(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…५।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०१ ☆
☆ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
आज
आम आदमी
संत्रस्त है, परेशान है
और है बेहद दुखी,
धैर्य के धिक्कार से
सहिष्णु मन भी
आतुर है
बन जाने को ज्वालामुखी।
याद आ रहा है
एक पुराना गीत-
‘मन के हारे हार है
मन के जीते जीत! ‘
गीत, आखिर गीत होता है
खण्डहर में गूँजते गीत से
आदमी भयभीत होता है।
हम,
खण्डहर में खड़े खड़े
भयभीत होते जा रहे हैं-
हमारी नियति-
होठों से गिरकर
पत्थर पर लिखे गीत होते जा रहे हैं।
हमारे नाकनक्श भूख
तराशे हैं,
हकीकत ये है –
हम कई दिनों से उपासे हैं, प्यासे हैं,
और
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “प्राण पखेरू उड़े अचानक...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “प्राण पखेरू उड़े अचानक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – वरिष्ठ नागरिक।)
☆ चुभते तीर # १३९ – व्यंग्य – वरिष्ठ नागरिक☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
सभागार के वातानुकूलित कमरे के मुख्य द्वार पर अठहत्तर साल के विश्वंभर दयाल अपनी लाठी टेकते हुए सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में जरी के गोटे वाला एक पुराना पीला शॉल और मखमली डिब्बे में रखा एक सूखा हुआ मुरझाया गुलाब का फूल रहता था जिसे वे अपनी हथेली पर रखकर लगातार सहलाते रहते थे। सभागार का नया सुरक्षाकर्मी जब भी उन्हें गेट के पास बैठा देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर पटकते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “बाबा जब आज इक्कीस अगस्त को वरिष्ठ नागरिक दिवस के मौके पर बड़े साहब खुद नए शॉल और सम्मान बांटने आ रहे हैं तो इस फटे पुराने शॉल को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अधिकारियों के आगे नुमाइश क्यों लगाते हो।” विश्वंभर दयाल अपनी पुरानी ऐनक के धुंधले शीशे को धोती से पोंछते और बहुत धीमी आवाज़ में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह जरीदार कपड़ा केवल रेशम का टुकड़ा नहीं है बल्कि इस पूरे समाज की उस अंधी संवेदनहीनता का वो ढोंग है जिस पर साल में सिर्फ एक दिन भाषणों की माला पहनाई जाती है।” सभागार में आने वाले तमाम मुंशी और युवा कार्यकर्ता उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में बाबा की मति मारी गई है जो सम्मान के इस पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चले हैं।” विश्वंभर दयाल किसी की कड़वी बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को अपनी कांपती उंगलियों से संभालते और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।
सभागार के तमाम कर्मचारी विश्वंभर दयाल की इस मूक उपस्थिति से पूरी तरह परिचित हो चुके थे और उन्हें एक सनकी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। आयोजन समिति का बड़ा सचिव जब भी गुलदस्तों और मोमेंटो का ढेर लेकर मुख्य मंच की तरफ बढ़ता तो विश्वंभर दयाल बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस बुजुर्ग पेंशन और भरण-पोषण वाले कागज़ पर साहब की मुहर लग गई।” सचिव गुस्से में अपने चश्मे को ठीक करते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक डिजिटल पोर्टल पर सत्यापन पूरा नहीं होगा और तहसील से नई रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस पुराने शॉल को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” विश्वंभर दयाल बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस मखमली डिब्बे के ढक्कन को बार-बार खोलने और बंद करने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे। शहर के लोग आपस में खुसर-पुसर करते कि शायद बाबा अपने बेटे से संपत्ति का कोई पुराना विवाद सुलझाने के लिए यह स्वांग रच रहे हैं लेकिन किसी को भी उस सूखे गुलाब और वरिष्ठ नागरिक दिवस के इस भव्य तमाशे के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी थाह नहीं लग पा रही थी।
