(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३३० ☆ सोंध…
असमय बरसात हुई है। कुछ बच्चे घर से मनाही के बाद भी भीगने के आनंद से स्वयं को वंचित होने से रोक नहीं पा रहे हैं। बच्चों के भीगने को लेकर परिजनों की अपनी चिंताएँ हैं। अलग-अलग घर से अपने-अपने बच्चे का नाम लेकर पुकार लग रही है। ऐसे में अपना आनंद अधूरा छोड़कर घर लौटे लड़के को डाँटती उसकी माँ का स्वर कानों में पड़ा, “आई टोल्ड यू मैनी टाइम्स बट यू डोंट लिसन। मिट्टी इज़ डर्टी थिंग.., मिट्टी को हाथ भी नहीं लगाना। यू अंडरस्टैंड?”…इस आभिजात्य(!) माँ की चिंता कानों में पिघले सीसे की तरह उतरी।
मिट्ट इज़ डर्टी थिंग..!! सृष्टि के 84 लाख जीवों में से एक मनुष्य को छोड़कर शेष सबका प्रकृति के साथ तादात्म्य है। बुद्धि का वरदान प्राप्त विकास की राह पर चलते मनुष्य से यह तादात्म्य अधिक अपेक्षित है। तथापि अनेक प्राकृतिक आपदाएँ झेलते मनुष्य की भस्मासुरी प्रवृत्ति आश्चर्यचकित करती है। अपनी लघुकथा ‘सोंध’ स्मरण हो आई। कथा कुछ इस प्रकार है-…..
‘इन्सेन्स- परफ्यूमर्स ग्लोबल एक्जीबिशन’.., इत्र बनानेवालों की यह यह दुनिया की सबसे बड़ी प्रदर्शनी थी। लाखों स्क्वेयर फीट के मैदान में हज़ारों दुकानें। हर दुकान में इत्र की सैकड़ों बोतलें। हर बोतल की अलग चमक, हर इत्र की अलग महक। हर तरफ इत्र ही इत्र।
अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शनी में भीड़ टूट पड़ी थी। मदहोश थे लोग। निर्णय करना कठिन था कि कौनसे इत्र की महक सबसे अच्छी है।
तभी एकाएक न जाने कहाँ से बादलों का रेला आसमान में आ धमका। गड़गड़ाहट के साथ मोटी-मोटी बूँदें धरती पर गिरने लगीं। धरती और आसमान के मिलन से वातावरण महकने लगा।
..दुनिया के सारे इत्रों की महक अब अपना असर खोने लगी थीं। माटी से उठी सोंध सारी सृष्टि पर छा चुकी थी।…..
इस लघुकथा का संदर्भ इसलिए कि अपनी क्षणभंगुर कृत्रिमता को अविनाशी प्राकृतिक के सामने खड़ा करता मनुष्य दयनीय लगने लगा है। मिट्टी से बना आदमी अपनी मिट्टी खुद पलीद कर रहा है।
मिट्टी में मिलने के सत्य को जानते हुए भी मिट्टी से एलर्जी रखने वाली मनुष्य की यह मानसिकता सचमुच भय उत्पन्न करती है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – ग़ज़लिका।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७४ ☆
☆ ग़ज़लिका☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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जल प्रवाह में नर्तित रवि-किरणों में झलक तुम्हारी है।
चंद्र-रश्मियों में बिंबित छवि हमने हुलस निहारी है।।
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (6 अप्रैल से 12 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। कलयुग के पराक्रमी देवता श्री हनुमान जी के चरणों में शत-शत नमन के साथ आज की चौपाई है :-
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा,
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥
हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से राजकीय मान सम्मान प्राप्त होता है। हनुमत कृपा पर विश्वास आपको चतुर्दिक सफलता दिलाएगा।
“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में हनुमान चालीसा की चौपाइयों के संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
अब हम इस सप्ताह के ग्रहों के विचरण के बारे में चर्चा करेंगे।
इस सप्ताह सूर्य, शनि और मंगल मीन राशि में, वक्री राहु कुंभ राशि में, गुरु मिथुन राशि में और शुक्र मेष राशि में गोचर करेंगे। बुध प्रारंभ में कुंभ राशि में रहेंगे तथा 10 तारीख के 2:14 रात से मीन राशि में प्रवेश कर जाएंगे। आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपका व्यापार ठीक चलेगा। धन आने की पूरी उम्मीद है। गलत रास्ते से भी धन आएगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में मधुरता कम हो सकती है। कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है परंतु इसके लिए आपको अत्यंत सावधानी लेनी होगी। अपने वकील से भी आपको सावधान रहना पड़ेगा। आप अपने शत्रुओं को मामूली से प्रयासों से से परास्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए, 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित है। 6 और 7 तारीख को आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गरीबों के बीच में चावल का दान दें तथा शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को चावल या सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। धन की वृद्धि होगी। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह ठीक रहेगा। जीवनसाथी के साथ स्वास्थ्य में 6 और 7 तारीख को थोड़ी समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपकी कुंडली के गोचर में शत्रुहंता योग बन रहा है। इसके कारण आपके शत्रु कम या समाप्त हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख थोड़ा ठीक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मिथुन राशि
कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह का उत्तम रहेगा। उनका प्रमोशन अगर ड्यू है तो वह भी हो सकता है। सीमित मात्रा में धन आने का योग है। भाग्य से आपको सामान्य मदद मिलेगी। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके पेट में थोड़ी परेशानी हो सकती है।, आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहने की उम्मीद है। आपके ब्लड प्रेशर और डायबिटीज में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। छात्रों के लिए यह सप्ताह मिला-जुला प्रभाव लेकर आएगा। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख के दोपहर तक का समय किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक करने के लिए उपयुक्त है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी से कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। आपके जो भी कार्य सिर्फ भाग्य की वजह से अटक जाते हैं उनको इस सप्ताह करने का कष्ट करें। वे सभी कार्य हो जाएंगे। इस सप्ताह आपके खर्चे में वृद्धि होगी। पेट में छोटी-मोटी तकलीफ हो सकती है। ड्राइविंग के समय सावधान रहें। अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख किसी भी कार्य को करने के लिए सफलता दायक है। 8, 9 और 10 तारीख को आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को संपन्न करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह ठीक चलेगा। मामूली धन आने की उम्मीद है। भाई बहनों के साथ तनाव हो सकता है। भाग्य से ज्यादा आपको अपने पुरुषार्थ पर यकीन करना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहकर के कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। इस सप्ताह आपके लिए 6 और 7 तारीख सभी प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। 10, 11 और 12 को आपको अपने कार्यों को पूरी सावधानी के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए बहुत अच्छा है। आपके लिए यह सप्ताह मिश्रित फल दायक है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों के लिए सप्ताह लाभ देने वाला है। विद्यार्थियों को इस सप्ताह में कोई विशेष लाभ नहीं हो पाएगा। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपको सावधानी के साथ व्यवहार करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए लाभ फलदायक हैं। 6 और 7 अप्रैल को आपके भाई बहनों को कुछ लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। भाग्य से आपको इस सप्ताह कम मदद मिलेगी। आपको अपने कर्मों पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। आपको अपने संतान से इस सप्ताह मामूली सहयोग मिल सकता है। विद्यार्थियों की पढ़ाई भी सामान्य ही रहेगी अर्थात पहले से काफी कम हो जाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार से परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए की शिव पंचाक्षरी स्त्रोत का प्रतिदिन पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
वृश्चिक राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए काफी अच्छा रहेगा। अगर उनका प्रमोशन ड्यू है तो प्रमोशन भी हो सकता है। परीक्षा में उनको सफलता प्राप्त होगी। धन प्राप्त होने की आशा है। जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। दुर्घटनाओं से आपको सचेत रहना चाहिए। आपके पेट में कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको 6 और 7 तारीख को अपने स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रूप से अच्छा है। यात्रा का योग बन सकता है। विद्यार्थियों की पढ़ाई साधारण रूप से चलेगी। आपके जीवन साथी के पेट में कुछ तकलीफ हो सकती है। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है अर्थात ना अच्छा है और ना बुरा। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख लाभप्रद है। 6 और 7 तारीख को आपको कचहरी के कार्यों में सावधानी से कार्य करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए उत्तम है। भाई बहनों से आपके संबंध भी अच्छे रहेंगे। उनका समर्थन भी आपको प्राप्त होगा। धन आने का योग है। भाग्य से आपको मदद कम मात्रा में मिलेगी। आपके कर्म आपकी पूरी मदद करेंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनको चाहिए कि वे व्यर्थ का वाद विवाद न करें। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख सभी प्रकार के कार्यों के लिए शुभ है। 8, 9 और 10 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। 6 और 7 तारीख को आपको धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग है। आपके थोड़े थोड़े से प्रयास से ही आपके पास अधिक मात्रा में धन आ सकता है। धन प्राप्त करने की सभी योजनाओं पर आपको इस सप्ताह कार्य करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। संतान से आपको इस सप्ताह कम सहयोग प्राप्त होगा। दुर्घटनाओं के प्रति आपको इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य के स्थान पर आपको अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। आप जितना कर्म करेंगे उतना ही आपको फल प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए आपको 6, 7 तथा 11 और 12 अप्रैल को सावधान रहकर कार्यों को करने की आवश्यकता है। 8, 9 और 10 तारीख थोड़ा ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें। और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मीन राशि
यह सप्ताह आपके लिए अधिकांश रूप से ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। लोगों पर आप विजय प्राप्त कर सकते हैं। धन प्राप्त होने का सामान्य योग है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में भी आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। किसी प्रकार का कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। दुर्घटनाओं के प्रति भी आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख कार्यों को करने हेतु अनुकूल हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चिड़ियों को दाना दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २१ आणि २२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. २१ – –
मना वासना चुकवी येरझारा ।
मना कामना सांडि रे द्रव्यदारा |
मना यातना थोर हे गर्भवासी ।
मना सज्जना भेटवी राघवासी |२१ |
अर्थ: हे मना, वासनेमुळे जीव जन्म मरणाच्या फेऱ्यात (येरझारा)अडकतो. त्या वासनेचा त्याग कर म्हणजे जीव जन्म मरणाच्या फेऱ्यात अडकणार नाही. पैसा आणि स्त्री सुख यांच्याबद्दल मोह बाळगू नकोस. कारण वासनेच्या पोटी जन्म घ्यावा लागतो आणि गर्भवासाच्या यातना भयंकर असतात. म्हणून हे मना भगवंताची भेट करून घे.
