हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆

सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह) –  लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन ☆ सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

पुस्तक  : साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संग्रह)

लेखक   : धर्मपाल महेन्द्र जैन

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर (म. प्र.)

मूल्य – 275

पृष्ठ – 154

वर्ष – 2025

सरल, चुटीली और प्रभावशाली – साहित्य की गुमटी – सुश्री ज्योत्स्ना कपिल ☆ 

व्यंग्य के क्षेत्र में धर्मपाल महेंद्र जैन जी एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वह हिन्दी व्यंग्य विधा के गिने-चुने बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक हैं। पिछले वर्ष शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके व्यंग्यों का एक रोचक संग्रह आया था ‘साहित्य की गुमटी’। जितना आकर्षक पुस्तक का शीर्षक है उतने ही लुभावने और सोचने को विवश करने वाले उनके व्यंग्य हैं। इस पुस्तक में धर्मपाल जी ने साहित्य जगत की विसंगतियों, दिखावा और परिवर्तित होती प्रवृत्तियों पर हास्यपूर्ण अंदाज में तीखा कटाक्ष किया है। यह पुस्तक पाठक को हँसी-हँसी में गंभीर मुद्दों पर सोचने को भी विवश करती है।

श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

यहाँ गुमटी को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जिस प्रकार सड़क किनारे लगी गुमटी में भांति- भांति के लोग आते-जाते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार साहित्य रूपी गुमटी में भी भिन्न-भिन्न श्रेणी के यथा- लेखक, पाठक, आलोचक और प्रकाशकों की भीड़ दिखाई देती है। जो स्वयं को बहुत महान समझने का भ्रम पाले रखती है। उनकी कुंठा, उनके आग्रह, उनकी बेचारगी, यह सब इन पात्रों में, उनके संवाद और उनकी आदतों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

संग्रह की पहली रचना ‘ज़हर के सौदागर’ लेखक की एक जबरदस्त व्यंग्य रचना है, जिसमें लेखक ने समाज में फैल रही नफरत, हिंसा, अफवाह और स्वार्थ जैसे जहर पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी में ज़हर बेचने वाली एक दुकान का उदाहरण देकर लेखक समाज की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। रचना में बताया गया है कि पहले ज़हर का उपयोग सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी माँग तेजी से बढ़ने लगी। यह बढ़ती माँग केवल वास्तविक ज़हर की नहीं, बल्कि समाज में फैल रहे झूठ, नफरत और दुर्भावना जैसे मानसिक ज़हर की ओर संकेत करती है। यहाँ लेखक बड़ी कुशलता से यह दिखाते हैं कि कैसे लोग बिना सोचे-समझे इन विषैले विचारों को फैलाते हैं और समाज को दूषित कर देते हैं।

‘ वाट्सऐप नहीं भाट्सएप’ में समकालीन सामाजिक व्यवहार, विशेषकर व्हाट्सएप समूहों में दिखने वाली प्रवृत्तियों पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है। आजकल व्हाट्सएप समूहों में होने वाली ‘अतिश्योक्तिपूर्ण’ प्रशंसा और चापलूसी दिखाई गई है। यहाँ हम देखते हैं कि कैसे कुछ सदस्य एक-दूसरे की रचनाओं की अतिश्योक्ति पूर्ण प्रशंसा करते हैं। यदि भूले से उनकी रचनाओं से असहमति जता दी जाए या आलोचना कर दें तो उसे व्यक्तिगत हमले की तरह लिया जाता है। ‘भाषा के हाइवे पर गड्ढे ही गड्ढे’ में समकालीन आलोचना पर गहरा कटाक्ष किया गया है। लेखक कहते हैं कि किसी कृति पर आलोचना देखकर ही पता चल जाता है कि वह मित्र द्वारा लिखी गई है अथवा अमित्र द्वारा। यदि मित्र की रचना है तो अपने ही किसी बंदे से लिखवाकर भेज देता है परन्तु यदि वह अमित्र की है (जो की होती है। क्योंकि लेखक आपस में प्रतिद्वंदिता के चलते अमित्र ही अधिक होते हैं) तो उसपर ऐसी आलोचना लिखी जाती है कि लेखक आत्महीनता का शिकार होकर लिखना ही भूल जाए।’ ‘लाइक बटोरो और कमाओ’ में अलग ही बानगी देखने को मिलती है। यहाँ फेसबुक की उस प्रवृत्ति का प्रदर्शन है जहाँ सारा फ़साना बस लाइक कमेंट का है। अगर जिन्दा हो, तो लाइक कमेंट करके अपने जीवित होने का प्रमाण दो। ‘ईडी है तो प्रजातंत्र स्थिर है’ आज की राजनीति का ज्वलंत उदाहरण है – हम राजनीतिज्ञ हैं दोमुँहे सांप जैसे। हमारे एक तरफ ईडी है तो दूसरी तरफ सीबीआई। हमको काहे का डर?

इसी प्रकार संग्रह में एक से बढ़कर व्यंग्य हैं जो हमारे समाज की राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक, धार्मिक विचारधारा, लोगों के दोगलेपन पर सटीक प्रहार करते हैं। लिखने को तो इतना कुछ है कि अगर लिखने बैठूं तो एक पुस्तक ही बन जाएगी। धर्मपाल जी के व्यंग्य से मेरा साक्ष्य पहली बार हुआ है और मैं उनकी पैनी दृष्टि से चमत्कृत हुई हूँ, कायल हुई हूँ। एक व्यंग्यकार बनने के लिए आपमें तीखी दृष्टि, हास्यबोध, बेहतरीन वैचारिक क्षमता और जागरूकता होना बेहद आवश्यक है। धर्मपाल जी ऐसे ही जीनियस रचनाकार हैं जिनकी विचारशीलता का फलक बहुत विस्तृत है। संग्रह के कई व्यंग्य बेहद तीखे बन पड़े हैं- बम्पर घोषणाओं के जमाने में, रक्तबीज का क्या मतलब, होरी खेले व्यंग्य वीरा अवध में, विदेश में परसाई से दो टूक, साहब को जुकाम है पर…, संस्कृति एक संक्रामक बीमारी है, सरकार तुम ट्रिलियन हम पाई, अफवाह को अफवाह रहने दें, सांप अब सभ्य हो गए हैं, साहित्य अकादमी-सी पान गुमटी इत्यादि।

संग्रह की भाषा सरल, चुटीली और प्रभावशाली है। वे भारी-भरकम शब्दों का कहीं भी प्रयोग नहीं करते, बल्कि बहुत सहज भाव में गहरी बात कह देते हैं। कई स्थानों पर व्यंग्य इतना तीक्ष्ण है कि पाठक मुस्कुराते हुए भी समाज और साहित्य की वास्तविकता को महसूस करता है। संग्रह में साहित्यिक आयोजनों, पुरस्कारों की होड़, लेखकों की भंगिमा, उनके स्वार्थ और आलोचना की राजनीति जैसी स्थितियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष हैं। धर्मपाल जी अपने व्यंग्यों के माध्यम से यह बताने का प्रयास करते हैं कि साहित्य केवल प्रसिद्धि पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम होना चाहिए।

यह एक ऐसा संग्रह है जो मनोरंजन के साथ-साथ साहित्यिक दुनिया की वास्तविकता को भी जाहिर करता है। धर्मजी की पैनी दृष्टि और हास्यपूर्ण शैली इस पुस्तक को रोचक और प्रभावशाली बनाती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक बेहतरीन उपहार है जो व्यंग्य साहित्य में रुचि रखते हैं। यह एक रोचक व विचारोत्तेजक व्यंग्य-संग्रह है। इसमें लेखक ने साहित्यिक दुनिया की विभिन्न प्रवृत्तियों, दिखावे और विसंगतियों पर तीखे लेकिन हास्यपूर्ण व्यंग्य किए हैं। लेखक की पैनी दृष्टि और चुटीली भाषा इस संग्रह को तीखी धार देती है। मैं इस संग्रह के लिए धर्मपाल जी को बधाई देती हूँ और उनकी आगामी कृति के लिए शुभकामनायें, प्रतीक्षा की घड़ियाँ शुरू हो गई हैं।

