हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मुसल्सल देखते जाना नज़र में इश्क़ का काजल

नहीं होना कभी भी तुम हमारी आँखों से ओझल

 *

उतरकर आँखों में देखो गिराँखातिर कि गहराई

हजारो हैं वहाँ तूफाँ बरसते है कहीं बादल

 *

उसी में है रवादारी उसे कमजोर मत समझो

सवारे जो यहाँ गुलशन उसे नादाँ कहें पागल

 *

नहीं है दोश भी कोई परिन्दे कैद है फिर भी

गिरेबाँ में जरा झाँको कफ़स में बंद है कोयल

 *

नहीं हिम्मत किसी में थी करे मैला यहाँ दामन

नहीं धब्बा जरासा भी रखा है पाक ये आँचल

 *

उसे पत्थर समझ बैठा नजर ने दे दिया धोखा

नहीं हीरा समझ पाया कहाँ का जौहरी कायल

 *

जवानी का ढला सूरज बुढापा पार करना हैं

अकेले हैं वहाँ जाना जहाँ पर ले चले पायल

 

मुसल्सल = एकटक, गिराँखातिर = उदासी, रखादारी = सहनशीलता, कफ़स = पिंजरा

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०२ ☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है प्रो. अरुण कुमार भगत जी द्वारा लिखित  “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तकपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०२ ☆

☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक ..’संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक’

लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत (सदस्य , बिहार लोक सेवा आयोग, पटना)

प्रकाशक: वाणी प्रकाशन , नयी

दिल्ली

मूल्य : 325 रु, पृष्ठ 160

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।

\संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरुआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुजरना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है ।

 संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है ।संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।

मेरा मानना है कि शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97)

शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

संपादन का शिल्प-विधान और शैली-पुस्तिका (पृष्ठ 98-108) संपादन में ‘शैली’ (Style Book) का क्या महत्व है, इस पर लेखक ने विशेष बल दिया है। भाषा-शैली की एकरूपता और शुद्धता ही किसी प्रकाशन की पहचान बनाती है। यह खंड भाषाई अनुशासन के प्रति लेखक की आदर्श प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

संपादन-प्रक्रिया, विलोम पिरामिड से चित्र-संपादन तक (पृष्ठ 109-140)  अध्याय सबसे अधिक तथ्यात्मक और क्रियात्मक है। इसमें ‘आमुख (Lead) की बनावट’, ‘विलोम पिरामिड शैली’ (Inverted Pyramid) और ‘समाचार का पुनर्गठन’ जैसे गंभीर विषयों पर नवाचारी चर्चा की गई है। साथ ही, ‘चित्र-संपादन’ का समावेश यह बताता है कि विजुअल मीडिया के दौर में एक संपादक की आँखें कितनी पैनी होनी चाहिए।

मुझे स्मरण है कि मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार ‘ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था, लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे , पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई, और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।

आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया । जब तक एक खबर पर भरोसा करो , उसका खंडन आ जाता है। खबरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टि कोण से यह किताब अध्ययन मनन और सीखने , पढ़ते , गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।

मेरी समझ में असंपादित न्यूज की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गई थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है।

पुस्तक में पृष्ठ-सज्जा और अभिकल्प (पृष्ठ 141-160) पर पूरा अध्याय है।

पुस्तक का समापन ‘पृष्ठ-सज्जा’ (Page Layout) के संतुलन और सौंदर्यबोध के साथ होता है।

एक संपादक को केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि रिक्त स्थान और विजुअल बैलेंस का भी ज्ञान होना चाहिए, यह इस खंड का मुख्य संदेश है। प्रकाशन रीडर्स फ्रेंडली होना चाहिए। छोटे अक्षरों में बेतहाशा पठनीय सामग्री उड़ेल देना उचित नहीं होता।

यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।

प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तार पूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है।

पत्रकारिता जगत से जुड़े  हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है । किताब संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला में पारंगत बनाती  है।

पुस्तक अमेजन पर सुलभ है। संदर्भ हेतु अपने स्टडी सेल्फ में रखने की अनुशंसा अपने पाठकों को करता हूं।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆

गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम।

आजादी की जली मशालें,गाया वंदेमातरम।।

*

बंकिमचंद्र चटर्जी जी ने, लिखी वंदना राष्ट्र की।

गाया हम सबने मिल करके, मंत्रित वंदेमातरम।।

*

हमने जननी जन्म भूमि को, माँ का दर्जा दिया सदा।

मातृभूमि की बलिवेदी में, वंदित वंदेमातरम।।

*

उत्तर पूरब पश्चिम दक्षिण, दश दिशाओं को भाया।

भाषा की टूटी दीवारें, गूँजा वंदेमातरम।।

*

धर्म कहाँ तब आड़े आया, दिल को आजादी भाई।

मिल कर गाया एक स्वरों में , सबने वंदेमातरम।।

*

सुदृढ़ अब अर्थ व्यवस्था, देश प्रगति करता यारो।

विश्व अग्रणी बने देश यह, गाएँ वंदेमातरम।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ – कविता – कहाँ हो माँ? ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है मातृ दिवस पर विशेष “कहाँ हो माँ? ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ ☆

🌻कविता 🌻 कहाँ हो माँ? 🌻

(विधाता छंद)

*

कहाँ हो माँ जरा सुन लो, तुम्हारी याद आती है।

घड़ी भर नींद का झोका, लगा आँचल सुलाती है।।

बजे धड़कन जरा सुन लो, अभी आँखे भरी मेरी।

यहीं है माँ तुझे देखूँ, लगे आवाज है तेरी।।

*

बनी दुनिया यहाँ मेरी, नया अनुभव सभी पाया।

बिताया फूल सा जीवन, सदा आँचल बनी छाया।।

समय की मार भी देखा, खड़ी हर जुल्म से सीखा।

कहीं बातें सदा मीठी, सही बातें बड़ी तीखा।।

*

ह्दय में प्रेम की गंगा, सदा ममता भरी बोली।

सजाया है यही घर को, कहे दुनिया बड़ी भोली।।

भरी है मांग लाली से, सजी कंचन सदा गहना।

पिता के साथ देखी है, सदा ही संग में बहना।।

*

सुनाती लोरियाँ मीठी, लगा बचपन अभी आया।

पुरानी बात है सारी, तुझे ढूँढा नही पाया।।

बनी जो हाथ की रोटी, सदा मुँह स्वाद है मेरा।

बनाई माँ मुझे बिटिया, करूँ आभार मै तेरा।।

*

विधाता खेल है रचता, लिखी हूँ आज मै गाना।

कहाँ ढूँढूँ तुम्हें मै तो, जरा मुझको बता जाना।।

मिली है प्रेम की पाती, यही तेरी निशानी है।

बता तुझको लिखूँ कैसे, सभी बातें कहानी है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७६ – देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७६ ☆ देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆

पिछले कुछ दिनों से चारों दिशाओं में “मदर्स डे” (मातृ दिवस) की चर्चा हो रही हैं। विगत एक दशक से  मदर्स डे शब्द सुनना आरंभ किया है।

बचपन से बुढ़ापे की दहलीज तक का जीवन तो बिना मदर्स डे मनाए ही व्यतीत हो गया था। अब जीवन की अंतिम पायदान पर ये सब देखने/ सुनने को मिल रहा है।

बाज़ार सज चुके है, पश्चिम में खुशियां मानने का आरंभ कार्ड भेज का शुभकामनाएं प्रेषित करने से होता हैं। नाना प्रकार के उपहार मां के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। ऑनलाइन व्यापार के चतुर खिलाड़ी भी इस रेस में अग्रणी रहते है।

“कुछ मीठा हो जाए” के नाम से ज़हर परोसने वाले भी सक्रिय हो जाते हैं। बाज़ार को भुनाने में सबसे आगे रहते है। आज भुने हुए चने की दुकान मुश्किल से मिलती है, लेकिन चॉकलेट/ केक हर दुकान पर मिल जाता  है। किसी भी दिन, कभी भी, कुछ भी हो केक काट कर खुशियां मनाया जाना अब हमारे समाज में भी एक रिवाज़ बन चुका है।

हमारी संस्कृति जहां मां अपने पूरे जीवन में बच्चों को सभी तरह की खुशियां ही नहीं देती वरन उनके सब कष्ट/दुःख का निवारण भी करती है। उसको वर्ष में एक दिन का सम्मान देना कदापि न्यायोचित नहीं हो सकता है।

