हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अनवरत परम्परा  

नर्मदा परिक्रमा के विषय में प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल बेगड़ ने अपने अनुभव साझा किए हैं। जेडीए अध्यक्ष डॉ. विनोद मिश्रा ने भी अपनी पुस्तक में नर्मदा परिक्रमा के अद्भुत अनुभवों को साझा किया है। रमनगरा निवासी वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य पं.मोतीराम शास्त्री की रचना पय: पानम् को राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। मनीषियों ने लिखा है कि नर्मदा का स्वरूप आल्हादित करने वाला है। नर्मदा के कल-कल निनाद में शिवत्व का बोध होता है। नर्मदा की उछलती लहरों का नृत्य अंत:पुर के दरवाजों को खोल देता है। इसका आध्यात्मिक सुख अवर्णनीय है। वहीं भू-जल विद विनोद दुबे का कहना है कि नर्मदा जल में वैक्टीरिया को खत्म करने की अद्भुत शक्ति है। नर्मदा घाटी में युगीन सभ्यता बिखरी पड़ी है। लोगों की इस पर नजर पड़े, वे इसके महत्व को समझें। संभवत: इसलिए ही नर्मदा परिक्रमा की परम्परा प्रारंभ हुई होगी। पाषाण में तब्दील हो चुके नर्मदा के किनारे पेड़-पौधों व पत्थरों के अलावा नर्मदा घाटी के रहस्यों पर आज भी अनेक शोध चल रहे हैं। तीन बार नर्मदा परिक्रमा कर चुके रामदास अवधूत का मानना है कि आज भी कई अदृश्य शक्तियां और देवता नर्मदा की परिक्रमा करते रहते हैं। नर्मदा की परिक्रमा उद्गम स्थल अमरकंटक से या फिर ओंकारेश्वर से प्रारंभ की जाती है, जो पैदल तीन साल, तीन माह और तेरह दिन में (दोनों तट) पूर्ण होती है। वाहनों पर लोग इसे 108 दिन में भी पूरा कर लेते हैं। परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले श्रद्धालु इसका संकल्प लेते हैं और फिर पूजन के बाद मां नर्मदा को एक कड़ाही प्रसाद भेंट करते हैं। कड़ाही प्रसाद से ही कन्याओं और सुपात्र ब्राम्हणों को भोजन कराया जाता है।

हमारी पहली परिक्रमा रामलला के आशीर्वाद और शनि महाराज के दर्शन से शुरू हुई। पुराने साथी मित्र और पड़ौसी श्री एल पी दुबे जी ने पुष्पमालाओं और मिठाई से परिक्रमा वासियों को विदाई दी। उनका प्रेममय व्यवहार आज की पूरी यात्रा मे परिक्रमा वासियों के बीच चर्चित रहा। अरुण श्रीवास्तव, आर.व्ही. अग्रवाल, एल.एन. अग्रवाल, अनिल मिश्रा, के.एल, सोनीजी आदि भी ग्वारी घाट मिलने और सद्भावना व्यक्त करने आये। अमृत लाल बेगड की धर्मपत्नी श्रीमती कांता बेगड के ममतामयी सानिध्य से परिक्रमा की शुरुआत हुई। उन्होंने सर्वाधिक मान बढ़ाया, जब हम और अरुण दनायक उनसे आशीर्वाद  लेने  पहुँचे तब उन्होंने छोटी-छोटी अनेक बातें नर्मदा यात्रा को लेकर बताई। श्री टी. पी. चौधरी दम्पत्ति ने तिलवारा घाट पर पहुँच कर अत्यंत प्रेमपूर्वक परिक्रमा वासियों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने सपत्नीक फूल मालाओं से परिक्रमा वासियों का स्वागत किया। फल नारियल भेंट किए। स्नेही जनों का प्रेम इस यात्रा मे मिलना अपने आप मे आह्लादकारक रहा। हमारे मित्र श्रीवर्धन नेमा जी स्टेट बैंक अधिकारी संघ के उप-महासचिव हैं। उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक जबलपुर में रहवास भोजन की व्यवस्था कराई और ग्वारीघाट से तिलवारा घाट तक परिक्रमा यात्रा में साथ चले। उनके विनम्र स्वभाव से हमारा मन अभिभूत हो गया।

नर्मदा परिक्रमा:पहला चरण

ग्वारी घाट से झाँसी घाट

पहली यात्रा 13 अक्टूबर 2018 को ग्वारी घाट से प्रारम्भ हुई। हमारे दल में एक रिटायर्ड सैनिक कोलिता थे। वे अपनी उम्र 100 से ऊपर बताते थे, परंतु लगते नहीं थे। बुज़ुर्ग लोगों को अक्सर अपनी उम्र बढ़ाकर बताने की आदत हो जाती है। फिर भी वे 80-90 के बीच के तो थे। उनके दाहिने पैर में गोली लगी थी। उनका बैग सबसे भारी था। चैन भी ख़राब हो गई तो सेफ़्टी पिन लगाकर बैग पीछे डंडे में फँसाकर थोड़ा लँगड़ा कर चलते थे। फिर भी कई बार सबसे आगे निकल जाते थे। उनकी याददाश्त कमज़ोर हो गई है। अक्सर भूल जाते थे। हर बार पूछते थे कि अब होशंगाबाद आएगा। चलते-चलते जब लोग चिड़चिड़े हो जाते तो भुनभुनाने लगते। जगमोहन अग्रवाल कई ट्रैकिंग अभियान में जा चुके हैं। वे कोलिता जी को साथ लाए थे। दनायक जी ने अग्रवाल जी से कहा कि यार अगली बार इनको मत लाना। कहीं भी आगे निकल जाते हैं, भूल जाते हैं। अग्रवाल जी ने कोलिता जी को झिड़की पिलाई कि बीच में चला करो। जब थकान उतरती तो सब सामान्य हो जाते थे। लेकिन तब से कोलिता जी मेरे के पीछे चलने लगे। कोलिता जी सेना की ट्रेनिंग के हिसाब से क़दम गिन कर किलोमीटर का हिसाब लगाने में माहिर हैं। उनका अन्दाज़ कभी ग़लत नहीं हुआ। एक बार मैंने उनको जानबूझकर बातों में लगा लेने के बाद तय दूरी किलोमीटर में पूछी तो उन्होंने कहा कि क़दम गिनना भूल गए। अन्दाज़ से दूरी बताई वह वास्तविक दूरी के आसपास थी। एक बात है यदि क़दम गिनते रहो तो थकान का अहसास नहीं होता।

