(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – उजड़ा कुंज…।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!
🪷Online Yoga or In-Person Yoga? 🤔
☘️Two approaches, two different experiences🍁
Yoga has entered the digital age. Online yoga classes offer convenience, flexibility and privacy, while in-person yoga classes offer personal attention, human connection and closer guidance.
Neither is inherently right or wrong. The choice depends on what a practitioner seeks from yoga.
🏠 Online Yoga — Convenience & Flexibility
✔️ Convenient: Choose a suitable time and practise from the privacy and comfort of your home.
✔️ Accessible: There is no need to travel to a yoga studio, making it useful for people with busy schedules or limited mobility.
✘ Limited personal attention: In a large virtual class, it is difficult for the online yoga instructor to observe every practitioner and correct incorrect postures or movements.
✘ One approach for many: Classes are often structured around a common sequence. The same instruction may not be equally suitable for people of different ages, physical abilities or individual needs.
✘ Less personal connection: A screen can transmit instructions, but it cannot fully recreate the warmth, companionship and human bonding that develop in a physical class.
✘ The traditional dimension:The virtual format naturally misses much of the lived experience of the traditional guru–shishya relationship.
🧘 In-Person Yoga — Personalised & Relational
✔️ Individual attention: A smaller class enables the yoga teacher or guru to observe practitioners closely, correct their postures and guide them appropriately.
✔️ Personalised practice: A teacher who knows the practitioners can modify the practice according to their age, physical condition, limitations and individual needs.
✔️ Greater safety: Rather than expecting everyone to perform the same asanas, the teacher can advise a practitioner to avoid or modify practices that may be unsuitable for them.
✔️ Human connection: Meeting face-to-face creates opportunities for personal bonding, encouragement, friendship and a sense of community.
✔️ Living tradition: For many practitioners, learning in the physical presence of a teacher brings alive an important aspect of the ancient guru–shishya parampara—learning not merely through instructions, but through observation, correction, experience and personal guidance.
🌿 One Simple Way to Look at It
An online class can sometimes resemble a doctor prescribing the same medicine to a thousand patients: convenient and useful for many, but unable to account for every individual’s needs.
A good in-person yoga teacher, by contrast, can observe each practitioner, understand their limitations and prescribe a practice more suited to that individual.
The Bottom Line🍃
Online yoga offers convenience.
In-person yoga offers connection.
Online yoga offers accessibility.
In-person yoga offers personalisation.
For someone who already understands yoga, practises safely and needs flexibility, an online class can be an excellent option.
For someone seeking close supervision, personalised guidance, correction, companionship and the deeper teacher–student experience, a small in-person class may offer something that a screen cannot quite provide.
Ultimately, the best yoga class is the one that enables you to practise regularly, safely, mindfully and meaningfully. 🧘♀️🌿
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