प्रतिदिन प्रातः काल मां के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की हमारी परंपरा अब विलुप्तता की कगार पर है। एक दिन मां को भगवान बना देने से मातृत्व ऋण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता हैं। इसलिए अपनी संस्कृति का अनुपालन कर जब मौका मिले मां से आशीर्वाद प्राप्त करते रहें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३७ आणि ३८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३७ आणि ३८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ३७ – – 

सदा चक्रवाकासी मार्तंड जैसा |

उडी घालितो संकटी स्वामी तैसा |

हरिभक्तीचा घाव गाजे निशाणी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी|३७|

अर्थ :  चक्रवाक पक्षांना ज्याप्रमाणे सूर्य अंधारापासून मुक्ती देतो किंवा दिशा दाखवतो त्याचप्रमाणे त्याप्रमाणेच परमेश्वर सुद्धा भक्ताच्या संकटात त्वरित धावून जातो आणि त्याची संकटातून मुक्तता करतो. हरीभक्तीचा महिमा पावलो पावली ऐकू येतो. त्याची निशाणी गर्जते आहे. दासाभिमानी असलेला राम आपल्या भक्तांची कधीही उपेक्षा करीत नाही.

(मार्तंड – सूर्य, निशाण – एक रणवाद्य/डंका, घाव – त्या वाद्यावरील प्रहार)

विवेचन :  भगवंत आपल्या भक्ताला संकटात सहाय्य करण्यासाठी कशाप्रकारे धावून जातो हे सांगण्यासाठी समर्थ आपल्याला या श्लोकात चक्रवाक पक्षाचे उदाहरण देतात.

चक्रवाक पक्षातील नर आणि मादी एकमेकांवर खूप प्रेम करतात. परंतु अंधारामध्ये या पक्षांची एकमेकांपासून ताटातूट होते. अंधारात त्यांना काहीही दिसत नाही. फक्त ते एकमेकांना साद घालतात. त्यांचा आर्त आवाज फक्त एकमेकांना ऐकू येतो. सूर्योदयाची ते वाट पाहत असतात. एकदा का सूर्योदय झाला की त्यांना दिसू लागते आणि विरहाच्या दुःखातून त्यांची मुक्ती होते. अशा रीतीने चक्रवाक पक्षी आणि सूर्य एकमेकांवर अवलंबून असतात.

या चक्रवाक पक्षांसाठी सूर्य ज्याप्रमाणे विरहातून मुक्तीचे कारण ठरतो, त्याप्रमाणेच भगवंत देखील आपल्या भक्तांसाठी धावून जातो आणि त्यांची संकटातून मुक्तता करतो. आपल्या संकटात जर भगवंत धावून यावा असे आपल्याला वाटत असेल तर आपल्याला त्याच्या भक्तीची ओढ लागली पाहिजे. आधीच्या श्लोकात समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे आपण त्याची अनन्यभवाने भक्ती करायला हवी म्हणजे तो संकटप्रसंगी धावून आपली त्यातून सुटका करतो.

श्रीहरी हा भक्तवत्सल आहे. जसे भक्ताला भगवंताशिवाय होत नाही तसेच श्रीहरीला देखील आपल्या भक्ताची काळजी केल्याशिवाय चैन पडत नाही. जेव्हा भक्त एक पाऊल पुढे टाकतो तेव्हा परमेश्वर त्याच्यासाठी स्वतःहून चार पावले पुढे येतो. हरिभक्तीचा महिमा फार मोठा आहे आणि हा महिमा आपल्याला पावलोपावली म्हणजे सर्वत्र ऐकू येतो. त्याची निशाणी म्हणजे त्याचा डंका सर्वत्र वाजतो आहे. वेद, शास्त्र, पुराणे देखील त्याचीच महती गात आहेत.

