हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३७ – क्रोध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३७ ☆ क्रोध… ?

चैनल पर समाचार देख रहा हूँ। दुकानदार द्वारा दस रुपये मांगने पर क्रोधित युवक ने उसे पीट-पीट कर मार डाला। समाचार सुनकर हतप्रभ हूँ, अवाक हूँ। कुछ लोग विचार कर सकते हैं कि केवल दस रुपए के लिए कोई इतनी हिंसा कैसे कर सकता है? मेरे सामने प्रश्न दस रुपये या दस लाख या दस करोड़ का नहीं, मनुष्य के क्रोध के पारावार का है। जो मारा गया वह मनुष्य था, जिसने मारा, वह मनुष्य है। सत्यस्थिति तो पुलिस की विवेचना से सामने आएगी तथापि प्रथम दृष्टया यह षड्यंत्रपूर्वक की गई हत्या नहीं लगती। इसके मूल में क्रोध के चलते अपना आपा खो देना दिखता है।

क्रोध मनुष्य की प्राकृतिक भावना है। मनुष्य के भावनात्मक विरेचन के लिए भी क्रोध अनिवार्य है। तथापि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्र अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए। क्रोध का अतिरेक सामान्य विवाद को हिंसक दुर्घटना में बदल सकता है।

प्रश्न है कि क्रोध क्यों उपजता है? मनोविज्ञान कहता है कि सामान्यत: अपेक्षा-भंग, असंतोष, असहिष्णुता, असफलता, असुरक्षा, असहायता के चलते क्रोध उपजता है।

योगेश्वर, श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय के बासठवें श्लोक में क्रोध के संबंध में कहते हैं,

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

अर्थात विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

योगेश्वर उवाच अगले श्लोक में इसी विषय को विस्तार देता है-

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहत्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न होता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और ज्ञानशक्ति का नाश हो जाने से मनुष्य अपनी स्थिति से, अपनी मनुष्यता से गिर जाता है।

क्रोध के चलते मनुष्यता से गिरा मनुष्य, कैसे अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है, इसका उल्लेख अपनी एक लघुकथा ‘क्रोध में किया था। लघुकथा इस प्रकार है-

“…दोनों में बहस होने लगी थी। विवाद की तीक्ष्णता बढ़ती गई। आक्रोश में दोनों थे पर पहला मनुष्य था, दूसरा क्रोधी था। क्रोध, तर्क का पथ तज देता है, मर्म को चोट पहुँचाने की राह चलता है। इस राह के एक विनाशकारी मोड़ पर तिलमिलाहट टकराती है।

तिलमिलाहट में क्रोधी ने एक बड़ा पत्थर मनुष्य के सिर पर दे मारा। मनुष्य की मौत हो गई। क्रोधी को फाँसी चढ़ना पड़ा।

यश, संपदा, नेह, संबंध, अंततः समूचे अस्तित्व की बलि ले लेता है क्रोध।”

आज के मनुष्य का अनुभव बताता है कि बदलती जीवन शैली में अब अहंकार से भी क्रोध उपजने लगा है। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स या श्रेष्ठता बोध, अहंकार के मूल में होते हैं।

इस लघुकथा को लेख के आरंभ में उल्लेखित घटना से जोड़ें। जिसकी हत्या हुई, उसका जीवन असमय नष्ट हो गया। जिसने हत्या की, उसका जीवन भी नष्ट होने की स्थिति में आ गया है।

लोकोक्ति है कि क्रोध वह अग्निकुंड है जो आपके हाथों स्वयं आपकी आहुति करवा देता है।

अपनी आहुति या अपने क्रोध पर नियंत्रण? निर्णय हरेक को अपने स्तर पर लेना है।

© संजय भारद्वाज 

(16:55 बजे, 30 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८१ – दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला – आम खास का खास है।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८१ ☆

☆ दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

आम खास का खास है, खास आम का आम.

‘सलिल‘ दाम दे आम ले, गुठली ले बेदाम..

.

आम न जो वह खास है, खास न जो वह आम.

आम खास है, खास है आम, नहीं बेनाम..

.

पन्हा अमावट आमरस, अमकलियाँ अमचूर.

चटखारे ले चाटिये, मजा मिले भरपूर..

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दर्प न सहता है तनिक, बहुत विनत है आम.

अच्छे-अच्छों के करे. खट्टे दाँत- सलाम..

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छककर खाँय अचार, या मधुर मुरब्बा आम .

पेड़ा बरफी कलौंजी, स्वाद अमोल-अदाम..

.

लँगड़ा, हापुस, दशहरी, कलमी चिना बदाम.

सिंदूरी, नीलमपरी, चुसना आम ललाम..

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चौसा बैगनपरी खा, चाहे हो जो दाम.

‘सलिल‘ आम अनमोल है, सोच न- खर्च छदाम..

.

तोताचश्म न आम है, तोतापरी सुनाम.

चंचु सदृश दो नोक औ‘, तोते जैसा चाम..

.

हुआ मलीहाबाद का, सारे जग में नाम.

अमराई में विचरिये, खाकर मीठे आम..

.

लाल बसंती हरा या, पीत रंग निष्काम.

बढ़ता फलता मौन हो, सहे ग्रीष्म की घाम..

.

आम्र रसाल अमिय फल, अमिया जिसके नाम.