©  सुश्री ज्योत्स्ना कपिल

18-ए, विक्रमादित्य पुरी, स्टेट बैंक कॉलोनी, बरेली 243003

मो.- 9412291372

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७२ – लघुकथा – सार्थकता ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – लघुकथा – सार्थकता)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७२ ☆

लघुकथा – सार्थकता ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

खेत में खड़े बिजूकों को देखकर हैलमेटों ने तंज कसा- “हम तो अपने मालिकों की जान बचाते हैं, तुम्हारा जीवन व्यर्थ है।”

एक बिजूका बोला- ‘तुम जरखरीद गुलाम सिर्फ अपने मालिक के काम आते हो। हम अपने और तुम्हारे मालिकों के साथ सबका पेट भरने के लिए दिन में धूप और रात में अँधेरे से जूझते हैं।’

निरुत्तर हैलमेट अगली सुबह खेतों में खड़े थे बिजूका बनकर।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१७.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५० ⇒ आए गए का घर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आए गए का घर।)

?अभी अभी # ९५०  ⇒ आलेख – आए गए का घर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किसी भी घर की रौनक ही इसी में है, कि वहां मिलने जुलने वाले और रिश्तेदारों का आना जाना बना रहे। किसी घर की घंटी बजना, अथवा घर के सामने जूते चप्पलों का ढेर यह दर्शाता है कि इस घर में काफी चहल पहल है।

वैसे भी घर में खामोशी किसे पसंद है, दीवारें तक कान लगाए सुनती रहती हैं, जिस घर में हमेशा महफिल जमी रहती है।

ऐसे घर को हमारी मां, आए गए का घर कहती थी। जब तक हमारे घर में मां और पिताजी मौजूद रहे, ना तो घर कभी खाली अथवा खामोश रहा और ना ही घर में कभी ताला लगा।।

तब कहां घरों में फोन अथवा मोबाइल थे। कभी कभी तो चिट्ठी के आने के पहले ही मेहमान टपक पड़ते थे लेकिन अधिकतर अतिथि शब्द का मान रखते हुए समय और तारीख बताए बिना ही पधार जाते थे।

पिताजी रात को जब घर आते तो भोजन के वक्त, कोई ना कोई परिचित अवश्य उनके साथ होता। बहन स्कूल से घर आती, तो एक दो सहेलियों को साथ लेकर आती। तब ना तो इतनी मोहल्लों में दूरी थी और ना ही दिलों में। तब शायद सबको प्यास भी बहुत लगती थी, वॉटर बॉटल का तब शायद आविष्कार ही नहीं हुआ था।।

हर तरह की परिस्थिति से घर में तब मां को ही जूझना पड़ता था। अनाज, मसाले और दाल चावल का साल भर का संग्रह जरूरी होता था। मौसम के हिसाब से घरों में एक्सट्रा बिस्तर और रजाई गद्दों की भी व्यवस्था करनी पड़ती थी। टेंट हाउस की याद तो बस शादी ब्याह के वक्त ही आती थी। किराने और दूध का हिसाब महीने में एक बार करना पड़ता था।

इस तरह की सभी युद्ध स्तर की तैयारियों से सुसज्जित घर ही आए गए का घर कहलाता था। मेहमानों की पसंद का भी पूरा खयाल रखा जाता था। फूफा जी को चावल में घी और शक्कर प्रचुर मात्रा में लगता था और वे पूड़ी ही पसंद करते थे, रोटी नहीं।।

लेकिन यह सब कल की बात है। आज तो मेहमानों के लिए नाश्ता भी बाहर से ही आता है और भोजन भी

बाहर होटल में ही किया जाता है। फोन और मोबाइल की सुविधा के बावजूद ना किसी को आने की फुर्सत है और ना ही किसी को बुलाने की।

परिवार छोटे होते जा रहे हैं, घर बड़े होते जा रहे हैं।

छोटे घर में तब कितने सदस्य समा जाते थे, आज आश्चर्य होता है। तब कहां किसी का अटैच बेडरूम और बाथरूम था। घर की महिलाएं अपने कपड़े ताक में रखती थी। आज घरों में सोफ़ा, अलमारी, अपनी अपनी वॉर्डरोब और मॉड्यूलर किचन है, बस खाने वाला कोई नहीं है।।

हंसी आती है, जब धर्मपत्नी पुराने बर्तनों और एक्सट्रा बिस्तरों को आज भी सहेजकर रखती है। वह कहती है, आप नहीं समझते, आए गए के घर में घर घृहस्थी का सभी सामान जरूरी होता है।

बड़ी भोली और घरेलू टाइप की गृहिणी है वह।

अनायास कोई मेहमान आता है तो उसकी बांछें खिल जाती हैं। घर में दावत हो जाती है। लेकिन

ऐसे अवसर आजकल कम ही आते हैं। लगता है अपने परिचित कहीं बहुत दूर चले गए हैं, यह दूरी दिलों की है अथवा मजबूरी की, समझ नहीं पाते। कोई आए, जाए, कितना अच्छा लगता है।।

होते हैं कुछ ऐसे खामोश घर, जहां कोई ज्यादा आता जाता नहीं। किसी आहट पर उम्मीद सी बंधती है लेकिन फिर खयाल आता है ;

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा।

मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 मार्च से 29 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 मार्च से 29 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जयश्री राम। मैं पंडित अनिल पांडे पहले की भांति आज भी आपको श्री हनुमान चालीसा की चार चौपाइयों के बारे में बताऊंगा जो की आपकी परेशानियों में मंत्र जैसा कार्य करेंगी। पहली दो चौपाइयां मैं अभी बताऊंगा तथा बाद की दो चौपाइयां इस वीडियो के अंत में बताई जाएंगी।

आज की श्री हनुमान चालीसा की पहले दो चौपाइयां ये है।

लाय सजीवन लखन जियाए,

श्री रघुबीर हरषि उर लाए।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई,

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

हनुमान चालीसा की इन चौपाइयों के संपुट पाठ करने से शारीरिक व्याधियों का निवारण होता है तथा अपने से बड़ों की कृपा प्राप्त होती है। अगर आपका बॉस आप से नाराज है या आप रोगों से ग्रस्त हो गए हैं तो आपको इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।

साप्ताहिक राशिफल में आज सबसे पहले मैं आपको 23 मार्च से 29 मार्च 2026 के सप्ताह के ग्रहों के परिवर्तन के बारे में बताऊंगा। उसके बाद राशिवार राशिफल की बारे में चर्चा की जाएगी।

