English Literature – Poetry – ☆ Bequest ☆– Ms Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

☆ Bequest ☆

(Ms. Neelam Saxena Chandra’s  poem “Bequest”  will definitely compel you to think that how dark night and dark side of life follows like a ghost for whole life, particularly in dark.  Still, I find a silent message to struggle with present for the future.)

 

So peaceful was her life,

The sea provided her a peaceful calm;

The waves were lovely and soothing

Having a composed charm…

 

Suddenly it was dark

The albatross shrieked;

There were wild tremors

Jeopardy reeked…

 

Life changed for her

In the fraction of a second,

There was water and water

And then everything blackened…

 

The enchanting sea

Engulfed her near and dear ones;

The waves which had been tranquil erstwhile

Suddenly became destructive like dragons…

 

As she was helplessly watching the destruction,

There was a loud uproar-

One particular large wave jumped at her

And she was dragged ashore…

 

The harbour waves kept

Pushing and pulling her;

But she kept holding on

Like a providential survivor…

 

Although she could endure and live on,

She still feels hapless and sad-

Her near and dear ones

Have left for the other world and are dead…

 

The sea has given her a bequest

She does not want to remember at all;

The waves: they still come and go

But she no more listens to their call…

 

The ghosts of the past

Shall live on with her forever;

Life shall normalize and she may forget it in the daylight

But the silent night shall make her remember it forever…

 

© Ms Neelam Saxena Chandra

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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – ? मी एक मनस्वी ? – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

?मी एक मनस्वी ?

(सुश्री प्रभा सोनवणे जी  हमारी  पीढ़ी की एक ज्येष्ठ मराठी साहित्यकार हैं । उनका यह  संस्मरण  आलेख/संस्मरण निश्चित ही हमारी समवयस्क पीढ़ी को अस्सी  के दशक के दिन याद दिला देगा। )

मनस्वी, अविचाराने, अव्यवहार्य असं मी अनेकदा वागलेली आहे.

आई वडिलांची भीती वाटायची, धाक होता. खरंतर चाकोरीबध्द आयुष्य असायला हवं होतं, पण मी चाकोरी बाहेरचे अनुभव घेतले,आठवीत असताना मुली म्हणाल्या कुठेतरी सहलीला जाऊ, एक मैत्रीण म्हणाली, “हिच्या शेतावर जाऊ” – म्हणजे माझ्या, आई परवानगी देणं शक्य नव्हतं, मैत्रिणीच्या शेतावर, जवळच जाणार असं सांगितलं, आमचं गाव, शेत पंधरा किलोमीटर होतं, एसटी नं जावं लागणार होतं जवळ कंपासबॉक्स साठी वडिलांनी दिलेले पैसे होते ते खर्च केले, ट्रीप चा आनंद घेतला, सहाजणी गेलो होतो, सहल छान झाली, त्या सहलीवर आशा देव नावाच्या आमच्या मैत्रिणीने कविताही केली, अर्थातच संध्याकाळी आईला समजलं, बोलणी खावी लागली, पण एक वेगळा अनुभव घेतला!  लग्न अतिशय जुन्या मताच्या घरात झालं, हातात बांगड्या, डोक्यावर पदर!  मैत्रिणीबरोबर ब्युटीपार्लर मध्ये गेले तिथे ब्युटीशियन म्हणाली, कुरळ्या केसांसाठी बॉयकट बेस्ट, मैत्रीण म्हणाली तिच्या घरी चालणार नाही!पण मी एक दिवस जाऊन बॉयकट करून आले, पण स्ट्रीक्टली डोक्यावर पदर घेऊन वावरले! १९८३ सालची गोष्ट!

कवितेमुळे बाहेरचं जग दिसलं, बॉयकट, बांगड्या न घालणं याला मान्यता मिळाली….म्हणजे कुणी नावं तरी ठेवली नाहीत! कवितेच्या कार्यक्रमांना जाणं हे माझ्यासाठी दिव्यच होतं, विरोध पत्करून बाहेर पडले!

येरवड्याच्या शाळेत नोकरी साठी अर्ज करा,नंतर सुट्टीत बी.एड.करा असे एका सुहृदाने सुचवलं! पण जिद्द, महत्वाकांक्षी काहीच नव्हतं,

पुढे स्वतःचा दिवाळी अंक सुरु केला तिथेही चिकाटी कमी पडली, पुढे एका मोठ्या अंकाच्या संपादकाने स्वतः फोन करून संपादकीय विभागात आमंत्रित केलं, दोन महिने बिनपगारी काम केले, पैसे त्यांनी दिले नाहीत मी मागितले नाहीत, हा अव्यवहारीपणा!