चढ़ा देवफल भोग में, हो न विधाता वाम..

‘सलिल‘ आम के आम ले, गुठली के भी दाम.

उदर रोग की दवा है, कोठा रहे न जाम..

चाटी अमिया बहू ने, भला करो हे राम!.

सासू जी नत सर खड़ीं, गृह मंदिर सुर-धाम..

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (1 जून से 7 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (1 जून से 7 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कहते हैं

“हरि अनंत हरि कथा अनंता।

कहहिं सुनहिं बहुबिधि जसब संता॥

भगवान अनंत है और उनकी कृपा भी अनंत है। इसी प्रकार हमारे श्री हनुमान जी भी अनंत प्रकार से हमारी रक्षा करते हैं और उनको याद करने का सबसे अच्छा तरीका श्री हनुमान चालीसा का पठन-पाठन है। आज की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है :-

भूत पिसाच निकट नहिं आवै |

महाबीर जब नाम सुनावै ||

लाभ:- इस चौपाई के संपुट पाठ करने से बुरी आत्मा, भूतप्रेत आदि अगर आपके पास आ गए हैं तो दूर भाग जाएंगे अन्यथा आपके पास नहीं आएंगे।

नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 1 जून से 7 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, बुध और शुक्र मिथुन राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। गुरु प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेंगे तथा 2 तारीख के 1:57 दिन से कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। क्रोध की मात्रा थोड़ी बढ़ सकती है। अगर आपको श्वास संबंधी कोई रोग है तो उसमें आपको लाभ होगा। धन आने की मात्रा में थोड़ी कमी हो सकती है। आपको अपने संतान से सहायता मिल सकती है। आपकी प्रतिष्ठा में इस सप्ताह वृद्धि होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। 1 जून को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आप कचहरी के कार्यों में सफल हो सकते हैं। धन आने का उत्तम योग बनेगा। व्यापार में लाभ होगा। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपको अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए, भाग्य पर नहीं। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अगर वह कहीं कार्यरत है तो उनको वहां सफलता मिलेगी। अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपको अपने कार्य स्थल पर सावधानी पूर्वक बात करना चाहिए। क्रोध में नहीं आना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 6 तारीख की दोपहर से लेकर 7 तारीख तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता दायक है। एक, 2 और 3 जून को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें अक्षत और लाल पुष्प डालकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रह सकता है। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि संभव है। प्रेम संबंधों में स्थायित्व भी आएगा। नौकरी के मामले में सफलता का योग है। कचहरी के मामले में आपको सावधान रहना चाहिए। धन आने का उत्तम योग है। भाग्य के मामले में आप सावधान रहें। आप अपने कर्मों पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। शत्रुओं को आप थोड़े से प्रयास से परास्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून कार्यों को करने हेतु सफलता दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कार्यालय में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करने में सफलता मिल सकती है।। भाग्य से मामूली मदद प्राप्त हो सकती है।। कार्यालय में आपको अपने साथियों और अधिकारियों का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए।। इस सप्ताह आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा।। आपके संतान की उन्नति भी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख की दोपहर तक का समय कार्यों को करने में मददगार है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। भाग्य से भी आपको मदद मिल सकती है। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आप या आपके जीवन साथी में से किसी एक को शारीरिक कष्ट हो सकता है। आपको अपने संतान से कोई विशेष सहयोग नहीं मिलेगा। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन तारीख ठीक-ठाक है। 1 तारीख को आपको अपने प्रतिष्ठा और माता जी के प्रति थोड़ा सा तक रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी का ध्यान करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा उनको अपने कार्यालय में अधिकारियों एवं सहयोगियों से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा व्यापार उत्तम चलेगा अगर आप नए व्यापार का प्रयास कर रहे हैं तो एक बड़े व्यापार की नींव डाल सकते हैं। भाग्य से आपको इस सप्ताह कोई विशेष मदद नहीं मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन तारीख लाभदायक है। इन दोनों तारीखों में आपके द्वारा किए जा रहे अधिकांश कार्य सफल होंगे। इस सप्ताह 1 तारीख को आपको अपने भाई बहनों का सहयोग प्राप्तहो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी की पूजा करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद मिलेगी। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। व्यापारियों का व्यापार भी अच्छा चलेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को उनके कार्यालय में अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। परंतु उनको बहुत सावधान होकर कार्य करना चाहिए। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक हैं। 1 जून को आपको धन के मामले में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका बहुत अच्छी तरह से साथ देगा। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुके हुए हैं उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं का बड़ी आसानी के साथ थोड़े से प्रयास से ही सफाया कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपको अपने जीवनसाथी के स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 6 और 7 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल हैं। 1 तारीख को आपको अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