इस सप्ताह सूर्य और शनि मीन राशि में मंगल, बुध और राहु कुंभ राशि में और गुरु मिथुन राशि में भ्रमण करेंगे। शुक्र प्रारंभ में मीन राशि में रहेंगे तथा 25 तारीख के 3:53 रात से मेष राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह सतर्कता पूर्वक कार्य करके आप कचहरी के कार्यों में लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि संभव है। व्यापारियों को लाभ होगा। भाई बहनों के साथ संबंध स्थिर रहेंगे। आपके संतान को लाभ होगा। संतान का आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको इस सप्ताह धन अर्जित करने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। व्यापारियों के लिए सप्ताह अच्छा है। कर्मचारी और अधिकारियों को सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख सफलता प्रदान करने वाले हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर वे चाहेंगे और प्रयास करेंगे तो उनको सही पदस्थापना मिल सकती है। भाग्य से मामूली लाभ होगा। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा नहीं है। भाई बहनों के साथ संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको 25 और 26 तारीख का विशेष रूप से उपयोग करना चाहिए। इन दोनों तारीखों में आपके अधिकांश कार्य सफल होंगे। 23 और 24 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। भाग्य की मदद से आपके सभी कार्य संपन्न हो सकते हैं। मगर प्रयास तो करना ही पड़ेगा। आपके व्यय में वृद्धि होगी। कर्मचारियों अधिकारियों को सावधान रहना चाहिए। आपका, आपके जीवनसाथी का और माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों को भी इस सप्ताह में सावधानी के साथ व्यापार करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 27 के दोपहर से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को पूर्ण करने में मददगार है। 25 और 26 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। मामूली मात्रा में धन आने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर विश्वास करके कार्यों को करना चाहिए। माता जी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कर्मचारियों और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख लाभदायक है। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सावधानी पर जोर देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

व्यापारियों के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। कर्मचारियों एवं अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह प्रतिष्ठा दायक रहेगा। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। 25 और 26 तारीख को आपको अधिकांश कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर पर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। अविवाहित जातकों के नए-नए विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। संतान का सहयोग आपको कम मिलेगा। परीक्षाओं में सफलता के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकते हैं। भाग्य से थोड़ा बहुत लाभ प्राप्त होगा। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख उपयोगी हैं। 23 और 24 तारीख को आपको सावधान रहने की सलाह दी जाती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके संतान की उन्नति हो सकती है। संतान से आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को पढ़ाई में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको शत्रुओं से सावधान रहना चाहिए। अविवाहित जातकों के विवाह के प्रस्ताव में कुछ लोग बाधक बन सकते हैं। धन प्राप्त होने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार सामान्य रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक है, परंतु उनको अपने विचारों पर नियंत्रण रखना होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए सावधान रहने का समय है, अन्यथा उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख परिणाम मूलक हैं। 25 और 26 तारीख को आपको कोई भी कार्य बहुत सोच समझकर करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवारहै।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपका इच्छित स्थान पर स्थानांतरण हो सकता है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अत्यंत उत्तम है। उनके प्रतिष्ठा में भरपूर वृद्धि हो सकती है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधानी से कार्य करना चाहिए। व्यापारियों का व्यापार सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन गुरुवार है।

मकर राशि

आपका, आपके जीवनसाथी का, आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ अच्छे संबंध बनेंगे। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर अधिक विश्वास करना चाहिए। भाग्य पर नहीं। छात्रों को पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। आपको अपने संतान का सहयोग बहुत कम मिलेगा। शत्रुओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख परिणाम दायक हैं। 25 और 26 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें साथ ही रुद्राष्टक का भी पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको धन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपको ब्लड प्रेशर, डायबिटीज आदि रोगों से सावधान रहना चाहिए। आपके माता-पिता जी का और जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपको अपनी संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 24 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक है। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सचेत रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आप अपने बहुत सारे कार्य अपने आत्मविश्वास के बल पर कर लेंगे। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। धन प्राप्त करने में सावधानी बरतें। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से भी थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 25 और 26 तारीख विभिन्न रूप से मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र की तीन माला का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

आईये अब हनुमान चालीसा के मंत्रवत चौपाइयों की चर्चा कर लें। आज की दो चौपाइयां हैं;-

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥

हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से यश, सम्मान, प्रसिद्धि और कीर्ति बढ़ती है। अगर आपको मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करना हो तो इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ भीष्म विषाद… ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? कवितेचा उत्सव ? 

☆ भीष्म विषाद… ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

पडून पंजरी पार्थ शरांच्या प्रतीक्षा करी मृत्यूची

आंस लागली उत्तरायणी नसे वासना जन्माची ||ध्रु||

पांचालीच्या अब्रूसाठी फुरफुरले ना हे बाहू

किती विनविले चरणांपाशी किती काय मी साहू

एक वस्त्र ना पुरे पडावे होळी झाली लज्जेची

लाज राखली कृष्ण बांधवे वाण नसे मग चीरांची ||||

 *

हाच काय पुरुषार्थ आमुचा शिखंडी ही वाटतो भला

पुरुष नसोनी न्यायासाठी धाक दावितो किती मला

शौर्य आमुचे क्लैब्य जाहले शस्त्रे ही गाळायची

धनंजयाचे बाण झेलुनी काया मग अर्पायाची ||||

 *

पश्चात्ताप हा जाळुनि आत्म्याला नी कायेला

देहासाठी शरपंजर परी ना आधार शीराला

मस्तकाचे क्लेश जाणुनी तीर धावले पार्थाचे

परतफेड ही धनंजयाची उपकारे अन्यायाची ||||

कवी : © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम. डी. , डी. जी. ओ.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचा ☆ पानगळ… (कविता) ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ क्षण सृजनाचा ☆ पानगळ… (कविता) ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे 

कधी नव्हे तो निवांतपणा मिळाला होता. उकाडा फार जाणवायला लागला होता. बाल्कनीत जरा हवा येत असेल म्हणून तिथे खुर्ची टाकून बसले होते. मग नजर सहजच इकडेतिकडे भिरभिरायला लागली, आणि दररोजच समोर असणाऱ्या कित्येक गोष्टी नव्यानेच पहातेय असं वाटायला लागलं……

… त्यातलेच एक हे घरासमोरील मोठ्ठे पिंपळाचे झाड …’ आजूबाजूचं सगळंच इतकं बदललंय.. पण हे झाड मात्र गेली कित्येक वर्षं आहे तसंच आहे.. ते कसं काय ?‘…

… इतक्यात वाऱ्याची एक सुखद झुळूक आली.. अंग मोहरून उठलं.. समोरचं ते झाडही सळसळलं …. आणि.. आणि बघता बघता त्याची कितीतरी पानं अल्लाद झाडावरून खाली पडली.. मला कसंतरीच झालं.. एकदम जाणवलं की ही तर पानगळ सुरु झालीये.. म्हणजे आता शिशिर संपून वसंत ऋतू येणार तर … आणि मग त्या भिरभिरणाऱ्या पानांबरोबर मनही भिरभिरायला लागलं – – –

खरंच.. काय गंमत आहे ना.. कोणी न सांगताच या झाडांना कळतंय की वर्षभर ज्याची वाट पाहात होतो तो आपला प्रिय सखा वसंतराजा आता येणार म्हणून.. आणि झाडं आता त्याच्या स्वागताची जणू तयारी करताहेत.. मनात आलं.. ही झटकून टाकलेली पानं म्हणजे जणू इतके दिवस नावडत्या सोबत्याबरोबर राहावे लागल्याने मनाला आलेली मरगळच अशी क्षणार्धात झटकून टाकली असेल का ? पण मग ज्यांच्यामुळे झाडांना शोभा अशी ती पानं एकदम अशी निरुपयोगी समजून दूर फेकून देतांना काहीच दु:ख नसेल का झालं झाडाला ?……

…. असं नसेल पण.. इतकं कठोर नि कृतघ्न व्हायला झाडं म्हणजे माणसं थोडीच आहेत ? मग हे कदाचित फक्त स्थित्यंतर असेल …. एका पिढीकडून दुसऱ्या पिढीकडे.. किंवा झाडाचा पुनर्जन्म ??

आत्मा तोच आणि वरचा साज मात्र नवा.. कोवळ्या लुसलुशीत तजेलदार पानांचा !!.. असंच असावं….