पण त्याची खंत वाटली नाही, तो एक चांगला अनुभव होता, बस रिक्षाचे पैसे अक्कल खाती जमा!

अविचाराचे अनेक प्रसंग घडले, पण मी हे स्वतःच मान्य करते मी आळशी आणि बिनमहत्वाकांक्षी बाई आहे त्या मुळे *जो मिल गया उसीको मुकद्दर समझ लिया*

स्वतः कष्ट करून अर्थार्जन करायला हवे होते असे वाटते कधी तरी, पण फार खंतही वाटत नाही! कारण तसं सुखवस्तू आयुष्यच वाट्याला आलं कुठलं ही चॅलेंज नसलेलं!

माझ्या इतर जावांपेक्षा माझं आयुष्य वेगळं आहे, फक्त घरात रमले असते तर आयुष्य वेगळं झालं असतं,    मी शिस्तबद्ध, गृहकृत्यदक्ष, संसारी अजिबात नाही, पण गृहिणीपद ब-यापैकी सांभाळले, रांधा वाढा उष्टी काढा इती कर्तव्य अजूनही चालूच आहेत!

माझी एक कविता आहे,

मी नाही कुणाची

यशोमय गाथा,

मी एक मनस्वी,

मुक्त छंदातली कविता !

© प्रभा सोनवणे, पुणे

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (40) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वितीय अध्याय

साँख्य योग

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )

(कर्मयोग का विषय)

 

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते ।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

किये गये हर कर्म का होता कभी न नाश

थोड़ा सा भी धर्म नित करता पाप विनाश ।।40।।

भावार्थ :   इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है।।40।।

 

In this there is no loss of effort, nor is there any harm (the production of contrary results or transgression). Even a little of this knowledge (even a little practice of this Yoga) protects one from great fear. ।।40।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

 

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Practice Yoga ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)

Practice Yoga

 

Mrs. Radhika Bisht

Founder: LifeSkills

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com
Courtesy – Shri Jagat Singh Bisht, LifeSkills, Indore

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English Literature – Poetry – ☆ Woman ☆– Ms Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

☆ Woman ☆

(Ms. Neelam Saxena Chandra’s  poem “Woman”  will definitely compel you to think not only “woman’s emotions” but “Woman Power” too.  Amazingly scripted.)

 

Everyone thought that I am a breeze

Flowing gently over hills and vales,

Regaling all those who come my way,

Revitalizing those whose heart ails.

 

Air, that I am, I have various shapes

And the tender breeze was just one form;

When time summons me to rise,

My own strength I outperform.

 

Stronger and stronger I blow and blow

Stirring all those who come my way;

Affection does win me over anytime

But arrogance makes me harder sway.

 

The more the hostility, the more my outburst,

My anger then assumes the form of tempest;

Crushing everything that comes in my path,

Submerging the vast cities and the forests…

 

I am a woman

The way you perceive me, a reflection you shall see;

If you love and admire me, I shall be a gentle breeze,

If you downcast me, I shall rise like a phoenix!

 

© Ms Neelam Saxena Chandra

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ पार्टियों में कोहराम ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

☆ पार्टियों में कोहराम ☆

(लोकतन्त्र के महापर्व पर डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी का एक  सामयिक एवं सटीक व्यंग्य।)  

 

पार्टियों में इस वक्त भगदड़ का आलम है।सब तरफ बदहवासी है।बात यह हुई कि एक पार्टी ने जन-जन की प्यारी, दर्शकों की आँखों की उजियारी, परम लोकप्रिय ठुमका-क्वीन और जन-जन के प्यारे, दर्शकों के दुलारे झटका -किंग को फटाफट पार्टी में शामिल करके लगे-हाथ चुनाव का टिकट भी पकड़ा दिया है।चुनाव का टिकट एकदम ठुमका-क्वीन और झटका-किंग की पसंद का दिया गया है ताकि उन्हें जीतने में कोई दिक्कत न हो।तबसे उनके क्षेत्र के उनके भक्त टकटकी लगाए बैठे हैं कि कब भोटिंग हो और वे अपने दुलारे कलाकारों की सेवा में अपने भोट समर्पित करें।

विरोधी पार्टियों वाले बदहवास दौड़ रहे हैं। लगता है जैसे कोई बम फूट गया है। बुदबुदा रहे हैं—–‘दिस इज़ अनफ़ेयर। हिटिंग बिलो द बेल्ट।हाउ कैन दे डू इट?’

