हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५४ – तनकीद के पहले… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना  – तनकीद के पहले।)

☆ हेमंत साहित्य # ५४ ☆

✍ तनकीद के पहले… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना, मनाना, मनाते रहना

 *

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

 *

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

 *

अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना,  फकीरों को खिलाते रहना

 *

मिल जाए गर कोई नाख़ुश, नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

 *

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

तीरगी       =  अंधकार, तनकीद     = उपदेश देना

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆ कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “राम और कृष्ण एक ही हैं“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆

✍ कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नाम में श्याम बसे हैं,

श्याम में रघुनाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

कभी अयोध्या में राम बने वो,

कभी गोकुल के श्याम।

एक ने धनुष उठाया जग में,

एक ने बजाई बांसुरी मधुर नाम॥

 

रूप बदलकर आए जग में,

एक ही उनकी बात।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

राम बने मर्यादा पुरुषोत्तम,

श्याम प्रेम अवतार।

एक ने रावण का संहार किया,

एक ने कंस संहार॥

 

धर्म की रक्षा करने वाले,

दोनों दीनानाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

सीता-राम की पावन महिमा,

राधे-श्याम का प्यार।

एक में त्याग और तपस्या,

एक में रस की धार॥

 

भक्तों के हित दोनों दौड़े,

पकड़ कर प्रेम का हाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

राम कहूँ या कृष्ण पुकारूँ,

दोनों सुनते पुकार।

नाम अलग पर ज्योति वही है,

एक ही पालनहार॥

 

सत्येंद्र मन हरि में रमे तो,

मिट जाएँ सब घात।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अरे! देवर जी तुम कब आ गए आश्चर्य पूर्वक कमल जी ने कहा।

“अपनी भाभी भाई के घर में आने के लिए क्या मुझे कोई इजाजत लेनी पड़ेगी या कार्ड छपवाना पड़ेगा” नवीन बोला।

कमल जी ने कहा – “नहीं नहीं भैया मैं ऐसा नहीं बोल रही इतने दिनों तक आपने दर्शन नहीं दिया आज अचानक आप आए इसलिए मैंने ऐसा कहा।“

“भाभी भैया कहाँ है?” नवीन बोला।

“तुम्हारे भैया 13वीं का इंतजाम करने के लिए बाजार गए हैं” कमल जी ने कहा।

नवीन बोला- “तुम लोगों ने घर और खेत ले लिया है मेरे पास सिर्फ मेरा हिस्सा और दुकान है सब चीजों का बंटवारा तो हो जाना चाहिए।”

कमल जी ने कहा- “ठीक है देवर जी मैं भी यही चाहती हूँ लेकिन दुकान और घर का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो आपके ही कब्जे में है जहाँ आप हमें जाने भी नहीं देते अभी पिताजी को गुजरे दो ही दिन हुए हैं। हम पर पहाड़ टूट पड़ा है और आप हमें आकर इस तरह बोल रहे हैं कम से कम 13 दिन तो रुक जाना था।”

नवीन बोला “भाभी रोने धोने का नाटक तो तुम बहुत अच्छा कर लेती हो गरीब बनाकर सबसे हमदर्दी लेकर पूरे समाज में हमारी बदनामी कर रही हो कि हमने सबसे ज्यादा हिस्सा ले लिया।”

रोते हुए कमला ने कहा – “अब हमारा तुम्हारा कैसा नाता चले जाओ अभी मैं तुमसे बात करने के मूड में नहीं हूँ, कुछ दिन बाद हम आराम शांति से बैठेंगे दीदी लोग को  बुला लेंगे।  दो बहने भी है तुम्हारी और फिर तय करेंगे कि किसी क्या मिलना चाहिए सारी पिताजी की विरासत में तुम्हारा ही हक  है।”

नवीन ने कहा- “ठीक है देखता हूँ, कैसे तुम सब हिस्सा लेते हो? नवीन गुस्से से बड़बड़ाता हुआ गया।”

कमल जी कहती है कि “हे भगवान इस दुनिया में क्या रिश्ते नाते जिंदा है? जाना सबको है छोड़कर लेकिन फिर भी लोग कैसे लड़ते हैं।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१३ ☆ आहे तर आहे… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१३ ?

