(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है नवरात्र पर्व पर विशेष कविता “शुभ नवरात्रे”।)
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९६ ☆ देश-परदेश – World Mental Health Day: 10 Oct. ☆ श्री राकेश कुमार ☆
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस विगत 1992 से मनाया जाना आरंभ हुआ था। इस का तात्पर्य तो, ये हुआ उससे पूर्व हम सबका मानसिक स्वास्थ्य ठीक ही रहता होगा।
हमें याद आती है, अपनी युवावस्था जब घर के बड़े हमेशा ये ही कहते, थकते नहीं थे, कि आज की औलादों का तो दिमाग ही खराब हो गया है।
आज हम भी अपने बच्चों को ये ही तो कह रहें है, कि ये तो अलग तरह की पीढ़ी है। इतनी बिगड़ी हुई है, कभी सोचा भी नहीं था। जेन जी की भाषा और हाव भाव देख सुन कर हमारी आयु वर्ग के लोगों के दिमाग का दही बन जाता है।
हमारे पिताश्री ने घर में पहली बार टीवी को देखकर एक माह तक हमसे बात नहीं करी थी। आज टीवी के नेटफ्लिक्स चैनल पर स्तरहीन भाषा और दृश्यों को देखकर हमने भी अपने बच्चों का एक माह बहिष्कार किया था।
देखा जाय, तो मानसिक स्वास्थ्य को खराब करने के लिए समय समय पर नए नए कारण मिलते हैं। हम आज को पहचानने के स्थान पर अपना पुराना समय और परिस्थितियों में अटके रहते हैं। वर्त्तमान को नकार कर पूर्वकाल के साये से निकल नहीं पाते हैं।
आज का समय यू ट्यूब, फेस बुक से भी बहुत आगे जा चुका हैं। आने वाला समय और कुछ लाएगा। ये सिलसला सतत चलता रहेगा।
हमारे कुछ करीबी मित्र तो हमारे मुंह पर ये भी कह देते है, कि हमारा दिमाग कुछ हिल गया है, इसलिए प्रतिदिन कुछ भी लिख कर व्हाट्स ऐप पर पोस्ट करते रहते हैं। भले ही कोई पढ़े या ना पढ़ें।
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “प्राण पखेरू उड़े अचानक...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३०१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “प्राण पखेरू उड़े अचानक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ।)
☆ शेष कुशल # ७० ☆
☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…”– शांतिलाल जैन ☆
लोकतंत्र जम्बूदीप में भी है. जाहिर है वहाँ एक संसद भी है और संसद की कार्यवाही को कवर करनेवाले न्यूज़ चैनल भी. यू-ट्यूब पर उपलब्ध ऐसे ही एक चैनल के बुलेटिन का ट्रांसक्रिप्ट कुछ इस प्रकार है.
“नमस्कार. मैं हूँ अनाम और आप देखना शुरू कर चुके हैं दी जम्बूदीप टाइम्स. सरकार ने आज संसद में दो अधिनियम प्रस्तुत किए, जिन्हें भारी हंगामे के बीच बिना बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया. आज के बुलेटिन में हम दोनों कानूनों पर विस्तार से बात करेंगे.
पहला है मिनिमम वेजेस फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून के तहत देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को एक करोड़ रुपए रोज़ाना की न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान की गई है. इसे हर पाँच साल में संशोधित किया जाएगा और प्राइस इंडेक्स के अनुसार इसमें वृद्धि की जा सकेगी. उद्देश्य है रिच लाइफ़ स्टाइल में जीवनयापन के लिए एक तयशुदा बुनियादी आय का भरोसा दिलाया जाना.
दूसरा है वेल्थ क्रिएशन एंड एसेट होल्डिंग फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून में देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को उनके क़ब्ज़े में अब तक आ चुकी राष्ट्र की चालीस प्रतिशत संपदा में कमी नहीं आने देने की गारंटी प्रदान की गई है. उद्देश्य है अमीरों को गरीब होने से बचाना. कानून यह सुनिश्चित करेगा कि कल को आर्थिक समानता लाने की सनक में कोई सिरफिरा जननायक अमीरों की संपदा कम न कर बैठे.
