मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०९ – प्रेरक गाथा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०९ – विजय साहित्य ?

☆ प्रेरक गाथा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(दशाक्षरी)

☆

वात्सल्यांकीत, रूप दुर्गेचे

स्कंदमातेला, नमन करू

मनी मानसी, पद्मासनीला,

नामस्मरणी, हृदयी धरू ..!

*

शिवपुत्र जो,कार्तिकेय तो

पराक्रमी नी, केले सक्षम

युद्ध कलेची, दिधली शक्ती

उभी राहिली,पाठी भक्कम..!

*

 तारकासुरा, केले शासन

मरूगणासी,सुसज्ज केले

संकट हारी, संरक्षक ही

स्कंद मातेने, स्फूरण दिले .

*

स्कंद मातेची, करता पूजा

बालकापरी,करते माया

भक्ती शक्तीची, देत शिदोरी

सदैव देते, जीवन छाया..!

*

माय कृपाळू, सिंह वाहिनी

शक्ती पीठ हे, सामर्थ्य दायी

चराचराची, माय माऊली

भक्त रक्षणा, धावत जाई

*

परम शांती, वात्सल्य माया

नवदुर्गा ही, प्रेरक गाथा

नसे वंचना,नुरे वल्गना

घेता दर्शन, झुकतो माथा.

☆

© कविराज शब्दसम्राट विजय

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६७ ☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘इंसानियत‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६७ ☆

☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

“प्लीज अंकल, दो महीने से मुझे सैलेरी नहीं मिल रही है, जैसे ही मिलेगी मैं आपको किराया दे दूंगी.”

“मुझे कुछ नहीं पता, रहना हो तो किराया दो, नहीं तो मकान खाली कर दो.”

“इस समय मुझे यहीं रहने दीजिए. आप ही बताइए ना मैं कहाँ जाऊँ इस समय?”

“मुझे कुछ नहीं पता” – बडे रूखेपन से मकान मालिक ने जबाब दिया.

“अंकल! आपको पता है ना कोरोना के कारण देश का क्या हाल है. मुझे मकान कहाँ मिलेगा किराए पर इस समय” – उसने बडी मायूसी से कहा.

“मुझे इससे कोई मतलब नहीं, मैंने पहले ही कहा था कि किराया समय पर देना होगा”.

रिया ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन मकान मालिक ने एक ना सुनी, साफ कह दिया कि- “किराया दो या मकान खाली करो.” रिया ने परेशान होकर अपने लिए मकान देखना शुरू किया . दोस्तों के परिचय से मकान मिल तो गया अब समस्या यह थी कि नए घर में सामान कैसे पहुँचाया जाए? लॉकडाउन के कारण कोई आ नहीं सकता था, बालकनी में खडी सोच रही थी कि सडक पर कुछ लडकों को जाते देखा, सबके कंधो पर बैग लदे थे, हाथों में भी सामान था. सबके चेहरों पर बडी थकान दिख रही थी. रिया ने बडे सकुचाते हुए उन्हें अपनी परेशानी बताई और पूछा – मुझे नए घर में सामान शिफ्ट करना है आप लोग मेरी मदद कर देंगे क्या? मेरे पास पैसे भी थोडे ही हैं.

उन्होंने एक दूसरे की तरफ देखा. “अरे दीदी काहे नहीं करेंगे मदद” – मुस्कुराता हुआ एक लडका बोला, “हमें आदत है मेहनत – मजूरी करने की.” सबने अपना सामान एक किनारे रखा और लग गये रिया की मदद करने. सामान पहुँचाने के बाद रिया ने उन्हें पैसे देने चाहे तो एक मजदूर हाथ जोडकर बोला –  “दीदी पैसे की बात ना करना, हम समझते हैं सबके हालात, देखो ना हम भी तो मारे – मारे घूम रहे हैं. बस इतनी दुआ करना कि हम अपने घर पहुँच जाएं अपनों के पास” —  उसकी आँखें भर आईं.  

रिया को इंसान में भगवान के दर्शन हो गये थे.

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # ३०३ ☆ शारदीय नवरात्रि : जवारे—आस्था की हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शारदीय नवरात्रि : जवारे—आस्था की हरियाली…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०३ ☆

☆ शारदीय नवरात्रि : जवारे—आस्था की हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

माँ की ममता छाँव, शक्तिमय पावन धारा।

सुंदर हो हर राह, लगे सुखमय जग सारा॥

माँ से मिलती आस, फैलता हिय उजियारा।

माँ चरणों में प्रीत, रहे मन भावन प्यारा॥

☆

नवरात्रि शक्ति की आराधना के साथ प्रकृति के प्रति हमारी आस्था और जीवन में सकारात्मकता का संदेश देने वाला पर्व भी है। इस अवसर पर जवारे बोने की परंपरा धार्मिक विश्वास के साथ जीवन के गहरे अर्थों को भी अभिव्यक्त करती है। मिट्टी के पात्र में बोए गए अनाज के दाने जब हरी कोपलों के रूप में फूटते हैं, तो प्रकृति की सृजनशीलता साकार हो उठती है।

नवरात्रि के प्रथम दिन स्वच्छ मिट्टी और अनाज के दानों से जवारे बोए जाते हैं। नौ दिनों तक देवी की आराधना के साथ इनकी देखभाल की जाती है। प्रतिदिन बढ़ती हरियाली भक्तों के मन में शुभता और समृद्धि का भाव जगाती है। नवमी के दिन विधिपूर्वक पूजा-अर्चना के पश्चात जवारों का विसर्जन किया जाता है अथवा स्थानीय परंपरा के अनुसार उन्हें उपयोग में लाया जाता है।

जवारों का अंकुरण प्रकृति के एक सहज सत्य से परिचित कराता है—जीवन के विकास के लिए अनुकूल वातावरण, धैर्य और देखभाल आवश्यक हैं। मिट्टी के भीतर दबा बीज अंधकार में भी अपने अस्तित्व की संभावनाएँ सँजोए रहता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही वह धरती को भेदकर प्रकाश की ओर बढ़ने लगता है। मनुष्य का जीवन भी इससे अलग नहीं है। विपरीत परिस्थितियों के बीच आशा और आत्मविश्वास का सहारा नई राह खोजने की प्रेरणा दे सकता है।