.. म्हणूनच तर या खाली पडलेल्या पानांच्या चेहेऱ्यावर कुठे दु:ख दिसत नाहीये ! कशी आनंदाने भिरभिरताहेत ! त्यांची जागा घेऊन आता झाडावर अभिमानाने डोलणाऱ्या नव्या पानांकडेही किती कौतुकाने पहाताहेत ! केवढं मोठं मन हे.. आणि केवढा त्याग.. आपल्या जीवावर ज्याचा रुबाब, त्याला संजीवनी मिळावी म्हणून किती सहज स्वतःचाच त्याग करताहेत ही पानं ! ही पानगळ !…. का लोक खेदाने पहातात तिच्याकडे ? तिचा मोठेपणा का लक्षातच येत नाही कुणाच्या ?.. प्रत्येक गोष्टीत फक्त ‘उणं’ तेवढंच पाहणाऱ्या आम्हा माणसांना तिच्याकडून काहीच संदेश घ्यावासा वाटत नाही ते का ?….

…. निदान आयुष्याला मरगळ आणणाऱ्या नकारात्मक संवेदना झटकून टाकून सद्भावाची अन प्रेमाची नवी पालवी फुलवावी आणि भविष्य आनंददायी ‘वसंत’ व्हावं असा प्रयत्न करण्यासाठी या पिंपळवृक्षाप्रमाणे सज्ज व्हावं असं कधी वाटेल आम्हाला ?

नव्या रक्ताला.. नव्या विचारांना.. नव्या जाणिवांना संधी देण्यासाठी जुन्यांनी अट्टाहास सोडून समजूतदारपणा दाखवायलाच हवा हे या पानगळीकडून शिकेल का कधी आमचा समाज ? … या समाजवृक्षाला नवजीवन मिळावं म्हणून हातात हात घालून एकत्रपणे काही करू शकू का आम्ही.. या पानगळीसारखं ???

… सहजपणे ‘कचरा’ समजल्या जाणाऱ्या या दुर्लक्षित पानगळीतून कितीतरी शिकण्यासारखं आहे हाच एक विचार मग कितीतरी वेळ माझ्या मनात टपटपत राहिला … त्या पानगळीसारखाच … आणि नकळत तसेच भिरभिरत कागदावर शब्द उतरले… 

☆ पानगळ… ☆

दिवसामागून दिवस चालती.. ऋतूमागूनी ऋतू धावती

विसावा नसे मुळी कसा तो.. निसर्गचक्रा सततची गती – –

*

वसंत प्रिय तो येईल आता.. कल्पनेत या वृक्ष थरारे

स्वागतास अति आतुर झाला.. आनंदे अन मनही भरारे – –

*

येणार नक्की तो प्रियतम म्हणुनी.. सळसळ उठली पानोपानी

स्वतःस आता किती सजवावे.. रोमरोम हे जाई हरखुनि – –

*

मरगळ मनीची झटकत असता.. विखरून पाने किती ओघळली

सालभरी त्यांनीच सजवले.. जुनी जणू ती आता झाली – –

*

जुने जाऊ द्या मरणालागी.. म्हणतच येती नवी पाने ती

परी तयांना आज कळेना.. उद्याची त्यांची हीच स्थिती – –

*

नवेपणा मिरविण्या तयांचा.. जुन्यांनी जणू नेपथ्य मांडले

आपली जागा त्यांना देण्या.. मन मोठे हे किती हो केले – –

*

जाण्यासाठीच येती सगळे.. जगरीती ही त्यांना ज्ञात

सवेच आलो.. सवे चाललो.. म्हणतच घेती हातात हात – –

*

दु:ख मुळी ना परतण्यात त्या.. कर्मयोग त्यांनी स्विकारला

सार्थच झाले जीवन म्हणुनी.. आनंदे जीवही थरारला – –

*

पायघड्या आपल्याच घातल्या.. सफल जणू हे जीवन झाले

जीवनदायी वसंतऋतूच्या.. पायी जीव समर्पित झाले – –

*

चैतन्याची ज्योत पालवून.. स्वतः मालवे कृतार्थ जीवन

पानगळीला हिणवू नका हो.. मनास मिळू द्या तिचे प्रबोधन – –

©  सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

९८२२८४६७६२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ एनी बेझंट ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ एनी बेझंट ☆ शालिनी जोशी

ॲनी बेझंट  –परदेशी असूनही भारतासाठी कार्य करणाऱ्या

जन्माने ख्रिश्चन पण मनाने हिंदू असलेली एक ब्रिटिश महिला म्हणजे  ॲनी बेझंट.भारतीय स्वातंत्र्य लढ्यातील एकनिष्ठ व्यक्ती त्या ठवल्या.ॲनी बेझंट यांचा जन्म एक ऑक्टोबर १८४७ रोजी लंडन येथे झाला. त्या पाच वर्षाच्या असताना वडील विल्यम पेजवुड यांचे निधन झाले. ते विद्वान, तत्त्वज्ञ व बहुभाषी होते. आई एमिली ही धार्मिक, कष्टाळू होती. पण पेजवुड यांच्या निधनानंतर आई कौटुंबिक अडचणीत सापडली. त्यामुळे त्यांच्या मैत्रिणीने ॲनीचे शिक्षण व पालन पोषण केले. त्या धार्मिक बनल्या. पुढे १८६७ मध्ये रेव्हरंट फ्रॅंक बेझंट या ख्रिस्ती धर्मोपदेशका बरोबर त्यांचा विवाह झाला. देवावरील श्रद्धेवरून दोघात मतभेद झाले आणि बेझंट यांनी घटस्फोट घेतला.

त्या स्त्री सुधारणावादी होत्या. कामगारांची युनियन स्थापन केली. महिला कामगारांचा संप घडवून आणला. लेखन भाषण मार्गाने समाज सुधारण्याचा प्रयत्न केला. पुढे १८८९ मध्ये थिओसॉफिकल सोसायटीची त्यांचा संबंध आला. ही संस्था अध्यात्मिक तत्त्वज्ञानाचा शोध घेणारी व विश्वबंधुत्वाला प्रोत्साहन देणारी होती. त्यात त्या सामील झाल्या. १८९३ च्या सर्व धर्म परिषदेत थिओसाॅफिकल सोसायटीचे प्रतिनिधित्व त्यांनी केले.  १८९३ मध्ये या सोसायटीच्या प्रसारासाठी त्या भारतात आल्या.

भारताच्या स्वातंत्र्याचा त्यांनी सक्रिय पुरस्कार केला. लोकमान्य टिळकांबरोबर होमरूल चळवळ उभारली. तुरुंगवासही भोगला.१९१७ च्या भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसचे (कलकत्ता) अध्यक्ष पद त्यांनी भूषविले. या पदावरच्या त्या पहिल्या महिला ठरल्या. स्वातंत्र्य लढ्यात पंडित नेहरू, महात्मा गांधी यांनाही त्यांनी सहकार्य केले. त्यांच्या प्रयत्नाने भारतात अनेक शैक्षणिक संस्था उभ्या राहिल्या. महिला शिक्षणावर त्यांनी विशेष लक्ष केंद्रित केले. १८९८ मध्ये बनारस येथे सेंट्रल हिंदू कॉलेजची स्थापना केली. यातूनच पंडित मदन मोहन मालवीय यांचे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थापन झालं. मुलींसाठी सेंट्रल हिंदू स्कूल फॉर गर्ल्स ची स्थापना करून शैक्षणिक सुधारणांचा पाया घातला.

