(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तीरगी शब कीमिटाना है …“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – उकताहट…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “क्रेता…“।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – ट्रैफिक जाम।)
सड़क पर पहुँचते ही गाड़ियों की लंबी कतार दिखाई दी। हॉर्न पर हॉर्न बज रहे थे, मगर सड़क जैसे साँस लेना भूल गई थी।
ड्राइवर बोला, “मैडम, आगे जाम बहुत लंबा है। शायद एक्सीडेंट हुआ है।”
बहू दर्द से कराह उठी।
अरुंधति की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्होंने घड़ी देखी। अस्पताल अब कुछ ही दूरी पर था, मगर रास्ता जैसे मीलों लंबा हो गया था।
“भैया, कोई दूसरा रास्ता नहीं है?”
“पीछे भी गाड़ियाँ फँसी हैं, आगे भी। निकलना मुश्किल है।”
तभी अरुंधति की नजर सड़क किनारे खड़े एक बच्चे पर पड़ी। उसके पास साइकिल थी।
“बेटा, अपनी साइकिल दे दोगे? मेरी बहू बहुत तकलीफ़ में है। मैं उसे किसी तरह अस्पताल पहुँचा दूँगी। तुम्हारा पता दे देना, मैं साइकिल वापस पहुँचा दूँगी।”
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं आंटी, साइकिल आपको ही मुबारक। मैं पैदल चला जाऊँगा। वैसे भी मुझे इसी अस्पताल में जाना है… मैं वहाँ वार्ड बॉय हूँ।”
अरुंधति की आँखें भर आईं।
किसी तरह बच्चे की मदद से बहू अस्पताल पहुँची।
इलाज शुरू हुआ तो डॉक्टर ने कहा, “थोड़ी और देर होती तो मुश्किल हो सकती थी।”
अरुंधति अस्पताल की खिड़की से बाहर देखने लगीं। सड़क पर वही जाम अब भी लगा था।
उनके मन में एक सवाल कौंधा- “हमने शहरों को इतना बड़ा तो बना दिया कि आसमान छू लें, लेकिन रास्ते इतने छोटे क्यों कर दिए कि किसी की साँस अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही रुक जाए?”
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारीजी द्वारा संपादित “नाभिनाल का अटूट रिश्ता”पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१५ ☆
☆ “नाभिनाल का अटूट रिश्ता” – संपादक : ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/
मन का मुसाफ़िर (यात्रा वृतांत)
लेखक – अखंड गहमरी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ नाभिनाल का अटूट रिश्ता : स्मृति, ममत्व और मनुष्य होने की कविता – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
माँ को पढ़ना दरअसल उस मौन को पढ़ना है, जिसे जन्म से पहले से ही माँ पल पल स्वयं कष्ट सहकर भी आनंदित होती है और जीवन की कहानी लिखती चलती है।
माँ जीवन का अमर तत्व है। उस पर प्रायः प्रत्येक कवि ने लिखा है। मुझे स्मरण है कि जागरण समूह ने इंदौर से मां शीर्षक से एक भव्य लघुकथा संग्रह निकाला था।
मुझे अपनी मां के अवसान पर स्वयं मुखरित हुई रचना की पंक्तियां याद आती हैं
“घर के हर दर पर चंदन की खुश्बू सी ,लगती हो माँ
तुलसी बिरवे के चौरे पर
रौशन बाती सी उजरी हो माँ “
माँ और संतान का रिश्ता एक अदृश्य धागा है, जो जन्म के क्षण में भले ही शारीरिक रूप से अलग हो जाता है, लेकिन स्मृति, संवेदना और आत्मा के धरातल पर वह कभी विच्छिन्न नहीं होता।