एक जगह भूख पर चर्चा चल पड़ी। सृष्टि का आधार भूख है। ऋग्वेद में ऋचाओं के सूत्र हैं कि कहीं कुछ नहीं था, अंतरिक्ष भी नहीं, ब्रह्माण्ड भी नहीं। सब कुछ शून्य था। एक शून्य हिरण्य गर्भ कहा गया है। दूसरा ब्रह्म अस्तित्व शिव तत्व। बिग बेंग सिद्धांत से हॉकिंग ने इसी की पुष्टि की है। गैसों का एक महावलय पूरी तीव्रता से गोलाकार घूमने लगा। उसकी गहराई में सृष्टि का अंड जन्मा। शिव के बीज तत्व ने पूरी तीव्रता से उसके अंदर प्रवेश किया तब वह अंड प्रस्फुटित हुआ और ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया, अंतरिक्ष में ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं। हम सब सृजन करने के लिए उसी प्रक्रिया को दोहराते हैं। अंड की फूटने की भूख और शिवतत्व की सघन ऊर्जा की सृजन भूख से जगत निर्माण हुआ है। ब्रह्म का अंड से मिलन हुआ ब्रह्माण्ड। सृष्टि का यह विधान हम सब अनिवार्यत: पूरा करने को प्रकृति के वशीभूत हैं। परिक्रमा यात्रा में सुबह से भूखे पेट आठ-दस किलोमीटर चलने के बाद भी भूख का अहसास न होना चमत्कारी तो है ही, वैज्ञानिक भी है। सूर्य ऋग्वेद का देवता है। ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का सबसे बड़ा श्रोत सूर्य है। जिसमें अणुओं के खंडन-विखंडन की सतत प्रक्रिया चल रही है। वह बिना कुछ खाए ऊर्जा पैदा कर रहा है। परिक्रमा यात्री जब लगातार चलता है तब उसकी देह सूर्य के समान सतत ऊर्जा पैदा करने लगती है। सूर्य जैसा हो जाना ही सूर्योंपासना है। यात्री की अस्थियाँ, मांसपेशियाँ, स्नायुतंत्र और ग्रंथियाँ ऊर्जा का सघन वलय बनकर शरीर में शक्ति पैदा करतीं हैं। विजातीय पदार्थ द्रव्य बनकर पसीने के साथ देह से बाहर होता जाता है। मनुष्य की भूख के कई स्तर हैं। पेट की भूख, शरीर की भूख, मन की भूख, मस्तिष्क की भूख और आत्मा की भूख। पेट की भूख पूरी होते ही शरीर की भूख जागती है। शरीर की भूख पूरी होने पर मन की भूख जागती है। अंत में आत्मा की भूख अन्तरात्मा को जानने की जागती है। भूखों का नियोजन ही मानव जीवन है। इसी भूख के नियोजन में छुपे हैं पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता और सदाचार-भ्रष्टाचार के मूल्य। देह की भूख भोजन की भूखी है, मस्तिष्क की भूख प्रशंसा माँगती है। मन की भूख रंजन की और आत्मा की भूख समर्पित आस्था की दरकार है। भूख से आध्यात्म का यह अर्थगहन नर्मदा यात्रा की अद्भुत उपलब्धि है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५१ – आलेख – मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५१ ☆

☆ आलेख ☆ ~ मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां  एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।

साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो  वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और  उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये  सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज  लिखता हूँ या  अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।

एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने  जब यह जानना चाहा था  कि  मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में  कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी)  क्षत्रियों का गांव है।

मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों  तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी  ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।

इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव  मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए,  सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर  यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे  थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री  उदय शंकर सिंह जी से  मिला।

यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।

अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।

होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।

वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।

उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है,  किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था।

छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण  स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे,  उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।

गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में  बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे  ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिणा दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना,   मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।

वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।

शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है ।

यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना,  उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था ।

विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न,  धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में  बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।

मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।

अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी ।  या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।

दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं   मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।

आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा।   आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना  था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।

यद्यपि आजकल मैं  उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।

यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है।  उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है ।  पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं,  वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।

यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया ।

इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।

सादर

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में  स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मन और वाणी।)

☆ कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

हो कमान जब वाणी पर तो, दे अलग पहचान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

क्यों लड़ना है प्यारे तुझको, जीवन क्षणभंगुर।

पल का भी क्या तनिक भरोसा, किस नशे में चूर।।

प्रेमभाव की बोली से ही, तेरी बढ़े शान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

शब्द चीर देते हैं मन को, गहरा लगे घाव।

बरसों के संबंध मिटाता, कुछ पलों का ताव।।

करो मौन ये वाणी जब हो, मन में घमासान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

बातें सुन मिश्री सी मीठी, मन में जगे आस।

हो अवसाद दूर जीवन से, सारा मिटे त्रास।।

त्याग करें कटुता का हम भी, दो हमे वरदान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०३ ☆ गीत – ।। बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०३ ☆

☆ गीत ।। बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है।

सूख रहा पौधा भी रोज  सींच कर हरा बनता है।।

**

अच्छा भलाआदमी भी जल-भुन के खाक हो जाता है।

अहंकार में पलते-पलते  आदमी राख हो जाता है।।

आचरण में शिक्षा को उतार आदमी ज्ञान भरा बनता है।

बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है।।

***

सुख समृद्धि में नहीं संघर्ष कष्ट में आदमी निखरता है।

कठनाईं में भी आगे  बढ़ कर ही आदमी संवरता है।।

अपने बुरे वक्त से लड़ कर आदमी निर्भिक बनता है।

बदरंग सोना तप कर तराश कर खरा बनता है।।

**

अगर रास्ते जिद्दी तो मंजिल पाने की जिद बढ़ जाती है।

अगर चलते ही रहे तो मुश्किल  खुद ही घट जाती है।।

जन्म काफी नहींअपने कर्म से इंसान धरा पर बनता है।

बदरंग सोना तप कर तराश कर खरा सोना बनता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६६ ☆ कविता – बापू का सपना… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – बापू का सपना …। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६६