भारतीय तत्त्वज्ञान, संस्कृती आणि अध्यात्म यांचा सखोल अभ्यास त्यांनी केला. लेखिका व व्याख्याता म्हणून प्रसिद्ध झाल्या. भारतभर प्रवास करून रामायण, महाभारत, उपनिषदे यावर अनेक व्याख्याने दिली. १९०५ मध्ये गीतेचे इंग्रजी भाषांतर केले. २५० ग्रंथ लिहिले. भारतीयांनी प्राचीन परंपरा विसरू नये यासाठी त्यांचा हा प्रयत्न होता. पाश्चात्य स्त्रीने भारतीय संस्कृतीचा मोठेपणा सांगावा हे पाहून लोक प्रभावित झाले. त्यांना मानू लागले. पण सनातनी हिंदू मात्र त्यांना आपल्या शत्रू समजत. सहभोजने, बालविवाह प्रतिबंध, स्त्रियांची सुधारणा इत्यादी क्षेत्रात त्यांनी काम केले. मद्रास येथे ‘कॉमन विल’ आणि न्यू इंडिया’ ही वृत्तपत्रे सुरू केली. असहकार व सत्याग्रह या बाबतीत मात्र गांधींची त्यांचे मतभेद झाले.

मद्रास येथे १९३३ मध्ये ॲनी बेझंट यांचे निधन झाले. पार्थिव देहाचे दहन करून रक्षेचा अंश गंगेत विसर्जित करण्यात आला. ब्रिटिश असूनही भारतीयांविषयीची आत्मियता, समाज सुधारण्याची तळमळ होती. त्या प्रकांड पांडित्य, वक्तृत्व, कार्यक्षमता, स्मरणशक्ती, दीर्घोद्योग, वक्तशीरपणा अशा अष्टपैलू होत्या. ॲनी बेझंट एकदा भारतात आल्या  त्या इथल्याच होऊन राहिल्या. पुढील पिढ्यांना प्रेरणादायी असे समर्पित जीवन त्या जगल्या.

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “अपरिचिताचा शेवटचा प्रवास…” (अनुवादित) – मूळ इंग्रजी लेखक : अज्ञात – कन्नड अनुवादक : अज्ञात – मराठी अनुवादक : डॉ. सुभाष भोसले ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆

श्री मोहन निमोणकर 

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ “अपरिचिताचा शेवटचा प्रवास…” (अनुवादित) – मूळ इंग्रजी लेखक : अज्ञात – कन्नड अनुवादक : अज्ञात – मराठी अनुवादक : डॉ. सुभाष भोसले ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर

(‘अपरिचिताचा शेवटचा प्रवास’ ही एक सोशल मीडियावर लोकप्रिय झालेली हृदयस्पर्शी कथा आहे. या कथेत एका टॅक्सी चालकाचा आणि एका वृद्ध प्रवाशाचा अनुभव मांडला आहे. या कथेचे मूळ लेखक केंट नर्बर्न (Kent Nerburn) आहेत. ही कथा त्यांच्या Make Me an Instrument: The Humble Journeys of a Everyman या पुस्तकातील एका भागावर आधारित आहे, ज्याला The Taxi Ride या नावाने ओळखले जाते. या कथेचा कोणताही एक अधिकृत ‘एकुलता एक’ अनुवादक नाही. ही कथा प्रामुख्याने सोशल मीडिया (फेसबुक आणि व्हॉट्सॲप) आणि ब्लॉग्स द्वारे मराठीत लोकप्रिय झाली.-  AI आधारीत जानकारी)

मी एक टॅक्सी चालक आहे. बहुतेक वेळा मी रात्रीची पाळी करतो. गेल्या आठवड्यात रात्री साधारण अकरा वाजता एक वयस्कर गृहस्थ माझ्या टॅक्सीत बसले. पांढ रा कुर्ता, धोतर, थकलेले डोळे—पण त्यांच्या आवाजात एक वेगळीच ठामपणा होता.

टॅक्सीत बसताच ते म्हणाले,

“आज रात्री तू मला पाच ठिकाणी घेऊन जायचे आहे. मी तुला ५००० रुपये रोख देईन. पण प्रवास संपेपर्यंत ‘का?’ असा एकही प्रश्न विचारायचा नाही.”

त्यांनी माझ्या हातात एक चिठ्ठी दिली. त्यावर पाच पत्ते लिहिले होते.

पहिला थांबा

दक्षिण कोलकात्यातील एक जुने घर. मी गाडी थांबवली. ते खाली उतरले नाहीत. फक्त काच खाली करून त्या घराकडे शांतपणे पाहत राहिले. दहा मिनिटे गेली. त्यांच्या डोळ्यांतून अश्रू वाहत होते, पण आवाज नव्हता.

“चला… पुढच्या ठिकाणी जाऊया,” ते हळूच म्हणाले.

दुसरा थांबा

एक प्राथमिक शाळा. गेट बंद होते. आत अंधारात खेळाचे मैदान दिसत होते. ते गाडीतून उतरले आणि हळूहळू झोपाळ्याजवळ गेले. त्यावर बसून हलके हलके झोके घेऊ लागले. वीस मिनिटांनी ते परत आले.

ते म्हणाले, “इथे मी ४३ वर्षे शिक्षक म्हणून काम केले. माझ्या आयुष्यातील सर्वात सुंदर काळ इथेच गेला.”

तिसरा थांबा

एक छोटंसं जुने कॉफी हाऊस. ते आत गेले आणि चहाचा एक कप मागवला. एका कोपऱ्यात बसले, पण चहाला हातही लावला नाही. फक्त आजूबाजूला पाहत बसले. पंधरा मिनिटांनी हलकंसं हसत बाहेर आले.

ते म्हणाले, “इथेच मी पहिल्यांदा उमादेवीला भेटलो होतो… १९६९ साली.”

चौथा थांबा

निम्ताला स्मशानभूमी. ते खाली उतरले. एका स्मृतीफलकासमोर उभे राहून काहीतरी पुटपुटत होते—जणू प्रार्थना करत होते. अर्ध्या तासाने परत आले तेव्हा त्यांचे डोळे लाल झाले होते.

ते म्हणाले, “ती गेल्याला आता तीन वर्षे झाली.”

पाचवा थांबा

एक मोठे सरकारी रुग्णालय. त्यांनी गाडी थांबवायला सांगितले. मग माझ्याकडे पाहून म्हणाले,

“आता मी तुला कारण सांगतो. मला चौथ्या टप्प्यातील कॅन्सर आहे. डॉक्टर म्हणतात—काही आठवडे… कदाचित काही दिवसच उरले आहेत. म्हणून आज रात्री माझे संपूर्ण आयुष्य शेवटच्या वेळेस पाहून घ्यायचे होते.”

.. .. हे ऐकून मी स्टेअरिंगवर डोके टेकवून रडू लागलो.

ते शांतपणे म्हणाले—

“ते घर… जिथे मी माझी मुलं वाढवली.

ती शाळा… जिथे मला माझ्या आयुष्याचा उद्देश सापडला.

ते कॉफी हाऊस… जिथे मी प्रेमात पडलो.

ते स्मशान… जिथे मी माझ्या पत्नीला शेवटचा निरोप दिला.

आणि हे रुग्णालय… जिथे आज मी दाखल होणार आहे. मी पुन्हा घरी परतणार नाही.”

.. .. .. त्यांनी ५००० रुपये माझ्या हातात दिले.

“धन्यवाद. तू मला माझे आयुष्य पुन्हा एकदा पाहायला मदत केलीस. माझ्या आयुष्यातील शेवटचा अपरिचित माणूस—पण खूप माणुसकीने वागणारा.”

मी म्हणालो, “नको तात्या, हे पैसे मी घेऊ शकत नाही.”

ते म्हणाले, “घे. हे देण्यासाठी माझ्याकडे आता कोणी नाही. माझी मुलं माझ्याशी बोलत नाहीत. मित्रही उरले नाहीत. पण तू मला तीन तास दिलेस—तीन तास माणुसकीचे. त्याची किंमत पैशापेक्षा जास्त आहे.”

