( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋतु वसंत…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २४
कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
क्या कविता-गीत लिखूँ तुम पर, तुम ख़ुद हो गीत-ग़ज़ल साथी
तुम कली हो तुम ख़ुद तितली हो, तुम ख़ुद हो खिला कमल साथी ll
=2=
इतना है प्रेम प्रगाढ़ मेरा, जीना तुम बिन दुश्वार मेरा
धड़कन कहती दिल भी कहता, तुम बिन हर पल है विकल साथी ll
=3=
अपना सर्वस्व न्यौछावर कर, तुम साथ निभाना सुख-दुःख में
फ़िर देखो सजा-सुसज्जित सा, अपने ख़्वाबों का महल साथी ll
=4=
शर्मो-हया के दल-दल में, देखो मैं दला सा जाता हूँ
बातें मैं न कर पाऊँगा, अब तुम ही करो पहल साथी ll
=5=
हो बहार जीवन में संगी, रहे न शिकवा-गिला कोई
हर लम्हा ख़ुशनुमा सजीला, जीवन जाए सम्हल साथी ll
=6=
जब दौर बुरा आये कोई, तब साथ मेरे रहना ऐसे
ज्यों परछाई रहती है, संग रहना तुम हर पल साथी ll
=7=
मुस्कान चाँदनी जैसी है, स्वर कोई मधुर कोकिला सा
दुनिया में चीज़ हसीं जितनी, लगती है तेरी नकल साथी ll
=8=
तुम हो सतरंगी इन्द्रधनुष, मेरे जीवन नभ-मण्डल पर
हुआ बसेरा मन में जबसे, दिल में मची हलचल साथी ll
=9=
ओझल यूँ न होना नज़र से, बस यही इल्तिज़ा है मेरी
दूर हुई तुम कुछ क्षण को भी, ये दिल न जाए मचल साथी ll
=10=
विकट क्षणों में जीवन के तुम, सदा निभाना साथ मेरा
बनना ऐसा मेरा सहारा, ज्यों ग्रंथों की रहल साथी ll
=11=
ऋतु वसंत आयी मादकमयी, रंग पर्व रंगीला
दिल निश्छल यह प्रेम अटल, यह इश्क़ रहे अव्वल साथी ll
=12=
फाल्गुन मादक मस्त अहा, रंगीला नशीला महीना
महुआ ज्यों मदमत्त होके, सब दूर करें अटकल साथी ll
=13=
जीवन क्यों बदरंग रहे, इस रंग-बिरंगी होली में
‘राजेश’ रंग दूँ गाल तेरे, तू साथ मेरे अब चल साथी ll
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – इस दुनियाँ में…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६० ☆
☆ इस दुनियाँ में… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆
इस दुनियाँ में सबसे सुन्दर अनुपम भारत देश है
अपने में अपना सा प्यारा इसका हर परिवेश है ।।
इस दुनियाँ में…
पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण बिखरा अति सौंदर्य है
वन, मरूथल, पर्वत, नदियों मंदिरों में भी आश्चर्य है
प्राकृत सुषमा, हरे भरे खेतों में अजब मिठास है
हर प्रदेश का खान-पान कुछ भिन्न है, मोहक वेश है || 1 ||
इस दुनियाँ में…
उत्तर, ओड़ीसा, कर्नाटक अलग नृत्य संगीत है
खान पान जीवन पद्धति में सबकी अपनी रीति है
फिर भी सब हैं सरल भारतीय, संस्कृति अनुपम एक सी
गंगोत्री से रामेश्वर तक धार्मिक भाव विशेष है || 2 ||
इस दुनियाँ में…
राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत हर मन की पावन चाह है
प्रगति हिमालय सी संवृद्धि हो जैसे सिन्धु अथाह है
जीवन सबका निर्मल मन पावन हो कर्मठ भावना
भारत का युग युग से “बंधुता’ प्रेम रहा संदेश है ||3||
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख “क्या प्रॉब्लम है…?”। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१२ ☆
☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆
‘क्या प्रॉब्लम है’… जी हां! यह वह शाश्वत् प्रश्न है,जो अक्सर पूछा जाता है छोटों से; बराबर वालों से– परंतु आजकल तो ज़माना बदल गया है। अक्सर हर उम्र के लोग इन प्रश्नों के दायरे में आते हैं और हमारे बुज़ुर्ग माता-पिता तथा अन्य परिवारजन– सभी को स्पष्टीकरण देना पड़ता है। सोचिए! यदि रिश्ते में आपसे बहुत छोटी महिला यह प्रश्न पूछे,तो क्या आप सकते में नहीं आ जाएंगे? क्या होगी आपकी मन:स्थिति… जिसकी अपेक्षा आप उससे कर ही नहीं सकते। वह अनकही दास्तान आपकी तब समझ में तुरंत आ जाती है,जब चंद लम्हों बाद आपका अहं/ अस्तित्व पलभर में कांच के आईने की भांति चकनाचूर हो जाता है और उसके असंख्य टुकड़े आपको मुंह चिढ़ाते-से नज़र आते हैं। दूसरे शब्दों में आपको हक़ीक़त समझ में आ जाती है और आप तत्क्षण अचंभित रह जाते हैं यह जानकर कि कितनी कड़वाहट भरी हुई है सोमा के मन में– जब आपको मुजरिम की भांति कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और इल्ज़ामों की एक लंबी फेहरिस्त आपके हाथों में थमा दी जाती है। वह सोमा,जो आपको मान-सम्मान देती थी; सदैव आपकी तारीफ़ करती थी; जिसने इतने वर्ष एक छत के नीचे गुज़ारने के पश्चात् भी पलट कर कभी जवाब नहीं दिया था। वह तो सदैव परमात्मा का शुक्र अदा करती थी कि उसने उन्हें पुत्रवधु नहीं,बड़ी शालीन बेटी दी थी। परंतु जब विश्वास टूटता है; रिश्ते सहसा दरक़ते हैं तो बहुत तकलीफ़ होती है। हृदय कुलबुला उठता है,जैसे अनगिनत कीड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हों और वह प्रश्नों के भंवर से चाह कर भी ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाती।
‘आपको क्या प्रॉब्लम है?’ यदि बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ एकांत में समय गुज़ारना चाहते हैं; खाने के लिए नीचे नहीं आते तो…परंतु हम सबके लिए यह बंधन क्यों? वह वर्षों से अपने कौन-से दायित्व का वहन नहीं कर रही? आपके मेहमानों के आने पर क्या वह उनकी आवभगत में वह कमी रखती है,जबकि वे कितने-कितने दिन तक यहाँ डेरा डाले रहते हैं? क्या उसने कभी आपका तिरस्कार किया है? आखिर आप लोग चाहते क्या हैं? क्या वह इस घर से चली जाए अपने बच्चों को लेकर और आपका बेटा वह सब अनचाहा करता रहे? हैरान हूं यह देखकर कि उसे दूध का धुला समझ उसके बारे में अब भी अनेक कसीदे गढ़े जाते हैं।
वह अपराधिनी-सम करबद्ध प्रार्थना करती रही थी कि उसने ग़लती की है और वह मुजरिम है,क्योंकि उसने बच्चों को खाने के लिए नीचे आने को कहा है। वह सौगंध लेती है कि भविष्य में वह उसके बच्चों से न कोई संबंध रखेगी; न ही किसी से कोई अपेक्षा रखेगी। तुम मस्त रहो अपनी दुनिया में… तुम्हारा घर है। हमारा क्या है,चंद दिन के मेहमान हैं। वह क्षमा-याचना कर रही थी और सोमा एक पुलिस अफसर की भांति उस पर प्रश्नों की बौछार कर रही थी।
जब जिह्वा साथ नहीं देती,वाणी मूक हो जाती है तो अजस्र आंसुओं का सैलाब बह निकलता है और इंसान किंकर्त्तव्य- विमूढ़ स्थिति में कोई भी निर्णय नहीं ले पाता। उस स्थिति में उसके मन में केवल एक ही इच्छा होती है कि ‘आ! बसा लें अपना अलग आशियां… जहां स्वतंत्रता हो; मानसिक प्रदूषण न हो; ‘क्या और क्यों’ के प्रश्न उन पर न दाग़े जाएं और वे उन्मुक्त भाव से सुक़ून से अपनी ज़िंदगी बसर कर सकें। इन परिस्थितियों में इंसान सीधा आकाश से अर्श से फ़र्श पर आन पड़ता है; जब उसे मालूम होता है कि इस करिश्में की सूत्रधार हैं कामवाली बाईएं–जो बहुत चतुर, चालाक व चालबाज़ होती हैं। वे मालिक-मालकिन को बख़ूबी रिझाना जानती हैं और बच्चों को वे मीठी-मीठी बातों से खूब बहलाती हैं। परंतु घर के बुज़ुर्गों व अन्य लोगों से लट्ठमार अंदाज़ से बात करती हैं,जैसे वे मुजरिम हों। इस संदर्भ में दो प्रश्न उठते हैं मन में कि वे उन्हें घर से निकालना चाहती हैं या घर की मालकिन उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहती है? छुरी हमेशा खरबूज़े पर ही पड़ती है,चाहे किसी ओर से पड़े और बलि का बकरा भी सदैव घर के बुज़ुर्गों को ही बनना पड़ता है।
