हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५१ ☆ आलेख – कैसे छोड़ दूं यह दुनिया (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘कैसे छोड़ दूं यह दुनिया (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३५१ ☆

☆ आलेख ☆ कैसे छोड़ दूं यह दुनिया (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

यह हिन्दी के वरिष्ठ कवि मलय की एक कविता का शीर्षक है। मलय जी की कविता का संदर्भ तो दूसरा है, लेकिन यह पंक्ति संसार के ज़्यादातर मनुष्यो की भावना को प्रतिध्वनित करती है। यह सच है कि आदमी ज़िन्दगी को कितना ही कोसे, लेकिन ज़्यादातर लोग मरना नहीं चाहते। मृत्यु की कल्पना भय पैदा करती है, सिहराती है। यह विचार विचलित करता है कि यह विविधताओं से भरी, रंग-बिरंगी दुनिया एक दिन पूरी तरह छूट जाएगी। सन्त भले ही उपदेश देते रहें— ‘अरे मन मूरख जनम गंवायो,ये संसार फूल सेमर को, सुन्दर देखि लुभायो’, लेकिन इस सेमर के फूल को कोई छोड़ना नहीं चाहता।

विज्ञान की तरक्की के साथ कुछ समर्थ, संपन्न लोगों के मन में उम्मीद जागी है कि एक दिन यह संभव हो जाएगा कि मृत मनुष्य को पुनः जीवित किया जा सके। यानी मृत्यु का अन्त हो जाएगा और मनुष्य देवताओं की तरह अमर हो जाएगा। इसीलिए दुनिया के कुछ अति-संपन्न लोग ऐसी कंपनियों में भारी निवेश कर रहे हैं जो मनुष्य को अमर बनाने के उपक्रम में लगी हैं।

अमर होने की उम्मीद में कई संपन्न लोगों ने अपने शरीर को मृत्यु के बाद क्रायोजेनिक तकनीक से सुरक्षित करवा दिया है। संसार के 500 से ज़्यादा लोग इस तकनीक से अपने शवों को सुरक्षित करवा चुके हैं। हज़ारों लोग भविष्य के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। इस तकनीक में शरीर को -196 डिग्री सेल्सियस के तरल नाइट्रोजन में संरक्षित किया जाता है। एक शव को संरक्षित करने का व्यय 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक आता है। इस प्रक्रिया में पहले व्यक्ति का संरक्षण 1967 में किया गया था। कुछ लोग पूरे शरीर के बजाय सिर्फ दिमाग को संरक्षित कराते हैं, इस उम्मीद के साथ कि पुनः जीवित होने पर उसे नये शरीर या अन्य नेटवर्क में ‘लिंक’ किया जा सकेगा। सिर्फ दिमाग को संरक्षित करने में 60-70 लाख रुपये खर्च आता है।

फिलहाल अमरता के नुस्खे की खोज की कोई संभावना नहीं दिखती, इसलिए सवाल उठता है कि अगर इस नुस्खे की खोज में सौ वर्ष लग गये तो इन सोये हुए लोगों के जागने पर उन्हें दुनिया कैसी लगेगी? क्या वे दुनिया को पहचान सकेंगे या दुनिया उन्हें पहचान सकेगी? मुझे अमेरिकी लेखक वाशिंगटन इरविंग की कहानी ‘रिप वान विंकिल’ याद आती है जिसमें कथा का नायक ऐसा सोया कि बीस साल बाद जागा। इस बीच उसकी दुनिया बदल चुकी थी। पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और बेटे जवान हो गये थे। मतलब यह कि वह अपनी दुनिया में अजनबी हो गया। सौ साल बाद जागने वालों के लिए दुनिया और अधिक अजनबी हो जाएगी।

मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने एक जगह लिखा कि जब हम अपने गांव को छोड़ देते हैं तो कुछ वक्त तक वह हमारा इंतज़ार करता है, फिर वह भी उठकर कहीं चल देता है। उनका एक दोहा है— ‘घर को खोजें रात दिन, घर से निकले पांव; वो रस्ता ही खो गया जिस रस्ते था गांव।’ जो लोग शहर की चमक-दमक के लिए अपना गांव छोड़ देते हैं, गांव भी कुछ वक्त बाद उन्हें छोड़ देता है।

प्राचीन मिस्र में शवों की ममी बनाने का रिवाज़ था, लेकिन उसका उद्देश्य शव को पुनर्जीवित करना नहीं था। ममी बनाने में दिल को छोड़कर शव के सभी भीतरी अंग निकाल दिये जाते थे। मस्तिष्क भी निकाल दिया जाता था। दिल को बुद्धि और आत्मा का केन्द्र माना जाता था, इसलिए उसे ‘फ़ाइनल जजमेंट’ के लिए ज़रूरी समझा जाता था। यह प्रथा 2600 ई. पू. से लेकर लगभग 3000 वर्ष तक चली और इस काल में लगभग सात करोड़ ममी का निर्माण हुआ, जिनमें लगभग 10 लाख पशुओं के ममी थे।

आदमी अगर भविष्य में अमर हो गया तो दुनिया और समाज की क्या सूरत बनेगी? जब करीब सौ साल तक सोये लक्ष्मीपुत्र जागेंगे तब उनकी तीन-चार पीढ़ियां दफ़्न हो चुकी होंगीं और वे दुनिया में किसी को पहचानने की स्थिति में नहीं होंगे, न कोई उन्हें पहचानेगा। वे अपनी अपनी हाथी दांत की मीनार में अमरता का सुख लेंगे। भारत जैसे देश में संपत्ति के झगड़े बढ़ेंगे क्योंकि जब दादाजी मरेंगे ही नहीं तो उनकी संपत्ति में से बेटों, पोतों, पड़पोतों, पड़पड़पोतों को क्या मिलेगा? तब संयुक्त परिवारों का सवाल ही नहीं रहेगा। पारंपरिक लक्ष्मीपुत्रों के अलावा रिश्वतखोरों, भ्रष्टाचारियों की बन आएगी क्योंकि वे तुरंत अमरता के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे। पाप की सज़ा पाने का डर ख़त्म हो जाएगा और पाप करने में समर्थ लोग खुलकर अपनी प्रतिभा दिखा सकेंगे।