त्यांनी आपली छोटी बॅग घेतली आणि रुग्णालयात आत गेले.

दुसऱ्या दिवशी मी फुलांचा गुच्छ घेऊन त्यांना भेटायला गेलो. त्यांनी मला पाहून हलकंसं हसलं.

“तू आलास?”

मी म्हणालो, “तुम्हाला असंच सोडून येणं मनाला पटत नव्हतं.”

आम्ही दोन तास बोललो—त्यांच्या पत्नी उमादेवीबद्दल, त्यांच्या विद्यार्थ्यांबद्दल, आणि दूर गेलेल्या मुलांबद्दल.

मी रोज जाऊ लागलो. चहा घेऊन जायचो, त्यांना वर्तमानपत्र वाचून दाखवायचो. कधी कधी फक्त त्यांच्या शेजारी शांत बसायचो.

एकदा ते म्हणाले,

“मी एकटाच मरणार असं वाटत होतं. पण तू आता इथे आहेस. शेवटी एक अपरिचितच कुटुंबासारखा झाला—हेच माझं भाग्य.”

मी त्यांचा हात हातात घेत म्हणालो,

“तुम्ही एकटे नाही.”

दुसऱ्या दिवशी पहाटे ३:१७ वाजता त्यांचं निधन झालं. मी त्यांचा हात धरून तिथेच बसलो होतो.

त्यांचे शेवटचे शब्द होते—

“सगळ्यांना सांग… अपरिचित लोकांकडे लक्ष दे. आपण सगळे कुठेतरी निघालो आहोत. काहीजण जलद, काहीजण हळूहळू. पण वाटेत माणुसकी दाखवत जा. तू तसं केलंस… आणि माझे शेवटचे दिवस सुंदर केलेस.”

मॉनिटरचा आवाज थांबला… आणि सरळ रेषा दिसू लागली.

त्यांच्या अंत्यसंस्काराला फक्त सहा लोक होते—

मी, तीन परिचारिका, एक वकील आणि त्यांचा एक जुना विद्यार्थी.

४३ वर्षांचे अध्यापन.

५२ वर्षांचा संसार.

८१ वर्षांचे आयुष्य… आणि शेवटी फक्त सहा माणसं.

त्या दिवशी मला एक मोठा धडा मिळाला—

प्रत्येक अपरिचित माणूस कोणाच्या तरी आयुष्याचं संपूर्ण जग असतो.

प्रत्येक प्रवाशामागे एक कथा असते.

प्रत्येक माणूस जगत असतो… आणि कुणीतरी आपल्याला समजून घ्यावं, इतकीच त्याची अपेक्षा असते.

आजही ते ५००० रुपये मी खर्च केलेले नाहीत. ते माझ्या टॅक्सीतच ठेवले आहेत. कारण प्रत्येक प्रवासी कदाचित आपल्या आयुष्याच्या शेवटच्या प्रवासावर असू शकतो.

त्या एका शिक्षकाने मला शिकवले—

माणुसकी ही काही अतिरिक्त गोष्ट नाही; तीच खरं आयुष्य आहे.

चला… आपणही असा प्रयत्न करूया.

कदाचित आपल्याला  भेटणारा एखादा अपरिचित माणूस त्याच्या आयुष्याच्या शेवटच्या प्रवासात असेल.

आपण त्याच्या आयुष्यात थोडासा का होईना, प्रकाश आणि माणुसकी देऊया.

माणूस म्हणून जन्माला आलो, तर माणुसकी विसरून कसं चालेल?

अनुवादक : डॉ. सुभाष भोसले

(हा एखाद्या टॅक्सी चालकाचा खरा अनुभव आहे की एखाद्या लेखकाची कल्पित कथा आहे, हे मला माहीत नाही. कोणीतरी हे इंग्रजीतून कन्नडमध्ये भाषांतर केले होते. मी ते कन्नडमधून मराठीत अनुवाद करण्याचा प्रयत्न केला आहे. वाचलेल्या मजकुरात थोडेफार बदल करून, चांगला संदेश देण्याच्या सद्भावनेने येथे शेअर करत आहे). 

प्रस्तुती : श्री मोहन निमोणकर

संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो.  ८४४६३९५७१३.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “शुभेच्छांचा दिवा तेवता राहो…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “शुभेच्छांचा दिवा तेवता राहो…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर

शुभेच्छांचा दिवा तेवता राहो… 

                             “गुढीपाडवा शुभेच्छा”

आज मराठी नववर्षाची सुरुवात होत आहे, म्हणजे शालिवाहन शके १९४८ चा पहिला दिवस चैत्र शु १.

आपणा सर्वांना गुढीपाडव्याच्या खूप खूप शुभेच्छा.

गुढी पाडव्याला मराठी नवीन वर्षाच्या आपण जेव्हा शुभेच्छा देतो तेव्हा त्या ३६५ दिवसांकरता असतात. वर्ष सुरु होतांना पहिल्या दिवशी सगळीकडेच शुभेच्छांची भरपूर देवाण घेवाण सुरु असते, त्यामुळे तो दिवस छान जातो.

.. .. .. पण ज्यांना आपण शुभेच्छा दिल्या त्यांचे पुढचे ३६४ दिवस आनंदाचे जाण्याकरता शुभेच्छा देणाऱ्यांची काहीच हालचाल नसते. नुसते एक दिवस हॅपी न्यू ईयर म्हणून संपूर्ण वर्ष नक्कीच आनंदाचे जाणार नसते.   

ह्या दिलेल्या आणि घेतलेल्या शुभेच्छा जर आपल्याला वर्षभराकरता फलद्रुप करायच्या असतील, म्हणजे हा शुभेच्छांचा दिवा जर आपल्याला वर्षभर तेवत ठेवायचा असेल, तर आपल्याला त्यात कायम तेल टाकत रहायला पाहिजे, म्हणजे त्याकरता वर्षभर काहीतरी करत रहायला पाहिजे.

आपण स्वतः जर वर्षभर आनंदी असलो तरच आपण इतरांना वर्षभर आनंद देऊ शकतो. आणि त्याकरता खालील सोपे सोपे बदल आपण स्वतःमधे करायचे आहेत –

मला जर कायम आनंदी राहायचे असेल तर हेल्दी बॉडी आणि हेल्दी माईन्ड, हीच प्रूव्हन व्दिसूत्री आहे. ही व्दिसूत्री अस्तित्वात उतरवण्याकरता अतिशय सोपे / कुठलाही साईड इफेक्ट नसणारे / खर्च नसणारे, आध्यात्मिक गुरूंनी दिलेले  प्रिस्क्रिप्शन  हे असे आहे – — 

  • १)  रोज स्वत:करता एक तास द्या, त्यामधे –
  • २५ मिनिटे चालणे : मस्त बूट घाला, रंगीबेरंगी कपडे घाला. मोबाईल घरी ठेवा. फिरतांना ‘बिग नो’  टू घरगुती वाद  / नकारात्मक चर्चा.  रमतगमत चालणे – नो वे !  स्विफ्ट चालायचे आहे, ताठ चालायचे आहे.
  • १५ मिनिटे प्राणायाम -. ५ मिनिटे अनुलोम – विलोम,  ५ मिनिटे दीर्घ श्वसन, ५ मिनिटे ओंकार जाप.
  • १० मिनिटे  ध्यान  :  विचारशून्य अवस्थेमधे बसणे
  • १० मिनिटे व्यायाम : आपल्या शरीराच्या सर्व सांध्यांची हालचाल होईल असे अगदी सोपे व्यायाम आपल्याला करायचे आहेत. आपण शाळेमध्ये पीटी च्या तासाला करायचो, साधारण तसेच.