जवारों की हरियाली को शुभता, समृद्धि और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में इनके रंग, लंबाई और वृद्धि को लेकर अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। इन मान्यताओं का अपना सांस्कृतिक महत्त्व है, यद्यपि इन्हें भविष्य के निश्चित संकेतों के बजाय लोकविश्वास के रूप में देखना अधिक उचित है।

जवारे बोने की परंपरा हमें मिट्टी, बीज और जीवन के परस्पर संबंध का स्मरण कराती है। जिस प्रकार नन्हे अंकुरों के विकास के लिए संवेदनशील देखभाल आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन में भी संबंधों, मूल्यों और प्रकृति के संरक्षण के लिए सजगता अपेक्षित है। नवरात्रि की यह हरियाली हमें सिखाती है कि आस्था का वास्तविक विस्तार तभी होता है, जब वह हमारे व्यवहार में उतरकर प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का रूप लेती है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३४ ☆ हिंदी साहित्य में लघुकथा : छोटी काया, व्यापक जीवन-दृष्टि ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३४ ☆

?  आलेख – हिंदी साहित्य में लघुकथा : छोटी काया, व्यापक जीवन-दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी साहित्य में लघुकथा की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि रचना का महत्त्व उसके आकार से नहीं, उसके अनुभव और प्रभाव से तय होता है। कुछ पंक्तियों में भी कोई कथा मनुष्य के भीतर एक लंबी बहस शुरू कर सकती है। किंतु लघुकथा को केवल ‘कम शब्दों वाली कहानी’ मानना भूल होगी। उसमें कथा-सूत्र, पात्र या स्थिति, अर्थपूर्ण तनाव और ऐसी परिणति चाहिए जो कहे हुए के साथ अनकहे को भी पाठक के अनुभव में जगा दे।

भारतीय कथा-परंपरा में पंचतंत्र, जातक, लोककथाएँ, दृष्टांत और बोधकथाएँ संक्षिप्त कथन के पुराने उदाहरण हैं। फिर भी इन्हें आज की हिंदी लघुकथा का सीधा पर्याय नहीं माना जा सकता। उनकी रचना-प्रेरणा प्रायः नीति, शिक्षा अथवा मनोरंजन से जुड़ी थी; आधुनिक लघुकथा अधिकतर जीवन की जटिलता, विडंबना और सामाजिक यथार्थ से अपना अर्थ ग्रहण करती है। परंपरा ने उसे संक्षेप का संस्कार दिया, आधुनिक समाज ने उसकी अलग पहचान बनाई।

हिंदी साहित्य को लघुकथा से क्या मिला, यह सवाल विचारणीय है। यह अभिव्यक्ति की एक सशक्त विधा है।

लघुकथा ने सबसे पहले साधारण दिखने वाले क्षण को साहित्यिक गरिमा दी। दफ्तर का एक संवाद, अस्पताल के बाहर की प्रतीक्षा, घरेलू कामगार की चुप्पी या किसी बच्चे का प्रश्न, ऐसे दृश्य बड़े सामाजिक तंत्र की असमानता खोल सकते हैं। उपन्यास व्यापक संसार रचता है और कहानी अनुभव को अपेक्षाकृत विस्तार देती है।  लघुकथा एक चुने हुए बिंदु पर दृष्टि केंद्रित कर पाठक से शेष संसार की मनोगत कल्पना करवाती है। यह किसी अन्य विधा का विकल्प नहीं, रचना का अलग कलात्मक रास्ता है।

हिंदी गद्य को मितव्ययी भाषा, सार्थक संवाद और संकेत की शक्ति का नया अभ्यास भी लघुकथा ने दिया है। अच्छी लघुकथा उपदेश सुनाकर पाठक का काम पूरा नहीं करती, sवह प्रश्न छोड़ती है। इसीलिए उसका योगदान केवल सामाजिक विसंगतियाँ दिखाने तक सीमित नहीं। वह मनुष्यता, स्मृति, अकेलेपन, सह-अस्तित्व और छोटे नैतिक निर्णयों की जटिलता को भी व्यक्त कर सकती है। व्यंग्य उसका एक सशक्त औजार है, अनिवार्य स्वभाव नहीं।

प्रायः कहा जाता है कि लघु कथा में एक घटना, कम पात्र, छोटा समय, तीखा अंत और निश्चित शब्द-सीमा होनी चाहिए। ये सूत्र अभ्यास में उपयोगी हो सकते हैं, पर इन्हें अटल विधान बना देने से रचना कृत्रिम हो जाती है।

इनके अभाव में कुछ लोग लघुकथा को लघु कहानी कह देते हैं।

मेरी समझ में अधिक विश्वसनीय कसौटी है कथात्मक एकाग्रता,  क्या हर वाक्य मुख्य अनुभव को आवश्यक रूप से आगे बढ़ाता है? क्या पात्र और प्रसंग जितने हैं, उतने ही चाहिए? क्या अंत से पहले की पूरी रचना उसके अर्थ को तैयार करती है?

कम शब्द होना पर्याप्त नहीं।  घटना का संक्षिप्त समाचार लघुकथा नहीं बन जाता। चुटकुले का अंतिम पलटाव क्षणिक हँसी दे सकता है, जबकि लघुकथा का अंत पाठक को पहले पढ़ी बात नए अर्थ में सोचने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हर रचना में चौंकाने वाला ‘ट्विस्ट’ या स्पष्ट नैतिक शिक्षा भी अनिवार्य नहीं समझी जानी चाहिए। कभी मार्मिक मौन, कभी अप्रत्याशित संवाद और कभी बिना किसी नाटकीय घोषणा के खुली रह गई परिस्थिति अधिक प्रभावी होती है। शीर्षक अर्थ को खोल सकता है, पर उसे पूरी कथा का सारांश बनने की आवश्यकता नहीं। भाषा सहज हो, मगर सपाट नहीं, विवरण कम हों, मगर जीवन-संदर्भ अनुपस्थित न हो। लघुकथा कार के विवेक एवं शिल्प को नियमों में बांधना मेरी शैली और समझ में कम आता है।

