(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके “साप्ताहिक स्तम्भ -साहित्य निकुंज”के माध्यम से आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की एक हृदयस्पर्शी कविता “माँ तुम याद बहुत आती हो ”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 13 साहित्य निकुंज ☆
☆ माँ तुम याद बहुत आती हो ☆
माँ तुम याद बहुत आती हो
बस सपने में दिख जाती हो.
पूछा है तुमसे, एक सवाल
छोड़ गई क्यों हमें इस हाल
जीवन हो गया अब वीराना
तेरे बिना सब है बेहाल
कुछ मन की तो कह जाती तुम
मन ही मन क्यों मुस्काती हो ?
माँ तुम याद बहुत आती हो
बस सपने में दिख जाती हो .
मुमुझमे बसती तेरी धड़कन
पढ़ लेती हो तुम अंतर्मन
तुमको खोकर सब है खोया
एक झलक तुम दिखला जाती .
जाने की इतनी क्यों थी जल्दी
हम सबसे क्यों नहीं कहती हो?
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से आप प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का एक आलेख जिसमें उन्होंने समाज की एक हृदयविदारक परंपरा ऑनर किलिंग पर अपनी बेबाक राय रखी है. साथ ही उन्होंने आह्वान किया है कि कैसे समाज में इस बुराई को दूर कर एक सकारात्मक समाज की स्थापना की जा सकती है. आदरणीया डॉ मुक्त जी का आभार एवं उनकी कलम को इस पहल के लिए नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 15 ☆
☆ ऑनर किलिंग ☆
‘ऑनर किलिंग’ विपरीतार्थक शब्द… सम्मान-पूर्वक मृत्यु, अर्थात् समाज का एक घिनौना सत्य…जो सदियों से हर जाति, हर मज़हब के लोगों में प्रचलित है। प्रश्न उठता है, ‘आखिर यह प्रथा आई कहां से?’ शायद इसका जन्म हुआ मानव में निहित सर्वश्रेष्ठता के भाव से, उसके अहं से, उसके ग़ुरूर से। यह वह दुर्भाव अर्थात् दूषित भाव है, जो मानव को मानवता से कोसों दूर ले जाता है। उसकी संवेदनाएं मर जाती हैं और वह ठूंठ मात्र रह जाता है, क्योंकि संवेदन- शून्य व्यक्ति हृदयहीन, दैवीय गुणों से विहीन…स्नेह, सौहार्द, ममता,त्याग, सहानुभूति आदि की भावनाओं से बहुत दूर…अहंलीन मानव दूसरों के अस्तित्व को नगण्य समझता है।
वह घर-परिवार में एकछत्र साम्राज्य चाहता है, यहां तक कि वह अपने आत्मजों को भी अपनी सम्पत्ति- धरोहर स्वीकारता है तथा आशा करता है कि वे कठपुतली की भांति उसका हर हुक्म बजा लाएं… उसके हर आदेश की अनुपालना तुरंत करें।’ नो’ व ‘असंभव’ शब्द उसके शब्दकोश से नदारद होते हैं। उसमें प्रत्युत्तर सुनने का सामर्थ्य नहीं होता। वह शख्स अजीब होता है…जो अपने से अधिक बुद्धिमान, सामर्थ्यवान व शक्तिशाली किसी दूसरे को नहीं समझता।
सब परिवारजन उसकी अमुक प्रवृत्ति से सदैव परेशान रहते हैं। उसके घर आते ही बच्चे इधर-उधर छिप जाते हैं और पत्नी का चेहरा भी भय से कुम्हला जाता है क्योंकि वह नहीं जानती कब वह उस पर अकारण बरसने लगे?और उसके माता-पिता भी उसके व्यवहार के प्रति आशंकित रहते हैं क्योंकि वह किसी भी पल सीमाओं को लांघ सकता है। वह किसी भी पल, किसी को कटघरे में खड़ा कर सकता है।