☆ बापू का सपना…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

बापू का सपना था—भारत में होगा जब अपना राज ।

गाँव-गाँव में हर गरीब के दुख का होगा सही इलाज ॥

*

कोई न होगा नंगा – भूखा, कोई न तब होगा मोहताज ।

राम राज्य की सुख-सुविधाएँ देगा सबको सफल स्वराज ॥

*

पर यह क्या बापू गये उनके साथ गये उनके अरमान।

रहा न अब नेताओं को भी उनके उपदेशों का ध्यान ॥

*

गाँधी कोई भगवान नहीं थे, वे भी थे हमसे इन्सान ।

किन्तु विचारों औ’ कर्मों से वे इतने बन गये महान् ॥

*

बहुत जरूरी यदि हम सबको देना है उनको सन्मान ।

हम उनका जीवन  समझें, करे काम कुछ उन्हीं समान ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३९ आणि ४० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३९ आणि ४० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ३९ – – 

जया वर्णिती वेदशास्त्रे पुराणे |

जयाचेनि योगे समाधान बाणे|

तयालागी हे सर्व चांचल्य दीजे |

मना सज्जना राघवी वस्ती कीजे|३९|

अर्थ : ज्या परमेश्वराचे वर्णन वेद, शास्त्रे आणि पुराणे करतात, ज्याच्या जवळ गेल्याने आपल्याला अक्षय समाधान लाभते, अशा परमेश्वराला आपल्या मनातील सर्व प्रकारची चंचलता अर्पण करावी. मनाने त्याचेच होऊन राहावे.

विवेचन : माणूस आयुष्यभर सुखाच्या पाठी धावत असतो परंतु एवढी धावपळ करूनही आयुष्याच्या अखेरीपर्यंत त्याला ते गवसत नाही. आपल्या पूर्वजांनी ऋषीमुनींनी देखील समाधानाचा शोध घेतला अखेरीस त्यांना ते भगवंताच्या ठिकाणीच आहे असे आढळून आले. त्याचेच वर्णन आपले वेद, शास्त्रे आणि पुराणे करतात. म्हणून समर्थ देखील आपल्याला सांगतात की जयाचेनि योगे समाधान बाणे. त्याचा योग म्हणजे संबंध आला की अंगी समाधान बाणते म्हणजे त्याची प्रचिती येते.

संत तुकाराम महाराज म्हणतात, “ठेविले अनंते तैसेची राहावे, चित्ती असू द्यावे समाधान. ” हे आपल्याला कळते पण वळत नाही आणि आपला सुखाचा आणि समाधानाचा शोध सुरूच राहतो. प्रत्येक परिस्थितीत आपली सुखाची आणि समाधानाची व्याख्या बदलत जाते. मला नोकरी लागली म्हणजे मी सुखी होईल, माझ्या पगारात वाढ झाली म्हणजे मी सुखी होईल, माझ्याकडे आज चार चाकी आहे, उद्या त्यापेक्षा आणखी चांगल्या प्रकारचे वाहन आले म्हणजे मला समाधान लाभेल. आणखी जमीन, आणखी घरे, बंगले यासारख्या गोष्टी माणूस मिळवण्यासाठी माणूस धडपड करतो आणि त्यासाठी आयुष्यभर धाव धाव धावतो. परंतु त्याची हाव संपत नाही. कुठे थांबायचे हे त्याला कळत नाही.

एका शेतकऱ्याची गोष्ट फार सुंदर आहे. तो आपल्या शेताच्या बांधावर आरामात झोपला होता. त्याची एका मोक्याच्या ठिकाणी शेतजमीन होती. शहरातून आलेला एक कारखानदार ती जमीन विकत घेऊन तिथे कारखाना काढण्याच्या तयारीत होता. तो त्या शेतकऱ्याला म्हणाला, “तू मला ही जमीन दिलीस तर मी तुला भरपूर पैसे देईन. तू श्रीमंत होशील. ” शेतकऱ्यांनी विचारले, ” भरपूर पैसे मिळाल्यावर आणि श्रीमंत झाल्यावर काय होईल ?” जमीनदार म्हणाला, ” वेडा आहेस का ?अरे तू अत्यंत समाधानात राहशील. ” शेतकरी म्हणायला, ” मग त्यासाठी जमीन विकायची काय गरज आहे ? मी आत्ता देखील समाधानीच आहे. ” एका सामान्य शेतकऱ्याला जी गोष्ट कळली ती आपल्याला कळत नाही.

परमेश्वर प्राप्तीच्या आड जर काही येत असेल तर ते म्हणजे आपले मन ! आपले मन अतिशय चंचल आहे आणि ही गोष्ट सगळ्यांनाच माहिती आहे. म्हणून तर एका गाण्यात म्हटले आहे, ” माझिया मना जरा जरा थांब ना, तुझे धावणे अन् मला वेदना !” म्हणून समर्थ म्हणतात की आपले हे चांचल्य म्हणजे चंचलता भगवंताला अर्पण करून आपली चित्त त्याच्याकडे केंद्रित करावे. त्याचे ध्यान लागावे.

गीतेत भगवंत म्हणतात ” सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ” सर्वधर्म म्हणजे आपली सुखदुःखे, कर्म, वासना आदी सगळे भगवंताला अर्पण करून त्याला शरण जावे. तो आनंदनिधान आहे. अक्षय सुख आणि समाधान त्याच्याच ठायी आहे.

स्वसंवाद :: 

१) मी ज्या सुखाच्या शोधात धावत आहे, ते खरोखरच मला समाधान देणारे आहे का? की ही केवळ अंतहीन धावपळ आहे?

२) माझ्या मनातील चंचलता, अपेक्षा आणि असंतोष मी कधी परमेश्वराला अर्पण करण्याचा प्रयत्न केला आहे का?

३) “समाधान” ही बाह्य गोष्टींमध्ये नसून अंतर्मनात आहे हे मला खरेच पटले आहे का? (क्रमशः)

– – – – 

श्लोक क्र. ४० – – 

मना पाविजे सर्वही सुख जेथे ।

अती आदरे ठेविजे लक्ष तेथे ।

विवेके कुडी कल्पना पालटीजे ।

मना सज्जना राघवी वस्ती कीजे ।४०।

अर्थ :  समर्थ आपल्या मनाला सांगतात की हे मना, सर्व सुखे जिथे प्राप्त होतात अशा त्या परमेश्वराकडे अतीव अशा आदराने आपले लक्ष केंद्रित कर. योग्य अयोग्यतेचा विचार करून वाईट विचारांचा/कल्पनांचा त्याग कर आणि राघवाच्या ठिकाणी आपले मन असू दे.