विरोधी पार्टियों के वे उम्मीदवार परेशान हैं जो ठुमका-क्वीन और झटका-किंग के चुनाव-क्षेत्र से खड़े होने वाले हैं।आँखों में आँसू भरकर कहते हैं, ‘भैया, हम जीत गये तो मूँछ ऊँची होना नहीं है और अगर हार गये तो नाक कट कर यहीं सड़क पर पड़ी दिखायी देगी।नाक पर रूमाल रखकर चलना पड़ेगा।अगली बार पता नहीं पार्टी टिकट दे या नहीं।कहाँ फँस गये!’

सभी दूसरी पार्टियों ने अपने सीनियर कार्यकर्ताओं को आदेश जारी कर दिया है कि तत्काल जितनी ठुमका-क्वीन और जितने झटका-किंग राज्य में मिल सकें उन्हें भरपूर प्रलोभन देकर झटपट पार्टी में ससम्मान शामिल करायें। उन्हें तुरंत उनकी पसंद का चुनाव टिकट नज़र किया जाएगा। इस काम के लिए हर पार्टी ने दो दो हेलिकॉप्टर मुकर्रर कर दिये हैं ताकि काम तत्काल हो और दूसरी पार्टी वाले क्वीनों और किंगों को झटक न लें।

ज़्यादा बदहवास उस पार्टी के उम्मीदवार हैं जिसने सबसे पहले क्वीन और किंग को अपने पाले में खींचा है। क्वीन और किंग के चुनाव -क्षेत्र से जिनको टिकट मिलने की उम्मीद थी उनकी नींद हराम है। वे बड़े नेताओं के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं——-‘सर, यह क्या किया? हमारे चुनाव-क्षेत्र का टिकट क्वीनों और किंगों को दे दिया तो हम कहाँ जाएंगे? सर, हम तीस साल से पार्टी की सेवा कर रहे हैं। तीन बार लगातार चुनाव जीते हैं।’

जवाब मिलता है, ‘जीते हो तो लगातार मलाई भी तो खा रहे हो। कौन सूखे सूखे सेवा कर रहे हो। पंद्रह साल में आपकी संपत्ति में जो बरक्कत हुई है उसकी जाँच करायें क्या?’

बेचारा उम्मीदवार बगलें झाँकने लगता है।

बड़े नेताजी समझाते हैं, ‘सवाल ‘विन्नेबिलिटी’ का है।हमें किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है।क्वीन और किंग की पापुलैरिटी जानते हो?एक ठुमका मारते हैं तो सौ आदमी गिर जाता है। दो तीन लाख भोट तो आँख मूँद के आ जाएगा। आपकी सभा में तो सौ आदमी भी इकट्ठा करने के लिए पाँच सौ रुपया और भोजन का प्रलोभन देना पड़ता है। पार्टी की भलाई का सोचो। सत्ता हथियाना है या नहीं?’

उम्मीदवार आर्त स्वर में कहता है, ‘सर, यही हाल रहा तो एक दिन सदनों में कोई पालीटीशियन नहीं बैठेगा। सब तरफ किंग और क्वीन ही दिखायी पड़ेंगे। तब कैसा होगा, सर?’

नेताजी कहते हैं, ‘तो आपकी छाती क्यों फटती है? सदन में सुन्दर और स्मार्ट चेहरे दिखेंगे तो आपको बुरा लगेगा क्या? एक अंग्रेज लेखक हुए हैं—-आस्कर वाइल्ड। उन्होंने एक जगह लिखा कि सुन्दर चेहरे वालों को ही दुनिया पर राज करना चाहिए। सदनों में सुन्दर चेहरे रहेंगे तो दर्शक सदन की कार्यवाही देखने में ज़्यादा दिलचस्पी लेंगे। सदन में सदस्यों की उपस्थिति भी सुधरेगी। हम जो कर रहे हैं समझ बूझ के कर रहे हैं। ज़्यादा टाँग अड़ाने की कोशिश न करें। हमको इनडिसिप्लिन की बातें पसंद नहीं हैं।’

उम्मीदवार अश्रुपूरित नयनों के साथ विदा हुए।

 

© कुन्दन सिंह परिहार
जबलपुर (म. प्र.)

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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ? सूर्यास्त ? – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

 

? सूर्यास्त ?