दोपहर में अचानक जिले के नए जिलाधिकारी महोदय और समाज कल्याण अधिकारी वरिष्ठ नागरिक दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह का उद्घाटन करने सभागार पहुँच गए। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए रेड कारपेट बिछाया जाने लगा ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और बुजुर्गों के सम्मान में कसीदे पढ़ने के बाद जब जिलाधिकारी महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र मुख्य द्वार के कोने में शांत बैठे विश्वंभर दयाल पर पड़ी जिनकी गोद में वही पीला शॉल और सूखा गुलाब रखा था। अपनी जनप्रिय और संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए साहब तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर विश्वंभर दयाल के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हम आप जैसे पूज्य बुजुर्गों को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है जिसे मैं तुरंत हल करवाऊँ क्या आपको वृद्धावस्था सम्मान का लाभ नहीं मिल रहा है।” विश्वंभर दयाल ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब को देखा और अपने कांपते हाथों से वह पीला शॉल और सूखा गुलाब साहब की हथेली पर रखते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस शॉल के कोने पर छपा हुआ नाम और यह सूखा हुआ फूल पहचान लीजिए।”
साहब ने जब उस शॉल के कोने पर सुनहरे धागों से लिखी इबारत को पढ़ा तो उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया और हाथ कांपने लगे क्योंकि उस पर पिछले साल का तारीखवार सरकारी सम्मान और खुद उनके अपने दस्तखत दर्ज थे। विश्वंभर दयाल की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस सूखे गुलाब पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब ठीक पिछले साल इसी इक्कीस अगस्त को आपने इसी मंच पर मुझे जिले का सबसे सम्मानित वरिष्ठ नागरिक घोषित करके यह शॉल और फूल पहनाया था। लेकिन अगले ही दिन जब मेरे अफ़सर बेटे ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया तो मैं आपके दफ्तर में भरण-पोषण कानून की अर्जी लेकर साल भर भटकता रहा और आपके बाबू मुझसे फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत मांगते रहे। मैं भूखा प्यासा फुटपाथ पर सोता रहा और कोई भी अफ़सर मेरी सुध लेने नहीं आया। मैं आज यह सरकारी शॉल और सूखा फूल आपको वापस लौटाने आया हूँ ताकि आपकी इस व्यवस्था को बता सकूँ कि साल में तीन सौ चौसठ दिन लावारिस छोड़ दिए जाने वाले बूढ़े बाप को साल के सिर्फ एक दिन मंच पर शॉल ओढ़ाकर देवता बना देना ही इस सभ्य समाज का सबसे घिनौना मज़ाक है।” यह सुनते ही जिलाधिकारी का सिर शर्म से पूरी तरह झुक गया और पूरे सभागार में ऐसा सन्नाटा छा गया जिसने वहाँ खड़े हर इंसान के ज़मीर को झकझोर कर रख दिया।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चिंगारी…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘राम कथा है अमृत वाणी…‘।)
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४८ ☆
☆ व्यंग्य ☆ बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
देश के मशहूरो-मारूफ़ शिक्षा संस्थान बेमिसाल यूनिवर्सिटी ने 20 जून को एक विज्ञप्ति निकाली जिसमें घोषणा की गयी कि यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए दो नये रोज़गारोन्मुख पाठ्यक्रम आरंभ करने जा रही है जिनका उद्घाटन राज्य के माननीय राज्यपाल के कर कमलों द्वारा शीघ्र होगा।
विज्ञप्ति में कहा गया कि पिछले साल यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए पन्द्रह दिन का अति उपयोगी ‘उपला मेकिंग‘ कोर्स चला चुकी है जो बहुत लोकप्रिय हुआ और जिसमें छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। विशेषकर छात्राओं का मत था कि यह कोर्स साधारण पढ़ाई की तुलना में बहुत दिलचस्प और उपयोगी साबित हुआ।
यूनिवर्सिटी ने अब निम्नलिखित दो उपयोगी पाठ्यक्रमों के आरंभ होने की घोषणा की है जिनकी अवधि एक वर्ष होगी और जिनमें सफल छात्रों को डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। विज्ञप्ति में यह विश्वास दिलाया गया कि ये पाठ्यक्रम छात्रों को नौकरी या व्यवसाय करने में बहुत सहायक सिद्ध होंगे।