अगर आप अविवाहित हैं तो यह समय आपके लिए काफी अच्छा है। आपके विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। पुराना अगर कोई प्रस्ताव चल रहा है तो विवाह तय भी हो सकता है। नए-नए संबंध बन सकते हैं। पुराने संबंधों में वृद्धि हो सकती है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। व्यापार में प्रगति होगी। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। आपको अपने दुश्मनों से इस सप्ताह थोड़ा सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून परिणाम दायक हैं। 1 जून को आपको कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए काफी अच्छा रहेगा। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आपको गलत रास्ते से धन की प्राप्ति हो सकती है। धन प्राप्ति का ठीक-ठाक योग है। इस सप्ताह आपके लिए चार पांच और छे तारीख उत्तम है। दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। 1 तारीख को आपको अपने धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आप अपने भाई बहनों के साथ संबंध अच्छा रहेगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। संतान का आपको अच्छा समर्थन प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक रहेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपनी प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको कम मदद मिलेगी। आपको अपने परिश्रम से कार्यों को संपन्न करना होगा। इस सप्ताह आपके लिए 6 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 7 तारीख कार्यों को करने के लिए उत्साहवर्धक हैं। चार-पांच और 6 तारीख के दोपहर तक आपको सतर्क रहना चाहिए। 1 तारीख को आपको अपने कार्यालय में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके थोड़े से प्रयास से ही आपकी प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि होगी। लोगों के बीच में आपकी स्वीकारता बढ़ेगी। आपको सम्मान प्राप्त होगा। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक रहेगी। अगर आप व्यापारी है तो आपका व्यापार अच्छा चलेगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। आपके संतान को उनके कार्यों में सफलता मिल सकती है। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। परीक्षाओं में आपको सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए दो और तीन जून कार्यों को करने हेतु मददगार है। 6 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर और 7 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ४९ आणि ५० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ४९ आणि ५० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ४९ – – 

सदा बोलिल्यासारीखे चालताहे|

अनेकी सदा एक देवासी पाहे|

सगुणी भजे लेश नाही भ्रमाचा|

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा|४९|

अर्थ :  जो बोलण्याप्रमाणे वागतो, परमेश्वराची जरी अनेक रूपे असली तरी तो एकच आहे या दृष्टीने त्याच्याकडे पाहतो, सगुण परमेश्वराची उपासना करताना त्याच्या मनामध्ये कोणतीही शंका असत नाही असा भक्त त्या सर्वोत्तमाचा श्रेष्ठ भक्त असतो.

विवेचन : खऱ्या भक्ताची फार सुंदर लक्षणे समर्थांनी या ठिकाणी सांगितली आहेत. परमेश्वराचा प्रिय भक्त होणे ही सोपी गोष्ट नाही. जशी रोगातून बरे होण्यासाठी अनेक पथ्ये पाळावी लागतात, तशीच पथ्ये भक्ताला देखील पाळावी लागतात. आपले संत म्हणजे “बोले तैसा चाले” या तुकोबांच्या उक्तीचे मूर्तिमंत उदाहरण होत.

व्यवहारामध्ये आपण बऱ्याच वेळा खोटे बोलत असतो. बऱ्याच व्यक्ती बोलतात एक आणि करतात दुसरे ! अशा व्यक्ती दुसऱ्याला उपदेश करण्यात आघाडीवर असतात. परंतु स्वतःवर वेळ आली की त्यांचे वागणे वेगळे असते. आपल्या मुलांना मराठी माध्यमाच्या शाळांमध्ये घाला असे सांगणाऱ्या बऱ्याच व्यक्तींची मुले इंग्रजी माध्यमातून शिक्षण घेताना दिसतात. लग्नप्रसंगी हुंडा घेऊ नये, अवास्तव खर्च करू नये अशी सांगणारी मंडळी त्यांच्या मुलांच्या लग्नामध्ये या सगळ्या गोष्टी बाजूला ठेवून वारेमाप खर्च करताना दिसतात. असे वागणे म्हणजे दुटप्पी वागणे होय.

संतांच्या बोलण्यात आणि वागण्यात एकवाक्यता असते. “काय उणे आम्हां विठोबाचे पायी… “असे तुकाराम महाराजांनी म्हटले. किंवा “सोने रूपे आम्हां मृत्तिकेसमान, ” असे जे त्यांनी म्हटले ती त्यांची अंतरंगातून आलेली निरपेक्ष वृत्ती होती. विरक्ती त्यांच्या रक्तात भिनली होती. म्हणून छत्रपती शिवाजी महाराजांनी जेव्हा त्यांना सोने, नाणे, वस्त्र इत्यादी स्वरूपात नजराणा पाठवला तेव्हा त्यांनी तो नाकारला. छत्रपती शिवाजी महाराज समर्थ रामदासांन आपले गुरु मानत. एकदा तर त्यांनी आपले राज्य समर्थांना चिठ्ठी लिहून झोळीत अर्पण केले होते. परंतु समर्थांनी ते त्यांना परत केले. अशी असते संतांची निरपेक्ष वृत्ती !

अशी भक्ती आणि विरक्ती अंगात भिनली पाहिजे. आपण सर्वसामान्य माणसे आहोत परंतु संतांनी दाखवलेल्या या मार्गावर वाटचाल तर करू शकतो ! माझ्या प्रपंचासाठी आवश्यक तेवढे धन मी मिळवीन. इतरांचे धन किंवा पैसा माझ्यासाठी मृत्तिकेसमान असेल. परस्त्रीकडे मी माता किंवा भगिनी म्हणून पाहीन या गोष्टी तर आपल्याला सहज करता येण्यासारख्या आहेत.

