ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष 💐 हेमन्त बावनकर ☆

दो वर्ष के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि सुमित्र जी नहीं रहे। ऐसा लगता है कि उनसे कल ही तो बात हुई थी। किन्तु, मृत्यु तो अटल सत्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वजनों को शारीरिक रूप से अवश्य छोड़ कर चले गए किन्तु, उनकी स्मृतियाँ सदैव उनकी पीढ़ी एवं वर्तमान पीढ़ी के मस्तिष्क में आजीवन रहेंगी।

सुमित्र जी से पहली मुलाक़ात मेरे स्व. पिताश्री टी डी बावनकर जी (सुमित्र जी के मित्र) के साथ 1982 की एक शाम को उनके निवास पर हुई। उसके बाद एक ऐसा संबंध बना जो आजीवन चलता रहेगा। उनके द्वारा प्रकाशित मेरी प्रथम कहानी “चुभता हुआ सत्य’ नवीन दुनिया के पाक्षिक तरंग के प्रवेशांक में प्रकाशित हुई थी। उनके पत्र एवं तरंग की प्रति मेरे पास अभी तक सुरक्षित है।

मेरी उपरोक्त स्मृति तो मात्र एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, उनसे जुडने वाले अनेकों मित्रों का जिन्हें उन्होने आजीवन अपना आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन दिया है। ऐसी अनेक कहानियाँ और संस्मरण आपको संस्कारधानी के साहित्य जगत में ही नहीं अपितु सारे विश्व के कई मित्रों में मिलेगी।

ई-अभिव्यक्ति के प्रथम अंक के लिए उनके आशीष स्वरूप प्राप्त कविता उद्धृत कर रहा हूँ जो मुझे ई-अभिव्यक्ति के सम्पादन में सदैव सकारात्मक मार्गदर्शन देती रहती है, एक गुरुमंत्र की मानिंद।

☆ अभिव्यक्ति  ☆

संकेतों के सेतु पर

साधे काम तुरंत |

दीर्घवयी हो जयी हो

कर्मठ प्रिय हेमंत

काम तुम्हारा कठिन है

बहुत कठिन अभिव्यक्ति

बंद तिजोरी सा यहां

दिखता है हर व्यक्ति

मनोवृति हो निर्मला

प्रकटें निर्मल भाव

यदि शब्दों का असंयम

हो विपरीत प्रभाव ||

सजग नागरिक की तरह

जाहिर हो अभिव्यक्ति

सर्वोपरि है देशहित

बड़ा न कोई व्यक्ति|

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

स्थान – दिल्ली 15 /10/18

मित्र श्री संतोष नेमा जी ने ‘सुमित्र संस्मरण’ प्रकाशित किया है। जिसमें 60 से अधिक लोगों के संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं। श्री नेमा जी के शब्दों में ही “साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें.”

सुमित्र जी के अनेकों स्वजनो के अनेकों संस्मरण हैं जो आजीवन उनकी याद दिलाते रहेंगे। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर ई-अभिव्यक्ति द्वारा प्रकाशित विशेष संस्करण भी मात्र एक प्रतीक ही था. यह विशेष संस्करण अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं.  

 

हेमन्त बावनकर

पुणे 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चट्टान ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चट्टान ? ?

मैं

चट्टान बनकर खड़ा हूँ

प्रवाह के बीचों-बीच

वह

नदी बनकर

मेरे इर्द-गिर्द बह रही है

समीक्षा के शौकीन

प्रवाह की तरलता

और सरलता की

आदर्श कथा सुना रहे हैं

बगैर तथ्य जाने-समझे

मुझ पर संवेदनहीन,

जड़ और भोथरा

होने का आरोप लगा रहे हैं,

मैं चुप हूँ

वैसा ही, जैसे तब था,

तब…जब, वह

अपने सारे उफान,सारे तूफान

सारा आक्रोश,सारा असंतोष

मुझसे बयान करती

मेरे सीने से लगती

मुझसे लिपटती

कहती,सुनाती और रोती,

उसके भीतर जमा

सबकुछ प्रवाहित होने लगता

वह हल्की होती

शनैः-शनैः नदी बन

बहने लगती

….और मैं

भीतर ही भीतर समेटे

सारे झंझावत

निःशब्द खड़ा रह जाता,

उसे प्रवहमान करने

की प्रक्रिया में

सारा भीतर

भीतर ही भीतर सूख जाता,

ये सूखा भीतर

नित विस्तार पाता रहा

वह हर क्षण प्रवाह होती गई

मैं हर पल पाषाण होता रहा,

अब वह उछलती-कूदती नदी है

मैं हूँ निर्जीव चट्टान,

पर प्रवाह का

इतिहास लिखनेवालों का

है कहना;

हर नदी के लिए

आवश्यक है

एक चट्टान का होना! 

