☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव एवं सुश्री प्रतिमा अखिलेश को मिलेगा डॉ. सुमित्र स्मृति सम्मान — अभिनंदन ☆ साभार – श्री राजेश पाठक प्रवीण ☆
जबलपुर। पाथेय साहित्य कला अकादमी द्वारा 25 अक्टूबर 2025 को अपरान्ह 3 बजे से आयोजित डॉ. राजकुमार सुमित्र स्मृति संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव को डॉ० सुमित्र स्मृति सृजन सम्मान एवं प्रतिष्ठित कवयित्री, कथाकार प्रतिमा अखिलेश को डॉ. सुमित्र काव्य सम्मान से अलंकृत किया जायेगा, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में क्रियाशील 21 संस्थाओं को
संस्थाश्री अलंकरण से सम्मानित किया जाएगा।तदाशय की जानकारी पाथेय साहित्य कला अकादमी द्वारा आयोजित पत्रकार वार्ता में अकादमी के महासचिव राजेश पाठक प्रवीण, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. तनूजा चौधरी ने दी।
राजेश पाठक प्रवीण ने पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए बताया कि डॉक्टर सुमित्र साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि थे, उन्होंने 35 से अधिक साहित्यिक कृतियों का सृजन किया है, उनकी स्मृति में सम्मानित होने वाले वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव का सृजन सामाजिक चेतना का सृजन है उन्होंने अनेक कृतियों की रचना की है।उनकी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियां के उन्मूलन का संदेश है।
श्री प्रतुल श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं । हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम हिंदी भाषी क्षेत्रों में जाना पहचाना है । इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया । साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी । आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं । नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया । प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया । आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं ।
प्रकाशित पुस्तकें- यादों का मायाजाल, अलसेट (हास्य-व्यंग्य), आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य), तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य), मौन, व्यक्तित्व दर्शन
सुश्री प्रतिमा अखिलेश
सुश्री प्रतिमा अखिलेश ने कम उम्र में अपनी अनेक कृतियों के माध्यम से धर्म,अध्यात्म और समसामयिक परिस्थितियों को चित्रित किया है।
विधा— गीत, कहानी
प्रकाशित कृति–सुनो प्रियंवद, (गीत संग्रह), रुद्रदेहा साझा (पति के साथ), रघुनंदिनी- उपन्यास
डॉक्टर तनूजा चौधरी एवं ज्योति मिश्रा ने डॉक्टर सुमित्र के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डालते हुए आज 25 अक्टूबर को आयोजित समारोह में साहित्य अनुरागियों से उपस्थिति का आग्रह किया। पत्रकार वार्ता में अकादमी से डॉ. हर्ष कुमार तिवारी, यशोवर्धन पाठक,ज्योति मिश्रा, विजय जायसवाल भी उपस्थित थे ।
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साभार –श्री राजेश पाठक प्रवीण, महासचिव, पाथेय साहित्य कला अकादमी
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ कला, साहित्य और संस्कृति के लिए समर्पित व्यक्तित्व – स्व गिरीश बिल्लौरे मुकुल — विनम्र श्रद्धांजलि ☆ प्रस्तुति – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
प्रति दिन जब सूर्य अस्त होता है तो अगले दिन उसके पुनः सूर्योदय की आशा रहती है कि सूर्य उदय होगा और जग को प्रकाशवान करेगा लेकिन जब कोई सूर्य अस्त हो जाये और पुनः उसके उदय होने की आशा न हो तब इसे अपूर्णीय क्षति ही कहा जाएगा। पिछले दिनों संस्कारधानी के साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जगत का ऐसा ही सूर्य अस्त हो गया। साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्थाओं की विकास शील गतिविधियों के लिए समर्पित और सक्रिय आत्मीय भाई श्री गिरीश बिल्लौरे मुकुल जी के स्वर्गवास पर हम सभी ने कुछ ऐसा ही महसूस किया।
भाई श्री गिरीश बिल्लौरे जी ने बाल भवन के एक उच्च स्तरीय अधिकारी के रुप में कुशल और सफल संचालन किया और अपने सेवा काल के दौरान बच्चों को संस्कार वान बनाने के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अनेक प्रेरक प्रयत्न और प्रभावी प्रयोग किए। उनकी सोच थी कि बच्चों के उत्थान के लिए मानसिक और शारीरिक विकास के साथ बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास भी जरूरी है। यही कारण है कि उन्होंने बाल भवन के सुधार और विकास के लिए जो कोशिशें की उसने उनको बाल विकास के क्षेत्र में एक सशक्त अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