ज्याप्रमाणे आपल्या देशाबद्दल बोलताना आपण म्हणतो की आपल्या देशात अनेकतेत एकता आहे. त्याप्रमाणे परमेश्वराची विविध रूपे आणि विविध नावे असली तरी चैतन्यरूपी असलेला तो परमेश्वर एकच आहे. अनेक संतांनी हे सत्य एकमुखाने सांगितले आहे. गीतेत श्रीकृष्णाने सांगितले आहे की ज्याप्रमाणे विविध नद्या एकाच समुद्राला येऊन मिळतात त्याप्रमाणे विविध देवदेवतांना केलेली प्रार्थना माझ्यापर्यंत येऊन पोहोचते. पण आम्ही सामान्य माणसे हे समजून घेताना गोंधळ करतो. देवामध्ये कोण श्रेष्ठ, कोण कनिष्ठ अशा प्रकारचा भेदभाव करत बसतो.

स्थुलाकडून सूक्ष्माकडे तशी सगुणाकडून निर्गुणाकडे आपली वाटचाल झाली पाहिजे. भगवंताचा श्रेष्ठ भक्त ही गोष्ट जाणून असतो. निर्गुण निराकाराप्रती त्याची श्रद्धा असते. परंतु तरी देखील सर्वसामान्यांच्या मनामध्ये भगवंताबद्दल विश्वास निर्माण व्हावा आणि त्यांचीही वाटचाल सगुणाकडून निर्गुणाकडे व्हावी अशी त्याची इच्छा असते म्हणूनच तो सगुणाची देखील पूजा करतो. असे करताना त्याच्या मनामध्ये कोणतीही शंका किंवा कोणताही भ्रम असत नाही. मंदिरात अंतरात तोच नांदत आहे हे तो जाणून असतो. असा भक्त भगवंताचा त्या सर्वोत्तमाचा श्रेष्ठ भक्त होय.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या बोलण्यात आणि वागण्यात एकवाक्यता आहे का? मी इतरांना जे सांगतो ते स्वतः पाळतो का, याचा मी कधी प्रामाणिकपणे विचार केला आहे का?

२. परमेश्वराची विविध रूपे पाहताना माझ्या मनात श्रेष्ठ-कनिष्ठाचा भेद येतो का? “अनेकी एक” हे तत्त्व माझ्या उपासनेत उतरले आहे का?

३. संतांच्या निरपेक्ष वृत्तीचा आदर्श डोळ्यांसमोर ठेवून माझ्या दैनंदिन जीवनात मी एखादी तरी गोष्ट निरपेक्षपणे करतो का?

४. सगुण उपासना करताना माझ्या मनात शंका, भ्रम किंवा न्यूनगंड येतो का? माझी श्रद्धा अविचल आहे का?

५. “सर्वोत्तमाचा दास” होण्याच्या दिशेने माझी वाटचाल सुरू आहे असे मला वाटते का?

– – – 

श्लोक क्र. ५० – – 

नसे अंतरी कामकारी विकारी |

उदासीन जो तापसी ब्रह्मचारी|

निवाला मने लेश नाही तमाचा|

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा |५०|

अर्थ : ज्याच्या मनामध्ये कामवासनेसारख्या निरनिराळ्या प्रकारच्या विकार उत्पन्न करणाऱ्या वासना उत्पन्न होत नाहीत, जो वृत्तीने विरक्त असून ब्रह्मचारी राहून तपस्या करतो, ज्याच्या मनात क्रोधाचा लवलेशही उरत नाही, ज्याचे मन अत्यंत शांत आणि क्रोधरहित होते, असा मनुष्य त्या सर्वोत्तम भगवंताचा जगातील उत्कृष्ट भक्त होय.

(कामकारी – कामवासना, विकारी – विकृती/अशांती निर्माण करणारा, उदासीन – तटस्थ/निर्विकार, निवाला – शांत/तृप्त, लेश – अंश, तम – अंधार /अज्ञान/ मोह/ अविचार)

विवेचन : मागील काही श्लोकांपासून समर्थ आपल्याला खऱ्या भक्ताची लक्षणे सांगत आहेत. एकेक श्लोक वाचून त्याचा अर्थ लक्षात घेतला की आपणही मानसिकदृष्ट्या खऱ्या अर्थाने समृद्ध होत जातो. आपण जर साधक असू, तर आपण कसे असायला हवे हे यातून कळते.

कामवासना ही माणसाच्या मनातील इतर वासनांपेक्षाही अधिक बलवान असलेली वासना असते. ती अनेक विकार म्हणजेच विकृती उत्पन्न करते. जेव्हा कामवासनेवर माणसाचे नियंत्रण नसते, तेव्हा त्याची बुद्धी काम करत नाही. त्याचा विवेक हरवतो आणि मग नको त्या गोष्टी त्याच्या हातून घडतात. समाजात अनेक राजकारणी व्यक्ती, साधू, संत, बुवा, बाबांचे असे अधःपतन होताना आपण पाहतो.

भगवंताचा सच्चा भक्त मात्र कामवासनेला आपल्या मनाचा ताबा घेऊ देत नाही. वृत्तीने तो उदासीन असतो. या ठिकाणी उदासीन या शब्दाचा अर्थ आपण समजावून घेऊया. सामान्यतः आपण असे समजतो की उदासीन म्हणजे उदास, कंटाळवाणा, ज्याला कशातच गोडी वाटत नाही अशी व्यक्ती. परंतु इथे समर्थांनी हा शब्द त्या अर्थाने वापरलेला नाही. उद् म्हणजे वरच्या दिशेने. लिफ्टला मराठी शब्द उद्वाहक असा आहे. या अर्थाने उदासीन म्हणजे वरची पातळी. सामान्य लोकांपेक्षा साधक एका वेगळ्या वरच्या पातळीवर स्थिर झालेला असतो. देहसुखाला महत्त्व न देता भगवंताच्या नामात तो स्थिर असतो. असा साधक म्हणजे उदासीन.