तब फांसी की सज़ा की धारा ख़त्म हो जाएगी क्योंकि लटकाने पर भी अपराधी की जान नहीं निकलेगी। श्मशान और कब्रिस्तान का झगड़ा ख़त्म हो जाएगा। बाबाओं, पुरोहितों का धंधा मंदा हो जाएगा तथा मंदिरों में भीड़ कम हो जाएगी। बागेश्वर वाले बाबा का भूत भगाने वाला मेला बंद हो जाएगा। यमराज के सेवकों का प्राण खींचने का काम बंद हो जाएगा, परिणामत: वे बेकार हो जाएंगे। ‘अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे’ जैसे शेर और ‘मर गये हम जीते जी मालिक तेरे संसार में’ जैसे फिल्मी गीत लिखना बंद हो जाएगा। महिलाओं को करवा चौथ और तीजा जैसे कठिन व्रत करने की ज़रूरत नहीं रहेगी। बहू-दहन का अंत होगा। दुनिया ‘अमर’ और ‘मरणशील’ के बीच बंट जाएगी

कालांतर में यदि क्रायोजेनिक तकनीक दुनिया में ज़्यादातर वर्गों के लिए सुलभ हो गयी तो अमर लोगों से दुनिया भर जाएगी। आदमी के लिए ज़रूरी साधनों का सत्यानाश होगा। पर्यावरण की स्थिति कैसी बनेगी, कह पाना कठिन है। हमारे शहरों की पहले से ही ख़स्ता हालत और बिगड़ेगी। दुनिया में अराजकता की स्थिति बन सकती है। हो सकता है कि संसार के ‘अल्ट्रा रिच’ दूसरे ग्रहों पर बसने का बंदोबस्त करें।

परिवार के सदस्य कैसे एक दूसरे के लिए अजनबी हो जाते हैं इसके संबंध में विदेश की एक घटना याद आती है। एक व्यक्ति के बाल-बच्चे बड़े होने पर दूसरे शहर चले गये और यह व्यक्ति बुढ़ापे में उस शहर में अकेला रह गया। कुछ समय बाद बूढ़े के नाम एक लॉटरी खुल गयी और वह पैसे वाला हो गया। संपन्नता ने बूढ़े के मन में विवाह की इच्छा पैदा की। उसने विवाह के लिए विज्ञापन दिया और कई लड़कियों ने उसकी दौलत को देखकर उससे संपर्क किया। अंततः एक लड़की के साथ बात बन गयी और उनका विवाह हो गया। कुछ समय बाद पारिवारिक एलबम पलटते हुए दोनों को ज्ञात हुआ कि नयी पत्नी वास्तव में उसकी सगी पोती है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ऐसी ही स्थितियां आदमी के अमर होने पर सामने आ सकती हैं।

आदमी के अमर होने पर दुनिया में क्या क्या गुल खिलेंगे यह आगे देखने की बात है। ‘आगे आगे देखिए होता है क्या’।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२२ – जीना पड़ता है… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– जीना पड़ता है…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२२ — जीना पड़ता है — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मेरे रिश्तेदार जगरूप के तीन लोगों की एक साथ मोटर दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। घर के शेष लोग पागल हो गये थे। पुलिस आ कर उनकी खोज खबर लेती रहती थी। आज वही परिवार सफलता की पराकाष्ठा छू रहा है। जगरूप से मुलाकात होने पर हम प्यार से मिले। हमने खूब बातें कीं। जाते – जाते उसने हाथ मिला कर कहा, “लिखते रहना भयवा।” वह मिठास अपने में लिये मैं बड़े प्यार से अपने घर लौटा था।

 © श्री रामदेव धुरंधर
1 – 10 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५७ – बहुमूल्य…अमूल्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५७ ☆ बहुमूल्य…अमूल्य… ?

मॉल में हूँ। खरीदारी हो चुकी। खड़े रहते और भटकते-भटकते थक भी चुके। परिवार फूडकोर्ट में जाने की घोषणा कर चुका है। फूडकोर्ट जाने के लिए एस्केलेटर के मुकाबले एलेवेटर पास है। अत: एलेवेटर से फूडकोर्ट के लिए चले। लिफ्ट से बाहर निकलते हुए देखता हूँ कि दाहिने हाथ पर पीने के पानी की मशीन लगी है और ऊपर बोर्ड लिखा है, ‘फ्री ड्रिंकिंग वॉटर।’

अपने युग का कितना बड़ा बोध करा रहे हैं ये शब्द! पीने का पानी नि:शुल्क..!

एक समय था जब मनुष्य सीधे नदी का पानी पिया करता था। तब नदियाँ स्वच्छ थीं। अब नदी के पानी के शुद्धीकरण की प्रक्रिया होती है।  घर पर आर.ओ. के जरिए उसे फिर शुद्ध करते हैं। एक-एक कर उसके सारे प्राकृतिक तत्व निकाल फेंकते हैं। कामधेनु को छेरी करने का अद्भुत मानक स्थापित किया है हमने।

पानी की निर्मलता को लेकर एक घटना याद हो आई। वर्ष 2000 में राजस्थान के  मारवाड़ जंक्शन के निकट एक गाँव में एक डॉक्युमेंट्री फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। पशुओं की किसी औषधि से सम्बंधित डॉक्युमेट्री थी। शूटिंग स्थल के निकट ही एक स्वच्छ तालाब था। गाँव उस तालाब के पानी का पीने के लिए उपयोग करता था। हम सब भी उस तालाब का पानी पी रहे थे। फिल्म में किसी भूमिका के लिए समीपवर्ती नगर से एक अभिनेत्री को  बुलाया गया था। उन्होंने मिनरल वॉटर की मांग की। आज से लगभग ढाई दशक पहले ग्रामीण भाग में बोतलबंद मिनरल वॉटर अपवाद ही था।  हमारी जीप का ड्राइवर अभिनेत्री से बोला, “मैडम जी, हमारे तालाब का पानी अमरित है। पी लो। यूँ भी जल में मल नहीं होता।”

मानवीय सभ्यता के विकास का इतिहास साक्षी है कि मनुष्य ने जल की उपलब्धता देखकर ही बस्तियाँ बसाईं। नदी से जल और परोक्ष में जीवन पाने वाला मनुष्य आगे चलकर नदियों का गला घोंटने लगा। नदियाँ निरंतर प्रदूषित की जाने लगीं। नदियाँ नाले में परिवर्तित कर दी गईं। अब नदी के नाम पर ठहरा हुआ पानी है, दुर्गंध है, कारखानों से गिरता अपशिष्ट है, सीवेज लाइन के खुलते दरवाज़े हैं। अपने उद्गम पर नदी आज भी अमृत है पर मनुष्य की बस्तियों तक पहुँचते- पहुँचते हम उसे मृत कर देने पर उतारू हैं।