वैसे तो श्री गिरीश बिल्लौरे जी मेरे एक ऐसे आत्मीय मित्र थे जिनके बौद्धिक और सारगर्भित लेखन से मैं अत्यधिक प्रभावित था। ज्वलंत मुद्दों पर उनके लेखन से उनकी गहरी सोच का पता चलता था। वैचारिक दृष्टिकोण पर आधारित उनके लेख उनके चिंतन का परिचायक थे। श्री बिल्लौरे जी ने गद्य हो या पद्य , दोनों ही में काफी लिखा और अच्छा लिखा। शहर की और बाहर की पत्र पत्रिकाओं में खूब छपे भी। उनके लेखन का एक बड़ा पाठक वर्ग था जो उनके साहित्य को उत्सुकता से पढ़ता था और पसंद भी करता था। उस पाठक वर्ग में रचनाओं का मैं भी एक ऐसा पाठक था जो उत्साह और उत्सुकता से उनके गद्य और पद्य दोनों ही को काफी ध्यान से पढ़ता और अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत भी कराता। कभी मैं उनकी रचनाओं को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया उन्हें न दे पाऊं तो बराबर उनकी ओर से मुझे उलाहना भी मिलता। वे कहते आत्मीयता के कारण इतना तो अधिकार मेरा है। उनके बौद्धिकता के कारण मैं उन्हें अक्सर विद्वान मित्र कहकर संबोधित करता और गिरीश भाई मुझे आत्मीय मित्र। विद्वान मित्र इसलिए क्योंकि उनके लेखन में मुझे उनका रिसर्च वर्क नज़र आता। उदाहरण के लिए मस्तिष्क में घटनाओं का पुरुत्पाद विषय नामक लेख में वे लिखते हैं कि इन्द्रियों के माध्यम से हम सूचनाओं को एकत्र करते हैं और वह सूचना हमारे स्मृति कोष में संचित हो जाती है। अर्थात हमारे मस्तिष्क में केवल वही बात जमा होती हैं जिसे हम गंध , ध्वनि, आवाज,स्वाद , दृश्य, भाव के रुप में महसूस करते हैं।
स्पष्टवादिता बिल्लौरे जी की जीवन शैली की विशेषता थी। प्रशासनिक क्षेत्र हो या अन्य क्षेत्र , बिल्लौरे जी बिना लाग लपेट के साफ़ साफ़ कहने के आदी थे। अभिनंदन आयोजनों से दूर रहने वाले बिल्लौरे जी की सोच थी कि किसी भी क्षेत्र में समर्पित भाव से कार्य करने वालों की सम्मान की अपेक्षा नहीं रहनी चाहिए। सम्मान की आशा आगे बढ़ने के प्रयासों पर विराम लगा दिया करती है। भाई श्री गिरीश बिल्लौरे मुकुल जी के साथ मेरी ही नहीं बल्कि उनके न जाने कितने आत्मीय जनों की स्नेहिल यादें जुड़ी हुईं हैं और ये यादें हमारे दिल और दिमाग में सदा उनके अपने आसपास होने का अहसास दिलाती रहेंगी।
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प्रस्तुति – श्री यशोवर्धन पाठक
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ कला, साहित्य और संस्कृति की शाश्वत शक्ति का उत्सव — “भाषा एंड बियॉन्ड 3.0” ☆ प्रस्तुति – साभार – सुश्री नीलम सक्सेना ☆
पुणे, यशदा परिसर:
लिटरेरी वॉरियर ग्रुप (LWG) द्वारा आयोजित बहुप्रतीक्षित साहित्यिक महोत्सव “भाषा एंड बियॉन्ड 3.0” का भव्य आयोजन महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में हुआ। यह दो दिवसीय उत्सव कला, साहित्य और संस्कृति की शाश्वत शक्ति का अद्भुत संगम रहा।
लिटरेरी वॉरियर ग्रुप (LWG) की स्थापना वर्ष 2011 में इस उद्देश्य से की गई थी कि रचनात्मकता की लौ को जीवित रखा जाए और लेखकों, कवियों, कथाकारों व कलाकारों को एक साझा मंच प्रदान किया जा सके। संख्या से अधिक गुणवत्ता पर ध्यान देने वाले इस समूह ने समय के साथ देश-विदेश की सीमाएँ पार कीं और आज यह 2,96,000 से अधिक सक्रिय सदस्यों का सशक्त परिवार बन चुका है।
लखनऊ, दिल्ली, मुंबई और पिछले वर्ष CME, पुणे में सफल आयोजनों के बाद, इस वर्ष भाषा एंड बियॉन्ड 3.0 का आयोजन यशदा, पुणे में किया गया।
उद्घाटन समारोह
उद्घाटन सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे —
श्री निरंजन कुमार सुधांशु, डीजी, यशदा
डॉ. सुजाता जाधव, हेड – लाइब्रेरीज़ एवं डॉक्यूमेंटेशन सेंटर, NCPA
साहित्य और रेडियो जगत के सुप्रसिद्ध रचनाकार सुनील देवधर
पहले दिन के मुख्य आकर्षण
पहले दिन का प्रमुख आकर्षण रहा वरिष्ठ अभिनेता व निर्देशक अमोल पालेकर एवं संध्या गोखले द्वारा उनकी चर्चित पुस्तक “Viewfinder” पर संवाद सत्र, जिसकी सूत्रधार थीं लेखिका नीलम सक्सेना। इस संवाद में अमोल पालेकर जी ने अपने जीवन के अनछुए प्रसंगों, कला और सिनेमा पर अपने गहन विचार साझा किए। यह कार्यक्रम पेज टू स्टेज, NCPA, मुंबई और लिटरेरी वारियर ग्रुप का संयुक्त आयोजन था। NCPA, मुंबई का यह सहयोग श्री एनसीपीए के अध्यक्ष – ख़ुशरू सुंतूक के सौजन्य से संभव हुआ। NCPA की तरफ से डॉ सुजाता जाधव, कोऑर्डिनेटर “पेज टू स्टेज” मौजूद थीं|
पहले दिन “पठन से सृजनशीलता का विकास” विषय पर एक पैनल चर्चा भी आयोजित की गई। इस चर्चा में डॉ. पद्मजा अय्यंगर-पैडी, हेमा रवि, मधुमिता भट्टाचार्य और ऊर्णा बोस पैनलिस्ट के रूप में शामिल थीं। इस सत्र का संचालन डॉ. कोयल विश्वास ने किया।
पहले दिन पुस्तकों का लोकार्पण हुआ जिसमें LWG के तत्वावधान में द्विभाषीय कविता संग्रह , “कच्चे धागे- strings of connections “ मुख्य थी। इसकी क्यूरेटर स्वयं नीलम चंद्रा एवं संपादक डॉ रेणु मिश्रा एवं आशा सिंह गौड़ थीं।