चलिये! अब बच्चों की नियति पर चर्चा करते हैं… किस मन:स्थिति में वे उस घर में रहते हैं, जहां पिता, पिता नहीं, एक हिटलर की मानिंद सदैव व्यवहार करता है। बच्चों को वह अपनी संपत्ति समझता है और उन्हें अपने अंकुश में रखना चाहता है। बच्चों को उसकी हर गलत बात को सही कहना पड़ता है क्योंकि दूसरे पक्ष की बात सुनने का धैर्य उसमें होता ही नहीं। बच्चे उसे अपनी नियति स्वीकार, सुंदर कल की कल्पना में खोए रहते हैं कि आत्मनिर्भर होने के पश्चात् उन्हें वह सब नहीं सहना पड़ेगा…वे निरंकुश व स्वछंद हो जाएंगे तथा अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने में स्वतंत्र होंगे।
परंतु वह समय आने से पूर्व, यदि बेटा या बेटी,किसी को चाहने लगते हैं, प्रेम करने लगते हैं, तो सुनामी की गगनचुंबी लहरें उस घर की शांति व सुख चैन को समाप्त कर देती हैं, लील जाती हैं। उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है और वह लातों व घूसों पर उतर आता है। बेटी को तो वह घर की चारदीवारी में कैद कर लेता है और उससे मोबाइल आदि भी छीन लिया जाता है। वह मासूम दीवारों से सिर टकराती, आंसू बहाती, बार-बार ग़ुहार लगाती रहती है कि वह उसके साथ अपना जीवन बसर करना चाहती है। वह दिल की गहराईयों से उसे पसंद करती है और उसके बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती।
परंतु उसकी आवाज़ उसके कानों से टकरा कर लौट आती है। यदि वह कभी उससे जिरह करने का साहस जुटाती है, तो उस पर पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं और कुलनाशिनी, कुलक्षिणी कहकर उसे ही नहीं, उसकी मां को भी लताड़ा जाता है। जब जुल्म की इंतहा हो जाती है तो अक्सर वह उन ज़ंजीरों को तोड़ कर भाग निकलती है,जहां वे स्वतंत्रता से सुख की सांस ले सके।
इसके पश्चात् अक्सर उस घर में हंगामा व गाली- ग़लौच होता रहता है और वह ज़ालिम हर पल आसमान को सिर पर उठाए डोलता रहता है। उसके मन में यही ख़लिश रहती है कि यदि वह एक बार उसके सामने आ जाए, तो वह उसे अपनी ताकत का एहसास दिला कर सुक़ून पा सके। पिता होने से पहले वह हिटलर है। वह किसी भी सीमा तक जा सकता है और यही ‘शक्ति-प्रदर्शन’ है ऑनर किलिंग।
लड़की का पिता व परिवारजन अपने-अपने मान- सम्मान की दुहाई देते हुए उन दोनों की हत्या पर अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने बच्चों को जन्म देकर कोई एहसान नहीं किया और न ही वे गुलाम हैं उनकी सल्तनत में…सो! वे उससे मनमाने व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
प्रेम सात्विक भाव है…प्रेम सामीप्य का प्रतिरूप है …एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए क़रीब लाने का उपादान है। प्रेम संगीत है…प्रेम उच्छ्वास है … प्रेम वह पावन भाव है, जो मलय वायु के झोंकों सम शीतलता प्रदान करता है। परंतु जन्मदाता ही बच्चों में प्रेम का भाव प्रकट होते ही उनके दुश्मन क्यों बन जाते हैं? क्या झूठा अहं व मान-सम्मान बच्चों की ज़िन्दगी से अधिक अहमियत रखता है? शायद उनकी नज़रों में प्रेम करना ग़ुनाह है, जिसका मूल्य उनके आत्मजों को अपने प्राणों की बलि देकर ही चुकाना पड़ता है।
चलिए! इन कट्टरपंथी विचारधारा वाले माता-पिता के व्यवहार पर दृष्टिपात कर लें…आजकल तो वे स्वयं को ख़ुदा स्वीकारने लगे हैं क्योंकि वे अपनी इच्छानुसार बच्चों को जन्म देते हैं, अन्यथा भ्रूण हत्या करवा देते हैं और बच्चों के युवा होने पर उनकी भावनाओं को न समझते हुए उनकी हत्या तक कर डालते हैं। क्या आप ऐसे सिरफिरे लोगों को ख़ुदा से कम आंकेंगे?