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८३ – नवगीत – धुन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – धुन

? रचना संसार # ८३ – गीत – धुन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

वेणु की प्रभो प्यारी धुन है,

हे मनमोहन हे गिरधारी।

भीगी प्रीति फुहारों से है,

मधुवन में बृषभानु दुलारी।।

*

अन्तर्मन में प्रीति बसी है,

लोभ कपट सब छूटी माया।

अधरों को सिंचित करती है,

कामदेव सी तेरी काया ।।

धुन भाती वंशी की सबको,

महका दो जीवन फुलवारी।

*

पात -पात पर प्रीति पल्लवित,

स्वर्णमयी आभा फैलाती।

पावन धुन मुरली की बजती,

राधे ललिता प्रीति निभाती।।

कटुता की बेलें कटतीं हैं,

श्याम शरण पाते सुखकारी।

*

कण-कण में मनमोहन बसते,

नित उर नूतन आस जगाते।

वंशी धुन पर गोपी झूमे,

कान्हा जब भी रास रचाते।।

मंजुल नैना रूप मनोहर,

छवि कान्हा शुभ मंगलकारी।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२९ ⇒ नाड़ी दोष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नाड़ी दोष।)

?अभी अभी # ९२९ ⇒ आलेख – नाड़ी दोष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कबीर कोई नाड़ी वैद्य नहीं थे और ना ही कोई ज्योतिषी, जो लोगों की जन्म पत्री में नाड़ी दोष निकालते बैठते। वे कोई हठयोगी भी नहीं थे, महज एक जुलाहे थे, जो ताना बाना बुनते थे और सहज रूप से ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बातें करते थे। साधो ! सहज समाधि भली।

जितनी कृष्ण की रानियां थीं, उससे अधिक तो हमारे शरीर में नस -नाड़ियां हैं। हम श्रीकृष्ण नहीं, हमें सिर्फ या तो नारियों में दोष दिखाई देता है, या फिर इंसानों में नाड़ी – दोष ! ठीक है, अगर किसी में नाड़ी दोष है तो किसी नाड़ी – वैद्य को बताओ। नहीं ! वे नाड़ी – दोष के लिए किसी ज्योतिषी की सलाह लेते हैं। बस यहीं कबीर का दिमाग खराब हो जाता है। वह अपने कुल को ही दोष देने लग जाता है :

बूढ़ा वंश कबीर का,

उपजा पूत कमाल।।

ज्योतिषी कुंडली में विवाह के पूर्व वर – वधू के गुण मिलाते हैं। नक्षत्रों का मिलान करते हैं। दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन, पहले बत्तीस गुण, फिर सगाई और उसके बाद बारात। अगर फिर भी बात ना बने तो ! नाड़ी दोष और क्या। महाराज कोई निदान ? हां यजमान गऊ दान, तुरंत समाधान।

पहले उन्हें नाड़ी वैद्य कहते थे, विज्ञान उन्हें न्यूरो सर्जन कहता है। कलाई गोरी हो या काली, उसे थामने का अधिकार सिर्फ डॉक्टर, वैद्य अथवा एक चूड़ी वाले को ही होता है। नाडी वैद्य अगर नाड़ी देखकर मर्ज पहचान जाता है तो डॉक्टर अपने यंत्र द्वारा पल्स रेट और दिल की धड़कन जानकर। डॉक्टर आपके दिल पर हाथ नहीं रखता, बस यंत्र द्वारा बीमारी को टटोल लेता है। ज़ोर से सांस लो, छोड़ो। आंखों से आंखें नहीं मिलाता, टॉर्च से रोशनी फेंकता है। इन आंखों का रंग हो गया, गुलाबी गुलाबी ! कहीं कंजेक्टिवाइटिस तो नहीं ? नहीं, नहीं सब ठीक है। हल्की सी हरारत है। सब ठीक हो जाएगा एंटीबायोटिक से।।

तब लक्स अंडरवियर और बनियान का प्रचलन नहीं था। बंबइया पट्टेदारी चड्डी और जेब वाले बनियान मां घर पर ही सीती थी। बाहर के लिए कुर्ता पायजामा। तब भी हम नाड़ी दोष से परेशान रहते थे। पुराने टूथ ब्रश की डंडी से ही नाड़ी दोष दूर हो जाता था। बाद में तो इस धर्म संकट से बचने के लिए एक सेफ्टी पिन पायजामे के साथ ही नत्थी कर दी जाती थी। आज इलेस्टिक ने एक आम इंसान की इज्जत बचा ली। उसे नाड़ी दोष से मुक्त कर दिया।

आज सी टी स्कैन और एम आर आई जैसी आधुनिक तकनीक से रीढ़ की हड्डी से लेकर मस्तिष्क तक की सभी नस नाड़ियों की जांच संभव है, फिर भी मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यूं ज्यूं दवा की।

कहीं नाड़ी दोष तो कहीं पितृ दोष। दान पुण्य, ज्योतिष, नीम हकीम। क्या क्या न किए हमने खट करम आपकी खातिर।।