☆ सुप्रसिद्ध कवि आचार्य भगवत दुबे की कृति – कांटे हुए किरीट ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(एक साहित्यिक मूल्यांकन)
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आचार्य भगवत दुबे हिन्दी के एक वरिष्ठ रचनाकार हैं। प्रचार प्रसार से दूर वे एक मौन साधक हैं और उन्होंने न केवल काव्य के कथ्य शिल्प को नये नये रुपों में संजाया संवारा है बल्कि महाकाव्य से लेकर मुक्तक -गजल तक को अपनी लेखनी का पाटल -स्पर्श। प्रदान किया है।
सुविख्यात कवि श्री नीरज की इस प्रभावी प्रतिक्रिया का उल्लेख किया था सुप्रसिद्व कवि श्री चन्द्रसेन विराट ने राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले श्रद्धेय कवि आचार्य भगवत दुबे की काव्य कृति कांटे हुए किरीट में। कवि चन्द्रसेन विराट ने कवि नीरज की इस बात का उल्लेख करते हुए अपनी मंगल कामनाओं में अपनी जो बात इस काव्य पुस्तक में शामिल की वह भी आचार्य जी के काव्य को महत्वपूर्ण सिद्ध करने के लिए काफी है। वे कहते हैं कि यह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, कथाकार कितनी दिशाओं में एक साथ रचनारत रहा है, यह जानकर सुधी पाठक चकित रह जाता है। इसी कृति में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य सृजन से प्रभावित होकर एक और राष्ट्रीय कवि श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने भी लिखा है कि कवि में अपनी कल्पनाओं को रुपक में डालने की विशेष प्रवृत्ति। दिखाई पड़ती है। भाषा में प्रवाह है और अच्छे प्रयोग देखने को मिलते हैं। उन्होंने लिखा है कि अधिकांश कविताएं उपदेशात्मक और शोषण, अन्याय एवं सांप्रदायिक संकीर्णता के विरोध में है। तदर्थ इन रचनाओं का विशेष महत्व है।
आचार्य जी की इस कृति में अधिकांश कविताएं कृषकों और ग्रामीणों के दैनिक जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित हैं। दरअसल आचार्य जी स्वयं भी गांव की सोंधी महक में पले बढ़े ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को न केवल अपने आस पास देखा है बल्कि उसे बड़ी गहराई से महसूस भी किया है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में यह बात बड़ी साफ तौर पर देखी जा सकती है। जैसे –
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न्याय मांगने, गांव हमारे, जब तहसील गये,
न्यायालय, खलिहान खेत, घर गहनें लील गये।
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और कवि जब ऐसी विषम परिस्थितियों से पीड़ित जनमानस को, परेशान देखता है तो अपनी कविता में आवेश मिश्रित सीख भी देता है –
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अहंकार, अन्याय रौंदता फिरे जहां जन जीवन को
हे धिक्कार, अनीति सहन करने वाले, नर यौवन को
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आचार्य जी की कविताओं में शोषण के प्रति चिंता तो है लेकिन वे निराश नहीं है। उनका आशावादी दृष्टिकोण उनकी कविताओं में साफ साफ नजर आता है –
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संकल्पों की दीप्त प्रभा से सुखद सवेरा लाना है,
लेकर नयी उमंग, निराशाओं का तिमिर हटाना है।
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गांवों की गरिमामयी संस्कृति और पावन संस्कारों का महत्व भी आचार्य जी की कविताओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, एक कविता में वे लिखते हैं –
पलक पांवड़े, जहां अतिथियों की
खातिर बिछ जाते हैं,
नगरवासियों चलो तुम्हें,
हम अपने गांव दिखाते हैं।
आचार्य जी को विरासत में मिले यही पावन संस्कार समाज के लिए प्रेरणा का विषय हो सकते हैं। जीवन में मातृ भक्ति का सिध्दांत उनके लिए सर्वोपरि था और इसकी झलक उनकी कविताओं में दिखाई देती है –
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टूटी कुटिया के भीतर जब शीश झुकाकर मैं जाता हूं,
मां के ममतालू चरणों में, मंदिर जैसा सुख पाता हूं।