 

का भिडतो हा अस्त जिवाला

नित्य पडते कोडे मनाला

का घ्यावा अस्ताचा ध्यास

अन का रूजवावा मनी ऊर्जेचा -हास

 

सतत तळपत्या सूर्यालाही

का बघावे होतांना म्लान

क्षितिजाआड दडणा-या बिंबाचे

का ऐकावे मूक गान

 

मूक  गहिरी रंगछटा

व्यापी भूतल, चराचरास

आसमंती अन् जळी घुमती

भैरवीचे सूर उदास

 

चैतन्याच्या ह्या सम्राटाचे

घायाळ करी अस्तास जाणे

सांजसावल्यांसवे कातरवेळीचे

मंदमंद पदरव हे जीवघेणे

 

उदयास्ताची मैफल

अनोख्या रंगात रंगलेली

जन्ममृत्युच्या अटळतेची

कहाणी क्षितिजावर कोरलेली

 

©  सौ. ज्योति हसबनीस

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (39) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वितीय अध्याय

साँख्य योग

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )

(कर्मयोग का विषय)

 

एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।

बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥

 

सांख्य योग यह,सुन जरा बुद्धियोग की बात

सुन अर्जुन! जिससे न हो तुझे कोई व्याघात।।39।।

 

भावार्थ :  हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा॥39॥

 

This which  has  been  taught  to  thee,  is  wisdom  concerning  Sankhya.  Now  listen  to wisdom concerning Yoga, endowed with which, O Arjuna, thou shalt cast off the bonds of action!

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

 

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Positive Education: Teaching well-being to Young People ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)

Positive Education: Teaching well-being to Young People

Positive education pairs traditional schooling with positive psychology interventions to improve well-being.
Positive education is based on the science of well-being and happiness.

Positive Education is an approach to education that blends academic learning with character and well-being. It prepares students with life skills such as: grit, optimism, resilience, growth mindset, engagement, and mindfulness amongst others.
Positive education views school as a place where students not only cultivate their intellectual minds, but also develop a broad set of character strengths, virtues, and competencies, which together support their well-being.
Positive education is a whole-school approach to student and staff well-being: it brings together the science of positive psychology with best-practice teaching, encouraging and supporting individuals and communities to flourish.
Positive Education focuses on specific skills that assist students to strengthen their relationships, build positive emotions, enhance personal resilience, promote mindfulness and encourage a healthy lifestyle.
Positive Education brings together the science of Positive Psychology with best practice teaching to encourage and support individuals, schools and communities to flourish. We refer to flourishing as a combination of ‘feeling good and doing good’.
In consultation with world experts in positive psychology and based on Seligman’s PERMA approach, the Geelong Grammar School developed its ‘Model for Positive Education’ to complement traditional learning – an applied framework comprising six domains: Positive Relationships, Positive Emotions, Positive Health, Positive Engagement, Positive Accomplishment, and Positive Purpose. This model has been augmented with four fundamental active processes that underpin successful and sustained implementation of positive education: Learn It, Live It, Teach It, and Embed It.
Widespread support is necessary for the success of the positive education movement.
Jagat Singh Bisht

Founder: LifeSkills

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com
Courtesy – Shri Jagat Singh Bisht, LifeSkills, Indore

 

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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ ठगी ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक 

☆ ठगी ☆ 

(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत यह लघुकथा  भारत के लोकतन्त्र के महापर्व  “चुनाव” की पृष्ठभूमि  पर  रचित कटु सत्य को उजागर करती है। )

“काय कलुआ के बापू, इत्ती देर किते लगाये दई । वा नेता लोगन की रैली तो तिनै बजे बिला गई हती ना । दो सौ रुपैया तो मिलइ गए हुइहें?”

रमुआ कुछ देर उदास  बैठा रहा, फिर उसने बीवी से कहा – “का बताएं इहां से तो वो लोग लारी में भरकर लेई गए थे और कही भी हती थी कि रैली खतम होत ही दो सौ रुपइया और खावे को डिब्बा सबई को दे देहें, मगर उन औरों ने हम सबई को ठग लऔ। मंत्री जी की रैली खतम होवे के बाद ठेकेदार ने खुदई सब रुपया धर लओ और हम  सबई को धता बता दओ । हम  ओरें  शहर से गांव तक निगत निगत आ रए हैं । लौटत में बा लारी में भी हम औरों को नई बैठाओ । बहुतै थक गए हैं । आज की मजूरी भी गई और कछु हाथे न लगो,अब तो तुम बस एकइ लोटा भर पानी पिलाए देओ – ओई से पेट भर लेत है ।”

रमुआ की बीवी ऐसे ठगों को बेसाख्ता  गाली बकती हुई अंदर पानी लेने चली गई ।

 

© डॉ . प्रदीप शशांक 
37/9 श्रीकृष्णपुरम इको सिटी, श्री राम इंजीनियरिंग कॉलेज के पास, कटंगी रोड, माढ़ोताल, जबलपुर ,म .प्र . 482002

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