बहुत समय नहीं बीता जब राह चलते को पानी पिलाने का चलन था। उस समय बारह मास पानी का संकट भोगनेवाले राजस्थान जैसे मरुस्थली भूभागों पर भी प्याऊ लगाई जाती। गाँव के बुज़ुर्ग विशेषकर महिलाएँ इसके लिए बारी-बारी से सेवा देतीं। इसे जलमंदिर भी कहा जाता था। तब किसी जलमंदिर पर ‘फ्री ड्रिंकिंग वॉटर’ का कोई बोर्ड नहीं लगा होता था। यह मनुष्य के साथ मनुष्य का मनुष्यता का व्यवहार था।

मनुष्य की देह पंच महाभूतों से बनी है। महाभूत नि:शुल्क हैं। जो नि:शुल्क है, वह अमूल्य है। नि:शुल्क के उपसर्ग का अब प्रतिस्थापन हो चुका। अब सब सशुल्क है। सशुल्क धीरे-धीरे बहुमूल्य हो जाता है।

जल अब धड़ल्ले से बेचा-ख़रीदा जाता है। ऑक्सीजन कैफे हैं, जिनमें प्राणवायु बिक रही है। तब पुरखों की भूमि को प्रतिष्ठा माना जाता था, मंदिर पाठशाला, धर्मशाला के लिए भू-दान किया जाता था। अब प्रति स्क्वेयर फीट से प्रतिष्ठा का सौदा हो रहा है। आकाश में अंतरिक्ष स्टेशन और सेटेलाइटों की भीड़ है। मनुष्य ने न धरती छोड़ी, न आकाश। न हवा स्वच्छ रखी, न पानी। सब बेचा जा रहा है, सब बिक रहा है।

कहा गया है,

अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च।

तस्मात् सर्वेषु दानेषु तयोदानं विशिष्यते॥

(महाभारत, शान्तिपर्व )

अर्थात जल से संसार के सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं एवंं जीवित रहते हैं। अतः सभी दानों में जल का दान सर्वोत्तम है।

हम दान से विक्रय तक आ पहुँचे हैं। जल के प्राकृतिक स्रोतों की सुरक्षा और स्वच्छता अब भी दिशा परिवर्तन कर सकते हैं।

अमूल्य को बहुमूल्य करने की उलटी यात्रा को रोकना होगा। लौटना होगा बहुमूल्य से अमूल्य की ओर। अपने-अपने स्तर पर और सामूहिक रूप से जो किया जा सके, अवश्य करें। माध्यम कोई भी हो, जैसे आकाश से गिरा हुआ पानी  समुद्र में जाता है, वैसे ही हर प्रयास बहुमूल्य को अमूल्य करने में सहायक सिद्ध होगा।

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् |

सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति ||

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९६ – ज्ञानवर्धक – दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है ज्ञानवर्धक   – दोहा सलिला।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९६ ☆

☆ ज्ञानवर्धक – दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

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दोहा में दो पंक्तियाँ, और चरण हैं चार।

विषम और सम चरण का, तेरह-ग्यारह भार।।

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तेरह मात्रिक विषम पद, रच भर भाव अनंत।

ग्यारह मात्रिक सम चरण, गुरु-लघु से कर अंत।।

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हो मात्रिक दोहराव तो, लय रहती है ठीक।

दोहा उल्टे सोरठा, सत्य सुपावन रीत।।

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दोहे की लय गुनगुना, रखिए उसमें शब्द।

सरस सरल दोहा रचें, श्रोता रहें निशब्द।।

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मात्रा गिनना सीखिए, बोल बोल उच्चार।

अ इ उ ऋ लघु गिनें, शेष रहे गुरु भार।।

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मात्रा को कहते कला, छंद शास्त्री जान।

द्विकल त्रिकल चौकल रखें, शब्द भार अनुमान।।

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विधि हरि हर बिन हो नहीं, भव से बेड़ा पार।

द्वि कल द्वि कल के बाद है, दोहे का आधार।।

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अकल शकल से श्रेष्ठ है, नकल नहीं अधिकार।

त्रिकल त्रिकल के बाद है, परख करें स्वीकार।।

.

पनघट पनघट पर जुड़ा, नयनों का संबंध।

चौकल चौकल बाद ज्यों, श्वास-आस अनुबंध।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

५.१०.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। अभी तक मैं प्रतिदिन आपको हनुमान चालीसा की चौपाइयों के बारे में बता रहा था। मैंने इस संबंध में एक पुस्तक भी लिखी है जिसका नाम नासे रोग हरे सब पीरा है। इस पुस्तक का विमोचन श्रद्धेय परम पूज्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी बागेश्वर धाम सरकार के हाथों हुआ था। इस पुस्तक में आपको हनुमान चालीसा की सभी चौपाइयों की विवेचना उससे होने वाले लाभ और उनका किस तरह से जाप करना चाहिए सब कुछ मिल जाएगा।

एक प्रसिद्ध बयान है हनुमान चालीसा पढ़ते हो और डरते हो। इसका अर्थ है हनुमान चालीसा पढ़ने वाले को किसी से भी डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। और यह पूर्णतया सत्य है। नासे रोग हरे सब पीरा पुस्तक में इसी सत्य को प्रतिपादित किया गया है।

एक शक्ति अभी है एक शक्ति यह भी है एक सत्य यह भी है की ग्रहों की शक्तियां हमारे पूरे जीवन को निर्धारित करती हैं। अब मैं पंडित अनिल पांडे आज आपको 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2026 के सप्ताह में कौन सा ग्रह कहां पर है यह बताने जा रहा हूं। इसके उपरांत इस सप्ताह के प्रत्येक राशि के राशिफल के बारे में बताया जाएगा।

इस सप्ताह सूर्य और बक्री शुक्र तुला राशि में, मंगल और गुरु कर्क राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। बुध प्रारंभ में तुला राशि में रहेगा और 24 तारीख के 7:26 रात से तुला राशि में ही वक्री हो जाएगा।

आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। सातवें भाव में सूर्य का गोचर हो रहा है। सूर्य अपनी नीच की राशि में भ्रमण कर रहा है। सूर्य मेष राशि में उच्च का होता है और उसके स्वामी मंगल केंद्र में है। इस प्रकार सूर्य से नीच भंग राजयोग बना रहा है। जिसके कारण वैवाहिक जीवन और साझेदारी के काम में आप पूर्ण रूप से सफल रहेंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। कचहरी के कार्यों में आपको सावधानी पूर्वक कार्य करना चाहिए। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा है। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख सफलता दायक है। 23 तारीख के दोपहर से लेकर 24 और 25 तारीख को आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं पर पर विजय मिलेगी, । कर्ज और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने पर उसमें सुधार होगा। व्यापार में उन्नति होगी। भाई बहनों के साथ संबंध सुधरेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को अपने वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। भाग्य से आपको मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 21, 22 और 23 तारीख की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता दिलाने वाला है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