विवेचन : आधीच्या श्लोकात आपण पाहिले की सुखाची आणि समाधानाची प्रत्येकाची कल्पना वेगवेगळी असते. कोणाला पैसा हवा असतो, कोणाला यश तर कोणाला कीर्ती तर कोणाला आणखी काही… माणूस क्षणिक मोहाला बळी पडतो आणि त्या सुखाच्या मागे धावतो परंतु अंतिमतः सुखाऐवजी दुःखच पदरात पडते. क्षणकाल टिकणाऱ्या सुखासाठी आपण फार मोठी किंमत मोजून दुःख पदरात घेतो.

काम, क्रोध, लोभ, मोह यासारख्या विकारांनी मन दूषित होते. असे मन आणखी वाईट विचारांना जन्म देते. माणसाची दिवसेंदिवस अधोगती होत जाते. ज्याप्रमाणे गढूळ पाण्यात आपल्याला प्रतिबिंब दिसत नाही तसेच नाना प्रकारच्या विकारांनी दूषित झालेल्या मनात भगवंताचे प्रतिबिंब पडणे शक्य नसते. म्हणूनच अशा वाईट विचारांचा विवेकपूर्वक त्याग करणे आवश्यक असते. कुडी कल्पना म्हणजे वाईट विचार. ज्या गोष्टी किंवा जे विचार भगवंतापासन दूर नेतात, त्या सगळ्या गोष्टी म्हणजे कुडी कल्पना असे म्हणता येईल. म्हणून तर “सदाचार हा थोर सांडू नये तो, जनी तोचि तो मानवी धन्य होतो” हे समर्थांनी सुरुवातीलाच आपल्याला सांगितले आहे.

एखाद्या विद्वत् सभेत जर विद्वानांना एखाद्या विषयावर त्यांचे मत विचारले तर प्रत्येकाची वेगवेगळी मते येतील. तात्पर्य त्यांच्यामध्ये एकाच विषयावर एकवाक्यता नसते. पण जर सर्व खऱ्या संतांचा (भोंदू बाबा नव्हे) मेळा भरला आणि त्यांना जर अंतिम सुख आणि समाधान कशात आहे हे विचारले तर त्या विषयावर त्यांचे एकमत होईल, एकवाक्यता असेल आणि एका सुरात “भगवंत” असेच उत्तर त्यांच्याकडून येईल.

संत हे ईश्वराचे प्रतिनिधी असतात नव्हे ईश्वर स्वरूपच असतात. परमेश्वराकडे जाण्याचा मार्ग ते आपल्याला दाखवतात. त्यांना लोकांच्या कल्याणाची तळमळ असते. जर अशा सर्व संतांचे अंतिम समाधान हे भगवंताच्या ठायी आहे असे एकमत असेल तर आपण ते का स्वीकारू नये ? 

क्षणिक सुखाच्या मागे लागण्यापेक्षा मग संत सांगतात तो मार्ग का स्वीकारू नये ? पंढरीचे सुख नाही त्रिभुवनी, प्रत्यक्ष चक्रपाणि उभा असे.. असे संत चोखामेळा आपल्याला सांगतात. तर देवाचिये द्वारी उभा क्षणभरी, तेणे मुक्ती चारी साधियेल्या… असे संत ज्ञानेश्वर माऊली म्हणतात. संतांचे हे सांगणे आपण लक्षात घ्यायचे नाही का? थोडा विचार केला म्हणजेच विवेकाने वागायचं ठरवलं तर ही गोष्ट आपल्याला पटेल. म्हणून संतांचे सांगणे शिरोधार्य मानून आपण विवेकाने वाईट विचारांचा त्याग करावा आणि राघवाकडे आपले मन लावावे.

स्वसंवाद :: 

१) माझे मन गढूळ आहे की स्वच्छ – आज माझ्या मनात कोणते विचार जास्त असतात, चांगले की वाईट ?

२) विद्वान आणि संत यांच्यात फरक आहे – मी माझ्या जीवनात कोणाचे मार्गदर्शन घेतो, बुद्धीचे की श्रद्धेचे ?

३) “विवेके कुडी कल्पना पालटीजे” – आज मी कोणत्या एका वाईट विचाराचा किंवा सवयीचा विवेकाने त्याग करण्यास तयार आहे ?

४) संत चोखामेळा, ज्ञानेश्वर, तुकाराम सर्वांनी एकमताने भगवंत हेच अंतिम सुख सांगितले – हे माझ्या मनाने खरोखर स्वीकारले आहे का ?

– क्रमशः श्लोक ३९ आणि ४०.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२१ ☆ प्रकृति सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रकृति सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – राह दिखा जाओ / स्वर- डॉ. निशा आग्रवाल, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२० ☆

☆ प्रकृति सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

मानव व प्रकृति का संबंध अनादि व अखंड है। प्रकृति का सामान्य अर्थ है–समस्त चराचर में स्थित सभी वनस्पति,जीव व पदार्थ, जिनके निर्माण में मानव का हाथ नहीं लगा; अपने स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य भी आ जाता है, जो प्रकृति का अंग है और शेष सृष्टि उसकी रंगभूमि है। सो! उसकी अन्त:प्रकृति उससे अलग कैसे रह सकती है? मनुष्य प्रकृति को देखता व अपनी गतिविधि से उसे प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित हो बदलता-संवरता है; तत्संबंधी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। उसी के माध्यम से वह जीवन को परिभाषित करता है। मानव प्रकृति के अस्तित्व को हृदयंगम कर उसके सौंदर्य से अभिभूत होता है और उसे चिरसंगिनी के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है और उसे मां के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है।