‘एक ही समय-काल’ की अनिवार्यता पर भी व्यापक विचार ज़रूरी है। एक केंद्रित दृश्य लघुकथा के लिए अक्सर उपयोगी है, किंतु बीते समय की एक स्मृति या सीमित समय की छलाँग यदि मुख्य अनुभव को गहरा करती है, तो उसे केवल तकनीकी नियम के कारण निषिद्ध नहीं किया जा सकता। मेरे विचार में एक केंद्रीय प्रभाव अधिक सार्थक अनुशासन है, न कि घड़ी की सुइयों से बाँधी गई कथा। समय-विस्तार इतना ही हो कि रचना की सघनता बनी रहे। जहाँ कई स्वतंत्र प्रसंग और विस्तृत चरित्र-विकास आवश्यक हों, वहाँ संभव है कि विषय कहानी का आकार माँग रहा हो। रचनाकार को विधा की पहचान और कथ्य की आवश्यकता, दोनों समाझनी चाहिए।

आज लघुकथा संग्रहों, साहित्यिक पत्रिकाओं, मंचों और डिजिटल माध्यमों में निरंतर लिखी-पढ़ी जा रही है। इस प्रसार ने नए लेखकों और विविध सामाजिक अनुभवों को प्रवेश दिया है। साथ ही त्वरित प्रकाशन का दबाव अधूरी रचना, तैयारशुदा संदेश और केवल ‘आखिरी पंक्ति के झटके’ को भी बढ़ा सकता है। पाठकों की संख्या से अधिक महत्त्वपूर्ण है आलोचनात्मक पाठ, संपादन और श्रेष्ठ रचनाओं का विवेकपूर्ण चयन। क्षेत्रीय भाषिक अनुभव, स्त्री-दृष्टि, श्रमजीवी जीवन, पर्यावरण, तकनीकी बदलाव तथा हाशिये की आवाज़ें लघुकथा के कथ्य को और व्यापक बना सकती हैं।

लघुकथा की शक्ति यह नहीं कि वह कम समय में ‘खत्म’ हो जाती है। उसकी असली शक्ति यह है कि पढ़ने के बाद भी वह पाठक के भीतर चलती रहती है। हिंदी साहित्य को उसने इसी उत्तरजीवी अर्थ का एक सघन रूप दिया है। विधा को अनुशासन चाहिए, पर ऐसा अनुशासन जो अनुभव को तराशे, उसकी साँस न रोके।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “आने वाले समय की कहानी” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – आने वाले समय की कहानी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

युग युग बीते

वो ऊपर जाती सीढ़ियां

कभी खत्म ही नहीं होतीं

जैसे किसी पिरामिड पर हो

चट्टानों को लेकर चढ़ना

और, जिस्म पर हमेशा

समय के हंटर का चलना

एक समय उभरेगा

प्रयासों के स्मारक बन जाएंगे

लेकिन पीढ़ियों को फुरसत नहीं होगी

कभी पलकों में दो आंसू लिये

यहाँ भ्रमण करने की

ये भी एक युग बन कर बीत जाएगा

फर्श से अर्श तक की चढ़ाई का

फिर कोई इतिहास क्यों बने

जैसे बीते अध्यायों पर

अब कोई लकीरें, आकृतियां

उकेरे जाने का सिलसिला,

समाप्तप्राय हो चला है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ – पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग जी द्वारा लिखित पुस्तक – “गुल्लक और उसकी रजाई” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ ☆

☆ पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

कहानी-संग्रह : गुल्लक और उसकी रजाई

कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग

प्रकाशन सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

प्रथम संस्करण : 2026

ISBN : 978-93-7251-012-6

मूल्य : ₹199/-

समीक्षक : ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ गुल्लक और उसकी रजाई : बालमन की जिज्ञासा से सामाजिक चेतना तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बाल साहित्य को लेकर एक सामान्य धारणा यह रही है कि वह बच्चों के मनोरंजन और नैतिक शिक्षण का माध्यम है। किंतु आधुनिक बाल साहित्य ने इस सीमित धारणा से आगे बढ़कर बालक को उसके समय, समाज, पर्यावरण और बदलती जीवन-स्थितियों के बीच देखने का प्रयास किया है। आज का बच्चा केवल परी-कथाओं का पाठक नहीं है; वह तकनीक से परिचित है, प्रश्न करता है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखता है और अनेक बार बड़ों की स्थापित धारणाओं पर भी सवाल उठाता है। इसलिए आज की बाल कहानी से अपेक्षा है कि वह बालमन की जिज्ञासा को स्वीकार करे और उसे संवेदना, विवेक तथा सामाजिक चेतना से जोड़े।

अंजना मनोज गर्ग का कहानी-संग्रह ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी बदलती हुई बाल साहित्यिक चेतना का प्रतिनिधि संग्रह कहा जा सकता है। इसमें बीस कहानियाँ हैं और लगभग प्रत्येक कहानी किसी न किसी समकालीन सरोकार को बालमन के निकट ले आती है। जल-संरक्षण, पर्यावरण, पशु-पक्षी, स्वच्छता, पुस्तकों के प्रति प्रेम, बुजुर्गों की उपेक्षा, पारिवारिक संबंध, त्योहार, प्रकृति और आधुनिक तकनीकी जीवन—ये सभी विषय संग्रह में अपनी अलग-अलग कथात्मक शक्ल में उपस्थित हैं।

इस संग्रह की विशेषता यह है कि लेखिका गंभीर विषयों को बच्चों के सामने सीधे भाषण के रूप में नहीं रखतीं, बल्कि उन्हें कहानी की स्थितियों में बदलने का प्रयास करती हैं। कहीं रजाई कथा का माध्यम बनती है, कहीं पुस्तक स्वयं अपना दर्द व्यक्त करती है, कहीं जंगल एसी की माँग करता दिखाई देता है और कहीं पक्षियों के माध्यम से प्रकृति का मौन संकट सामने आता है। यही रचनात्मक प्रयोग इस संग्रह को सामान्य उपदेशात्मक बालकथाओं से अलग करने का प्रयास करते हैं।