ज्याप्रमाणे चक्रवाक पक्षातील नर आणि मादी हे दोन जीव एकमेकांसाठी आसुसलेले असतात. त्याचप्रमाणे भक्त आणि भगवंत म्हणजे जीव आणि शिव. जीव शिवापासून म्हणजे आपल्या मूळ रूपापासून दूर गेला आहे. भगवंताची भेट म्हणजे जीवाचे शिवाशी मिलन. दुसऱ्या शब्दात सांगायचे तर जन्म मरणाच्या फेऱ्यापासून मुक्ती. ईश्वराला मनापासून आवाहन केले तर तो आपल्या हाकेला धावून येतो. ईश्वर म्हणजे या विश्वातील सूक्ष्म आणि सर्वव्यापी अदृश्य शक्ती. ही शक्ती आपल्याला मदत करण्यासाठी तत्पर असते. फक्त आपले आवाहन तिच्यापर्यंत पोहोचण्यासाठी खरी तळमळ हवी. २७ व्या श्लोकापासून तर या ३७ व्या श्लोकापर्यंतच्या एकूण अकरा श्लोकांमध्ये परमेश्वर आपल्या भक्ताची कधीही उपेक्षा करीत नाही ही गोष्ट समर्थ आपल्या मनावर ठसवतात.

स्वसंवाद : 

१) चक्रवाक पक्षाला जशी सूर्याची ओढ असते तशी माझ्या मनात परमेश्वराची आर्त ओढ कधी निर्माण झाली आहे का ?

२) “जीवाचे शिवाशी मिलन” हेच जीवनाचे अंतिम ध्येय आहे. माझ्या दैनंदिन जगण्यात हे ध्येय मला दिसते का ?

३) हरिभक्तीचा डंका सर्वत्र वाजतो आहे. मला तो खरंच ऐकू येतो का की सांसारिक गोंगाटात तो माझ्यापर्यंत पोहोचतच नाही ?

– – – – 

श्लोक क्र. ३८ – – 

मना प्रार्थना तुजला एक आहे|

रघुराज थक्कित होऊनि पाहे |

अवज्ञा कदाही येदर्थी न कीजे|

मना सज्जना राघवी वस्ती कीजे|३८|

अर्थ :  या श्लोकात समर्थ मनाला प्रार्थना करतात की राघवाला एकवार तू थक्क होऊन पहा (म्हणजेच त्याला समजून आणि जाणून घे). मनाने तू कायम भगवंताजवळच वस्ती कर. माझ्या या विनंतीचा अवमान म्हणजे अवज्ञा कधीही करू नकोस.

(थक्कित – आश्चर्ययुक्त/अद्भुत, येदर्थी – या बाबतीत)

विवेचन :  आतापर्यंतच्या श्लोकांमध्ये समर्थांनी मनाला उपदेश केला आहे. या श्लोकात मात्र ते मनाला प्रार्थना करतात की हे मना परमेश्वराकडे तू थक्क होऊन पहा. समर्थांचे हे सांगणे सुरुवातीला आपल्याला थोडे विचित्र वाटते. पण त्यात खूप गहन अर्थ भरलेला आहे. एखाद्या गोष्टीकडे आपण थक्क किंवा आश्चर्यचकित होऊन केव्हा पाहतो तर ज्यावेळी त्या गोष्टीचा कार्यकारण भाव आपल्याला समजत नाही. आपल्या समजण्याच्या पलीकडे ती गोष्ट असते तेव्हा आपण त्या गोष्टीकडे एखादी अद्भुत गोष्ट म्हणून पाहतो.

ज्यावेळी पहिल्यांदा वाफेवरचे पहिले रेल्वे इंजिन धावले आणि त्याच्या सहाय्याने रेल्वे धावली, त्यावेळी लोकांनी थक्क होऊन तिच्याकडे पाहिले. ही गोष्ट त्यांच्या दृष्टीने अद्भुत होती. बैल, घोडे किंवा ओढणारे कोणीही नसताना ही गाडी कशी चालते याचे कोडे सर्वसामान्यांना पडले होते. पण जेव्हा ही गोष्ट त्यांना नित्याची झाली आणि त्यामागील कार्यकारण भाव समजला तेव्हा तिचे आश्चर्य त्यांना वाटेनासे झाले. हळूहळू ते तंत्रज्ञान आपण जाणून घेतले, त्याचा अभ्यास केला. त्यात पुढे प्रगती झाली. विजेवर, डिझेलवर धावणाऱ्या रेल्वे इंजिनांची निर्मिती झाली. त्यासाठी त्या तंत्रज्ञानाच्या सानिध्यात आपल्याला जावे लागते.