तो तापस असतो म्हणजे तपस्या करणारा. तपस्या करण्यासाठी आपल्याला कोणी ऋषीमुनी व्हावे लागेल असे नाही तर भगवंताच्या मार्गावर चालण्यासाठी एक प्रकारची साधना आणि त्यातील सातत्य आवश्यक असते. ही साधना म्हणजेच तपस्या असे म्हणता येईल.

‘ब्रह्मचारी’ या शब्दाचा अर्थ देखील या ठिकाणी आपण समजून घेऊ. व्यवहारात आपण ब्रह्मचारी म्हणजे लग्न न केलेला किंवा ब्रह्मचर्य पाळणारा असा अर्थ घेतो. जो विवेकाचा वापर करून आपल्या मनावर संयम ठेवतो आणि ब्रह्मचर्याचे पालन करतो अशी कोणतीही व्यक्ती म्हणजे ब्रह्मचारी. मग ती लग्न झालेली असो किंवा नसो. संसारात राहून देखील ब्रह्मचर्याचे पालन करता येणे शक्य असते आणि खरा साधक त्याचे पालन करतोच. आरोग्य किंवा विद्या प्राप्त करण्यासाठी जसे ब्रह्मचर्य पाळणे आवश्यक असते त्याप्रमाणेच साधना मार्गातही ब्रह्मचर्याचे अतिशय महत्त्व आहे.

तिसऱ्या ओळीत समर्थांनी साधकाचे आणखी एक लक्षण सांगितले आहे. ते म्हणजे त्याच्या मनात तमाचा म्हणजे मोह, अज्ञान आणि त्यातून उत्पन्न होणाऱ्या क्रोधाचा लवलेशही नसतो. काम आणि क्रोध हे बहुधा जोडीनेच आपल्या मनामध्ये वास करत असतात. काम आणि क्रोध या दोन्हींचा अतिरेक झाला की माणूस आपली विचारशक्ती आणि विवेक हरवून बसतो मग त्याच्या हातून नको त्या गोष्टी घडतात. साधनेच्या मार्गावर चालणाऱ्या आणि ज्यांनी बऱ्यापैकी त्यात प्रगती केली आहे अशा व्यक्तींना देखील काम आणि क्रोध यावर नियंत्रण न ठेवता आल्यामुळे त्यांचे अधःपतन झालेले दिसून येते. महर्षी विश्वामित्रांचे उदाहरण तर आपणा सर्वांना माहिती आहे.

खरा भक्त या सगळ्या वासना आणि विचारांवर नियंत्रण ठेवतो. त्याचे मन शांत आणि तृप्त असते. म्हणून आपण जे खरे संत किंवा साधक आहेत, त्यांच्याजवळ शांतीचा अनुभव घेतो. त्यांच्या चेहऱ्यावर एक विलक्षण प्रसन्नता आणि तेज असते. ते त्यांच्या साधनेतून आणि मानसिक शांततेतून आलेले असते. संत तुकाराम म्हणतात…

शांतीपरतें नाहीं सुख । येर अवघेंची दुःख ॥१॥

म्हणउनी शांति धरा । उतराल पैल तीरा ॥ध्रु. ॥

खवळलिया कामक्रोधीं । अंगी भरती आधिव्याधी ॥२॥

तुका म्हणे त्रिविध ताप । जाती मग आपेआप ॥३||

– – म्हणून काम, क्रोध आदी विकारांवर नियंत्रण असलेला, ब्रह्मचर्याचे पालन करणारा आणि साधना मार्गावर सातत्याने वाटचाल करणारा भक्त म्हणजे त्या सर्वोत्तम परमेश्वराचा जगातील उत्कृष्ट असा भक्त होय.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या मनावर कामवासना आणि क्रोध यांचे किती प्रमाणात नियंत्रण आहे – हे मी प्रामाणिकपणे तपासले आहे का ?

२) “उदासीन” म्हणजे वरच्या पातळीवर स्थिर राहणे – माझी साधना मला या पातळीकडे नेत आहे का की मी अजून सांसारिक गोष्टींमध्येच गुंतलेलो आहे ?

३) संसारात राहूनही ब्रह्मचर्य पाळता येते – माझ्या दैनंदिन जीवनात मनावर संयम ठेवण्याचा माझा प्रयत्न किती प्रामाणिक आहे ?

– क्रमशः श्लोक ४९ आणि ५०.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हमारा जानने वाले परिवार पर आफत आ गयी। कोई ट्रक उनके घर के पास से निकलता हुआ उनकी चारदीवारी तोड़ गया। चारों ओर समाचार। पुलिस ने कार्यवाही शुरू की। कुछ दिन बाद हम उनके गर गये। पूछा क्या बना पुलिस कार्यवाही का?

-हमने अपनी अर्जी वापस ले ली।

-क्यों?

