्त कहावत का चलन सबसे अधिक हमारे देश में ही होता है। अंग्रेज़ी की कहावत “Prevention is better than Cure” का सदुपयोग पश्चिम के देशों में ही होता है।
देश के किसी भी भाग में कोई आपदा आने से पूर्व कभी कोई तैयारी नहीं होती है। दुर्घटना हो जाने के बाद मात्र कुछ घंटों/ दिनों के लिए हम लोग विश्व के किसी भी देश से अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इस सक्रियता का दसवां हिस्सा भी हम आपदा पूर्व तैयारी में खर्च कर देवें, तो देश दुर्घटना रहित हो सकता है।
गर्मी के मौसम में आग लगना आम बात होती है। व्यवस्था को दोष मढ़ कर हमारा कार्य पूर्ण हो जाता है। अभी लखनऊ आग की लपटों में ताप बाकी है, मुंबई की पहली वर्षा ने ही समस्याओं का विकराल रूप सामने खड़ा कर दिया है।
किसी भी व्यवस्था के नियमों का पालन ना करने की हमारी आदत, घर से ही आरंभ हो जाती है। सोने के नियत स्थान पर भोजन ग्रहण करना हो या रोज मर्रा के तय नियमों की अनदेखी करना।
पहली बार जब आप कोई भी नियम का उल्लंघन करते हैं, उस दिन के बाद से ही आपके स्वभाव और आदतों में “अनुशासनहीनता” जन्म ले लेती है।
हम स्वयं भी बहुत सारे नियम तोड़ कर जीवन के कष्ट भोग रहें हैं। कॉलेज में मित्र के कहने पर जीवन में जब मदिरा का पहला प्याला ये कहकर उठाया था, कि बस आज पहली और आखिरी बार है। तब स्वयं ली गई प्रतिज्ञा टूट गई थी, उसके बाद हम उसके आसरे से ही, जी पा रहें है। स्वास्थ्य पर इसके विपरीत प्रभाव के हम सब अच्छे खासे जानकार हैं।
होटल में जब कभी छोटे समूह में जाते हैं, तो उस होटल के टेबल कुर्सी आदि को हम अपनी संख्या से लगवा लेते हैं। इससे वहां अव्यवस्था होती है, लेकिन हमको उससे क्या लेना देना?
जब तक हम स्वयं तय शुदा नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं करते हैं, तब प्रशासन, काम काज आदि के क्षेत्र में अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी होगी।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…२ ।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २१० ☆
☆ – सूरज नहीं दिया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
मेरे बच्चो !
इस जमाने में
खुशहाली का रास्ता
बहुत तंग है.
आम आदमी के लिये बंद है,
सिफारिश के बिना योग्यता अपंग है।
यकीन करो,
मैं तुम्हारे लिये
सब सुख मुहैया करना चाहता हूँ,
एक सही आदमी की तरह जीकर
मरना चाहता हूँ।
काश!
शेष वर्षों में ऐसा हो पाए,
हर आदमी
जरूरत की चीजें पाए।
बहरहाल
मैं अपने पास
नहीं फटकने दूँगा हताशा, निराशा,
नहीं चाहिये सोने के कटोरे में दूधभात,
हड्डियों को चन्दन सा घिसकर
जुटा ही लूँगा बताशा ।
और जब
उम्मीद का बताशा चुकेगा
यानी जिन्दगी का बताशा घुलेगा
तब मेरे पौरुष का
आखिरी पृष्ठ खुलेगा,
जब सुलग रही होगी चिता
तब तुम कह सकोगे कि हमारा पिता
दूसरों के लिये भी जिया था
वो सूरज नहीं दिया था।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “भूल चुके लोगों की स्मृति में...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “भूल चुके लोगों की स्मृति में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४२ ☆ कंफर्ट ज़ोन…
प्रकाशन के अपने व्यवसाय के संदर्भ में काग़ज़ के थोक विक्रेताओं के बाज़ार में हूँ। यह मुख्य शहर की एक संकरी गली है। इमारतों के पुनर्विकास के बाद ऊपरी मंज़िलों पर फ्लैट बने हुए हैं और नीचे दुकानें हैं। अपना काम समाप्त कर निकलने ही वाला हूँ कि सड़क पर कुत्तों के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने के स्वर गूँजने लगे हैं।
देखता हूँ कि किसी फ्लैट में रहने वाली एक महिला अपने पालतू कुत्ते को घुमाने निकली हैं। कुत्ते के गले में बंधे पट्टे से लगी साँकल का एक सिरा महिला के हाथ में है। उसके दूसरे हाथ में डंडा है। इसी कुत्ते को देखकर और महिला के हाथ के डंडे के चलते गली के कुत्ते उनसे कुछ दूरी रखकर ही भौंक रहे हैं। गली के कुत्तों को आवारा या स्वतंत्र कहने का विकल्प पाठक अपने-अपने वैचारिक अधिष्ठान के अनुसार चुन सकते हैं।
