मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ – मनमुक्त मी – ☆ सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे ☆

सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

 

? – मनमुक्त मी…! – ☆ सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे ☆

सुख स्वप्नांचे रंग मी

अंगावर पांघरले 

फुलपाखरांचे थवे 

सभोवती अवतरले ||

*

स्वप्नांची फुलपाखरे 

मनी रुंजी घालतात 

मनावरती हलकेच 

मोरपीस फिरवतात ||

*

आनंदी घराची मी 

सिद्धहस्त स्वामिनी 

गृहसौख्य फुलविणारी 

गृहदेवता भामिनी ||

*

मी सौंदर्याची राणी 

आत्मानंदात रमते 

माझे आत्मतत्त्व मी 

मनमुक्ततेत जपते ||

*

मी देवाची निर्मिती 

मी निर्मितीची खाण 

सुख स्वप्नात सुद्धा 

नसे कशाची वाण ||

© सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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English Literature – Poetry ☆ What difference does it make? ☆ Hemant Bawankar ☆

Hemant Bawankar

☆ What difference does it make? ☆ Hemant Bawankar ☆

(Poetry based on incident occurred on February 28, 2026, a missile strike destroyed the Shajareh Tayyebeh girls’ elementary school in Minab, southern Iran, killing 100+ people, most of them schoolgirls.)

Shshsh…shsh

Quiet… quiet…

Here sleep

more than a hundred small girls

who had set out to study.

They went to study…

but could’nt return

and

were put to sleep

in those small graves

in a terrifying graveyard…

From this,

the world’s remaining small girls

their relatives

and

humans unworthy of being called humans…

What difference does it make?

 

Those innocent girls

didn’t even know that…

What is a country?

What is a border?

What is religion?

What is race?

What is a friendly country?

and

What is an enemy country?

They believed that

the sun is one

the moon is one

and

this earth belongs to all.

Their entire world

started from home

and ended at school.

After eating-drinking, reading-writing

would get lost in parents’ embrace.

Then,

to whoever targeted

and fired a missile on their school…

What difference does it make?

 

We have become addicted

to watching wars on TV

like video games…

In this game of destruction

now we don’t see

schools and hospitals

cities anndd buildings

turning into ruins.

Luxurious peaceful lavish lives

getting buried

cities ruined

and

beautiful gardens

getting destroyed.

Now… children, men-women and elders

however, they live or die,

What difference does it make?

 

We had much to learn

Then what did we learn?

From rulers becoming dictators…

From Nagasaki’s atomic explosion…

From torture camps…

From gas chambers…

From gas tragedy…

From shadow of terror…

From poison of religious fanaticism…

From COVID pandemic…

From wars and massacres…

Now, to the hopeless maniacs…

What difference does it make?

 

The peace award – seeker of future

is perhaps sleeping somewhere…

Most people have turned indifferent

and rulers have gone mad…

It is necessary to remind them, as per poet Habib Jalib* —

The person who was seated on the throne here before you

He too had the same conviction of being God himself.

Explaining to them is impossible,

What difference does it make?

 

The flame of hope

has not been extinguished…

It wasn’t said without reason in Atharvaveda **.

“Vasudhaiva Kutumbakam”

“The whole world is one family”.

Therefore,

my words

are words without borders

which wherever they reach

reach carrying message of humanity

reach carrying message of peace.

Now don’t say that— from this

What difference does it make?

Difference does matter,

from message of peace and humanity…

Difference does matter…

Difference surely matters!

 

* Habib Jalib – A Pakistani Shayar and his shayari

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था*

“Tum se pehle wo jo ik shakhs yahan takht-nashin tha,
Us ko bhi apne khuda hone pe itna hi yaqin tha.”

** Atharvaveda – The Atharvaveda is the fourth Veda among the four Vedas of Hinduism (Rigveda, Yajurveda, Samaveda, and Atharvaveda)

© Hemant Bawankar

Pune, Maharashtra. India

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय “जय प्रकाश के दोहे – गर्मी” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पाँवों में छाले पड़े, उधड़ रही है खाल

हरियाली के गाँव में, सूखे का भूचाल।

नदी किनारे बैठकर, देख सुलगती रेत

नाव लहर को कोसती, बंजर गाते खेत।

 *

सड़क पिघलती धूप में, पगडंडी के पाँव

पनघट प्यासे रह गए, पेड़ न देते छाँव।

 *

पोंछ पसीना माथ से, बैठा समय किसान

धूप लिए कागज कलम, लिखती रोज मसान।

 *

लू लपटें अख़बार की, ख़बर सनसनीख़ेज़

सूरज पढ़ता रोज़ ही, तपते दस्तावेज़।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – वर्तमान ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – वर्तमान ? ?