-पुलिस कार्यवाही के नाम पर आती और चार पानी पीकर चली जाती। हम काम काज करें कि इनकी आवभगत? बस। इसीलिए हमने अर्जी वापस ले ली। अर्जी वापस लेने में ही हमारी भलाई थी।

हम उनकी समझ व अनुभव पर मुस्कुरा दिए।

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५३ – लघुतम कथा – जिंदा गुड़िया  ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५३ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ जिंदा गुड़िया ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

वह भीड़ में अपने बाबूजी के अंगुली को पकड़े खड़ी लड़की, खिलौनो की दुकान की तरफ देखने में मग्न थी l  जब उसका ध्यान टूटा, तो उसने  देखा कि अब वह किसी अजनबी के हाथों की  उँगुली पकडे खड़ी है l  उसने जोर से चिल्लाते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं l अबकी बार जब उसकी आंख खुली तो उसने खुद को खिलौनों के दुकान में पाया, जहां सिर्फ जिंदा गुड़ियाँ ही बिक रही थीं l

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ४ – ले लो हरि अवतार यहाँ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ले लो हरि अवतार यहाँ!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ४ ☆

☆ ले लो हरि अवतार यहाँ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

 कृष्ण कन्हैया तुम्हे दिखाऊं, बिखरे पग पग खार यहां

, जगह-जगह पर जंजालों का, लगा हुआ अंबार यहांँ ।।

*

गैया तेरी रोती कान्हा, सड़कों पर कूड़ा खाती ।

 कृषि कार्य को छोड़ा जब से, नंदी है बेकार यहांँ ।।

*

दूध दही घृत माखन होता, अमृत तुल्य यह बतलाया ।

 इन सब में ही मिला रसाय*न, होता कारोबार यहांँ ।।

*

माखन सबको बांँटा तुमने, भोग बांँटना सिखलाया।

अन्न भरा है गोदामों में, जन भूखे लाचार यहांँ।

*

युद्ध महाभारत करवाया, हर नारी को मान मिले।

धवल चदरिया ओढ़े कुछ जन, करते तन व्यापार यहांँ।।

*

चीर बढ़ाने की लीला रच, लाज अमूल्य बताई थी।

अंग-प्रदर्शन को समझे पर, नारी शिष्टाचार यहाँ ।।

*

दंश धरा अति झेल रही है, निशदिन अत्याचारों के ‌

मानव में फिर मानवता हो, ले लो हरि अवतार यहाँ ।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

तिलवारा घाट से भेड़ाघाट: 14 अक्टूबर 2018…

रामायण काल में राम को केवट ने नदी पार कराई थी। निषाद राज उन्हें दूर तक छोड़ने गए थे उनसे उनके वनराज्य में वनवास बिताने का आग्रह करते रहे परंतु राम न रुके। महाभारत काल में वे धीवर कहलाने लगे। महाभारत कथा की जड़ में एक धीवर कन्या सत्यवती ही है। उसके लिए कौरव-पांडव से थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। चद्रवंशी राजाओं में एक प्रतापी राजा हुए थे शान्तनु, उनका राज्य गंगा के दोनों किनारों पर फैला हुआ था। वे अक्सर गंगा किनारे घूमने जाया करते थे। गंगा नदी देवी रूप में प्रकट होकर उनसे मिलीं तो वे उन पर आसक्त हो गए। विवाह का निवेदन किया जिसे गंगा ने नकार दिया लेकिन दैहिक सम्बंध आज की सहनिवासी (Living Together) तर्ज़ पर स्थापित हो गए। गंगा ने शर्त रखी कि वह जो कुछ भी करेगी शान्तनु कोई प्रश्न नहीं करेंगे। यदि सवाल किया  तो वे उन्हें छोड़कर चली जाएँगी। उनके सात पुत्र हुए जिन्हें पैदा होते ही गंगा ने नदी को अर्पित कर दिए उन सात पुत्रों की कहानी सप्त ऋषियों के उद्धार से जुड़ी है। जब आठवाँ पुत्र हुआ तो शान्तनु से नहीं रहा गया। उन्होंने गंगा को टोक दिया। गंगा ने वह पुत्र शान्तनु को दे दिया और हमेशा के लिए चलीं गईं। उस पुत्र का नाम देवव्रत रखा गया। वे बाद में भीष्म पितामह कहलाए।

एक मत्स्यगंधा धीवर कन्या सत्यवती अपने पिता के साथ यमुना में नाव खेती थी। एक दिन उसके पिता नदी किनारे नहीं थे वह अकेली नाव पर बैठी थी। तभी पाराशर ऋषि आए उन्होंने उससे गंगा पार उतारने का निवेदन किया। पिता जी को आने में विलम्ब हो रहा था अतः सत्यवती ख़ुद नाव खे कर पाराशर ऋषि को गंगा में उतर गई। गंगा का पाठ चौड़ा था। सत्यवती का उत्तरीय उसके वक्ष से उड़-उड़ जा रहा था उसने उत्तरीय को क़स कर कमर में बाँध लिया। अब उसके वक्ष पर एक कंचुकी भर थी। वह पसीने से तरबतर नाव खेते जा रही थी। पसीने से उसकी कंचुकी का अस्तित्व समाप्त सा हो देह का उभार निखर आया, उसकी बाहों की गोलाई और वक्ष की कसावट पर पाराशर ऋषि की निगाह पड़ी। उसके गीले बदन से मत्स्य गन्ध की मादकता पाराशर ऋषि की नथुनों में समायी तो वे कामाशक्त हो गए। सत्यवती भी ऋतुश्राव से निवृत हुई थी। नाव में समागम हुआ जिससे वेद व्यास जी का जन्म हुआ, जिन्होंने महाभारत लिखी थी। इस वास्तविक घटना को तर्क-वितर्क का जामा कथावाचक पहनाते रहते हैं कि सत्यवती की देह से आती दुर्गंध से निजात पाने के लोभवश वह तैयार हुई थी। पाराशर ऋषि और सत्यवती मिलन से  वेद व्यास का जन्म हुआ था। पाराशर ऋषि सत्यवती को छोड़कर सन्यासी की राह चले गए।