☆ आहे तर आहे ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

तो नाही माझा तरी पण

आकर्षण… आहे तर आहे

ही प्रीती कसली,

खुळा मोहाचा क्षण …आहे तर आहे

गोपाळा आहेस

 वेणूच्यानादा मध्ये बुडलेला

मातीची नांगरण करण्या

संकर्षण… आहे तर आहे

येथे नाही राहिले–

कोणावाचूनी कोणाचे रे

आयुष्या, नशिबी अटळशी

ही वणवण.. आहे तर आहे

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २३ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २३ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

रविंद्रनाथांचे वडील देवेंद्रनाथ टागोर यांचा जन्मदिवस १५ मे. रविंद्रनाथांच्या जडणघडणीत त्यांच्या वडिलांचा फार मोठा वाटा आहे. म्हणूनच आज आपण त्यांच्याविषयी थोडी माहिती घेऊ या.

महर्षी देवेंद्रनाथ टागोर (ठाकूर) म्हणून प्रख्यात असलेले बंगाली समाजसुधारक, प्रखर राष्ट्रवादी, गद्याकार आणि ब्राम्हो समाजाचे अध्वर्यू देवेंद्रनाथ हे राजा (प्रिन्स) द्वारकानाथ टागोरांचे ज्येष्ठ पुत्र.

देवेंद्रनाथांचा जन्म कलकत्ता येथे त्यांच्या जोड़ासाँको भागातील प्रसिद्ध वडिलोपार्जित वाड्यात १५ मे १८१७ रोजी झाला.

ठाकूर कुटुंबाचे मूळ आडनाव कुशारी. वर्धमान जिल्ह्यातील ‘कुश’ हे त्यांचे मूळ गाव. फार पूर्वी तेथून या कुटुंबाने यशोहर गावी स्थलांतर केले. कालांतराने जातीबहिष्कारामुळे आपले यशोहर (जेसोर) गाव सोडून महेश्वर व शुकदेव हे त्यांचे पूर्वज कलकत्त्याच्या दक्षिणेला गोविंदपूर गावी स्थायिक झाले. पुढे पंचानन कुशारी ह्या पूर्वजाने ईस्ट इंडिया कंपनीच्या कामाचे ठेके घ्यायला सुरुवात केली.

त्या काळी ब्राह्मणेतर लोक ब्राह्मणांना ‘ठाकूर मोशाय’ अशा बहुमानार्थी नावाने संबोधीत. इंग्रज कप्तानांनी ‘ठाकूर’ चा ‘टागोर’ असा उच्चार केला. ईस्ट इंडिया कंपनीच्या बरोबर टागोर कुटुंबाचीही भरभराट झाली. इंग्रज व्यापारी, राज्यकर्ते आणि ज्ञानोपासक ह्यांच्यात वावर असणाऱ्‍या नव्या सरंजामदारांत टागोर घराण्याचाही अंतर्भाव झाला. त्यांपैकीच राजा राममोहन रॉय, यांनी बंगालच्या सामाजिक प्रबोधनाची चळवळ सुरू केली. त्यांच्या भूमिकेशी रवींद्रनाथांचे आजोबा द्वारकानाथ एकरूप झाले. सार्वजनिक कार्याला त्यांनी केवळ आर्थिकच नव्हे, तर स्वतः उत्तम कायदेपटू आणि व्यासंगी असल्यामुळे वैचारिक परिवर्तनाच्या कार्यातही भाग घेऊन साहाय्य केले.

द्वारकानाथ टागोर हे राजा राममोहन रॉय यांचे सहकारी होते. त्यामुळे देवेंद्रनाथांना लहानपणापासूनच राजा राममोहन रॉय यांचे सान्निध्य लाभले. बालवयात तसेच किशोरवयातही ते राजा राममोहन रॉय यांच्या विद्यालयात शिकले. बुद्धिमान विद्यार्थी म्हणून त्यांची विद्यालयात ख्याती होती. वयाच्या चौदाव्या वर्षी त्यांचा शारदा देवींशी विवाह झाला. त्यांचे महाविद्यालयीन शिक्षण कलकत्याच्या हिंदू महाविद्यालयात झाले. राजा राममोहन रॉय यांचे कनिष्ठ पुत्र, देवेंद्रनाथांचे सहाध्यायी होते. बंगाली ब्राह्मोसमाजाच्या स्थापनेत आणि प्रसारात त्यांचा फार मोठा वाटा आहे.