आठवड्यातून ५ दिवस केले तर चालेल का ? वगैरे, असे कुठलेही ऑपशन्स याला नाहीत.

२) कळते पण वळत नाही —

‘कळते पण वळत नाही’ या म्हणीतून, या वर्षी आपल्याला पूर्णपणे बाहेर पडायचे आहे. म्हणजे जे कळते, त्याला आता वळते करायचे आहे. तब्येत छान राहण्याकरता ‘जंक फुड खाऊ नका’, ‘अति तेलकट-तुपकट खाऊ नका’, ‘साखरेचा अतिरेक टाळा’, हे पण आपल्याला कळत असतं, पण वळत नसतं. ज्या ज्या गोष्टींकरता, आपण ही म्हण वापरतो, त्या सगळ्यांना या वर्षी वळते करायचे आहे.

३) आलिया भोगासी असावे सादरं – चित्ती असू द्यावे समाधान —

ज्या गोष्टी आपल्या आयुष्यात घडतात, त्यांचा मनापासून स्वीकार करायचा. प्रत्येक परिस्थितीमध्ये समाधानी असणे, फार महत्वाचे असते. समाधानी माणूसच मनन करू शकतो आणि परिस्थिती बदलू शकतो.

अप्रिय घटनांवर मनन केलं, तर समजू  शकतं, की,  आपलंच ‘असं – असं’ चुकलं होतं, किंवा आपण कुणाची तरी मदत घ्यायला पाहिजे होती. आणि चूक सुधारून पुन्हा आपल्याला घोडदौड सुरु करता येते.   

 ४) संवाद —

घरामध्ये आई-वडील, मुलं-मुली, सासु-सासरे, नवरा-बायको यांच्यात खेळीमेळीचे वातावरण असेल, तर घर आनंदी राहतं आणि ओघानीच आपण पण आनंदी राहतो. आणि याकरता जरूर आहे संवादाची.

एकमेकांची विचारपूस करणे, काय हवे-नको ते विचारणे, इतरांच्या चांगल्या कामाचे नेहेमीच मनापासून कौतुक करणे – प्रशंसा करणे, या गोष्टींना या वर्षी महत्व द्यायचे आहे.

५) कुणी काय करावं हा ज्याचा त्याचा प्रश्न आहे —-

रोजच्या आपल्या प्रवासात अनेक गोष्टी आपल्या मनाविरुद्ध घडत असतात. अशावेळेस, ह्यानी असं कां केलं ? त्यानी असं कां केलं ? हा असं कां वागतो ? वगैरे, काथ्याकूट करण्यात आपण आपली सगळी ऊर्जा वाया घालवतो आणि हातात काहीच येत नाही. ज्ञानी मंडळी सांगतात – कुणी काय करावं हा ज्याचा त्याचा प्रश्न आहे.  प्रत्येकाचा स्वभाव हा वेगळा असतो, हा निसर्गाचा नियमच आहे. प्रत्येक झाडाचा स्वभाव वेगळा असतो, प्रत्येक प्राण्याचा स्वभाव वेगळा असतो. स्वभावाला औषध नक्कीच असते. पण ते  फक्त स्वतःचा स्वभाव बदलण्याकरता  – इतरांचा नाही. मी काय करावं एवढाच सोपा विचार मला करायचा आहे.

६) वर्तमानकाळात रहा —

आपण आपला ५० % वेळ भूतकाळातल्या कडू आठ्वणी उगाळण्यात घालवतो आणि ५० % वेळ भविष्याची काळजी करण्यात घालवतो. त्यामुळे ताणतणाव हेच आपले आयुष्य बनते. मन आणि शरीर यांना बरोबर ठेवणे, यालाच वर्तमानकाळात राहणे असे म्हणतात, यालाच योगसाधना म्हणतात, यालाच ध्यान म्हणतात. ताणतणाव मुक्ती करता हीच आनंदी राहण्याची महाऔषधी आहे.

७) कायम आनंदी चेहेरा —

कायम आनंदी चेहेरा – ही आरोग्याची गुरूकिल्ली आहे. रस्त्यावर हातगाडी घेऊन हिंडणारे भंगारवाले नेहेमीच हसतमुख असतात. चहाची टपरी चालवणारे / रस्यावर झाडलोट करणारे, कायम हसतमुख असतात. मग आपलाच चेहेरा  एरंडेल तेल प्यायल्यासारखा का असतो ?

आपण नकारात्मक व्यक्तींपासून दूर राहिलो आणि सकारात्मक-हसतमुख व्यक्तींना जवळ केले, तर हमखास हसतमुख राहता येते. आपल्या आवडीचे छंद, जसे वाद्य वाजवणे, गाणी म्हणणे, चित्रकला, वगैरे यामध्ये जर आपण रमलो तर आपल्या चेहेऱ्यावर हमखास आनंद फुलतो.

– – – मी जेव्हा समोरच्याला वर्ष आनंदाचे जावो अशा शुभेच्छा देतो, तेव्हा माझा वर्षभर असा रोल असायला पाहिजे, कि, वर्षभर माझ्या प्रत्येक कृतीमधून, मी त्या व्यक्तीला आनंदच दिला पाहिजे. चांगले बोलून आनंद दिला पाहिजे. जरुरीच्या वेळेस मदतीचा हात पुढे करून आनंद दिला पाहिजे. कामासंबंधी विचारपूस करून आनंद दिला पाहिजे. घरच्यांची खुशाली विचारून आनंद दिला पाहिजे. नेहेमी संपर्क ठेवून आनंद दिला पाहिजे. असे वर्षभर करत राहणे, यालाच खऱ्या अर्थानी भरीव / ठोस शुभेच्छा देणे असे म्हणता येईल. हा बदल आपल्याला ह्या वर्षी नक्कीच करायचा आहे.

चला तर मग –  यावेळेस शुभेच्छांची देवाण घेवाण करतांना देणाऱ्यांनी  “ठोस” बनायचे आहे, आणि शुभेच्छा घेणाऱ्यांनी पण  “ठोस” बनायचे आहे. 

नवीन वर्षाकरिता माझ्याकडून तुम्हाला खूप खूप आणि “ठोस” हार्दिक शुभेच्छा ! ! !

हे नवीन वर्ष आपणा सर्वांना आनंदानी आणि उत्साहानी भरलेले असो, आणि मंगलमय असो.

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “अंकल…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “अंकल…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

“तुजसे नाराज नही जिंदगी,हैरान हू मै,परेशान हू मै….”गेले काही दिवस अशी अवस्था झालेली.मन थाऱ्यावर नव्हतं.सगळं व्यवस्थित चाललेलं.फार काही टेंशन नव्हतं तरीसुद्धा खूप उदास वाटत होतं.निराशा दाटलेली. मनापासून आनंद घेता येत नव्हता.यांत्रिकपणे रोजची कामं चाललेली.डॉक्टर मित्राच्या सल्ल्यानुसार तपासण्या केल्या पण रिपोर्ट नॉर्मल आले.विचार करून डोकं फुटायची वेळ आली. म्हणून अंकलना भेटायला गेलो.

“अरे वा,वा,चौथा खांब या”अंकलनी नेहमीसारखं हटके स्वागत केलं. 

“आता हे काय नवीन?”

“अरे तू मीडियावाला ना.लोकशाहीचा चौथा खांब….”

“प्रत्येकवेळी नवनवीन नावं द्यायला कसं सुचतं”

“आई शप्पथ!!मलाही माहीत नाही पण सुचतं आपोआप” डोळे मिचकावत अंकल म्हणाले.