यह कहावत आजकल मान्य नहीं है कि जन्म व मृत्यु तो सृष्टि-नियंता के हाथ में है। मानव उसके हाथों का खिलौना मात्र हैं। वह जितनी सांसें लिखवा कर इस संसार में जन्म लेता है, उससे एक सांस भी अधिक नहीं ले सकता। अरे! यह इक्कीसवीं सदी है… परंपरागत मान्यताएं बदल गई हैं… सोच भी पहले सी कहां है? शायद! वह ज़ालिम पिता यह सोचकर फूला नहीं समाता कि उसने ही उसे जन्म दिया था, तो उसे मार कर, उसकी जान लेकर उसने कोई गुनाह नहीं किया।
विभिन्न प्रदेशों में खापें इस विचारधारा की पक्षधर हैं, पोषक हैं। युवाओं को अपनी इच्छानुसार विवाह करने का अधिकार प्रदत्त नहीं है। वे कुल-गोत्र, जात-बिरादरी की मर्यादा पर अधिक ध्यान देती हैं और उनकी हत्या करने को उचित ठहराती हैं। आश्चर्य होता है यह देख कर कि अनेक वर्ष तक साथ, एक छत के नीचे ज़िन्दगी बसर कर रहे पति- पत्नी को, भाई-बहन के रूप में राखी बांधने का फरमॉन स्वीकारना पड़ता है। तभी उन्हें व उनके माता-पिता को जात-बिरादरी व गांव से निष्कासित कर दिया जाता है, तो कभी उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जातीं हैं।
परन्तु आज कल कुछ सुखद परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। चंद खापों का मृत्यु-भोज की परंपरा का विरोध करना या विवाह पर डी•जे• आदि न चलाने की पेशकश, दहेज न लेने-देने की मुहिम आदि उन की सकारात्मक सोच की ओर संकेत करते हैं। परंतु आवश्यकता है… खापें व समाज के ठेकेदार, बच्चों को अपनी इच्छानुसार जीवनसाथी चयन करने की स्वतंत्रता प्रदान कर, उदार हृदयता का परिचय दें। उनके विरुद्ध मनमाने निर्णय ले, बेतुके व विचित्र फरमान जारी न करें।
ऑनर किलिंग यदि एक की होती है, तो दोनों परिवार सकते में आ जाते हैं… उनमें मातम पसर जाता है…. क्योंकि वे एक-दूसरे के अभाव में जीने की कल्पना भी नहीं कर पाते। यह आघात दोनों परिवारों की खुशियों को समूल नष्ट कर देता है, सुनामी की लहरों की भांति लील जाता है। प्रेम प्रतिदान का दूसरा रूप है। यह देने का नाम है। सो! यदि समाज के रसूख-दार लोग बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करें तथा मनचाहे जीवनसाथी को वरण करने का अधिकार प्रदान करें ताकि वे प्रसन्नता से अपना जीवन बसर कर सकें। वे उनकी भावनाओं का तिरस्कार न करें, यही जीवन की सार्थकता है। आइए! मिलकर जीवन में नया उजाला लाएं। एक स्वर्णिम सुबह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। सारी सृष्टि उपवन की भांति महक रही है,जहां चिर वसन्त है। हम भी मनोमालिन्य मिटाकर, प्रेम भाव से एक नए युग का सूत्रपात करें, जहां सम्बन्धों की गरिमा व अहमियत हो…स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाओं के स्थान पर हम अलौकिक प्रेम व अनहद नाद की मस्ती में खो जाएं।
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. हम श्री संतोष नेमा जी के ह्रदय से अभारी हैं जिन्होंने हमारे आग्रह को स्वीकार कर “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” के लिए रचनाएँ प्रेषित करना स्वीकार किया है. हमें पूर्ण विश्वास है कि “इंद्रधनुष” को पाठकों का स्नेह /प्रतिसाद मिलेगा और उन्हें इस स्तम्भ में हिंदी के साथ ही बुंदेली रचनाओं को पढनें का इंद्रधनुषीय अवसर प्राप्त होगा. आज प्रस्तुत है वर्षा ऋतु पर एक सामयिक बुंदेली कविता “फूटी मेड़ें बही क्यारी “. अब आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़ सकेंगे . )
(समाज , संस्कृति, साहित्य में ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले कविराज विजय यशवंत सातपुते जी की सोशल मीडिया की टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं । इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं। आज श्री विजय जी ने एक गंभीर विषय “सिग्नल का भारत” चुना है। हम प्रतिदिन सिग्नल पर जी रही दुनिया और लोगों को देखते हैं किन्तु, न तो हम उन लोगों के लिए कुछ विचार करते हैं और न ही शासन। ऐसे ही गंभीर विषयों पर आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे। )
दारिद्रय रेषेखालील जनता म्हणजे हा सिग्नलवरचा भारत. ज्यांना अन्न, वस्त्र आणि निवारा या मूलभूत गरजा देखील स्वायत्त तेने भागवता येत नाहीत अशी कुटुंबे. भीक मागणारी मुले म्हणून त्यांची उपेक्षा होत रहाते. फुटपाथ वर पथारी पसरून किंवा एखाद्या झाडाच्या आडोश्याने यांचा संसार सुरू होतो. असे बेघर जगणे आणि यातून जन्माला येणारी नवी पिढी, जीवन संघर्ष करताना व्यसनाधीन आणि गुंडगिरी याकडे मोठ्या प्रमाणावर वळत आहे
सिग्नलवर राहणाऱ्या लोकांच्या समस्या सामाजिक व्यवस्थेशी झगडा करीत समाघास घातक ठरत आहेत. जीवनाश्यक मुलभूत गरजा, शिक्षण, संस्कार यांचा अभाव, पुरेश्या सेवा सुविधा उपलब्ध नसताना, उघड्यावर थाटलेले संसार प्रदुषण, दैन्य, चोरी मारी यांना खतपाणी देताना दिसतात.
