हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९५ – काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९४ ☆

☆ –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 

और हम

योजनाओं की के पीछे

भाग रहे हैं.

उपकारित कामों से

नींद की गोलियाँ रखी हैं

वे सोने का अभिनय कर रहे हैं।

मगर जान रहे हैं।

कैसी विडम्बना है-

सर्वोदय का दावा करने वाले

समस्याओं की भाषा कह रहे हैं।

सत्ताधारियों का सत्तामोह

आकांक्षियों का द्रोह

और विरोधियों का व्यामोह

देखने वाली नई पीढी

यदि हो रही है सौरभहीन

तो उसका क्या दोष है ?

उसका जो आक्रोश है

वह चाहे ठीक न हो

लेकिन गलत नहीं है.

कौन ऐसा माई का लाल है

जो स्वार्थी से आहत नहीं है।

तो आओ

हम अहिंसा को नई परिभाषा दें.

देश के पथराये मन प्राणों को

समाजवाद की आशा दो

हमें जन्मेजयी यज्ञ में

विषधरों का

हवन करना ही पड़ेगा.

समाजवाद के विध्वंसकों का

सरेआम हमें

दहन करना ही पड़ेगा।

यदि ऐसा नहीं किया

तो फिर क्या उपाय है?

 

सिरफिरे नेताओं

और

पचहत्तर घरानों की खातिर

करोड़ों लोगों को अभावों की भट्टी में

झोंकना कहाँ का न्याय है?

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९२ – “अनंत खुशियों की राशी…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत अनंत खुशियों की राशी...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अनंत खुशियों की राशी...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

रिश्तों की अनुपम नक्काशी

जैसी रही बुआ ॥

जीते हुये किसी प्रत्याशी

जैसी रही बुआ ॥

 

बहुत रहीं खुद्दार कभी

उनने कुछ न चाहा ।

किसी घाव के लिये

रही वे, दवा लगा फाहा ।

 

जो भी सच होता उसको

मुँह पर ही कह देना ।

किन्तु दुआ की मथुरा काशी

जैसी रही बुआ ॥

 

घरकेसभी सदस्यों की

वह अधिक चहेती थीं ।

सदा किसी भी काम काज

को हाँ कह देती थीं।

 

अगर दिखें नाराज तनिक में

खुश हो जाती थीं।

आशुतोष थीं जो अविनाशी

जैसी रहीं बुआ ॥

 

जब भी चाहो उन्हें बुलालो

झट से आ जाती।

आते ही घर के कामों में

झट पट जुट जाती ।

 

हर शंका का समाधान थी

इस घर की जो भी ।

व अनंत खुशियों की राशी

जैसी रही बुआ ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जीवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जीवन ? ?

जुग-जुग जीते सपने,

थोड़े से पल अपने,

सूक्ष्म और स्थूल का

दुर्लभ संतुलन है,

नश्वर और ईश्वर का

चिरंतन मिलन है,

जीवन, आशंकाओं के पहरे में

संभावनाओं का सम्मेलन है… !

 ?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 8.11 बजे , 30.3.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 96 – The Modern Freelancer’s Freedom… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Modern Freelancer’s Freedom 

☆ Witful Warmth# 96 ☆

☆ Satire ☆ The Modern Freelancer’s Freedom… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

The gig economy promised us ultimate freedom—the ability to be your own boss, work from a beach, and set your own hours. In reality, being your own boss just means having the worst, most demanding employer in the world who refuses to give you paid leave. Freelancers spend eighty percent of their time sitting in trendy coffee shops, buying expensive lattes just to justify using the Wi-Fi for six hours. They pretend to look busy on their laptops while secretly panicking about an invoice that is three months overdue. The “work from a beach” dream results in sand getting into the laptop keyboard and a screen glare that makes it impossible to see anything. It is a beautiful life of endless flexibility, where you have the absolute freedom to work every single waking hour of your life.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जड़ों से उखड़ रहे हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – जड़ों से उखड़ रहे हैं…!

