हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ – नई दिशा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा नई दिशा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆

🌻लघु कथा🌻 नई दिशा 👩‍🍼

मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।

मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।

हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।

सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८८ – देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८८ ☆ देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆

फ्री या मुफ्त शब्द का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण की गति से भी तीव्र माना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे कुछ ज्ञानी “कॉम्प्लीमेंट्री” बताकर अपने आप को सफेद पोश समझ लेते हैं। उनका ये मानना है, हमारे द्वारा खरीदी गई सुविधा के साथ ही तो मिल रहा है, इसलिए ये फ्री से अलग होता हैं।

दो साबुन के साथ एक फ्री का मिलना हो या होटल में किराए के कमरे के साथ नाश्ता और एक समय का भोजन जैसी सुविधा इस श्रेणी में गिना जाता हैं।

होटल का कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट वह जगह है, जहाँ आदमी भूख से नहीं, कमरे के किराए की वसूली की भावना से खाता है, घर पर सुबह दो टोस्ट से काम चल जाता है मगर होटल में प्लेट उठाते ही भीतर का चार्टर्ड अकाउंटेंट जाग जाता है।

व्हाट्स ऐप ज्ञान से प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले फल डालेंगे क्योंकि स्वस्थ दिखना है, फिर उसके बगल में आलू पराठा, इडली, पोहा, सॉसेज और एक ऐसा छोटा तिरामिसु रख देंगे जिसकी पहचान हमें नहीं मगर मुफ़्त है इसलिए सम्मान देना ज़रूरी है।

प्लेट में जगह खत्म होते ही दूसरी प्लेट उठा लेते हैं और अपने आप से कहते हैं यह सिर्फ ऑमलेट के लिए है, लाइव काउंटर वाला पूछता है वेज या चीज़, प्याज़, टमाटर, मिर्च, मशरूम, अब हम ऑमलेट नहीं बनवा रहे, जीवनसाथी चुनने जितनी जानकारी दे रहे हैं।

फिर टोस्टर में ब्रेड डालते हैं, वह नीचे से गायब हो जाती है मगर निकलती कहीं नहीं, आप मशीन के सामने झुककर भीतर ऐसे देखते हैं जैसे बच्चा बोरवेल में गिर गया हो, तभी पीछे से किसी और की जली हुई ब्रेड निकलती है और वह आपको संदेह से देखता है कि आपने उसकी ब्रेड के साथ क्या किया, कॉफी मशीन पर छह बटन हैं, एस्प्रेसो दबाओ तो कप में दो चम्मच दुःख गिरता है, कैपुचीनो दबाओ तो मशीन पहले कराहती है, फिर भाप छोड़ती है, फिर इतनी झाग देती है कि कॉफी नीचे कहीं किरायेदार बनकर रह जाती है।

आप मेज़ पर लौटते हैं तो साथी पूछती है इतना कौन खाएगा, आप कहते हैं थोड़ा थोड़ा लिया है, जबकि मेज़ देखकर लगता है संयुक्त राष्ट्र ने अकाल राहत सामग्री भेजी है, बीच में वेटर प्लेट उठाने आता है और आप आधी खाई इडली बचाते हुए कहते हैं अभी चल रही है, भोजन है या पुरानी ईएमआई जिसे बंद नहीं होने देना है।

अंत में पेट जवाब दे चुका होता है मगर नज़र मिठाई पर पड़ती है, हम एक मफ़िन नैपकिन में लपेटकर बाद के लिए रख लेते हैं, फिर कमरे में लौटकर दो घंटे बिस्तर पर सीधे नहीं लेट पाते और गर्व से कहते हैं आज लंच की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यही होटल ब्रेकफास्ट की असली बचत है, पैसे एक वक्त के बचते हैं और पाचन तंत्र दो दिन का ओवरटाइम करता है।

यदि होटल में कमरे के किराए में नाश्ते के बदले कुछ छूट मिल जाय तो निजी यात्रा के समय हम सब कम किराए वाला ऑप्शन उपयोग करते है। ऑफिशल यात्रा के समय कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ता ही चुना जाता हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३७ ☆ भावनेचा कोपरा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३७ ?