राजा राममोहन रॉय यांच्या नंतर देवेंद्रनाथ ब्राम्हो समाजाचे अध्वर्यू बनले व त्यांनी समाजाच्या कार्याला उत्कृष्ट वळण दिले. त्यांनी एकेश्वरवादाचा (एकाच ईश्वराची पूजा) प्रसार केला.

(अपूर्ण-उरलेला भाग पुढील भागात)

—–

गीत : ६७

THOU art the sky and thou art the nest as well.

O thou beautiful, there in the nest it is thy love that encloses the soul with colours and sounds and odours.

There comes the morning with the golden basket in her right hand bearing the wreath of beauty, silently to crown the earth.

And there comes the evening over the lonely meadows deserted by herds, through trackless paths, carrying cool draughts of peace in her golden pitcher from the western ocean of rest.

But there, where spreads the infinite sky for the soul to take her flight in, reigns the stainless white radiance. There is no day nor night, nor form nor colour, and never, never a word.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत: ६७

*

खोपा तो प्रेमाचा

रंग गंध स्वरांचा

सजविलास साचा

आत्म्यासाठी॥

*

किरणांची झारी

सौंदर्याच्या हारी

प्रभातीची परी

धरणीसाठी॥

*

गर्द अशा वनी

संध्या, गायरानी

संदेशा घेऊनी

शांतीसाठी॥

*

वेळ संपताची

अंतीम मार्गाची

प्रभुच्या प्रेमाची 

वाट मिळे॥

*

रात ना दिवस

रंग नाही वास

चीर विश्रांतीस

स्थानासाठी॥

*

अनंत अंतराळ

तेज मायंदाळ

शब्दहीन पोकळ

आत्म्यासाठी॥

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—–

गीत : ६८

THY sunbeam comes upon this earth of mine with arms outstretched and stands at my door the livelong day to carry back to thy feet clouds made of my tears and sighs and songs.

With fond delight thou wrappest about thy starry breast that mantle of misty cloud, turning it into numberless shapes and folds and colouring it with hues ever changing.

It is so light and so fleeting, tender and tearful and dark, that is why thou lovest it, O thou spotless and serene. And that is why it may cover thy awful white light with its pathetic shadows.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत: ६८

सहस्त्र बाहूंनी रश्मी तुझ्या,

मम धरेवर पसरती

सांज होई तो माझ्या दारी,

त्या उभ्या असती

मम अश्रू नि उसासे,

मेघरूपी घेऊन जाती 

त्या मेघांसह मम गीतांना,

तव चरणी अर्पिती 

मेघांची त्या तरल आवरणे,

तुजला आवडती

देशी त्यांना आकार विविध,

रंगछटा किती

तारांकित ती दुलई घेशी,

प्रेमभराने वक्षावरती

तू पावन, प्रसन्न अन् दुलई

 प्रेमळ, अलवार ती

प्रखर तव प्रकाश अन् 

करुण त्या छाया झाकिती

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९४५०२२८६५८

—–

गीत : ६९

THE same stream of life that runs through my veins night and day runs through the world and dances in rhythmic measures.

It is the same life that shoots in joy through the dust of the earth in numberless blades of grass and breaks into tumultuous waves of leaves and flowers.

It is the same life that is rocked in the ocean-cradle of birth and of death, in ebb and in flow.