प्रथमत: सर्व दारिद्रय रेषेखालील लोकांना रोजगार उपलब्ध करून देण्यासाठी महापालिका स्तरावर विशेष उपाय योजना राबविण्यात यायला हव्यात. रस्त्यावर बेवारसपणे फिरणारे हे लोक यांची ठोस व्यवस्था व्हायला हवी. भीक मागून जगायचे आणि पुरेशी भीक मिळाली नाही की चोरी करायची ही वृत्ती बळावत चालली आहे.
रोजगार निर्मिती आणि मुलभूत गरजा उपलब्ध करून दिल्यास हा समाज उपेक्षित रहाणार नाही. फुटाथवर राहणाऱ्या लोकांसाठी स्वत:चा हक्कांचे घर मिळेल. उघड्यावर मांडलेला संसार त्यांना स्वतःच्या पायावर उभे करेल. शिक्षण मोफत आणि विशिष्ट ठिकाणी अशा लोकांना निवारा उपलब्ध करून दिल्यास सार्वजनिक ठिकाणी होणारे दैन्य प्रदर्शन आपोआप थांबेल. भीक मागायला मनाई करून रोजगार उपलब्ध करून दिल्यास बरेच परीवर्तन घडून येईल.
सिग्नलवरील अनाथ मुलांस अनाथश्रम तसेच अंध, वृद्ध अपंगांना महापालिकेने विशिष्ट ठिकाणी आसरा द्यायला हवा. सामाजिक कार्यकर्ते यांच्या मदतीने त्यांना विशेष सेवा उपलब्ध करून देता येईल. ज्यांना मुलेबाळ नाही अशा सधन कुटुंबातील व्यक्तींनी अशी मुले दत्तक घेतल्यास हे मागासलेपण दूर होईल.
माणसाने माणसाला मदतीचा हात देऊन त्यांचा सांभाळ करणे उत्तम शिक्षण व संस्काराची प्रेरणा अंतरी रुजवणे गरजेचे झाले आहे. भीक देणे बंद केले की माणूस आपोआप रोजगार शोधून स्वतःच्या उदरनिर्वाहचे साधन शोधेल. काम करणा-या व्यक्तीला मदत करणे गैर नाही पण भिकारी जमात पोसणे हे मात्र पाप आहे.
प्रत्येक व्यक्तीस तो निराधार नाही, भिकारी नाही, माणूस आहे, भारतीय नागरिक आहे ही जाणीव करून दिल्यास ती व्यक्ती स्वतःचे आयुष्य मार्गी लावू शकेल. सदर व्यक्ती रोजगार निर्मिती करेपर्यंत मुलभूत सेवा सुविधा दिल्यास ती व्यक्ति समाजात स्वतःचे स्वतंत्र अस्तित्व निर्माण करू शकेल.
भीक मागण्या पेक्षा भीक देणे हा गुन्हा आहे ही भावना मनात ठेऊन केलेली मदत सेवा कार्य खूप मोलाचे ठरेल. धडधाकट व्यक्तीला कष्टाची कामे करायला लावून अर्थार्जन उपलब्ध करून दिल्यास भीकारी संख्या कमी होईल. जेंव्हा भीक देणे बंद होईल तेव्हाच ही जमात स्वयंरोजगार उपलब्ध करून स्वतःच्या पायावर उभे राहिल.
शेवटी व्यक्ती घडली की कुटुंब घडते. कुटुंब घडले की समाज सुधारतो, समाज घडला की देशाची प्रगती होते हे सत्य विसरून चालणार नाही.