(कविता-संग्रह ‘क्रौंच’ से)

कल, आज और कल का

यूँ उपमान हो जाता हूँ,

अतीत में उतरकर

देखता हूँ भविष्य,

वर्तमान हो जाता हूँ।

 

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रात: 9:44 बजे, 01/04/2023)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७९ ⇒ घराना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घराना।)

?अभी अभी # ९७९ ⇒ आलेख – घराना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरा नाम राजू, घराना अनाम, बहती है गंगा,

जहां मेरा धाम …

लेकिन सभी जानते हैं, कपूर खानदान के इस चिराग का भी एक सेमी क्लासिकल फिल्म संगीत का घराना था, जिसमें शंकर जयकिशन, शैलेंद्र हसरत और मुकेश ने मिलकर जो गीतों की बरसात शुरू की थी, उसने मेरा नाम जोकर तक थकने का नाम नहीं लिया था। और जहां तक नाम का सवाल है, तो पृथ्वी थिएटर से शुरू इस कपूर परिवार के अभिनय का करिश्मा आज भी कायम है।

घराना गर्व और गौरव का विषय है, अच्छे घराने की बहू के लिए ही गृह लक्ष्मी जैसे विशेषणों का प्रयोग किया जाता था। राजघरानों में आज हम भले ही केवल होलकर और सिंधिया राजघरानों तक ही सिमटकर रह गए हों, लेकिन शास्त्रीय संगीत के घरानों की बात तो कुछ और ही है।।

नृत्य और संगीत हमें स्वर्ग की नहीं, गंधर्व लोक की देन हैं, सवाई गंधर्व और कुमार गंधर्व इनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आप मानें या ना मानें, संगीत के घरानों और राजघरानों का आपसी संबंध बहुत पुराना है। आइए कुछ संगीत घरानों की चर्चा करें।

भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो या अनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।।

घराना (परिवार, कुटुंब), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं। घराना शब्द हिंदी शब्द ‘घर’ से आया है जिसका अर्थ है ‘घर’। यह आमतौर पर उस स्थान को संदर्भित करता है जहां संगीत विचारधारा की उत्पत्ति हुई; उदाहरण के लिए, ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध कुछ घराने हैं: दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, इंदौर, अतरौली-जयपुर, किराना और पटियाला।

इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु व उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है। घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में से निम्न घराने शामिल होते हैं: आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला।

सबसे पुराना ग्वालियर घराना है। तानसेन भी ग्वालियर से ही आए थे। हस्सू हद्दू खाँ के दादा नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है। दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था।।

जरा इन गायकों और उनके घरानों पर भी गौर कर लिया जाए ;

१. मेवाती घराना : पंडित जसराज

२.पटियाला घराना : उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, बेगम अख्तर, निर्मला देवी और परवीन सुल्ताना

३. जयपुर अंतरौली घराना मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर और अश्विनी भिड़े।

४. किराना घराना: भीमसेन जोशी  

५. आगरा घराना : जितेंद्र अभिषेकी

इन घरानों की शुद्धता, मर्यादा और अनुशासन का पालन शिष्यों को भी करना पड़ता है। गुरु शिष्य परम्परा यूं ही फलीभूत नहीं होती।

ना मिलावट ना खोट यही शास्त्रीय संगीत की पहचान है। एक भी सुर गलत नहीं।

धारवाड़, कर्नाटक से आए, घराने की बंदिश से अपने को मुक्त रखते हुए, लोक संगीत को शास्त्रीय संगीत की ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले कुमार गंधर्व स्वयं अपने आपमें एक घराना हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४८ ☆ जबसे आया है हुनर ये शाइरी का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जबसे आया है हुनर ये शाइरी का“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४८ ☆

✍ जबसे आया है हुनर ये शाइरी का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