मानव प्रकृति के पंचतत्वों पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि, आकाश व सत्,रज,तम तीन गुणों से निर्मित है…फिर वह प्रकृति से अलग कैसे हो सकता है? जिन पांच तत्वों से प्रकृति का रूपात्मक व बोधगम्य रूप निर्मित हुआ है,वे सब इंद्रियों के विषय हैं। इन पांच तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ही असंख्य रूपों में मानव चेतना के कोश को कर्म, चिन्तन, कल्पना, भावना, भावुकता, संकल्प, जिज्ञासा, समाधान आदि से कितना समृद्ध किया है–इसका अनुमान मानव की उपलब्धियों से लगाया जा सकता है। प्रकृति का वैभव अपरिमित एवं अपार है। उसकी पूर्णता को न दृष्टि छू सकती है, न ही उसकी सीमाओं तक कान ही पहुंच सकते हैं और न ही क्षणों की गति को मापा जा सकता है। प्रकाश व शब्द की गति के साथ कौन दौड़ लगा सकता है? प्रकृति के अद्भुत् सामर्थ्य व निरंतर गतिशीलता के कारण उसमें देवत्व की स्थापना हो गयी तथा उसकी अतिन्द्रियता, अद्भुतता, उच्चता, गहनता आदि के कारण उसे विराट की संज्ञा प्रदान की गयी है। विराट में मानव,मानवेतर प्राणी व अचेतन जगत् का समावेश है। अचेतन जगत् ही प्रकृति है और जगत् का उपादान अथवा मूल तत्व है। वह स्वयंकृत, चिरंतन व सत्य है। उसका निर्माण व विनाश कोई नहीं कर सकता। प्रकृति के अद्भुत् क्रियाकलाप व अनुशासनबद्धता को देख कर मानव में भय, विस्मय, औत्सुक्य व प्रेम आदि भावनाओं का विकास हुआ, जिनसे क्रमश: दर्शन, विज्ञान व काव्य का विकास हुआ। सो! मानव मन में आस्था, विश्वास व आदर्शवाद जीवन-मूल्यों के रूप में सुरक्षित हैं और विश्व में हमारी अलग पहचान है। सम्पूर्ण विश्व के लोग भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं। रामायण व महाभारत अद्वितीय ग्रंथ हैं और गीता को मैनेजमेंट गुरू स्वीकारा जाता है। उसे विश्व के विभिन्न देशों में पढ़ाया जाता है। यह एक जीवन-पद्यति है; जिसे धारण कर मानव अपना जीवन सफलतापूर्वक बसर कर सकता है।

प्रकृति हमारी गुरू है, शिक्षिका है, जो जीने की सर्वोत्तम राह दर्शाती है। प्रकृति हमारी जन्मदात्री मां के समान है और हमारी प्रथम गुरू कहलाती है और जो संस्कार व शिक्षा हमें मां से प्राप्त होती हैं, वह पाठ संसार का कोई गुरू नहीं पढ़ा सकता। प्रकृति हमें सुक़ून देती है; अनगिनत आपदाएं सहन करती है और हम पर लेशमात्र भी आँच नहीं आने देती। वह हमारी सहचरी है; सुख-दु:ख की संगिनी है। दु:ख की वेला में यह ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाती भासती है, जो सुख में मोतियों-सम प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, दु:ख में प्रकृति मां के समान धैर्य बंधाती है।

प्रकृति हमें कर्मशीलता का संदेश देती है और उसके विभिन्न उपादान निरंतर सक्रिय रहते हैं।क्षरात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर, अमावस के बाद पूनम व विभिन्न मौसमों का यथासमय आगमन समय की महत्ता व गतिशीलता को दर्शाता है। नदियाँ निरंतर परहिताय प्रवाहशील रहती हैं। इसलिए वे जीवन-दायिनी कहलाती हैं। वृक्ष भी कभी अपने फलों का रसास्वादन नहीं करते तथा पथिक को शीतल छाया प्रदान करते हैं। वे हमें आपदा के लिए संचय करने को प्रेरित करती है। जैसे जल के अभाव में वह बंद बोतलों में बिकने लगा है। बूंद-बूंद से सागर भर जाता है और जल को बचा कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। वायु भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। परंतु मानव की बढ़ती लालसाओं ने जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के महल बनाकर पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत वृद्धि की है, जिसका विकराल रूप हमने कोरोना काल में आक्सीजन की कमी के रूप में देखा है; जिसके लिए लोग लाखों रुपये देने को तत्पर थे। परंतु उसकी अनुपलब्धता के कारण लाखों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। काश! हम प्रकृति के असाध्य भंडारण व असाध्यता का अनुमान लगा पाते कि वह हमें कितना देती है? हम करोड़ों-अरबों की वायु का उपयोग करते हैं; अपरिमित जल का प्रयोग करते हैं; वृक्षों का भी हम पर कितना उपकार है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कार्बन-डॉयोक्साईड लेकर हमें आक्सीजन देते हैं। इतना ही नहीं, वे हमें अन्न व फल-फूल देते हैं, जिससे हमें जीवन मिलता है।

मानव व प्रकृति का संबंध अटूट, चिरंतन व शाश्वत् है। प्रकृति विभिन्न रूपों में हमारे सम्मुख बिखरी पड़ी है। प्रकृति के कोमल व कमनीय सौंदर्य से प्रभावित होकर कवि उसे कल्पना व अनुभूति का विषय बनाता है, जो विभिन्न काव्य- रूपों में प्रकट होती है। यदि हम हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो प्रकृति हर युग में मानव की प्रेरणा-शक्ति ही नहीं रही, उसकी चिर-संगिनी भी रही है। वैदिक-कालीन सभ्यता का उद्भव व विकास प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में हुआ। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने प्रकृति के प्रति जहां अनुराग व्यक्त किया, वहीं उसके उग्र,रम्य व मानवीकरण आदि रूपों को अपनाया। ऋग्वेद मानव सभ्यता का प्राचीनतम ग्रंथ है। प्रकृति के दिव्य सौंदर्य से अभिभूत होकर जहां मानव उसके उन्मुक्त सौंदर्य का बखान करता है; वहीं विराट के प्रति भय, विस्मय श्रद्धा आदि की अनुभूतियों में अनंत सौंदर्य का अनुभव करता है। वाल्मीकि का प्रकृति-जगत् के कौंच-वध की हृदय-विदारक घटना से उद्वेलित आक्रोश व करुणा से समन्वित शोक का प्रथम श्लोक रूप में प्रस्फुरण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भावातिरेक या अनुभूति की तीव्रता ही कविता की मूल संजीवनी शक्ति है। महाभारत में प्रकृति केवल पर्वत, वन, नदी आदि का सामान्य ज्ञान कराती है। नल दमयंती प्रसंग में वह प्रकृति से संवेदनात्मक संबंध स्थापित न कर, स्वयं को अकेला व नि:सहाय अनुभव करती है।

कालिदास को बाह्य-जगत् का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकारा जाता है। उनका प्रकृति-चित्रण संस्कृत साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वे प्रकृति को मूक, चेतनहीन व निष्प्राण नहीं मानते, बल्कि वे उसमें मानव की भांति सुख- दु:ख व संवेदनशीलता अनुभव करते हैं। इस प्रकार अश्वघोष, भवभूति, भास, माघ, भारवि, बाणभट्ट आदि में प्रकृति का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है।

हिन्दी साहित्य के आदिकाल अथवा पूर्व मध्य-कालीन काव्य में प्रकृति का उपयोग पृष्ठभूमि, उद्दीपन व उपमानों के रूप में हुआ। विद्यापति के काव्य में प्रकृति कहीं-कहीं उपदेश देती भासती है और आत्मा परमात्मा में इस क़दर लीन हो जाती है, जैसे समुद्र में लहर और भौंरों का गुंजन नायिका को मान त्यागने का संदेश देता भासता है। वियोग में उनका बारहमासा वर्णन द्रष्टव्य है।