(प्रस्तुत है डॉ रवीन्द्र वेदपाठक जी की सुधाकरी काव्य रचना गणेश स्तवन . यह कविता मन स्पर्शी साहित्य मंच द्वारा आयोजित राज्यस्तरीय *सुधाकरी* काव्य रचना स्पर्धा के लिए भी समर्पित है.)
हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
षष्ठम अध्याय
( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण )
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।।3।।
योगेच्छुक मुनि के लिये,कारण होता कर्म
योगारूढ उसी का पर कारण होता शम।।3।।
भावार्थ : योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।।3।।
For a sage who wishes to attain to Yoga, the action is said to be the means; for the same sage who has attained to Yoga, inaction (quiescence) is said to be the means. ।।3।।
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
(श्री सदानंद आंबेकरजी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है।गायत्री तीर्थशांतिकुंज, हरिद्वारके निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 सेनिरंतर प्रवास।
हम श्री सदानंद आंबेकर जीके आभारी हैं जिन्होंने श्री गणेश विसर्जन से सम्बंधित हमारी परम्पराओं के साथ ही पर्यावरण पर अपनी पैनी दृष्टी डालते हुए इस विचारात्मक आलेख की रचना की है. )
☆ अथ श्री गणेश व्यथा ☆
भाद्रपद पूर्णिमा की सुबह, मंगलमूर्ति गणपतिजी कैलाश पर महाकाल शंकर जी के समक्ष बैठे हुये थे। चेहरा म्लान, शरीर क्लांत दिखाई दे रहा था। पास ही मूषकराज भी शरीर को झटक झटक कर सुखाने का उपक्रम करते दीख रहे थे।
भगवान आशुतोष ने माता पार्वती की ओर गहरी दृष्टि से देखा और गणपतिजी से पूछा- क्या बात है वत्स ? उल्लासित नहीं दिख रहे हो ?
वे आगे कुछ और पूछते इतने में मंगलमूर्ति व्यग्रता से बोल उठे- पिताजी मुझे यह हर वर्ष धरती पर कब तक जाना होगा?
भोलेनाथ- क्यों क्या हो गया? धरती पर तो तुम्हारा बड़ा स्वागत सत्कार होता है। फिर ?
गणनाथ – स्वागत और सत्कार ? पिताश्री अब आज धरती पर झांक कर देखिये, मेरी प्रतिमायें सिरविहीन, भुजाविहीन, भग्रावस्था में जलाशयों के किनारों पर पैरों तले पड़ी मिलेंगी।
भोलेनाथ – अच्छा … ऐसी अवमानना . . . मैं अभी डमरू बजा दूँ तो चहुँ ओर प्रलय आ जायेगी।
गणपति- रहने दीजिये पिताजी, धरती पर मेरी प्रतिमाओं की स्थापना के पास मानव निर्मित वृहदाकार ध्वनि विस्तारक यंत्रों का शोर आप दस दिनों तक अहर्निश सुनेंगे तो अपने डमरू और शंख रुद्र की ध्वनि को भूल जायेंगे। कुछ दिन तक तो आपको बधिरता लगेगी। उफ्फ, आप स्वागत-सत्कार की बात कह रहे थे, पहले दिन तो खूब धूमधाम से मेरा स्वागत होता है, भजन, आरती, नारे लगते हैं पर अगले दिन से मानव न मालूम कौन सी वाणी में गीत बजाता है, मुझे तो कुछ समझ नहीं आता है। सायंकाल में महिला पुरुष भक्त दर्शनों को आते हैं, तो मेरे स्थापना करने वाले भी एकदम संत प्रकृति के हो जाते हैं, पर रात्रि बढने पर वे ही आपकी सेना के भूत पिशाचों की श्रेणी में आकर मदिरापान करने लगते हैं और आपके महाप्रलय की शैली में अबूझ नृत्य करते हैं।
मुझे अर्पित किया गया प्रसाद भी न मालूम किस पदार्थ का होता है, बड़ा अप्रिय लगता है, और दान का धन भी न जाने कहाँ चला जाता है। धरती पर विद्युत ऊर्जा अतिशय अपव्यय मैं देखता हूँ। पिताश्री, यह यंत्रणा दस दिनों तक मैं सहता हूँ।
दसवें दिन फिर मुझे बड़े आदर के साथ विसर्जन हेतु जुलूस में ले जाया जाता है और किसी जलाशय, समुद्र के तट पर ले जाकर जयकारों के साथ अत्यंत गंदे जल में विसर्जित किया जाता है। जल में मैं देखता हूँ, नाना प्रकार के जलचर बड़े घबराये हुये से भागते दिखाई पड़ते हैं और वह जल भी, उफ्फ . . कितना गंदा होता है। पिताजी , उनके जयकारों में वे कहते हैं- अगले बरस तू जल्दी आ, आप ही बताईये मैं फिर क्या करने जाऊँ? कहाँ है भक्ति, श्रद्धा, समर्पण एवं आदर्श के प्रति प्रेम? मुझे बताईये पिताजी, क्या पुण्यात्मा लोकमान्य तिलक जी से स्वर्ग में मेरी भेंट हो पायेगी ?? मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि उन्होंने किन पवित्र उद्देश्यों को लेकर मोहल्ले में सार्वजनिक गणेश उत्सव की परम्परा आरम्भ की थी?