तशीच ईश्वराने निर्मिलेली ही सृष्टी अद्भुत आहे. चंद्र, सूर्य, तारांगणे, मेघमाला, निरनिराळे प्राणी, पक्षी, वनस्पती आणि सूक्ष्मजीव पाहिले की थक्क व्हायला होते. या गोष्टी एकदा काळजीपूर्वक पाहिल्या की त्याच्या मागील कार्यकारण भाव जाणून घेता येईल. एखादे तंत्रज्ञान जाणून घ्यायचे असेल तर ज्याने ते निर्माण केले आहे त्याच्याजवळ जाऊन आपल्याला ते शिकावे लागते. या सृष्टीचा निर्माता ईश्वर आहे. तिचा कार्यकारणभाव जाणून घेण्यासाठी भगवंताला शरण जावे लागेल.

शरण जाणे म्हणजेच भगवंताच्या जवळ जाणे. त्याशिवाय हे शक्य नाही. म्हणून समर्थ म्हणतात मना सज्जना राघवी वस्ती कीजे. आपल्याला त्याच्याजवळ वस्ती केल्याशिवाय पर्याय नाही. त्यामुळेच भगवंताच्या अस्तित्वाचे ज्ञान आपल्याला प्राप्त होईल आणि या चराचरात तो कसा भरून राहिला आहे त्याचेही ज्ञान होईल. आपले कल्याण कशात आहे हे देखील समजेल आणि मग आपोआपच आपली वाटचाल व्यवहारातून अध्यात्माकडे आणि अध्यात्माकडून मोक्षाकड अशी सुरू होईल. समर्थांचे हे सांगणे आपल्या हिताचे आहे. म्हणूनच ते म्हणतात की याची कधीही अवज्ञा करू नकोस.

स्वसंवाद :

१) मी कधी या सृष्टीकडे खऱ्या अर्थाने थक्क होऊन, आश्चर्याने पाहिले आहे का? की सर्व काही गृहीत धरून जगतो आहे?

२) माझे मन खरोखरच “राघवी वस्ती” करते आहे का, की ते अजूनही बाह्य जगातच भटकत आहे?

३) समर्थांची ही विनंती मी मनापासून स्वीकारली आहे का, की अजूनही दुर्लक्षच करत आहे? (क्रमशः

– क्रमशः श्लोक ३७ आणि ३८.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…१ ✍

कह कि तुझ पर

क्या विपत आई

कि तेरी आँख भर आई?

मत समझ हमको पराया

बोल दे भाई

गाँठ मन की खोल दे भाई ।

कह कि कुछ तू आपनी बीती

कुछ तू और की बीती

प्रमिल

सुन कि

कि

साथ में आजा, उड़ा मौजें

बाद में तस्वीर हम खोजें

कि तुझ पर कष्ट कैसा आ पड़ा है

अरे भाई, बैठ भी तो जा

एक

कि तू कब से खड़ा है

बोझ मन भर का रखे मन पर

भला क्या सोच पायेगा ?

अँधेरा आँख में आँखें

भला किस ओर जायेगा ?

बात अब तेरी समझ में आ गई होगी

मैं यही समझा

कि तेरे इरादों पर

कोई मुसीबत छा गई होगी।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८२ “निरंतर हुये प्रतीत पिता…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत निरंतर हुये प्रतीत पिता...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “निरंतर हुये प्रतीत पिता...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

आँखों में विश्वास खोजते

हुये व्यतीत पिता ।

इस घर की इन दीवारों में

बने अतीत पिता ॥

 

ऊपर के उस आले में

धुँघली चिन्तित छाया ।

जो विपन्न हो बैठी आखिर

छूट गई माया।

 

उस पलंग पर बैठे

लगता देख रहे सबको ।

गहन प्यास को लिये

निरंतर हुये प्रतीत पिता ॥

 

उसी एक कमरे में जिसमें

बिता चुके जीवन ।

वही एक इच्छा,आकांक्षा का

अधियारा मन ।

 

उसी तिमिर से लडते लडते

साहस की मूरत,

ढोते रहे जीर्ण कंधों पर

बने सुजीत पिता ॥

 

और सभी हम लोग कुटुंबी

जन करते चर्चा ।

मरते मरते तकिया नीचे

छोड़ गये खर्चा ।

 

इसी तरह सब अपनी अपनी

लिये समस्यायें,

हो बैठे हम कैसे आखिर

अनुग्रहीत पिता ?