☆ भावनेचा कोपरा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

चंद्र होता सोबतीला लाजरा

साथ त्याला धुंद देतो मोगरा

*

तार होती वादकाने छेडली

स्पर्श होता देह झाला बावरा

*

पावसाची वाजता ही पावले

मी मनाचा मोर पाही नाचरा

*

शांत का ही होत नाही वादळे

ती म्हणाली या मनाला सावरा

*

ओठ व्हावे का तिचेही तांबडे

मी विड्याचा चावताना तोबरा

*

तृप्त झालो एवढा होतो तरी

एक कोरा भावनेचा कोपरा

*

चंद्र आहे रात्र सारी जागतो

ही सकाळी झोप येते पामरा

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९८ – प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९८ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

शायद आप कहें-

क्या मास्टरों ने तुझे

वकील किया है ?’

जी माई बाप

न तो मैं वकालत पढ़ा हूँ और

न किसी ने मुझे वकील किया है

मैं मास्टर हूँ, मैंने खुद फील

किया है

 

लेकिन क्या कहें अपने राज को ?

क्या कुछ भी नहीं सूझता

इस बीसवीं सदी के सभ्य समाज को?

 

यह ठीक है कि हम दोषी ठहरा सकते हैं

ब्रिटिश राज को।

अब तो अपना ही राज है

जनता ही राजा है

तो ये वक्त का तकाजा है

कि समय रहते चेतना चाहिये

अपने शासन को,

कि राष्ट्र का निर्मातातरसता न रहे

दवा वस्त्र या राशन को।

कि अपनी सरकार करेगी कुछ विचार

मगर इसी संदर्भ में

एक कड़ी बात याद आती है-

कि भरोसे की भैंस 

वैसे तो मुझे है भरोसा

अक्सर

पड़ा ही ब्याती है। इसलिये

समाज से भी कुछ कहना।

मेरा फर्ज है।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९५ – “उनकी छत पर कडी धूप…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत उनकी छत पर कडी धूप...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “उनकी छत पर कडी धूप...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

उनकी छत पर खड़ी धूप

जो उड़ती रहती है ।

जो उड उड कर अपने उजले

पंख बदलती है ॥

 

उड़ना तो वह रही चाहती

अमवा के ऊपर ।

उतर नदी की गहराई में

आ जाती भू पर ।

 

उनकी छत पर बड़ी धूप

कुछ गोलाई लेकर –

अपनी छाती पर उभारती

हुई मचलती है ॥

 

तनिक देर में खड़ी पहाड़ी

चढ़ जाया करती ।

और मुस्कराते वन प्रांतर को

भाया करती ।

 

उनकी छत पर कडी धूप

जो तपती रहती है –

पसरी हुई मौन लगती है

माला जपती है ॥

 

पास पहाडी झील लाल

होती होती लगती ।

माथे की ठहरी कुमकुम

जैसे बहती लगती ।

 

उनकी छत पर कड़ी धूप

कुछ ठंडी लगती है –

जो धीमे धीमें प्राणों में

ढलती लगती है ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

02 -08 -2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७७ ☆ # “झूमके आया सावन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “झूमके आया सावन…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७७ 

☆ # “झूमके आया सावन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

प्यासी प्यासी धरती

मेघों की है दीवानी

 

कारे बादर घूम रहे हैं

धरती को चूम रहे हैं

मदहोशी में झूम रहे हैं

धरती मेघों के मिलन से

बरस रहा है पानी

झूम के आया  सावन

बरसे बरखा रानी

 

फूलों के लगे हैं मेले

झूलों के लगे हैं मेले

तरुणाई आंख  मिचोली खेलें

सावन के गीत गाए

मदमस्त है जवानी

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

 

बूंदों का श्रृंगार है

आंखों में प्यार है

साजन का इंतजार है

प्रियतम की राह तकते

ओढ़ी चुनरी है धानी

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

 

मेघों  की मनमानी है

बारिश भी तूफानी है

नगरी डूब ही जानी है

अहंकार के पतन की

यही है कहानी

झूम के आया सावन

बरसे बरखा रानी

प्यासी प्यासी धरती

मेघों की है दीवानी /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२१ – भारत की आजादी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता भारत की आजादी ।)

☆ अभिव्यक्ति # १२१ ☆

☆ भारत की आजादी ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

भारत की आजादी को, बड़ी मुश्किल से पाया है,

मत पूछो इसको पाने में, हमने क्या गंवाया है.

*

मातृभूमि पर, रणबांकुरे, हंसते हंसते बलिदान हुए,

देश बचाने, धर्म बचाने, अपना शीश गंवाया है.

*

खून शहीदों का झण्डे में, तिरंगा तब फ़हराया है,

सीमा पर फौजी की साँसों से, ये झंडा लहराया है.

*

मिलजुल कर हम एक रहेंगे, गर्व से दिवस मनाएंगे,

झंडे को सलामी देंगे, शहीदों को, भुला न पाएंगे.

*

आओ मिलकर याद करें हम,  शहीद बलिदानों को,

रक्त से जिनने सींचा है, भारत के इन  मैदानों को.

*

छोटी छोटी बातों में, अब हमको नहीं उलझना है,

एक रहेंगे, नेक रहेंगे, बस आगे ही बढ़ते रहना है.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४५ ☆ व्यंग्य – पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘पेपर लीकेज का जिन्न‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

पेपर लीकेज के मसले ने सरकारों की नींद आराम कर दी है। पूरे देश में हंगामा बरपा है। सरकारों को लगता है ये आंदोलनकारी जेन-ज़ी नहीं, बोतल से निकले जिन्न जी हैं। अभी तक ये कहां छिपे बैठे थे? समझ में नहीं आता कि इन्हें वापस बोतल में कैसे बन्द किया जाए। ये चुपचाप पुलिस की लाठियां खाकर भागने वाले, किताबों में डूबे रहने वाले संस्कारी छात्र अचानक जिम्मेदार लोगों से आंख में आंख डालकर सवाल कैसे करने लगे? घोर कलियुग! उस पर तुर्रा यह कि इनके साथ जेन-अल्फ़ा भी कुसंस्कार सीख रहा है, यानी बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुबहान अल्लाह।

देश के बहुत से सयाने लोग लड़कों के नारों और उनके द्वारा प्रदर्शित प्लेकार्डों से दुखी हैं। ‘हाय,हाय, ये नेताओं के लिए कितनी गन्दी भाषा लिख और बोल रहे हैं। इनके संस्कार कहां गये?क्या इनके मां-बाप ने इन्हें यही सिखाया था? न किसी की शर्म, न लिहाज। राम, राम।’

कुछ दूसरे सयाने जवाब देते हैं— ‘हमारी पीढ़ी ने नयी पीढ़ी को कौन से संस्कार सिखाये हैं? संसद में सांसद दूसरे दलों के सांसदों के लिए कैसी भाषा का उपयोग करते हैं? सभी बड़े मंदिरों में रोज़ चोरी की खबरें आती हैं, परीक्षाओं के पेपर लीकेज से छात्रों का भविष्य चौपट हो रहा है, पार्टियों को खुले आम तोड़कर सरकारें बनायी जाती हैं, बड़े-बड़े सन्त जेल की हवा खा रहे हैं, सिद्ध भ्रष्ट बड़ी कुर्सियों पर बैठे हैं, चतुर लोग बैंकों का हज़ारों करोड़ हज़म करके विदेश में मौज कर रहे हैं, हजारों करोड़ से बने पुल उद्घाटन से पहले गिर रहे हैं, नयी बनी एक्सप्रेस-वे चटक रही हैं, नये बने एयरपोर्ट पहली बरसात में चौधार आंसू टपका रहे हैं, महापुरुषों और ऋषि-मुनियों की नयी बनी मूर्तियां हवा के झोंके से गिर रही हैं। यह सब नयी पीढ़ी देख रही है और समझ रही है, इसलिए उस पर हमारे नैतिकता के भाषणों से कोई असर नहीं होने वाला। ये कोई दूध-पीते बच्चे नहीं हैं। इस पीढ़ी के पास हमसे ज़्यादा समझ है। वह हमारी पीढ़ी के पाखंड को खूब समझ रही है।’

सुन कर संस्कारों की दुहाई देने वाले सयाने मौन साध लेते हैं।

सरकारों में भगदड़ मची है। इस लीकेज को कैसे बन्द किया जाए। कमेटियां बन रही हैं। कुछ पकड़-धकड़ भी हुई है। कमेटियों से सुझाव आता है कि  लीकेज के दोषियों के लिए सख़्त सज़ा का प्रावधान हो। दस साल की सज़ा और दस करोड़ जुर्माने पर सहमति बनती है।

एक मसखरा सवाल करता है, ‘अपराधी के पास दस करोड़ की संपत्ति नहीं हुई तो वसूली कैसे होगी?’

छात्र इन सुझावों पर आपत्ति करते हैं, कहते हैं, ‘ये सब लीकेज के बाद के उपाय हैं। इनसे छात्रों का नुकसान कैसे पूरा होगा? अंग्रेज़ी की कहावत के अनुसार घोड़े के भाग जाने के बाद अस्तबल का दरवाज़ा बन्द किया जाएगा। सरकार यह बताये कि लीकेज रोकने के लिए क्या किया गया है।’

सरकारें फिर परेशान हैं। फिर कमेटियां बैठती हैं। फिर मगजमारी होती है। लीकेज रोकने के सुझाव मांगे जाते हैं। छात्रों की तरफ से सुझाव आता है कि परीक्षाओं का पूरा काम सौ प्रतिशत ईमानदार और कठोर निर्णय लेने वाले अधिकारियों को सौंपा जाए। अब सौ प्रतिशत ईमानदार अधिकारियों की खोज में दौड़भाग शुरू होती है। तुरन्त ‘ऑनेस्टी टेस्टिंग मीटर’ तैयार करवाए जाते हैं और सौ से ज़्यादा अधिकारी इन मीटरों से लैस होकर देश के कोने-कोने में निकल पड़ते हैं। उच्च अधिकारी सारे वक्त उनसे रिपोर्ट लेते हैं।

ज़्यादातर मामलों मैं रिपोर्ट मिलती है कि  ईमानदार तो बहुत मिल रहे हैं लेकिन अब तक सौ प्रतिशत वाला बन्दा नहीं मिला है। उच्च अधिकारी माथे का पसीना पोंछते हैं, कहते हैं, ‘कोई बात नहीं। लगे रहो। कामयाबी ज़रूर मिलेगी।’

तो भाइयो, सौ प्रतिशत ईमानदार खोजने की कोशिश अभी ज़ारी है। हम भी दुआ करते हैं कि अधिकारियों को इस काम में जल्दी सफलता मिले। वैसे यह गांधी और बुद्ध का देश है। यहां सौ प्रतिशत ईमानदार आदमी नहीं मिला तो बड़ी नककटई हो जाएगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११६ – नामालूम कारागाह… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– नामालूम कारागाह…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११६ — नामालूम कारागाह — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर : मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(150 शब्द – सीमा’ के आधार पर ‘गद्य भँवर’ का लेखन मेरा एक श्रमसाध्य प्रयोग है। अभी जो रचना मैं लिख रहा हूँ यह उसी की अगली कड़ी है। हो सकता है इसे उलझा सा मान कर सन्देहास्पद कहा जाना शुरु हो जाए। पर मैं तो यह मानने में तटस्थ रहूँगा लिखा तो मैंने अर्थ के लिए ही है।)

विद्वान सिल्वानो को सूर्योदय के वक्त अनुभूति हुई संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। अपनी इस अनुभूति ने तो उसे बहुत उद्वेलित किया। न हुआ तो भी हुआ सा हुआ, उसे लोगों को चिट्ठियाँ लिख कर पूछना पड़ा क्या किसी को उस कारागाह का पता मालूम है? उसी दिन सूर्यास्त के वक्त सिल्वानो की अनुभूति हुई उसके पास दुनिया भर से चिट्ठियाँ आई हैं जिनमें लिखा हुआ है संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। क्या तुम्हें वह कारागाह मालूम है?

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४९ – कलयुग केवल नाम अधारा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४९ कलयुग केवल नाम अधारा… ?

राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस।

बरसत वारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास।।

श्री राम का नाम परमार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम मोक्ष प्रदान करता है। उनके नाम के बिना भवसागर से पार होने की कल्पना कुछ ऐसी ही है, जैसे कोई बारिश की बूँदों के सहारे आकाश में जाना चाहता हो। अर्थ स्पष्ट है, श्री राम का नाम तारणहार है।

श्री राम के नाम को, उनकी अतुल्य जीवनयात्रा को घर-घर और जन-जन तक जनभाषा में पहुँचानेवाले ग्रंथ का नाम है, रामचरितमानस।  कौशल्या हितकारी राम से रणकर्कश श्री राम  की कथा है रामचरितमानस, राजा राम से लोकनायक श्री राम होने की गाथा है रामचरितमानस। रामचरितमानस श्रीराम के व्यक्तित्व और कृतित्व की अशेष यात्रा है। रामचरितमानस में को अवधी भाषा में लिखा गया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अमर कृति का लेखन विक्रम संवत 1631 तदनुसार  ईस्वी सन 1574 को  मंगलवार श्री रामनवमी के दिन आरंभ किया था। यह लेखन 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन चला। विक्रम संवत 1633 अर्थात ईस्वी सन 1576 को श्री राम विवाह के दिन यह संपन्न हुआ।

रामचरितमानस में कुल सात खंड / अध्याय हैं, बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुन्दरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।

मानस में संस्कृत और प्राकृत के कुल मिलाकर 18 छंदों में सृजन हुआ है। रामचरितमानस में कुल 10902 पद हैं। इनमें 9388 चौपाई हैं। मानस में 1172 दोहा हैं। इसमें 87 सोरठा हैं। इस महाकाव्य में 208 छंद हैं जिनमें हरिगीतिका, त्रिभंगी, तोमर, चौपैया सम्मिलित हैं। इस कालजयी ग्रंथ में 47 श्लोक हैं। इन श्लोकों में शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप, प्रमाणिका, वंशस्थ, उपजाति, मालिनी, वसंततिलका, रथोद्धता, भुजंगप्रयात, तोटक, स्रग्धरा हैं।

यद्यपि स्थूल रूप से देखें तो रामचरितमानस,  रामकथा है, तथापि सूक्ष्म अवलोकन-अध्ययन  करें तो पाएँगे कि इसके अक्षर-अक्षर में जीवनमूल्य और नीतिमत्ता साक्षात दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि श्री राम का जीवनवृत्त ही ऐसा है। संभवत: यही कारण था, जिसने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से लिखवाया,

राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।

कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।।

रामचरितमानस ने श्री राम को एक अनन्य व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, लोकहितकारी हैं।राम एकमेवाद्वितीय हैं।

रामचरितमानस पढ़ना अर्थात सदाचार, नीतिमत्ता और जीवन के आदर्श पढ़ना। विशेषकर उत्तरभारत में तो मानस के दोहे और चौपाइयाँ, लोकोक्तियों के समान चलन में हैं।

अवधी में होने के कारण रामचरितमानस सार्वजनीन हुआ, जन-जन की जिह्वा का गान बना। जिस तरह बालक को दादी, नानी कहानी सुनाती हैं, कुछ उसी तरह हर आयुसमूह के लिए दादी, नानी की लोककथा बना रामचरितमानस। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित मानस का पारायण आगे चलकर परम्परा बना।

वस्तुत: संसार रूपी सागर में हर मनुष्य एक घड़ा है, एक घट है। इस घट में रावण का निवास है पर श्रीराम का भी वास है। मनुष्य से अपेक्षित है कि वह भीतर के  श्रीराम का जागरण और अंतर्भूत रावण का मर्दन करे।अपने अवगुणों का दहन, और रामत्व का जागरण  ही रामचरितमानस का सच्चा पारायण है।

‘रामत्व’ की अनुकम्पा गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त हुई थी। तभी श्रीरामचरितमानस में आपने लिखा,

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥

अर्थात जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ।

गोस्वामी जी के कविरूप का ध्रुवतारा है रामचरितमानस। कहा गया है,

कलयुग केवल नाम अधारा।

सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।

कलयुग में केवल श्री राम का नाम एक आधार है। उनके सुमिरन मात्र से, केवल उनके स्मरण से मनुष्य भवसागर पार हो जाता है।

श्री राम के चरित के माध्यम से जीवन की ज्ञात, अज्ञात स्थितियों को जानने, समझने और हल की दिशा पर प्रकाश डालने का माध्यम है रामचरितमानस। कालजयी साहित्य का सार्वकालिक उदाहरण है रामचरितमानस।

श्रावण शुक्ल सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती थी। विश्व को रामचरितमानस जैसा अनन्य महाकाव्य  देनेवाले गोस्वामी जी को नमन।

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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