पिताश्री, मेरी पीड़ा आप स्वयं भी समझ सकते हैं, जब श्रावण में कांवड यात्रा रूपी हुडदंग में आपकी घोर अवमानना होती है। अगले माह मेरी स्नेहमयी माताजी को भी नवरात्रि में धरती पर जाना होता है, मैं तो कहूँगा कि वे भी इस विषय में एक बार सोच लें।
यह सब सुनकर भगवान पशुपतिनाथ को अतिशय क्रोध आ गया और वे आवेश में खड़े होकर गर्जना करने लगे- जाग, जाग, जाग, मानव जाग।
दूर कहीं से आवाज आ रही थी उठो, उठो, उठो और अचानक जोर का धक्का लगा तो मेरी नींद झटके से खुल गई और देखा, पिताजी मुझे झकझोर कर कह रहे थे- अरे निकम्मे, विसर्जन करके रात देर में आया, अब कब तक सोयेगा, चल उठ और काम पर लग जा।
(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday Ms. Neelam Saxena Chandra ji is Executive Director (Systems) Mahametro, Pune. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “Pandu’s sons”. This poem is from her book “Tales of Eon)
☆ Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 7 ☆
☆ Pandu’s Sons☆
Cursed by Rishi Kindima
Into the realms of the forest, Pandu retired
The news of pregnant Gandhari
In him, the desire to have a son fired.
Seeing him desolate and murky
His dutiful wife, Kunti consoled
“For his wife to bear another man’s child,”
She said, “The law of Dharma allowed”.
“Let me call a Rishi,” said Pandu
“Let us call a Deva,” Kunti stated
Blessed by Rishi Durvasa, she had a boon;
The knowledge made Pandu elated.
Pleased by Kunti’s solution
First to be invoked was Lord Yama
She gave birth to Yudhishtra
Who would be the upholder of Dharma
Next to be summoned was the God of wind
Of all Gods, most powerful and mightiest
And thus was born courageous Bhima
Who, one day, would be the strongest
And then, blessings were sought
From Indra, King of all Devas, who ruled the sky
Arjuna, the valiant archer was born
He became Kunti’s favourite by and by
And then, Kunti could invoke no more
Four were the maximum allowed
Pandu thought for a few days and then
For Madri, his second wife, implored
The Ashwini twins were invoked for Madri
The Lord of morning and evening stars
Nakula, the handsomest man was born
Along with his twin, with knowledge of near and far
Pandu, thus had five sons
Together, they came to be as Pandavas known
Had the wisdom of ‘King perfect’ collectively
Honesty, strength, skill, beauty, and wisdom they honed
(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)
(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )
☆ संजय दृष्टि – समुद्र मंथन ☆
…समुद्र मंथन क्या एक बार ही हुआ था?
…. फिर ये नित, निरंतर, अखण्डित रूप से मन में जो मथा जा रहा होता है, वह क्या है?… विष भी अपना, अमृत भी अपना! राक्षस भी भीतर, देवता भी भीतर!… और मोहिनी बनकर जग को भरमाये रखने की चाह भी भीतर!