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वर्ष 2001 में प्रकाशित राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक, और ग्रामीण परिवेश की 68 कविताओं के इस संग्रह में आचार्य जी की प्रेरक सोच वाली ऐसी काव्य रचनाएं शामिल हैं जो आज भी सामयिक और प्रासंगिक हैं तभी तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और पाथेय के संस्थापक स्व. डा. राजकुमार सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि- कवि आचार्य भगवत दुबे संस्कारधानी जबलपुर के ऐसे स्वनामधन्य साहित्य साधक हैं जिनके विविध वर्णी कृतित्व की यश सुरभि विंध्य -सतपुडा के शैल शिखरों को लांघ कर भारत व्यापिनी हो गयी है।
आज हम सभी गौरवान्वित हैं कि। श्रद्धेय सुमित्र जी की इस बात से पूरा साहित्यिक क्षेत्र सहमत है।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – सावन।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१६ ☆
☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – शर्मा जी का पार्किंग स्लॉट।)
☆ चुभते तीर # १२६ – व्यंग्य – शर्मा जी का पार्किंग स्लॉट ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
गुलमोहर अपार्टमेंट में पार्किंग स्लॉट A-102 कोई मामूली जगह नहीं थी। वह सोसायटियों की उस राजनीति का ताज थी, जिसके लिए लोग अपनी पुरानी गाड़ियों की डेंटिंग तक भूल जाया करते थे। शर्मा जी पिछले दो सालों से उस स्लॉट पर नज़र गड़ाए बैठे थे। वजह सीधी थी, वो जगह सीधे उनके फ्लैट की बालकनी के नीचे थी, जहाँ से वे अपनी नई चमचमाती सफेद कार पर चिड़ियों के हमले को दिन में तीन बार चाय की चुस्की के साथ मॉनिटर कर सकते थे।
समस्या सिर्फ इतनी थी कि उस जगह पर पिछले छह महीनों से एक पुरानी लावारिस साइकिल खड़ी थी। उस साइकिल का मालिक कौन था, यह बात पूरी सोसायटी के लिए किसी रहस्यमयी जासूसी उपन्यास से कम नहीं थी। गुप्ता जी कहते थे कि यह बिल्डर के किसी रिश्तेदार की है, तो वहीँ दूसरे तल्ले वाले वर्मा जी का दावा था कि इसमें कोई भूतिया साया बसता है क्योंकि हवा चलने पर उसकी घंटी अपने आप बज उठती थी।
शर्मा जी ने ठान लिया था कि इस रविवार को होने वाली सोसायटी जनरल बॉडी मीटिंग में वे इस मुद्दे को उठाएंगे और पार्किंग अपने नाम करवा कर ही दम लेंगे। पूरे हफ्ते उन्होंने भाषण की तैयारी की। मुहावरों को ऐसे पिरोया जैसे किसी कवि सम्मेलन का आलेख हो। रविवार को मीटिंग हॉल खचाखच भरा था। शर्मा जी अपनी कुर्सी पर इस ऐंठ के साथ बैठे थे जैसे कोई नया-नया चुना गया मंत्री सदन में प्रवेश करता है।
जैसे ही मीटिंग शुरू हुई, शर्मा जी ने अपना दुखड़ा रोना चालू कर दिया, “अध्यक्ष महोदय, वो सड़ती हुई पुरानी साइकिल हमारी सोसायटी की खूबसूरती पर वैसा ही दाग है जैसे किसी नई-नवेली दुल्हन की साड़ी पर दाल का धब्बा! अगर तीन दिन में उसका मालिक सामने नहीं आया, तो उस कबाड़ को फेंका जाए और वो जगह मुझे दी जाए।”
पूरी सोसायटी में फुसफुसाहट फैल गई। अध्यक्ष महोदय ने चश्मा सीधा करते हुए गंतव्य की ओर रुख किया और गंभीर आवाज़ में गार्ड को बुलाया, “रामसिंह, उस साइकिल को तुरंत हटाओ। क्या तुम्हें पता नहीं चला कि वो किसकी है?”
रामसिंह ने अपने दोनों हाथ जोड़े और बहुत ही मासूमियत से कहा, “साहब, वो साइकिल तो तीन महीने पहले हमारे सिक्योरिटी गार्ड्स के फंड से खरीदी गई थी। गुप्ता जी और वर्मा जी ने मिलकर पास किया था ताकि रात को पेट्रोलिंग आसानी से हो सके। और साहब, वो साइकिल शर्मा जी के ही लड़के ने पिछले महीने अपनी कार बैक करते वक्त ठोक दी थी, जिससे उसका चेन कवर जाम हो गया था। हम तो शर्मा जी की भलमनसाहत का इंतज़ार कर रहे थे कि वो कब उसकी मरम्मत करवाएंगे।”
पूरा मीटिंग हॉल सन्नाटे में डूब गया। शर्मा जी का चेहरा ऐसा लाल हो गया जैसे किसी ने गरमा-गरम जलेबी का सिरा उनके गालों पर मल दिया हो। अध्यक्ष महोदय नेमुस्कुराते हुए माइक उठाया और कहा, “तो तय रहा, शर्मा जी साइकिल की मरम्मत कराएंगे और पार्किंग में अपनी कार के साथ गार्ड की साइकिल भी पार्क करेंगे।”
सबके चेहरे पर मुस्कान तैर गई और पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। शर्मा जी ने भी धीमी सी मुस्कान के साथ ताली बजाई, यह सोचते हुए कि पार्किंग तो नहीं मिली, लेकिन जिम्मेदारी का बिल ज़रूर फाड़ दिया गया।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शेर और शेर दिल…“।)
अभी अभी # १०७२ ⇒ आलेख – शेर और शेर दिल श्री प्रदीप शर्मा