LWG Anthology – कच्चे धागे – Strings of Connection के अलावा निम्नलिखित पुस्तकों का लोकार्पण हुआ तथा उनके लेखकों से बातचीत भी हुई ।
नीलम सक्सेना- मेरी आँखों का महताब
डॉ रेणु मिश्रा- अनामिका
डॉ अपर्णा प्रधान- निर्झर मन
आशा सिंह गौड़ – Fifteen Days and Seven Stories
कोयल बिस्वास- बादलों के पीछे एक घर है
निशा मोटघरे – Momentum
विनीत कुमार – Mayan Routes Indian Roots
इस कार्यक्रम के अतिथि के रूप में डॉ सुजाता जाधव, संजय चंद्रा और डॉ रेणु मिश्रा थे|
सृजनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु आयोजित कार्यशालाओं में —
हाइकू लेखन कार्यशाला का संचालन श्रीनिवास राव ने किया।
“शब्द साधना” कार्यशाला का संचालन हेमंत देओलेकर ने किया, जिसमें प्रतिभागियों ने अभिव्यक्ति के नए आयामों की खोज की।
“आमना” संस्था की अर्पणा राव ने प्रतिभागियों को नृत्य की बारीकियाँ सिखाईं। शाम के सांस्कृतिक सत्र में अपर्णा राव और नंदिता जी की मनमोहक कथक प्रस्तुति तथा प्रोजेक्ट कलाकृति के ओजस द्वारा प्रस्तुत ऊर्जावान ड्रम बीट्स ने समूचे सभागार में ऊर्जा भर दी।
दूसरे दिन का साहित्यिक रंग
दूसरे दिन अनेक पुस्तकों का लोकार्पण हुआ, जिनमें विशेष आकर्षण रही “Curry for the Spirited Soul” — एक कहानी-संग्रह, जिसे नीलम सक्सेना जी क्यूरेटर थीं और नित्या शुक्ला और डॉ. मैत्रेयी जोशी ने संपादित किया था।
इसके साथ ही अन्य पुस्तकों का भी विमोचन हुआ —
बेरंग-सी दुआएँ – अर्चना जैन
Luminara – Poetry that touches the Soul – बिंदु उन्नीकृष्णन
The Last Wish – जसबीर बसु
Midnight Ponders – मरिया हुसैन
सिने गीतों का रसास्वादन और अलंकारिक भाषिक व्यंजना – प्रो. निर्मला राजपूत
A Pocket Full of Limericks – Waheeda Hussain
Avisha and the Kaalkoot Assassins – सिद्धार्थ सुजिर
इस कार्यक्रम के अतिथि के रूप में माया जाजू महेश्वरी, प्रिंसिपल चीफ इनकम टैक्स कमिश्नर, मुंबई, दिलीप महापात्रा, सुरेख साहू और डॉ अपर्णा प्रधान थे|
संवाद और चिंतन
‘दृष्टिकोण’ नामक विचारोत्तेजक सत्र का संचालन कर्नल सलिल जैन ने किया, जिसमें वक्ता रहे नीलम सक्सेना जी, हेमंत देओलेकर जी और यशदा के राहुल माहिवाल जी। इस सत्र में वक्ताओं ने कविता और कर्मक्षेत्र में अपनी भूमिका पर गहन विचार साझा किए। नीलम जी ने कहा, “हम जो भी कार्य करते हैं, वह एक भूमिका का निर्वहन है, परंतु जो दिल से करते हैं वही हमारी असली पहचान बनता है।”
पुणे की आवाज़- ख़ास आवाज़
इस कार्यक्रम के संचालक पुणे के जाने माने साहित्यकार डॉ सुनील देवधर जी थे। इसमें शायर मैडी क्रिस्टी एवं कवियत्री स्वरांगी साने जी ने अपनी कविताओं से समाँ बाँधा। इस कार्यक्रम की संयोजक डॉ रेणु मिश्रा थीं।
सांस्कृतिक संध्या और पुरस्कार समारोह
LWG सदस्यों की प्रस्तुतियों ने शाम को यादगार बना दिया — मनमोहक नृत्य, विचारोत्तेजक नाटक और संगीत की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का समापन ‘आरंभ’ नामक पुरस्कार समारोह से हुआ — जो केवल समापन नहीं बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत थी। इस अवसर पर ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे
राजेश वर्मा (डीआरएम), सुरभि अल्पेश (रिडन एरे की संस्थापक) व एडीजी यशदा, शेखर गायकवाड़ जी।
साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए विनीता शर्मा जी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
आभार और समापन
कार्यक्रम की सह-संस्थापक रेणु जी ने अपनी पूरी टीम को शानदार आयोजन के लिए बधाई दी।
मुख्य सहयोगियों — डॉ. अपर्णा प्रधान, लेफ्टिनेंट कर्नल सलिल जैन, सुनील जोशी, जूही गुप्ते, और नित्या शुक्ला, तथा सोशल मीडिया टीम के योगदान का विशेष उल्लेख किया गया।
LWG परिवार ने NCPA के प्रति विशेष आभार प्रकट किया, जिन्होंने कई उल्लेखनीय आयोजनों में सहयोगी बनकर साहित्यिक यात्रा को और समृद्ध बनाया।
डिज़ाइन मीडिया (Photography Partner) प्रोग्राम के फोटोग्राफी पार्टनर थे|
LWG की संस्थापक नीलम जी कहा कि “साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने के हमारे दृष्टिकोण को साकार करने में इन सभी सहयोगियों की भागीदारी ने अहम भूमिका निभाई है। हम सभी के समर्थन और विश्वास के लिए हृदय से आभारी हैं।”
भाषा एंड बियॉन्ड 3.0 ने न केवल साहित्यिक संवाद को नई दिशा दी, बल्कि कला, संगीत और शब्दों की सुंदरता को एक ही मंच पर समेट लिया — सच्चे अर्थों में यह कला, साहित्य और संस्कृति का उत्सव था।
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साभार – सुश्री नीलम सक्सेना
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
काही अपरिहार्य कारणामुळे मंगळवार दि. ७ ऑक्टोबर ‘२५ ते मंगळवार दि. १४ ऑक्टोबर ‘२५ असे सलग आठ दिवस ई-अभिव्यक्तीचा दैनिक अंक प्रकाशित केला जाणार नाही. कृपया सर्वांनी याची नोंद घ्यावी. आपणा सर्वांचे सहकार्य अपेक्षित आहे.