I feel my limbs are made glorious by the touch of this world of life. And my pride is from the life-throb of ages dancing in my blood this moment.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत: ६९

*

नसानसांतून माझ्या वाहे

अशी अविरत जीवन सरिता

लयबद्ध नृत्य करिते जी 

साऱ्या विश्वातून वाहता

*

तीच उगवते धरतीमधुनि 

अन् सळसळते, पर्णफुलातुनि

जन्ममृत्युच्या चक्रातुन फिरते

भरती ओहोटीस जसे घडते 

*

तेज फाकते मम गात्रातुनि

जीवन स्पर्शाच्या जादूने

अभिमान नाचतो धमनीमधुनि

युगायुगांच्या स्पंदनाने

– क्रमशः भाग २३

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४७ – बुन्देली कविता – ”जो दारू के दास हो गए” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जो दारू के दास हो गए।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४८ ☆

☆  बुन्देली कविता – जो दारू के दास हो गए ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

 जो दारू के दास हो गए

घर के सत्यानाश हो गए

 *

मौड़ा-मौड़ी खबीब पढ़त राय

पैलें नम्बर पास हो गए

 *

हिम्मत कर लो, हार न मानो

तुम तौ अबइ निराश हो गए

 *

स्थान की अब कदर होत नई

मानों कूड़ा-घास हो गए

 *

जब से सारे जंगल कट गय

ओझल कहाँ पलास हो गए

 *

बीस महल, लाखों झोपड़ियाँ

ऐंड़ आइ, विकास हो गए

 *

भिनकत रैन कुठरिया में बे

‘भगवत’ जिन्दा लाश हो गए

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मुसल्सल देखते जाना नज़र में इश्क़ का काजल

नहीं होना कभी भी तुम हमारी आँखों से ओझल

 *

उतरकर आँखों में देखो गिराँखातिर कि गहराई

हजारो हैं वहाँ तूफाँ बरसते है कहीं बादल

 *

उसी में है रवादारी उसे कमजोर मत समझो

सवारे जो यहाँ गुलशन उसे नादाँ कहें पागल

 *

नहीं है दोश भी कोई परिन्दे कैद है फिर भी

गिरेबाँ में जरा झाँको कफ़स में बंद है कोयल

 *

नहीं हिम्मत किसी में थी करे मैला यहाँ दामन

नहीं धब्बा जरासा भी रखा है पाक ये आँचल

 *

उसे पत्थर समझ बैठा नजर ने दे दिया धोखा

नहीं हीरा समझ पाया कहाँ का जौहरी कायल

 *

जवानी का ढला सूरज बुढापा पार करना हैं

अकेले हैं वहाँ जाना जहाँ पर ले चले पायल

 

मुसल्सल = एकटक, गिराँखातिर = उदासी, रखादारी = सहनशीलता, कफ़स = पिंजरा

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०२ ☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है प्रो. अरुण कुमार भगत जी द्वारा लिखित  “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तकपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०२ ☆

☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक ..’संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक’

लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत (सदस्य , बिहार लोक सेवा आयोग, पटना)

प्रकाशक: वाणी प्रकाशन , नयी

दिल्ली

मूल्य : 325 रु, पृष्ठ 160

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।

\संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरुआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुजरना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है ।

 संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है ।संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।

मेरा मानना है कि शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97)

शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

संपादन का शिल्प-विधान और शैली-पुस्तिका (पृष्ठ 98-108) संपादन में ‘शैली’ (Style Book) का क्या महत्व है, इस पर लेखक ने विशेष बल दिया है। भाषा-शैली की एकरूपता और शुद्धता ही किसी प्रकाशन की पहचान बनाती है। यह खंड भाषाई अनुशासन के प्रति लेखक की आदर्श प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

संपादन-प्रक्रिया, विलोम पिरामिड से चित्र-संपादन तक (पृष्ठ 109-140)  अध्याय सबसे अधिक तथ्यात्मक और क्रियात्मक है। इसमें ‘आमुख (Lead) की बनावट’, ‘विलोम पिरामिड शैली’ (Inverted Pyramid) और ‘समाचार का पुनर्गठन’ जैसे गंभीर विषयों पर नवाचारी चर्चा की गई है। साथ ही, ‘चित्र-संपादन’ का समावेश यह बताता है कि विजुअल मीडिया के दौर में एक संपादक की आँखें कितनी पैनी होनी चाहिए।

