हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९१ ☆ भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९१ ☆

भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

मानसून भारतीय जीवन का केवल एक मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के सुंदर मिलन का पर्व है। वर्षा की पहली फुहार के साथ ही धरती नवजीवन से भर उठती है और वातावरण में हरियाली का संदेश फैलने लगता है। यही कारण है कि पौधारोपण के लिए वर्षाकाल को सबसे उपयुक्त समय माना गया है।

पौधे लगाने से पूर्व भूमि की तैयारी, जैविक खाद का उपयोग तथा स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों का चयन आवश्यक है। वर्षा का प्राकृतिक जल पौधों की जड़ों को मजबूती देता है और उनके विकास में सहायक बनता है। किंतु पौधारोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल कर उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना है।

भारतीय संस्कृति में भी वर्षा और हरियाली का विशेष महत्व रहा है। सावन, हरियाली अमावस्या, तीज तथा नागपंचमी जैसे पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करते हैं। हमारे लोकगीतों, लोकपरंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में वृक्षों को जीवनदाता और पुण्य का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार मानसून की रिमझिम फुहारें केवल खेतों और बागों को ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी सिंचित करती हैं।

आज आवश्यकता है कि हम वर्षा ऋतु को केवल मौसम परिवर्तन के रूप में न देखें, बल्कि इसे हरियाली बढ़ाने और प्रकृति से अपने संबंधों को मजबूत करने के अवसर के रूप में अपनाएँ। एक पौधा लगाना पर्यावरण संरक्षण का कार्य है, तो उसकी देखभाल करना संस्कृति और संवेदना का निर्वाह। वास्तव में वर्षा, वृक्ष और संस्कृति का यह संगम जीवन को संतुलित, सुंदर और समृद्ध बनाता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२९ ⇒ || रोंगटे || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रोंगटे ||।)

?अभी अभी # १०२९ ⇒ आलेख – || रोंगटे || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(GOOSE BUMPS)

हमारा शरीर भी विचित्र है। हमारी त्वचा में असंख्य रोमकूप हैं। जो भक्त होते हैं, उनके रोम रोम में राम व्याप्त होते हैं। हम जब अनजाने में, तनिक से स्पर्श से सिहर उठते हैं, तो ये भी अपनी अपनी हैसियत के अनुसार सक्रिय हो जाते हैं। इन्हें हम रोएँ भी कहते हैं।

हमारे रोमांच में रोम का बड़ा हाथ होता है। Rome was not built in a day.

भारतीय नाट्य शास्त्र में केवल भाव भंगिमा से ही मन में उत्पन्न सभी भावों का सजीव चित्रण किया जाता है। चेहरे पर संचारी भावों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन ही तो नृत्य है। जिनमें श्रृंगार, शांत, भय, रौद्र, वीर और वीभत्स रस भी शामिल है। कहीं नटवर है तो कहीं नटराज। वैसे भी तांडव नृत्य मंच पर ही देखना अच्छा लगता है।।

हम भी अजीब हैं। जब हमें गुस्सा आता है, तो हमारे तेवर देखिए और जब हम खुद डर जाते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मानो उन्हें कक्षा में मास्टर जी ने जोर से डांटकर फटकारा हो, ऐ मिस्टर तुम ! खड़े हो जाओ। स्कूल में क्या नींद निकालने के लिए आते हो।

ये रोंगटे भी अजीब हैं। यूँ तो आराम से सोते रहेंगे, लेकिन जरा भी खतरे की घंटी बजी, तो खड़े हो जाते हैं, जैसे अफसर की घंटी से बाहर स्टूल पर ऊंघता चपरासी झट से आया साहब कहता हुआ खड़ा हो जाता है।।

क्या डर के मारे खड़े हुए रोंगटे किसी मास्टर जी के आदेश की प्रतिक्षा करते रहते हैं, कि ठीक है, बैठ जाओ, या खड़े ही रहते हैं। यह भी एक पहेली ही है। पहेली तो वैसे यह भी है कि ये संख्या में कितने हैं और इनकी आपस में एकता देखिए, मुसीबत में, या भय की स्थिति में, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। और जब संकट टल जाता है, तब सभी निश्चिंत होकर एक साथ चैन से बैठ जाते हैं।

आप भी कभी डरे होगे, आपके भी रोंगटे खड़े होते होंगे। कभी इनसे बात कीजिए, इनके हालचाल पूछिए। आप कैसे हैं मिस्टर रोंगटे ! इनकी संख्या कितनी है और ये शरीर में कहाँ कहाँ विराजमान हैं, इन्हें कोई तकलीफ तो नहीं?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०० ☆ बाल कविता – इल्लम इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०० ☆ 