नाड़ी वैद्य ना सही, उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम नियमित व्यायाम और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी कर सकते हैं। नाड़ी दोष से भी अधिक खतरनाक आजकल राजनीतिक दोष हो गया है जहां कहीं भी किसी को गुण नजर ही नहीं आता। किसी की कलाई मरोड़ी तो किसी की कलाई खोली। काश कोई नाड़ी वैद्य इन बीमारों की बीमारी जड़ से पकड़ ले तो समाज का नाड़ी दोष दूर हो जाए। हमारी संस्कृति और सभ्यता की गाड़ी वापस रास्ते पर आ जाए। डर है, कहीं कोई यहां भी पितृ दोष ना निकाल दे ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – २ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

बस इतना सा ख्वाब है ! – भाग – २ – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

उसके मन को बस एक ही सवाल निरंतर कुरेदता रहता … पति की सात-आठ हजार रुपये की तनख्वाह में मनमाफिक जीवन कैसे जिया जाए? यथा काल घर में नए मेहमान आने का अंदेशा होने लगा। दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। पति यथाशक्ति उसको लाड प्यार से जतन कर उसकी मांगें पूरी करने में लगा रहता। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई और एक शुभ दिन उनके जीवन में नन्ही परी ने कदम रखा। उसके आगमन के साथ ही उन दोनों के जीवन में एक नया मोड़ आया। उसके कार्यकलाप काफी हद तक बढ़ गए और साथ साथ खर्चे भी! लेकिन वह बदलते हालात के साथ पूरी तरह से जी जान लगा कर तालमेल बिठाने में लगी रही। चॉल में हमउम्र सहेलियों के साथ गपशप के दौरान विचारों और समस्याओं का आदान-प्रदान करते हुए, अनायास ही उसने एक गांठ मन में बांध ली कि, अपने सवालों के जवाब खुद को ही खोजने होते हैं। ऐसे में पहली बिटिया सवा साल की होते-होते फिर एक बार नया कोंपल फूटा। उसने सही समय पर दूसरे बच्चे को जन्म दिया और इस बार भी बेटी ही हुई। एक पल के लिए, अनजाने में ही उसके मन में हूक उठी कि काश इस बार बेटा होता तो कितना ही अच्छा होता! यह तो उस क्षण का आवेग था, परन्तु बेटा हो या बेटी… वात्सल्य भाव से भरपूर दूध की धारा माँ के अंचल से अपने आप ही झरने लगती है… और फिर इसी से समानांतर खर्चे का भी झरना तेजी से बहने लगा। अब तो ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या’ जैसी हालत होने लगी।   

एक दिन, उसके पति ने नौकरी का विज्ञापन पढ़ा और अपने दिल पर पत्थर रखकर अकस्मात ही उसे सुझाव दिया कि यह नौकरी उसके लिए ठीक रहेगी। नौकरी के लिए एकमात्र शैक्षणिक योग्यता बारहवीं पास होना था। वह आयु सीमा भी पूरी कर रही थी। बस बाधा उत्पन्न करने वाली एकमात्र शर्त यह थी कि, उसे नगर निगम के मुख्य कार्यालय जाना पड़ेगा। अब तक वह मुंबई के जीवन से अच्छी तरह से परिचित हो चुकी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या वह अकेली बस से यात्रा कर पाएगी? लोकल ट्रेन का सफर तो दूर की बात थी। इस घडी तक तो घर की चारदीवारी में ही उसका विश्व समाया था । घर-आंगन के परे भी जग होता है, इस वास्तविकता को मानों वह भूल चुकी थी। लेकिन घर में आमदनी बढ़ाना अत्यावश्यक था। माता-पिता की दवाइयों और लड़कियों की स्कूल का खर्चा आए दिन बढ़ता ही जा रहा था। और पति के दोनों हाथ कमजोर पड़ने लगे थे। इस परिस्थिति में मजबूरन पति बहुत अनिच्छा से ही सही, उसे नौकरी के लिए आवेदन करने का आग्रह करने लगा। वह भी घर दर्दनाक हालत समझ पा रही थी, साथ ही पैसे की बढ़ती आवश्यकता उससे छिपी नहीं थी। एक ओर, खुद पैसे कमाने का विचार लुभावना प्रतीत हो रहा था, लेकिन दूसरी ओर उसके मन पर भय का गहरा साया छाया था। हर दिन उसे इतनी लंबी दूरी की यात्रा अकेले तय करनी होगी, उस प्रचंड भीड़भाड़ में अकेले मजबूती से डटे रहना, दिन भर अजनबी इन्सानों के बीच आना-जाना… और तिस पर काम? उसने तो महीनों से कलम छुई तक नहीं थी… वह जटिल सरकारी कार्य… क्या वह समझ पाएगी? क्या वह उसे सक्षमता से निभा पायेगी?… और उसकी छोटी बेटियां, सास-ससुर का क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा?… ऐसे अनगिनत सवाल उसके दिमाग को घेरे हुए थे, जिनके उत्तर ढूंढते हुए वह और भी भयकंपित होने लगी । “अरी भागवान! आवेदन करने में हर्ज क्या है? तुरन्त नौकरी मिलेगी इसकी कोई गुंजाईश तो है नहीं।”…उसके पति ने इन आश्वासक शब्दों से उसे मना ही लिया… उसने आवेदन किया। उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया… उसने अत्यधिक घबराहट की स्थिति में किसी तरह साक्षात्कार भी दिया… और आश्चर्यजनक रूप से, उसे एक महीने के भीतर नियुक्ति पत्र तक मिल गया…अब उसकी वास्तविक सत्वपरीक्षा का प्रारम्भ हुआ।