सूत्र बताते हैं कि अंदरखाने सरकार चिंतित है कि कुछ बिजनेस टाइकून्स और टॉप सीईओज की इनकम और सैलरी लगातार घट रही है. कहीं कहीं तो यह पचपन लाख रुपए प्रतिदिन तक रह गई है. जबकि उनकी फैक्ट्रियों में मजदूरों की आय पंद्रह बेसिस पॉइंट के इज़ाफ़े के साथ तीन सौ पंद्रह रुपए रोज़ हो गई है. ऐसे में सुपर रिच सेगमेंट को शोषण से बचाने की जरूरत महसूस की जा रही थी. प्रस्तावित क़ानून यह देखेगा कि बिजनेस टाइकून्स की इनकम बेंच मार्क इनकम से कम न होने पाए. यदि ऐसी स्थिति निर्मित होती है तो शासन इंसेटिवाइज करके अंतर की राशि की आपूर्ति करेगा. बिल पेश करते हुए सरकार ने इसे कल्याणकारी राज्य की दिशा में एक जनहितकारी कदम बताया है.
कॉर्पोरेट फंडेड थिंक टैंक के एक अर्थशास्त्री से हमने कुछ देर पहले बात की. उन्होंने जम्बूदीप टाइम्स को बताया कि सुपर रिच परिवार इन दिनों फाइनेंशियल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. एक करोड़ रुपए रोज़ की मामूली आमदनी से घर खर्च बमुश्किल निकल पाता है. निजी विमान से यात्रा का खर्च, विदेशों में होने वाली कांफ्रेसेज का खर्च, प्राईवेट आईलैंड पर हॉलिडेईंग का खर्च और परिवार में परिणय-प्रसंग पड़ जाए तो चार-पाँच हज़ार करोड़ की मामूली सी रकम में सादगी से निपटाने की मजबूरी. स्थिति इतनी गंभीर है कि पाँच सितारा होटल्स में दो जून की रोटी का खर्च निकालपाना दुश्वार होता जा रहा है. अधिनियमों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित जम्बूदीप बनाने के लिए गरीबों को अमीरों के पक्ष में त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. सरकार के विधिक सलाहकारों का अभिमत है कि तीन सौ रुपए रोजाना कमाने की लक्झरी में जी रही पचास प्रतिशत आबादी स्वेच्छा से कुर्बानी न दे तो शासन क़ानून बनाकर ऐसी कुर्बानी ले सकता है, लेना भी चाहिए. गरीब और मध्यम वर्ग की कुर्बानियाँ जीएसटी के रूप में हो सकती हैं. बढ़ी हुई आयकर की दरों के रूप में या सर्विस चार्जेज के रूप में भी हो सकती है, जल, जंगल, जमीन के अधिग्रहण के रूप में भी.
अधिनियम पारित होने के बाद जननायक ने प्रेस से बात करते हुए कहा है कि आर्थिक समानता की बात करनेवाले बुद्धिजीवी जम्बूदीप में अराजकता फैलाना चाहते है. पचास प्रतिशत आबादी के पास देश की संपदा का छह प्रतिशत हिस्सा अभी भी है. यह विलासिता है. संपत्ति रखने की उसे जरूरत ही क्या है? रोज़ कमाना रोज़ खाना है. पाँच किलो अनाज हम दे ही रहे हैं, उतना अपने पास रखकर शेष अमीरों में बाँट देना चाहिए.
अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सरकार ने एक रोडमैप भी बनाया है. मान लो किसी बड़े घराने की संपदा घटने लगी तो सरकार उसे एक दो हवाई अड्डे देगी, कुछेक सी-पोर्ट दे देगी, कुछ खदानें, नॉमिनल दरों पर जमीन और कॉर्पोरेट टैक्स में छूट देकर उन्हें गरीब होने से बचाएगी. लोन के डिफाल्टर हुए तो नब्बे प्रतिशत से ज्यादा का हेयरकट देकर भी उनके सुपर रिच स्टेटस की रक्षा करेगी. सरकार अपनी प्राथमिकताएँ समझती है, अमीरों को और अधिक अमीर बनाना सरकार की प्राथमिकताओं में हमेशा ही शुमार रहा है.