☆ बाल कविता – इल्लम इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

इल्लम – इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली।

भागी – दौड़ी पहुँची दिल्ली।।

 *

दिल्ली में था चूहा मोटा।

हाथ न आया पहुँचा कोटा।।

 *

कोटा में फिर करी पढ़ाई।

वहाँ गई बिल्ली की ताई।

 *

ताई को कुत्ते दौड़ाते।

चढ़ी पेड़ पर पकड़ न पाते।।

 *

पेड़ पे थे बड़के लंगूर।

पूँछ लगीं पहुँची मैसूर।।

 *

चूहों ने बिल्ली दौड़ाई।

लौट के बुद्धू घर को आई।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆ जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆ —

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆

जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

होना क्या है

किसे पता है

शेष कुशल है यही कथा है।

 

लाँघ गए चौखट

अतीत की

बजती कोई धुन

सुगीत की

करना क्या है

किसे पता है

जनगण मन की यही व्यथा है ।

 

वर्तमान पीड़ित

उलझन से

राह निकलती है

करमन से

दुविधा क्या है

किसे पता है

अकर्मण्यता बनी प्रथा है ।

 

उग आए जंगल

आँखों में

सिमटे सपने सब

पाँखों में

उड़ना क्या है

किसे पता है

गंतव्यों की आत्मकथा है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(१४.८.२५)

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५६ ☆ तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तबाही रोकिए अब“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५६ ☆

✍ तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मिले है ज़ख़्म मुझको इश्क़ में अक्सर ही फूलों से

गिला कोई नहीं दिल में मुझे अपने रक़ीबों से

 *

पिलालो दूध कितना दोसती होती न सापों से

विवशता से नहीं रिश्ते सँवरते भावनाओं से

 *

ग़ज़ल कोई मुक़म्मल दोस्त आसानी से कब होती

कुरेदो ज़ख़्म दिल के सब्ज़ करने आप शूलों से

 *

बुरे अच्छे करो जो काम रखता वो अलग खाते

न पीछा छूटता इंसान का करता जो पापों से

 *

विसात इंसान की क्या है सितम करना नहीं इन पर

पिघल जाता है लोहा मुफ़लिसों की  निकली आहों से

 *

नबाजे हमको जो क़ुदरत अकड़ को छोड़ देना है

सबक ये सींख लें हम भी झुकी फलदार डालों से

 *

निजी कामों को करने सिर्फ़ ये  हमने नहीं पाईं

उठाएं गिर गए है जो ख़ुदा की बख्शी बाहों से

 *

तबाही रोकिए अब युद्ध  घातक मोड़ पर पहुँचा

जमीं को पाट देगे आप क्या लोगों की लाशों से

 *

बड़ा है दोगला गिरगिट से अपने रंग ये बदले

नहीं अनजान रहना है अरुण दुश्मन की चालों से

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६० – आवारगी में गुजारे दिन… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना  – आवारगी में गुजारे दिन।)

☆ हेमंत साहित्य # ६० ☆

✍ आवारगी में गुजारे दिन… ☆ श्री हेमंत तारे  

उधर चश्म पूरनम हुई तो बादल याद आ गये

इधर आँख खुली तो वो हसीं पैकर याद आ गये

माना के गुजरा वक्त कभी लौट आता नहीं

मगर उन संग जो गाये वो तराने याद आ गये

 *

बारिश मौसम तो है, सुकूँ भी है यार

बेवजह ही सही, वो ख़मदार – गैसू याद आ गये

 *

ये मिट्टी की महक औ बून्दो की छमाछम

इक छाते तले तै किये फ़ासिले याद आ गये

 *

देखा उस बेफिक्र को सिगरेट जलाते 

तो आवारगी में गुजारे दिन याद आ गये

 *

मुन्तजिर हूँ “हेमंत” सियाह अब्र बरसते रहे

वो आवारगी में गुजारे जमाने याद आ गये

पैकर = चेहरे, ख़मदार- गैसू = घुंघराले बाल

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆ तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह) – कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ समीक्षा – डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा  – “तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆

✍ पुस्तक समीक्षा – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

पुस्तक का नाम – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)

कवि – महेन्द्र वर्मा

प्रकाशक – आस्था प्रकाशन गृह, जालंधर-नई दिल्ली-कनाडा

संस्करण – 2026

मूल्य – 325 रु.

सार्त्र ने कहा था – “सब कुछ गुजर जाता है। आंधी, तूफान, सुनामी, सब आते हैं, रुकते नहीं, थमते नहीं, पतझड़ में रंग-बिरंगे पत्ते, अपनी शाख से, आज़ादी पा, मंडराते हैं, खिलखिलाते हैं और फिर बिखर जाते हैं ज़मीं पर”…  किसी काव्य-संग्रह में सार्त्र का नाम होना ही कवि की उच्चता दर्शाता है, क्योकि ज्याँ पॉल सार्त्र बीसवीं सदी के सुविख्यात फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता को बनाए रखते हुए नोबेल पुरस्कार भी लेने से इंकार कर दिया था।