चॉल में ही रहने वाली एक चाची मामूली पैसे के ऐवज में बच्चियों की देखभाल करने के लिए राजी हो गई। लेकिन उसे नौकरी मिल जाने के बावजूद गृहकार्यों के लिए किसी नौकरानी को पालना नामुमकिन था, क्योंकि नौकरी ‘लोअर डिविजन क्लर्क’ की थी… और वेतन भी उसके पदानुसार ही सीमित था।  एक राहत की बात थी कि, एक नौकरानी सास-ससुर को दोपहर के नियत समय पर खाना देने के लिए तैयार हो गई। उस नौकरानी का वेतन एक अनिवार्य खर्च ही था। धीरे-धीरे एक के बाद एक सारे परिवारजनों की रोजमर्रा जिंदगी सुस्थिति में आ गई। इन खर्चों को घटाने के पश्चात भी उसके पास कम से कम चार-पाँच हज़ार रुपये बचेंगे, ऐसा उसका अनुमान था। अब सबसे कठिन कार्य बचा था अपने अस्थिर मन को आत्मविश्वास के अश्व पर आरूढ़ करवाना।

अपने पति के विश्वास का हाथ मजबूती से थामे हुए, उसने यह व्यवधान भी दूर किया और उसकी नौकरी शुरू हो गई… और जीवन की रेलगाड़ी वक्त की पटरियों पर बेतहाशा भागने लगी। यादों के झुरमुट की हरियाली भी उसी द्रुतगति से पीछे हटती गई… एक-एक करके, वे इतने पीछे हो गई कि नजर की ओट से भी अदृश्य हो गई…ठीक वैसे ही, जैसे लोकल ट्रेन की खिड़की से ओझल होती रहती थी। … जब उसने पहली बार मुंबई में कदम रखा, तो वह अपने साथ सपनों की बड़ी सी गठरी भी साथ संजो कर लाई थी। उस गठरी में बंद सपने अपेक्षाकृत छोटे-छोटे ही थे! …वह चाहती थी, ‘राणीचा बाग’ (रानी का बगीचा) जी भरकर घूमूं, … कमला नेहरू पार्क में बने ‘बूट हाऊस’ अर्थात बूढ़ी औरत के जूते में जाते हुए मरीन ड्राईव्ह का मनोरम नजारा देखूँ,  … उसने सुना था, जहाँ देखो वहीं सड़कों के किनारे बाजार सजते हैं रोज, अलीबाबा की गुफा जैसी तरह-तरह की चीज़ों से भरे रहते हैं…… उसने सोचा था, जहाँ तहाँ इतराते हुए चक्कर काटूंगी और मनचाही छोटी-मोटी चीज़ें खरीद लूँगी…उसे नमक की खदानें (मीठागर) देखने की बहुत उत्सुकता थी…इसके अलावा, वह  देखना चाहती थी कि डबल-डेकर बस वास्तव में कैसी होती है… उसमें सवारी करने की चाह भी थी मन में… और उसका सबसे बड़ा सपना था मुंबई के समुन्दर का दर्शन करने का… मुंबई में भी समुन्दर है, यह जानने के तुरन्त बाद तो नीलवर्णी मनोरम सागर से गर्भनाल के अटूट बंधन द्वारा जुड़े सुहाने रिश्ते को वह किसी भी हालत में टूटने नहीं देना चाहती थी।  लेकिन जैसे ही उसका जीवन उस चॉल में सिमटी छोटी-सी दुनिया में उलझ गया, वैसे ही ये नन्हे कोंपल से खिले सपने भी उसके मन की गठरी में उलझ गए… बंद होने से उनका दम घुटने लगा … और फिर धीरे-धीरे विस्मृति के काले धुंए में लुप्त हो गए।