अधिनियम के प्रावधानों में कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेष्ठीजनों में वर्गीकरण नहीं किया गया है. जो कुशल है वो धनाढ्य भी हो यह जरूरी नहीं है. जो धनाढ्य है वो कुशल है. प्रस्तावित अधिनियम में संरक्षण पाने का अधिकारी है. इस अधिनियम में कार्य घंटे और कार्य दिवस भी परिभाषित नहीं किए गए है. ‘वंस ए अमीर इज आलवेज ए अमीर’ के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है. विपक्ष ने इन दोनों अधिनियमों का विरोध किया है लेकिन हमने अपनी पड़ताल में पाया है कि जब वे ट्रेझरी बेंच पर क़ाबिज़ थे तब उनकी नीतियाँ भी प्रो-रिच-सुपर-रिच ही रहीं. बहरहाल, पूरे जम्बूदीप में सरकार के इन क़दमों का स्वागत किया जा रहा है. सुपर रिच खुश तो हैं लेकिन न्यूनतम दैनिक आय एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ रुपए रोज़ाना करने की मांग भी कर रहे हैं.
दोनों अधिनियमों पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ. अभी के लिए बस इतना ही. नमस्कार”
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक व्यंग्य “नरेन्द्र और देवराज इंद्र”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆
नारायण – नारायण कहते हुए नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने आइये ऋषिवर, कहां से आगमन हुआ कहते हुए नारद जी का स्वागत किया। नारद मुनि बोले – प्रभु पृथ्वी पर स्थित आपके प्रिय जम्बुद्वीप का भ्रमण करके लौट रहा हूं। वहां की अराजक स्थिति को देखकर अत्यंत दुखी हूं। जनता में हाहाकार मचा है। देश की केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों के बढ़ते टैक्सों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिसके पास धन और सत्ता है वे सुख भोग रहे हैं। गरीबों, कमजोरों पर तरह – तरह के अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिभा और योग्यता दर – दर भटक रही है, गधे पंजीरी खा रहे हैं। दबंगों के साथ – साथ अनेक साधु वेशधारी भी महिलाओं से दुष्कर्मों में लिप्त हैं। झूठ और फरेब का बोलबाला है। देवी – देवताओं के वंशज पथ भ्रष्ट हो गए हैं। धन्वन्तरि के वंशज चिकित्सा के क्षेत्र में, कुबेर के वंशज व्यवसाय में, बुद्धि दाता गणेश के वंशज मीडिया और न्याय में, विश्वकर्मा के वंशज तकनीक और नवनिर्माण में, माँ अन्नपूर्णा के वंशज कृषि और अनाज के क्षेत्र में लूट और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। प्रभु आपने ही बताया था कि धरती पर शांति और अनुशासन के लिए एक ही परम शक्ति ने अलग – अलग रूपों में जन्म लिया है। फिर देवी – देवताओं और अन्य धर्मों के प्रमुखों के नाम पर भोली – भाली जनता को भ्रमित करके क्यों लड़वाया और लूटा जा रहा है ? प्रभु अब जम्बुद्वीप पर आपके पुनः जन्म लेने का समय आ गया है। विष्णु जी बोले – ऋषिवर मैं यह कार्य अनेक बार कर चुका हूं, अब इसे कोई अन्य देवता करे। नारद मुनि निराश होकर देवराज इंद्र के दरबार में पहुंचे। उन्होंने देवराज को जम्बुद्वीप की हालत