पूर्व मध्यकालीन काव्य में प्रकृति उन्हें माया सम भासती है तथा उन्होंने भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनाया है। कबीरदास जी ‘माली आवत देखि के, कलियन करि पुकार/ फूलि-फलि चुनि लहि, कालहि हमारी बारि’ के माध्यम से मानव को नश्वरता का संदेश देते हैं। दूसरी ओर ‘तेरा सांई तुझ में, ज्यों पुहुपन में वास/ कस्तूरी का मृग ज्यों फिरि-फिरि ढूंढे घास’ के माध्यम से वे मानव को संदेश देते हैं कि ब्रह्म पुष्पों की सुगंध की भाति घट-घट में व्याप्त है, परंतु अज्ञान के कारण बावरा मानव उसे अनुभव नहीं कर पाता और मृग की भांति वन-वन में ढूंढता रहता है। प्रेममार्गी शाखा के प्रवर्त्तक जायसी के काव्य में प्रकृति के उपमान, उद्दीपन व रहस्यात्मक रूपों का चित्रण हुआ है। वे चराचर प्रकृति में ब्रह्म के दर्शन करते हैं। समस्त जड़-चेतन प्रकृति में प्रेमास्पद के प्रतिबिंब को निहारते व अनुभव करते हैं। ‘बूंद समुद्र जैसे होइ मेरा/ मा हिराइ जस मिले न हेरा।’ जिस प्रकार बूंद समुद्र में मिलकर नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार आत्मा भी ब्रह्ममय हो जाती है।

रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास की वृत्ति प्रकृति-चित्रण में अधिक नहीं रमी, तथापि उनका प्रकृति-चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। प्रकृति उनके काव्य में उपमान व उद्दीपन रूप में नहीं आयी, बल्कि उपदेशिका के रूप में आयी है। संयोग में वर्षा व बादलों की गर्जना होने पर पशु-पक्षी व समस्त प्रकृति जगत् उल्लसित भासता है और वियोग में मन की अव्यवस्थित दशा में मेघ-गर्जन भय संचरित करते हैं। मानवीकरण में मनुष्य का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और मानव उसमें अपनी मन:स्थिति के अनुसार उल्लास, उत्साह, आनंद व शोक की भावनाएं- क्रियाएं आरोपित करता है। राम वन के पशु-पक्षियों से सीता का पता पूछते हैं। तुलसी सदैव लोक- कल्याण की भावना में रमे रहे और प्रकृति से उपदेश-ग्रहण की भावना में उन पर श्रीमद्भागवत् का प्रभाव द्रष्टव्य है–’आन छोड़ो साथ जब, ता दिन हितु न होइ/ तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि, तासु रिपु होइ।’ जब कुटुम्बी साथ छोड़ देते हैं, तो संसार में कोई भी हितकारी नहीं रह पाता। कमल का जनक जल जब सूख जाता है, तो उसका मित्र सूर्य भी उसे दु:ख पहुंचाता है।

कृष्ण भक्ति शाखा के अतर्गत सूर, नंददास, रसखान आदि को कृष्ण के कारण प्रकृति अति प्रिय थी। प्रकृति का आलंबन, उद्दीपन व आलंकारिक रूप में चित्रण हुआ है। वियोग में प्रकृति गोपियों को दु:ख पहुंचाती है और वे मधुवन को हरा-भरा देख झुंझला उठती हैं– ‘मधुबन! तुम कत रहत हरे/ विरह-वियोग स्याम सुंदर के ठाढ़ै,क्यों न जरे।’ कहीं-कहीं वे प्रकृति में उपदेशात्मकता का आभास पाते हैं और संसार के मोहजाल को भ्रमात्मक बताते हुए कहते हैं–’यह जग प्रीति सुआ, सेमर ज्यों चाखत ही उड़ि जाय।’ तोते को सेमर के फूल में रूई प्राप्त होती है और वह उड़ जाता है। सूर ने प्रकृति के व्यापारों का मानवीय व्यापारों से अतु्लनीय समन्वय किया है।

उत्तर मध्यकालीन को प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षित नहीं कर पाता। बिहारी को गंवई गांव में गुलाब के इत्र का कोई प्रशंसक नहीं मिलता। केशव को प्राकृतिक दृश्यों के अंकन का अवसर मिला,परंतु वे अलंकारों में उलझे रहे। बिहारी सतसई में जहां मानवीकरण व आलंबनगत रूप चित्रण हुआ, वहीं पर नैतिक शिक्षा के रूप में अन्योक्तियों का आश्रय लिया गया है। इनके प्रकृति-चित्रण में हृदय-स्पर्शिता का अभाव है। सो! प्रकृति उद्दीपन व उपमान रूप में हमारे समक्ष है। ‘ नहीं पराग,नहीं मधुर मधु,नहीं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यौ,आगे कौन हवाल’ के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। ‘जिन-जिन देखे वे सुमन, गयी सो बीति बहार/ अब अलि रही गुलाब की, अपत कंटीली डार।’ यह उक्ति सम्पत्ति-विहीन व्यक्ति के लिए कही गयी है तथा भ्रमर को माध्यम बनाकर प्राचीन वैभव व वर्तमान की दरिद्रावस्था का बखूबी चित्रण किया गया है।

भारतेन्दु युग आधुनिक युग का प्रवेश-द्वार है और इसमें नवीन व प्राचीन काव्य-प्रवृत्तियों का समन्वय हुआ है। प्रकृति मानवीय भावनाओं के अनुरूप हर्ष-विषाद को अतिशयता प्रदान करती, वियोगियों को रुलाती तथा संयोगियों को उल्लसित करती है। इनका बारहमासा वर्णन विरहिणी की पीड़ा को और बढ़ा देता है तथा कहीं-कहीं प्रकृति उपदेश देती भासती है। ‘ताहि सो जहाज को पंछी सब गयो,अहो मन होई’ (भारतेन्दु ग्रंथावली)। अत:जीव जहाज़ के पक्षी की भांति पुन: ब्रह्म में मिलने का प्रयास करता है। बालमुकुंद जी के हृदय में प्रकृति के प्रति सच्चा अनुराग है, जो आलंबन, उद्दीपन व उपमान रूप में उपलब्ध है।