विदेश में विदेशी भाषा के माध्यम से हिंदी पढ़ाने वाले महेन्द्र वर्मा जी जैसा व्यक्तित्व जब कविता रचेगा तो उसमें अपने उत्स और विदेश की धरती पर अपनों परायों के बीच जीवन जीना कितना अनुभूत, कितना परानुभूत होगा, यह उनकी कविताओं से थोड़ा सा परिलक्षित होता है, थोड़ा सा इसलिए कि अपनी भाषा की सुगंध को विदेशी भाषा की सुगंध में अवगुंठित करना और अपनी मांटी की सौंध से सात समुंदर पार की धरती तक के वितान पर अनुभवों की रेखा खींच पाना एक काव्य-संग्रह में संभव नहीं है, परंतु सात समुंदर पार भी अपनी मांटी की सौंध को अपने में बसाये रखने वाले महेन्द्र वर्मा जैसे व्यक्तित्व की एक ही कविता ऐसी हो सकती है कि पाठक उसे पढ़कर बरसों प्रभावित रह सकता है।

महेन्द्र वर्मा की अपनी पहली कविता, “क्या खोया, क्या पाया”, में ही बयान कर देते हैं-

अक्तूबर का दिन था

खुशनुमा दिन

जब आया था न्योता

सात समंदर पार

यू.के. से

एक नहीं

दो-दो

यॉर्क और मेनचेस्टर से।

करना है

मजबूत-प्रवास में

हिंदी की नींव को

यॉर्क ने,

दूर से दी थी आवाज।“

 

इस कविता में ही उन्होंने अपनी यात्रा का ऐसा वर्णन कर दिया है कि पाठक पढ़कर सोचता रह जाता है। आगे पढने के लिए उसे हिम्मत जुटानी पड़ती है। आगे वर्मा जी सोचें लेकिन उनकी यात्रा हिंदी से ही पूरी होती है, जो उनका बहुत बड़ा संबल भी बनती है। इसी कव्ता में आगेलिखते हैं-

“प्रवासी को

हाथ बढ़ा कर

दे दिया

हिंदी ने

इतना कुछ,

विधि में

मिलता नहीं

सदा

सब कुछ।

कुछ खोया, कुछ पाया।“

 

लेकिन विरासत उन्हें कुछ भूलने नहीं देती। दूसरी कविता “विरासत” में वे कह उठते हैं-

 

 “है संबंध अनूठा

मानवता औ विरासत का,

है एक विशाल कोश

वेदों औ पुराणों में

विरासत का

करता है प्रदान जो

मानवता को अंतर्दृष्टि।

……

मिला दर्शन

वसुधैव कुटुंबकम्

सर्वे भवंतु सुखिना

औ’

ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत

का भी।”

 

विदेश में रहते वे रामायण, गीता, मानस, तमिल कंब रामायण, मलयालम अध्यातम रामायणम्, नानक, गौतम और महावीर के साथ-साथ शंकर और चार्वाक किसी को नहीं भूलते।

 

महेन्द्र वर्मा जी का काव्य कौशल उस समय ऊंचाइयों की पराकाष्ठा पर होता है जब वे “पतझड़” को एक नया सकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हैं, जो किसी कवि ने नहीं दिया। वे लिखते हैं-

 

“पतझड़ है यह तो

ज़मीं पर बिखरी पत्तियाँ

सूरज की

सुनहली रोशनी में

चमकती-दमकती

इठला रही हैं,

मुक्ति मिली है

आज”

 

अंग्रेजी कवि कीट्स की कविता को उन्होंने आगे बढ़ाया है। इसी कविता में आगे लिखते हैं—

 

“और मिला है

वह अंतिम सुख

जब बटोर- बटोर कर

माली ने

किया

उनका अंतिम संस्कार।”

 

प्रकृति का अवलोकन ही नहीं अवीक्षण भी उनका अभूतपूर्व है। “कली बोली” कविता उऩकी दृष्टि देखिए—

“कली बोली-

मैं अधखिली रह गयी,

था मेरे

यौवन का क्षण, वह

तुषारापात कर दिया

अचानक

जब तुमने।”

 

और वे “गुलमोहर” से पूछ बैठते हैं—

 

“गुलमोहर से पूछो

खुल कर, खिलखिला कर बोलेगा,

पतझड़ आया तो क्या

चला गया

हर वर्ष

जाड़ा भी आकर।”

 

ऐसा कोई कवि नहीं हुआ, जिसने येन-केन-प्रकारेण सृष्टि पर कुछ न लिखा हो। प्रकृति और सृष्टि कवियों के चहेते विषय हैं, तो वर्मा जी पीछे कैसे रहते, “सृष्टि” कविता में लिखते हैं—

 

“सृष्टि का भी तो

अजीबो-ग़रीब

रंगो-रिवाज़ है।

सुनामी आती तो है

पर

दस्तक देकर ,

चली भी जाती।”

 

उनकी कल्पना शक्ति “सुगंध” नामक कविता में तो देखते ही बनती है। अमूर्त को मूर्त कैसे बनाया जाता है उसकी बानगी इस कविता में है—

 

“निःशब्द हो

तुम सुगंध,

पर निष्प्राण नहीं।

धार्मिक अनुष्ठानों में

मंदिर हो या मस्जिद

कहाँ नहीं मिलती हो तुम

 ….