सप्ताह के अंत में आपको धन लाभ का योग है। सप्ताह के बाकी दिनों में भी धन लाभ हो सकता है। यह समय विद्यार्थियों के लिए ध्यान केंद्रित करने का समय है। सट्टेबाज़ी या जोखिम भरे निवेश से बचना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 23 की दोपहर के बाद से लेकर 24 और 25 तारीख उपयोगी हैं। 19 और 20 तारीख को आपको सचेत रहते हुए कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके द्वारा ध्यान देने पर घर-परिवार में सुख-शांति का माहौल रहेगा। माता जी के स्वास्थ्य में सावधान रहने पर सुधार होगा। भूमि, भवन या नए वाहन की खरीद-फरोख्त की योजना बन सकती है। पारिवारिक बातचीत में आपका प्रभाव बढ़ेगा। आपको इस सप्ताह मानसिक तनाव से बचना चाहिए। भाग्य से मामूली मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख मददगार है। 21, 22 और 23 तारीख को आपको होशियार होकर के कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन परिवार में सुख शांति के लिए राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपका पराक्रम बढ़ेगा। भाई-बहनों से संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास और संवाद कौशल (Communication Skills) बहुत मजबूत होगा। छोटी यात्राओं के योग बनेंगे, जो लाभदायक सिद्ध होंगी। मीडिया, लेखन, मार्केटिंग या डिजिटल कार्य से जुड़े लोगों के लिए यह समय विशेष सफलता देने वाला है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक-ठाक ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करने में सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 21 22 और 23 की दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए लाभदायक है सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को करना चाहिए इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। परंतु आपको धन के लेन-देन में सतर्कता भारत में चाहिए। कटु वाणी से बचें। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे। आपको अपने संतान से सहयोग मिल सकता है। परिवार में मांगलिक चर्चा हो सकती है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। कर्मचारीयों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। आपका और आपके जीवनसाथी का तथा माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात जैसा चल रहा है वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 23 के दोपहर के बाद से लेकर 24 और 25 तारीख अनुकूल है। 21, 22 और 23 के दोपहर तक आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपके लग्न राशि में शुक्र, बुध और सूर्य देव विराजमान है। इसके कारण आपके व्यक्तित्व में आकर्षण और निखार आएगा। निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होगी। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। व्यापार में नई योजनाओं को लागू करने के लिए यह समय ठीक है। इस सप्ताह आपको मानसिक तनाव और सिरदर्द से बचना चाहिए। इस सप्ताह आपको सभी निर्णय सोच-समझकर लेना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु आप उनको समाप्त नहीं कर पाएंगे। अतः उनको समाप्त करने का प्रयास न करें। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख फलदायक है। 23, 24 और 25 को आपको अपने कार्यों को सावधानी से निपटना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनिदेव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

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वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से थोड़ी सी मदद मिल सकती है। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपके खर्चों में बढ़ोतरी हो सकती है। विदेश के लिए काम कर रहे लोगों के लिए लाभ के अवसर मिल सकते हैं। विदेश यात्रा या विदेशी कंपनियों/कार्यों से लाभ मिलने की अच्छी संभावना है। हालांकि, खर्चों में अचानक बढ़ोतरी हो सकती है, इसलिए बजट का ध्यान रखें। कानूनी या अदालती मामलों में सतर्कता बरतें। सतर्कता बरतने से सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 21, 22 और 23 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। आय के नए स्रोत बना सकते हैं।, बड़े भाई या मित्रों से सहयोग मिलेगा। आर्थिक दृष्टि से यह सप्ताह आपके लिए ठीक रहेगा। पुराने निवेश से बढ़िया रिटर्न मिल सकता है। बड़े भाई-बहनों और मित्रों का पूरा सहयोग प्राप्त होगा। छोटे भाई बहनों से सहयोग मिलने की उम्मीद कम है। आपके लिए 23, 24 और 25 तारीख परिणाम मूलक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं शनिवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सट्टा सामान्यतः ठीक है। लेकिन कार्यक्षेत्र में सहकर्मियों से तालमेल बनाए रखना चाहिए। कार्यक्षेत्र और नौकरी में उन्नति के योग हैं। अधिकारियों के साथ आपके संबंध सुधरेंगे। यदि पदोन्नति (Promotion) या नई नौकरी की तलाश में हैं, तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। आपके पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इसके अलावा राज्य का भी आपके समर्थन प्राप्त होगा। व्यापार विस्तार के लिए भी समय अनुकूल है। आपके माता जी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

आपके भाग्य में थोड़ा उतार-चढ़ाव रह सकता है, । धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। अटके हुए काम गति पकड़ सकते हैं। धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ेगी। उच्च शिक्षा के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए समय अनुकूल है। लंबी दूरी की यात्राएं फलदायी होंगी। इस सप्ताह आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में ध्यान देकर कार्य करने पर सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 21, 22 और 23 तारीख प्रभावशाली है। 19 और 20 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

रिसर्च, ज्योतिष या गुप्त विद्याओं से जुड़े लोगों के लिए यह समय ठीक है। अचानक कोई रुका हुआ धन मिल सकता है। वाणी पर थोड़ा संयम रखें और स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न बरतें। अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहे। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 23 की दोपहर से लेकर 24 और 25 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त हैं। 21, 22 और 23 की दोपहर तक का समय सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान सूर्य को तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ रविवार है।

 

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ रेणुका माता आरती… ☆ ज्योती कुळकर्णी ☆

ज्योती कुळकर्णी 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ रेणुका माता आरती… ☆ ज्योती कुळकर्णी ☆  

(वृत्त: कलापति)

☆

माय रेणुका घरात आज स्थापली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

* 

स्वागतास ढोल ताश मीच आणले

टाळ वाद्य वृंद की मृदंग वाजले

आज ती मला सुरेख फार भासली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 *

माय रेणुका घरात आज स्थापली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 **

पारिजात फूल मी तुलाच वाहिले

वाकुनी तुझ्या पुढ्यात भाव अर्पिले

आशिषात हो मला प्रसन्न माउली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 *

माय रेणुका घरात आज स्थापली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 **

पंच आरतीस पाच दीप लावले

पाचशे विडे तुझ्या मुखात ठेवले

वाहिली तुलाच मंत्र पुष्प अंजली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 *

माय रेणुका घरात आज स्थापली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 **