बुधवार दि. १५ ऑक्टोबर ‘२५ पासून अंक परत नियमित प्रकाशित होईल.
– संपादक मंडळ
ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
नक्षत्रांचं देणं या काव्य मंचाने राज्यस्तरीय श्रावणी काव्यलेखन स्पर्धा आयोजित केली होती. या स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती दीप्ती कुलकर्णी यांच्या ‘येता श्रावण‘ या कवितेस प्रथम क्रमांक प्राप्त झाला आहे. त्यांच्या या उज्वल यशाबद्दल ई अभिव्यक्ती परिवारातर्फे त्यांचे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा !
आज त्यांची कविता “येता श्रावण…“, ‘कवितेचा उत्सव‘ या सदरात देत आहोत.
☆ हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों की डायरेक्टरी में ई-अभिव्यक्ती का चयन एवं अन्य विशिष्ट उपलब्धियां ☆ हेमन्त बावनकर ☆
प्रिय मित्रो,
सर्वप्रथम ई-अभिव्यक्ति के सभी एवं प्रबुद्ध लेखकगण तथा पाठकगण के आत्मीय स्नेह के लिए हृदय से आभार।
इस वर्ष अक्तूबर २०२५ में आपकी प्रिय वैबसाइट के सफल ७ वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं एवं १५ अगस्त २०२५ को ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ने अपने सफल ५ वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।
सितम्बर माह हम सब के लिए कई विशिष्ट उपलब्धियां ले कर आया है। मुझे इन उपलब्धियों को आपसे साझा करने में अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
यह आप सभी के सतत प्रयासों एवं प्रबुद्ध लेखकगण एवं पाठकगण के आत्मीय स्नेह का ही परिणाम है कि आपकी प्रिय वेबसाइट को हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों की डायरेक्टरी के 15वे संस्करण में सम्मिलित किया गया है। इस Hindi Blog List में 80 ब्लॉग हैं।
ई-अभिव्यक्ति (हिंदी) के संपादक एवं भोपाल के साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी को उनके बहुमूल्य साहित्यिक योगदान के लिए निर्मला साहित्य रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया।
ई-अभिव्यक्ति (मराठी) की संपादिका सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे जी को स्टेट बँक पेन्शनर्स असोसिएशन, मुंबई सर्कल (महाराष्ट्र व गोवा) द्वारा आयोजित लेख स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। सरल काव्यांजलि साहित्यिक संस्था, उज्जैन,(म.प्र.) द्वारा राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मृति साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया।
इन पंक्तियों के लिखे जाते तक 30,330+ रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं एवं से अधिक विजिटर्स आपकी प्रिय वैबसाइट https://www.e-abhivyakti.com पर विजिट कर चुके हैं।
इन सभी उपलब्धियों से ई-अभिव्यक्ति परिवार गौरवान्वित अनुभव करता है। आप सभी का यह अपूर्व आत्मीय स्नेह एवं प्रतिसाद इसी प्रकार हमें मिलता रहेगा।
आपसे सस्नेह विनम्र अनुरोध है कि आप ई-अभिव्यक्ति में प्रकाशित साहित्य को आत्मसात करें एवं अपने मित्रों से सोशल मीडिया पर साझा करें।
आपके विचारों एवं सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।
एक बार पुनः आप सभी का हृदय से आभार ।
सस्नेह
हेमन्त बावनकर
पुणे (महाराष्ट्र)
19 सितम्बर २०२५
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(आपके आत्मीय स्नेहनुसार अंतिम तिथि ०५ अक्कोटूबर २०२५ शाम 7 बजे तक)
भारत में दीपावली नए पंचांग, घर बाहर साफ सफाई, भांति-भांति के व्यंजन, रंगोली, उत्सव के लिए जानी जाती है। परिवारजन इस अवसर पर देश-विदेश से घर आते हैं।
भारतवर्ष के साहित्य जगत में विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं दीपावली विशेषांक प्रकाशित करते हैं।
ई-अभिव्यक्ति मे हम पिछली तीन दीपावली पर विशेषांक प्रकाशित कर चुके हैं, जिनकी चर्चा वैश्विक स्तर पर हुई।
आपके आत्मीय स्नेह से ई-अभिव्यक्ति भारत के ८० श्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग में से एक है। साथ ही ई-अभिव्यक्ति को ‘फ्लिपबुक’ प्रारूप में भारत का पहला और एकमात्र दीपावली विशेषांक प्रकाशित करने का गौरव भी प्राप्त है।
आप विगत तीन दीपावली विशेषांकों को निम्न चित्रों पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।
प्रत्येक साहित्यकार का स्वप्न होता है कि उनका सर्वश्रेष्ठ साहित्य, दीपावली विशेषांक में प्रकाशित हो और प्रबुद्ध पाठक भी दिवाली के अंक का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