शीघ्रगामी कालचक्र रुकने का नाम तक नहीं ले रहा था। बेटियाँ बड़ी हो गईं। वह हर हाल में उन्हें स्नातक होने तक तक पढ़ाना चाहती थी, और इस आकांक्षा को पूरा करने हेतु वह खुद के मामले में बेहद कृपणता दिखाकर पाई पाई जोड़ रही थी। उसने और उसके पति ने केवल बारहवीं कक्षा तक ही शिक्षा पाई थी। इस कारण स्टोर कीपर और एलडीसी (निम्न श्रेणी लिपिक) इन दोनों ही पदों के चलते पदोन्नति का कोई सवाल ही नहीं था… लोकल ट्रेन एवं और कार्यालय की चिट फंड योजना में नियमित रूप से भाग लेने से, और वेतन में वृद्धि होने पर भी, उस वृद्धि को छुए बिना उसने कुछ रकम और थोड़ा बहुत सोना इकठ्ठा कर रखा  था। एक के बाद एक पैदा हुई दोनों बेटियों का विवाह भी थोड़े ही अंतराल में करना था। इसलिए बहुत समय पहले, उसने अपने माता-पिता द्वारा उसकी शादी में पहनाई गईं चार चूड़ियाँ और एक छोटा गले का हार बिना ज्यादा उपयोग में लाते हुए इसी समय के लिए संजो कर रखे थे। दोनों ही लड़कियों के नाक नक्श सुन्दर थे। परिस्थितिनुसार वे समझदार और सुशील थीं। उनकी स्नातक परीक्षा समाप्त होते ही, उन दोनों के लिए खातेपीते परिवारों से रिश्ते के प्रस्ताव आने लगे। उसका बड़ा ही सीधा और सटीक सा विचार था कि जब उसकी अपनी झोली खाली है, तो दूसरे की खाली झोली के बारे में शिकायत कैसी? भाग्यवश दोनों ही होने वाले दामाद भी शालीन, व्यसन-मुक्त और शिष्ट थे। उन पर ज्यादा जिम्मेदारियां भी नहीं थीं। वेतन भी संतोषजनक थे। भला उसके पास इससे अधिक सोचविचार करने का वक्त कहां था? एक वर्ष के अंतराल से दोनों बेटियां ससुराल चलीं गईं। लेकिन घर में पैसों की तंगी की कहानी तो चल ही रही थी। बेटियों की शादी के लिए पति-पत्नी को कुछ कर्ज लेना पड़ा। फिर लड़कियों पर होने वाले खर्चों की जगह ऋण की किश्तें चुकानी शुरू हो गईं; बस यही एक अंतर था। वक्त के प्रवाह में वृद्धावस्था की सीमा लाँघ चुके उसके ससुर एवं फिर थोड़े अंतराल के भीतर उसकी सास, दोनों ही चल बसे। इतनी तसल्ली थी कि इन दुखद घटनाओं के पहले उसे, उसके पति और दोनों विवाहित बेटियों को उनके भरपूर आशीष प्राप्त हुए।     

… इतने वर्षों तक लगातार भागदौड़ करने के बाद न केवल उसका शरीर बल्कि, उसका मन भी अत्यधिक क्लांत हो चला था… लेकिन अब वह बहुत ही तटस्थ, शांत और बेहद मजबूत हो गया था। इतने वर्षों की अथक मेहनत के बाद उसने जिन जिम्मेदारियों का बोझ उठाया था, वह वाकई थोड़ा कम हो गया था,  परन्तु इस हालात में तुरन्त नौकरी छोड़ने के बारे में सोचना बिलकुल असंभव लगता था। पति की नौकरी एकाध साल में खत्म होने वाली थी, लेकिन उसकी नौकरी के फ़िलहाल ४-५ वर्ष बाकी थे। पति की निजी नौकरी में पेंशन की कोई गुंजाईश ही नहीं थी। यदि निवृत्ति के वक्त पति को फंड की थोड़ी बहुत  धनराशि भी मिलती, तो उसे दोनों की वृद्धावस्था के खर्चों में ही लगाना पड़ता। इसके अलावा, यदि वह सेवानिवृत्ति की आयु से पहले ही नौकरी छोड़ देती, तो उसकी निवृत्ति- निधि अर्थात पेंशन की राशि कम हो जाती। इसलिए अभी नौकरी छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चाहे वह कितनी भी थकी-हारी हो, चाहे उसका प्रकृति स्वास्थ्य बिगड़ने लगा हो, वह बीच में नौकरी से छुटकारा पाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। आजकल उसके पैर शिथिल हो गए थे सो तेज़ी से नहीं उठ पा रहे थे… उन्हें जोर जबरदस्ती से घसीटना पड़ता था। लेकिन इन सब मुसीबतों को झेलते हुए, उसको सुबह नौ सात (९.०७ ) वाली लोकल ट्रेन पकड़ना आज की तारीख में भी परम आवश्यक था…

… लेकिन हाल ही में, कोल्हू के बैल जैसी अनवरत पिसती जिंदगी के बीच एक नवीनतम सपना उसे पुकार रहा था…. पहले वाले सपनों जैसा ही, बहुत छोटा सा…. सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम एक महीने के लिए उस ९. ०७ की लोकल ट्रेन का फर्स्ट क्लास पास खरीदना, और महीन साड़ियों और पोशाकों से सजी, इत्र की खुशबू महकाती खुशहाल स्त्रियों के धक्के खाते ही सही, इत्मीनान से ऑफिस पहुंचना, और इसके बाद ही निवृत्त होना…. बस इतना ही… यह तो कुंवारी कली सा अछूता सपना था…. वैसे, सच में देखा जाए तो यह अंतिम ही समझना होगा… परन्तु कम से कम यह तो पूरा होगा न? –