रक्षणास प्रार्थना तुलाच गायली

राक्षसास मारण्यास तूच पावली

सोहळा न‌ऊच रात्र येथ थांबली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

 *

माय रेणुका घरात आज स्थापली

होय ती खरेच आदिमाय वाटली

☆

©  ज्योती कुळकर्णी

अकोला

मोबा. नं. ९८२२१०९६२४

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ स्वातंत्र्याच्या इतिहासातील हरवलेली स्त्री-पाऊलवाट… – लेख क्र. ७ ☆ मंजिरी येडूरकर ☆

मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ स्वातंत्र्याच्या इतिहासातील हरवलेली स्त्री-पाऊलवाट… – लेख क्र. ७ ☆ मंजिरी येडूरकर ☆

दमयंती धर्माधिकारी – – 

वर्धा जिल्ह्यातील श्रीमंत मालगुजार श्री मिरापूरकर यांची एकुलती एक कन्या! जन्म १९०४ साली झाला. कृष्णाबाई हे तिचे माहेरचे नांव. लहानपण अतिशय श्रीमंतीत गेले. अर्थात विवाह बालपणीच झाला. मध्य प्रदेशातील मूळ तापी येथील धर्माधिकारी घराणे म्हणजे संयुक्त कुटुंब पद्धतीचे एक उत्तम उदाहरण होते. त्यांच्या घरात धर्माधिकारी आडनावाची किमान शंभरावर माणसं होती. तरी रूढींपेक्षा विज्ञान दृष्टीवर भर असल्याने स्त्रियांमध्येही प्रगतीशीलता होती. अशा घरात दादा म्हणजे शंकर धर्माधिकारी यांच्याशी कृष्णाबाईंचा विवाह झाला आणि ती दमयंती धर्माधिकारी झाली. दादांचे वडील त्र्यंबक धर्माधिकारी हे न्यायाधीश होते. त्यामुळे सुखवस्तू घराणे! दादाही खूप शिकतील असे वाटत असतानाच लग्नानंतर लगेचच त्यांनी कॉलेज शिक्षण सोडून देऊन गांधींच्या असहकार चळवळीमध्ये उडी घेतली. आणि नागपूरच्या टिळक राष्ट्रीय विद्यालयात 30 रुपये महिना पगारावर शिक्षकाची नोकरी पत्करली. दमयंतीचा संन्याशाबरोबरचा संसार सुरू झाला. नाव शंकर होतेच.

महात्मा गांधींच्या तत्त्वाचा अंमल असल्याने दोघेही पती-पत्नी खादीचे पुरस्कर्ते होते. भाजीसाठी नेलेल्या पैशातून पुस्तके खरेदी करून घरी येणारे दादा! त्यामुळे सगळ्या संसाराचा भार हा दमयंतीकडेच आला. तिला दादा मालकीण बाई म्हणत असत.

तत्त्वासाठी स्वतःवर ओढवून घेतलेल्या दारिद्र्याचे वैभव काही वेगळेच असते. त्यात एक वेगळीच मस्ती असते. वडिलांच्या मृत्यूनंतर ते नागपूरहून वर्ध्याला राहायला आले. वर्ध्याची बजाज वाडी म्हणजे निरनिराळ्या प्रांतातून आलेल्या कार्यकर्त्यांचे एकत्र कुटुंबच होते. महात्मा गांधींची कर्मभूमी होती. त्यामुळे तिथले वातावरण भारलेले होते. सांप्रदायिक, धार्मिक, रूढी, परंपरा यात दादा कधीच गुरफटले नाहीत. त्यांच्या या लोकविलक्षण मतांशी आणि प्रयोगांशी दमयंतीला जुळवून घ्यावे लागले. त्यामुळे मुलांच्या मुंजी झाल्या नाहीत. लग्नंही नोंदणी पद्धतीने झाली. ज्या मंदिरात हरिजनांना प्रवेश नसेल त्या मंदिरात दादांच्या घरातीलही कोणी पाऊल टाकत नसे. तीर्थक्षेत्री काही कारणाने दमयंती गेली तरी देवाचे दर्शन न घेता ती परत येत असे. ज्या सणावारी ब्राह्मण जेवायला बोलवायची पद्धत असते, तिथे दमयंतीकडे मात्र पैकू हा भंगी जेवायला असे. त्यामुळे ती अनेक जातीच्या व धर्माच्या मुला मुलींची आई झाली होती.

१९४१ चा वैयक्तिक सत्याग्रह हा गांधींच्या सत्याच्या चळवळीचा उच्चांक होता. या आंदोलनात पहिल्यांदा दमयंती बाईंनी प्रत्यक्ष भाग घेतला.

दमयंतीबाईंनी शरयूताई धोत्रे यांच्याबरोबर वर्धा जिल्ह्यातील बारा खेड्यांचा पायी दौरा केला. या दौऱ्यात त्या ब्रिटिश सरकारच्या जुलमी धोरणांविरुद्ध आणि दुसऱ्या महायुद्धात भारतीयांना बळजबरीने सामील करून घेण्याविरुद्ध बोलल्या व जोरदार युद्धविरोधी प्रचार केला. अनेक जाहीर सभा घेऊन भाषणे केली. खेड्यापाड्यात जाऊन अशी प्रक्षेभक भाषणे केल्यामुळे अटक झाली. अटके नंतर न्यायाधीशांसमोर आपली बाजू मांडताना त्यांनी अत्यंत स्वाभिमानी व कणखर भूमिका घेतली. दमयंतीबाई म्हणाल्या, ” माझ्यासारख्या संसारी, कौटुंबिक वृत्तीच्या स्त्रीलाही, राजकारणात फारसा रस नसताना, महात्मा गांधींच्या या पवित्र चळवळीत उतरावे असे वाटले, कारण ब्रिटिश सरकारचे अत्याचार आता असह्य झाले आहेत. कोणत्याही नागरिकाला स्वाभिमानाने जगणे अशक्य झाले आहे. साम्राज्यशाही व हिटलरशाही ही जुळी भावंडे आहेत. हिटलरचा जरी नयनाट झाला तरी इंग्लंडच्या रूपाने हिटलरशाही जिवंत राहील. हिंदुस्थान गुलाम असताना त्याने या महायुद्धाला मदत करणे हे राष्ट्रदोहाचे ठरेल. हिटलरशाही व साम्राज्यशाहीचा अंत गांधीजींच्या अहिंसक मार्गानेच होईल. त्यामुळे या हिसक युद्धाला आमचा विरोध असेल. आपल्याला जर खरोखरीच सरकारचे नोकर या नात्याने लोकांचे खरे हित करायचे असेल तर या युद्धाला विरोध करणे व अहिंसेचा मार्ग स्विकारणे हे आपले कर्तव्य ठरते. ” या खटल्यात तुरूंगवासाची शिक्षा झाली. १९४२ मधे हा तुरूंगवास संपला.