सुधि पाठक दीपावली अंक संदर्भ के लिए संजो कर रखते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ई-अभिव्यक्ति ने इस वर्ष भी ऐसे ही स्तरीय दीपावली विशेषांक के प्रकाशन का निर्णय लिया है।
साहित्यकारों से अनुरोध है कि वे अपनी सर्वश्रेष्ठ अप्रकाशित रचनाएं इस विशेषांक हेतु प्रेषित कर इस साहित्यिक कार्य को सफल बनाने में सहयोग प्रदान करें:
साहित्यिक सामग्री भेजते समय कृपया निम्नलिखित नियमों को ध्यान में रखें:
दिवाली अंक ई-बुक फॉर्मेट में प्रकाशित किया जाएगा।
किसी एक साहित्यिक विधा की केवल एक रचना भेजी जाये ताकि अधिक से अधिक साहित्यकारों को अवसर दिया जा सके।
साहित्यिक विधाओं में कथा-कहानी, कविता, व्यंग्य, लघुकथा, ललित लेख, प्रहसन, संस्मरण, साहित्यिक समीक्षा स्वीकार की जावेगी।
कविता में अधिकतम 20 पंक्तियां होनी चाहिए। अन्य सभी साहित्यिक विधाओं में साहित्य अधिकतम 1000 शब्दों तक होना चाहिए। सभी सामग्री फॉण्ट व वर्ड फॉर्मेट में श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के व्हाट्स एप्प 7000375798 पर अथवा ईमेल shrivivekranjan@gmail.com पर प्रेषित कीजिये। सब्जेक्ट लाइन में दीपावली विशेषांक – २०२५ लिखा जाना चाहिए।
साहित्य मौलिक और अप्रकाशित होना चाहिए. यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए कि सामग्री को दिवाली के अंक के लिए भेजा जा रहा है।
संपादक मण्डल का निर्णय अंतिम होगा।
तकनीकी कारणों से दिवाली के अंक में शामिल नहीं किए गए स्तरीय साहित्य को ई-अभिव्यक्ति के दैनिक अंक में लिया जाएगा।
०५ अक्टूबर २०२५ को शाम 7 बजे तक अपनी सामग्री हमें भेजें। कृपया ध्यान दें कि उसके बाद प्राप्त साहित्य को दीपावली के अंक में लेना संभव नहीं होगा।
यह सेवा नि:शुल्क है. साहित्यकार को कोई मानदेय नहीं दिया जा सकेगा।
अनुरोध है कि प्रकाशनार्थ साहित्य धार्मिक, राजनीतिक या किसी अन्य विवादास्पद विषय से संबन्धित नहीं होना चाहिए तथा सामाजिक समरसता भंग न हो, इसका ध्यान रखा जाए।
आप इस निवेदन की जानकारी अन्य साहित्यकारों और समूहों को भेज सकते हैं।
आइए सभी के सहयोग से सामाजिक समरसता और स्तरीय साहित्य को साझा कर दीपावली की खुशियों को दुगुना कर दें।
ई-अभिव्यक्ति – संपादक मंडल
संपादक – श्री हेमन्त बावनकर
संपादक हिन्दी – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव / संपादक अंग्रेजी – कैप्टन प्रवीण रघुवंशी
☆ हिंदी, भारतीय भाषाओं के बीच संवाद की एक सेतुभाषा है – ऋषि कुमार शर्मा ☆ प्रस्तुति – सुश्री महिमा श्रीवास्तव वर्मा ☆
अन्तर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच द्वारा हिन्दी पखवाड़े में आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम में अहिन्दी भाषी साहित्यकारों का सम्मान व परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अहिन्दी भाषी साहित्यकार सुश्री पारमिता षड़ंगी (ओड़िआ ), डॉ. विनीता राहुरिकर (मराठी) और डॉ. सबीहा रहमानी (उर्दू ) को सम्मानित किया गया।
स्वागत वक्तव्य देते हुए अन्तर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की संस्थापक अध्यक्ष सुश्री संतोष श्रीवास्तव ने कहा कि – “हिन्दी की स्वीकार्यता इसके लचीलापन, प्रभावशाली अभिव्यक्ति और व्यापक उपयोग प्रादेशिक और वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही है।”
परिचर्चा का विषय था “भारतीय भाषाओं में हिन्दी की स्वीकार्यता”।
इस विषय पर बोलते हुए विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर ज्योति गजभिए ने कहा कि “संपर्क भाषा के रूप में दूसरे अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी का उपयोग हो रहा है।”
ट्रू मीडिया के प्रधान संपादक श्री ओमप्रकाश प्रजापति जिनका कार्यक्रम में विशेष सान्निध्य प्राप्त हुआ, उन्होंने कहा कि “डिजिटल मीडिया में हिन्दी का वर्चस्व दिखाई देता है।” साथ ही उन्होंने एक अनुकरणीय बात कही कि “फोटो खिंचवाते या सेल्फी लेते समय ‘ चीज़’ या ‘पनीर’ के बदले ‘ हिन्दी ‘ कहा जाये।”
मुख्य अतिथि, हिन्दी अकादमी दिल्ली के पूर्व उपसचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि “संस्कृति, विचार और भावनाओं में राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। जितना किसी बात का विरोध होता है, उतनी ही तीव्रता से वो बढ़ती है। यही बात हिन्दी के विरोध की है।”
कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ और सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री प्रबोध कुमार गोविल ने हिन्दी के संदर्भ में कहा कि- “भाव,भाषा और भावनाओं को परे करने से विवाद होते हैं, पर साहित्यकार आशंकाओं को संभावनाओं को बढ़ा देते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि “भिन्न – भिन्न भाषाओं के साहित्यकार हिन्दी में सतत लेखन कर रहे हैं, स्वतः ही हिन्दी समृद्ध हो रही है।”
परिचर्चा के रोचक विषय पर श्रोताओं ने भी खुलकर भाग लिया और अपने विदेशो के किस्से भी सुनाएं। कार्यक्रम में भारत के विभिन्न शहरों से एवं विदेशों से भी बड़ी संख्या में साहित्यकारों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन अन्तर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की निदेशक सुश्री महिमा श्रीवास्तव वर्मा ने किया। आभार ज्ञापन का दायित्व अन्तर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की मंत्री संचालक सुश्री जया केतकी शर्मा ने किया।
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प्रस्तुति – सुश्री महिमा श्रीवास्तव वर्मा
साभार – सुश्री संतोष श्रीवास्तव
संस्थापक अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका आणि ई अभिव्यक्ती मराठी अंकाच्या संपादक मंडळ सदस्या सौ. मंजुषा मुळे यांचे अभिव्यक्ती परिवारातर्फे मन:पूर्वक अभिनंदन💐
🖊️स्टेट बँक पेन्शनर्स असोसिएशन, मुंबई सर्कल (महाराष्ट्र व गोवा) आयोजित लेख स्पर्धेत प्रथम पुरस्कार ✒️
स्टेट बँक पेन्शनर्स असोसिएशन, मुंबई सर्कल (महाराष्ट्र व गोवा) यांनी आयोजित केलेल्यालेख स्पर्धेतत्यांनीप्रथम पुरस्कारप्राप्त केला आहे. या यशाबद्दल यांचे अभिनंदन!
🖊️राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मृति प्रित्यर्थ साहित्य पुरस्कार ✒️
हिंदी साहित्याचा मराठीमध्ये अनुवाद करण्याचे त्यांचे कार्य सातत्याने चालू आहे. आतापर्यंत त्यांनी २७५ हून अधिक हिंदी लघुकथांचा अनुवाद करुन त्या कथा मराठी वृत्तपत्रे, नियतकालिके यांमधून प्रकाशित केल्या आहेत. त्यांच्या या साहित्य सेवेची दखल घेऊन, सरल काव्यांजलि साहित्यिक संस्था, उज्जैन,(म.प्र.) या संस्थेने राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मृति प्रित्यर्थ साहित्य पुरस्कार देऊन सन्मानित केले आहे. नुकताच १४ सप्टेंबर या हिंदी दिनानिमित्त त्यांचा हा गौरव करण्यात आला आहे.
या गौरवास्पद कामगिरी बद्दल सौ. मंजुषा मुळे यांचे समुहातर्फे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील वाटचालीसाठी हार्दिक हार्दिक शुभेच्छा 💐
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आजच्या अंकात वाचूया तीन लघुकथा.
संपादक मंडळ
ई अभिव्यक्ती मराठी
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जीवनरंग
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(१) सांगा ना बाबा… श्रीभगवानवैद्य ‘प्रखर’ (२) हेछानचझालं…श्रीसंतोषसुपेकर(३) खिडकी…श्रीभगवानवैद्य ‘प्रखर’ ☆ मराठी अनुवाद / लेखिका : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे☆
(१) लघुकथा – सांगा ना बाबा…
(एका हिंदी कवितेवर आधारित)
‘आता त्या चिमणीला मी कुठल्या भाषेत समजावून सांगू बाबा? तुम्ही कोणत्या भाषेत बोलायचात तिच्याशी … बाबा ते प्लीज एकदा सांगा ना मला.
अजूनही ती न चुकता रोज घरात येते. आधी उंबऱ्यावर बसून चिव चिव करते… तुम्हाला हाका माराव्यात तशी. मग खिडकीत बसते… मान वेळावून सगळीकडे बघत राहते … तुम्हाला शोधत असल्यासारखी. मग बाल्कनीत जाते … नाच करावा तशी स्वतःभोवतीच फिरत राहते… एकीकडे चिवचिवाटही मोठ्याने सुरु असतो…. तो थांबतच नाही…. आणि मी अक्षरशः चक्रावून जातो.
तुम्ही गेलात… ते कळल्यावर भेटायला आलेले नातेवाईक परतले. शेजाऱ्यांनी आणि मित्रांनीही चौकशी करणं थांबवलं. इतकंच काय.. अनेक वर्षं आपला पत्ता शोधत येणाऱ्या पत्रांनी- मासिकांनीही जणू आपल्या घराकडे पाठ फिरवली. हो.. पण घायाळ झालेल्या पाखरासारखी तुमची पुस्तकं मात्र काही दिवस नक्कीच फडफडत राहिली होती … आता त्यांच्यावर धूळ साठलीय तो भाग वेगळा. पण …
…. पण ती निळ्या पिवळ्या पंखांची चिमणी मात्र अजूनही येते …अगदी रोज… कधी एकटी तर कधी सोबत आणखी बऱ्याच चिमण्या घेऊन — पोलीस ठाण्यात विनाकारण डांबून ठेवलेल्या आपल्या माणसाला सोडावं म्हणून लोक मोर्चा घेऊन जातात ना.. तसंच काहीसं वाटून जातं मला त्यांच्याकडे बघून. आता तिला मी काय सांगू … कसं सांगू बाबा?