वैसे आजकल तो बाईएं ऐसे घरों में काम करने को तैयार भी नहीं होती,जहां परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य लोग भी रहते हों। परिवार की परिभाषा वे अच्छी तरह से जानती हैं… हम दो और हमारे दो,क्योंकि आजकल पति-पत्नी दोनों अक्सर नौकरी करते हैं। उनके घर से जाने के पश्चात् वे दिनभर अलग-अलग पोशाकों में सज-संवर कर स्वयं को आईने में निहारती हैं। यदि बच्चे छोटे हों, तो सोने पर सुहागा… उन्हें डाँट-डपट कर या नशीली दवा देकर सुला दिया जाता है और वे स्वतंत्र होती हैं मनचाहा करने के लिए। फिर वे क्यों चाहेंगी कि कोई कबाब में हड्डी बन कर वहां रहे और उनकी दिनचर्या में हस्तक्षेप करे? इस प्रकार उनकी आज़ादी में खलल पड़ता है। इसलिए भी वे बड़े बुज़ुर्गों से खफ़ा रहती हैं। इतना ही नहीं,वे उनसे दुर्व्यवहार भी करती हैं,जैसे मालिक नौकर के साथ करता है। जब उन्हें इससे भी उन्हें संतोष नहीं होता; वे अकारण इल्ज़ाम लगाकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर देती है और घर की मालकिन को तो हर कीमत पर उनकी दरक़ार रहती है,क्योंकि बाई के न रहने पर घर में मातम-सा पसर जाता है। उस दारुण स्थिति में घर की मालकिन भूखी शेरनी की भांति घर के बुज़ुर्गों पर झपट पड़ती है,जो अपनी अस्मत को ताक़ पर रख कर वहां रहते हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबीपन का एहसास उन्हें नासूर-सम हर पल सालता रहता है। उस घर का हर प्राणी नदी के द्वीप की भांति अपना-अपना जीवन ढोता है। वे अपने आत्मजों के साथ नदी के दो किनारों की भांति कभी मिल नहीं सकते। वे उनकी जली-कटी सहन करने को बाध्य होते हैं और सब कुछ देखकर आंखें मूँदना उनकी नियति बन जाती है। वे हर पल व्यंग्य-बाणों के प्रहार सहते हुए अपने दिन काटने को विवश होते हैं। उनकी यातना अंतहीन होती है,क्योंकि वहाँ पसरा सन्नाटा उनके अंतर्मन को झिंझोड़ता व कचोटता है। दिनभर उनसे बतियाने वाला कोई नहीं होता। वे बंद दरवाज़े व शून्य छतों को निहारते रहते हैं। बच्चे भी उन अभागों की ओर रुख नहीं करते और वे अपने माता-पिता से अधिक स्नेह नैनी व कामवाली बाई से करते हैं।
‘हाँ! प्रॉब्लम क्या है’ ये शब्द बार-बार उनके मनोमस्तिष्क पर हथौड़े की भांति का प्रहार करते हैं और वे हर पल स्वयं को अपराधी की भांति दयनीय दशा में पाते हैं। परंतु वे आजीवन इस तथ्य से अवगत नहीं हो पाते कि उन्हें किस जुर्म की सज़ा दी जा रही है? उनकी दशा तो उस नारी की भांति होती है,जिसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है; जो उसने किया ही नहीं। उन्हें तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान ही नहीं किया जाता। कई बार ‘क्यों का मतलब’ शब्द उन्हें हांट करते हैं अर्थात् बाई का ऐसा उत्तर देना…क्या कहेंगे आप? सो! उनकी मन:स्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। सो! चिंतन-मनन कीजिए कि आगामी पीढ़ी का भविष्य क्या होगा?