…. वह फिर एक बार शांतिपूर्वक उस भीड़ का एक बेनाम हिस्सा बनकर उसमें घुल जाती!…

♦ ♦ ♦ ♦

मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९३☆ गीत – बुरा वक्त जब भी आता है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय  गीत – बुरा वक्त जब भी आता है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९३ ☆

गीत – बुरा वक्त जब भी आता है☆ श्री संतोष नेमा ☆

बुरा वक्त जब भी आता है।

कुछ हमको सिखला जाता है।

कौन हमारा कौन पराया,

समझ तभी हर नर पाता है।

वक्त बुरा जब भी आता है।।

*

कभी न आता समय बता कर।

लगे हुए जैसे इसको पर।

कभी दुखों के शूल चुभाता,

कभी लुटाता खुशियाँ भर-भर।

जीवन का सच बतलाता है।।

बुरा वक्त जब भी आता है।

*

वक्त किसी का सगा नहीं है।

कौन वक्त से ठगा नहीं है।।

मूल्यवान है समय बहुत ही,

खोता जो भी जगा नहीं है।।

खोकर फिर नर पछताता है

बुरा वक्त जब भी आता है।

*

उस ईश्वर का ध्यान करें हम।

श्रद्धा से गुणगान करें हम।

धर्म-कर्म से जोड़ें नाता,

खुद को भी रसखान करें हम।

वही ईश सबका दाता है।

बुरा वक्त जब भी आता है।

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १४ – कविता – परम प्रेम… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘परम प्रेम…’।)

☆ शशि साहित्य # १४ ☆

? कविता – परम प्रेम… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

❣️❣️❣️❣️

आज राधा ने मुख पर घूंघट है डाला,

श्याम की बेचैनी बढ़ती जाए..

देखी जाए ना सही जाए,

ऐसी हो गई कृष्ण की हाला..

हो गए “हिय प्यारी”  के दर्शन दुर्लभ,

मनवा हो गया बावरा..

सौ सौ चांद सा चमक रहा,

पर कृष्णा मेघ ने पेहरा डाला..

छलिया नित लीला करें,

करें नित नए प्रयास,

देख शरारत राधे की

अति व्याकुल हो गए आज..

हृदय  लगन लगी बस दरस की,

सजल नयन करे मनुहार..

प्राण प्रिय को व्याकुल देख,

विचलित हो गई कृष्ण प्रिया..

सरक गया कब घूंघट मुख से,

पल भर भी ना समय लगाया..

निरख अनुपम रूप को,

हो गए श्याम अनूप…

कृष्ण उर में बसे राधिका,

राधामय भये घनश्याम..🙏

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८३ – दोषी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८३ – विजय साहित्य ?

☆ दोषी…!

(मात्रा वृत्त – २५ मात्रा)

माझ्याआधी, मलाच गेले, वाचून कोणी

उपदेशाचे, डोस पाजले, हासून कोणी. १

*

चेष्टा, टिंगल, आणी टवाळी, झाली कविता

आदर देता, सादर झाले, आतून कोणी.२

*

घनिष्ठ झालो, बघता बघता, ‌या मनी नांदलो

काळजास त्या, दिली उभारी, राहून कोणी. ३

*

हळवेली पण, मधाळ बोली, संजीवन ते

श्वास फुलांचे, अत्तर गेले, माखून कोणी.४

*

नको‌ तेवढे, वाटत गेलो, धन शब्दांचे

अक्षर काळे, भास्कर झाले, लाजून कोणी.५

*

जपली नाती, वेळ देऊनी हिशेब नाही

नाते गेले, मनासारखे, वागून कोणी.६

*

मतभेदाचे, आले वारे, कडकड नाही

घरात गेले, वहात तेव्हा, पाहून कोणी.७

*

हाकेसरशी, दमात एका, आधार झालो

विश्वासाला, हलाल केले, मागून कोणी.८

*

घर शेणाचे, घर मेणाचे, जमले नाते

अनुभवांचे, दार घेतले, लावून कोणी.९

*

हात लिहिते, थांबले कधीचे कळले नाही

विडा निरोपी, हातावरचा, चाखून कोणी.१०

*

लळा‌ लावूनी, गळा कापला, कविराजाचा

स्वभाव‌ ठरला, दोषीच तेव्हा, टाळून कोणी.११

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ फटका…☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे☆

सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ फटका ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे ☆

!! श्री!!