सकाळच्या कोवळ्या उन्हात बसून तुम्ही तिला तांदळाचे दाणे खायला द्यायचात … पेपर वाचून दाखवायचात.. तुमच्या कविता वाचून दाखवायचात.. आणि ते सगळं कळत असल्यासारखं, तल्लीन होऊन ती तुमच्यासमोर शांत बसून रहायची. कधीकधी तीही बहुतेक स्वतःची सुखं दु:खं चिवचिव करत तुम्हाला सांगत राहायची, आणि तुम्हीही शांतपणे ऐकत राहायचात. तुम्ही बागेत काम करायचात तेव्हा तर ती तुमच्याकडे अशी निरखून बघत राहायची की जणू काही तुम्ही तिच्या बागेत काम करणारा माळी असायचात …
… आत्ता प्रकर्षाने आठवतंय सगळं.
तुम्ही गेल्यानंतर प्रत्येक रोपट्याला तिने किती वेळा तुमच्याबद्दल विचारलं असेल …सांगा ना बाबा…आता कसं सांगू.. कसं समजावू मी तिला….
एक दिवस ना बाबा, ती धीटपणाने बेधडक थेट घरातच आली आणि शोधत राहिली…. एकही पेटी.. एकही कपाट असं राहिलं नाही जिथे बसून तिने तुमचा कानोसा घेतला नाही. आरशावर डोकं आपटून आपटून विचारत होती …. तुम्ही कुठे आहात ते. शेवटी हताश झाल्यासारखी तुमच्या टेबलावर जाऊन बसली.. आणि तुमच्या पेनाला विचारायला लागली…. त्याने तुम्हाला शेवटचं कधी पाहिलं होतं ते….
आता तिला कसं समजवायचं बाबा.. आम्हीही तिला तांदळाचे दाणे देतो, पण तोंडही लावत नाही ती. मोठ्याने चिवचिवाट करून नक्कीच गळा कोरडा पडत असणार तिचा.. पण अजूनही तुम्ही झाडाला टांगून ठेवलेल्या पाण्याच्या मडक्याकडे ती बघतही नाही…. दारात, अंगणात, बाल्कनीत, खिडक्यांमध्ये चिवचिव करत भिरभिरत रहाते आणि दमली की निघून जाते….. दुसऱ्या दिवशी परत येण्यासाठी..
– आता तिला कसं सांगायचं की तुम्ही खूप लांब निघून गेला आहात …. परत कधीही इथे न येण्यासाठी…
बाबा ऐका ना.. हे सगळं सगळं तुम्ही त्या चिमणीला कोणत्या भाषेत सांगितलं असतंत …. ते सांगायला तरी या ना बाबा परत …
प्लीज बाबा.. या ना…‘
कविवर्य : श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ यांच्या ‘बोलो ना पापा’ या हिंदी कवितेवर आधारित.
लेखिका : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
(२) हे छानच झालं…
माझा एक मित्र सकाळी सकाळी घाईघाईने कुठे तरी चालला होता. रस्त्यावर नेहेमीची वर्दळ अजून सुरू झाली नव्हती. त्यामुळे त्याच्या टू-व्हिलरचा वेग नकळतच वाढला होता… एक काम करून लगेच ऑफिसला वेळेत पोहोचायचं आहे हाच विचार असणार त्याच्या डोक्यात… आणि रस्त्याने जाणाऱ्या एका वृध्द गृहस्थांना त्याच्याही नकळत त्याच्या गाडीने धडक दिली. तो प्रचंड घाबरला. गाडी बाजूला लावून त्याने त्या गृहस्थांना आधार देत उठवून बसवलं. बरंच लागलं होतं त्यांना. घाबरलेल्या मित्राने मला घाईघाईने फोन केला… ‘पटकन् ये’ म्हणाला, आणि मी लगेच तिथे पोहोचलो. मुद्दाम माझी कार घेऊन गेलो… त्या गृहस्थांना धरून गाडीत बसवलं… हॉस्पिटलमध्ये नेलं. सुदैवाने जिवाला धोका ठरणाऱ्या जखमा नव्हत्या. औषधोपचार… बॅन्डेज सगळं करून झाल्यावर आम्ही दोघं त्यांना त्यांच्या घरी पोहोचवायला गेलो.
त्या अनोळखी घरात जातांना खरं तर जरा घाबरलोच होतो… आजोबांच्या घरातल्यांचा त्या अपघातावरून आणि त्याहीपेक्षा उपचारांच्या खर्चावरून वाद होणार… आम्ही बोलणी खाणार… पैसेही द्यावे लागणार… या सगळ्यासाठी आम्ही मनाची तयारी केलेलीच होती….