वैसे इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है,क्योंकि जैसा वह करता है,वही लौटकर उसके पास आता है। लोग चिंतित रहते हैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में और यह सोचकर वे हैरान-परेशान रहते हैं। आइए! यह समझने का प्रयास करें कि प्रॉब्लम क्या है और क्यों है? शायद! प्रॉब्लम आप स्वयं हैं और आपके लिए उस स्थान को त्याग देना ही उस भीषण समस्या का समाधान है। सो! मोह-ममता को त्याग कर अपनी राह पर चल दीजिए और उनके सुक़ून में ख़लल मत डालिए। ‘जीओ और जीने दो’, की अवधारणा पर विश्वास रखते हुए दूसरों को भी अमनोचैन की ज़िंदगी बसर करने का अवसर प्रदान कीजिए। उस स्थिति में आप निश्चिंत होकर जी सकेंगे और ‘क्या-क्यों’ की चिंता स्वत: समाप्त हो जाएगी। फलत: इस दिशा में न चिंता होगी; न ही चिंतन की आवश्यकता होगी।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीत – नेह-डोर…।
रचना संसार # ८४ – गीत – नेह-डोर… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – फागुन।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – मीरा पर कुछ दोहे… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘गोपी संग रास रंग…‘।)
☆ शशि साहित्य # १५ ☆
कविता – गोपी संग रास रंग… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०२ ☆
आलेख – डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।
उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे, सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।
उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद “मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना” आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति “विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा” विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है।
उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है “प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है” जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।
डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है ।
पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।
उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।
धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।
एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला, रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था।
पुष्पा जी ने लिखा है, “मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं – महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है…
तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८४ – व्यंग्य – डाइट कंट्रोल और समोसे का सम्मोहन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
मनुष्य के जीवन में ‘संकल्प’ और ‘समोसे’ का वही रिश्ता है जो चूहे और बिल्ली का होता है। आप कितनी भी बड़ी ‘डाइट कंट्रोल’ की दीवार खड़ी कर लें, एक गरम समोसा उस दीवार के नीचे से ‘सुरंग’ बनाकर आपके आत्मबल को धराशायी कर देता है। हमारे मित्र ‘गजाधर बाबू’ ने जब से डॉक्टर की यह बात सुनी कि उनका शरीर अब ‘इंसानी शरीर’ कम और ‘फैट का गोदाम’ ज्यादा लग रहा है, उन्होंने ‘डाइट’ का भीषण व्रत ले लिया।
गजाधर बाबू ने घोषणा कर दी कि अब वे केवल ‘घास-फूस’ यानी सलाद पर जीवित रहेंगे। उनके डाइनिंग टेबल पर अब खीरे, ककड़ी और उबली हुई लौकी का साम्राज्य था। वे इन चीजों को ऐसे देखते थे जैसे कोई मुजरिम अपनी हथकड़ियों को देखता है। श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहें तो, गजाधर बाबू का यह त्याग वैसा ही था जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी रिटायरमेंट के बाद ‘सत्य और अहिंसा’ पर प्रवचन देने लगे।
लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। एक शाम गजाधर बाबू दफ्तर से लौट रहे थे। रास्ते में ‘मुन्ना हलवाई’ की दुकान थी। मुन्ना हलवाई के यहाँ समोसे तलने की क्रिया किसी ‘यज्ञ’ से कम नहीं होती। कड़ाही में खौलता हुआ तेल, और उसमें गोते खाते हुए सुडौल समोसे—जैसे स्वर्ग की अप्सराएँ अमृत कुंड में स्नान कर रही हों।
समोसे की वह सोंधी खुशबू जब गजाधर बाबू की नासिकाओं से टकराई, तो उनके ‘डाइट संकल्प’ के फेफड़े फूलने लगे। उनका मन चिल्लाया— “भाग गजाधर, ये मायाजाल है!” पर उनका पेट पलटकर बोला— “अबे रुक! देख तो सही, आलू का वो श्रृंगार, मसालों की वो जुगलबंदी!”