अंजना मनोज गर्ग के आमुख को पढ़ते हुए उनके बाल लेखन की मूल प्रेरणा स्पष्ट होती है। वे बचपन की निर्मलता, अबोधता और जिज्ञासा को अपनी रचनात्मकता का आधार मानती हैं। उनके लिए बालमन प्रश्नों का एक ऐसा संसार है, जहाँ जीवन की साधारण घटनाएँ भी कौतूहल का विषय बन सकती हैं।

उनकी रचनात्मक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बच्चे को केवल परिवार और विद्यालय के दायरे में नहीं देखतीं। उनके बच्चे जंगल, पक्षियों, पेड़ों, मौसम, जल और घरेलू संसार से भी जुड़े हुए हैं। इसीलिए संग्रह में प्रकृति और मनुष्य का संबंध बार-बार उभरता है।

लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने जीवन में काम आने वाले सामान्य किंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को बालमन की जिज्ञासा में ढालकर कहानी रचने का प्रयास किया है। यही बात उनके कथा-संसार की आधारभूमि बनती है। वे बड़े प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में बदलती हैं और बच्चों को उन प्रसंगों के बीच रख देती हैं।

आज तकनीकी विकास ने बच्चे की दुनिया को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यम उसके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इस स्थिति में बाल साहित्य का दायित्व कम नहीं, बल्कि बढ़ गया है। सूचना के विस्तार के साथ संवेदना का विकास भी आवश्यक है।

तकनीक बच्चे को बहुत कुछ जानने का अवसर देती है, लेकिन साहित्य उसे यह समझने में सहायता करता है कि उस ज्ञान का मानवीय उपयोग क्या है। बाल साहित्य उसे प्रकृति से जोड़ सकता है, दूसरों के दुख को समझने की दृष्टि दे सकता है और उसके भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव पैदा कर सकता है।

जितेन्द्र निर्मोही ने संग्रह की भूमिका में इसी संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा है कि आज बच्चों में तकनीकी समझ तेजी से बढ़ रही है, इसलिए उन्हें संवेदना, सामाजिक सरोकार और संस्कृति से जोड़ना भी आवश्यक है। ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी आवश्यकता को अपने कथ्य में ग्रहण करता है।

इस संग्रह की बीस कहानियाँ विषयगत रूप से एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक व्यापक सूत्र से जुड़ी हैं—बालमन के माध्यम से जीवन और समाज को देखना।

‘घमण्डी गुलाब’ से संग्रह की शुरुआत होती है। गुलाब जैसे फूल को केंद्र में रखकर निर्मित यह कथा बाल साहित्य में मानवीकरण की परंपरा का उपयोग करती है। फूल को व्यक्तित्व देना बच्चे के लिए प्रकृति को एक जीवंत सत्ता के रूप में देखने की संभावना खोलता है।

शीर्षक कहानी ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ में सर्दी और विद्यालय जाने की स्थिति के माध्यम से कर्तव्य-बोध को कथा का आधार बनाया गया है। यहाँ रजाई केवल सर्दी से बचाने वाली वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि बालक के आराम और उसके दायित्व के बीच एक रोचक प्रतीकात्मक स्थिति निर्मित करती है। बालक का अपने कर्तव्य की ओर लौटना कथा का केंद्रीय भाव बनता है।

‘मकर संक्रान्ति और बरगद काका की सीख’ में प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदना का स्वर है। त्योहार को केवल परंपरा के रूप में न लेकर उसके भीतर छिपी प्रकृति-संवेदना को रेखांकित करने का प्रयास कहानी को सामाजिक अर्थ देता है।

‘शुभम की नयी होली’ और ‘पानी की चोरी’ जल-संरक्षण के प्रश्न को बच्चों के सामने रखती हैं। पानी के संकट को यदि केवल तथ्य या आँकड़े के रूप में बताया जाए तो बालक उससे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता। कहानी इस समस्या को अनुभव में बदल देती है। यही बाल साहित्य की शक्ति है।

‘भोलू का अपना घर’ स्वच्छता के प्रश्न को सामने लाती है। स्वच्छता यहाँ केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि रहने के परिवेश और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बनती है।

‘जंगल लौटी चिनचिन गौरैया’ और ‘चिंकी और गौरैया’ में पक्षी बाल साहित्य के माध्यम से प्रकृति के संकट के प्रतिनिधि बनते हैं। गौरैया का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पक्षी भारतीय घर-आँगन और मानवीय जीवन से गहरे जुड़ा रहा है। उसके अस्तित्व को लेकर चिंता स्वयं मनुष्य और प्रकृति के बदलते संबंधों की ओर संकेत करती है।

‘सोनू की तासीर’ संग्रह की विषय-विविधता का उदाहरण है। यह गर्म तासीर वाले फलों को किस प्रकार खाया जाए, जैसे सामान्य जीवनोपयोगी प्रश्न को बाल कथा का रूप देती है। इससे स्पष्ट होता है कि लेखिका के लिए बाल कहानी का विषय केवल बड़े सामाजिक प्रश्न नहीं, बल्कि बच्चे के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताएँ भी हैं।

‘किताबों का दर्द’ संग्रह की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। पुस्तक को मानवीय संवेदना देकर उसके ‘दर्द’ को सामने रखना एक प्रभावी कल्पनात्मक युक्ति है। बच्चों द्वारा पुस्तकों को फाड़ने या खराब करने की आदत को सीधे डाँटने के बजाय यदि पुस्तक स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त करे तो बच्चा उसके साथ भावनात्मक संबंध स्थापित कर सकता है।

‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ और ‘दादाजी और धूप’ आधुनिक जीवन और पारिवारिक संबंधों के बीच संवाद स्थापित करती हैं। यहाँ बुजुर्ग केवल ज्ञान देने वाले पात्र नहीं हैं; वे भावनात्मक संबंधों की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आधुनिक व्यस्तता में कमजोर पड़ रही है।

‘गीतु-मीतु की समीरा’ और ‘रसोई बीमार है’ घरेलू और पर्यावरणीय जीवन के अलग-अलग पक्ष सामने लाती हैं। विशेषकर ‘रसोई बीमार है’ का शीर्षक ही अपने भीतर एक मानवीकरण छिपाए हुए है। रसोई का ‘बीमार’ होना वास्तव में उस घरेलू व्यवस्था की उपेक्षा का रूपक बन जाता है, जिसका प्रभाव बच्चों के जीवन पर पड़ता है।