☆ ॥ कविता॥ जड़ों से उखड़ रहे हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

संवेदना के स्नेह- निर्झर सूख रहे हैं,

हरे-भरे बरगद बारिश में सूख रहे हैं।

 *

सोने के थाल में छप्पन भोग सजे हैं,

लेकिन शरीर ह्रष्ट-पुष्ट सूख रहे हैं।

 *

सदियों से जो उपेक्षा के शिकार रहे,

अब जाकर उनके नसीब जग रहे हैं।

 *

आजतक  जिन्होने ख़ुशी देखी नहीं,

उनके  द्वारे ढोल- नगाड़े बज रहे हैं।

 *

अभिमान में जो सर रस्सी-से तने हैं,

जनता जनार्दन के आगे झुक रहे हैं।

 *

सियासत खिलाफत की बायस हुई,

सियासी  अपनी  मर्यादा भूल रहे हैं।

 *

भौतिकता की ऐसी बयार बही कि,

दरख्त  अपनी जड़ों से उखड़ रहे हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३४ – हास्य-व्यंग्य – “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य-व्यंग्य  गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३४

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

यह तो सुना था कि गधों को पंजीरी खिलाई जाती है और वे बड़ी रुचि से इसे खा कर खिलाने वाले के वश में हो जाते हैं और उसके बताए अनुसार काम करने लगते हैं,  किन्तु यह पहली बार पता लगा कि गधों को गुलाब जामुन खिलने से भी वे मनोनुकूल परिणाम दिला सकते हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मानसून की बेरुखी और बारिश न होने से परेशान लोगों ने इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए गधों को गुलाब जामुन खिला कर अच्छी बारिश की कामना की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने गधों के माध्यम से इंद्र देव से झमाझम बारिश की प्रार्थना की। इससे आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि गधों की पहुंच कहां तक हो सकती है।

मुझे लगता है कि किसी की सत्ता को बनाए रखने में हमेशा गधों अर्थात विमूढ़ों (मूर्खो) का महत्वपूर्ण स्थान होता है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा है  –

सबसे भले विमूढ़,

जिन्हें न व्यापे जगत गति।

यों तो हर व्यक्ति के अंदर एक गधा छिपा रहता है जो अवसर आने पर प्रकट हो जाता है। महापंडित – ज्ञानी रावण का तो एक सिर ही गधे का प्रदर्शित किया जाता है। रावण के अंदर छिपे गधे ने ही उससे सीता हरण करवाया। उसके बाद भी वह उसके जीवन में अनेक बार प्रकट हुआ। रावण का अधिकांश दरबार गधों से भरा पड़ा था। लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठा हर व्यक्ति बुद्धिमान सहयोगियों से बचता है। बुद्धिमानों से उसे अपनी कुर्सी खतरे में नजर आने लगती है। सहयोगियों के रूप में हमेशा गधे उसकी पहली पसंद होते हैं। वह उन्हें पंजीरी अथवा गुलाब जामुन खिला कर संतुष्ट रखता है और उसकी सत्ता निर्विघ्न चलती रहती है। शायद इंद्र देव भी इसी नीति पर चलते हुए अनंत काल से देवराज बने बैठे हैं। इंद्रासन प्राप्त करने के लिए किसी बुद्धिजीवी  साधक के प्रयासों से इंद्रासन डोलने लगता है और इंद्र तत्काल एन – केन – प्रकारेण उसकी तपस्या अथवा प्रयत्नों पर पलीता लगाने अपने दरबार में शामिल गधत्व से भरे अपने सेवक – सेविकाओं को सक्रिय कर देते   हैं। मानव लोक में भी सत्ता पाने एवं सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए सत्ताधारी भी यही मंत्र अपनाते हैं। बुद्धिमानों से दूर रहो, पंजीरी खाकर खुश रहने वाले बुद्धि हीन, विचार हीन लोगों को सहयोगी बनाओ। … लेकिन ध्यान रहे कि जो आपकी नजरों में गधा या मूर्ख है वह स्वयं को मूर्ख नहीं अपितु आपके समकक्ष समझता है। अतः यदि आप मूर्खो का सहयोग लेकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो आपके मूर्ख साथियों को  कदापि यह आभास नहीं होना चाहिए कि आप उन्हें मूर्ख समझते हैं। नाराज होने पर मूर्ख याने गधे आपका खेल बिगाड़ सकते हैं, वे दुलत्ती झाड़ कर आपको आपके लक्ष्य से दूर फेंक सकते हैं।