“तुमच्याकडे आलं की छान वाटतं.एकदम मस्त फिलिंग” 

“म्हणूनच बऱ्याच दिवसांनी नव्हे महिन्यांनी भेटतोयेस.”

“इच्छा होती पण कामाच्या गडबडीत जमलं नाही”

“कसा आहेस”अंकलनी विचारल्यावर ओशाळल्यासारखं झालं वास्तविक मी विचारपूस करायला पाहिजे होती पण लक्षातच आलं नाही.आताशा आपण साधेसुधे मॅनर्स देखील विसरत चाललो आहोत.

“मी ठीकयं.तुम्ही कसे आहात.”

“मस्त,मजेत नेहमीसारखा”

“फार पेशंट दिसत नाहीत.”

“आता गर्दी स्पेशालिस्टकडे.आमच्यासारखे जुने डॉक्टर आता आऊटडेटेड.”

“एक विचारू..पर्सनल आहे”

“बिनधास्त”

“तुम्हांला कधीच हताश,कंटाळलेलं पाहिलं नाही.इतकी एनर्जी कुठून आणता.कायम फ्रेश असता. याचं सिक्रेट मलाही सांगा.”

“आयुष्य सोपं केलंय.”

“म्हणजे”

“मला आनंदी रहायला आवडतं म्हणून तसं राहण्याचा प्रयत्न करतो.”

“पण तरीही,त्रास असणारच ना.ते कोणाला चुकलेत”

“त्यालाच तर आयुष्य म्हणतात.समोर येईल ते स्वीकारायचं म्हणजे त्रासाची तीव्रता कमी होते.त्यासाठीच काही सवयी मुद्दाम लावून घेतल्यात आणि काही बदलल्या.”

“उदारणार्थ..”

“आपली कुवत,मर्यादा ओळखून वागतो आणि स्पष्टपणे ‘नाही’ म्हणायला शिकलोय.शक्य तेवढंच काम करतो.महत्वाचं म्हणजे कमी अपेक्षा ठेवतो त्यामुळे फार प्रॉब्लेम निर्माण होत नाही.”

“ऐकायला चांगलं वाटलं तरी प्रत्यक्षात असं वागणं फार अवघडयं.”

“हो पण अशक्य नाही.”

“आजकाल पैसा आहे पण मन शांत नाही असं का?.

“दिखाऊपणाच्या नादात आपणच आयुष्य अवघड करतो.अनेक त्रास स्वतःहून ओढावलेले असतात.मोठ्ठ कर्ज काढून खरेदी करायची आणि ईएमआयची वाळवी मेंदूला लावून घ्यायची.त्याचा तब्येतीवर परिणाम होतो.भरिस भर ताण आणि मोबाईल कायम सोबतीला असल्यानं सतत अस्वस्थ.”क्षणभर अंकल माझ्याविषयीच बोलत आहेत असं वाटलं. 

“पण तुम्हांलाही त्रास झाला असेलच ना.”

“खूप त्रास झाला.धाडस नाही.

अल्पसंतुष्ट,कचखाऊ,पळपुटा,डेरिंग नाही वगैरे वगैरे अशी भरपूर नावं मिळाली.“कुछ तो लोग कहेंगे” म्हणत सोडून दिलं.माझा निर्णय बदलला नाही अर्थात बायकोच्या पाठिंब्यामुळेच हे शक्य झालं. आता आम्ही आनंदी आहोत. गरजेपुरता पैसा गाठीशी आहे.मुलाच्या संसारात डोकावायला नको म्हणून मुद्दाम वेगळं राहतो.एक रुपयाचं सुद्धा कर्ज नाहीये.रोजचा व्यायाम आणि जिभेवरचा ताबा यामुळं तब्येत उत्तम,जमेल तसं सहलीला जातो.एकूणच मस्त आयुष्य चाललंय.”अंकलचं ऐकून मला त्यांचा खूप हेवा वाटला.

“अजून एक महत्वाचं सांगतो.”

“काय ते..”

“आपले प्रॉब्लेम्स स्वतःलाच सोडवावे लागतात.प्रेमपत्र कितीह सुंदर लिहिलेलं असलं तरी जाहिरारित्या वाचायचं नसतं. तसंच आपले प्रॉब्लेम कितीही मोठे आणि महत्वाचे असले तरी इतर त्यांच्याशी कनेक्ट होऊ शकत नाही.त्यात आजकाल तर मदत करण्याऐवजी सल्लाच दिला जातो.”

“थोडक्यात काय तर दाढदुखीचा ठणका ज्याचा त्यालाच सहन करावा लागतो.”

“करेक्ट.नेमकं बोललासं.उदाहरण आवडलं”

“तुमच्याकडूनच शिकलोय.हसू नका पण मी सुद्धा मदत मागायलाच आलोय.”

“ते लक्षात आलं.तू मागतोय म्हणून सल्ला देईन पण मान्य करायचा की नाही याचा निर्णय तुलाच घ्यायचाय.माझा आग्रह नाही.” अंकलशी बराच वेळ गप्पा मारल्या.मनातली खदखद मोकळी केल्यावर शांत वाटलं.अंकल काहीच बोलले नाहीत. 

“काही सीरियस”भीती भीत विचारलं.

“काहीही झालं नाहीये.हे मानसिक दुखणं आहे.टेंशन घेऊ नकोस.”

“विनाकारण उदास,निराश का वाटतं.”

“होतं असं.सर्व काही ठीक असलं तरी अनामिक काळजी वाटतेच.खूप विचार करतोस का?”

“हो.”

“विचारांची धुनी कायम पेटलेली.अनावश्यक, संदर्भहीन विचार येतात. स्वतःचाच राग येतो.घुसमट वाढते.शांत झोप नाही.मेंदू कायम सावध.करेक्ट!!”

“असंच होतयं.परफेक्ट निदान केलंत.पक्के मनकवडे आहात.हे कशामुळं?.”

“एकसूरी आयुष्य!!आजच्या भाषेत बोलायचं तर मोनोटोनस लाईफ!!सगळंच वरवरचं,तकलादू,तेच ते अन तेच ते आयुष्य.त्यातही आनंद घेण्यापेक्षा दाखवला जातो.त्यामुळे मन अस्थिर. एकाग्रता फार काळ टिकत नाही.भान हरपून जावं असं घडत नाही.स्वतःची नेमकी आवड,छंद कोणते?हेच समजत नाही.मेंढरांसारखे एकमेकांच्या पाठीमागे फरफटत जाऊन नकली आनंदी घेत राहतो.”

“अगदी खरंय,मी पण तेच करतोय.आवड साफ विरसलोय .”

“आधी त्याचा शोध घे.जे केल्यानं छान वाटतं,मूड चांगला होतो,आनंद मिळतो ते ते सर्व कर.आतापर्यंत घर,संसार,मुलं यांच्यासाठी केलसं.थोडं स्वतःसाठी जग…..आणि आता आज एवढा  डोस बास!!बाकी तू हुशार आहेस.चला”

“मी घरी सोडतो.”

“नको.माझी मर्सिडिज आहे ना” सायकलकडे बोट दाखवत अंकल हसले.मी वाकून नमस्कार केल्यावर  “कल्याणमस्तु!!” असा आशीर्वाद देऊन सायकलवर टांग मारून निघून गेले.पाठमोऱ्या अंकलकडे पाहताना अचानक डोक्यात ट्यूब पेटली लहाणपणी मला सायकल खूप आवडायची. भरपूर चालवली आणि नंतर सायकल सुटली ती कायमचीच.गेल्या कित्येक वर्षात सायकलला हातच लावला नव्हता.ठरलं तर मग…… नकळत तोंडातून शब्द बाहेर पडले “ थॅंक्यू अंकल.” 

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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