गजाधर बाबू दुकान के सामने ऐसे ठिठक कर खड़े हो गए जैसे कोई सन्यासी अपनी पुरानी प्रेमिका को देख ले। उन्होंने सोचा, “एक समोसे से क्या होगा? न्यूटन ने भी तो कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, तो एक समोसे की प्रतिक्रिया में मैं कल दो किलोमीटर ज्यादा चल लूँगा।” यह वह तर्क है जो दुनिया का हर डाइट करने वाला इंसान खुद को ‘बेवकूफ’ बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।
वे दुकान के करीब पहुँचे। समोसा एकदम गरम था, उसकी पपड़ी ऐसी कुरकुरी कि छूने मात्र से ‘साहित्यिक संगीत’ पैदा हो। गजाधर बाबू ने समोसे को हाथ में लिया। वह उनके हाथ में ऐसे थिरक रहा था जैसे कोई नवजात शिशु। उन्होंने उसे चटनी में डुबोया—हरी चटनी यानी तीखा प्रहार और लाल चटनी यानी मीठा धोखा।
जैसे ही उन्होंने पहला निवाला लिया, उन्हें लगा कि उनके भीतर की ‘कैलोरी’ पुलिस ने हड़ताल कर दी है और ‘कोलेस्ट्रॉल’ के गुंडे जश्न मनाने लगे हैं। स्वाद ऐसा कि उन्हें लगा जैसे मोक्ष का द्वार उनके तालू में खुल गया है।
गजाधर बाबू अभी दूसरे समोसे पर हाथ साफ़ कर ही रहे थे कि अचानक उनके पीछे एक परिचित आवाज़ गूँजी— “अरे गजाधर भाई! ये क्या? आप तो कह रहे थे कि अब आप केवल उबला हुआ पानी और हवा खाकर जिएंगे?”
पीछे उनके डॉक्टर खड़े थे, जो खुद हाथ में ‘जलेबी’ का दोना थामे हुए थे। गजाधर बाबू का समोसा उनके हाथ में ही जम गया। वे हड़बड़ाए, पर हार मानने वाले कहाँ थे।
गजाधर बाबू ने बड़ी गंभीरता से कहा, “अरे डॉक्टर साहब, आप गलत समझ रहे हैं। दरअसल मैं तो इस समोसे का ‘पोस्टमार्टम’ कर रहा था। मैं देख रहा था कि मुन्ना हलवाई इसमें कितना ‘हानिकारक’ फैट डालता है, ताकि मैं कल सुबह ग्रुप में सबको इसके नुकसान बता सकूँ। और आप? आप ये जलेबी क्यों ले रहे हैं?”
डॉक्टर साहब ने भी बिना पलक झपकाए जवाब दिया, “मैं? मैं तो इस जलेबी की ‘कुंडली’ चेक कर रहा था कि आखिर ये इतनी टेढ़ी क्यों होती है! विज्ञान के लिए बलिदान देना पड़ता है गजाधर बाबू!” अब दोनों ‘विज्ञानी’ एक-दूसरे की चोरी पर हाथ मिला चुके थे और मुन्ना हलवाई सोच रहा था कि अगर ये दोनों वैज्ञानिक हैं, तो फिर ‘पागल’ कौन है!