तथापि इस आलेख का विषय आवारा या स्वतंत्र कुत्तों का भौंकना नहीं है। विषय है पालतू कुत्ते का उनकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखना। वह अपनी मालकिन के आश्रय में साँकल की परिधि में यहाँ- वहाँ कुछ सूँघता, कहीं-कहीं मुँह मारता चला जा रहा है। मेरी विचार-प्रक्रिया के केंद्र में इस घटना के संदर्भ में पालतू कुत्ते का व्यवहार है। क्रिया की प्रतिक्रिया, प्रकृति का नियम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने इसे थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन के द्वारा सिद्ध भी किया है। यह नियम कहता है कि किसी भी क्रिया के लिए हमेशा एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।
इस घटना में पालतू कुत्ता, गली के कुत्तों के भौंकने की प्रतिक्रिया में भौंक नहीं रहा है। सोचता हूँ, पराधीनता से मिलता लाभ भी शनै:-शनै: सुविधा के गणित में बदल जाता है। यदि इस पालतू के स्थान पर गली का कुत्ता होता तो प्रतिरक्षा में भौंकता, उस गली में अपना स्थान बनाने के लिए लड़ता या अपने को निर्बल पाकर भाग खड़ा होता, जो भी करता, कोई न कोई प्रतिक्रिया अवश्य देता। यद्यपि हम उपेक्षा को भी प्रतिक्रिया कह सकते हैं पर प्राणी के बौद्धिक स्तर को देखते हुए यह तर्कसंगत नहीं लगता। यहाँ तो साँकल के संरक्षण में भौंकने की प्रक्रिया विस्मृत हो जाना अधिक तार्किक जान पड़ता है।
परजीविता के इस उदाहरण में अपने स्वामी से प्राप्त भोजन, पोषण, सुविधा ने कुत्ते के लिए एक कंफर्ट ज़ोन तैयार कर दिया है। कंफर्ट ज़ोन भीतर ही भीतर मानसिक ग़ुलामी के लिए तैयार कर देता है।
मानसिक गुलामी की भयावता पर लगभग दो दशक पूर्व लिखी अपनी कविता स्मरण हो आई। ‘मन के हारे’ शीर्षक की यह कविता कहती है,
समय ने ली करवट / पिंजरा अब खुला है,
कैसा मोह है / पंछी अब भी उसी में पड़ा है,
आयु बीती स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में,
आकाश मापने की मनीषा में,
पर-जैसे-जैसे / समय बीतता है,
तन के साथ / मन भी ग़ुलाम हो जाता है,
पंछी हो या मनुष्य / मानसिक ग़ुलामी भयावह है !
यूँ भी आसानी से अपना कंफर्ट ज़ोन बिरले ही छोड़ पाते हैं। जबकि तथ्य यह है कि धरती की कक्षा में बने रहने का मोह हो तो अंतरिक्ष में प्रवेश नहीं किया जा सकता। यात्रा लंबी करनी हो, सोद्देश्य करनी हो तो कंफर्ट ज़ोन छोड़ने का साहस करना ही होगा। अपनी प्रकृतिगत विशेषताओं, अपने सिद्धांतों और तदनुकूल आचरण के साथ ‘कदापि समझौता नहीं’ के तत्व को अपनाना ही होगा।
सार है कि अपने मूल के साथ अपने अस्तित्व के अभिन्न संबंध को अनुभव करो और गंतव्य की ओर बढ़ो। यदि ऐसा कर सके तो जीवन रीतने का दुख नहीं अपितु सार्थक बीतने का संतोष होगा। अस्तु!
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य “झुमकों का जादू और उनके दुश्मन”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३० ☆
☆ हास्य व्यंग्य ☆ “झुमकों का जादू और उनके दुश्मन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
जब झुमकों का जिक्र होता है तो महिलाओं के सौंदर्य में चार चांद लगाते उनके कानों में लटकते-झूलते, मचलते झुमकों के साथ-साथ न जाने कितनी झुमकाधारी महिलाओं के चेहरे आँखों के सामने आ जाते हैं, झुमकों पर बने गीत और उन पर इठलाती हीरोइनें स्मृति में उभर आती हैं। वह गाना तो आपको याद ही होगा – “ढूंढो ढूंढो रे बलमा, ढूंढो रे सजना मेरे कान का बाला”। बाला गुम जाने से कितनी परेशान थी फिल्म गंगा जमुना की हीरोइन। …और वह गाना “कान में झुमका, चाल में ठुमका”। मैं समझता हूं कि कान में झुमका पहनने के बाद चाल में ठुमका शायद इसलिए लगाना पड़ता है कि ठुमके के कारण झुमका हिले और देखने – चाहने वालों के दिलों की धड़कने बढ़े। यों तो अब सभी जगह अच्छे झुमके मिलने लगे हैं किन्तु पहले बरेली के झुमके बहुत प्रसिद्ध थे – “झुमका बरेली वाला कानों में ऐसा डाला झुमके ने ले ली मेरी जान, हाय रे मैं तेरे कुर्बान।