सुगंध, तेरी है विचित्र कहानी

पवन का दामन छोड़

पहुँच जाती हो

जब अंतरिक्ष में

फैलादेती हो ऐसा

अपना सुवास, अपना सौरभ

बतला नहीं पाती,

रह जाती है

नाकाम

अंतरिक्ष निर्वात में

नाक हमारी।”

 

सड़कों के किनारे वृक्ष लगाए जाते हैं और वे ऊंचे होकर सड़क को ढंकते हुए मिल जाते हैं। ऐसा मैंने देखा है। आपने भी देखा होगा। और महेन्द्र वर्मा ने भी देखा, लेकिन कैसे, उनकी कविता “आमने-सामने” में देखिए—

 

“रख दिया तुमने मुझे

अपनों से दूर

जमा दिया सड़क के

इस पार- उस पार

आमने-सामने

,………

प्यार का नशा हो जाए

तो लगती हैं खिसकने

दूरियाँ।

उम्र बढ़ती गयी

और हम पास आते गए

आलिंगन होने लगा

फुनगियाँ, फुनगियों से मिलती रहीं

हमारी दूरियाँ फिसलती गयीं।”

 

सृष्टि, प्रकृति पर ही उनकी निगाह नहीं गई, अपितु विज्ञान पर गहरी नजर गई और वैज्ञानिकों को सुनाया भी। उनकी “विज्ञान और वैज्ञानिक” कविता में है—

 

“विज्ञान नहीं, वैज्ञानिकों,

कर डाला तुमने

क्या

विज्ञान का।

……

पैदा कर दी है

वैमनस्यता कैसी

भेद डाल

मित्रता में

विज्ञान औ प्रकृति की।

….

रख दिया ताक पर

सृष्टि के मूल्यों को

मत दो विध्वंस का नुस्खा,

दे दो संजीवनी की औषधि।”

 

इंतज़ार पर उन्होंने तीन कविताएँ लिखी हैं। तीनों हृदयस्पर्शी हैं। लेकिन एक “इंतजार-2” मेरे दिल को भेद गई, आंसू ढल आए। आप भी देखिए—

 

“व्यग्रता से था

माँ को इंतज़ार

बेटा आएगा

लौट कर युद्ध से।

आया तो अवश्य

पर, अंतिम संस्कार के लिए।”

 

इंतज़ार 1 और 3 भी बहुत गंभीर रचनाएँ हैं। वर्मा जी लिखते हैं तो कविता लेकिन दर्शन उनकी हर बात में रहता है। वास्तव में वे एक भाषावैज्ञानिक कवि ही नहीं अपितु दार्शनिक कवि हैं। उनकी प्रतीक्षा नामक कविता में ऐसे दिखता है—

 

“करूँ प्रतीक्षा किस की

कब तक

..

उस मौसम की

जो कभी न आया।

प्रतीक्षा में नींद आने की

रात को थाम लेता हूँ,

रात आती तो है

पर फटकने देती नहीं,

नींद को पास

और हो जाती है सुबह।”

 

ऐसे ही प्रतीक्षा की घड़ी कविता में लिखते हैं—

“खिसकती जा रही है

प्रतीक्षा की घड़ी

सूइयाँ फिर भी

थकती नहीं

अनवरत चलती जा रही हैं,

घूम-घूम कर

मोक्ष का दामन पकड़े

मुक्ति की आशा

रख रही है-

ज़िंदा उन्हें।”

 

उन्होंने खूब लिखा है। पर माँ को नहीं भूलते—

 

“माँ बैठी है, चुपचाप

आँखें हो गयी हैं

पथरायी-सी

बाट जोहते-जोहते

उसकी

जो कभी न लौटा,

लौटा भी तो तब

जब बंद हो चुकीं थीं

माँ की आँखें।”

 

मुक्ति कविता में वर्मा जी लिखते हैं—

 

“ईश्वर ने

मानव से पूछा-

मुक्ति मेरी

कब आएगी

उत्तर आया-

जब मेरी होगी।”

 

आगे पाठक स्वयं पढ कर देखेंगे कि और क्या उत्तर आता है। “ऐसे ही लोगे कब तक परीक्षा,” “कब तक रहोगा उदास”, “जी करता है” उऩकी बहुत मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं। उनका प्रवासी मन मसोस उठता है।

 

“जी करता है

कुछ बोलूँ,

क्या बोलूँ

किस से बोलूँ

कैसे बोलूँ

बतियाऊँ भी तो

किस भाषा में”

 

अकेलापन तो वे बड़े नज़दीक से महसूस करते हैं। लिखते हैं—

 

“खड़ा हूँ

अब अकेला अंतिम पड़ाव पर।

दिखते बहुत हैं लोग

मुड़कर देखता कोई नहीं।

कैसा है अकेलापन यह।”

 

वर्मा जी विदेश में रहते हैं, पर संस्कारों का पूरा ध्यान रखते हैं और संस्कार पर कविता लिखना नहीं भूलते, लिखते हैं-

“तुम्हारे संस्कार, औ’ मेरे संस्कार

क्या दोनों का सामंजस्य

नहीं हो सकता .