द्विवेदी युगीन कवियों ने प्रकृति को काव्य का वर्ण्य-विषय बनाया है तथा प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है। श्रीधर पाठक, रूपनारायण पाण्डेय, रामनरेश त्रिपाठी आदि ने आलंबनगत चित्र प्रस्तुत किए हैं तथा स्वतंत्रतावादी कवियों ने रूढ़ रूपों को नहीं अपनाया, बल्कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में उसके साधारण चित्रमय, सजीव व मार्मिक रूप प्रदान किए हैं। पाठक ने कश्मीर सुषमा, देहरादून आदि कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्र उपलब्ध हैं। शुक्ल जी ने प्रकृति के आलंबन व त्रिपाठी ने पथिक व स्वप्न खंड काव्यों में प्रकृति का मार्मिक चित्रण किया  है। हरिऔध ने जहां ऐंद्रिय सुख की अनुभूति की, वहीं प्रकृति से उपादान ग्रहण कर नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत, पंचवटी, यशोधरा आदि काव्यों में मनोरम प्राकृतिक चित्रण उपलब्ध है। पंचवटी में प्रकृति की अपूर्व झांकी दिखाई देती है और प्रकृति मानव के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में संबंध स्थापित करती है। साकेत में प्रकृति का मानव व मानवेतर जगत् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वे प्रकृति को सद्गुणों से परिपूर्ण मानते हैं– ‘सर्वश्रद्धा, क्षमा व सेवा की, ममता की वह धर्म में भी प्रतिमा/ खुली गोद में जो उसकी, समता की वह प्रतिमा।’ प्रकृति ममतामयी मां है, जो समभाव से सब पर अपना प्रेम व ममत्व लुटाती है।उपदेशिका की भांति मानव में उच्च विचार व सदाशयता के भाव संचरित करती है। वे भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना के भाव जाग्रत करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहते हैं—‘पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे काम में/ फिर क्यों तुम्ही खोते हो, व्यर्थ के विश्राम में।’ कवि ने सर्वभूतों को सर्वदा व्यस्त दिखाते हुए देशवासियों को आलस्य त्यागने व जाग्रत रहने का संदेश दिया है। रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में प्रकृति के सुंदर, मधुर, मंजुल रूप प्रकट होते हैं, उग्र नहीं। वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मानव-व्यापारों व मानव- संवेदना का आभास पाते हैं।

छायावाद में प्रकृति को स्वछंद रूप प्राप्त हुआ है और उसका उपयोग आध्यात्मिक भावों के प्रकाशन के लिए हुआ है। प्रकृति कवि की चेतना, प्रेरणा व स्पंदन है। इसलिए छायावाद को प्रकृति काव्य के नाम से अभिहित किया गया है।यदि प्रकृति को छायावाद से निकाल दिया जाए, तो वह पंगु हो जाएगा। प्रसाद ने प्रकृति में चेतना का अनुभव किया और वह मधुर, कोमल व सुकुमार भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बन गयी, परंतु कवि ने कामायनी में प्रकृति के भयावह, विकराल व विराट आदि रूपों का दर्शन किया है। वे प्रकृति को सचेतन व सजीव मानकर उसमें अलौकिक सत्ता का दर्शन करते हैं तथा समस्त सृष्टि के कार्य-व्यापारों को सर्वोत्तम शक्ति द्वारा अनुप्राणित स्वीकारते हैं। प्रसाद ने संसार को रंगभूमि मानते हुए कहा है कि मानव यहां अपनी शक्ति के अनुसार संसार रूपी घोंसले में अपनी शक्ति के अनुसार ठहर सकता है, ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का संदेश देता है। पंत प्रकृति के उपासक ही नहीं, अनन्य मित्र थे। उनके काव्य में मानव और प्रकृति का एकात्म्य हो जाता है। मधुकरि का मधुर राग उन्हें मुग्ध करता है और वे ‘सिखा दो न हे मधुप कुमारि/ मुझे भी अपने मीठे गान'(पल्लविनी)। वे प्रकृति के सहचरी, देवी, सखी, जननी आदि रूपों को काव्य में चित्रित करके उनमें अलौकिक सत्ता का आभास पाते हैं और प्रकृति उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है।

निराला के काव्य में प्रकृति के चित्र दिव्य, समृद्ध व रहस्यात्मक रूप में आए हैं। उनके काव्य में दो तत्वों की प्रधानता है-रहस्यवाद व मानवीकरण। उनके काव्य विराटता व उदात्तता की दृष्टि से सराहनीय हैं। प्रकृति उसे सजीव प्राणी की भांति अपना रूप दिखाती, हाव-भावों से मुग्ध करती, संवेदना प्रकट करती उत्साहित करती है। इस प्रकार प्रकृति व मनुष्य का तादात्म्य हो जाता है। बादल प्रकृति को हरा-भरा कर देते हैं, जिससे प्रेरित होकर प्रकृति कर्त्तव्य- पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है।

महादेवी वर्मा सृष्टि में सर्वत्र दु:ख देखती हैं। प्रकृति उनके लिए सप्राण है तथा वे मानव व प्रकृति के लिए एक प्रकार की अनुभूति, सजीवता, विश्रंखलता, आत्मीयता व व्यापकता  का अनुभव करती हैं। वे संसार में प्रियतम को ढूंढती हैं । वे कभी प्रेम भाव में बिछ जाती हैं और जब प्रियतम अंतर्ध्यान हो जाते हैं, वे निराश होकर दु:ख-दैन्य भाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं—‘मैं फूलों में रोती, वे बालारुण में मुस्काते/ मैं पथ में बिछ जाती,वे सौरभ सम उड़ जाते।’ वे प्रकृति के चतुर्दिक प्रियतम के संदेश का आभास पाती हैं और प्रश्न कर उठती हैं — ‘मुस्काता प्रेम भरा नभ,अलि! क्या प्रिय आने वाले हैं?’ वे जीवन को संध्या से उपमित करती हैं ‘प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन’ ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ के माध्यम से वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। वेएक ओर प्रकृति में विराट की छाया देखती हैं और दूसरी ओर अपना प्रतिबिंब पाती हैं। वै छायावाद का आधार स्तंभ-मात्र नहीं हैं, रहस्य व अरूप की साधिका रही हैं।