यहां झुमके की ताकत समझिये और अपनी प्रिये को झुमके की सरप्राइज गिफ्ट देने की योजना बनाइये, निःसंदेह आपको मनचाहा फल मिलेगा। अभी हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी भारतीय परम्परा वाले झुमके पहिन कर पूरी दुनिया में झुमकों का हल्ला बोल दिया है। मुझे नहीं मालूम कि मेलोनी जी को झुमके पहनने के लिए किसने प्रेरित किया अथवा उन्हें ये झुमके किसने भेंट किये? आप चाहें तो भेंटकर्ता का अनुमान लगा सकते हैं, हो सकता है कि आपका अनुमान सही हो। बरेली शहर में बना झुमका चौराहा और वहाँ स्थापित विशाल झुमका इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में झुमके और झुमके पहनने वालियों का कितना सम्मान है। मैंने तो जब से इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी की झुमके वाली फोटो देखी है तब से उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ गई है, वे मुझे जरा ज्यादा ही अपनी सी लगने लगी हैं। मेलोनी जी से मेरा आग्रह है कि वे जब भी भारत आएं झुमके पहिन कर ही आएं और बरेली का झुमका चौराहा घूमने अवश्य जाएं, किंतु सतर्क रहें न जाने कौन सा श्राप है कि बरेली के बाजार में महिलाओं के झुमके गिर जाया करते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत का साहित्य झुमकों से भरा पड़ा है। झुमकों पर शायरों ने खुलकर लिखा है –
मुसीबत है ये तेरा झुमका जो तेरे गालों पर झूल गया,
कहने आया था मैं दिल की
बात और मैं भूल गया।
*
तेरे कानों का झुमका देख दिल जलता है,
मुझसे बेहतर तेरा झुमका है जो गालों को चूम जाता है।
*
इश्क की महाभारत में
झुमका किसी ब्रम्हास्त्र से कम नहीं ..।
*
जुल्फें सिर्फ बाईं तरफ न रखो,
दायां झुमका खुद को महफूज नहीं समझता।
भाइयो अब तो आप महिलाओं से झुमकों का रिश्ता समझ ही गए होंगे। दुख की बात है कि पुलिस की सतर्कता के बाद भी टुच्चे लुटेरों द्वारा सड़क पर महिलाओं के गले से चेन खींच कर भागने की घटनाओं में तो कोई कमी नहीं आई, हां अब मोटर साइकल सवार लुटेरे महिलाओं के झुमके भी खींच कर भागने लगे हैं। इससे महिलाओं का आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा है, कान फटने से वे लहूलुहान भी हो रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि लूट के डर से भयभीत महिलाएं झुमके पहनना ही छोड़ दें। इससे नारी के सौंदर्य की हानि के साथ साथ झुमका साहित्य की समृद्धि भी प्रभावित होगी। लुटेरों से आग्रह है कि झुमकों पर हाथ न डालें।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “यह बरसात का मौसम…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मुस्कुराओ कि…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # ११३ ☆
☆ मुस्कुराओ कि… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
☆
मुस्कुराओ कि जिंदगी लौटे,
रेत की तह पर नमी लौटे,
लबों पर जम गए हैं सन्नाटे,
कुछ किया जाए कि हंसी लौटे,
हमारी जिंदगी में इतनी कटुता कहां से आ गई, बचपन में तो नहीं थी, किसी के बारे में कभी नहीं सोचा कि उन्नति ना करें, कभी नहीं सोचा कि सुखी ना हो, हमारी संस्कृति में भी, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… की बात की है. पर अब क्या हो गया अगर हम त्यौहार भी मनाते हैं तो कटुता से भरे रहते हैं. हम क्यों नहीं उसके घर जाकर उनकी खुशियों में शरीक होते हैं, क्यों नहीं, हम, खुशी को साझा करते हैं, दर्द भी साझा करें, खुशी भी साझा करें.
लेकिन क्या हो गया हम अपने आप में ही सिमट गए, दूसरे की खुशियां हम नहीं बांट सकते, हम दूसरों की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, हम अपने परिवार की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, अकेलापन आप चाहते नहीं हो, तो आप चाहते क्या हो, प्रकृति आपके हिसाब से नहीं चलती, प्रकृति अपनी गति से गतिमान होती है, आपको ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है.
प्रकृति के साथ, बारिश में भीगना छोड़ दिया, छत पर सुबह की धूप लेनी छोड़ दी, जब आप प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं, तब आप खुश होना सीख जाते हैं, खुशियां बांटनी चाहिए, दूसरों के गम में शरीक होना चाहिए, और जब आप खुशियां बांटना शुरू कर देते हैं दूसरों के गमों में शरीक होना शुरू कर देते हैं यकीन मानिए आपको भी कहीं ना कहीं अपार खुशी मिलती है.
कोशिश करके देखिए, जीवन जीने का रवैया बदल जाएगा, हंसिए, हंसाईये दूसरों की हंसी का कारण बनिए ऐसा कोई कार्य न करें, जो आप अपने लिए नहीं चाहते, मुस्कराये और दूसरों की मुस्कराहट का कारण बनिए, बस खुशियों से भरा जीवन जीना सीख लीजिए.