‘जंगल में जब लगा एसी’ संग्रह की सबसे अधिक कल्पनाशील और समकालीन कहानियों में रखी जा सकती है। जंगल में एसी की आवश्यकता क्यों पड़ी—यह असंभव-सी लगने वाली स्थिति बच्चे के भीतर तुरंत प्रश्न पैदा करती है। यही प्रश्न आगे पर्यावरणीय संकट की ओर ले जाता है। एसी और रेफ्रिजरेटर से ओजोन परत को होने वाले नुकसान की ओर संकेत कहानी को वैज्ञानिक चेतना से जोड़ता है।

‘दीपावली और सफाई’ त्योहार और सामाजिक सरोकार के संबंध को रेखांकित करती है। दीपावली केवल सजावट और उत्सव नहीं, बल्कि स्वच्छता तथा सामुदायिक जीवन से जुड़ा अवसर भी है—कहानी इसी दिशा में विचार करती है।

अंतिम कहानियों में ‘नन्हें प्राशु की समझदारी’ और ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ जैसी रचनाएँ बाल-बुद्धि और पर्यावरणीय संकट को केंद्र में लाती हैं। ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ में कटते जंगल, उत्खनन और नदियों से रेत के दोहन जैसे प्रश्नों को कथा के दायरे में लाया गया है। इस प्रकार संग्रह का पर्यावरणीय पक्ष केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास की उन प्रक्रियाओं पर भी संकेत करता है जो प्रकृति के संतुलन को प्रभावित करती हैं।

बालमनोविज्ञान : संग्रह का केंद्रीय आधार

इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका बालमनोविज्ञान है। लेखिका ने बच्चों को उपदेश ग्रहण करने वाली निष्क्रिय इकाई नहीं माना है। उनकी कहानियों में बच्चा प्रश्न करता है, देखता है, अनुभव करता है और कई बार समाधान की दिशा भी खोजता है।

यह दृष्टिकोण आधुनिक बाल साहित्य के लिए आवश्यक है। बच्चे को यदि केवल ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ बताया जाए तो कहानी उपदेश बन जाती है। किंतु जब वही बात किसी पात्र की समस्या और उसके अनुभव से निकलती है, तो वह कथा का स्वाभाविक निष्कर्ष बन जाती है।

मानवीकरण : कथा को रोचक बनाने का साधन

लेखिका ने कई कहानियों में मानवीकरण का प्रयोग किया है। गुलाब, किताब, रसोई, गौरैया और जंगल जैसे तत्वों को मानवीय संदर्भ देकर उन्होंने बच्चों की कल्पनाशीलता को सक्रिय किया है।

मानवीकरण बाल साहित्य का पुराना किंतु अत्यंत प्रभावी उपकरण है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लेखक उसके माध्यम से केवल मनोरंजन करता है या कोई नया अर्थ भी निर्मित करता है। इस संग्रह में मानवीकरण का उपयोग अधिकांशतः किसी सामाजिक या पर्यावरणीय प्रश्न को बालमन के निकट लाने के लिए किया गया है।

प्रकृति एक पात्र के रूप में

संग्रह में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है। कई कहानियों में वह स्वयं कथा की सक्रिय शक्ति बन जाती है। गौरैया, बरगद, जंगल, बारिश, पानी और पेड़ कथानक के भीतर अपना अर्थ निर्मित करते हैं।

यहीं संग्रह की पर्यावरणीय चेतना सबसे प्रभावी रूप में सामने आती है। लेखिका प्रकृति को ‘बचाने योग्य वस्तु’ मात्र नहीं मानतीं, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन का सहभागी बनाती हैं।

पारिवारिक संबंध

दा-दादी और बच्चों के संबंध संग्रह में विशेष स्थान रखते हैं। ‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ तथा ‘दादाजी और धूप’ जैसी कहानियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि आधुनिकता के बीच बुजुर्गों की भूमिका और उनके प्रति भावनात्मक जिम्मेदारी को पुनः समझने की आवश्यकता है।

इन कहानियों का महत्त्व इसलिए भी है कि ये बच्चों को परिवार की बहु-पीढ़ीय संरचना से जोड़ती हैं। बाल साहित्य के माध्यम से पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करना आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।

भाषा और शैली

लेखिका की भाषा सहज और संप्रेषणीय है। बाल पाठक के लिए कठिन शब्दावली या अत्यधिक जटिल वाक्य-विन्यास से बचने का प्रयास किया गया है। कहानियों में कथ्य के अनुसार कल्पनात्मक और संवादात्मक शैली का उपयोग मिलता है।

जहाँ पर्यावरणीय समस्या है वहाँ विचार प्रमुख होता है, जबकि पशु-पक्षियों और वस्तुओं के मानवीकरण वाली कहानियों में कल्पना का पक्ष मजबूत हो जाता है। इस शैलीगत विविधता के कारण संग्रह एकरस नहीं बनता।

शीर्षक और कथात्मक कौतूहल

संग्रह के कई शीर्षक अपने आप में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं—’किताबों का दर्द’, ‘रसोई बीमार है’, ‘जंगल में जब लगा एसी’, ‘पानी की चोरी’ और ‘गुल्लक और उसकी रजाई’।

इन शीर्षकों में एक प्रश्न छिपा हुआ है। किताब को दर्द कैसे हो सकता है? रसोई बीमार कैसे हो सकती है? जंगल में एसी क्यों लगा? पानी की चोरी किसने की? यही प्रश्न बाल पाठक को कथा की ओर खींचते हैं।

नवाचार : संग्रह की केंद्रीय उपलब्धि

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता उसका नवाचार है। नवाचार का अर्थ केवल नए विषय चुनना नहीं, बल्कि परिचित विषय को नई दृष्टि से प्रस्तुत करना भी है।