और विष्णु देव से मुलाकात की जानकारी दी। नारद की बात पर देवराज ने मुस्कुराते हुए कहा – हे ऋषिवर भारतवासियों और पड़ोसी देशों के समाचारों से हम सभी देवता चिंतित हैं। “देव सरकार” भी विष्णु जी से जम्बुद्वीप पर अवतार लेकर वहां पुनः व्यवस्था कायम करने का आग्रह कर चुकी है, किंतु विष्णु जी का कथन भी सही है कि वे यह कार्य अनेक बार कर चुके हैं, अतः अब किसी अन्य देवता को भेजा जाए। ऋषिवर विष्णु जी के धरती पर अनुभवों को देखते हुए हमने उनसे अनुरोध किया है, हमें विश्वास है कि वे एक बार फिर जम्बुद्वीप पर अवतार लेने राजी हो जाएंगे। वैसे भी उनका “कल्की अवतार” लेना अभी बाकी है।
नारद मुनि ने नारायण – नारायण कहते हुए गहरी सांस ली और बोले – प्रभु कहीं विष्णु जी को पहुंचने में देर न हो जाए। जम्बुद्वीप में इन दिनों नरेंद्र नामक व्यक्ति सर्वोच्च पद पर आसीन है, कोई अमित उनका सारथी है। ये दोनों ही तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी हैं। नरेंद्र तो चक्रवर्ती सम्राट बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसने पूरे जम्बुद्वीप को एक रंग में रंग दिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सहित विश्व के तमाम बड़े – छोटे देशों को अपनी वाणी से मोह लिया है, चीन पर भी डोरे डाल रहा है। जम्बुद्वीप का सारा विपक्ष भी एकजुट होकर उसका मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रहा है। यदि नरेंद्र के विजय रथ को शीघ्र नहीं रोका गया तो अनर्थ हो जाएगा। चिंतातुर देवराज बोले – हे ऋषिवर स्पष्ट बोलें – क्या अनर्थ हो जाएगा ?
नारद मुनि ने पुनः गहरी सांस ली और कहा – प्रभु जम्बुद्वीप के चंद राज्य ही उसके ध्वज से बचे हैं। जैसे ही वह संपूर्ण जम्बुद्वीप पर अपना ध्वज लहराकर और सम्पूर्ण विश्व के नेताओं को जादू की झप्पी दे देकर चक्रवर्ती सम्राट बनेगा वैसे ही उसकी नजर आपकी कुर्सी पर होगी। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि वह बहुत चतुर है। उसके पास अमित जैसा कुशल सारथी और “मामा” जैसे घोषणा वीर हैं। नारद की बातों से चिंतित देवराज अपना आसन छोड़ विष्णु जी से मिलने रवाना हो गए। वे नहीं चाहते थे कि कलयुग में कोई धरती पुत्र इतना शक्तिशाली हो जाए कि उसके कारण इंद्रासन डोलने लगे।
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माता के दरबार में…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘किसी का यहां कोई नहीं…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # १२७ ☆
☆ किसी का यहां कोई नहीं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा – ‘प्रेम-प्यार‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५० ☆
उस कार्यक्रम में शायद वह कहीं पीछे बैठा था। वहां से उठकर ठीक मेरे पीछे वाली कुर्सी पर आ गया, फिर गर्दन लंबी करके बोला, ‘नमस्ते चाचाजी।’
मैं चौंका। यहां ‘चाचा जी’ संबोधन करने वाला कौन आ गया? उसे सात-आठ साल बाद देख रहा था। मैंने पूछा, ‘कैसे हो? यहां कैसे?’