विवेचन: जन्माआधी आणि जन्माच्या प्रसंगी होणाऱ्या यातना किती भयंकर असतात हे समर्थांनी आधीच्या श्लोकात सांगितले आहे. या श्लोकात ते आपल्याला म्हणतात की वासनेच्या पोटी जन्म घ्यावा लागतो म्हणून या वासनांचा त्याग करायला हवा. वासनाच नसतील तर जन्म मृत्यूचा प्रश्नच उद्भवणार नाही. या श्लोकात ‘ चुकवी ‘ हा शब्द वासना आणि येरझारा या दोन्हीसाठी आहे. आपल्याला वासना आणि येरझारा दोन्हीही चुकवायच्या आहेतच. वासना चुकवली तर येरझारा आपोआपच चुकतील.
वासना या निरनिराळ्या प्रकारच्या असतात त्यातही त्यांचे दोन प्रमुख प्रकार सांगता येतील. सद् वासना आणि दुर्वासना. दोन्हींपैकी कोणत्याही प्रकारची वासना असेल तरी पुनर्जन्म हा अटळ आहे. परंतु त्यातल्या त्यात सद्वासना म्हणजे चांगल्या वासना असतील तर पुन्हा जन्म मिळाला तरी हरकत नसते. समाजोपयोगी कार्य करणे, संतांचा सहवास लाभणे किंवा परमेश्वर भक्तीची इच्छा धरणे या सद्वासना आहेत. या सद्वासनांमुळे आत्मिक उन्नती होण्यासाठी मदत होते. षडरिपूंच्या नादी लागून त्या वासना अपूर्ण जर राहिल्या असतील तर त्या पूर्ण करण्यासाठी पुनर्जन्म घ्यावा लागतो. परंतु त्याने शेवटी मनुष्याची अधोगतीच होते आणि मुक्तीपासून तो दूर जातो.
संत तुकाराम महाराजांना संतसंग आणि भगवद्भक्तीची आस होती. ते म्हणतात – –
न लगे मुक्ती आणि संपदा, संतसंग देई सदा|
तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हासी ||
संतांचा, सज्जनांचा संग म्हणजे सहवास मिळावा, परमेश्वराची भक्ती कायम लाभावी म्हणजे जेणेकरून त्यातील गोडी कायम अनुभवता येईल. म्हणून त्यांना गर्भवास म्हणजे पुन्हा जन्म घेणेदेखील मान्य आहे.
तुकाराम महाराजांसारख्या संतांची ही सद्वासना झाली. परंतु या ऐहिक जीवनात सामान्य मनुष्य एवढा गुंतून जातो की त्याच्या अनेक प्रकारच्या वासनांची पूर्ती कधी होतच नाही. ज्याप्रमाणे अग्नीमध्ये जेवढे इंधन घालावे तेवढा तो अधिक प्रज्वलित होतो. तशा या दुर्वासना देखील वाढत जातात आणि अंतकाळी या वासना कायम असतील तर त्या पोटी मनुष्याला पुनर्जन्म घ्यावा लागतो. सत्ता, संपत्ती आणि स्त्री संबंधित वासना कधी संपतच नाहीत. कामिनी आणि कांचन यांच्या वासना सर्वात जास्त प्रबळ आहेत. त्यांच्यावर मात करणे सोपे नाही. इतर वासना त्यामानाने गौण आहेत. आज जगातील घडणारे बहुतेक गुन्हे आणि वाईट घटना कामिनी आणि कांचनाच्या हव्यासापायीच घडत आहेत. चित्रपटातून आणि टीव्हीवरील विविध प्रकारच्या धारावाहिकांमधून अशाच घटना समोर येतात. त्यापासून बोध घेण्याऐवजी त्यातील वाईट गोष्टींचा प्रभाव समाजमनावर अधिक पडतो. भ्रष्टाचाराच्या घटनांबद्दल तर न बोललेले बरे इतक्या त्या नित्याच्या झाल्या आहेत.
वासना अपूर्ण राहिल्या की पुन्हा जन्म घ्यावा लागतो. जन्माला आल्यानंतर या वासनांचा भोग तर मिळतो परंतु माणसाची अधिकाधिक अधोगती होते आणि त्याने तो मुक्ती पासून दूर जातो.
परद्रव्य कांता पराची पाहता
स्मरादि रिपु ओढिती मानसाता
– – असे श्री दत्त स्तुतीत म्हटले आहे. दुसऱ्याचे धन, दुसऱ्याची स्त्री यांची अभिलाषा धरली तर काम, क्रोध यांसारखे शत्रू मनावर आक्रमण करतात आणि शेवटी ते माणसाचा नाश घडवून आणतात.
म्हणूनच जन्म मृत्यूचा फेरा म्हणजेच येरझारा चुकवायचा असेल तर समर्थ वासनेवर मात करायला सांगतात. आणि त्यासाठी ईश्वर प्राप्तीचे पवित्र ध्येय आपल्या डोळ्यासमोर ठेवावे लागते. केवळ ध्येयवादी मनुष्य असा त्याग करू शकतो. माया मोहात अडकलेले मन आपण ईश्वराकडे लावले तर तेच मन आपल्याला (राघवाची) ईश्वराची भेट घडवून देईल.