ख़ुदेजा ख़ान और डाॅ. मयंक मुरारी द्वारा बहुत ही गम्भीर चिंतन से संपादित काव्य संकलन ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी शाश्वत संबंध को कविता के अनेक स्वरों में अनुभव करने का अवसर देता है।
यह पुस्तक केवल माँ पर लिखी गई कविताओं का ऐसा संग्रह है जो उस मानवीय अनुभव की साहित्यिक यात्रा है, जहाँ माँ एक व्यक्ति से आगे बढ़कर स्मृति, माटी, घर, त्याग, समय और अस्तित्व का रूपक बन जाती है।
विभिन्न कवियों की रचनाएँ इसी केंद्रीय भाव को अपने-अपने जीवनानुभवों , परिवेश और भाषिक संस्कारों के साथ अभिव्यक्त करती हैं
‘नाभिनाल’ जैविक संबंध का प्रतीक है, जबकि ‘अटूट रिश्ता’ उसके भावात्मक विस्तार का व्याख्यान। जन्म के बाद नाभिनाल कटती है, लेकिन क्या माँ से हमारा संबंध कभी कट सकता है? यही प्रश्न इस संकलन के शीर्षक को साधारण नाम से उठाकर एक दार्शनिक प्रस्तावना में बदल देता है।
माँ हमारे जीवन का पहला स्पर्श है, पहली भाषा है और संभवतः पहली ऐसी उपस्थिति भी, जिसके अर्थ को हम उम्र भर समझने का प्रयास करते रहते हैं। हम बड़े होते हैं, घर बनाते हैं, अपनी सफलताओं का संसार रचते हैं, लेकिन हमारे भीतर कहीं एक बच्चा अपनी माँ की आवाज, उसकी हथेली और उसकी प्रतीक्षा में सदैव ठहरा रहता है।
इस संकलन की कविताएँ इसी ठहरे हुए बच्चे तक पहुँचने का रास्ता बनाती हैं।
ब्रज श्रीवास्तव की कविता ‘सबसे पहले माँ’ माँ की पारंपरिक छवि को एक आत्मीय और धरती से जुड़ी हुई व्याख्या देती है—
“माँ केवल माँ नहीं है सुखद उपस्थिति है किसी जज़्बात की”
और आगे कवि लिखते हैं—“माँ कोई जन्नत नहीं है वह तो खालिस धरती है ,धरती पर मौजूद घर का ओसारा है।”
इन पंक्तियों में माँ को किसी अमूर्त आदर्श या दूरस्थ स्वर्ग के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की ठोस, रोजमर्रा की सुरक्षा के रूप में देखा गया है। ओसारा यहाँ घर का वास्तु-तत्व , विश्राम, आश्रय और अपनत्व का स्थान है। जीवन की तपिश भरी धूप से लौटकर मनुष्य जहाँ स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है, वही माँ का भावलोक है।
कविता का दार्शनिक सौंदर्य इस बात में है कि वह माँ को पूजनीय बनाने के बजाय पहले मनुष्य के जीवन में उसकी वास्तविक उपस्थिति को पहचानती है।
माँ की आवाज, उसकी चिंता और उसकी परवाह करना, ये सभी हमें स्वयं से प्रेम करना सिखाते हैं।
माँ को समझना , एक ऐसी भाषा,होती है जिसे पढ़ा नहीं जा सकता, वह अनुभव होती है।
भरत प्रसाद की कविता ‘कोई और धातु की होती है-माँ’ मातृत्व को असाधारण शक्ति और रहस्य के रूप में देखती है। कवि लिखते हैं— “गलती से भी मां को परखने की गलती मत करना उसके भीतर छिपी रहती हैं अज्ञात लिपियाँ”
यहाँ माँ एक ऐसी किताब बन जाती है, जिसके अक्षर सामान्य बौद्धिक उपकरणों से नहीं पढ़े जा सकते। मातृत्व को कवि प्रकृति द्वारा लिखी गई एक विशिष्ट भाषा कहते हैं—“मिट्टी की भाषा की तरह।”
इस कविता का भावात्मक केंद्र उस स्वीकार में है कि माँ को जानना केवल उसके कार्यों की सूची बना लेना नहीं है। उसके त्याग, धैर्य और मौन की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन उसकी संपूर्णता को नाप पाना कठिन है।
कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस अनुभूति को और गहरा करती हैं
“जीते जी हद से ज्यादा मिट जाने की कला है- मां होना।।”
माँ होने को मिट जाने की कला कहना एक मार्मिक दार्शनिक बिंब है। यह मातृत्व के समर्पण की ओर संकेत करता है, यद्यपि माँ को केवल आत्म-विलोपन तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। माँ की पहचान उसके अपने सपनों, संघर्षों और व्यक्तित्व से भी बनती है। इस दृष्टि से कविता पाठक को मातृत्व के त्याग के साथ उसके मानवीय विस्तार पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
शायद मां अपने सपने अपनी संतान में साकार करती है।
संग्रह की एक और कविता नरेंद्र गौड़ की ‘माँ का संदूक’ स्मृति को किसी बड़े दार्शनिक वक्तव्य में नहीं, बल्कि एक घरेलू वस्तु में खोजती है। पिता द्वारा संदूक पर लिखे गए माँ के नाम से कविता आरंभ होती है— “आइलपेंट से टेढ़ मेढ़े अक्षरों में संदूक पर छोड़ गए माँ का नाम”
माँ का संदूक परिवार की संपत्ति से कहीं अधिक उसकी सामूहिक स्मृति का पात्र बन जाता है। माँ के जाने के बाद उसके कपड़े, आभूषण और उपयोग की वस्तुएँ अचानक भावनात्मक और आर्थिक मूल्य के बीच खड़ी दिखाई देती हैं।
कविता का व्यंग्यात्मक और करुण पक्ष तब सामने आता है, जब भाई संदूक को लेकर अपनी आजमाइश करते हैं। जिस माँ ने परिवार के लिए अपने आभूषणों तक को बचाकर नहीं रखा, उसकी बची हुई वस्तुओं में संतानें अपने हिस्से का अर्थ खोजती हैं।
यहाँ संदूक एक वस्तु नहीं रह जाता, वह परिवार के बदलते मूल्यों का आईना बन जाता है। माँ की स्मृति के भीतर छिपे त्याग को समझने की जगह मनुष्य जब वस्तुओं के मूल्य में उलझ जाता है, तब कविता एक मौन प्रश्न छोड़ जाती है, क्या भावना और स्मृतियों का भी बँटवारा किया जा सकता है?
मिथिलेश रॉय की कविता ‘अपनी कथा में’ माँ को उसकी संतान की माँ होने से पहले एक स्वतंत्र बचपन वाली लड़की के रूप में देखने का प्रयास करती है। वह अपने पोते-पोतियों को खेलों, नदी और स्कूल की स्मृतियाँ सुनाती है।
कविता में माँ का बचपन धीरे-धीरे सामने आता है, वह लंबी दौड़ जीतती थी, नदी पार करती थी, तितली की तरह उड़ती थी। फिर विवाह और सामाजिक बंधनों की स्मृति उस कथा में प्रवेश करती है। “तब इतना बड़ा घूँघट लेना पड़ता था हमें ससुराल में”
बच्चों का उस घूँघट को देखकर हँसना और माँ का अपनी कथा के बीच रुक जाना कविता को एक गहरी संवेदनात्मक ऊँचाई देता है। उसके बाद— “रुंध जाता है उसका गला , भरने लग जाती है मां की आवाज।”
यहाँ कविता केवल अतीत का वर्णन नहीं करती, वह पीढ़ियों के बीच अनुभवों की दूरी को सामने लाती है। जिस माँ को बच्चे केवल माँ के रूप में जानते हैं, उसके भीतर एक लड़की, एक विद्यार्थी, एक स्वप्नदर्शी और एक संघर्षशील स्त्री भी समाई हुई थी।
कविता हमें याद दिलाती है कि किसी व्यक्ति को उसके संबंधों की एकमात्र भूमिका में देखना उसके पूरे अस्तित्व को देखना नहीं है।
