सुश्री आरूशी दाते
तो फक्त प्राजक्त होता…
(प्रस्तुत है सुश्री आरूशी दाते जी की एक शाश्वत प्रेम पर भावप्रवण कविता।)
तो फक्त प्राजक्त होता…
(प्रस्तुत है सुश्री आरूशी दाते जी की एक शाश्वत प्रेम पर भावप्रवण कविता।)
श्रीमद् भगवत गीता
पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
द्वितीय अध्याय
साँख्य योग
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
(सांख्ययोग का विषय)
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।22।।
जीर्ण वसन ज्यों त्याग नर , करता नये स्वीकार
त्यों ही आत्मा त्याग तन नव गहती हर बार।।22।।
भावार्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।22।।
Just as a man casts off worn-out clothes and puts on new ones, so also the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others that are new. ।।22।।
© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर
मो ७०००३७५७९८
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

Shri Jagat Singh Bisht
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)
Video Link >>>>>>
The headstand is one of the most important yogic asanas. The inversion in the final pose brings a rejuvenating supply of blood to the braincells.
सुश्री प्रभा सोनवणे “कात्यायनी”
चिट्ठियाँ
(प्रस्तुत है ज्येष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री प्रभा सोनवणे जी की भावप्रवण कविता “चिट्ठियाँ “)
अक्सर हमे मिलने आती है चिट्ठियाँ
चाहत भरे नगमे गाती है चिट्ठियाँ
आहट तुम्हारे पैरों की जब आती है
खबर कोई मीठी लाती है चिट्ठियाँ
चिठ्ठी नही यह तो मेरी धडकन ही है
दर्द कितने सनम छुपाती है चिट्ठियाँ
छोडा हमारे ख्वाबों को तन्हाँ तुमने
यादे तुम्हारी संजोती है चिट्ठियाँ
वादा कभी कोई करके भुला भी दे
आँसू बहाती है रोती है चिट्ठियाँ
रौनक’ प्रभा’ तुमने माँगी अंधेरोंसे
किस्मत यहाँ पर चमकाती है चिट्ठियाँ
© प्रभा सोनवणे”कात्यायनी”
गणराज ,135/2 सोमवार पेठ पुणे 411011 (महाराष्ट्र)
मोबाईल -9270729503
सुश्री मीनाक्षी भालेराव
चार मराठी कविताएँ
(सुश्री मीनाक्षी भालेराव जी की भारतीय परिवेश में स्त्री की पहचान उजागर करती हृदयस्पर्शी कविताएँ।)
१)
आई म्हणायची ,
आपल्या मुलींवर कधी हात टाकू नये.
लक्ष्मी रुसते.
आज सगळीकडे
दारिद्य्र वाढतंय,
महागाई वाढतेय,
कारण
आज देशात ठिकठिकाणी
मुलींना मारले जातंय .
२)
शेजाऱ्यांच्या घरात भिंत उभी राहिली आहे आताशा .
असे वाटतंय , त्यांची मुले कमवू लागली आहेत आताशा .
ज्या आईवडिलांनी हौसेने बांधलं होते घर
ते वृध्दआश्रम गले आहेत आताशा .
शेजाऱ्यांच्या घरात भिंत उभी राहिली आहे आताशा .
असे वाटतंय , त्यांची मुले कमवू लागली आहेत आताशा .
३)
लहानपणी आईपासून
नाईलाजाने दूर राहावे लागले होते ,
तेव्हा आई मला नेहमी
पत्र पाठवत असे.
आज खूप वर्षे झाली
आई जाऊन.
तेव्हापासून तिची ती पत्रेच
बनली आहेत आई !
४)
पूर्वी कच्चे असायचे राखीचे धागे
पण नाती असायची पक्की.
आज अगदी मजबूत असतात राखीचे धागे
पण नाती मात्र बनत आहेत तकलादू .
जेव्हापासून आईवडिलांच्या मृत्युपत्रात
मुलीलाही मिळू लागला वाटा
तेव्हापासून माहेरी भाऊ-वहिनीच्या प्रेमाच्या
राहून गेल्या कथा .