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

13-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३४ – कर्मण्येवाधिकारस्ते! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३४ कर्मण्येवाधिकारस्ते! ? श्री संजय भारद्वाज ☆

एक युवा व्यापारी मिले।  बहुत परेशान थे। कहने लगे, “मन लगाकर परिश्रम से अपना काम करता हूँ  पर परिणाम नहीं मिलता। सोचता हूँ काम बंद कर दूँ।” यद्यपि उन्हें  काम आरम्भ किए बहुत समय नहीं हुआ है। किसी संस्था के अध्यक्ष मिले। वे भी व्यथित थे। बोले,” संस्था के लिए जान दे दो पर आलोचनाओं के सिवा कुछ नहीं मिलता। अब मुक्त हो जाना चाहता हूँ इस माथापच्ची से।” चिंतन हो पाता, उससे एक भूतपूर्व पार्षद टकराए। उनकी अपनी पीड़ा थी। ” जब तक पार्षद था, भीड़ जुटती थी। लोगों के इतने काम किए। वे ही लोग अब बुलाने पर भी नहीं आते।”

कभी-कभी स्थितियाँ प्रारब्ध के साथ मिलकर ऐसा व्यूह रच देती हैं कि कर्मफल स्थगित अवस्था में आ जाता है। स्थगन का अर्थ तात्कालिक परिणाम न मिलने से है। ध्यान देने योग्य बात है कि स्थगन किसी फलनिष्पत्ति को कुछ समय के लिए रोक तो सकता है पर समाप्त नहीं कर पाता।

स्थगन का यह सिद्धांत कुछ समय के लिए निराश करता है तो दूसरा पहलू यह है कि यही सिद्वांत अमिट जिजीविषा का पुंज भी बनता है।

क्या जीवित व्यक्ति के लिए यह संभव है कि वह साँस लेना बंद कर दे?  कर्म से भी मनुष्य का वही सम्बंध है जो साँस है। कर्मयोग की मीमांसा करते हुए भगवान कहते हैं,

‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।’

कोई क्षण ऐसा नहीं जिसे मनुष्य बिना कर्म किए बिता सके। सभी जीव कर्माधीन हैं। इसलिए गर्भ में आने से देह तजने तक जीव को कर्म करना पड़ता है।

इसी भाव को गोस्वामी जी देशज अभिव्यक्ति देते हैं,

‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा।’

जब साँस-साँस कर्म है तो उससे परहेज कैसा? भागकर भी क्या होगा? ..और भागना संभव है क्या? यात्रा में धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता आती-जाती हैं। आकलन तो किया जाना चाहिए पर पलायन नहीं। चाहे लक्ष्य बदल लो पर यात्रा अविराम रखो। कर्म निरंतर और चिरंतन है।

सनातन संस्कृति छह प्रकार के कर्म प्रतिपादित करती है- नित्य, नैमित्य, काम्य, निष्काम्य, संचित एवं निषिद्ध। प्रयुक्त शब्दों में ही अर्थ अंतर्निहित है। बोधगम्यता के लिए इन छह को क्रमश: दैनिक, नियमशील, किसी कामना की पूर्ति हेतु, बिना किसी कामना के, प्रारब्ध द्वारा संचित, तथा नहीं करनेवाले कर्म के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

इसमें से संचित कर्म पर मनन कीजिए। बीज प्रतिकूल स्थितियों में धरती में दबा रहता है। स्थितियाँ अनुकूल होते ही अंकुरित होता है। कर्मफल भी बीज की भाँति संचितावस्था में रहता है पर नष्ट नहीं होता।

मनुष्य से वांछित है कि वह पथिक भाव को गहराई से समझे, निष्काम भाव से चले, निरंतर कर्मरत रहे। अपनी कविता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ उद्धृत करना चाहूँगा-

भीड़ का जुड़ना,

भीड़ का छिटकना,

इनकी आलोचनाएँ,

उनकी कुंठाएँ,

विचलित नहीं करतीं

तुम्हें पथिक..?

पथगमन मेरा कर्म,

पथक्रमण मेरा धर्म,

प्रशंसा, निंदा से

अलिप्त रहता हूँ,

अखंडित यात्रा पर

मंत्रमुग्ध रहता हूँ,

पथिक को दिखते हैं

केवल रास्ते,

इसलिए प्रतिपल

कर्मण्येवाधिकारस्ते!