घरात पोहोचताच त्या आजोबांचा तरुण मुलगा तावातावाने माझ्या मित्राला बोलायला लागला… ‘‘खरं तर तुमची रवानगी थेट पोलिस कोठडीत करू शकलो असतो मी… पण माझ्या वडलांना धडक मारल्यावर तुम्ही तिथून पळून गेला नाहीत… त्यांना हॉस्पिटलमध्ये घेऊन गेलात… उपचार केलेत… म्हणून सोडून देतोय् तुम्हाला… नाहीतर तुम्हाला जेलची हवाच खायला लावली असती मी… लक्षात ठेवा… आणि आत्ता आमची हलाखीची परिस्थिती तर बघताच आहात तुम्ही. मी दिवसभर घराबाहेर असतो… दोन-दोन नोकऱ्या करून कसं तरी घर चालवतो. आता बाबा अंथरूणावर पडून रहाणार म्हणजे कितीतरी कामांसाठी मला पैसे खर्च करावे लागणार… रजा घ्याव्या लागणार. भरीस भर म्हणून त्यांच्या औषध-पाण्याचा खर्च आहेच. अहो माझे वडील या वयातही सकाळी लवकर उठून पाणी भरायचे… मुलांना शाळेत सोडायला जायचे, येतांना दूध आणि भाजी घेऊन यायचे. पुन्हा दुपारी मुलांना शाळेतून आणायला जायचे. विजेचं बील, पाण्याचं बील भरायचे, रेशन आणायचे. दळण दळून आणायचे. शिवाय रिकाम्या वेळेत सुतारकाम करून थोडेफार पैसेही कमवायचे… आता ही सगळी कामं कोण करणार? तुम्ही असं करा… आम्हाला कमीत कमी साठ-सत्तर हजार तरी द्याच…”
… आणि तिथे अंथरूणावर पडलेल्या वडलांच्या जखमांवर मात्र, मुलगा त्यांची जी खोटी खोटी प्रशंसा करत होता, ते शब्द मलम लावण्याचं काम करत होते. त्या तशा जखमी अवस्थेतही त्यांना छान हसावंसं वाटत होतं… त्यांच्या मनात विचार येत होता की… ‘‘मला हा ऍक्सिडेंट झाला हे तर छानच झालं… आज इतक्या वर्षात पहिल्यांदाच मुलाच्या तोंडून माझं या घरातलं महत्त्व तरी ऐकायला मिळालं मला …”
मूळ हिन्दी कथा : ‘अच्छा हुआ!’
कथाकार : श्री संतोष सुपेकर, उज्जैन
मराठी अनुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
(३) खिडकी…
“बाबा.. बाबा.. अहो लक्ष कुठे आहे तुमचं? ऊन किती तापलंय.. आणि तुम्ही इथे बाल्कनीत निवांत बसलायत.. चला आत चला..“
“हो बाळा, मी उठणारच होतो आत्ता..“
“बाबा मी रोज बघतोय.. तुमची खोली बदललीये तेव्हापासून तुम्ही या बाल्कनीतच जास्त वेळ बसून असता..“
“हां.. बरोबर आहे.. पण अरे असंच येऊन बसतो इथे.. सहजच..“
“नव्या खोलीत कुठली गैरसोय जाणवते आहे का तुम्हाला? सगळं फर्निचर नवं आहे.. आणि ही खोली तुमच्या आधीच्या खोलीपेक्षा थोडी मोठीही आहे.. मग तरी..?“
“अरे गैरसोय वगैरे काही नाही.. सगळी अगदी छान सोय आहे.“
“हो ना? मग खोलीतून उठून सारखे असे बाल्कनीत का येऊन बसत असता?“
“अरे खरंच खास असं काही कारण नाहीये.. पण का कोण जाणे.. इथे येऊन बसलं की फार बरं वाटतं.. आणि अरे वेळही चांगला जातो.. म्हणून.. बाकी काही नाही.“
“बाबा मला कळतेय की तुम्ही सांगत नसलात तरी नक्कीच काहीतरी कारण आहे याचं. अहो ‘आबांची खोली आम्हाला पाहिजे‘ म्हणून किती हट्ट करत होती दोन्ही मुलं.. दोघेही मोठे झालेत आता.. अभ्यासही खूप असतो त्यांना.. त्यामुळे बाबा त्यांचं म्हणणं ऐकावं लागलं आम्हाला. पण हे बघा त्याविषयी तुम्हाला काही सांगायचं असलं तर मोकळेपणाने सांगा मला.. असं मनात नका ठेऊ.“
– – “आता तू एवढं म्हणतोच आहेस तर सांगतो…. त्या खोलीला एक बऱ्यापैकी मोठी खिडकी आहे ना.. त्या खिडकीपाशी मी तासनतास बसून राहायचो. तिथून रस्त्यापलिकडचं ते वाण्याचं दुकान दिसतं. तिथे सतत माणसांची ये-जा चालू असते.. ती बघत वेळ कसा जातो कळत नाही. आणि माझे ते अगदी जवळचे मित्र होते ना.. काळेकाका.. त्यांचं घर बरोब्बर समोरच्या चौकातच आहे. माझ्याशी गप्पा मारायला ज्या रस्त्याने यायचे ना ते, तो रस्ताही अगदी स्पष्ट दिसतो त्या खिडकीतून. आणि रस्त्याच्या डाव्या बाजूला आणखी एका मित्राचं तीन मजली मोठं घर आहे. तो हयात होता तोपर्यंत त्याच्या गच्चीवरच्या कुंड्यांना पाणी घालायला जेव्हा जेव्हा यायचा तेव्हा हमखास दिसायचा.. एकमेकांना बघून नुसते हात हलवायचो आम्ही.. पण खूप छान वाटायचं रे.. आता दोघेही गेले हे जग सोडून.. खरं तर एक-एक करत बरोबरचे बहुतेक सगळेच गेले रे.. खूप साऱ्या आठवणी मागे ठेवून.. त्या खिडकीशी बसून त्या सगळ्या आठवणी मी आठवत राहायचो.. जणू पुन्हा अनुभवायचो ते दिवस आणि मन रमवायचो. आता त्या खोलीतून या खोलीत आलोय.. माझं सगळं सामानही इकडे हलवलंय…. पण त्या खिडकीची सोबत सुटली रे.. म्हणून तर सारखा असा इथे या बाल्कनीत….“
– – बोलता बोलता नकळत ओलावलेले डोळे झटकन पुसत त्या वडलांनी मान वळवून शेजारी उभ्या असलेल्या मुलाकडे पाहिलं.. पण – –
– – मुलगा तिथे नव्हताच.. कधी निघून गेला ते कळलंच नव्हतं त्यांना……..
मूळ हिन्दी कथा : ‘खिडकी‘.
कथाकार : श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’.
अनुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