अमरजीत की कविता ‘चिराग़ जैसी मां’ माँ की अनुपस्थिति को शहर के सामान्य जीवन के बीच रखती है। माँ के जाने के बाद शहर में सब कुछ पहले जैसा चलता रहता है, लोग काम पर जाते हैं, कारखाने चलते हैं, सड़कों पर भीड़ रहती है। लेकिन परिवार के भीतर एक ऐसी रिक्तता उत्पन्न हो जाती है, जिसे बाहरी दुनिया नहीं देख पाती।
कविता के अंत में आता है— “सिर्फ एक माँ के नाम का चिराग है बुझा हुआ।”
यह बिंब अत्यंत प्रभावी है। शहर की रोशनियों के बीच माँ के नाम का बुझा चिराग निजी शोक और सार्वजनिक सामान्यता के अंतर को प्रकट करता है। दुनिया चलती रहती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लिए समय का अर्थ बदल जाता है।
माँ की मृत्यु के बाद स्मृति ही वह दीपक बनती है, जिसके सहारे मनुष्य अतीत से संवाद करता रहता है।
इस संकलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न भाषायी और भौगोलिक पृष्ठभूमियों के कवियों का सम्मिलन है। असमिया और उड़िया सहित अलग-अलग क्षेत्रों के कवि मातृत्व के अनुभव को अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों और भाषिक संवेदनाओं के साथ भिन्न भिन्न रचनाओं में व्यक्त करते हैं।
मानस रंजन महापात्र की कविता ‘माँ के लिए आकाश के सपने’ में माँ धरती और आकाश के बीच फैली हुई एक विराट उपस्थिति बन जाती है— “आकाश के चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है मेरी माँ!”
माँ और माटी का यह संबंध भारतीय संवेदना में गहरी जड़ें रखता है। मिट्टी हमें जन्म देती है, पोषित करती है और अंततः अपने भीतर समाहित कर लेती है। कविता इस चक्र को मातृत्व की स्मृति से जोड़ती है।
कवि आगे कहते हैं— “धरती के शब्द सारे असमर्थ हैं तेरा नाम लिखने को।”
इन पंक्तियों में अतिशयोक्ति के माध्यम से उस भाव को व्यक्त किया गया है, जहाँ माँ के प्रति प्रेम सामान्य शब्दावली की सीमा से बाहर चला जाता है। अनुवाद के माध्यम से यह अनुभव एक भाषिक सीमा से दूसरी भाषा तक पहुँचता है और संकलन को व्यापक भारतीय काव्य-संवेदना से जोड़ता है।
मधु सक्सेना की कविता ‘बंजारन माँ’ , माँ की गृहस्थी को एक छोटे टीन के बक्से में समेटती है। कुछ कपड़े, एक शाल, पति की तस्वीर और बच्चों के लिए तावीज, ये वस्तुएँ माँ के जीवन के भौतिक विस्तार को दर्शाती हैं।
कविता की खूबी यह है कि वह माँ की स्मृतियों को भव्यता से नहीं, सामान्य घरेलू विवरणों से रचती है। उसके हाथों से बने पकवान, व्रत, बच्चों की चिंता और नाती-पोतों को देखकर झुकी कमर का गर्व, ये सब मिलकर एक ऐसी स्त्री की छवि बनाते हैं, जिसके जीवन में संघर्ष और स्नेह साथ-साथ चलते हैं।
माँ के लिए परिवार केवल वर्तमान नहीं है; वह उसकी स्मृतियों, आदतों और प्रार्थनाओं में भी उपस्थित रहता है।
‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ का महत्त्व उसके विषय की भावुकता भर में नहीं, बल्कि इस बात में है कि माँ को देखने के लिए इसमें अनेक दृष्टियाँ उपलब्ध हैं। कहीं माँ धरती है, कहीं संदूक में सुरक्षित स्मृति, कहीं बचपन खो चुकी लड़की, कहीं चिराग और कहीं ऐसी भाषा, जिसका पूर्ण अनुवाद संभव नहीं।