राजा शान्तनु के जीवन से गंगा जा चुकी थी वे नदी किनारे उदास घूमते थे। उनकी निगाह सत्यवती पर पड़ी और सत्यवती ने उनको देखा। प्रेम अंकुर फूटते देर न लगी। शान्तनु ने उसके पिता से विवाह का प्रस्ताव रखा तब तक गंगापुत्र देवव्रत को अगला राजा बनाना तय हो चुका था। सत्यवती के पिता ने विवाह के लिए शर्त रखी कि सत्यवती की संतान ही अगला राजा बनेगी,  जिसे शान्तनु ने मान लिया। फिर सवाल उठा कि देवव्रत की संतान भी राजा का दावा कर सकती है। शान्तनु चुप रह गए। पिता को उदास देखकर देवव्रत ने प्रतिज्ञा की, कि वह आजीवन अविवाहित रहकर सिंहासन की सेवा करेंगे। उस भीष्म प्रतिज्ञा से वे भीष्म कहलाए। शान्तनु और सत्यवती से एक पुत्र विचित्रवीर्य नाम का हुआ। उसके विवाह के लिए काशी राजा की तीन कन्याओं अम्बे, अम्बा और अम्बालिका को भीष्म भरे स्वयंवर से उठा लाए। अम्बे का प्रेम प्रसंग किसी अन्य राजकुमार से था तो उसे वापस जाने दिया। उसे प्रेमी राजकुमार ने नकार दिया तो वह शिखंडी बनी। अम्बा और अम्बालिका से संतान पैदा नहीं हो रही थी। सत्यवती ने पाराशर ऋषि से उत्पन्न अपने पुत्र वेद व्यास से नियोग द्वारा अम्बा से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पाण्डु पैदा करवाए और एक दासी से विदुर पैदा हुए। यहीं महाभारत युद्ध की नीव पड़ गई। धीवर कन्या सत्यवती कौरव-पांडव की राजमाता थीं। पुराणों में आर्य-अनार्य सम्मिलन की अनेकों घटनाओं में से यह एक घटना है। यही हमारा पौराणिक इतिहास है। धीवर आदिवासी कन्या थी। आदिवासी प्रारम्भ से भारत के निवासी रहे थे आर्यों ने उनको अपने में मिलाने के लिए बेटी व्यवहार का तरीक़ा अपनाया था।

राजा दुष्यंत की कहानी में कालिदास ने शकुंतला की अँगूठी ढीमर द्वारा पकड़ी गई मछली के पेट में मिली बताई थी। उस समय तक धीवर नाम बदलकर ढीमर हो चुका था। मध्ययुग में वही ढीमर बड़ी-बड़ी नाव गंगा में खेने लगे थे अतः वे मल्लाह कहलाने लगे। अंग्रेज़ों के आने के बाद बंगाल में डोली उठाने के लिए और लुटेरों के क़हर से निपटने के लिए वे मेहनतकश लोग कहार कहलाने लगे। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ों ने आसाम में चाय के बाग़ लगाए तब कलकत्ता से उन मल्लाहों को आसाम ले गए वहाँ मल्लाहों ने एक प्रचलित ब्राह्मण उपनाम बरुआ अपना लिया क्योंकि उनको लाने वाला एक बरुआ ब्राह्मण ही था और अंग्रेज़ उन्हें बरुआ कहकर बुलाते थे। अतः निषाद समाज बरौआ कहलाने लगा। उन्ही बरुआ को त्रिपुरा में बर्मन बुलाते थे। जैसे सचिन देव बर्मन और उनके पुत्र आर.डी.बर्मन। आज़ादी के बाद बरौआ शब्द बर्मन में बदल गया। नर्मदा किनारे के सभी नाविक अब बर्मन कहलाना पसंद करते हैं।