वह बोला, ‘मैं तो डेढ़ साल से इसी शहर में हूं। किसी दिन आपसे मिलने आने वाला ही हूं। अभी तक नहीं आ पाया।’
फिर बोला, ‘चाची जी की डेथ के बारे में पता चला था। बहुत भली थीं। अ ग्रेट लेडी। मुझे तो बेटे जैसा मानती थीं। उनकी बहुत याद आती है। आई कैन नेवर फ़ॉरगेट हर। वाइफ़ भी आप लोगों को बहुत याद करती है।’
वह थोड़ी देर तक अफ़सोस में सिर हिलाता रहा, फिर बोला, ‘बेटे दोनों कैसे हैं? अब तो बड़े हो गये होंगे।’
मैंने कहा, ‘हां, अभी दोनों कॉलेज में हैं।’
वह सिर हिलाता बैठा रहा। पंद्रह सोलह साल पहले वह किसी रिश्तेदार का पत्र लेकर नौकरी के लिए मेरे शहर आया था और मेरे घर पर दस-पंद्रह दिन रहा था। मेरी पत्नी ने उसे खूब लाड़ से रखा था। फिर उसने किराये पर मकान ले लिया था। कुछ दिन बाद उसकी शादी हो गयी थी और वह गृहस्थ हो गया था। उसके बाद उसका मेरे घर आना कम होता गया था। वह कब शहर छोड़ कर चला गया मुझे पता ही नहीं चला। पता चला उसने पुरानी नौकरी छोड़ दी थी। शहर छोड़ने के बाद उसने मुझसे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की थी।
उसके दोस्तों से मालूम हुआ कि वह कई बार उनकी शादियों में शरीक होने के लिए शहर आया था, लेकिन वह कभी मुझसे नहीं मिला। लेकिन अभी वह मेरे पास बैठा पुरानी बातों को खोद खोद कर निकाल रहा था।
बात करते-करते वह हंसने लगा, बोला, ‘आपके आर्टिकिल पढ़ता रहता हूं। बहुत मज़ा आता है। साथियों को बताता हूं कि आप मेरे पिता जैसे हैं। मुझे बहुत स्नेह करते हैं।’
कार्यक्रम ख़त्म हुआ तो वह मेरे साथ मेरे स्कूटर तक आया। पांव छूकर बोला, ‘इतने दिनों बाद आपको देखकर बहुत अच्छा लगा। आशीर्वाद देते रहें। मैं जल्दी ही घर आकर आपसे इत्मीनान से बात करूंगा।’
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– उद्घोष…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १२१ — उद्घोष —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
अज्ञानी तो क्या, वह तो विद्वानों के मुँह पर भी कह देता था वह भगवान को नहीं मानता। लोग तो यही सोचते होंगे भगवान सुन रहा है। पर भगवान सुनता भी हो तो आदमी को किसी प्रकार का अंतर नहीं पड़ता। बल्कि वह तो आजीवन सुखी संपन्न रहा। उसके अंत में इतना ही हुआ वह भी भगवान को मानने वालों की तरह अरथी में सजा और उसके लिए श्मशान तक उद्घोष एक ही हुआ, “राम नाम सत्य है।”
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३५६ ☆ नव साधना…
नवरात्रि शक्तिपर्व है। शास्त्रोक्त एवं परंपरागत पद्धति के साथ-साथ इन नौ संकल्पों के साथ देवी की उपासना करें। निश्चय ही दैवीय आनंद की प्राप्ति होगी।
1. अपने बेटे में बचपन से ही स्त्री का सम्मान करने का संस्कार डालना देवी की उपासना है।
2. घर में उपस्थित माँ, बहन, पत्नी, बेटी के प्रति आदरभाव देवी की उपासना है।
3. दहेज की मांग रखनेवाले घर और वर तथा घरेलू हिंसा के अपराधी का सामाजिक बहिष्कार देवी की उपासना है।
4. स्त्री-पुरुष, सृष्टि के लिए अनिवार्य पूरक तत्व हैं। पूरक न्यून या अधिक, छोटा या बड़ा नहीं अपितु समान होता है। पूरकता के सनातन तत्व को अंगीकार करना देवी की उपासना है।
5. स्त्री को केवल देह मानने की मानसिकता वाले मनोरुग्णों की समुचित चिकित्सा करना / कराना भी देवी की उपासना है।
6. हर बेटी किसीकी बहू और हर बहू किसीकी बेटी है। इस अद्वैत का दर्शन देवी की उपासना है।
7. किसीके देहांत से कोई जीवित व्यक्ति शुभ या अशुभ नहीं होता। मंगल कामों में विधवा स्त्री को शामिल नहीं करना सबसे बड़ा अमंगल है। इस अमंगल को मंगल करना देवी की उपासना है।
8. गृहिणी 24×7 अर्थात पूर्णकालिक सेवाकार्य है। इस अखंड सेवा का सम्मान करना तथा घर के कामकाज में स्त्री का बराबरी से या अपेक्षाकृत अधिक हाथ बँटाना, देवी की उपासना है।
9.स्त्री प्रकृति के विभिन्न रंगों का समुच्चय है। इन रंगों की विविध छटाओं के विकास में स्त्री के सहयोगी की भूमिका का निर्वहन, देवी की उपासना है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