स्वसंवाद :
माझ्या आयुष्यात कोणत्या वासना मला सर्वाधिक बांधून ठेवतात?
कामिनी आणि कांचनाच्या मोहापासून दूर राहण्यासाठी मी सजग आहे का?
संतसंग, सत्संग किंवा आध्यात्मिक चिंतनाला माझ्या जीवनात किती स्थान आहे?
माझ्या जीवनाचे ध्येय केवळ भोग आहे की ईश्वरप्राप्ती?
– – – –
श्लोक क्र. २२ – –
मना सज्जना हीत माझे करावे ।
रघुनायका दृढ चित्ती धरावे ।
महाराज तो स्वामि वायूसुताचा ।
जना उद्धरी नाथ लोकत्रयाचा ।।२२।।
अर्थ :
हे सज्जन मना, तुला जर तुझे खरे कल्याण करून घ्यायचे असेल तर रघुकुलाचा नायक असलेल्या श्रीरामाला चित्तामध्ये दृढ धारण कर. तो वायूसुत हनुमंताचा स्वामी आहे आणि तिन्ही लोकांचा उद्धार करणारा आहे. म्हणून अशा त्या श्रीरामाला तू घट्ट धरून ठेव—म्हणजेच नेहमी त्याच्या चिंतनात राहून आपला उद्धार करून घे.
विवेचन :
आधीच्या श्लोकांमध्ये जन्माला येताना जीवाला किती यातना सहन कराव्या लागतात हे समर्थ सांगतात. आयुष्य जगताना देखील नाना प्रकारची दुःखे, संकटे आणि क्लेश सहन करावे लागतात. हे सर्व म्हणजे जन्म-मृत्यूच्या अखंड फेऱ्यांमुळे घडणारे आहे. या येरझाऱ्यातून सुटका करून घ्यायची असेल तर माणसाने आपले खरे हीत करून घ्यायला हवे. मग हे हीत म्हणजे नेमके काय आणि ते कसे साध्य करायचे—याचे उत्तर समर्थ या श्लोकात देतात.
हे जग मायेचा एक मोहक पिसारा आहे. त्याला आपण भुलतो, तेच अंतिम सत्य आहे असे मानतो आणि त्यातच अडकून पडतो. नाना प्रकारची प्रलोभने, विकार आणि वासना आपल्या मार्गात अडथळे निर्माण करतात. परिणामी, आपल्या कल्याणाचा जो अंतिम मार्ग आहे—श्रेयसाचा मार्ग, त्याऐवजी आपली वाटचाल प्रेयसाच्या मार्गाने होत राहते.
खरे पाहता मनच आपला मित्र आणि मनच आपला शत्रू असते. तेच आपले हीत किंवा अहित करू शकते. विषयसुख आणि शरीरसुखालाच आपण जीवनाचे अंतिम ध्येय मानतो. कामिनी आणि कांचनाच्या मागे धावत राहतो. परंतु या सर्व गोष्टी म्हणजे मृगजळासारख्या आहेत. मृगजळ दिसते, पण प्रत्यक्षात अस्तित्वात नसते. तसेच हे बाह्य जग—ते सत्य वाटते, पण ते भासमान आहे. आपण त्याच्या मागे धावत राहतो आणि जे अंतिम सत्य आहे—ब्रह्म किंवा परमेश्वर—त्याकडे दुर्लक्ष करतो.
आपली अवस्था कस्तुरीमृगासारखी होते. कस्तुरी स्वतःच्या नाभीत असतानाही तो तिच्या शोधात रानोमाळ भटकत राहतो. त्याचप्रमाणे आपल्या हृदयातच असलेल्या आत्मारामाला आपण विसरतो आणि बाह्य सुखांच्या मागे भटकत राहतो.
मानवी जीवनाचे खरे हीत म्हणजे त्या रघुनायकाला दृढ चित्ती धारण करणे. चित्तामध्ये भगवंताला घट्ट धरून ठेवणे म्हणजेच आपले कल्याण करणे होय. एखाद्या वस्तूचा सतत सहवास लाभला तर ती वस्तू आपल्याला प्रिय वाटू लागते. तसेच भगवंताच्या नामाचा आणि स्मरणाचा सतत सहवास लाभला तर भगवंतही आपल्याला प्रिय वाटू लागतो. आणि जेव्हा भगवंत प्रिय वाटू लागतो, तेव्हा समजावे की आपण योग्य मार्गावर चाललो आहोत.
श्रीराम हे वायूसुत हनुमंताचे स्वामी आहेत. हनुमंत म्हणजे शक्ती, युक्ती आणि बुद्धिमत्तेचे मूर्तिमंत प्रतीक. तरीही तो स्वतःला रामाचा दास मानतो. भक्ती कशी करावी हे हनुमंताकडून शिकावे. त्याने श्रीरामांना आपल्या हृदयात कायमचे धारण केले आहे. श्रीरामांच्या कृपेने तो चिरंजीव झाला आहे.
शौर्य, धैर्य, औदार्य आणि शरणागताचे रक्षण—हे श्रीरामांचे वैशिष्ट्यपूर्ण गुण आहेत. ते रघुकुलाचे भूषण आहेत. त्यांचे नाम पापातून मुक्त करणारे आहे, भवसागरातून तारून नेणारे आहे. हजारो वर्षांपासून असंख्य लोकांनी श्रीरामनामाचा आश्रय घेतला आणि या संसारसागरातून तरून गेले.