यह विविधता पुस्तक को एकरेखीय भावुक संकलन बनने से बचाती है। हालाँकि मातृत्व पर लिखी कविताओं में पुनरावृत्त भाव-बिंबों की संभावना स्वाभाविक है, फिर भी अलग-अलग कवियों की निजी स्मृतियाँ इस विषय को नए कोण प्रदान करती हैं। इस प्रकार पुस्तक का साहित्यिक मूल्य केवल उसके भावनात्मक प्रभाव में नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद सामाजिक, पारिवारिक और दार्शनिक प्रश्नों में भी है।
माँ को याद करना यहाँ अतीत में लौटना भर नहीं है। यह स्वयं से पूछना भी है कि हमारी वर्तमान जीवन-व्यवस्था में उस व्यक्ति के लिए कितना स्थान बचा है, जिसने हमारे अस्तित्व के निर्माण में सबसे पहली भूमिका निभाई।
नाभिनाल से स्मृति तक , पढ़ते हुए लगा कि कविता का काम हमेशा उत्तर देना नहीं होता। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न जगा देती है, जिनके साथ हम चुपचाप घर लौटते हैं।
माँ को लेकर लिखी गई कविताएँ हमें भावुक करती हैं, लेकिन उससे आगे जाकर वे हमें अपने व्यवहार, अपनी स्मृतियों और अपने संबंधों पर विचार करने का अवसर देती हैं। माँ के प्रति प्रेम केवल स्मरण का विषय नहीं, जीवन में निभाए जाने वाले दायित्व का प्रश्न भी है।
नाभिनाल जन्म के समय कटती है, पर उसकी स्मृति मनुष्य की चेतना में जीवन भर बनी रहती है। शायद इसीलिए माँ को याद करते हुए हम केवल अपनी माँ को नहीं पुकारते, हम अपने भीतर के उस आरंभ को पुकारते हैं, जहाँ से हमारी मनुष्यता ने पहली साँस ली थी।
‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी आरंभ की कविता है। एक ऐसा काव्य-संसार, जहाँ माँ स्मृति भी है, माटी भी, मौन भी और मनुष्य होने का पहला अर्थ भी है।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बदल गया है आज जमाना”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३५ ☆
☆ छल प्रपंच की आड़ ले… ☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९३ ☆ देश-परदेश – मीठा ज़हर ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हमारे जीवन में किसी सुविधा या शॉर्ट कट आरंभ में तो सरल प्रतीत होता हैं। कुछ समय बीत जाने के पश्चात जब उस सुविधा का शुल्क लग जाता है, या शुल्क में बढ़ोतरी होती है, वो हमें अखरने लगती हैं। इंटरनेट, मोबाइल आदि के साथ भी ऐसा ही हुआ था। जियो ने आरंभ में मुफ्त सुविधा देकर, लत लगा दी थी। बैंक ने भी मुफ्त ए टी एम कार्ड दिए थे, बाद में वार्षिक शुल्क और अब तो सीमा से अधिक उपयोग पर भी जेब ढीली करनी पड़ रही हैं।
उपरोक्त कार्टून यु पी आई द्वारा प्रस्तावित शुल्क को लेकर हैं। एक दशक पूर्व बेरोजगार हुए जेब कतरे अब वापिस आस लगाए बैठे हैं, कब जनता जेब में नगद राशि लेकर बाज़ार में निकलेगी, तब वो पुराने धंधे में लौट आयेंगे। ए टी एम कार्ड आदि आने पर भी दो दशक पूर्व बहुर सारे जेब कतरे भी इस प्रोफेशन को छोड़ कर सोने की चेन खींचने आदि व्यवसाय से जुड़ गए थे।
पुलिस थानों में भी पुराने जेब काटने वालों की फाइल्स रिकॉर्ड रूम से निकलवा ली हैं। मुखबिरों को भी उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए कहा गया हैं। शेयर बाजार के मंजे हुए खिलाड़ी ब्लेड निर्माताओं की कंपनियों में तेज़ी की संभावना लगाए हुए हैं।
यू पी आई में शुल्क लगने के कारण बैंक में कार्यरत लोग भी कुछ परेशान प्रतीत हो रहे हैं। वर्षों तक पेट्रोल पंप, मदिरा विक्रेता, जिंसों के थोक व्यवसाय से जुड़े लोग बहुत अधिक मात्रा में प्रतिदिन करेंसी नोट जमा करवाते थे। बैंकर्स का बहुत सारा समय उनको गिनने या सॉर्टिंग करने में निकल जाता था। कोविड के बाद से ऑनलाइन के कारण प्रतिदिन नगद राशि के उपयोग में बहुत अधिक गिरावट हुई थी। इस कारण बैंकर्स भी थोड़ी राहत महसूस कर रहें थे।
केंद्रीय बैंक को भी अब और अधिक नोट छापने पड़ेंगे, बैंकर्स के यहां भी नगद जमा और भुगतान का कार्य बढ़ेगा। फटे पुराने नोट बदलने के व्यवसाय आदि से जुड़े लोगों का भी अच्छे दिनों का इंतजार समाप्त हो जाएगा।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता “हिन्दी अनुरागी”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७८ ☆
🌻कविता🌻 हिन्दी अनुरागी🌻
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हिन्दी अनुरागी बनें, रहे हिन्द का नाम।
हिन्दी में बातें करें, भारत भूमि धाम।।
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है सुघर मधुर सुंदर बोली, बावन सखियों की हमजोली।
इत -उत डोले पल-पल बोले, हिन्दी शब्द मकरंद घोले।।
हलचल करती पवन हिलोरें, मात्रा सुंदर लगती डोरे।
इन्द्रधनुष सी आभा न्यारी, भाषा लय बाधी है प्यारी।।
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भाषा इसकी है भली, करें सदा सम्मान।
ह्दय भाव से जोड़ती, सबका रखती ध्यान।।
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ज्ञानी कहते महिमा जानो, हिन्दी को सब अपना मानों।
खूब करें जन-जन की सेवा, छंद विधा के गणपत देवा।।
कोकिल कंण करें उच्चारण, गीत संगीत की है तारण।
माँ की ममता होती लोरी, लचक- मचक चलती है गोरी।।
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भाव भरी ये पावनी, सहती हरदम पीर।
कब आयेगा पावन पल, हिन्दी होगी हीर।।
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नैन निहारे तकती राहें, भरती रहती अपनी आहें।
कलम चलाओ हिन्दी धारी, तुम अब बन जाओ गिरधारी।।
कसकस थाथें हिन्दी आशा, राष्ट्र बचायें हिन्दी भाषा।।
धर्म कर्म की सुंदर वाणी, हिन्दी है जग की कल्याणी।।
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कानों में रस घोलती, मीठी सी पहचान।
आओं गढ़ ले आज हम, गर्वित दृढ अभिमान।।
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छम-छम बाजें पांवो झांझर, सात सुरो की पहनी घाघर।।
बैलों की घंटी की छुन- छुन, मीठी हिन्दी बाजें रुनझुन।।
लिख- लिख बांचे कविवर प्यारा, बढ़ता हिन्दी भाईचारा।
निकली लेकरआँचल ममता, इसकी नजरों में है समता।।
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धूँ- धूँ जलती आग में, देख रही सब ओर।
अपने मुझको थाम ले, लाज बचाओं छोर।।
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बना देह कंचन है मोती, पावन रिश्ते यही पिरोती।
आओं कर ले मीठी बातें, खूब कटेगी अपनी रातें।।
गंगा यमुना रेवा सरिता, बनी श्रेष्ठ हिन्दी शुभ वरिता।