प्रगतिवाद भौतिकवादी दर्शन है, जिस पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। समस्त सृष्टि का विकास दो वस्तुओं के संघर्ष से होता है, जो द्वंद्व का परिणाम है। यह वैज्ञानिक दर्शन है, जिसमें भावुकता के स्थान पर बुद्धि को स्वीकारा गया है।यह यथार्थवाद पर आधारित है। इन कवियों को जीवन से अनुरक्ति है और प्रकृति से प्रेम है।उन्होंने प्रकृति के उपेक्षित तत्वों व पात्रों को महत्व दिया है और प्रकृति उनके लिए शक्ति- प्रणेता है। वे दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन को देख जीवन के विकास के लिए परिवर्तन-शीलता को अनिवार्य मानते हैं। इनके गीतों पर लोकगीतों कि प्रभाव द्रष्टव्य है।

प्रयोगवादी कविता में प्रकृति के भावात्मक स्वरूप का ग्रहण हुआ अबोध बालक की तरह ईश्वर, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य के विभिन्न स्तरों पर प्रश्न करता है। इन कवियों ने जहां प्रकृति के उपेक्षित व वैज्ञानिक स्वरूपों को ग्रहण किया है,

वहीं प्रकृति में दैवीय सत्ता का आभास न पाकर , भौतिकता के संदर्भ में एक शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। इनका दृष्टिकोण भावात्मक न होकर, बौद्धिक है और प्रकृति के उपेक्षित स्वरूप(कुत्ता, गधा,चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, प्लेटफार्म, धूल, साइरन) को काव्य का विषय बनाया।इन्होंने असुंदर, भौंडे, भदेस आदि में सौंदर्य के दर्शन किए तथि युगबोध के अनुकूल प्रकृति का चित्रण किया। इन्होंने जहां प्रकृति को अपनी मानसिक कुंठाओं की अभिव्यक्ति का साधन बनाया, वहां नवीन उपमानों, बिम्बों को अपने काव्य में प्रतिष्ठित किया तथा मानवीकरण कर मनोरम चित्रण किया है।

नयी कविता प्रयोगवाद का विकसित चरण है तथा इसमें उपलब्ध प्रकृति चित्रण की विशेषता है–ग्राम्य चित्रपटी की अवधारणा। नयी कविता वाद मुक्त है तथा वे जो भी मन में आता है, कहते हैं। वे क्षणवादी हैं और हर पल को जी लेना चाहते हैं,क्योंकि वे भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनमें एक दर्शन का अभाव है। कई बार उन्हें प्रकृति के विभिन्न रूप स्पंदनहीन भासते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में शंका होने लगती है। नये कवियों की विषय-व्यापकता, नया भाव-बोध तथा नवीन दृष्टिकोण सराहनीय है। सो! प्रकृति व मानव का संबंध अनादि काल से शाश्वत् व अटूट रहा है। वह हर रूप में आराध्या रही है। परंतु जब-जब मानव ने प्रकृति का अतिक्रमण किया है, उसने अपना प्रकोप व विकराल रूप दिखाया है, जो प्राकृतिक प्रदूषण व कोरोना के रूप में हमारे समक्ष है। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव नियति के सम्मुख विवश व असहाय भासता है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९३ – नवगीत – मधु मिलन राग… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मधु मिलन राग

? रचना संसार # ९३ – गीत – मधु मिलन राग…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

क्यों कलंकित लोग करते,

हैं सदा अनुराग को।

गा न पाती कोकिला है,

मधु मिलन के राग को।।

*

काँपती है हर कली भी,

अब भ्रमर गुंजार से।

तोड़ बंधन प्रीत के सब,

झाँकते क्यों द्वार से।।

कौमुदी कब तक बचेगी,

दानवों के वार से।

दग्ध हिय प्रतिबिम्ब तेरा,

ताकता है बाग को।

*

सुप्त फेरे प्रीत के हैं,

हारती है दामिनी।

ठग गया है काम तन को,

है बिलखती कामिनी।।

राह प्रियतम नित निहारे,

प्रेम आकुल भामिनी,

पूछती है केश वेणी।

तन लगे इस दाग को

*

रो रहा है देख अम्बर,

टूटते विश्वास को।

छल गया है चाँद छलिया,

फिर मिलन की आस को।।

दे रहे आवाज आँसू,

जा रहे मधुमास को।

नित गरल के घूँट पी कर,

देखते बस झाग को।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२१ ☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

बरगी जल के बाँध में, गूँजी चीख हज़ार।

गोद मिली है नर्मदा, समा रहे जलधार।

*

अश्रु बहे कैसे? रुकें, देखा जब ये त्रास।

हृदय फटा मन रो पड़ा, बुझी जीवनी आस।।

*

करुण दृश्य यह देखकर, मौन रहा आकाश।

सोए नीर समाधि में, कैसे? हों विश्वास।।

*

माँ ने थामा लाल को, लहर बहाती साथ।

बढ़ा रही माँ नर्मदा, देती अपना हाथ।।

*

अन्तस आहत हो रहा, सुनकर करुण पुकार। 

असमय घटना देखकर, मचता हाहाकार।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०३ ☆ कविता – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०३ ☆

कविता – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं☆ श्री संतोष नेमा ☆

ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

देकर   लोभ  लुभा  जाते   हैं ||

आए   कभी  न  वर्षों  से  जो |

गले   लगाकर   सहलाते    हैं ||

*

जन  नेता  बन  जाते  भिक्षुक |

चरण चूमते छलिया झुक-झुक ||

एक  लक्ष्य   बस  सत्ता  पाना |

परिणामों की मन में धुक-पुक ||

जामा  पहने  जन  सेवक  का |

अपना  परचम    फहराते   हैं ||

ये   चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

*

जाति – धर्म   की  बातें  करते |

वादों    के    आडंबर    रचते ||

वोट   खींचने  करते  साजिश |

दाँव-पेंच   में   माहिर   लगते ||

ये   कानून    हाथ   में   लेकर |

प्रतिद्वंदी    को    धमकाते  हैं ||

ये   चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

*

रंग  –  बिरंगे      नारे       रटते |

अपने   स्वयं    कसीदे    गढ़ते ||

इनकी    मोटी   चमड़ी     यारो |

लज्जा-शर्म   ताक  पर  रखते ||

इनकी  तिकड़म  को  पहचानो |

जाल   वोट   का   फैलाते    हैं  ||

ये   चुनाव   जब  भी   आते  हैं |

*

खूब     बहाते      नेता     पैसा |

कोई   चतुर   न   उनके   जैसा ||

मत  की  कीमत  पहचानो  तुम |

करो     न    सौदा    ऐसा   वैसा ||

ध्यान    रखें    ‘संतोष’    हमेशा |

देश    भक्त   तब   कहलाते   हैं ||

 ये   चुनाव  जब   भी  आते   हैं |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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