त्रैलोक्याचा नाथ असलेल्या त्या श्रीरामांनी लोककल्याणाचे व्रत स्वीकारले आहे. म्हणूनच समर्थ अत्यंत तळमळीने आपल्या मनाला सांगतात—
“हे सज्जन मना, त्या श्रीरामांना आपल्या हृदयात दृढ धारण कर; त्यातच तुझे खरे कल्याण आहे. ”
स्वसंवाद :
माझ्या जीवनातील खरे “हीत” काय आहे याचा मी कधी गंभीरपणे विचार केला आहे का?
विषयसुख आणि भौतिक यश यांनाच मी जीवनाचे अंतिम ध्येय मानतो आहे का?
माझ्या मनाला ईश्वरनाम, सद्गुण आणि सत्कर्म यांचा सहवास मिळतो आहे का?
हनुमंताप्रमाणे श्रद्धा, नम्रता आणि सेवाभाव माझ्या जीवनात कितपत आहे?
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “लाल बत्ती”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
मैं आज अपनी कार में बेटी को यूनिवर्सिटी छोड़ने जा रहा था। आमतौर पर अपनी सरकारी लाल बत्ती वाली चमचमाती गाड़ी में छोड़ने जाता हूँ। लाल बत्ती देखते ही सिक्युरिटी पर तैनात सिपाही सैल्यूट ठोकना नहीं भूलते। पर आज ड्राइवर छुट्टी पर था। मैंने सोचा कि मैं ही अपनी कार में बेटी को छोड़ आता हूँ।
जैसे ही मेन गेट पर कार पहुंची, सिक्युरिटी वालों ने हाथ देकर रुकने का इशारा किया। मैं हैरान! जो मुझे देखे बिना सैल्यूट ठोकते थे, आज चैकिंग के लिए पूछ रहे थे क्योंकि आज लाल बत्ती वाली गाड़ी जो नहीं थी !
मैंने बताने की कोशिश की कि मैं वही हूँ, जिसे आप बिना देखे सलाम करते हो लेकिन वे मानने को तैयार न थे! तो क्या लाल बत्ती ही मेरी पहचान है, मैं नहीं? और मैं आईकार्ड ढूंढने लगा!
☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की बात, पत्थर पर खींची हुई लकीर ? ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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पत्थर पर खींची गयी लकीर, और पिता की कही गयी बात कभी मिथ नही हो सकती l ऐसा कह कर वह बुजुर्ग सो गया l इस बात को जिस विश्वास के साथ उसने कहा था, बुजुर्ग को अपने इस विश्वास के अस्तित्व पर खतरा महसूस हो रहा था l बुजुर्ग सोया, मगर इस सोच और मंथन के साथ सोया कि इस पंक्ति में मजबूती कितनी है, यह तो आगे देखने वाली चीज होंगी l
नींद में भी लम्बे अनुभव और युवा के अतिआत्मविश्वास मे द्वन्द बढ़ता गया था l युवा पुत्र को बुजुर्ग बाप से यह कहना बड़ा आसान था कि आप कुछ नही जानते है l आपको कुछ सही समझ मे आता ही कहां है l आप तो गलतियाँ करते ही करते है l अब ऐसी गलती बर्दास्त भी नही होंगी ।
बुजुर्ग बाप की लम्बी उम्र, पके बाल, और मंद होती आँखे स्वप्न में भी इसी सोच मे पड़ी रहीं कि क्या उसका पुत्र सही कह रहा था और उसकी बात गलत है ।
बुजुर्ग आँखे अपनी बत्ती बुझने से पहले पहले अपने इस प्रश्न का सटीक उत्तर ढूढ़ रही थी l अचानक मानव जीवन के यथार्थ का बोध कराने वाली पुस्तक श्रीरामचरितमानस उसके आगे खुली थी l वह लगातार पन्ने पलटते जा रहा था कि..अचानक ये पंक्तियाँ उसके मानस पटल से टकराई l
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें।
चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें॥
राहत की बात यह थी कि नींद खुलने से पहले उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया था l
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २८ ☆ श्री सुरेश पटवा
नैनीताल
कालाढूँगी से नैनीताल की तरफ़ मुड़ने लगे तो वहाँ पुलिस ने बेरीकेड़ लगा कर मुस्तैद चौकसी कर रखी थी। वे कोरोना चेकिंग कर रहे थे। उन्हें टेस्ट रिपोर्ट बताई। फिर भी संतुष्ट नहीं हो रहे थे। परिचय पत्र के रूप में स्टेट बैंक के पहचान पत्र दिखाते ही अफ़सर ने कहा जाइए। यात्रा शुरू होते ही पहाड़ियों का घुमावदार रास्ता आरम्भ हो गया। जिम कार्बेट कभी इन्ही रास्तों से पैदल नैनीताल ज़ाया करते थे। इन्ही पहाड़ियों में उन्होंने आदमखोरों का पीछा किया था और कई बार तो आदमखोरों ने उनका पीछा किया था। शुरू में पहाड़ियाँ थोड़ी सपाट सी थीं लेकिन दस किलोमीटर चलने के बाद तीखी चढ़ाई आते ही चारों तरफ़ खूबसूरत नज़ारे दिखने लगे। शाम के धुँधलके में नैनीताल पहुँच गये।