पर्यावरण पर हजारों रचनाएँ लिखी गई हैं, लेकिन जंगल के पशुओं को एसी की आवश्यकता पड़ने की कल्पना समस्या को एक नए कोण से देखने का अवसर देती है। पुस्तक संरक्षण पर उपदेश देने की जगह ‘किताबों का दर्द’ उनकी भावनात्मक आवाज बन जाता है। घरेलू उपेक्षा को ‘रसोई बीमार है’ के रूपक में बदल देना भी इसी रचनात्मकता का उदाहरण है।

इस प्रकार लेखिका ने कई गंभीर विषयों को बालमन के लिए प्रतीक, कल्पना और मानवीकरण के माध्यम से सुगम बनाने का प्रयास किया है।

आलोचनात्मक सीमाएँ

किसी भी कृति का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। आलोचना का उद्देश्य रचना की संभावनाओं और सीमाओं दोनों को देखना है।

इस संग्रह की प्रमुख सीमा यह कही जा सकती है कि कुछ कहानियों में सामाजिक और नैतिक संदेश इतना स्पष्ट है कि पाठक के लिए निष्कर्ष तक पहुँचने की गुंजाइश कुछ कम रह जाती है। बाल कहानी की शक्ति तब और बढ़ती है जब बच्चा स्वयं कहानी के अनुभव से अर्थ ग्रहण करे।

कुछ कहानियों में पात्रों के मनोवैज्ञानिक विकास की अपेक्षा कथ्य और संदेश अधिक प्रमुख दिखाई पड़ते हैं। यदि पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, असमंजस और संघर्ष को थोड़ा अधिक स्थान मिले तो कहानियों का साहित्यिक विस्तार बढ़ सकता है।

इसी प्रकार पर्यावरणीय कहानियों में समस्या और समाधान के बीच का तनाव कुछ और गहरा किया जा सकता था। उदाहरण के लिए जंगल, जल या वर्षा से जुड़े संकट केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जटिलताओं से भी जुड़े हैं। बाल साहित्य में इन जटिलताओं को सरल बनाना आवश्यक है, किंतु उन्हें पूरी तरह सपाट कर देना कथा की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। प्रूफ की कमी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अखरती है।

फिर भी यह आलोचना संग्रह की मूल रचनात्मक उपलब्धियों को कम नहीं करती। यह लेखिका की आगामी रचनाओं के लिए संभावनाओं की ओर संकेत करती है।

निष्कर्ष

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ समकालीन बाल साहित्य की उन रचनाओं में अपना स्थान बनाने की क्षमता रखता है, जो बालमन और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हैं। यह संग्रह केवल नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियों का संकलन नहीं है। इसमें लेखिका ने बालक की जिज्ञासा को प्रकृति, पर्यावरण, परिवार और समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया है।

इसकी कहानियों में पानी है तो उसके साथ जल-संकट का प्रश्न भी है; गौरैया है तो उसके साथ प्रकृति-संरक्षण की चिंता भी है; पुस्तक है तो उसके साथ ज्ञान और पुस्तक-संस्कृति का प्रश्न भी है; दादा-दादी हैं तो उनके साथ पारिवारिक संवेदना का प्रश्न भी है; जंगल है तो उसके साथ पर्यावरणीय संकट भी है।

यही इस संग्रह की सार्थकता है।

अंजना मनोज गर्ग ने बालमन की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं को सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़ने का जो प्रयास किया है, वह उल्लेखनीय है। उनकी कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के मन और संवेदना को आकार देने वाला साहित्य भी है।

‘गुल्लक और उसकी रजाई’ का महत्त्व इस बात में है कि यह बच्चे को केवल कहानी सुनाकर छोड़ नहीं देता; वह उसके आसपास की दुनिया को देखने की उसकी दृष्टि में हल्का-सा परिवर्तन करने का प्रयास करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि यह संग्रह बालमन की निर्मलता, प्रकृति की पुकार और सामाजिक संवेदना को एक साथ समेटे हुए बीस कहानियों का ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें मनोरंजन के साथ विचार और विचार के साथ संवेदना भी खिलती है। अंजना मनोज गर्ग की यह कृति बाल साहित्य की वर्तमान धारा में अपने विषय-नवाचार और समकालीन सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करती है और लेखिका के आगामी रचनात्मक विकास के लिए एक आशाजनक आधारभूमि तैयार करती है।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

08/10/2026

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३१३ ☆ बाल गीत – बच्चे बनकर हम तो खेले… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३१३ ☆ 

☆ बाल गीत – बच्चे बनकर हम तो खेले…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

हमने सुख-दुख हँसकर झेले।

सच ने देखे बड़े झमेले।

* 

जिनको कहते थे हम अपना

जीते जी वे लगे पराए।

संबंधों की बदली भाषा

जुल्म उन्होंने जब-तब ढाए।

 *

अपने से ही बातें कर-कर

नहीं लगे हम रहे अकेले।

 **

इच्छा और अपेक्षाएँ गुमसुम

हम निष्काम बने योगी।

मन का घोड़ा कसा तभी से

रोती रहीं इन्द्रियाँ भोगी।

 *

नहीं बुढ़ापा हमें सताए

रहते हैं सदैव नवेले।

 **

हर कोई है सुख का साथी

दुख में काम नहीं आएं।

भय संशय में लोग रहें अब

कब वे अपना प्रेम लुटाएं।

 *

सबकी चाहत धन दौलत है

बच्चे बनकर हम तो खेले।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६६ – बुन्देली कविता – ”उनखें सत्ता, शासन चइये ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६६ ☆

☆  बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

उनखें सत्ता, शासन चइये 

हमखें उन्ना, राशन चइये 

 *

हमें चाउने खरी मजूरी 

लबरे हमें न भाषन चइये 

 *

किसना कौ मन जिनमें रीझत 

गौयें, ग्वालें, ग्वालन चइये 

 *

जौ फिसले ईमान हमाओ 

धन की काइ न फिसलन चइये 

 *

छप्पन भोग न चाहे कान्हा 

प्रेम भरो दधि-माखन चइये 

 *

हम दाइज कौ पाप न लादें 

हमखौं बस कन्या धन चइये 

 *

तीन लोक से न्यारो अपनो 

‘भगवत’ बो बिंद्राबन चइये

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१८ ☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय जी द्वारा लिखित  “अस्मि” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१८ ☆

☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

पुस्तक : अस्मि 

उपन्यासकार : शिखा वार्ष्णेय

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ अस्मि’: अपने होने की पहचान की तलाश – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किसी पुस्तक पर चर्चा करना केवल उसकी कथा सुनाना नहीं होता।  उसके भीतर छिपे विचारों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझने का प्रयास  है। मेरे लिए अस्मि ऐसी ही एक कृति है, जो एक स्त्री की कहानी कहते हुए हम सबके सामने एक बुनियादी प्रश्न रखती है,दूसरों के लिए जीते हुए क्या स्त्रियाँ अपने लिए जीना भूल जाती हैं?