(यह विडम्बना है कि – हम सिनेमा की स्मृतियों को तो बरसों सँजो कर रखते हैं और रंगमंच के रंगकर्म को मंचन के कुछ दिन बाद ही भुला देते हैं। रंगकर्मी अपने प्रयास को आजीवन याद रखते हैं, कुछ दिन तक अखबार की कतरनों में सँजो कर रखते हैं और दर्शक शायद कुछ दिन बाद ही भूल जाते हैं। कुछ ऐसे ही क्षणों को जीवित रखने का एक प्रयास है “रंगमंच स्मृतियाँ “। यदि आपके पास भी ऐसी कुछ स्मृतियाँ हैं तो आप इस मंच पर साझा कर सकते हैं।
इस प्रयास में सहयोग के लिए श्री अनिमेष श्रीवास्तव जी का आभार। साथ ही भविष्य में सार्थक सहयोग की अपेक्षा के साथ – हेमन्त बावनकर)
☆ रंगमंच स्मृतियाँ – “न चीनी कम ना नमक ज़्यादा” – श्री अनिमेष श्रीवास्तव ☆
* निर्देशकीय *
नियति है.. अकेलापन.. ।
आना भी अकेले और जाना भी…. इससे दूर रहने के लिए इंसान ने ख़ूब उपाय किये । समाज बनाया, रीति-रिवाज बनाये, नियम बनाया, क़ानून बनाये.. कि सभ्य और सुसंस्कृत रूप से जी सके.. मगर फिर भी अकेलेपन से निजात नहीं पा सका.. क्योंकि वह इसकी जड़ में अपने मूल स्वभाव.. अहंकार को कभी समझ ही नहीं पाया ।
अहंकार जिसके ना रहने पर प्रेम होता है, प्रेम क़रीब लाता है । उसके अभाव में लोगों से घिरे रहने के बावजूद भी मनुष्य तनहा है। अनगिनत संबंधों की डोर से जुड़ा होने पर भी जो सिरा उसके पास है वह अकेलेपन का ही है…।
मनोवैज्ञानिक और तथाकथित सामाजिक रूप में संबंधों (दोस्त, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी के संबंध) की महती आवश्यकता हर इंसान की ज़रूरत है। यह रिश्ते मानसिक जीवन के भरण-पोषण के लिए अवश्यम्भावी हैं। दोस्त के रूप में मां-बाप, भाई-बहन या अन्य कोई भी बाहरी, प्रेमी-प्रेमिका के रूप में किसी भी आदर्श व्यक्ति या अपने ही किसी संबंधी की छवि जो पति-पत्नी के चयन में भी परिलक्षित होती है, के लिए मन खेल खेलता है और अपने मुताबिक ना होने पर खुद को छला महसूस करता है । मन का ये भ्रमण विलास और खोजते रहने की प्रवित्ति ही मानव जीवन का सत्य है ।
दुरूह है यह जानते हुए भी इंसान ने जीवन को स्वाभाविक ढंग से जीना शुरू किया और अपने सबसे बड़े गुण, बुद्धि का इतना विकास किया कि उससे अविष्कृत सुख-सुविधा में दुःख (जो मूल रूप में अकेलापन है, उसे) भूलने का छल भी अपने से किया ।
दिवा-स्वप्नों को जीते हुए इंसान अपने जीने के कारणों को तलाश रहा है और जीता चला जा रहा है।
मनुष्य अकेला है मगर उजागर नहीं है । दर्शन का उपयोग और शास्त्र का प्रयोग उसके अकेलेपन का बचाव है ।
प्रस्तुत नाटक में मानवीय अकेलापन सीधे-सीधे तो परिलक्षित नहीं होता मगर हास्य के क्षणों को, जो नाटक में हैं, हम देखें तो उसका दर्शन अवश्य होता है ।
यह एक मनोवैज्ञानिक नाटक है । एक एकाकी अविवाहित महिला जो जीने के कारणों को स्वप्न-दिवास्वप्न में तलाशती है । उसके यह सपने तो कभी पूरे नहीं होते किन्तु उसकी संपूर्णता की चाह ही उसके जीने का सबब हैं।
शारीरिक ज़रूरत कई समस्याओं की जड़ है लेकिन उसकी पूर्ति किसी समस्या का हल भी नहीं है।
नाटक की मुख्य पात्र मीरा के अकेलेपन का एक कारण लीबीदो है, जो जैविक मनोवैज्ञानिक कारण जैसे व्यक्तित्व और तनाव, और सामाजिक कारक जैसे काम और परिवार से प्रभावित होता है। इसके अलावा चिकित्सीय स्थितियों, जीवन शैली, रिश्ते के मुद्दों और उम्र से भी अपना स्वरूप ग्रहण करता है ।
मनुष्यों में अंतरंग संबंधों के निर्माण और निर्वहन में यौन इच्छाएं अक्सर एक महत्वपूर्ण कारक होती हैं।
ऐसे ही लीबीदो से वशीभूत होकर मीरा के जीवन में किसी एक दिन तीन लोगों का आगमन होता है । यह लोग उसके मनःस्थिति में बसे संबंधों के आदर्श रूप प्रस्तुत करते हैं । उनमें से एक दोस्त है, एक हीरो रूप (प्रेरणा) और तीसरा प्रेमी । इनसे दो-चार होकर उसे खुशी भी मिलती है और नैराश्य भी। इस खुशी और नैराश्य के पीछे लीबीदो ही है।
क्या खुशी और नैराश्य एक स्वप्न है ? सिर्फ लीबीदो ?