(उपक्रम – हरिभगिनी वृत्त – फटका)

 (मात्रा ८|८|८|६)

मना जाण रे मनोबोध तू समर्थ शिकवण जाणावी

मना चांगले वाग नेटके विवेक संगत राखावी ||

*

नको हाव रे धनद्रव्याची गरजेपुरते जोडावे

समाधान हे मनात असते व्यर्थ धावणे सोडावे ||

*

अती क्रोध अन अती मस्करी हानीकारक बघ ठरते

नियम बंधने तोडता मना संसाराचे सुख सरते ||

*

व्यसने घातक रोग शरीरा त्यांची संगत धरू नको

देह संपदा मूल्यवान ती हेळसांड तू करू नको ||

*

झाले गेले विसरुन सारे जिवलगांसवे बंध हवे

आयुष्याचे रूप देखणे बनत जातसे नवे नवे ||

*

मृदू बोलणे नित्य असावे कथन करावे प्रेमाने

माणसातल्या देवत्वाला वंदन करणे विनयाने ||

*

मायपित्यांची सेवा करणे कर्तव्याला चुकू नको

पाठीराखा देव होतसे नामस्मरणा टाळु नको ||

© सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ शतजन्म शोधिताना या नाट्यगीता चे रसग्रहण ☆ रसग्रहण – प्रा. भारती जोगी ☆

प्रा. भारती जोगी

 काव्यानंद

☆  शतजन्म शोधिताना या नाट्यगीता चे रसग्रहण ☆ रसग्रहण – प्रा. भारती जोगी ☆

(सावरकर पुण्यतिथी दि.२६ फेब्रुवारी निमित्त…)

संगीत नाटकांच्या वैभवशाली परंपरेत सुवर्णाक्षरांनी कोरलेलं नाव म्हणजे सावरकरांनी, मा. दीनानाथ मंगेशकर यांच्यासाठी लिहिलेली अजरामर नाट्यकृती “ संन्यस्त खड्ग ! “ १८ सप्टेंबर १९३१ या दिवशी या नाटकाचा पहिला प्रयोग झाला. आता शतकाकडे वाटचाल सुरू झाली आहे याची! 

या नाट्यकृतीतल्या… वैश्विक अनुभूती आणि एका वेगळ्याच विरहानुभूतीचा स्पर्श लाभलेल्या, भैरवी रागातल्या अवीट आणि अमीट सुरांची झालर असलेल्या एका नाट्य पदाचे रसग्रहण करण्याचा प्रयत्न मी करणार आहे. खरंतर सावरकरांच्या भावना, कल्पना आणि विचारांचं… उदात्त, उन्नत आकाश दोन बोटांच्या चिमटीत धरणं, सामावणं शक्यच नाही. पण तरीही हे शिवधनुष्य… काही क्षणांपुरतं का असेना… पेलून बघणार आहे…

नाट्यपद…

शत जन्म शोधितांना। शत आर्ति व्यर्थ झाल्या। 

शत सूर्य मालिकांच्या। दीपावली विझाल्या |

*

तेव्हा पडे प्रियासी| क्षण एक आज गांठी |

सुख साधना युगांची| सिद्धीस अंती गाठी। 

*

हा हाय जो न जाई| मिठी घालू मी उठोनी |

क्षण तो क्षणात गेला | सखी हातचा सुटोनी |

हे नाटक गौतम बुद्धांच्या काळाशी संबंधित आहे. बुद्धांच्या सांगण्यावरुन ‘शाक्य’ सेनापती विक्रमसिंह आणि शाक्य जनता, शस्त्र त्याग करून संन्यास घेतात. काही काळ जातो. दरम्यान विक्रमाचा मुलगा वल्लभ सुलोचना नावाच्या युवतीशी प्रेमविवाह करतो. लग्नाला वर्ष उलटल्यानंतर वल्लभ आणि सुलोचना यांच्या मिलनाचा / भेटीचा योग येतो. आणि… तो बहुप्रतिक्षित मधुर मिलनाचा क्षण येतो… पण हाय रे दैव! 

त्याचवेळी, कोसल देशाचा राजा… विद्युतगर्भ याने आक्रमण केल्याची वार्ता येते आणि शाक्य राष्ट्राला वाचवण्यासाठी, वल्लभालाही पाचारण केले जाते. कपिलवस्तुचा पाडाव टळावा म्हणून संन्यस्त खड्गाला आवाहन केले जाते. वल्लभही मग संन्यास धर्माचा संन्यास घेत… युद्धात उतरतो. म्हणून नाटकाचं नाव.. “संन्यस्त खड्ग!!”

मिलनाच्या क्षणीच झालेली ताटातूट, त्यामुळे सुलोचनेच्या मनाची झालेली अवस्था, विरह वेदनेचे, हतोत्साहित, विकल, असहाय असे मनोभाव… सगळ्याच… विभाव, अनुभाव आणि संचारी भावांसह, रस निष्पत्ती पर्यंत पोहोचविणारं हे नाट्यपद!! 

 सुलोचना आपल्या प्रिय सखीला… नलिनीला, वल्लभाच्या ऐनवेळी असं निघून जाण्याने, तिच्या मनात उठलेलं भावनांचं वादळ, विचारांचा कल्लोळ… कथन करते आहे…. ते शब्दांकन म्हणजे हे पद! 