दादा तर कित्येक वेळा तुरुंगात जात होते. अशा वेळी घर सांभाळणे, दादांच्या हालचालीत गुप्तता पाळणे अशा जबाबदाऱ्या उचलाव्या लागत होत्या.

पती-पत्नी दोघेही तुरुंगात असताना सगळ्या कुटुंबाने अगदी चौदा वर्षाच्या मुलाने (न्यायमूर्ती चंद्रशेखर धर्माधिकारी) सुध्दा भूमिगत राहून आंदोलनात भाग घेतला होता. १९४२ च्या भारत छोडो आंदोलनातही दमयंतीबाईंनी भाग घेतला होता. तेव्हाही जवळजवळ तीन वर्षे तुरुंगवास भोगावा लागला.

या तुरुंगवासात त्यांनी पहिले की मोठमोठी माणसे सुद्धा तुरुंगात सवलती मिळविण्यासाठी ज्या क्षुद्रपणे वागतात त्याचा दमयंती बाईंच्या मनावर परिणाम झाला. त्या क्रांतिकारकांच्या मनातील प्रतिमा डागाळल्या. हा सर्व मानसिक त्रास त्यांना सहन झाला नाही. त्याचा त्यांच्या मेंदूवर परिणाम झाला. अशाच अवस्थेत तीन वर्षांच्या तुरुंगवासानंतर त्यांची सुटका झाली. पण सगळा संसार उद्ध्वस्त झाला. परिस्थिती शेवटपर्यंत सुधारली नाही व २६ मे १९७३ रोजी एक क्रांती ज्योत अनंतात विलीन झाली.

तोपर्यंत त्या जिवंत आहेत की नाही याची चौकशीही कुणी कधी केली नाही, हे शल्य त्यांच्या कुटुंबियांच्या मनामध्ये घर करून राहिले.

– लेख क्र. ७.  

© मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १२१ आणि १२२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १२१ आणि १२२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. १२१ – – – 

महा भक्त प्रल्हाद हा कष्टवीला ।

म्हणोनी तया कारणे सिंहय झाला ।

न ये ज्वाळ वीषाळ संन्नीध कोण्ही ।

नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ।।१२१।।

अर्थ : प्रल्हाद हा भगवंतांचा थोर भक्त होता. जेव्हा त्याला त्रास होऊ लागला, तेव्हा त्याच्यासाठी भगवंताने सिंहाचे रूप धारण केले. सिंहरूपी भगवंताच्या अंगातून येणाऱ्या प्रचंड ज्वाळांमुळे त्याच्याजवळ जाण्याची कोणाचीही हिंमत नव्हती. भगवंत हा भक्ताभिमानी असून आपल्या भक्तांची तो कदापिही उपेक्षा करीत नाही.

(ज्वाळ वीषाळ – आगीच्या प्रचंड ज्वाला, सन्निध – जवळ, कोण्ही – कोणी)

विवेचन : प्रल्हाद हा भगवंताचा परमभक्त होता. प्रल्हादाचा उल्लेख करताना नेहमी भक्त प्रल्हाद असा केला जातो. त्याची कथा यापूर्वी ९६ व्या श्लोकात आली आहे. समर्थांनी त्याला महा भक्त म्हटले आहे. त्याचे कारण म्हणजे राक्षस कुळात जन्माला येऊनही आणि अत्यंत विपरीत परिस्थिती असूनही भगवंताची भक्ती तो एकनिष्ठपणे करीत राहिला. प्रल्हाद हा वयाने लहान असला तरी अत्यंत ज्ञानी होता. या चराचरात सर्वत्र भगवंत भरला आहे या गोष्टीवर त्याची दृढ श्रद्धा होती आणि त्या दृष्टीनेच तो सर्वांकडे पाहत होता. प्रल्हादाला महाभक्त म्हणण्याचे आणखी एक कारण आहे. त्याने परमेश्वराकडे त्याच्या एकट्याच्या मुक्तीची याचना केली नाही. भगवंताने सर्वसामान्य माणसांचा देखील उद्धार करावा अशी विनंती त्याने केली.

त्याच्यावर अनेक संकटे आली पण प्रत्येक वेळी प्राणांतिक संकटातून त्याला भगवंताने तारून नेले. प्रल्हादाची भक्ती जेवढी शुद्ध आणि निष्कपट होती, त्याच्या नेमका उलट त्याचा पिता हिरण्यकश्यपू हा होता. तो अत्यंत दुराचारी, भोगी आणि विलासी स्वभावाचा होता. त्याला मिळालेल्या वरामुळे त्याचा अहंकार कमालीचा वाढला होता. मीच परमेश्वर आहे असे तो समजू लागला होता. ज्याप्रमाणे शिशुपालाचे शंभर अपराध भरल्यानंतर श्रीकृष्णाने त्याला आपल्या सुदर्शन चक्राचा वापर करून ठार केले. त्याप्रमाणेच आता हिरण्यकश्यपूच्या अपराधांची सीमा झाली होती.

हिरण्यकश्यपूला दिलेल्या वरानुसार देव, दानव किंवा मानव यांच्या हस्ते, अस्त्राने किंवा शस्त्राने, जमिनीवर किंवा आकाशात त्याचा वध होऊ शकत नव्हता. एक प्रकारे हिरण्यकश्यपूने अमरत्वच प्राप्त केले होते. त्यामुळे आपल्या भक्ताला छळणाऱ्या हिरण्यकश्यपूला मारण्यासाठी भगवंताला नरसिंह रूप धारण करावे लागले. हे नरसिंह रूप अत्यंत उग्र होते. त्याच्या अंगातून दाहक ज्वाळा निघत होत्या. त्यामुळे ते पाहून सर्वसामान्यांची पाचावर धारण बसली. त्याच्याजवळ जाण्याची कोणाची हिंमत होईना. परंतु भगवंताचा भक्त असलेला प्रल्हाद मात्र त्याच्याजवळ जाऊन त्याला प्रणाम करू लागला. हाच नरसिंह अवतार. प्रल्हादाने नंतर त्याला सौम्य रूप धारण करण्याची विनंती केली. आता लक्ष्मीनृसिंह म्हणून या अवतारातील भगवंताची पूजा केली जाते.

या नरसिंह रूपात हिरण्यकश्यपूला दरवाज्यापर्यंत फरफटत नेऊन त्याला आपली नखे खुपसून ठार मारले. अशा प्रकारे भगवंत आपल्या भक्तांचा कैवारी आहे. त्यांच्या रक्षणासाठी तो कोणताही अवतार धारण करून त्यांचे रक्षण करतो.