अपना काम निकालने के लिए जहां तक संभव हो गधों  को पंजीरी रूपी रिश्वत देते रहें और उनके बेतुके (ढेंचू – ढेंचू) आलापों, प्रस्तावों, सुझावों की प्रशंसा करते रहें। ध्यान रखें बुद्धिमानों को अपने रंग में रंगने का प्रयास कभी सफल नहीं होता। जिसने गधों को अपना बना लिया वही बादशाह बन सकता है। “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” बीते युग की बात थी, आज सफलता का मूल मंत्र मूर्खम् शरणम् गच्छामि है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४ ☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता शायद तूफान आने वाला है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४ 

☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

आसमान में बादल गरज रहे हैं

धुआंधार बरस रहे हैं

बिजलियाँ कड़क रहीं हैं 

हवाएं बेफाम बह रही हैं

बहते बहते कह रही हैं

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

गगन में यह कैसी जंग है

धरती पर हम सब दंग है

तबाही आ रही संग संग है

टूटती हर मन की उमंग है

टूटते टूटते कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

चारों दिशाओं में शोर है

नदी नालों में भी जोर है

बारिश भी घनघोर है

समंदर की नजरों में

यह तूफान कमजोर है

हर लहर कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

यह पानी का बहाव

 संकेत है बर्बादी का

यह बूंद बूंद का एक होना

संकेत है आजादी का

बादल का फटना

संकेत है जल समाधि का

सब कुछ डूब गया

तो क्या होगा अपराधी का

प्रकृति हम सबसे कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ – मुसाफ़िर – ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – मुसाफ़िर ☆

मैं मुसाफ़िर तू मुसाफ़िर, रास्ते अनजान हैं

आदमी हूँ आदमी की, बस यही पहचान है

आदमी बनकर रहा जो, जिंदगी में खुश रहा

सारे मज़हब के दिवाने, मिट्टी के मेहमान हैं

 *

क्यों बखेडा कर रहे हो, घर के अंदर में यहाँ

भारती है माँ हमारी, उस की हम संतान हैं

 *

माँ के टुकडे करने वाले, देश के गद्दार तुम

आरती का बन चुके हम, बस तेरे सामान है

 *

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब सिपाही हैं यहाँ

देश पे कुर्बान हो तुम, तुम पे हम कुर्बान हैं

 *

उन शहिदों को पुछो, देश पर जो मिट गये

धर्म से बढकर तिरंगा, इस वतन की शान है

 *

आवो मेहनत को बनाएं, एक इज्जत का निशाँ

मुफ्त की रोटी पे पलते, कुछ यहाँ नादान हैं

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११८ – बाबुल के बुलावे पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बाबुल के बुलावे पर।)

☆ अभिव्यक्ति # ११८ ☆

☆ बाबुल के बुलावे पर☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तेरी इस दुनिया में, पल का ठिकाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

दिया जले बाती से, तेल का समाना है,

तेल खत्म होते ही, दिया बुझ जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

अंगना में चिड़िया है, जब तक दाना है।

*

दाना खत्म होते ही, चिड़िया उड़ जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

रंगमंच दुनिया है, कला का जमाना है,

रोल खत्म होते ही, पर्दा गिर जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