आशिक़ी समझी इबादत ख़ुश पयंबर हो गया

बर्फ जैसा इश्क़ के दरिया का आज़र हो गया

 *

जबसे आया है हुनर ये शाइरी का कुछ मुझे

बोलता हिंदी फ़िदा उर्दू पे जी भर हो गया

 *

होती थी वाइज़ की इज्ज़त  ख़ास पहले सच यहाँ

अब गिरा किरदार से तो जेल में घर हो गया

 *

था हवेली जैसा पहले भाइयों  में  जब बँटा

जाल दीवारों का मेरे घर के अंदर हो गया

 *

अब सियासत में शराफ़त का न कोई काम है

जिसको अय्यारी न आई है वो बाहर हो गया

 *

नाम होते जो नदी नाला न बन उफना रहा

अपनी हद में रहके वो दिल से समुंदर हो गया

 *

खैर दुनिया की नहीं इससे बचाये अब ख़ुदा

उस्तरा ले हाथ में हज्जाम बंदर हो गया

 *

देव देवों का नहीं ऐसे ही कहते है सभी

शिव पिया विष खैर-ए-आलम को महेश्वर हो गया

 *

जिसको अंतर है नहीं अपने पराये में कोई

अय अरुण यह मान ले अब वो कलंदर हो गया

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५३ – बीज… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बीज।)

☆ हेमंत साहित्य # ५३ ☆

✍ बीज… ☆ श्री हेमंत तारे  

स्वाभाविक है,

छूट जाये बहुत कुछ

किसी मोड़, किसी पड़ाव पर,

किसी खेल में

कहते हैं जिसे

आपाधापी,

रेलमपेल,

या फिर,

ट्रांसफर- प्रमोशन का जंजाल।

 

फिर अचानक,

फ़ूट पड़ती है

विस्मयकारी लहर की तरह

पीपल की एक कोंपल

फाड़ कर एक दीवार।

 

सहसा,

मरता नहीं है बीज

बस, दब जाता है

किसी दीवार में, किसी भार तले

पर कभी-कभी

कोंपल नहीं, बीज बन जाता है, जीवाश्म

और ऐसे भी करवा देता है

बीज

अपने कभी होने का एहसास।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६२ ☆ कथा-कहानी ☆ सफेद पोश संत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “सफेद पोश संत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६२ ☆

✍ कथा कहानी ☆ सफेद पोश संत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वे एक कवि व लेखक। पाठ्य पुस्तकों में उनकी कविताएं व लेख आदि पढ़ाए जाते। सबको बहुत अच्छे लगते थे। परंतु सुरेश उनके लेखन से बहुत प्रभावित था। उनके दर्शन पाने व उनके सानिध्य की बहुत इच्छा थी उसकी। सुरेश चाहता था उनकी तरह लेखक बने, परंतु बारहवीं में उत्तीर्ण न हो पाया। उसकी पढाई रुक गई। उसके भाई भी थोड़े निराश हुए क्योंकि वे उसे डॉक्टर बनाना चाहत रखते थे। इसीलिए फिजिक्स केमिस्ट्री और बायोलॉजी दिलाई थी आर्थिक स्थिति आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दे रही थी। बारहवीं में अच्छे् अंक आ जाते तो वजीफा वगैरह का सोचा जाता। इसलिए सोचा गया कि सुरेश नौकरी विशेष कर सरकारी नौकरी पाने के लिए कोशिश करे। उसने टाइपिंग व शार्टहैंड सीखना शुरू कर दिया क्योंकि उन दिनों सरकारी नौकरी के लिए टाइपिंग आना जरूरी था। कुछ महीने बाद उसे एक ट्रस्ट कार्यालय में स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर जॉब मिल गया।

सुरेश बहुत परिश्रमी था। जो भी काम दिया जाता वह पूरे मनोयोग से पूरा करता। जिस ट्रस्ट कार्यालय में सुरेश को जॉब मिला था उसका काम ट्रस्ट के संयुक्त सचिव और मैनेजर देखते थे। ट्रस्ट के ट्रस्टी बहुत बड़े बड़े लोग थे और ज्यादातर दिल्ली में रहते थे। ट्रस्ट की वार्षिक बैठक में ही सब आते थे।

ट्रस्ट की वार्षिक बैठक होने वाली थी तो सुरेश का काम बहुत बढ़ गया था। उसी समय उसने ट्रस्टियों की सूची देखी। तब उसे पता चला कि वियोगी जी ट्रस्ट के सचिव थे। वियोगी जी का सुरेश शुरू से ही प्रशंसक था। उसने मैनेजर साहब से अनुरोध किया कि किसी भी तरह उसे वियोगी जी से मिलवा दें। मैनेजर साहब ने कहा कि मुश्किल है फिर भी कोशिश करेंगे। बैठक वाले कक्ष में किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। कक्ष में जाते हुए उसने सबको देखा। वियोगी जी सफेद खादी के कुर्ते और धोती में अलग ही दिखते थे। बैठक चलती रही और मैनेजर साहब के साथ एकाउंटेंट, सुरेश व अन्य स्टाफ बाहर खड़े रहे। लंच के बाद सभी ट्रस्टी निकले और गाड़ी में बैठ कर अतिथि गृह चले गए। सुरेश वियोगी जी को प्रणाम भी नहीं कर पाया, इस बात का बहुत अफसोस था।