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इस पाठ्यक्रम को हिन्दी में ‘चाटुकारी का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जाएगा। यूनिवर्सिटी में बहुत समय से यह शिद्दत से महसूस किया जा रहा था कि- कोरी शिक्षा और डिग्री से जीवन में सफलता और तरक्की हासिल करना मुश्किल है। पढ़-लिख कर आदमी नौकरी तो पा सकता है, लेकिन प्रोमोशन के लिए कुछ और गुण आवश्यक महसूस होते हैं, वर्ना काबिल लोग पांव पीटते रह जाते हैं और चतुर गधे बुलन्दी पर पहुंच जाते हैं। इसी तरह बिज़नेस में ऊंचाई हासिल करने के लिए सत्ता के रसूखदारों को साधना ज़रूरी होता है, जिसके लिए चाटुकारी अत्यावश्यक होती है। इसलिए शैक्षणिक योग्यता में ठकुरसुहाती या ब्याजस्तुति की गोटा-किनारी लगाना ज़रूरी है। राजाओं के ज़माने में यह काम भाटों और चारणों के द्वारा किया जाता था।
इस पाठ्यक्रम के सफल संचालन के लिए यूनिवर्सिटी देश के शीर्षास्थ चाटुकारों को ‘विज़िटिंग प्रोफेसर’ के रूप में आमंत्रित करेगी। सौभाग्य की बात है कि देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। अनेक जन-प्रतिनिधि इस कला में सिद्ध हैं। नेता के मुख से कोई प्रस्ताव निकलते ही तुरंत समर्थन में हाथ उठाते हैं। सोचने-समझने की ज़रूरत नहीं। इन्हें देखकर एक फिल्मी गीत याद आता है— ‘जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।’ हमारे बॉलीवुड में इस कला में सिद्ध अनेक कलाकार बैठे हैं। एक बुज़ुर्ग कलाकार सार्वजनिक रूप से गर्व के साथ अपने को एक बड़े नेता का ‘चमचा’ घोषित कर चुके हैं। समझदार फिल्म निर्माता ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनसे सरकार खुश हो और टैक्स में छूट मिले, भले ही समाज में ज़हर फैले। इस गुण से संपन्न अनेक मीडिया चैनल भी हैं जिन्हें ‘गोदी मीडिया’ नाम से विभूषित किया गया है।
कुछ लोगों में चाटुकारी की नैसर्गिक प्रतिभा होती है। वे हवा का रुख देखते ही अपने व्यवहार में पलटी मारते हैं। बनारस विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर साहब ने गोबर के उपले बनाने का प्रशिक्षण दिया, और इस तरह छात्रों के दिमाग़ में भरपूर गोबर भरा। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की प्रिंसिपल महोदया ने अंतरात्मा की पुकार पर छात्रों के क्लासरूम की दीवारों को गोबर से पुतवा दिया। परिणामत: छात्रों ने वही सलूक प्रिंसिपल महोदया के ऑफिस के साथ किया।
एक महंत जी हैं जो प्रभु के निर्देश पर एक राजनीतिक पार्टी में प्रवेश कर गये। फिर प्रभु के निर्देश पर दूसरी पार्टी में चले गये। फिलहाल वे अपनी नयी पार्टी के नेता में बुद्ध, महावीर और गांधी की छवि देख रहे हैं।
विज्ञप्ति में कहा गया कि भगवान भी अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं। अजामिल की कथा इसका प्रमाण है। इसीलिए चतुर लोग मन में भक्ति न होते हुए भी मुंह से नारायण का जाप करते रहते हैं ताकि उन्हें भी धोखे से स्वर्ग में ‘एंट्री’ मिल जाए।
यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में निष्कर्ष स्वरूप कहा गया कि संसार की बड़ी बाधाओं को चाटुकारी के अमोघ अस्त्र से जीता जा सकता है, और अन्त में रामायण की चौपाई उद्धृत की— ‘सकल पदारथ हैं जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं।’ मतलब यह कि जो जन चाटुकारी नहीं कर पाते, उन्हें संसार में कुछ नहीं मिलता। वे मुट्ठी बांधे आते हैं और हाथ पसारे संसार से विदा हो जाते हैं।
एडवांस्ड कोर्स इन डिस्सिम्युलेशन :-
इस कोर्स को ‘वाक्छल का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जा सकता है। यह भी बहुत उपयोगी और ज़रूरी पाठ्यक्रम है, ख़ासकर राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए। राजनीति में जनता को छलने और उनका वोट लेने के लिए बड़े-बड़े वादे करने पड़ते हैं। फिर वादे पूरे न होने पर जब जनता जवाब मांगती है तो वाक्छल की कला जान छुड़ाने के लिए बहुत काम आती है। जब जनता देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पूछने लगती है तो मंत्री जी फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की बात करने लगते हैं। एक जन- प्रतिनिधि को देखा जो अपने चुनाव-क्षेत्र गये थे। जब जनता उनके सामने अपनी शिकायतें रखने लगी तो नेताजी मुट्ठी उठाकर ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ के नारे लगाने लगे। इसके बाद वे कार में बैठकर वहां से फुर्र हो गये।
जनसेवा के जज़्बे से भरे नेताओं को कई बार दुखी मन से दल बदलना पड़ता है। तब जनता का सामना होने पर वाक्छल की कला बहुत काम आती है।