‘अस्मि’ का अर्थ होता है—‘मैं हूँ’। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक बड़ा जीवन-दर्शन समेटे है। हम अपने जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। किसी के माता-पिता, जीवनसाथी, बेटे-बेटी और मित्र होते हैं। इन रिश्तों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती हैं। लेकिन इन सबसे अलग हमारा अपना व्यक्तित्व भी है। हमारी इच्छाएँ, रुचियाँ और सपने भी हैं। क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं? क्या हमारे जीवन में उनके लिए जगह बचती है? शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास इन्हीं सवालों को कथा का आधार बनाता है।

शिखा वार्ष्णेय पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की। लंदन में रहते हुए भी उनका लेखन भारतीय पाठकों से निरंतर संवाद करता है। ‘लंदन नामा’ जैसी स्तंभ-लेखन यात्राएँ उनके अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाती रही हैं। यात्रा-वृत्तांत और अन्य लेखन के माध्यम से उन्होंने अपने अलग अनुभव-संसार का परिचय दिया है। अस्मि में भी बाहरी परिवेश के साथ मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व को समझने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

उपन्यास की केंद्रीय पात्र एला एक शिक्षित महिला है। उसका परिवार है, पति राजीव है और बेटा अंकुर है। बाहर से उसका जीवन सामान्य और व्यवस्थित दिखाई देता है। लेकिन भीतर वह अकेली है। परिवार की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते उसकी अपनी रुचियाँ और कलात्मक अभिरुचियाँ पीछे छूट गई हैं। वह धीरे-धीरे स्वयं से दूर होती जाती है। उसके जीवन में सुविधाएँ हैं, लेकिन संतोष नहीं। अपने लोगों के बीच रहते हुए भी उसे अपने होने का एहसास नहीं मिलता।

एला की यह स्थिति उपन्यास को हमारे समय से जोड़ती है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं, जो दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं, लेकिन उनकी अपनी जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं। विशेष रूप से महिलाओं से परिवार के लिए त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है। इसमें कोई बुराई नहीं, यदि यह समर्पण उनकी अपनी पहचान को मिटाने की कीमत पर न हो। परिवार महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार के भीतर प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र व्यक्तित्व भी महत्वपूर्ण है।

एला मानसिक तनाव और अवसाद से गुजरती है। इसी बीच एक पैराडाइव स्पोर्ट्स दुर्घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह एक दूरस्थ पहाड़ी गाँव में पहुँच जाती है। वहाँ के लोग उसके परिचित नहीं हैं। वे उसके परिवार, सामाजिक स्थिति या अतीत के बारे में कुछ नहीं जानते। फिर भी वे उसकी देखभाल करते हैं और उसे अपनापन देते हैं।

कथा का यह मोड़ ध्यान देने योग्य है। जिस एला को अपने परिचित परिवेश में अकेलापन महसूस होता था, उसे अनजान लोगों के बीच आत्मीयता मिलती है। यह अनुभव एक सहज प्रश्न उठाता है, क्या संबंध केवल रक्त, विवाह और परिचय से बनते हैं? या मनुष्य की संवेदना भी ऐसा रिश्ता बना सकती है, जो कभी-कभी स्थापित रिश्तों से अधिक गहरा हो?

गाँव में एला धीरे-धीरे अपने भीतर लौटने लगती है। वह चित्र बनाती है। घरों और दीवारों को रंगों से सजाती है। बच्चों के साथ समय बिताती है। अपने वनस्पति-विज्ञान के ज्ञान से गाँव के लोगों की मदद करती है। उसकी प्रतिभा अब केवल उसकी निजी रुचि नहीं रहती। वह समुदाय के जीवन का हिस्सा बन जाती है। लोग उसके काम को महत्व देते हैं। उसे लगता है कि वह उपयोगी है और उसके होने का कोई अर्थ है।

मनुष्य को केवल भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए। उसे यह अनुभव भी चाहिए कि उसके जीवन का कोई उद्देश्य है। उसकी प्रतिभा का उपयोग हो रहा है। उसकी उपस्थिति किसी के लिए मायने रखती है। एला को गाँव में यही अनुभव मिलता है। वह दूसरों के जीवन में रंग भरते हुए अपने जीवन में भी रंग वापस ले आती है।

गाँव का अरलू उसे जापानी अवधारणा ‘इकिगाई’ से परिचित कराता है। इसका आशय उस उद्देश्य से है, जो हमें हर सुबह उठने का कारण देता है। जीवन में कोई ऐसा काम, संबंध या लक्ष्य होना, जिससे हम भीतर से जुड़े रहें। एला के लिए चित्रकला, बच्चों के साथ जुड़ाव और गाँव के लोगों की सहायता ऐसे ही उद्देश्य बन जाते हैं। उसे किसी बड़ी उपलब्धि की तलाश नहीं है। उसे अपने काम में अर्थ दिखाई देने लगता है।

उपन्यास का संदेश उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एला के अनुभवों के माध्यम से सामने आता है। अपने जीवन को अर्थ देने के लिए हमेशा किसी बड़ी सफलता या सामाजिक मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी किसी बच्चे को सिखाना, किसी घर की दीवार पर रंग भरना या किसी जरूरतमंद की सहायता करना भी जीवन को नई दिशा दे सकता है।