लेकिन उसका नसीब अच्छा था। वियोगी जी ने अपना एक पत्र टाइप करने के लिए बुलाया था। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पर मन में डर भी बना हुआ था कि कहीं टाइप करने में गलती न हो जाए। आखिरकार सुरेश वियोगी जी के कक्ष में गया और चरण स्पर्श किए। उन्होंने हाथ से लिखा पत्र दिया और साथ ही अपना लैटरपैड। पत्र टाइप करके वह वियोगी जी के पास आया तो टाइपिंग देखकर वे काफी खुश हुए और आशीर्वाद दिया। सुरेश ने कमरे से निकलते समय उन्हें पत्र लिखने की अनुमति ले ली। कमरे में उसने एक महिला को भी देखा तो उन्हें भी प्रणाम किया। वह समझा कि उनकी धर्मपत्नी होंगी।

दो तीन महीने बाद सुरेश ने वियोगी जी को पत्र लिखा कि वह कबीर को समझना चाहता है। साथ ही माता जी को भी प्रणाम लिख दिया। वियोगी जी का उत्तर आया कि कबीर साहब को समझने के लिए सत्यरूप परमेश्वर की उपासना करो। साथ ही उन्होंने लिखा कि तुमने माता जी किसके लिए लिखा, मेरे साथ मेरी गोद ली बेटी थी जो मेरी बहू भी है। मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ। सफेद पोश में संत हूँ। उनके बारे में पूरी जानकारी न होने के कारण सुरेश को अंदर ही अंदर दुख हुआ।

समाचार मिला कि वियोगी जी आने वाले हैं , यह जानकर सुरेश बहुत खुश हो गया। सुरेश से कहा गया कि जब वियोगी जी आ जाएँ तो अतिथि गृह में उनके कमरे में टाइपराइटर लेकर जाए और दिन भर वहीं काम करे। सुरेश ने उनकी दो पुस्तकें टाइप कीं। टाइप करते समय उन पुस्तकों का आनंद भी लेता रहा।

दोनों पुस्तकें टाइप हो गई और सुरेश ने टाइप किए हुए कागज सौंपे तो वियोगी जी ने दस रुपए दिए और कहा जाकर दूध पी लेना। सुरेश ने उनसे विनम्र शब्दों में कहा – “मैं यहाँ नौकरी करता हूँ वेतन लेता हूँ तो आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ”। उन्होंने उसके गाल पर हल्की सी चपत लगाई और कहा -“मेरा कहना नहीं मानोगे। ” सुरेश निरुत्तर हो गया और पैसे रख लिए। इतना प्यार इतने बड़े लेखक कवि से मिलना उसके लिए एक उपलब्धि ही थी।

वियोगी जी दिल्ली चले गए पर सुरेश को अंदर से बदल गए। उसके सोचने का ढंग बदल गया। कविता कहानी लिखने लगा। अपने अंदर इतना बदलाव महसूस करने लगा कि शब्दों में बताया नहीं जा सकता। वह स्वत: स्फूर्त बड़ों को चरण स्पर्श कर अभिवादन करने लगा, जाति की अवधारणा समाप्त हो गई। बड़े बड़े आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ने लगा। साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ने लगा। यह परिवर्तन उसके जीवन में स्थाई हो गया। जबकि घर और उसके आसपास ऐसा कोई माहौल नहीं था। बुढ़ापे में भी वियोगी जी की छवि अचानक उजागर हो जाती है और सुरेश दनक उठता है। उनकी वह बात कभी नहीं भूलता कि कबीर साहब को समझना है तो सत्यरूप परमेश्वर की उपासना करो।