वाक्छल का उत्तम नमूना महाभारत में युधिष्ठिर का वक्तव्य था जिसमें वे गुरु द्रोण को अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार देते समय ‘अश्वत्थामा हत:‘ के पीछे ‘नरो वा कुंजरो वा’ जोड़ देते हैं।
अफसरों को भी जनता की शिकायतों का सामना करते समय अपना और अपने आकाओं का बचाव करना पड़ता है। इसके लिए जनता को नाना प्रकार से बहलाना और बहकाना पड़ता है। जब जनता के तर्कों का जवाब नहीं सूझता तो अफसर अंग्रेजी और कथा वाचक संस्कृत बोलने लगते हैं। पंडितों के मंत्रों के बारे में एक लेख में परसाई जी लिखते हैं— ‘जिन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, वे अगर संस्कृत से हिन्दी में कर दिये जाएं तो प्राइमरी स्कूल की किताब के लायक हैं।’
यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि हमारे देश में वाक्छल में माहिर लोग बड़ी संख्या में हैं। देश में ज़्यादातर लोगों के अल्पशिक्षित होने के कारण इस कला में माहिर लोगों की जनता को बहलाने में सफलता निश्चित रहती है। यूनिवर्सिटी ने लिखा कि वह इस कला में उच्च योग्यता प्राप्त विद्वज्जन को आमंत्रित कर छात्रों को इस कला में दीक्षित करेगी।
विज्ञप्ति के अन्त में लिखा गया कि यूनिवर्सिटी आगे भी इसी प्रकार छात्रोपयोगी पाठ्यक्रमों का अन्वेषण कर छात्रों का हित करने के उपक्रम में सन्नद्ध रहेगी।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– बेबाकी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ११९ — बेबाकी —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
महात्मा गांधी संस्थान में साथ करने वाला हमारा एक मित्र कहता था सभी लेखक विद्वान नहीं होते। संस्थान में हम दो तीन लिखने वाले थे और वह लिखने वाला नहीं था। गजब यह कि वह यह कहते लड़ाई जैसे तेवर से हम पर हावी हो जाता था। तब मेरी पक्षधरता लेखकों के लिए ही होती थी। पर अब मुझे लगता है उतनी बेबाकी से कहने वाले उस मृत आदमी की समाधि पर श्रद्धा के दो फूल चढ़ा आऊँ।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३५३ ☆
☆ दरवाज़े… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆
एक समय था जब लोगों के घरों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते थे। समय के साथ विचार बदले, स्थितियाँ बदलीं और अब अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद रहने लगे हैं।
सुरक्षा की दृष्टि से दरवाज़ा बंद रखना समकालीन आवश्यकता हो सकता है। तथापि स्थूल का प्रभाव, सूक्ष्म पर भी होता है।
एक प्रसंग सुनाता हूँ। एक धनी व्यक्ति एक महात्मा के पास आया। धनी का महल आलीशान था। उसके मन में इच्छा हुई कि अपना महल महात्मा को दिखाए। बहुत ना-नुकर के बाद महात्मा उसका महल देखने के लिए राजी हो गए। धनी ने जब अपना महल महात्मा को दिखाया तो वे हँस पड़े। धनी आश्चर्यचकित हुआ। फिर तनिक नाराज़गी के साथ बोला, ” महात्मन! यह दुनिया का सबसे सुरक्षित महल है।” महात्मा ने पूछा, “कैसे?” धनी बोला,” मैंने इसके सारे दरवाज़े चुनवा दिये हैं। इसमें केवल एक ही दरवाज़ा रखा है जिसके चलते शत्रु का भीतर प्रवेश करना असंभव-सा हो चला है।” इस बार महात्मा ठहाका लगाकर हँसे। फिर बोले, ” यह एक दरवाज़ा भी क्यों छोड़ दिया? यदि इसे भी बंद कर दो तो शत्रु का तुम तक पहुँचना असंभव-सा नहीं अपितु असंभव ही होगा।” धनी ने महात्मा के ज्ञान के कई प्रसंग लोगों से सुने थे। उसे लगा, सारे प्रसंग झूठे हैं। महात्मा तो सामान्य बात भी समझ नहीं पाते। सो चिढ़कर बोला, “महात्मन, यदि यह एकमात्र दरवाज़ा भी बंद कर दिया तब तो मेरे प्राण जाना निश्चित है। ऐसी सूरत में यह महल, महल न रहकर कब्र में बदल जाएगा।” इस बार गंभीर स्वर में महात्मा बोले, ” जब तुझे बात का भान है कि एक दरवाज़ा बंद करने से तेरी मृत्यु हो जाएगी तो इतने सारे दरवाज़े बंद करके कितनी बार मर चुका है तू?”
ध्यान देनेवाली बात है कि दरवाज़े सर्वदा बंद रखने के लिए होते तो बनाये ही क्यों जाते? उनके स्थान पर भी दीवारें ही खड़ी की जातीं।
दरवाज़े बार-बार खुलते रहने चाहिएँ, ताज़ा हवा का झोंका भीतर आते रहना चाहिए। खुले दरवाज़ों से नयापन और ताज़गी भीतर आते रहते हैं, प्रफुल्लता बनी रहती है।
…अंतिम बात, घर के हों या मन के, यह सूत्र दोनों प्रकार के दरवाज़ों पर लागू होता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