लेकिन इस कथा का वास्तविक संघर्ष तब सामने आता है, जब एला का बेटा अंकुर उसे खोजते हुए गाँव पहुँचता है। वह चाहता है कि उसकी माँ उसके साथ लौट चले। उसकी चिंता स्वाभाविक है। वह माँ से प्रेम करता है और उसे सुरक्षित देखना चाहता है। दूसरी ओर, एला अब उस जीवन में लौटने के लिए तैयार नहीं है, जिसमें वह अपनी पहचान खो बैठी थी। वह अंकुर को समझाती है कि गाँव ने उसे वह आत्मीयता और उद्देश्य दिया है, जिसकी उसे तलाश थी।

अंकुर के लिए माँ के निर्णय को स्वीकार करना आसान नहीं है। लेकिन वह कुछ समय गाँव में बिताता है। धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि उसकी माँ यहाँ सचमुच खुश है। अंततः वह उसके निर्णय का सम्मान करता है।

मेरी दृष्टि में यह उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर सामने आता है। हम अपने प्रियजनों के लिए निर्णय लेना चाहते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हम उनके लिए बेहतर जानते हैं। लेकिन क्या प्रेम का अर्थ उनकी ओर से जीवन चुनना है? या उनके निर्णय को समझने और स्वीकार करने का प्रयास करना भी प्रेम है?

एला का निर्णय हमें रिश्तों की एक नई व्याख्या की ओर ले जाता है। परिवार से जुड़ाव का अर्थ अपने व्यक्तित्व का विसर्जन नहीं होना चाहिए। किसी स्त्री का माँ या पत्नी होना उसकी पहचान का एक हिस्सा है, संपूर्ण पहचान नहीं। उसे अपनी रुचियों, अपने निर्णयों और अपनी खुशी के लिए भी जगह चाहिए। यह बात केवल स्त्रियों के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जो सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपने भीतर की आवाज खो देता है।

हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता और आत्मनिर्णय पर गंभीर लेखन हुआ है। मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती जैसी लेखिकाओं ने स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसकी आंतरिक दुनिया को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

 शिखा वार्ष्णेय की अस्मि इस व्यापक साहित्यिक विमर्श को आज के जीवन, प्रकृति और सामुदायिक संवेदना के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। इसकी विशेषता यह है कि एला की पहचान केवल विचार या विद्रोह से नहीं बनती। वह अपने काम, अपनी कला और दूसरों से जुड़ाव के माध्यम से स्वयं को खोजती है।

उपन्यास में पहाड़ी गाँव भी केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं है। वह ऐसे जीवन का प्रतीक है, जहाँ एला अपने व्यक्तित्व को व्यक्त कर पाती है। वहाँ सुविधाएँ कम हैं, लेकिन आत्मीयता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि गाँव का जीवन हर समस्या का समाधान है या शहर का जीवन संवेदनहीन है। उपन्यास का संकेत अधिक सूक्ष्म है। मनुष्य को ऐसा परिवेश चाहिए, जहाँ उसे सुना जाए, उसके काम का सम्मान हो और उसे अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता मिले।

यहाँ प्रकृति की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रकृति के निकट रहते हुए एला अपने भीतर की आवाज सुन पाती है। वह जीवन को केवल जिम्मेदारियों की सूची के रूप में नहीं देखती। उसे अपने आसपास के छोटे-छोटे कामों में आनंद मिलने लगता है। इस तरह उपन्यास आत्म-खोज को प्रकृति, कला और सामुदायिक जीवन से जोड़ता है।

अब प्रकाशक शिवना प्रकाशन की चर्चा भी जरूरी है। किसी पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाना साहित्यिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिवना प्रकाशन ने हिंदी की विभिन्न विधाओं में पुस्तकों के प्रकाशन के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाओं को भी मंच दिया है। प्रवासी साहित्य हिंदी को नए अनुभवों और नए परिवेश से जोड़ता है। भाषा किसी एक देश की सीमा में बंद नहीं रहती। वह जहाँ भी रची जाती है, वहाँ के जीवन और संवेदना से समृद्ध होती है। इस दृष्टि से ऐसे प्रकाशन और साहित्यिक आयोजन हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 मैं कहूँगा कि अस्मि का महत्व केवल एला की कहानी में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में है जो यह पाठक के सामने छोड़ती है। क्या हम अपने प्रियजनों को उनकी स्वतंत्र पहचान के साथ स्वीकार कर पाते हैं? क्या हम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपने लिए भी कुछ बचा पाते हैं? और क्या हम यह समझते हैं कि जीवन का अर्थ केवल दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करना नहीं है?

एला की यात्रा हमें याद दिलाती है कि स्वयं को पहचानना स्वार्थ नहीं है। यह अपने जीवन के प्रति सजग होना है। जब व्यक्ति अपने भीतर के संसार से जुड़ता है, तभी वह दूसरों से भी अधिक सच्चाई और संवेदना के साथ जुड़ पाता है।

‘अस्मि’ का सार शायद इसी एक वाक्य में है—मैं दूसरों के लिए हूँ, लेकिन मेरा अपना होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

शिखा वार्ष्णेय जी को इस संवेदनशील उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३८ – रिश्तों में खट्टास का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रिश्तों में  खट्टास का”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३८ ☆

☆  रिश्तों में  खट्टास का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

रिश्तों में खट्टास का, बढ़ता जाता रोग ।

समय अगर बदला नहीं, तो रोएँगे लोग ।।

*

लोभ मोह में लिप्त हैं, आज सभी इंसान ।

ऊपर बैठा देखता, समदर्शी भगवान ।।

*

अगला पिछला सब यहीं, करना है भुगतान ।

पुनर्जन्म तक शेष ना, कभी रहेगा जान ।।

*

जीवन का यह सत्य है, ग्रंथों का है सार ।

जो बोया तुमने सदा, वही काटना यार ।।

*

संस्कृति कहती है सदा, यह मोती की माल ।

गुथी हुयी उस डोर से,  टूटे ना हर हाल ।।

*

रिश्तों में बंधकर रहें, हँसी खुशी के साथ ।

बरगद सी छाया मिले, सिर पर होवे हाथ ।।

*

रिश्ते नाते हैं सदा, खुशियों के भंडार ।

सदियों से हैं रच रहे, उत्सव के संसार  ।।7

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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