 

विचार कीजिएगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ – हास्य-व्यंग्य – “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  डुप्लीकेट जिंदाबाद

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २५ 

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “डुप्लीकेट जिंदाबाद” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सबेरे कोई मेरे घर का दरवाजा लगातार खटखटाए जा रहा था।  मैं भी बिस्तर में दुबका उसके धीरज की परीक्षा ले रहा था, किंतु लंबे समय के बाद भी जब दरवाजे पर खटखटाहट बंद नहीं हुई तो मैं समझ गया कि दरवाजे पर मेरे पड़ोसी वर्मा जी के सिवा और कोई नहीं हो सकता।  कहीं दरवाजा न टूट जाए इस आशंका से मैंने तुरंत चादर फेंका और दरवाजा खोल दिया। मेरा अनुमान सही था बाहर वर्मा जी खड़े थे। उन्होंने मुझे एक ओर करते हुए घर के अंदर प्रवेश किया और सोफे पर पसरते हुए कहा – “भाई साहब, अख़बार पढ़ा आपने, अब डुप्लीकेट ताजमहल भी बन गया !”

मैंने आंखें मलते हुए कहा, वर्मा जी मुझे अख़बार पढ़ने की जरूरत कहां पड़ती है, आप ही सारी खबरें सुना जाते हैं और रही डुप्लीकेट ताजमहल की बात तो वह तो मेरे घर की आलमारी में भी बंद है। वर्मा जी बोले – “भाई साहब मैं आपकी आलमारी वाले ताजमहल की बात नहीं कर रहा, मैं तो उस विशाल डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा हूं जो एक पंजाबी उद्योगपति ने कुछ समय पहले 40 लाख अमरीकी डॉलर खर्च करके दुबई में बनवाया है। मैंने कहा भाई साहब इससे आपको क्या परेशानी हो रही है ? आजकल तो जमाना ही डुप्लीकेट का चल रहा है, वह समय गया जब किसी वस्तु या व्यक्ति का डुप्लीकेट होना सम्मानजनक नहीं समझा जाता था अब तो डुप्लीकेट की मांग ने ओरिजनल को पछाड़ दिया है। साबुन से लेकर सिंदूर तक सब डुप्लीकेट मिल रहा है। टी वी, कैमरा, सीडी की बात तो छोड़ो अब तो गीत और संगीत भी डुप्लीकेट मिलने लगे हैं और पसंद किए जा रहे हैं। डुप्लीकेट सामान के निर्माण में लोगों ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब ओरिजनल के पहले डुप्लीकेट सामग्री बाजार में आ जाती है। दुकानदार ग्राहक को ओरिजनल सामान दिखाने की कोशिश करता है तो वह डुप्लीकेट चाहिए कहकर दुकान से बाहर हो जाता है। डुप्लीकेट सामान बेचना दुकानदारों की भी मजबूरी बन गई है। बाजार में डुप्लीकेट की बढ़ती मांग के कारण देश के न जाने कितने उद्योगपतियों ने ओरिजनल वस्तुओं की जगह डुप्लीकेट का कारोबार शुरू कर दिया है। ओरीजनल समान बनाने और बेचने वाले अलसेट (मुसीबत) में हैं, डुप्लीकेट बनाने और बेचने वाले चांदी पीट रहे हैं।

लंबा बोलने के बाद जैसे ही मैंने सांस ली, वर्मा जी ने तुरन्त फायदा उठाया। बोले भाई साहब “आपने तो डुप्लीकेट पर भाषण ही दे डाला। मैं तो डुप्लीकेट ताजमहल की बात कर रहा था। ” मैने कहा – भाई जी आप ताजमहल को पकड़ का क्यों बैठे हैं ? अपने चारों ओर देखिए, हर तरफ डुप्लीकेट की माया है। आपको देश में दूध, दही, घी, तेल, सौंदर्य प्रसाधन, टी वी, कैमरा, रेडियो, कपड़ों से लेकर दवाएं तक डुप्लीकेट मिल जाएंगी। डुप्लीकेट गोविंदा, शाहरुख, सलमान, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या, करीना तो हैं ही डुप्लीकेट गांधी और मोदी भी घूम रहे हैं। “डुप्लीकेट जिंदाबाद” बोलिए और विदा लीजिए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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