स्टेट बैंक का गेस्ट हाऊस बहुत ऊँची पहाड़ी पर बहुत देर तक ढूँढने के बाद मिल तो गया। परंतु वहाँ का केयरटेकर बोला कि आपकी बुकिंग नहीं है। काफ़ी बहस मुबाहिसों के बाद कमरा हासिल कर लिया। बाहर निकल कर देखा तो नैनीताल को घेरकर अतीव प्राकृतिक सौदर्य बिखरा था। पूरा शहर नज़र आ रहा था। झील को घेरकर बनी सड़क पर आवागमन चिटियों की चलत रेखा सादृश्य दिख रहा था।
नैनीताल कुमायूँ इलाक़े का प्रमुख शहर और भारत का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। राज्य का उच्च न्यायालय स्थित होने से यह उत्तराखंड की न्यायिक राजधानी है। कुमाऊं मंडल का मुख्यालय होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण ज़िला भी है। उत्तराखंड के राज्यपाल यहाँ राजभवन में रहते हैं। जबकि राजनीतिक राजधानी देहरादून है। नैनीताल संयुक्त प्रांत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। नैनीताल बाहरी हिमालय की कुमाऊं तलहटी में राज्य की राजधानी देहरादून से 285 किमी की दूरी और नई दिल्ली से 345 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर समुद्र तल से 6,358 फुट की ऊंचाई पर एक घाटी में स्थित है। जिसमें एक आंख के आकार की झील लगभग दो मील की परिधि में पहाड़ों से घिरी हुई है, जिनमें से सबसे ऊंची नैना चोटी 8,579 फीट, उत्तर में देवपथ 7,999 फुट और पश्चिम में अयारपथ 7,474 फुट ऊंची चोटियों के शीर्ष से दक्षिण की ओर विशाल मैदान और उत्तर में बर्फीली श्रृंखला के साये में उलझी हुई लकीरों से पहाड़ी खेत के शानदार दृश्य हिमालय की केंद्रीय धुरी का निर्माण करती हैं। नैनीताल शहर का कुल क्षेत्रफल को 11.73 किमी है। झील की तलहटी झील के सबसे गहरे बिंदु, पाषाणदेवी के पास 85 मीटर की गहराई पर है। झील को विवर्तनिक रूप से बनाया गया माना जाता है। बलिया नाला, जो झील को भरने वाली मुख्य धारा है, और बाद की धाराएँ प्रमुख जोड़ों सहित 26 प्रमुख नाले झील में मिलते हैं, जिसमें 3 बारहमासी नाले शामिल हैं।
पुराणों के अनुसार सती के शव के विभिन्न अंगों से बावन शक्तिपीठों का निर्माण हुआ था। इसके पीछे यह अंतर्कथा है कि दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी यज्ञ में भाग लेने गईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर के आदेश पर उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए इधर-उधर घूमने लगे। तदनंतर सम्पूर्ण विश्व को प्रलय से बचाने के लिए जगत के पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ने चक्र से सती के शरीर को काट दिया। तदनंतर वे टुकड़े 52 जगहों पर गिरे। वे 52 स्थान शक्तिपीठ कहलाए। सती ने दूसरे जन्म में हिमालयपुत्री पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह किया। पौराणिक मान्यता है की सती के नैन यहाँ गिरने से नैना देवी का शक्ति पीठ स्थापित हुआ।
नैनीताल ऐतिहासिक रूप से कुमाऊं क्षेत्र का हिस्सा रहा है। 10वीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के पतन के बाद, कुमाऊं कई छोटी रियासतों में विभाजित हो गया था, और नैनीताल के आसपास का क्षेत्र एक खासिया परिवार की विभिन्न शाखाओं के अधीन था। कत्यूरियों के बाद कुमाऊं पर समेकित प्रभुत्व हासिल करने वाला पहला राजवंश चंद था, लेकिन इसमें कई शताब्दियां लगीं और नैनीताल और इसके आसपास के क्षेत्र अवशोषित होने वाले अंतिम क्षेत्रों में से एक थे।
त्रिलोक चंद ने तेरहवीं शताब्दी में भीमताल में एक किला बनवाया था, लेकिन उस समय नैनीताल स्वयं चंद शासन के अधीन नहीं था, और राज्य की पश्चिमी सीमा के पास स्थित था। उद्यान चंद के शासनकाल के दौरान, चंद राज्य की पश्चिमी सीमा कोशी और सुयाल नदियों तक फैली हुई थी, लेकिन रामगढ़ और कोटा अभी भी पूर्व खासिया शासन के अधीन थे। 1488 से 1503 तक शासन करने वाले कीरत चंद अंततः नैनीताल और आसपास के क्षेत्र पर अधिकार स्थापित करने में सक्षम हुए थे। खासिया प्रमुखों ने 1560 में अपनी स्वतंत्रता हासिल करने का प्रयास किया, जब उन्होंने रामगढ़ के एक खासिया के नेतृत्व में सफलता के एक संक्षिप्त क्षण का आनंद लिया, लेकिन बाद में बालो कल्याण चंद द्वारा निर्ममता से वश में कर लिया गया। अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन् 1790 में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया।