मुझे स्मरण है कि मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार ‘ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था, लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे , पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई, और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।

आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया । जब तक एक खबर पर भरोसा करो , उसका खंडन आ जाता है। खबरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टि कोण से यह किताब अध्ययन मनन और सीखने , पढ़ते , गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।

मेरी समझ में असंपादित न्यूज की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गई थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है।

पुस्तक में पृष्ठ-सज्जा और अभिकल्प (पृष्ठ 141-160) पर पूरा अध्याय है।

पुस्तक का समापन ‘पृष्ठ-सज्जा’ (Page Layout) के संतुलन और सौंदर्यबोध के साथ होता है।

एक संपादक को केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि रिक्त स्थान और विजुअल बैलेंस का भी ज्ञान होना चाहिए, यह इस खंड का मुख्य संदेश है। प्रकाशन रीडर्स फ्रेंडली होना चाहिए। छोटे अक्षरों में बेतहाशा पठनीय सामग्री उड़ेल देना उचित नहीं होता।

यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।

प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तार पूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है।

पत्रकारिता जगत से जुड़े  हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है । किताब संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला में पारंगत बनाती  है।

पुस्तक अमेजन पर सुलभ है। संदर्भ हेतु अपने स्टडी सेल्फ में रखने की अनुशंसा अपने पाठकों को करता हूं।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆

गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम।

आजादी की जली मशालें,गाया वंदेमातरम।।

*

बंकिमचंद्र चटर्जी जी ने, लिखी वंदना राष्ट्र की।

गाया हम सबने मिल करके, मंत्रित वंदेमातरम।।

*

हमने जननी जन्म भूमि को, माँ का दर्जा दिया सदा।

मातृभूमि की बलिवेदी में, वंदित वंदेमातरम।।

*

उत्तर पूरब पश्चिम दक्षिण, दश दिशाओं को भाया।

भाषा की टूटी दीवारें, गूँजा वंदेमातरम।।

*

धर्म कहाँ तब आड़े आया, दिल को आजादी भाई।

मिल कर गाया एक स्वरों में , सबने वंदेमातरम।।

*

सुदृढ़ अब अर्थ व्यवस्था, देश प्रगति करता यारो।

विश्व अग्रणी बने देश यह, गाएँ वंदेमातरम।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ – कविता – कहाँ हो माँ? ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है मातृ दिवस पर विशेष “कहाँ हो माँ? ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ ☆

🌻कविता 🌻 कहाँ हो माँ? 🌻

(विधाता छंद)

*

कहाँ हो माँ जरा सुन लो, तुम्हारी याद आती है।

घड़ी भर नींद का झोका, लगा आँचल सुलाती है।।

बजे धड़कन जरा सुन लो, अभी आँखे भरी मेरी।

यहीं है माँ तुझे देखूँ, लगे आवाज है तेरी।।

*

बनी दुनिया यहाँ मेरी, नया अनुभव सभी पाया।

बिताया फूल सा जीवन, सदा आँचल बनी छाया।।

समय की मार भी देखा, खड़ी हर जुल्म से सीखा।

कहीं बातें सदा मीठी, सही बातें बड़ी तीखा।।

*

ह्दय में प्रेम की गंगा, सदा ममता भरी बोली।

सजाया है यही घर को, कहे दुनिया बड़ी भोली।।

भरी है मांग लाली से, सजी कंचन सदा गहना।

पिता के साथ देखी है, सदा ही संग में बहना।।

*

सुनाती लोरियाँ मीठी, लगा बचपन अभी आया।

पुरानी बात है सारी, तुझे ढूँढा नही पाया।।

बनी जो हाथ की रोटी, सदा मुँह स्वाद है मेरा।

बनाई माँ मुझे बिटिया, करूँ आभार मै तेरा।।

*

विधाता खेल है रचता, लिखी हूँ आज मै गाना।

कहाँ ढूँढूँ तुम्हें मै तो, जरा मुझको बता जाना।।

मिली है प्रेम की पाती, यही तेरी निशानी है।

बता तुझको लिखूँ कैसे, सभी बातें कहानी है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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