सुलोचना अगतिक होते आणि म्हणते… असा पती लाभावा म्हणून मी शत जन्म शोधत राहिले गं! त्यासाठी मी शत-शत/अगणित, आरती केल्या. परमेश्वराच्या आळवण्या केल्या. तो भेटावा म्हणून शतजन्म वाट पाहिली. पण सखी, बघ ना, काय झालं…

‘शत आर्ति व्यर्थ झाल्या, शत सूर्य मालिकांच्या दीपावली विझाल्या! ‘

… या ओळींमध्ये शब्द.. शत सूर्य मालिका…. सावरकरांचं विश्वाच्या भव्यतेचं आकर्षण आणि विराटतेची ओढ व्यक्त झाली आहे. उत्तुंग कल्पना शक्ती, आशयातील भावोत्कटता जाणवते आहे. त्यातूनच सुलोचनेची मनोवस्था डोळ्यासमोर येते. ‘ दीपावली विझाल्या ‘ यातला विझाल्या हा अगदी अनवट असा शब्द प्रयोग…. तिच्या मनातले, मिलनोत्सुक आशेचे… शत-शत दीप विझले.. हे सूचित करतो… अगदी प्रत्यक्षानुभूतीच दिलीयं!

पुढील ओळीत सुलोचना म्हणतीये…

‘ तेव्हा पडे प्रियासी, क्षण एक आज गांठी!

सुख साधना युगाची, सिद्धीस अंति गाठी!‘

… या ओळी म्हणजे… यमक आणि श्लेष या दोन्ही अलंकाराच्या गाठभेटीचा उत्तुंग आणि उत्कट क्षण!! 

प्रिय मिलनाचा, शत जन्म वाट पाहिलेला क्षण, आज गांठी आला, गाठला एकदाचा, प्राप्त झाला, मिळाला…. असं वाटतंय! आणि मनात एकच विचार येतोयं की… शतजन्माच्या माझ्या साधनेने, सिध्दी गाठली. साधना आणि सिद्धीची गाठ पडली!! प्रिय आराधना, तपस्या, साधना सफल झाली.

 गाठी या शब्दांत, यमक आणि श्लेष या भाषालंकारांचा उपयोग करून… या पदातल्या, सुलोचनेच्या भावनांची अगदी… ये हृदयीचे, ते हृदयी…. म्हणजे प्रेक्षक वृंद हृदयी… गाठी घातली अंती… हीच भावना येते.

शेवटच्या दोन ओळी तर… कल्पनेची उत्तुंगता, आशयघनता, शब्दकळा, आणि भावनोत्कटता या सगळ्याचाच परिपूर्ण, परिपक्व, परिणाम म्हणावा ! 

सुलोचना सांगतीये… अगदी सजीव, सगुण, साकार दर्शन… त्या एका कृतीची साक्षात्कारी अनुभूती देत की…

हा हाय जो न जाई, मिठी घालू मी उठोनी

क्षण तो क्षणात गेला, सखी हातचा सुटोनी!! 

… सखी, बघ ना, तो मधुर मिलनाचा क्षण आला… मी उठून माझ्या वल्लभाला मिठी घालायला गेले… आणि… आणि, निमिषार्धात्.. तो क्षण.. क्षणात निसटून गेला गं माझ्या हातून.. अगदी काही कळायच्या आत!… किती ही वैश्विक अनुभूती! आध्यात्मिक किनार लाभलेली! कुठेतरी याच ओळी आठवतात… ‘ पाया पडू गेले तव, पाऊलचि ना दिसे!!! ‘ 

विरहाची काळ हा प्रदीर्घ भासतो, मात्र मिलनाचा काळ अत्यल्प भासतो.. असंही सुचवलयं ! ‘ क्षण तो क्षणात गेला…. ’ या सावरकरांच्या ओळीचं खरं मोल जाणून, भाषाप्रभू पु. ल. म्हणतात… ‘ या एका ओळीसाठी सावरकरांना नोबेल द्यायला हवं. ‘ 

हा खरा गौरव आहे त्या… ओळी सुचलेल्या क्षणांचा, सुलोचनेच्या हातून निसटलेल्या त्या हुरहुर लागलेल्या क्षणांचा ! 

या पदाचं आणखी एक वैशिष्ट्य म्हणजे… हे मिलनाच्या आधीचं नाही तर नंतरचं विरह गीत आहे. हे गाणं आपण ऐकतो तेव्हा एक विचित्र हुरहुर लागते. भैरवी रागातल्या सुरांची झालर असलेलं हे नाट्यपद… ‘आर्ति व्यर्थ झाल्या’ मधली आर्तता आणि ‘ क्षण तो क्षणात गेला ’ मधली क्षणभंगुरता स्पष्ट करतं… प्रेक्षकांच्या हाती मात्र खूप काही, मनाच्या गाभाऱ्यात स्थिरावून गेलं… असंच म्हणावसं वाटतं.

© प्रा. भारती जोगी

पुणे.                            

९४२३९४१०२४.📚📖🖋️

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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