स्वसंवाद :

१. प्रल्हादाप्रमाणे माझ्या सभोवताली कितीही विपरीत, नकारात्मक किंवा नास्तिक परिस्थिती असली, तरीही मी माझ्या चांगुलपणावर आणि भगवंताच्या सात्त्विक विचारांवर एकनिष्ठ राहू शकतो का?

२. हिरण्यकश्यपूला मिळालेल्या अफाट सत्तेसारखा किंवा संपत्तीसारखा अहंकार माझ्या मनात डोकावतो का? मी स्वतःला इतरांपेक्षा श्रेष्ठ समजू लागतो का?

३. जेव्हा भगवंताचे रूप उग्र किंवा संकटाचे वादळ प्रचंड असते, तेव्हा मी घाबरून दूर पळतो, की प्रल्हादासारखा निष्कपट आणि निर्भय भाव ठेवून त्या परिस्थितीला सामोरा जातो?

४. प्रल्हादाने जशी केवळ स्वतःच्या सुखाची किंवा मुक्तीची हाव न धरता सर्वांच्या कल्याणाची प्रार्थना केली, तशी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ ही व्यापक भावना माझ्या प्रार्थनेत आणि आचरणात कधी उमटते का?

—–

 श्लोक क्र. १२२ – – – 

कृपा भाकिता जाहला वज्रपाणी ।

तयाकारणे वामनु चक्रपाणी ।

द्विजांकारणे भार्गव च्यापपाणी 

नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ।।१२२।।

अर्थ : इंद्राने देवाची करुणा भाकली तेव्हा भगवंताने वामन अवतार धारण केला. द्विजांच्या रक्षणार्थ त्याने धनुष्यबाण धारण केलेल्या परशुरामाचा अवतार घेतला. भगवंत आपल्या भक्तांचा अशा प्रकारे कैवारी असून त्यांची तो कधीही उपेक्षा करीत नाही.

(वज्रपाणी – इंद्र, वामनु – वामन अवतार, चक्रपाणी – विष्णू /भगवंत, द्विज – ब्राह्मण, भार्गव – परशुराम, च्यापपाणी – धनुष्यबाण धारण केलेला/भगवंत) 

विवेचन : आधीच्या श्लोकात आपण भक्त प्रल्हादाबद्दल जाणून घेतले. या श्लोकात त्याचा नातू असलेला बली याचा संदर्भ आला आहे. त्याशिवाय द्विजांच्या रक्षणासाठी झालेल्या परशुराम अवताराचा देखील संदर्भ आहे. प्रल्हादाप्रमाणेच बली हा देखील भगवंताचा महान भक्त होता. तो अत्यंत पराक्रमी होता. आपल्याला इंद्रपद प्राप्त व्हावे म्हणून शंभर यज्ञांचे आयोजन केले होते. त्यापैकी ९९ यज्ञ निर्विघ्नपणे पार पडले. आता शंभरावा यज्ञ पूर्ण झाला तर आपले इंद्रपद जाईल याची भीती इंद्राला वाटू लागली. त्याने विष्णूंची प्रार्थना केली.

विष्णूने मग अदितीच्या पोटी वामन म्हणून जन्म घेतला. बटू वेशात थेट बलीच्या यज्ञशाळेत प्रस्थान केले. बली हा दानवीर होता. त्याने वामनरूपातील विष्णूचे यथोचित स्वागत करून त्यांना आपल्याला जी गोष्ट हवी आहे, ती सांगा. मी लगेच आपल्याला देतो असे म्हटले. याप्रसंगी वामन रूपातील भगवंताने आपल्याला केवळ तीन पावले एवढी भूमी द्यावी अशी विनंती केली. ही अजब आणि अत्यंत किरकोळ विनंती ऐकून बली क्षणभर चक्रावला. पण त्याने वामनाची मागणी पूर्ण करण्याचे ठरवून हातावर उदक सोडले. यावेळी दैत्यगुरू शुक्राचार्य यांनी बलीला विरोध करून असे करू नकोस असे सांगितले. पण आपल्या शब्दाचा पक्का असलेल्या बलीचा निश्चय अटळ होता.

त्याने हो म्हणताच वामन रूपातील भगवंताने विश्वव्यापक रूप धारण केले. एका पावलाने जमीन आणि दुसऱ्या पावलाने आकाश व्यापले. आता बलीने नम्र शरणागती पत्करली आणि आपले मस्तक त्याच्यापुढे झुकवले आणि तिसरे पाऊल आपल्या मस्तकावर ठेवण्याची विनंती केली. तेव्हा वामनाने आपले तिसरे पाऊल त्याच्या मस्तकावर ठेवले. त्याने बलीला पाताळात धाडले. तिथले राज्य दिले आणि स्वतः विष्णू त्याचे द्वारपाल झाले. शिवाय पुढील मन्वंतरात विष्णूने बलीला इंद्रपद दिले. अशा रीतीने भगवंताने इंद्र आणि बली अशा आपल्या दोन्ही भक्तांची लाज राखली.

या श्लोकातील पुढील संदर्भ भगवान परशुरामांचा आहे. त्यांच्या काळात काही क्षत्रिय राजे अत्यंत अहंकारी आणि अन्यायी झाले होते. त्यांनी भगवंताचे भक्त असलेल्या निरपराध ब्राह्मणांना त्रास देण्यास सुरुवात केली. आपल्या या भक्तांचे रक्षण करण्यासाठी भगवंताने जमदग्नी ऋषींच्या पोटी जन्म घेतला. हाच परशुराम अवतार. त्यांनी उन्मत्त झालेल्या क्षत्रिय राजांशी युद्ध करून त्यांचा नाश केला. काही लोक परशुराम अवताराला ब्राह्मण ब्राह्मणेतर वादाचा रंग देण्याचा प्रयत्न करतात. परंतु ते योग्य नाही. कारण अन्यायी आणि अधर्मी राजांचा वध श्रीराम आणि श्रीकृष्ण यांनी देखील केला आहे. अशा रीतीने आपल्या भक्तांचा अभिमानी असलेला भगवंत त्यांच्या रक्षणार्थ धावून जातो. तो त्यांची कधीही उपेक्षा करीत नाही.

स्वसंवाद

१. बली राजाप्रमाणे मी माझ्या आयुष्यात दिलेला ‘शब्द’ किंवा घेतलेला चांगला ‘निश्चय’ कितीही मोठे नुकसान सोसावे लागले तरी अढळ ठेवतो का?

२. इंद्राप्रमाणे जेव्हा मला माझ्या पदाची किंवा वैभवाची भीती वाटते, तेव्हा मी मत्सर करत बसतो, की विवेकाने ईश्वराचा धावा करून योग्य मार्ग शोधतो?