जीवन का अर्थ क्या है.

जीने का मतलब क्या है.

जीवन एक जैसा नहीं रहता हमेशा,

नहीं रहते संदर्भ और मूल्य एक जैसे।”

 

मानव मन के अध्येता के रूप में वर्मा जी तब उभर कर आते हैं जब घृणा पर कविता लिखते हैं। घृणा पर शायद ही किसी ने ऐसी कविता लिखी हो, विदेश में नस्ल भेद और घृणा को उन्होंने स्वयं भोगा है शायद। दृष्टव्य है—

“घृणा करना कितना

घिनौना होता है

इंसान जब इंसानियत

भूल बैठता है

नस्ल के नशे में

……

नस्ल, धर्म, जाति, पंथ, रंग

के नाम पर

घिनौनी हरकतें

जब कभी भी

दूसरों का रंग

उसे लगता है बदरंग। ”

 

वे व्यक्ति को सचेत भी करते हैं कि—

 

“दीप

दीप तो

कभी न कभी

सारे बुझेंगे ।

सोच कर यह

हो जाना

अकर्मण्य

विपरीत है

धर्म के।”

 

वे शब्दों के चितेरे हैं, तभी तो शब्द पर तीन कविताएं लिखी हैं। शब्दों की शक्ति में लिखते हैं—

 

“शब्दों में समाहित है

संगीत की शक्ति,

होती है शब्दों में

कोलाहल को भेदने की शक्ति,

शब्दों में शक्ति होती है

ममता औ’ मनुहार करने की,

लड़ने औ लड़ मरने की भी।”

 

महेन्द्र वर्मा जी एक दार्शनिक कवि हैं। उनकी हर कविता में दर्शन झलकता है। जैसे “नाम” शीर्षक वाली कविता में लिखते हैं—

 

“सोचता हूँ कभी-कभी

क्या धरा है मात्र नाम में.

 सोचता हूँ फिर,

हुआ होगा

सृष्टि में

कभी क्या

बिना नाम के संबोधित

कोई कभी.”

 

ऐसे ही उत्सव की परिभाषा में –

 

“होता है, मुक्ति का उत्सव

त्यागने पर अपना शरीर।

उत्सव, उत्सव हो सकता है

सारा जीवन ही उत्सव।”

 

“बेसलन, रूस” कविता में वे आतंकवादियों को ललकारते हैं—

 

“कितने बच्चे थे

मासूम

नन्हें-नन्हें

नए जीवन की

करने शुरुआत,

……

जब किया प्रहार

निर्दयी आतंकवादी

तुमने।“

 

फिर “मौत” कविता में जज़्बाती भी हो जाते हैं—

 

“जब भी आती है

मौत

कभी दस्तक

देती नहीं।“

 

अपने देश से दूसरे देश में बसने वाले या प्रवास करने वाले प्रवासियों की पीड़ा को वर्मा जी से अच्छा कौन

बता सकता है, “प्रवासी की पीड़ा” में देखिए—

 

“समझ गया मैं।

देसी कभी

नहीं समझोगे मुझको.

रंग भेद है

जाति भेद है

नस्ल भेद है

…..

करा दिया

स्वीकार तुम्हीं ने,

अंश नहीं

बन सकता

तेरी धरती का मैं।

 

वर्मा जी भाषाविज्ञानी तो हीं ही, विदेश में पढाया भी है। लेकिन भाषा और मातृभाषा को काव्य में भी नहीं भूलते, जैसे, “आप्रवासी की मातृभाषा” में देखिए—

 

“पहचानो, समझो मुझको।

अंग्रेजी नहीं जानतीं

पर, नहीं हूँ बिन भाषा के मैं ।

मेरी माँ की भाषा

भी सशक्त थी जब,

शिक्षा द्वार पहुँचते ही

दुत्कारा मेरी भाषा को

तुमने।”

 

भाषा के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों और स्वार्थलिप्सा में बंधे विद्वानों को भी नहीं छोड़ते, “भाषा हितैषी” कविता में लिखते हैं—

 

“और तुम

बहुत व्यस्त रहे तुम,

भाषाकर्मी बन

शोध जगत में।

….

बहुत कर लिए

शोध तुम ने।

शोधक भी हो गए

और संशोधक भी।

…..

दिखता नहीं तुम्हें क्या

होती जा रही है लुप्त

मेरी अपनी भाषा।

बनी रहेगा पीड़ा उसकी

पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक।

…..