कुमाऊं पर गोरखा शासन 24 वर्षों तक चला। इस अवधि के दौरान काली नदी को अल्मोड़ा के रास्ते श्रीनगर से जोड़ने वाली एक सड़क थी। गोरखा काल के दौरान अल्मोड़ा कुमाऊं का सबसे बड़ा शहर था, और अनुमान है कि इसमें लगभग 1000 घर थे।
कुमाऊँ की पहाड़ियाँ एंग्लो-नेपाली युद्ध (1814-16) के बाद ब्रिटिश शासन के अधीन आ गईं। नैनी ताल के हिल स्टेशन शहर की स्थापना 1841 में हुई थी, जिसमें शाहजहांपुर के एक चीनी व्यापारी पी. बैरोन द्वारा पहले यूरोपीय घर (पिलग्रिम लॉज) का निर्माण किया गया था। अपने संस्मरण में, उन्होंने लिखा: “यह अब तक का सबसे अच्छा स्थल है जिसे मैंने हिमालय में 2,400 किमी की यात्रा के दौरान देखा है।”
1846 में, जब बंगाल आर्टिलरी के एक कैप्टन मैडेन ने नैनी ताल का दौरा किया, तो उन्होंने दर्ज किया कि “बस्ती के अधिकांश हिस्सों में घर तेजी से उभर रहे थे: कुछ सैन्य रेंज के शिखर की ओर समुद्र तल से लगभग 7,500 फीट ऊपर थे। स्थानीय लोगों द्वारा इसका नामकरण ऊबड़-खाबड़ और जंगली आन्यारपट्टा आशीष (अन्यार-पट्ट – कुमाऊँनी में – पूर्ण अंधकार) किया था क्योंकि घने जंगलों के कारण यहाँ कम से कम सूर्य की किरणें पड़ती थीं। सेंट जॉन (1846) चर्च जंगल में सबसे शुरुआती इमारतों में से एक था। उसके बाद बेल्वेडियर, अल्मा लॉज, एशडेल कॉटेज (1860 ) बनीं। जल्द ही, यह शहर ब्रिटिश सैनिकों और औपनिवेशिक अधिकारियों और उनके परिवारों द्वारा मैदानी इलाकों की गर्मी से बचने की कोशिश करने वाला एक रिसॉर्ट बन गया। बाद में, यह शहर संयुक्त प्रांत के गवर्नर का ग्रीष्मकालीन निवास बन गया।
30 जुलाई 2021 को हमने एक पूरा दिन नैनीताल के दर्शनीय स्थलों के लिए रखा था। नैनीताल को भारत के लेक सिटी के रूप में भी जाना जाता है। कहा जाता है कि एक समय में नैनीताल जिले में 60 से अधिक झीलें थीं। चारों ओर सुंदरता बिखरी पड़ी है। सैर-सपाटे के लिए दर्जनों जगहें हैं, जहां पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरा यह स्थान झीलों से भरा हुआ है। नैनीताल हिमालय की कुमाऊँ पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है।
नैनी झील नैनीताल का सबसे प्रमुख आकर्षण है, जो हरी घाटियों से घिरा है। यात्री नौकायन (रोइंग), रोइंग, पैडलिंग (नौकायन) जैसी गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। यह झील काफी लंबी है और इसके उत्तरी भाग को ‘मल्ली ताल’ कहा जाता है, जबकि दक्षिणी भाग को ‘तल्ली ताल’ कहा जाता है। यह एकमात्र झील है जिस पर एक पुल और एक डाकघर है।
मॉल रोड नैनीताल की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम है, और हाल ही में इसे बदलकर ‘गोविंद बल्लभ पंत मार्ग’ कर दिया गया है। दुकानों और बाजारों के अलावा, कई बैंक और ट्रैवल एजेंसियां मॉल रोड पर उपलब्ध हैं। यह सड़क मल्लीताल को महाल्ली से जोड़ती है। एक अन्य पर्यटक आकर्षण ‘ठंडी सड़क’ है, जो नैनी झील के दूसरी ओर स्थित है। हम लोग एक नौका पर सवार होकर दो घंटे नैनीताल में नौकायन का आनंद लेते रहे। चारों तरफ़ पहाड़ों पर बादलों की अठखेलियाँ मस्त वातावरण रच रही थीं। मंद-मंद रिमझिम फुहारों ने वातावरण को और भी रोमांटिक बना दिया। झील की सैर के बाद चिड़िया घर की सैर को निकल गए।
नैनीताल में चिड़ियाघर 1984 में स्थापित किया गया था। यह नैनीताल बस स्टॉप से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह चिड़ियाघर विभिन्न जानवरों का घर है, जिनमें बंदर, साइबेरियाई बाघ, तेंदुए, भेड़िये, ताड़ के सिवेट बिल्लियाँ, रोज़ रिंग पैराकेट्स, सिल्वर तीतर, पहाड़ी लोमड़ी, सांभर, प्यारे और बार्क हिरण और हिमालयन काला भालू भी शामिल है। चिड़ियाघर सोमवार और सभी राष्ट्रीय छुट्टियों पर बंद है।
नैनीताल की सात चोटियों में 2611 मीटर ऊंची नैनी चोटी (चाइना पीक) सबसे ऊंची चोटी है। चाइना पीक की दूरी नैनीताल से लगभग 6 किलोमीटर है। इस चोटी से हिमालय की ऊँची चोटियाँ दिखाई देती हैं। नैनीताल झील और शहर के भव्य दृश्य भी हैं। फिर नीचे आकर टिफ़िन टॉप पर चढ़े। टिफिन टॉप एक सुंदर पिकनिक स्थल है, जिसे ‘डोरोथी की सीट’ के रूप में भी जाना जाता है। अयारपट्टा चोटी पर स्थित यह स्थान समुद्र तल से 7520 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यात्री यहाँ से ग्रामीण परिदृश्य के साथ शक्तिशाली हिमालय पर्वतमाला के प्रभावशाली दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इस स्थान का विकास डोरोथी शैले (एक अंग्रेजी कलाकार) के पति द्वारा विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद किया गया था। नैनीताल टाउन से 4 किमी दूर स्थित, यह टिफिन टॉप प्रकृति की फोटोग्राफी के लिए एक आदर्श स्थान है।