३. वामन अवताराप्रमाणे, भगवंत जेव्हा माझा अहंकार दूर करण्यासाठी मला संकटात टाकतो, तेव्हा मी बलीसारखे स्वतःचे मस्तक (अहंकार) त्याच्या चरणी समर्पित करायला तयार असतो का?

४. परशुराम अवताराच्या कथेवरून, माझ्या अंगी असलेल्या शक्तीचा किंवा अधिकाराचा उपयोग मी उन्मत्तपणे इतरांना त्रास देण्यासाठी करतो, की दुर्बलांच्या रक्षणासाठी करतो?

– क्रमशः श्लोक १२१ आणि १२२

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।

वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।

अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!

ये कैसे संजय हैं?

ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ७० – आलेख – नवरात्र पर्व विशेष – मेरी कुलदेवी माँ भवानी चंडी (ऊँचेड़ा) ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ७० ☆

☆ आलेख ☆ ~ नवरात्र पर्व विशेष – मेरी कुलदेवी माँ भवानी चंडी (ऊँचेड़ा) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

बलिया जनपद अंतर्गत चौदह के क्षेत्र में बसे कलचुरीवंशीय क्षत्रिय (राजपूत) तथा मेरी भी अधिष्ठात्री कुलदेवी, मेरे गांव संवरा के सन्निकट गांव गोपालपुर के कुलीन ब्राह्मण कुल की आराध्या माँ भगवती विंध्यवासिनी की प्रतिरूप उचेड़ा नामक ग्राम में अवस्थित माँ चंडी भगवती को इस समस्त क्षेत्र वासियों की पूजनीय देवी के रूप में जाना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि संवरा – गोपालपुर एवं चिंतामणि पुर से लेकर औन्दी तक, इधर मटिहीं से लेकर रतसर के बीच बसे कलचुरीवंशीय क्षत्रियों के परिवार में बेटे- बेटियों के यहाँ यदि कोई भी शुभ- मांगलिक कार्य होता है तो प्रथम पूजा माँ चंडी की ही होती है। इन दोनों वंशों के क्षत्रिय परिवार ऊंचेड़ा या खड़ीचा स्थित माँ भगवती के मंदिरों में पूजा आराधना करते हैं। कलचुरीवंशीय क्षत्रियों का गोत्र कृष्णात्र (अत्रि ऋषि से संबंधित गोत्र) एवं कुलदेवी विंध्यवासिनी वर्णित है। जैसा कि मैंने पूर्व में बताया, माँ भगवती चंडी, मां विंध्यवासिनी की ही रूप है। यदि हम कुछ और गहराई में जाएं तो कलचुरीवंशीय क्षत्रिय छत्तीसगढ़ के रतनपुर से आए थे। यह स्थान छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जनपद के सन्निकट है। रतनपुर में मां भगवती चंडी की बहुत ही पौराणिक ऐतिहासिक और प्राचीन प्रतिमा है। उस क्षेत्र के कलचुरी वंशियों की वही आराध्या है। मुझे रतनपुर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और माँ भगवती के दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त हो चुका है।

बात करते हैं ऊँचेड़ा वाली चंडी माई की। इनके के विषय में मान्यता है कि इनको इस स्थान तक ले आने का श्रेय गोपालपुर के एक ब्राह्मण परिवार का है, जो मां विंध्यवासिनी के बहुत बड़े उपासक थे। कहते हैं कि वह अपने योग से प्रतिदिन माँ के दर्शन करने जाया करते थे। वृद्धावस्था आने पर उन्होंने मन से प्रार्थना की कि माँ मेरे पास ही चले आइये, क्योंकि अब मैं आने-जाने में असमर्थ हूँ। माँ भगवती ने स्वप्न में उन्हें बताया कि मैं अमुक जगह पहुंच चुकी हूँ, वहां मेरी स्वयं भू प्रतिमा है। आप यहां से हमारा दर्शन कर सकते हैं। बताते हैं कि यही स्थान उचेडा है जहां माँ का आगमन हुआ।

साथ ही साथ एक मान्यता यह भी मानता है कि देवी दिन में तीन रूप धारण करती है। प्रातः ब्रह्मबेला में बालिका के रूप में, दोपहर मध्यान में यौवन अवस्था में, एवं संध्या रात्रि कालीन बेला में वृद्धावस्था में इनके दर्शन होते हैं। वर्ष के दोनों नवरात्रों में मां चंडी के दर्शन करने वालों की एक अच्छी खासी संख्या मां भगवती के दर्शन करने के लिए लगातार आती है। जनपद बलिया के सेंगर वंशीय क्षत्रियों की आराध्य नाथ बाबा का मंदिर रसड़ा सहित अन्य तीन स्थानों पर अवस्थित है। जैसा कि मैं बचपन से देखा आया। सेंगर और कलचुरी वंश के परिवार अगल-बगल गांव में बसे हुए हैं तो उनके बीच के पारिवारिक- सांस्कृतिक संबंध भी आपस में खूब है। इसका एक उदाहरण रसड़ा जी का नाथ जी मंदिर और उचेडा का चंडी माँ मंदिर भी है। दोनों वंशों क्षत्रिय परिवार और उस क्षेत्र में रहने वाले सारे लोग इन दोनों मंदिरों पर बराबर जाते हैं और पूजा अर्चन करते हैं।

नवरात्र का पावन महीना चल रहा है, उपरोक्त क्षेत्र में जन्म लेने वाले और सामाजिक एवं पौराणिक विषयों पर कलम चलाने वाले साहित्यकार के रूप में मैंने भी अपनी कृति काव्य “कथा वीथिका” में इन दोनों ही मंदिरों से जुड़े कथानकों कलम चलाई है। “कथा वीथिका” के पृष्ठ ८७ पर मैंने ‘विंध्यवासिनी स्वरूप चंडी माँ उचेडा’ शीर्षक से माँ चंडी के विषय में कविता लिखी है, वही श्रीनाथजी के विषय में मेरी रचना ”लाठी की पूजा होती है” शीर्षक से “कथा वीथिका” के पृष्ठ ७६ पर है।

बलिया के प्रख्यात इतिहासविद डॉ. शिवकुमार कौशिकेय ने भी अपनी पुस्तक बलिया_विरासत के पृष्ठ ९१ पर “भवानी मंदिर उचेड़ा” शीर्षक से मां चंडी के विषय में लिखा है।

नवरात्रि इस पावन पर्व पर मैं अपनी कुलदेवी मां भगवती चंडी को प्रणाम करता हूं एवं आप सभी को नवरात्र पर्व की शुभकामनाएं व्यापित करता हूँ।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि, लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ / बलिया  उप्र, (भारत )

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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