राज की ये बात कह दूं, राज ये बताना है।

*

अच्छे काम करो जग में, नाम रह जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५६ ⇒ दर्द और हमदर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दर्द और हमदर्द।)

?अभी अभी # १०५६ ⇒ आलेख – दर्द और हमदर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जहां दर्द है, वहां कोई न कोई हमदर्द भी है ! दुख मन का हो, या दर्द तन का हो, एक आह या पुकार जब उठती है, किसी न किसी हमदर्द की याद अवश्य आती है। वह कोई अपना ही होता है, जिसका अस्तित्व या तो इस दुनिया में होता है या किसी और दुनिया में।

दो कदम चले, रास्ते के पत्थर से ठोकर जब लगी, क्यूं उसकी याद आई, जिसे हम कभी मां कहते, कभी अम्मा, कभी आई। जब दुख दर्द में कराहते, मुंह से अनायास अरे राम रे, अथवा क्यों निकलता, हे राम या या खुदा, अब तो तू ही बचा। किसी को संकट में हनुमान याद आते तो किसी को नानी। क्या नहीं ये सब उन हम दर्दों की फेहरिस्त, जो हमें याद मुंह जबानी।।

हमारे दर्द का हमदर्द कोई औरत भी हो सकती है, कोई मर्द भी हो सकता है। वह हमारे दुख दर्द को दूर तो नहीं करता, लेकिन दिल को राहत और तसल्ली अवश्य देता है, जिससे कभी यह शिकायत नहीं रह जाती, कि :

हंसने की चाह ने

कितना मुझे रुलाया है,

कोई हमदर्द नहीं,

दर्द मेरा साया है।

जी हां ! यह सच है कि आपका हम दर्द हमेशा साये की तरह आपके साथ साथ चलता है। कितना दर्द है राजा मेहंदी अली खान के इस गीत में ;

तू जहां जहां चलेगा

मेरा साया साथ होगा।

कभी मुझको याद करके,

जो बहेंगे तेरे आंसू

तो वहीं पे रोक लेंगे

उन्हें आ के मेरे आंसू

तू जिधर का रुख करेगा

मेरा साया साथ होगा।।

आखिर ये साया कौन है ! यही वो रहबर है, जो कभी दोस्त बनकर, कभी कोई रिश्ता बनकर, तो कभी कोई फरिश्ता बनकर हमारे दर्द के साथ चलता है। हम किसी का घाव ठीक नहीं कर सकते, लेकिन प्रेम के दो शब्द, मरहम का काम करते हैं, और तिरस्कार की एक नजर, जले पर नमक छिड़कने का काम करती है।

क्या हमने कभी कोई ऐसी फेहरिस्त बनाई है, जब हमने डूबते को तिनके का सहारा दिया हो। किसी दुखी इंसान के आंसू पोंछे हों। यही ज़बान तो छुरी भी है और कटार भी। मरहम भी यही और प्यार, दुलार भी।।

नेकी और बदी, ये ज़िन्दगी की किताब के शब्द हैं, महज किसी शब्दकोश के दो आखर नहीं। चलती ट्रेन में जब कोई अनजान व्यक्ति प्लेटफॉर्म पर दौड़ता हुआ, आपकी प्यास बुझाने के लिए, आपका खाली बर्तन भरता है, तो क्या आप सोच सकते हैं, यह कितनी बड़ी सेवा है। ताली, थाली पर बहुत राजनीति और व्यंग्य हुआ, लेकिन सच्चाई के धरातल पर भी बहुत कुछ हुआ। देर से ही सही, किसी ने तो पलायन करते मजदूरों की आवाज़ उठाई।

ये चलते फिरते हमदर्द फरिश्ते आपको सब जगह मिलेंगे। कहीं नजर नहीं आएंगे, कहीं रूबरू मिलेंगे। शैलेन्द्र से अच्छा इस फलसफे को हमें और कोई नहीं समझा सकता ;

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार

किसी के वास्ते हो, तेरे दिल में प्यार

जीना इसी का नाम है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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