श्रीमद् भगवत गीता
पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
द्वितीय अध्याय
साँख्य योग
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
(सांख्ययोग का विषय)
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।21।।
अविनाशी अज सतत जो,उसका कहाँ विनाश
उसके मारण-मरण का झूठा है विश्वास।।21।।
भावार्थ : हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?।।21।।
Whosoever knows Him to be indestructible, eternal, unborn and inexhaustible, how can that man slay, O Arjuna, or cause to be slain? ।।21।।
© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर
मो ७०००३७५७९८
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

Shri Jagat Singh Bisht
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)
Video Link >>>>>>
Laughter and meditation are not opposites. Laughter opens a beautiful door to transcendence. Laughter meditation is one of the most intense and beautiful experiences that you can ever have.
ई-अभिव्यक्ति: संवाद–10
मेरे जैसे फ्रीलान्स लेखक के लिए अपने ब्लॉग के लेखकों / पाठकों की संख्या का निरंतर बढ़ना मेरे गौरवान्वित होने का नहीं अपितु, मित्र लेखकों / पाठकों के गौरवान्वित होने का सूचक है। यह सब आप सबके प्रोत्साहन एवं सहयोग का सूचक है। साथ ही यह इस बात का भी सूचक है कि इस चकाचौंध मीडिया और दम तोड़ती स्वस्थ साहित्यिक पत्रिकाओं के दौर में भी लेखकों / पाठकों की स्वस्थ साहित्य की लालसा अब भी जीवित है। लेखकों /पाठकों का एक सम्मानित वर्ग अब भी स्वस्थ साहित्य/पत्रकारिता लेखन/पठन में तीव्र रुचि रखता है।
अन्यथा इस संवाद के लिखते तक मुझे निरंतर बढ़ते आंकड़े साझा करने का अवसर प्राप्त होना असंभव था। अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि 15 अक्तूबर 2018 से आज तक 5 माह 9 दिनों में कुल 542 रचनाएँ प्रकाशित की गईं। उन रचनाओं पर 360 कमेंट्स प्राप्त हुए और 10,000 से अधिक सम्माननीय लेखक/पाठक विजिट कर चुके हैं।
प्रतिदिन इस यात्रा में नवलेखकों से लेकर वरिष्ठतम लेखकों और पाठकों का जुड़ना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
सबसेअधिक सौभाग्य के क्षण मैं आपसे साझा करना चाहता हूँ।
इस जबलपुर प्रवास के दौरान मुझे अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण एवं स्मरणीय क्षणों को सँजो कर रखने का अवसर प्राप्त हुआ।
प्रथम डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र” जी से आशीर्वचन स्वरूप उनकी साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ।
दूसरा संयोग बड़ा ही अद्भुत एवं आलौकिक था। इस संदर्भ में बेहतर होगा कि मैं उस वाकये को सचित्र आपसे साझा करूँ जो कि सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी की फेसबुक वाल से साभार उद्धृत करना चाहूँगा।
ऐसे व्यक्तिगत एवं आत्मीय क्षणों में मेरी प्रतिकृया मात्र यह थी >>>
इन दोनों ही क्षणों में अनुज डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ जी के साथ ने ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस अवसर को अविस्मरणीय बना दिया।
जीवन में ऐसे सुखद क्षणों की हम मात्र कल्पना ही कर पाते हैं। किन्तु, जब कभी ऐसे क्षण ईश्वर हमें देते हैं तो उन्हें अंजुरी में समेटना बड़ा कठिन लगता है । ऐसा लगता है कि ये कि ये क्षण सदैव के लिए हृदय के कैमरे में अंकित हो जाएँ। और वे हो गए।
आज बस इतना ही।
हेमन्त बावनकर
24 मार्च 2019
डॉ कुन्दन सिंह परिहार
अमर होने की तमन्ना
(लेखक के व्यंग्य-संग्रह ‘एक रोमांटिक की त्रासदी’ से)
डा. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है एक सामयिक एवं मार्मिक रचना जिसकी पंक्तियां निश्चित ही आपके नेत्र नम कर देंगी और आपके नेत्रों के समक्ष सजीव चलचित्र का आभास देंगे।)
© डा. मुक्ता
पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com