एक और वजह है। एक वरिष्ठ साथी की बेटी को वनस्थली विद्यापीठ में प्रवेश दिलाना था क्योंकि अंक कुछ कम थे और ट्रस्टी अनुशंसा करें तो प्रवेश मिल सकता था। वियोगी जी ट्रस्टी थे यह सुरेश जानता था पर बिना मिले बहुत वर्ष हो गए थे, पता नहीं उन्हें याद भी होगा या नहीं। वरिष्ठ साथी के बार बार अनुरोध करने पर सुरेश दिल्ली गया और वियोगी जी के निवास पर पहुंच गया। अंदर एक स्लिप पर अपना नाम लिखकर भेजा तो वे अंदर से बोलते हुए आए कि सुरेश मेरा बेटा और अपने सब नाती पोतों को बुला लिया। सुरेश जानता था कि सफेद पोशाक में बाल ब्रह्मचारी संत हैं। एक बार बताया भी था कि उन्होंने एक हरिजन कन्या को गोद लिया और अपने परिवार के युवा से विवाह कराया और अपने पास ही रखा। वे बच्चे उन्हीं की संतान थे। जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए उनका यह कदम अतुलनीय था। सब देखकर सुरेश की आंखें भर आईं। जब सुरेश ने अपने आने का कारण बताया तो उन्होंने अपना लैटरपैड उसको दे दिया और कहा कि जो चाहो लिख लो मैं हस्ताक्षर कर दूंगा क्योंकि 85 का हो गया हूँ, अब लिख नहीं पाता। ऐसे सुनामधन्य हिंदी साहित्य में अपना विशेष स्थान रखने वाले वियोगी जी को सुरेश आज भी हृदय में संजोए रखता है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बोझिल रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रोमा और अरुण दोनों एक बड़ी नेशनल कंपनी में नौकरी करते थे। अनिल की मां का देहांत बचपन में ही हो गया था, मौसी ने ही पालपोस के बड़ा किया। पिताजी मर्चेंट नेवी में थे इसलिए अक्सर उन्हें बाहर ही रहना पड़ता था। मौसी ने ही मां पिताजी का प्यार दिया। मौसी बहुत ही धार्मिक एवं कम पढ़ी-लिखी महिला थी। अरुण ने अपनी मरजी से शादी की थी। रोमा भी उसके साथ काम करती थी और दोनों ने साथ में पढ़ाई भी की थी। मौसी के कारण ही दोनों की शादी हुई।वैसे तो मौसी शादी के सख्त खिलाफ थी।

शीशे के सामने बैठकर रोमा इसी विचार में खोई थी कि आज मौसी आ रही है, जाने अब क्या कहेगी?

उसके साथ तो 1 घंटे रहना भी मुश्किल है मैं कैसे रहूंगी?

तभी अचानक घंटी बजती है वह उठकर दरवाजा खोलती है-  “मौसी जी प्रणाम।”

“खुश रहो तुम। रोमा कुछ खाना भी बना कर रखा है पहले एक कप चाय पिला दो।”

“आप खाना खुद बना लेती हो” कमला मौसी ने कहा।

“अनिल को तो मैंने खाना बनाना सिखाया है। अनिल बनाता है या नौकर। तुम तो कुछ नहीं करती होगी?”

“मौसी जी आप मेरे हाथ की चाय पीजिए” रोमा ने कहा।

“चाय पीकर तुम दोनों तैयार हो जाओ आज तुम्हें एक शादी के कार्यक्रम में लेकर चलती हूं देखो हमारे यहां शादियां कैसी होती हैं?”

“मौसी जी जब आपको खाना नहीं खाना था तो हमसे क्यों खाना बनवा कर रखा” रोमा ने कहा।

“तो क्या हो गया” कमला मौसी ने कहा।

“यहां पर मैं अपनी सहेली के पोते की शादी में आई हूं तुम दोनों भी वहां चलो।”

रोमा ने कहा “मौसी मैं तो चलूंगी लेकिन क्या करूंगी वहां जाकर?”

कमला मौसी ने कहा “तू ठीक कह रही है अनिल मेरे साथ चलेगा तेरे बच्चे नहीं है इसलिए जाना अच्छा नहीं लगेगा।”

“मौसी यह कैसी बात कर रही हो” अनिल ने कहा।

“मैं कौन सा गलत बात कह रही हूं” कमला ने कहा “7 साल हो गए हैं कोई बच्चे नहीं है तुम्हारे।”

“तू ही यह रिश्ता ढो रहा है यदि मेरी सगी बहन होती तो उसकी बात तो मानता ना।”

रोमा की आंखों से आंसू निकलने लग गए और वह अंदर चली गई।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३११ ☆ पानगळ… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३११ ?

पानगळ ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

आता सुरुच झाली ऐकलेली पानगळ

कित्येक दिवसांची रोखलेली पानगळ

 *

हिर्वा ऋतू आला अंगणाच्या आतही

दिसली जरा उशिरा सांडलेली पानगळ

 *

 तो एकटा तीही एकटी या जीवनी

कोणास सांगे हे बेतलेली पानगळ

 *

 होतास तू तेव्हा कोणत्या रूपात रे

देवा तुझ्या दारी योजलेली पानगळ

 *

पानगळ होताना सावल्यांनो शांत व्हा

पाहून घ्या आता झोपलेली पानगळ

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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