शेर तो खैर जंगल का राजा है, और उसका दिल शेर का दिल ही कहलाएगा। हर इंसान जो शेर दिल होता है, किसी राजा से कम नहीं होता। एक शायर भले ही शेर कहता हो, लेकिन उसका दिल कभी शेर दिल नहीं होता। जिसका दिल बार बार टूटे, उसे आप शेर दिल नहीं कह सकते।
शेर दिल को आप दरिया दिल तो कह सकते हैं, लेकिन kind hearted, यानी दयालु नहीं कह सकते। जो आसानी से पिघल जाए, वह कैसा दिल। जिसका दिल दरिया दिल के साथ मजबूत भी हो, वही शेर दिल कहलाने का अधिकारी होता है।
बहादुर बच्चे गिरने पर रोते नहीं, किसी से मार खाने पर घर आकर मम्मी से शिकायत नहीं करते। पूरा हिसाब बराबर करने के बाद ही विजयी मुस्कान लिए घर लौटते हैं, और उनके घर लौटने के पहले ही उनकी बहादुरी के किस्से घर पहुंच जाते हैं। ऐसे होते हैं शेर बच्चे।।
शेर का दिल किसी बच्चे का दिल नहीं होता। एक शायर दिवाना हो सकता है, एक शेर का दीवानगी से क्या काम। हमने नहीं सुना, किसी शेर ने कभी किसी को दिल दिया हो। एक मदारी भले ही पब्लिक में बंदर बंदरिया को रस्सी से बांधकर नचा ले, उनकी शादी करा दे, सर्कस में भी शेर, शेर ही होता है। उसे नचाने के लिए भी हंटर की जरूरत पड़ती है। वैसे असली शेर आजकल जंगल में नहीं संसद में दहाड़ते हैं, जिनकी दहाड़ आज तक में भी सुनी जा सकती है।
कल विश्व शेर दिवस था। हम जंगल तो नहीं जा पाए, लेकिन संसद में कल एक शेर दो घंटे तेरह मिनिट तक दहाड़ा, किसी भी शेर का यह विश्व रेकॉर्ड है। मैने देखा, उसने देखा, सबने देखा, कहां देखा, टीवी पर देखा, अपने मोबाइल में देखा।।
एक शायर बदनाम हो सकता है, लेकिन उसके शेर का भी बहुत नाम होता है। शेर कभी चरित्रहीन नहीं होते, कोई सुंदर हिरनी कभी उसे अपने जाल में नहीं फांस सकती। वह शेर दिल होता है, दिल फेंक नहीं। वह किसी को दिल नहीं देता, उसका कलेजा चीर देता है।
हमने कभी शेर को घास खाते नहीं देखा। गुजरात के गिर में कुछ सफेद शेर होते हैं, जो खेतों में भी घूमते पाए जाते हैं, एक खोजी फोटोग्राफर का तो यह भी कहना है कि ये सफेद शेर इतने शांत होते हैं कि इन्हें वहां मशरूम भी
खाते देखा गया है। हमारे कल के एंग्री यग मैन महानायक और आज के शेर दिल, केबीसी के बिग बी आपको यदा कदा गुजरात आने का निमंत्रण दिया करते हैं।।
अगर आपकी वास्तविक शेर में रुचि हो तो जंगल में नहीं, भारतीय संसद में जाएं, जहां एक अकेला सब पर भारी है और अगर आपकी रुचि शेर दिलों में है तो हमारे पंजाब आइए। यहां आपको शेर, सिंह, सभी मिलेंगे।
जितने शेर आज जंगल में नहीं हैं, उतने सिंह हमारे अकेले पंजाब में हैं और सभी जाबांज, शेरदिल। यहां के सभी सिंह आपको भांगड़ा करते नजर आएंगे। ये सभी सिंह जंगल में मंगल ही करते हैं, दंगल नहीं। अगर ये सिंह गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं तो मुल्क के लिए अपना शीश कटाते भी हैं। इनके राज में कोई प्राणी भूखा नहीं सोता, इनका लंगर सबके लिए है। सेवा ही इनकी सीख है, समर्पण ही इनकी सीख है, बलिदान ही इनकी सीख है, मुल्क की रक्षा ही इनकी सबसे बड़ी सीख है।।
जो निर्भय है, निडर है, अपने मुल्क की रक्षा में सक्षम है, वही सच्चा शेर है। आज शेर दिल लायंस क्लब में नहीं, बहादुर इंसानों में पाये जाते हैं, जो खुद भी चैन से रहते हैं, और सबके अमन चैन की चिंता करते हैं। शेर बनें, शेर दिल बनें, भीगी बिल्ली नहीं ..!!
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरे भीतर…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३६ ☆
कविता – मेरे भीतर… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
☆
किसने रखे हैं कदम इस चमन में,
पत्थर भी खिल के फूल हो गए हैं…
कुछ आहट है पहचानी सी,
वीरानियां भी खोकर, मधुमास हो गई है…
क्या हुआ जो आसमान से गिरने वाली यह बूंदें,
आजकल क्यों मोतियों की लड़ी होने लगी हैं…
बहुत लंबी, धनी काली रात, का साया…
अंधियारी को चीर कर किरणें नाचने लगी हैं…
यह कमजोर लरजते भीगे पंख,
हिम्मत करके ये छोटी चिरैया, पंख फड़फड़ाने लगी है…
यह कदमों की आहट, यह मधुमास का होना…
यह मोतियों की लड़ी, ये नाचती हुई किरणें…
यह छोटी सी चिड़िया की, बड़ी सी हिम्मत…
ये सब तो मेरे भीतर है, आंखें बाहर क्या खोजने लगी हैं??