मेरी पीड़ा है साक्षी

उस भाषाई भेदभाव की।

डिगा दिया है जिसने

संस्कृति की वह नींव हमारी।”

 

“मम्मी-डैडी” कविता में हिंदी-अंग्रेजी ध्वनियों की बात करते हैं तो “पनप न पाएगी” कविता में कहते हैं—

 

“कर लो कितनी भी कोशिश

पनप न पाएगी

इस धरती पर,

तेरी, उनकी भाषाएँ।”

 

इसके भी आगे “मेरी भाषा-तेरी भाषा” कविता में लिखते हैं—

 

“तेरी भाषा

मेरी भाषा

भाषा तो भाषा ही है

जैसी तेरी

वैसी मेरी।”

 

महेन्द्र वर्मा प्रवासी तो रहे पर जहाँ रहे वहाँ प्रकृति के बनके रहे, जैसे “ट्यूलिप के फूल” कविता में—

 

“आता है वसंत

औ’ निकल पड़ते तुम

गर्भ से ज़मीं के,

सुर्ख लाल,पीले

रंग-बिरंगे।

चंद दिनों का तुम्हारा जीवन

मुर्झाने लगता है,

मानकर

नियति के नियम को

हो जाते हो

धीरे-धीरे लुप्त

स्वीकार कर

आने-जाने के दर्शन को।”

 

“यूस्टन स्टेशन” का दर्शन वे कुछ इस तरह कराते हैं—

 

“भाग रहे हैं

भाग रहे हैं

सब के सब

बस दौड़ रहे हैं,

यह जाना पहचाना

यूस्टन का स्टेशन।”

 

“तुम, न आए लौट कर” कविता में उनका गहन सोच, दर्शन बहुत सुंदर ढंगे से प्रस्फुटित होता है—

 

“तुम न आए लैट कर

सृष्टिकर्ता,

रच तो दिया

इस अद्भुत सृष्टि को,

पर न आए लौट कर।”

“तुम, न आए लौटकर” काव्य संग्रह में कुल अस्सी कविताएँ हैं। हर कविता एक से बढकर एक, चयन करना मुश्किल, क्योंकि महेन्द्र वर्मा जी का शब्दों और अर्थों पर पूरा अधिकार है। काव्य संग्रह पढ़कर ही सुधी पाठक उसका आनंद उठा पाएंगे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – धरती माँ की पुकार।)

☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

पर्यावरण दिवस पर शहर के एक बड़े विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित था। मंच पर बड़े-बड़े भाषण गूँज रहे थे—

“पेड़ बचाओ… पानी बचाओ… धरती बचाओ…”

सभागार तालियों से गूँज उठा। कार्यक्रम के बाद लोगों ने जलपान किया और जाते-जाते आधी भरी प्लेटें, प्लास्टिक की बोतलें और बचा हुआ पानी यूँ ही इधर-उधर फेंक दिया।

भीड़ छँटने लगी तो एक शिक्षक की नजर विद्यालय के बाहर सूखे पेड़ के नीचे बैठी एक नन्ही बच्ची पर पड़ी। वह जमीन पर गिरी अधूरी पानी की बोतलों से बचा पानी अपनी छोटी-सी बोतल में भर रही थी।

शिक्षक उसके पास गए और स्नेह से बोले,

“बेटी, ये क्या कर रही हो?”

बच्ची ने मासूम आँखों से उनकी ओर देखा—

“अंकल, माँ कहती हैं… पानी और अन्न कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए। ये धरती माँ का आशीर्वाद होते हैं।”

शिक्षक कुछ क्षण निरुत्तर खड़े रहे।

तभी बच्ची ने पास खड़े सूखे पेड़ को सहलाते हुए कहा—

“जब पेड़ रोते होंगे ना अंकल… तब ही बारिश कम हो जाती होगी। फिर खेत सूख जाते होंगे… और गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती होगी…।”

उसकी बात सुन शिक्षक का मन भीतर तक भीग गया। मंच पर दिए गए सारे भाषण उस मासूम बच्ची की एक बात के आगे फीके पड़ गए थे।

उन्होंने देखा—

धरती को बचाने की बातें करने वाले लोग ही धरती का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे थे।

“प्रकृति बदला नहीं लेती,

बस समय आने पर हर कटे हुए वृक्ष का हिसाब

सूखे खेतों और प्यासे होंठों से वसूल करती है।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१९ ☆ परिपूर्ती… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१९ ?

☆ परिपूर्ती ☆  प्रभा सोनवणे ☆

हीच परिपूर्ती आयुष्याची,

जगून घेता सर्व छटा….

गच्च भरलेला…हिंदकळणारा…

प्रत्येक घट लागेल तटा…!

*

जीवनाचा किती भरवसा?

पापाचा घट, पुण्याचे घडे…

कालिंदीच्या तीरावरती….

अजून काही अलौकिक घडे !