इस समाज को कहीं आदिवासी माना जाता है, कहीं हरिजन और कहीं पिछड़ा वर्ग। इनके बच्चे बचपन से ही शराब, जुआँ और ग़लत लतों में पड़कर चालीस साल की उम्र तक बुढ़ा जाते हैं। शाम होते ही कच्ची शराब की गन्ध, बिड़ी के धुए के साथ, भूनी मछली की महक इनके गाँवों के आसपास फैलने लगती है। राजनीतिज्ञों के लिए इस समाज के लड़के प्रचार-प्रसार के लिए कच्चा माल हैं। सभी राजनैतिक दल मंच सजाने, भीड़ जुटाने, दौड़ भाग में इनका उपयोग ख़ूब खुलकर करते हैं। इनके जवान बच्चे 2,000-3,000 रुपए मासिक पर मिल जाते हैं। नेताओं की गाड़ियों में भरकर बाहुबली प्रदर्शन में इनका उपयोग किया जाता है। परिक्रमा के दौरान ये लोग खेतों को गोडकर रबी की फ़सल के लिए खेतों को तैयार करते नज़र आए। कुछ युवक ग़ैरक़ानूनी रूप से रेत माफ़िया के लिए नावों में रेत भरते नज़र आए। राजनीतिज्ञ, अफ़सर, पुलिस और पत्रकारों का एक नेक्सस याने गिरोह बन गया है जो बड़ी बेरहमी से नर्मदा के पेट से रेत निकाल कर उसके प्राकृतिक स्वरूप को बिगाड़ने में लगा है। बर्मन समाज भी उनके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा सकता क्योंकि वे ख़ुद सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाए खेती कर रहे हैं। यदि वे आवाज़ उठाएँगे तो अगले दिन ज़मीन से बेदख़ल। जिन लोगों पर भौगोलिक वातावरण को अक्षुण बनाए रखने की ज़िम्मेदारी है वे ख़ुद मिलकर उसे उजाड़ने में लगे हैं। जब बागड ही खेत खाने लगे तो फिर सुअरों की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस मामले में जनता में कोई जागृति नहीं है। नर्मदा के बहाव की दिशा में किनारे पर बेशुमार पोलिथिन और प्लास्टिक बोरियाँ पेड़ों पर लदी हुई मिलीं। रेत खनन और पोलीथिन प्लास्टिक से नर्मदा की नैसर्गिकता को जो भयानक नुक़सान हो रहा है उसकी भरपाई मुश्किल है।

शाम को चार बजे धुआँधार पहुँच गए। डूंडवारा से पसर कर बहने वाली नर्मदा अचानक लजा कर सिमट गई। उसका पानी सिमट कर गहरे खड्ड में तेज़ी से गिरने लगा तो वह छोटे कणों में बदलकर धुएँ की शक्ल में दिखने लग गया। यही जबलपुर की शान धुआँधार जलप्रपात है। पंचवटी तट स्थित नेपाली कोठी, जहाँ हमारे ठहरने की व्यवस्था अरुण जी के रिश्तेदार सुधीर भाई ने की थी, वहीं रात्रि विश्राम किया। यहाँ से हमारे एक अन्य साथी अविनाश दवे भी जबलपुर लौट गये।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३२ – कविता – ईद… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ईद…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३२?

? कविता – ईद… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

दीदार बिन तुम्हारे, मेरी कैसे ईद हो

तुम चाँद, मेरा चैन, आँख ख़्वाब, नींद हो

=2=

दिल से दिल मिला तो दिल ने दिल दिया मुझे

तुम चाहते हो इसकी भी कोई रसीद हो

=3=

इक दिन ज़रूर आएगा देखोगे इस तरफ़

अच्छे-बुरे की तुम ही मेरी चश्मदीद हो

=4=

हमने नहीं कहा कभी गुस्सा न हो मगर

कुछ यूंँ करो कि आपका गुस्सा मुफ़ीद हो

=5=

हसरत हो आरज़ू हो कामना हो तमन्ना

ख़्वाहिश तुम्हीं पहली और आख़िरी उम्मीद हो

=6=

मर-मिट गये जिनके लिये, हम रुसवा हो गये

वे फ़रमा रहे आशिक़ हो, न कि तुम शहीद हो   

=7=

सियासत है इतनी बदनाम चीज़ उफ़्फ़

क्यों शरीक़ इसमें अब कोई फ़रीद हो

=8=

यूँ धृष्टता के छू रहे हो सारे पायदान

तुम आदमी हो यार कि घोड़े की लीद हो

=9=

अच्छे-बुरे का ख्याल ज़रूरी है हर घड़ी

पहले कि इससे आपकी मिट्टी पलीद हो

=10=

मेरे अज़ीज़ आज मैं दिल खोलकर कहूँ

इस दिल में दिल से आपका ख़ुशामदीद हो 

=11=

धूमिल हैं चाँद आपके हुस्नो जमाल से

‘राजेश’ क्यों न आपका दिल से मुरीद हो

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०५ ☆ गीत – ।। उदाहरण पेश करके नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ  ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०५ ☆

☆ गीत ।। उदाहरण पेश करके नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।

चुनौती के सामने तुम अपना   सीना तन कर दिखाओ।।

**

मत रोको कोशिशअगली बार सफलता मिल सकती है।

निरंतर अभ्यास से चट्टान पत्थर की भी   हिल सकती है।।

केवल कथनी नहीं तुम इसे आचरण में रंग कर दिखाओ।

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।।

****

वह झरना भी कैसा झरना जो पत्थर से न टकराता हो।

वही आदमी साहसी जो मुश्किल में भी न घबराता हो।।

आगेबढ़ नेतृत्व क्षमता आवरण में उतर  कर दिखाओ।

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।।

***

जब हम सामने बढ़ चलते हैं तो कारवां पीछे आता है।

जो संघर्ष से परिचित   होता  वह ही चर्चित हो पाता है।।

वही होगी सच्ची सेवा किसीके दुखहरण बनकर दिखाओ।

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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