अगली सुबह सेंट जॉन चर्च इन वाइल्डरनेस गए जो मल्लीताल (नैनीताल के उत्तरी भाग) में स्थित एक शांत जगह है। यह चर्च वर्ष 1844 में स्थापित किया गया था। अभिलेखों के अनुसार, कोलकाता के बिशप, डैनियल विल्सन, इस चर्च की आधारशिला स्थापित करने के लिए यहां आए थे, अपनी यात्रा के दौरान, वे बीमार हो गए और उन्हें पास के जंगल में एक अधूरे घर में रहना पड़ा। इसलिए, चर्च को जंगल में सेंट जॉन के रूप में जाना जाने लगा। यह चर्च 1880 में भूस्खलन का शिकार हुए लोगों के एक स्मारक के रूप में भी काम करता है, जहाँ कांस्य पट्टिका में मारे गए लोगों के नाम लिखे हैं।
उसके बाद गुफा गार्डन गए। गुफा गार्डन को इको गुफा गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। यह नैनीताल का एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। यह उद्यान अपने आगंतुकों को पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली की एक झलक प्रदान करता है। छह भूमिगत पिंजरे हैं जो पेट्रोमैक्स लैंप द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं और एक संगीत वाद्ययंत्र की ताल पर चलने वाला एक फव्वारा भी है जो पहली बार नैनीताल में स्थापित किया गया था। इन गुफाओं को टाइगर गुफा, पैंथर गुफा, चमगादड़ गुफा, गिलहरी गुफा, फ्लाइंग फॉक्स, एव और एप गुफा के रूप में जाना जाता है। इन गुफाओं को जोड़ने का मार्ग काफी संकीर्ण है, कभी-कभी यात्रियों को रेंगने की आवश्यकता होती है। ये सभी गुफाएँ प्राकृतिक हैं और स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रबंधित हैं।
नैनीताल के पास एक खुर्पाताल भी है। कॉटेज, फिशिंग फिटर (झोपड़ी) लोगों के लिए स्वर्ग है। यह नैनीताल से 10 किमी दूर स्थित है। यह खूबसूरत छोटा उपग्राम (खेरा) समुद्र तल से 1635 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती है। खूबसूरत झील और आसपास के घर और होटल कई बार इस सुंदरता को बढ़ाते हैं। 19 वीं शताब्दी तक खुर्पाट लोहे के औजारों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब यह हरी सब्जियों के लिए प्रसिद्ध है।
तीसरे दिन सबसे पहले नैनीताल झील के किनारे पर स्थित नयना देवी के मंदिर पर देवी दर्शन किया। उसके ठीक बाजू में सिक्ख गुरुद्वारा में मत्था टेका। फिर नैनीताल झील में नाव की सवारी पर एक घंटा बिताता। इस झील में कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई है। जिनमे कटी पतंग फ़िल्म का गाना “जिस गली में तेरा घर न हो बालमा” बहुत प्रसिद्ध है। झील से चारों तरफ़ के गगनचुंबी पर्वत शिखर अत्यंत मनोरम दृश्यावली बनाते हैं। उसके बाद रोपवे से नैनीताल शहर की ऊँची चोटी पर पहुँच कर पूरे शहर को देखा और फ़ोटो खींचे। फिर मॉल रोड पर दो घंटे मटरगश्ती करते रहे। इस प्रकार हमारा अंतिम पड़ाव पूरा हुआ।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “धर्म-कर्म…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २६
कविता – धर्म-कर्म… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
अब न कैन्सिल हो पायेगी
रिटर्न टिकट कन्फर्म है प्यारे
यात्रा का आनन्द उठा लो,
लाइफ का ये मर्म है प्यारे
=2=
दौड़-धूप ऋण गुणा-भाग में
सपने जोड़ – घटाना है
उठा-पटक अप-डाउन तब भी
फ़र्ज़ तेरा सत्कर्म है प्यारे
=3=
इक दिन मिट्टी हो जाना,जीवन का यही तराना है
कभी हवा का शीतल झोंका,कभी जेठ-सा गर्म है प्यारे
=4=
लेखा-जोखा ले सबको,भवसागर पार उतरना है
परहित की पतवार से नैया,खेने में क्या शर्म है प्यारे
=5=
है ज़मीर मूलधन तेरा और क़िरदार तेरी पूँजी
‘राजेश’ मानवता से बढ़कर,नहीं कोई भी धर्म है प्यारे
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६२ ☆
☆ गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