निर्णय आपका है !
मंच पर
मीरा – आस्था जोशी
सोनू – सोनू चौहान
अरुण – सतीश मलासिया
हरीशंकर – सौरभ लोधी
मुरली मनोहर – पीयूष पांडा
कुली – आशुतोष मिश्रा
(नाटक “न चीनी कम ना नमक ज़्यादा” के लिए यह पेंटिंग नाटक के सेट डिजाइनर चैतन्य सोनी जी ने बनाया था। चैतन्य ने इस नाटक के लिए ना सिर्फ सेट डिजाइन किया, बल्कि वस्त्र-विन्यास भी उन्ही का था, जिसके लिए उन्होंने एक पूरी शर्ट भी पेंट किया। इसके अलावा नाटक में मेकअप भी उन्ही का था।)
मंच परे
मंच व्यवस्थापक – आशुतोष मिश्रा
मंच परिकल्पना एवं निर्माण – चैतन्य सोनी / अक्षिका यादव
मंच सामाग्री – सोनू चौहान
वस्त्र विन्यास – चैतन्य सोनी
रूप सज्जा – चैतन्य सोनी
प्रचार प्रसार – भगवती चरण
विडियो फोटो – कृष्णा गर्ग
प्रकाश परिकल्पना – मुकेश जिज्ञासी
मूल लेखक – मोहित चट्टोपाध्याय
हिन्दी अनुवाद – समर सेनगुप्ता
संगीत संकलन – अंकित शिरबावीकर
संगीत संचालन – अभिषेक सिंह राजपूत
सहयोगी कलाकार – चन्द्र कुमार फाये, पीयूष तिवारी, अक्षिका यादव
परिकल्पना एवं निर्देशन – अनिमेष श्रीवास्तव
मार्गदर्शक – मुकेश शर्मा
* निर्देशकीय संस्मरणात्मक अभिव्यक्ति *
समान्तर नाट्य संस्था, भोपाल के कलाकारों के साथ पिछले एक महीने से रंगमंचीय कार्यशाला करने का अनुभव ले रहा हूँ… सिखाया क्या हूँ कुछ नहीं, बल्कि खुद जाने कितनी चीज़े सीख गया हूँ। नए और जवान प्रशिक्षु लबरेज़ होते हैं अनगढ़ खूबसूरती से जिसे आकार देने की ज़िम्मेदारी किसी पुराने को दी जाती है। मैं पुराना नहीं हूँ बल्कि मुझ से नया और कोई नहीं, मगर फिर भी एक दिन श्री मुकेश शर्मा सर ने कहा कि आइए और हमारे कलाकारों के साथ कुछ काम कीजिये। मैं गया साहब। कलाकारों से मिला। बातें-वातें की । कुछ खेल खेले। कभी नाचे तो कभी रेंके । कभी पढ़ने लगे तो कभी एक्सरसाइज़ की। अपने तथाकथित सीखे को उनके तथाकथित नौसिखियेपन से जोड़ा, हिलाया, मिलाया, और जब सबने मिलकर खूब पसीना बहाया तब जाके रिजल्ट में निकला यह प्रहसन। जिसे मोहित चट्टोपाध्याय जैसे महान लेखक ने बांग्ला में ‘गनधोराजेर हाथताली’ नाम से रचा था मगर हिंदी में हमारे लिए जिसका अनुवाद वरिष्ठ रंगकर्मी श्री समर सेनगुप्ता जी ने किया । जबलपुर में रहने वाले समर दा अभिनय और निर्देशन के अलावा लेखन में भी दखल रखते हैं और उनका यह अनुवाद अच्छा बन पड़ा है ।
इधर मुकेश सर की बेशकीमती सलाहियत से नाटक के कई कमज़ोर पक्षों को मजबूती मिली तो कहानी और साफ हुई।
मूल बांग्ला से अनुदित इस नाटक की हिंदी में संभवतः यह पहली प्रस्तुति है ।
यह कक्षा अभ्यास प्रस्तुति महज परिदृश्य है उसका जिसे इन कलाकारों ने कार्यशाला के दौरान समझा है और जाना है। कितना जाना है इसे तो आपका अवलोकन ही बेहतर बयान कर सकेगा।