*

जागे आहे मनात काही,

एक अनोखी शीळ मनी

जगण्याच्या आसोशीतच

परिपूर्तीची स्नेहधूनी !

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २९ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २९ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

नोबेल पुरस्कार समितीने दिलेल्या मानपत्रात टागोरांविषयी लिहिले आहे की, “रविंद्रनाथ टागोर यांच्या अत्यंत संवेदनशील, मनोवेधक, वेगळ्या धाटणीच्या व परिपूर्ण अशा काव्यरचनांनी त्यांनी इंग्रजी साहित्य विश्वाला त्यांच्या अनोख्या काव्यात्म विचारांनी समृद्ध केले आहे. ” तर इकडे टागोरांना असं वाटलं की, “या पुरस्कारामुळे एकमेकांना अपरिचित असलेल्या संस्कृती, विश्वबंधुत्वाच्या भावनेने जवळ आल्या. “

रविंद्रनाथ १९१२ च्या सुरवातीला बरेच आजारी होते त्यामुळे त्यांची आधीच ठरलेली लंडन ट्रिप त्यांना पुढे ढकलावी लागली. त्याऐवजी ते हवाबदलासाठी त्यांच्या पद्मा नदीच्या किनाऱ्यावरील शिलादोह येथील वडिलोपार्जित घरी राहायला गेले. तिथं त्यांनी त्यांच्या काही बंगाली कवितांचा इंग्रजीत अनुवाद केला. त्यांनी एका खाजगी पत्रात आपण हा अनुवाद, का व कसा केला याविषयी लिहिलं आहे. ते म्हणतात, ” हा शब्दश: अनुवाद नाही तर या कवितांचा हा पुनर्जन्म आहे. मी यातून पुनश्च एकदा नवनिर्मितीचा अनुभव घेतला. ” इंग्रजी रचनेसाठी सोईस्कर असा गद्य काव्य प्रकार त्यानी यासाठी निवडला व त्यांना हा काव्यसंग्रह व्हायला नको होता तर ती एक काव्य मालिका व्हायला हवी होती.

नंतर कांही महिन्यांनी डॉक्टरांच्या सल्ल्याने, इंग्लंडला बोटीने जाण्यासाठी ते निघाले या प्रवासात त्यांनी आणखी काही कवितांचे इंग्रजी भाषांतर केलं. लंडनला गेल्यावर ते त्यांचे चित्रकार मित्र रोथेन्स्टाइन यांना भेटले व रोथेन्स्टाइन यांनी त्यांची व त्यांच्या काव्याची ओळख लंडनच्या आपल्या नामांकित मित्र परिवाराला करून दिली. यात डब्ल्यू. बी. यीट्स होते तसेच थॉमस मूर, इजा पाऊंड, ब्रुक इत्यादि अनेक सुप्रसिद्ध व्यक्ती होत्या. त्या सर्वांना टागोरांच्या गूढ, अप्रतिम व नाविन्यपूर्ण काव्याने प्रभावित केले.

यीट्स् यांनी या भाषांतरीत कवितांमधून निवडक १०३ कवितांचे पुस्तक काढण्याचा आग्रह धरला. रोथेन्स्टाइन यांच्यामुळे ‘इंडिया सोसायटी ऑफ लंडन’ यांनी या कवितांचे पुस्तक छापले. या पुस्तकाचे इंग्रजी वाचकांनी खूपच उत्साहाने स्वागत केले व या पुस्तकाची दुसरी आवृत्ती छापण्यासाठी मॅकमिलन प्रेस ऑफ लंडन पुढे आली. अवघ्या नऊ महिन्याच्या कालावधीत या पुस्तकाच्या दहा आवृत्त्या निघाल्या. केवळ रोथेन्स्टाइन यांच्यामुळे हे सर्व शक्य झाले म्हणूनच टागोरांनी हे पुस्तक रोथेन्स्टाइन यांनाच अर्पण केले आहे. यीट्स् यांना तर या कवितांनी इतकं भारून टाकलं होतं की त्यांनी आपण होऊन या पुस्तकाला प्रदीर्घ प्रस्तावना लिहिली.

या पुस्तकातल्या सहा कविता ‘पोएट्री’ या अमेरिकन मासिकात प्रसिद्ध झाल्या व त्यांचे तिथे अनेक नियतकालिकांमधून खूप कौतुकही झाले.

यानंतर रॉयल सोसायटी ऑफ लिटरेचर चे सदस्य असलेले ब्रिटिश साहित्यिक थॉमस मूर यांनी नोबेल पुरस्कारासाठी रवींद्रनाथांचे नाव पुरस्कृत केलं व हॉल स्टाॅर्म व इतर महानुभावांनी त्याला अनुमोदन दिले. एकूण २८ नामांकनांमधून टागोरांचं नाव सर्व संमत झालं. तारेने ही बातमी टागोरांना कळविण्यात आली, जी टागोरांना २२ नोव्हेंबर १९१३ रोजी मिळाली. संपूर्ण शांती निकेतन या बातमीने हर्षभरीत झालं व २३ नोव्हेंबरला तिथे टागोरांचा भव्य सत्कार करण्यात आला. या कार्यक्रमाला जगदीशचंद्र बोस प्रमुख पाहुणे होते. सुमारे पाचशे उत्साहित प्रशंसकांना घेऊन एक खास रेल्वे गाडी कलकत्त्याहून बोलपूरला म्हणजे शांतीनिकेतनला या कार्यक्रमासाठी आली.

नोबेल पुरस्कार सोहळ्याला स्वीडन येथे वेळेत पोहोचू शकत नसल्यामुळे, समारंभाला टागोर उपस्थित राहू शकले नाहीत. मात्र त्यांनी पाठविलेले लिखित भाषण समारंभात वाचून दाखविण्यात आले.

नंतर तो पुरस्कार व मानपत्र २७ जानेवारी १९१४ रोजी बंगालचे गव्हर्नर लॉर्ड कारमिशेल यांच्या मार्फत राजभवनात टागोरांना समारंभ पूर्वक दिले गेले.

—–

☆ गीत : ८५ ☆

WHEN the warriors came out first from their master’s hall, where had they hid their power? Where were their armour and their arms?

They looked poor and helpless, and the arrows were showered upon them on the day

they came out from their master’s hall.

When the warriors marched back again to their master’s hall where did they hide their power?

They had dropped the sword and dropped the bow and the arrow; peace was on their

foreheads, and they had left the fruits of their life behind them on the day they marched back again to their master’s hall.

——

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८५ ☆

अज्ञात जगातून येथे येती

शस्त्रे अस्त्रे मुळीच नसती

*

ज्ञात जगाच्या या पटलावर

धावा बोलती सारे त्यांवर

*

सामर्थ्याला टांगून शमीवर

अज्ञातवासा का येती भूवर

*

चिलखत देखिल नसते तेंव्हा

होत बाणांचा वर्षाव जेंव्हा

*

धैर्याची तो प्रचिती देऊन

साही यातना संयम राखून

*

परतण्याची मग वेळा येता

जाती ठेवून शांती चित्ता

*

कर्मफले पण इथेच त्यागुनि

प्रभुच्या चरणी जाती परतुनि

भावानुवाद ©️ शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—– 

☆ गीत : ८६ ☆

DEATH, thy servant, is at my door. He has crossed the unknown sea and brought thy

call to my home.

The night is dark and my heart is fearful yet I will take up the lamp, open my gates and

bow to him my welcome. It is thy messenger who stands at my door.

I will worship him with folded hands, and with tears. I will worship him placing at his feet the treasure of my heart.

He will go back with his errand done, leaving a dark shadow on my morning; and in my

desolate home only my forlorn self will remain as my last offering to thee.

—– 

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८६ ☆

मृत्यू उभा दारात येऊनि

अज्ञाताचा सागर लांघुनि

*

तुझिया आमंत्रणा घेऊनि

हृदयक्रंदना जरा थोपवुनि

*

पायघड्यांस्तव तया अंथरुनि

दीप लावुनि स्वागत करुनि

*

पूजन त्याचे हात जोडुनि

जाईल परतुनि कार्या करुनि

*

आत्मा नेईल देहा सोडुनि

तोच देह मग तुला अर्पुनि

*

शेवटची आहुती टाकुनि

यज्ञकुंड ते देईन शांतवुनि

भावानुवाद ©️ शोभना आगाशे

संपर्क: ९४५०२२८६५८

—– 

☆ गीत : ८७ ☆

IN desperate hope I go and search for her in all the corners of my room; I find her not.

My house is small and what once has gone from it can never be regained. But infinite is

thy mansion, my lord, and seeking her I have come to thy door. I stand under the golden canopy of thine evening sky and I lift my eager eyes to thy face.

I have come to the brink of eternity from which nothing can vanish ⎯ no hope, no

happiness, no vision of a face seen through tears.

Oh, dip my emptied life into that ocean, plunge it into the deepest fullness.

Let me for once feel that lost sweet touch in the allness of the universe.

—– 

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८७ ☆

शोधशोधुनि तिज माझ्या कुटीरी

आलो तुझिया भव्य मंदिरी॥

*

हुलकावणी मज देऊन गेली

पुन्हा न माझ्या घरी परतली॥

*

इथे उभा मी तुझिया द्वारी

सुवर्णमंडित आकाशमंदिरी॥

*

जीस गमावले तिच्या प्राप्तीचा

मार्ग दावशील तू खात्रीचा॥

*

शाश्वततेच्या काठावर तो

सुखदुःखांचा नाश न होतो॥

*

रिक्त माझे जीवन फिरुनि

पुनःपुन्हा तू देशी भरुनि॥

*

स्पर्शू दे मज त्या विश्वाला

जन्म पुनश्च देई मजला॥

– क्रमशः भाग २९..

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares