(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भरे पेट का ज्ञान…“।)
अभी अभी # १०१९ ⇒ आलेख – भरे पेट का ज्ञान श्री प्रदीप शर्मा
ज्ञान बांटने, और ग्रहण करने के लिए, पेट का भरा होना अत्यावश्यक है। जब भूखे पेट भजन नहीं हो सकता, तो ज्ञानार्जन अथवा ज्ञान का विसर्जन कैसे संभव है।
भक्ति और ज्ञान की भूख किसे नहीं होती। होते हैं कुछ दानवीर, जो खुद भूखे रहकर भी औरों की भूख मिटाते हैं। ज्ञान का भी ऐसा ही है। सुना है, ज्ञान बांटने से बढ़ता है। इसलिए आपके पास ज्ञान हो या न हो, बांटने में ही इतना ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि मस्तिष्क में ज्ञान का भंडार जमा हो जाता है। ।
मंदिरों में आरती, प्रसाद, भंडारे का भी कारण यही है कि प्रसाद की आस में हमें कई आरतियां, प्राथनाएं याद हो गई ! आंख बंद करके जब आरती गाते थे, तब आंखों के सामने प्रसाद तैर जाता था। कभी पंडित जी प्रसन्न हुए तो पूरा लड्डू, कभी सिर्फ थोड़ा सा चूरा। तब से ही संतोष की आदत सी पड़ गई है। जिस दिन पंजेरी और ककड़ी का प्रसाद होता था, हथेली इतनी छोटी पड़ जाती थी, कि प्रसाद लेकर बाहर ग्रहण करते ही, कमीज़ से हथेली पोंछकर पुनः प्रसाद की लाइन में लग जाया जाता था।
ज्ञान की भूख इंसान को कहां कहां ले जाती है। कभी लाइब्रेरी तो कभी सरस्वती पुस्तक सदन और कभी काफी हाउस। कॉफी में ऐसा क्या है जो ज्ञान की भूख बढ़ाता है। कॉफी हाउस की कुछ कुर्सियां तो साक्षात व्यास पीठ नजर आती हैं। पूरा कॉफी हाउस किसी कथा के पांडाल की तरह, उनकी प्रतीक्षा किया करता है। उनकी सीट भी आरक्षित होती है। सभी जानते हैं, वे बहुत बड़े लेखक हैं। उनका आज का ज्ञान कल किसी पुस्तक का ज्ञान बनने वाला है, जिसे साहित्यिक पुरस्कार मिलना तय है। उनकी ओछी हरकतों और अश्लील इशारों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। ।
उम्र के साथ साथ पेट की जठराग्नि कम होती चली जाती है और बात बात पर खाने को उतारू आदमी, कम और गम खाने लगता है। आसाराम से जला आदमी, हर संत की ओर फूंक फूंक कर कदम रखता है। लेकिन ज्ञान मार्ग की ओर एक बार उठे कदम, कभी वापस नहीं लिए जाते।
जब तक इंसान का पेट भरा रहेगा, संसार में ज्ञान का आगार कायम रहेगा। जब भी किसी को ज्ञान पेलें, यह ध्यान रखें, कहीं वह भूखा न हो, वर्ना खाने को दौड़ पड़ेगा। इसीलिए कवि गोष्ठियों में आजकल चाय नाश्ते का प्रबंध भी रखा जाने लगा है। नेताओं को तो भाषण के बीच सड़े टमाटर और अंडे खाने की आदत पड़ चुकी है। लेकिन आजकल वे भी समझदार हो गए हैं। टीवी और सोशल मीडिया पर ही ज्ञान बांटते हैं। अब आप टीवी का स्क्रीन फोड़ने से तो रहे। ।
डिजिटल जगत में दुनिया का सारा ज्ञान सिमटकर फेसबुक पर आ गया है। सभी तरह के बौद्घिक विमर्श और कविता पाठ फेसबुक पर लाइव चल रहे हैं। जब तक आपका मुंह चलता रहे, पेट पूजा होती रहे, अपनी रुचि एवं स्वादानुसार इसे ग्रहण करते रहिए। उम्मीद है इसमें सब सार सार ही है, थोथा बिल्कुल नहीं। क्या भरोसा कभी आपको भी इस प्रकार का ज्ञान बांटने का अवसर मिल जाए …!!!
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के चुनिन्दा साहित्य को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करते रहते हैं। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं।)
(ई-अभिव्यक्ति में “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से अमूल्य और ऐतिहासिक तथ्यों को सहेजने का प्रयास है। दस्तावेज़ में ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेजों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है मारिशस से आदरणीय श्री रामदेव धुरंधर जी द्वारा उनके ८० वें जन्मदिवस के अगले दिन अपने प्रिय मित्रो और सहृदय पाठकों को धन्यवाद ज्ञापन स्वरुप सन्देश और हमारे लिए भविष्य का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “कृतज्ञता ज्ञापन तथा मेरी अपनी कुछ बातें“। उनके जन्मदिवस के अवसर पर )
यह विशेष प्रसन्नता का विषय है कि इस शुभ अवसर पर सर्व भाषा ट्रस्ट की ओर से उनकी बहुमूल्य साहित्य-साधना को समेटती ‘रामदेव धुरंधर रचनावली’ (12 खंडों में) पाठकों के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। हमें विश्वास है कि यह रचनावली हिंदी साहित्य-जगत के लिए एक महत्त्वपूर्ण धरोहर सिद्ध होगी। इसका संपादन डॉ दीपक पाण्डेय एवं डॉ नूतन पाण्डेय जी ने किया है।
ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से मॉरिशस के लोकप्रिय एवं वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय रामदेव धुरंधर जी को उनके 80वें जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अभिनंदन 💐🙏
☆ दस्तावेज़ # ३१ – मारिशस से ~ कृतज्ञता ज्ञापन तथा मेरी अपनी कुछ बातें☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मेरी जन्म तिथि 11 जून 2026 के अवसर पर बहुत से मित्रों ने मेरे प्रति मंगलकामना के शब्द प्रेषित किये हैं। मैंने हर नाम को ध्यान से पढ़ने के साथ संलग्न शब्दों को भी पढ़ा और आत्मसात तो निश्चित ही किया। मेरे हिन्दी लेखन के प्रति मित्रों का यह आत्मीय अवदान है। आज यह आलेख लिखते वक्त मुझे थोड़ा विस्मय हो रहा है मैंने कल अस्सी पार कर दी। मैं अब बार — बार लिखता हूँ मेरे लिए यह उम्र बहुत है। यह अनुभव करने से ही मैं ऐसा लिखता हूँ।
फेसबुक ने एक सुविधा की नींव स्थापित कर दी है और मैं भारतेतर हिन्दी लेखक इससे कुछ — कुछ लाभ अर्जित कर लेता हूँ। अन्यथा पहले तो मैं पत्रों से काम लेता था। पत्र के आने — जाने में तो महीने लग जाते थे। पर आज समय परिवर्तित हुआ है। इन दिनों मैं फेसबुक में नित्य एक रचना डाल देता हूँ और उसकी लिखित प्रतिक्रिया मुझे प्राप्त हो जाती है। हाथ से लिखे जाने और पांडुलिपि डाक से भेजने के दिनों भी मैंने बहुत ही लिखा। पर इधर के दिनों में एक तो लेखन में रफ्तार आई और फेसबुक के आधार पर हजारों मित्रों से तारतम्य बनाने का संयोग हाथ लगा है। मैं मानता हूँ इस सुविधा ने मुझे लेखन में कुछ कदम आगे तो बढ़ाया ही है। तमाम — तमाम लेखक हैं जिनकी ओर मैंने हाथ बढ़ाया और उन्होंने स्वीकृति की मुहर से मेरे जेहन में अपने लिए स्थान बना लिया। उन्होंने भी अपनी ओर से मित्रता की पहल की।
मैं धर्मयुग और सारिका के जमाने से लिखा करता था बल्कि हिन्दी जगत में स्थापित होने के लिए यही मेरा आधार हुआ। मैं सरकारी स्कूल में हिन्दी का अध्यापक था। [1970 – 1976 ] मेरी पहली नियुक्ति रोमन कैथोलिक एडड् स्कूल में हुई थी। वहाँ मुझे हिन्दी का उद्धाटन करना था। रोमन कैथोलिक एडड् स्कूल होने से वहाँ अंग्रेजी फ्रेंच के अध्यापक सब के सब क्रिश्चियन थे। मैं अपने को बहुत अजनबी अनुभव करता था, बल्कि वे स्वयं मुझे अजनबी के कगार पर खड़ा देखना पसंद करते थे। यह लगभग क्रिओल इलाका था। भारतीय खून के बहुत से लोग स्वयं आ कर कह जाते थे उनके बच्चे हिन्दी पढ़ना पसंद नहीं करते। यह सुनने पर स्कूल के क्रिश्चियन टीचरों के बीच तो नाच का समा बंध जाता था। आज मॉरिशस के हिन्दी अध्यापक पता नहीं मेरी इन बातों को किस अर्थ में लें। तब के जिन हिन्दी अध्यापकों से आज मुलाकात हो जाती है हम वे अतीती बातें कर लेते हैं। हमारे साथ निश्चित ही यह बात साकार है हमने अपना जंगल काट कर स्वयं अपनी पगडंडी बनायी है।
अपने हिन्दी लेखन को भी मैं इसी वाक्य से जोड़ता हूँ। जंगल हो और मुझे धुन चढ़ गई हो मैं अपनी पगडंडी का निर्माण तो कर ही लूँ।
एक स्कूल से दूसरे स्कूल के लिए मेरा तबादला होता रहता और अवकाश वाली साठ की उम्र मेरे शरीर में दस्तक देने आ जाती। इस वक्त मैं अपनी जीवनी तो न लिख रहा हूँ, लेकिन जरूर अपने जीवन में हिन्दी का अनंत अनुराग समाहित होने की एक तस्वीर की रचना कर रहा हूँ। मैंने जिस स्कूल की पूर्व पँक्तियों में चर्चा की उन्हीं दिनों मुझे नागपुर में [ 1975 ] आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिल गया था। इसका श्रेय मेरे कहानी लेखन को जाता। मैं धर्मयुग और सारिका के माध्यम से कुछ प्रसिद्धि हासिल कर चुका था। उन दिनों तो फोन तक का खास बोलबाला नहीं था। शिक्षा मंत्रालय से अधिकारी यह सूचना मुझे देने मोटर में स्कूल आए थे। उन्हें स्कूल की बही में लिखना था मुझे कितने दिनों की छुट्टी चाहिए। स्कूल की हेड क्रिश्चियन महिला होने से उसने तो इस तरह से जताया था भारत तो उसके लिए एक अपरिचित देश है। उन्हीं दिनों एक क्रिश्चियन महिला टीचर ऑस्ट्रेलिया जा रही थी। उसका पति ऑस्ट्रेलिया में रहता था। उस स्कूल से विदेश जाने वाला तो मैं उस महिला के समकक्ष था, लेकिन स्कूल में मात्र उसके नाम पर पार्टी रखी गई थी। मैंने महिला हेड टीचर को बाध्य किया था भारत से जोड़ कर मेरा नाम लिया जाए।
भारत से लौटने पर मेरे जीवन में ऐसा वक्त आया मेरे लिए फिर से मंत्रालय की ओर से अधिकारी मोटर में स्कूल आए और मुझे ऑफिस में बुला कर सूचित किया गया महात्मा गांधी संस्थान के लिए मेरा तबादला हो रहा है। मैं मंत्री खेर जगतसिंह का तब भी आभारी था और आज भी उनका कर्ज अपने सिर पर मानता हूँ। वे भी नागपुर विश्व हिन्दी सम्मेलन में गए थे। अभिमन्यु अनत तो निश्चित ही वहाँ थे। खेर जगतसिंह ने वहाँ अनत की अद्भुत चर्चा सुनने पर वहीं घोषित कर दिया था महात्मा गांधी संस्थान में वे हिन्दी की गरिमा के लिए अपनी सेवा प्रदान करने जाएँ। अनत प्राइमेरी सरकारी स्कूल में हिन्दी टीचर थे। उनका तबादला क्रीड़ा मंत्रालय के हिन्दी नाट्य विभाग में हो गया था। खेर जगतसिंह का नाम मैं इस वक्त भारतीय भावना के एक महान शख्स के रूप में ले रहा हूँ। उन दिनों वे योजना मंत्री थे। उन्हीं की योजना के तहत महात्मा गांधी संस्थान का निर्माण हुआ था। संस्थान का उद्घाटन भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कर कमलों से हुआ था।
मैं जिस चुनाव इलाके से था खेर जगतसिंह यहीं निर्वाचित हुए थे। मैंने पहले भी लिखा इस वक्त दोहरा रहा हूँ नागपुर में हमारी आपसी पहचान हुई थी। उन्होंने वहाँ मेरा नाम सुना और अनत की तरह मेरा भी इस रूप में एक भविष्य निर्धारित कर दिया महात्मा गांधी संस्थान में हिन्दी के लिए कुछ विशेष रचनात्मक सेवा प्रदान करूँ। अनत वहाँ ‘वसंत’ पत्रिका शुरु कर चुके थे। हमारे प्यारे कवि पूजानन्द नेमा उनके साथ कार्यरत थे। मैं वहाँ जुड़ा तो बच्चों की एक पत्रिका की योजना बनी। हम नाम सोच रहे थे। नाम न मिलने से तो हमने हिडिंबा तक उच्चार दिया था। मेरे मुँह से निकला था रिमझिम। यही नाम मान्य हो गया। अभिमन्यु अनत ने संपादकीय में लिखा था रिमझिम नाम रामदेव धुरंधर की ओर से पारित हुआ है। यह अनत की उदारता थी।
मेरी बात इस तरह से है महात्मा गांधी संस्थान में जाने के बाद मेरे लिए वह मेरा एक नया हिन्दी जगत हुआ। कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, राजेन्द्र यादव, मनोहर श्याम जाशी, नामवरसिंह, गंगाप्रसाद विमल, चित्रा मुद्गल, उनके पति अवध नारायण, डा. विनय तथा और भी अनेक लेखकों को हमने हिन्दी लेखन कार्यशाला संचालित करने के लिए बुलाया। सचमुच यहाँ लेखक तैयार होते थे। इन भारतीय हिन्दी मनीषियों ने यहाँ के लोगों की जुबानी इनकी कहानी कविता सुनी। इन्होंने सराहा भी और निर्देश भी दिया लेखन को कैसा होना चाहिए। यह मैं सन् 2000 से पहले की बात कर रहा हूँ। उन दिनों के हम सभी तो अवकाश ग्रही हो गए। मुझे पता नहीं इधर के दिनों में महात्मा गांधी संस्थान की ओर से उस तरह की कार्यशाला संचालित करने के लिए भारतीय विद्वानों को बुलाया गया हो।
स्वनामधन्य धर्मवीर भारती के सौजन्य से मैं भारत में कहानीकार के रूप में जाना गया। इसी के समानांतर मेरी निजी बात इस तरह से है मैंने महात्मा गांधी संस्थान में तीस साल तक नौकरी निभाने की प्रक्रिया में वहीं लेखन के कुछ गहरे मर्म का संयोग हासिल किया। अनत और नेमा हम तीनों साहित्य की बात तो करते रहते थे।
महात्मा गांधी संस्थान में हिन्दी की बहुतायत पुस्तकें थीं। इस संस्थान ने मुझे पुस्तकों के रेले – मेले में एक मेक कर दिया और मैं था कि जहाँ तक हो सका खूब पुस्तकें पढ़ना शुरु कर दिया। माटी मटाल, ययाति, मैला आंचल, परती परिकथा, ओशो की तमाम पुस्तकें, प्रेमचंद का साहित्यिक खजाना, मोहन राकेश के नाटक, अज्ञेय, निराला, बाणभट्ट की आत्मकथा, शरतचंद के हिन्दी रूपांतरण उपन्यास तथा मेरे मन के लायक और भी तमाम तमाम कृतियाँ मुझे नसीब होती गईं। मैं पुस्तकों से माला माल जैसी स्थिति में पढ़ने के साथ लेखन का रहस्य सीखने का मानो अपना मंत्र साधता रहा।
इस संदर्भ को मैं फेसबुक आगे भी जारी रखूँगा।
अभी के लिए यह बात कर लूँ बहुत से मित्रों ने मेरे जन्म दिन के अवसर पर लिखा, लेकिन मैं एक — एक को उत्तर कर पाना असंभव सा पा रहा हूँ। अतः बिना शाब्दिक वापसी के वह मेरे पास ही रह जाए। आप लोगों के लिए बस धन्यवाद ही।
कल ऐसा भी हुआ था मित्र राजेश सिंह ने मेरा जन्म दिन मनाने के लिए एक खास व्यवस्था की थी। बहुत से लोग जुड़े थे। राजेश ने मुझे बताया लोगों ने मुझ पर आधारित रचना का पाठ किया। राजेश ने कुछ मिनट के लिए मोबाईल से मुझे कार्यक्रम से जोड़ दिया था। आभार राजेश जी।
कल 11 जून को सर्वभाषा प्रकाशन के श्री केशव मोहन पाण्डेय जी ने ‘रामदेव धुरंधर रचनावली’ के कवर पेज से हिन्दी जगत को अवगत करवा दिया। उन्होंने बहुत सुन्दर बनाया है। मेरे अस्सीवें जन्म दिन के अवसर पर प्रकाशक की ओर से यह अनमोल उपहार रहा। स्वाभाविक है लेखक के साथ प्रकाशन की उसकी अपनी तृषा जुड़ी होती है। लेखक के नाते मैं भी तो इस धारा का एक बेबाक तैराक हुआ करता हूँ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बीज भंडार…“।)
अभी अभी # १०१८ ⇒ आलेख – बीज भंडार श्री प्रदीप शर्मा
मेरे शहर में खादी भंडार, अखंड औषधि भंडार, दयाल भंडार और महालक्ष्मी वस्त्र भंडार की तरह कई बीज भंडार भी हैं। पहले हमारे घरों में भंडार गृह भी होते थे, जिनमें वर्ष भर का अनाज और राशन सुरक्षित रखा जाता था।
हमारा यही भंडार अंग्रेजी का स्टोअर्स है, जो घिस घिस कर स्टोर्स हो गया है। किराना के आगे स्टोर्स तो ऐसे लग जाता है, जैसे किसी इंजन के पीछे रेल के डिब्बे। हमारा बाजार भंडार, स्टोर्स, हाउस और सेंटर से भरा पड़ा है। भैया स्टोर्स पर किताबें और स्टेशनरी का भंडार है तो आड़ा बाजार के कंगन स्टार्स पर महिलाओं के श्रृंगार का सामान। इंदौर ग्लास हाउस कोई कांच का घर नहीं, लेकिन वहां कांच ही कांच है। कैफे सेंटर में अगर चाय कॉफी और नाश्ता उपलब्ध है तो गणेश कैप मार्ट पर महिलाओं की भीड़ ही भीड़।
किसानों और बागवानी के शौकीनों के लिए शहर के नंदलालपुरा में आज भी कई बीज की दुकानें हैं। हर दुकान के नाम में बीज भंडार आप आसानी से पढ़ सकते हैं। बीज में कितनी शक्ति है, यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता है। आज जो बीज यहां दुकान पर सुरक्षित रखा है, अगर उसे समय और मौसम के अनुकूल, उचित खाद और मिट्टी के सुपुर्द कर दिया जाए तो एक पौधा तैयार हो जाता है। खेत में फसल लहलहा उठती है, किसान की तकदीर चमक उठती है।।
हमारा शरीर भी महज कोई हाड़ मांस का पुतला नहीं, इसमें ही कहीं गुणों का भंडार है तो कहीं भावनाओं का समुद्र।
मनुष्य को बंडल ऑफ़ हैबिट्स अर्थात आदतों की गठरी भी कहा गया है।
बूंद जो बन गई मोती की तरह ही बीज रूप में सभी कुछ तो हमारे अंदर मौजूद है। जिस बीज को अच्छा पोषण मिलता है, वह पनप कर फलने फूलने लगता है।
मोटे तौर पर हमने इंसान को केवल दो भागों में ही बांटा है, अच्छा और बुरा। अच्छाई के प्रतीक अगर राम कृष्ण हैं तो बुराई के रावण, कंस और दुर्योधन। देवासुर संग्राम क्या अच्छे और बुरे बीजों का आपस में टकराव है। क्या गाजर घास की तरह बुराई के बीज को ही नष्ट नहीं किया जा सकता।।
बीज का एक सिद्धांत है। जो बीज जल जाता है अथवा एक बार उबाल लिया जाता है, आप कितनी भी कोशिश कर लो, उपजाऊ मिट्टी, बढ़िया खाद, हवा पानी कुछ काम नहीं आता। दग्ध बीज कभी नहीं पनपता।
अगर हमारे अंदर पनप रहे बुराई के बीज को जला दिया जाए तो क्या बुराई नष्ट नहीं हो जाएगी। कितना अच्छा हो, इंसानियत के बीज भंडार से अच्छाई का बीज लाया जाए और उसे प्रेम की माटी में सींचा जाए।।
मीरा ने भी तो यही किया था। आंसुओं के जल से प्रेम की बेल को सींचा था और उसे आनंद रूपी फल की प्राप्ति हुई थी। हमारे अंदर के कबीर, मीरा और सहजो कहां चले गए। हमारा प्रेम जनरल स्टोर्स क्यों आउट ऑफ स्टॉक हो गया।
हमारे अंदर के इंसानियत के बीज भंडार का क्या हुआ ? क्या बीज की देखभाल नहीं हुई अथवा बीज को पनपने लायक वातावरण नहीं मिल रहा। राग द्वेष स्वार्थ और नफरत की मिट्टी में क्या प्रेम और इंसानियत का बीज कभी पनपा है। क्या अखंड औषधि भंडार में कोई ऐसी वटी है जो हमारे विकारों का नाश कर सके। कोई ऐसा रसायन जो नकारात्मकता के वायरस का जड़ मूल से सफाया कर सके।।
क्यों न थक हारकर, हमारे त्रिपुरारी शंकर की ही सहायता ली जाए ;
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ऑनर किलिंग। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन चढी नाम खुमारी / स्वर- विभा जी योगाश्रम, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२५ ☆
☆ ऑनर किलिंग… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘ऑनर किलिंग’ विपरीतार्थक शब्द…’सम्मानपूर्वक मृत्यु’ अर्थात् समाज का एक घिनौना सत्य…जो सदियों से हर जाति, हर मज़हब के लोगों में प्रचलित है। प्रश्न उठता है, ‘आखिर यह प्रथा आई कहां से?’ शायद! इसका जन्म हुआ–मानव में निहित सर्वश्रेष्ठता के भाव से, उसके अहं व उसके ग़ुरूर से। यह दुर्भावना, वह दूषित व घृणित भाव है, जो मानव को मानवता से कोसों दूर ले जाता है। उसकी संवेदनाएं मर जाती हैं और वह ठूंठ मात्र रह जाता है, क्योंकि संवेदनशून्य व्यक्ति अहंनिष्ठ, हृदयहीन, दैवीय गुणों से विहीन तथा स्नेह, सौहार्द, ममता, त्याग, सहानुभूति आदि की भावनाओं से बहुत दूर होता है। ऐसा अहंलीन मानव दूसरों के अस्तित्व को नगण्य समझता है। परंतु वह घर-परिवार में एक-छत्र साम्राज्य चाहता है, यहां तक कि वह अपने आत्मजों को भी अपनी सम्पत्ति व धरोहर स्वीकारता है तथा आशा करता है कि वे कठपुतली की भांति उसका हर हुक्म बजा लाएं… उसके हर आदेश की तुरंत अनुपालना करें।’ नो’ व ‘असंभव’ शब्दों का उसके शब्दकोश में स्थान न हो, क्योंकि उसमें प्रत्युत्तर सुनने का सामर्थ्य-साहस होता ही नहीं। वह शख़्स अजीब होता है…जो अपने से अधिक योग्य, बुद्धिमान, सामर्थ्यवान् व शक्तिशाली किसी दूसरे को समझता ही नहीं।
अक्सर सब परिजन उसकी अमुक प्रवृत्ति से सदैव परेशान रहते हैं। उसके घर आते ही बच्चे इधर-उधर छुप जाते हैं और पत्नी का चेहरा भी भय से कुम्हला जाता है, क्योंकि वह नहीं जानती, कब वह किस बात पर क्रोधित हो; उस पर अकारण बरसने लगे? और उसके माता-पिता भी सदैव उसके व्यवहार के प्रति आशंकित रहते हैं, क्योंकि वह किसी भी पल मर्यादा की सीमाओं का अतिक्रमण कर किसी को भी कटघरे में खड़ा कर सकता है।
चलिये! अब बच्चों की नियति पर चर्चा करते हैं… किस मन:स्थिति में वे उस घर में रहते हैं, जहां पिता…पिता नहीं, एक हिटलर की मानिंद सदैव कटु व्यवहार करता है। बच्चों को वह अपनी जायदाद समझता है और उन्हें अपने अंकुश में रखना चाहता है। बच्चों को विवशता के कारण उसकी हर ग़लत बात को सही कहना पड़ता है, क्योंकि प्रतिपक्ष की दलील सुनने का धैर्य उसमें होता ही नहीं। बच्चे उसे अपनी नियति स्वीकार सुंदर कल की कल्पना में खोए रहते हैं कि आत्म-निर्भर होने के पश्चात् उन्हें वह सब सहन नहीं करना पड़ेगा।…वे निरंकुश व स्वछंद हो जाएंगे तथा अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने में स्वतंत्र होंगे।
परंतु समय से पूर्व, यदि बेटा या बेटी किसी को चाहने लगता है; प्रेम करने लगता है, तो सुनामी की गगनचुंबी लहरें उस घर की शांति व अमनोचैन को समाप्त कर देती हैं; लील जाती हैं। सहसा उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है और वह लातों व घूसों पर उतर आता है। बेटी को तो वह घर की चारदीवारी में कैद कर लेता है और उससे मोबाइल आदि भी छीन लिया जाता है। वह मासूम दीवारों से सिर टकराती, आंसू बहाती, बार-बार ग़ुहार लगाती रहती है कि वह उसके साथ अपना जीवन बसर करना चाहती है। वह दिल की गहराइयों से उसे पसंद करती है और उसके बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती। परंतु उसकी आवाज़ बंद कमरे की दीवारों से टकरा कर लौट आती है। यदि वह कभी अपने तथाकथित पिता से जिरह करने का साहस जुटाती है, तो उस पर प्रतिबंध व पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं और कुलनाशिनी, कुलक्षिणी व कुलटा कहकर उसे ही नहीं, उसके माता-पिता को भी प्रताड़ित किया जाता है। जब ज़ुल्मों की इंतहा हो जाती है, तो अवसर पाकर वह उन ज़ंजीरों को तोड़ कर भाग निकलती है, जहां वह अपने हमसफ़र के साथ स्वतंत्रता से सुख की साँस ले सके।
इसके पश्चात् अक्सर उस घर में हंगामा व गाली-ग़लौज़ होता रहता है और वह ज़ालिम हर पल आसमान को सिर पर उठाए धमाचौकड़ी मचाए रहता है। उसके मन में यही ख़लिश रहती है कि यदि वह एक बार उसके सामने आ जाए, तो वह उसे अपनी ताकत का एहसास दिला कर चींटी की भांति मसल कर सुक़ून पा सके। वास्तव में वह पिता होने से पहले हिटलर होता है, जो किसी भी सीमा तक जा सकता है और यही ‘शक्ति-प्रदर्शन’ है– ‘ऑनर-किलिंग।’ लड़की का पिता व परिवारजन, अपने-अपने मान-सम्मान की दुहाई देते हुए उन दोनों की हत्या कर अपनी पीठ ठोंकते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने बच्चों को जन्म देकर कोई एहसान नहीं किया और न ही वे गुलाम हैं उनकी सल्तनत के …जिन पर उनका एकाधिकार है। सो! वे उनसे इच्छित व्यवहार व आदेशों की अनुपालना की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं?
प्रेम सात्विक भाव है…प्रेम सामीप्य का प्रतिरूप है तथा एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए उन्हें क़रीब लाने का उपादान है। प्रेम संगीत है…प्रेम उच्छ्वास् है और प्रेम वह पावन भाव है, जो मलय वायु के झोंकों सम शीतलता प्रदान करता है। यह प्रश्न मन में अक्सर कुनमुनाता है कि जन्मदाता बच्चों में प्रेम का भाव प्रकट होते ही उनके दुश्मन क्यों बन जाते हैं? क्या झूठा अहं व मान-सम्मान बच्चों की ज़िन्दगी से अधिक अहमियत रखता है? शायद! उनकी नज़रों में प्रेम करना ग़ुनाह होता है, जिसका मूल्य अथवा ख़ामियाज़ा उनके आत्मजों को अपने प्राणों की बलि देकर ही चुकाना पड़ता है। चलिए! इन कट्टरपंथी दकियानूसी विचारधारा वाले माता-पिता के असामान्य व्यवहार पर दृष्टिपात कर लें। आजकल तो वे स्वयं को ख़ुदा स्वीकारने लगे हैं, क्योंकि वे अपनी इच्छानुसार बच्चों को जन्म देते हैं, अन्यथा भ्रूण-हत्या करवा कर उससे मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं और बच्चों के युवा होने पर उनके हृदय में उफ़नते प्रेम के ज्वार को देख वे उनके शत्रु बन जाते है और झूठी मान-मर्यादा हित आत्मजों के प्राण तक लेने में संकोच नहीं करते। ऐसे सिरफिरे लोगों को जो स्वयं को ख़ुदा से कम नहीं आंकते, क्या नाम देंगे आप?
यह शाश्वत् सत्य आजकल मान्य नहीं है कि जन्म व मृत्यु तो सृष्टि-नियंता के हाथ में है। मानव उसके हाथों का खिलौना- मात्र हैं। वह जितनी सांसें लिखवा कर इस संसार में जन्म लेता है, उससे एक सांस भी अधिक नहीं ले पाता। अरे! यह इक्कीसवीं सदी है… प्राचीन परंपराएं व मान्यताएं बदल गई हैं… सोच भी पहले-सी कहां है? शायद! वह ज़ालिम पिता यह सोचकर फूला नहीं समाता कि वह उसका जन्मदाता था। सो! उसकी हत्या व उसके प्राण लेकर उसने कोई अपराध अर्थात् ग़ुनाह नहीं किया।
विभिन्न प्रदेशों में खापें इस विचारधारा की पक्षधर व पोषक हैं कि युवाओं को अपनी इच्छानुसार विवाह करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। वे कुल-गोत्र व जात-बिरादरी की मर्यादा पर अधिक ध्यान देती हैं और उनकी हत्या करने तक को उचित ठहराती हैं। आश्चर्य होता है यह देख कर कि अनेक वर्ष तक एक छत के नीचे ज़िन्दगी बसर कर रहे पति-पत्नी को, भाई-बहन के रूप में राखी बांधने का फरमॉन स्वीकारना पड़ता है। कभी उन्हें व उनके माता-पिता को जात-बिरादरी व गाँव से निष्कासित कर दिया जाता है, तो कभी उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जातीं हैं।
परन्तु आजकल कुछ सुखद परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। चंद खापों का मृत्युभोज की परंपरा का विरोध करना या विवाह पर डी•जे• न चलाने की पेशकश, दहेज न लेने-देने की मुहिम आदि उनकी सकारात्मक सोच की ओर इंगित करता हैं। परंतु आवश्यकता है… समाज के तथाकथित ठेकेदार, बच्चों को अपनी इच्छानुसार जीवन साथी चयन करने की स्वतंत्रता प्रदान कर उदार-हृदयता का परिचय दें… उनके विरुद्ध मनमाने निर्णय लेकर बेतुके व विचित्र फरमॉन जारी न करें। संविधान ने सबको समानाधिकार प्रदान किए हैं और उन्हें भी अपनी इच्छानुसार जीवन-साथी के वरण करने का अधिकार है। सो! सबको एक-दूसरे की भावनाओं को अहमियत देते हुए समाज में समरसता स्थापित करने का भरसक प्रयास करना चाहिए।
यह अकाट्य सत्य है कि ऑनर किलिंग यदि एक की होती है, तो दोनों परिवार सकते में आ जाते हैं… उनके घर-परिवार में मातम-सा पसर जाता है, क्योंकि वे एक-दूसरे के अभाव में जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह हृदय-विदारक पीड़ा दोनों परिवारों की खुशियों को समूल नष्ट कर देती है तथा सुनामी की लहरों की भांति लील जाती है। प्रेम प्रतिदान का दूसरा रूप है…यह केवल देने का नाम है। सो! यदि समाज के रसूख़दार लोग बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान कर दें तथा मनचाहे जीवन साथी को वरण करने का अधिकार प्रदान करने की पहल करें, तो वे प्रसन्नता से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। सो! उनकी भावनाओं का तिरस्कार न करना ही जीवन की सार्थकता है। आइए! मिलकर जीवन को रोशन करें तथा समाज में नया उजाला फैलाएं। एक स्वर्णिम सुबह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है…सारी सृष्टि उपवन-सी महक रही है, जहां चिर-वसन्त है। हम भी मनोमालिन्य व ग़िले-शिक़वे मिटा कर प्रेम भाव से एक नए युग का सूत्रपात करें, जहां सम्बन्धों की गरिमा व अहमियत हो…हम स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाओं के स्थान पर, अलौकिक प्रेम व अनहद-नाद की मस्ती में खो जाएं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बात निकलेगी तो…“।)
अभी अभी # १०१७ ⇒ आलेख – बात निकलेगी तो श्री प्रदीप शर्मा
दूर तलक जाएगी ! जब भी बात निकलती है, तो दूर तलक ही जाती है ! क्यों जाती है कितनी दूर तलक जाती है, बीच में रुक क्यों नहीं जाती, किसी को पता नहीं। इसलिए बात को अक्सर दूर तलक जाने ही नहीं दिया जाता है। या तो उसे रोक दिया जाता है, या बात को बदल दिया जाता है। बात का बतंगड़ ना बने, इसलिए कभी कभी तो बात को ही दफन कर दिया जाता है।
बहुत से ऐसे लोग हैं जो यह कहते नहीं अघाते कि मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ। यह एक चेतावनी होती है कि जब भी यह ज़बान चलेगी, मुँहतोड़ जवाब देगी।इसलिए समझदार लोग सलाह देते हैं, उसके मुँह मत लगना।।
बातों से ही पता चलता है, भारत कभी सोने की चिड़िया था, यहाँ रामराज्य था। एक ऐसा भी राजा था, जो कुबेर तो ठीक, शनि समेत सभी नव-ग्रहों को अपने यहाँ बंदी बनाकर रखता था, लेकिन जब उसके ग्रह खराब चले तो एक सीता माता के हरण से लंकापति का खेल खत्म हो गया।
इस रामराज्य से उस रामराज्य के बीच बहुत कुछ घट गया। बात निकलेगी तो मुगल शासन और अंग्रेज़ी राज तक जाएगी। किसे मालूम था कि आज़ादी और बँटवारे के चलते गाँधी-नेहरू की बन आएगी। गाँधी ईश्वर-अल्लाह को एक साथ प्यारे होंगे, और वशवाद की जड़ें और मज़बूत हो जाएंगी।।
राजनीति की जब बात निकलती है गाँधी-नेहरू तलक अवश्य जाती है। फिल्मों की बात राजकपूर, दिलीप देव तक, फिल्मी गायकों की बात सहगल, रफी, मुकेश, किशोर तक, और फिल्मी गीतकारों की बात साहिर, शैलेन्द्र, हसरत और घूम फिरकर आनंद बख्शी तक ज़रूर पहुँच जाएगी। फिल्मी सङ्गीत का जब ज़िक्र होगा तो शंकर जयकिशन, नौशाद, मदनमोहन, सचिन देव और राहुल देव बर्मन से होती हुई लक्ष्मी प्यारे तक अवश्य जाएगी।
बात के दूर तलक जाने के अगर कुछ फायदे हैं, तो नुकसान भी ! इसे स्थानीय भाषा में कहते हैं, रहने दो, मुँह मत खुलाओ। इस चेतावनी के बाद मुँह बिना किसी आग्रह अथवा अनुग्रह के, अपने आप खुल जाता है। सभी राज़ फाश हो जाते हैं, सभी पर्दे, बेपर्दा और सभी लिहाज तार तार हो जाते हैं।।
जिस तरह बंदूक से निकली गोली कभी वापस नहीं आती, दूर तलक निकल गई बात, कई बात पुकारने के बाद भी वापस नहीं आती। कुछ वक्ता भी बात बात में, न जाने कौन सी बात निकाल लेते हैं, और ढील छोड़ देते हैं।
लोग उबासी ले लेकर थक जाते हैं, कुछ बाहर चाय नाश्ता तक कर आते हैं, लेकिन बात वापस नहीं आती। एक समझदार अनुभवी श्रोता संयोजक के कान में मंत्र फूँकता है, माइक का वायर डिस्कनेक्ट कर दो। बात हाँफते हाँफते वापस आ जाती है।
सुबह का वक्त है, बात अभी निकली ही है, ज़्यादा दूर तलक नहीं गई होगी।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८९ ☆
☆मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
जून का महीना केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन के नवसृजन का संकेत भी है। पहली वर्षा की बूंदें जैसे ही धरती को स्पर्श करती हैं, प्रकृति का मौन संसार जाग उठता है। सूखी प्रतीत होने वाली मिट्टी के भीतर छिपे बीज अचानक अंकुरित होने लगते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अनेक पौधे ऐसे भी उग आते हैं जिन्हें किसी ने बोया नहीं होता; वे केवल अनुकूल समय और थोड़ी नमी की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।
अंकुर अर्थात-
बीज से निकलने वाली पहली कोमल कोंपल
किसी नए विचार, स्वप्न या संभावना की शुरुआत
विकास और प्रगति का प्रथम चरण
धरती माँ की गोद में, अंकुर होता बीज। मिट्टी की महिमा अमर, शुभाशीष को दीज।।
छोटे से आकार में, बड़ा हुआ विस्तार। बीजों का अंकुर बना, वन का सारा सार॥
अंकुर को केवल पौधे की कोंपल नहीं, बल्कि आशा, धैर्य, संभावना और जीवन के नवप्रारंभ के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है।
मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमारे भीतर अनेक संभावनाएँ, सद्गुण और सपने बीज के समान सुप्त पड़े रहते हैं। सही वातावरण, सकारात्मक विचार और थोड़ा-सा प्रयास उन्हें अंकुरित कर सकता है। प्रकृति हमें सिखाती है कि विकास का आरम्भ हमेशा एक छोटे से अंकुर से होता है।
जून की यह आहट हमें एक और संदेश देती है। यदि हम हर वर्ष इस मौसम में एक पौधा भी रोपें और उसकी देखभाल का संकल्प लें, तो आने वाले वर्षों में हरियाली का एक विशाल संसार निर्मित हो सकता है। वृक्ष केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, वे जीवन में शीतलता, संतुलन और आशा भी लाते हैं।
आइए, इस वर्षा ऋतु का स्वागत केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि सृजनकर्ता बनकर करें। एक पौधा लगाएँ, एक अंकुर को जीवन दें और प्रकृति के साथ अपने संबंध को और गहरा करें। हर अंकुर भविष्य की हरियाली का वचन है, और हरियाली ही जीवन का सबसे सुंदर उत्सव।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१६ ☆
व्यक्तित्व और कृतित्व – सुरेश पटवा एक “अल्हदा और नए तरह के लेखक” श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
सुरेश पटवा” “कलम और कदम का अनूठा समन्वय है।
जब हम समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य को देखते हैं, तो हमें कई तरह के लेखक मिलते हैं, कुछ जो कमरों में बैठकर कल्पनाएं बुनते हैं, और कुछ जो इतिहास के पन्नों को पलटते हैं। लेकिन आज मैं एक ऐसे अनूठे ‘सृजन साधक’ की बात करने जा रहा हूँ, जिनकी कलम में इतिहास की गंभीरता भी है और जिनके कदमों में पूरी दुनिया को नाप लेने का कौतूहल भी। मैं बात कर रहा हूँ, सुरेश पटवा की।
अक्सर लोग बैंक से रिटायर होने के बाद आराम की जिंदगी चुनते हैं, लेकिन सुरेश पटवा जी बैंक की दीर्घकालीन सेवा के बाद अपने जीवन की सबसे ऊर्जावान पारी जी रहे हैं। 74 वर्ष की इस युवा उम्र में, वे 34 प्रकाशित कृतियों और 16 से अधिक राष्ट्रीय सम्मानों के साथ हमारे बीच साहित्य की एक जीती-जागती धरोहर हैं। “
उनके लेखन की सबसे अनूठी और रोचक बात उनका यायावर होना है। वे सिर्फ मेज पर बैठकर लिखने वाले साहित्यकार नहीं हैं। उन्होंने नर्मदा जी की परिक्रमा की, तो ‘सौंदर्य, समृद्धि, वैराग्य की नदी नर्मदा’ लिख दी। उन्होंने मोटर साइकिल उठाई और सिक्किम, भूटान, नेपाल, लद्दाख और उत्तराखंड की दुर्गम वादियों को छान मारा। कार से कोलकाता से कन्याकुमारी और वहां से द्वारकापुरी तक की तटीय यात्रा कर डाली। अमेरिका और यूरोप घूम आए।
यानी पटवा जी पहले जमीन पर अपने ‘कदम’ चलाते हैं, अनुभूतियों को जीते हैं, और फिर उनकी ‘कलम’ चलती है। यही कारण है कि जब वे ‘सगरमाथा से समुंदर तक’ या ‘सुरम्य सतपुड़ा’ लिखते हैं, तो पाठक सिर्फ पढ़ता नहीं है, वह पटवा जी की आंख से उस भूगोल की यात्रा करने लगता है।
उनका विषय वैविध्य विस्मित करने वाला है। जब उन्हें इतिहास पढ़ते हुए भारत की गुलामी की पड़ताल करती कोई मुकम्मल किताब नहीं मिली, तो उन्होंने खुद शोध किया और खड़ी कर दी—’गुलामी की कहानी’। एक तरफ वे गोंडवाना के विलुप्त इतिहास पर गंभीर शोध करते हैं, ‘वेदों से वेदांत’ जैसी आध्यात्मिक कृति लिखते हैं, तो दूसरी तरफ ‘हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग’ लिखकर हमारे भीतर के सिनेमाई नोस्टेल्जिया को जगा देते हैं। मिर्जा गालिब पर उनका शोधपूर्ण उपन्यास उनके विधा वैविध्य का अनूठा प्रमाण है। “
“पटवा जी केवल गंभीर इतिहासकार या यात्रा-वृत्तांत लेखक नहीं हैं। उनकी कविताएं और व्यंग्य समाज का मुखपत्र हैं। हाल ही में आए उनके व्यंग्य ‘पेटीकोट-पजामा स्टार्ट-अप’ और पुस्तक ‘व्यंग्य पच्चीसी’ सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार हैं।
उनकी कविताओं की एक खास बात है, जो मुझे बहुत प्रभावित करती है, उनकी कविताएं समाज की व्यवस्था से शिकायत तो करती हैं, जिम्मेदार लोगों पर तंज भी कसती हैं, लेकिन उनमें कहीं भी रोना-चीखना या करुणा का प्रदर्शन नहीं है। वे दृढ़ता के साथ, गरिमा में रहकर अपनी बात कहती हैं और चेतावनी देती हैं। यही एक सच्चे साहित्य का धर्म है, जिसका निर्वहन पटवा जी बखूबी कर रहे हैं। “
“आज पटवा जी दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के संयुक्त सचिव और अखिल भारतीय कला मंदिर के उपाध्यक्ष जैसी अनेक संस्थाओं के माध्यम से नई पीढ़ी के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
किताबों की इस आपाधापी भरी भीड़ में, सुरेश पटवा जी का लेखन अपनी सहजता, प्रामाणिकता और रोचक शैली के कारण बिल्कुल ‘अल्हदा’ है। वे जटिल से जटिल ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों को इतनी सरलता से परोसते हैं कि वह सीधे पाठक के दिल और दिमाग में उतर जाती है।
पटवा जी का जीवन और उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि सीखने, घूमने और लिखने की कोई उम्र नहीं होती। बस भीतर एक जीवंत कलाकार जिंदा रहना चाहिए। पटवा जी को उनके समृद्ध सृजन संसार के लिए नमन करता हूँ और उनके दीर्घायु व सतत लेखन जीवन की कामना करता हूँ।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३८ ☆
☆ आलेख – मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
भारतीय इतिहास में सबसे कम उम्र में कुलपति बनने का गौरव प्राप्त करने वाले डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। आपका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में कोलकाता विश्वविद्यालय के संस्थापक उप कुलपति आशुतोष मुखर्जी के घर पर हुआ था। आप का बचपन से ही मेघावी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, विचारक, गहन चिंतन और शिक्षा के प्रति विशेष लगाव रहा है।
आप की शिक्षा-
यही कारण है कि आप ने 1917 में मैट्रिक, 1921 में बीए, 1923 में वकालत की उपाधि बहुत ही बेहतरीन अंको से प्राप्त की थी। आप ने हरेक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं। आपको गणित के अध्ययन में विशेष रूचि थीं । इस कारण आप 22 वर्ष की उम्र में एमए करने के बाद विदेश चले गए। आप की प्रतिभा से प्रभावित हो कर लंदन की मैथमेटिक्स सोसाइटी ने आपको मानद सदस्यता सम्मानित किया गया था। यह किसी भारतीय व्यक्ति के लिए बहुत ही गौरव की बात थीं।
वैवाहिक जीवन-
लंदन से आप से 1926 में वकील बनकर भारत आ गए। इसी वर्ष आपका विवाह सुधा देवी से हो गया। मगर आपका वैवाहिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं चला। कुछ ही वर्षों में आपकी पत्नी का देहांत हो गया। इसके बाद आपने आजीवन शादी न करते हुए मानवता की सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया। शिक्षा जगत में ख्याति-
जब आपकी उम्र 23 वर्ष की थी तभी आप पिता का देहांत हो गया था। उसी समय आपको कोलकाता विवि विद्यालय की प्रबंध समिति में ले लिया गया। यही से आपके कार्यों की वजह से बहुमुखी प्रतिभा सभी के सामने प्रकट होने लगी। आपके प्रखर विचार, शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व विद्वत्ता को देखते हुए आप को 33 वर्ष की अल्पायु में कोलकाता विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया।
भारतीय शिक्षा इतिहास में आपको सबसे कम उम्र के कुलपति बनने का श्रेय आप को प्राप्त हुआ है।
आप का जीवन लक्ष्य-
आपने छात्र जीवन से अपने मूल लक्ष्य तय कर लिए थे। आप आध्यात्मिक तथा विज्ञान से युक्त शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। अध्यात्मवाद, सहनशीलता, मानवता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सांस्कृतिक विचारों की एकता के विचारों पर आजीवन दृढ़ता से चलते रहें। यही वजह है कि अपनी पत्नी के निधन के बाद आपने अपना पूरा जीवन मानवता, उसके विकास और वैज्ञानिक गतिशीलता के लिए समर्पित कर दिया था।
परिवार का जीवन पर प्रभाव–
आपके जीवन पर अपने परिवार के सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, राजनीति जीवन का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। आप का लालन-पालन जिस परिवार में हुआ था वहां आशुतोष मुखर्जी जैसे सुलझे विचारों के धनी पिता, शिक्षामित्र, विद्वान तथा ओजस्वी वक्ता की छत्रछाया आप को प्राप्त हुई थीं। साथ ही घर में होने वाले विभिन्न आयोजनों, गोष्ठियां, विचार-विमर्श, चिन्तन-मनन, सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिकों वातावरण का आप के जीवन पर सकारात्मक व दृढ़ प्रभाव पड़ा। यही वजह है कि आपके मन में भारत की पुरातन संस्कृति के प्रति विशेष प्रेम, विज्ञान के प्रति लगाव, मानवता के प्रति विशेष अनुराग पैदा हुआ।
आपकी अनुकरणीय प्रतिभा–
आप की प्रतिभा को इसी बात से समझा जा सकता है कि आपने जितनी भी परीक्षाएं उत्तीर्ण की थीं उन सभी में आप प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 8 अगस्त 1934 से 7 अगस्त 1938 रहते हुए अनेक विश्वविद्यालय के सम्मेलनों का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और नए विचार दिए। इस कारण आपकी गिनती उस समय के भारत के शीर्षस्थ शिक्षाविदों में होने लगी थी।
आपके उल्लेखनीय कार्य–
तत्कालीन समय में भारतीय जनता की स्थिति बहुत दयनीय थीं। भारतवासी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक दृष्टि से बेहतर स्थिति में नहीं थे। अंग्रेज कूटनीति द्वारा भारत का विभाजन की चाल चल रहे थे। इस कारण आप ने भारत की जनता के उत्थान और उसके सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। ताकि आप अपनी संपूर्ण ऊर्जा से मानवता की सेवा कर सके।
सन 1939 में राजनीति में प्रवेश करने के साथ आपने अपनी कार्यशैली में आमूल-चूल परिवर्तन कर लिया। इस कारण आपने गांधीजी की अहिंसा वादी नीति का घोर विरोध किया। आप कहते थे कि गांधीजी की अहिंसावादी नीति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी वैचारिक मतभेद के कारण आप कांग्रेस और गांधीजी की नीतियों के और विरोधी हो गए थे।
अकाल में आप की मानवतावादी सेवा–
इसी दौरान 1943 में भारत के बंगाल प्रांत में भयंकर अकाल पड़ गया। चूंकि आप मानवता के प्रखर और प्रबल समर्थक थे, इस कारण आपने बंगाल में आए इस संकट के लिए बड़े पैमाने पर सहायता व राहत कार्य किया। इसके लिए राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवियों, धर्मगुरुओं आदि की सहायता से जरूरतमंदों और पीड़ितों की भरपूर सहायता पहुंचाने के लिए बंगाल राहत समिति का गठन किया। जिसे बाद में हिंदू महासभा राहत समिति नाम दिया गया था।
लोगों ने इसमें बड़ी-बड़ी और छोटी-छोटी नगद राशियों से अकाल पीड़ित जनता की भरपूर सहायता कीं। इससे लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सका। आप के इस मानवतावादी कार्य से राष्ट्रीय एकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक व धार्मिक एकता का परिचय के साथ-साथ वहां की जनता को राष्ट्रीय एकता व एकजुट्ता की प्रेरणा प्राप्त हुईं।
आप के प्रभावाकारी विचार–
आप सांस्कृतिक एकता के प्रबल समर्थक थे। आपका मानना था कि सभी व्यक्ति सांस्कृतिक रूप में एक ही है। इनका धार्मिक रूप से विभाजन करना गलत है। आप इस नीति के घोर विरोधी थे। आप कहते थे कि हम सब में एक ही रक्त, एक ही भाषा, एक ही संस्कृति रची बसी है, इसलिए आपको प्रति सभी धर्मों के लोगों की आप पर संपूर्ण आस्था थीं। आपको हरेक धर्म, संस्कृति व सम्प्रदाय के लोगों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त था।
आप का राजनीतिक जीवन और उल्लेखनीय कार्य-
आपके विचारों की वजह से आपको बंगाल प्रांत का वित्त मंत्री बनाया गया था। जहां आप ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एमके फजलूल हक के समय 12 दिसंबर 1941 से 20 नवंबर 1942 तक वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके पूर्व भी आप बंगाल विधान परिषद में सांसद की हैसियत से 1927 से 1947 तक काम करते रहे हैं। आप 15 अगस्त 1947 को भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। 6 अप्रैल 1950 तक आप इसी पद पर बने रहे। 1947 को आप को स्वतंत्र भारत के वित्त मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था।
यह मंत्रालय सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने से दिया गया। क्योंकि वे उस समय गांधीजी व कांग्रेसियों की नीति के विरोधी थे। इस दौरान आप ने चितरंजन में रेलवे इंजन का कारखाना, विशाखापट्टनम में जहाज बनाने का कारखाना और बिहार में खाद बनाने के कारखाना खोला। ताकि यहां की जनता की दयनीय व करुणाजनक स्थिति में सुधार हो सके।
आप का प्रबल विरोध–
इसी दौरान आपने विभिन्न प्रांतों की यात्राएं कीं। आप भारतीय जनता की शोचनीय दशा से चिंतित थे। कश्मीर में अलग वजीर-ए-आलम यानी प्रधानमंत्री, अलग झंडा और उस को विशेष दर्जा दे रखा था। आप आरंभ से ही एक भारत, एक झंडे और एक प्रधानमंत्री के प्रबल समर्थक थे। इस पर आपके और सरकार के बीच मतभेद हो गए। आप 370 धारा खत्म करने की प्रबल समर्थक थे। जबकि सरकार इसे बनाए रखना चाहती थी।
इस मतभेद के कारण आपको मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। कारण, आप कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय चाहते थें। इसलिए आपने प्रजातंत्र पार्टी बनाकर कश्मीर में प्रवेश किया। उस समय अटल बिहारी वाजपेई (तत्कालीन विदेश मंत्री), वैद्य गुरुदत्त बर्मन, टेकचंद आदि के साथ में 6 मई 1953 को जम्मू के के लिए कूच किया। चूंकि बिना अनुज्ञा के आपने कश्मीर में प्रवेश किया था इस कारण आपको जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
मानवता के इस पुजारी की 40 दिनों तक जेल में बंद रहने के बाद 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई। भारतीय जनसंघ पार्टी के संस्थापक व्यक्तित्व का इस तरह चला जाना भारत की जनता के लिए अपूरणीय क्षति थीं। मगर आप अपने पीछे अपने कार्यों से ऐतिहासिक यादगार छोड़कर चले गए जो हमें सदैव आपका स्मरण कराती रहेगी।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भाव विरेचन…“।)
अभी अभी # १०१६ ⇒ आलेख – भाव विरेचन श्री प्रदीप शर्मा
** CATHARSIS **
अगर भाव ना हो, तो शायद इंसान ही ना हो। केवल इंसान में ही नहीं, प्रकृति के हर जीव जंतु में कम अथवा अधिक मात्रा में भाव का समावेश होता ही है। मादा पक्षी अपने अंडों को सेती है, उसकी आँधी तूफान और शिकारी शत्रुओं से रक्षा करती है, उनकी सुरक्षा के लिए नीड़ का निर्माण करती है। ये प्राणी, बस, प्रकट रूप में इंसान की तरह हँसते रोते नहीं हैं, जो खो गया, उसे भुलाते चलते हैं, लेकिन जो मिल गया वह उनके मुकद्दर का नहीं होता, उन्हें उसको हासिल करना पड़ता है।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।
मनुष्य के मन में भाव का भंडार भरा है। जब यह हल्का होता है तो रुई की तरह होता है, और जब भारी होता है, तो मानो किसी ने सर पर पहाड़ रख दिया हो। कोई सागर, दिल को बहलाता नहीं। जब यह अधीर होता है, तो साहिर इसे समझाते हैं, मन रे, तू काहे ना धीर धरे ! वही मन, जो दर्पण होता है, उसे पापी मन भी कहा गया है। देखिए, आशा जी फिल्म गंगा जमना में क्या कह रही हैं ;
तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे।
मिलाए छल बल से नजरिया रे।।
मन के विज्ञान को मनोविज्ञान कहते हैं। जिस मन के हारे, हार है, और मन के जीते जीत, जो कहीं मनजीत है, तो कहीं जगजीत, किसी के मन का मीत है तो किसी का शत्रु, उसे एक आम इंसान तो क्या, योगी भी अपने बस में नहीं कर पाए। यह एक ऐसे मन का मंत्रिमंडल है, जहां सब मनमानी करते हैं।
कई बार ऐसा होता है, जब मुंह से निकल जाता है, आज मन बड़ा उदास है।।
मन के विकारों को मनोविकार कहते हैं। राग द्वेष, सुख दुःख, हार जीत, हानि लाभ, यश अपयश, इन सबका प्रभाव हमारे चित्त पर पड़ता है, जिसे हम आम भाषा में मन ही कहते हैं। प्रकृति के द्वारा प्रदत्त संसाधनों को ही हम शुद्ध नहीं रख पा रहे हैं, तो जल को निर्मल और हवा को प्रदूषण रहित कैसे रख पाएंगे। जैसा पर्यावरण, वैसा हमारा मन। चंचल, पापी, विकारग्रस्त, सदा समस्याओं से ग्रस्त, त्रस्त।
देखिए ! हम इतने बुरे भी नहीं ! हम सदा सच बोलते हैं, ईमानदार हैं, मेहनती हैं, पूजा पाठ, योग, ध्यान, साधना सब करते हैं। लेकिन यह भी सच है, पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। हर इंसान में अच्छाई भी होती है, और बुराई भी। गुस्सा और क्रोध हमें भी आता है, जब हम कुछ गलत होते देखते हैं। आखिर अन्याय के खिलाफ आवाज भी तो उठानी ही पड़ती है।।
जब क्रोध आता है, तो हम क्या करते हैं ? एक से सौ तक की गिनती गिनते हैं, हाथ में माला लेकर जाप करने लग जाते हैं ? कैसी बातें करते हो, जो उचित होता है, वही करते हैं। सामने वाले को डांटते हैं, फटकारते हैं, गाली वाली भी बक देते हैं, और अगर फिर भी बात नहीं बनती, तो देते हैं दो मिलाकर। अगर दुर्वासा होते, तो शायद शाप भी दे देते। इससे क्या होता है, वह सुधरे ना सुधरे, हमारा गुस्सा जरूर शांत हो जाता है। शास्त्रों में इसे ही कैथार्सिस, भाव विरेचन अथवा भड़ास निकालना कहा गया है।
जब भी आपको किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति पर गुस्सा आए, तो एक मोटा तकिया ले लें, और उसे तबीयत से पीटें। अगर मुंह से गाली निकलती है, तो सब तकिये पर उगल दें, बेचारा कुछ नहीं बोलेगा। उल्टे रात को आपका सिरहाना ही बनेगा, आपको सुख ही देगा। वह रिएक्ट करना नहीं जानता। जड़ जो है।।
सोचिए अगर हमारे समाज में गालियां नहीं होती तो बेचारा एक गरीब, कमज़ोर, शोषित इंसान क्या करता। शायद गुस्से में आग ही लगा देता। बेचारा गाली बककर अपनी भड़ास निकाल लेता है, बीड़ी की आठ दस फूंक ज्यादा मार लेता है। हम सिस्टम तो सुधार नहीं सकते और चाहते हैं, इंसान सुधर जाए। रातों रात रामराज्य आ जाए।
जब भी मन में उमस पैदा होगी, आग भी लगेगी और पानी भी बरसेगा। अगर गम को गटक लिया, अपमान का घूंट पी लिया, तो अवसाद आपको मार डालेगा। भाव विरेचन की साधारण क्रिया कीजिए, अपने गुस्से को शांत कीजिए। बाद में ठंडा पानी पीकर प्रभु को याद कीजिए।
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग ” ।)
☆ “अंतर्कथा :अभिनवगीत की… भाग – ३ – उत्तर प्रसंग” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(आज से प्रस्तुत है श्री राघवेंद्र तिवारी जी का अभिनव गीत पर एक शोध परक आलेख “अंतर्कथा :अभिनवगीत की..”। इस आलेख को हम तीन भागों (आदि प्रसंग, मध्य प्रसंग और उत्तर प्रसंग) में प्रस्तुत कर रहे हैं.)
☆ भाग – ३ – उत्तर प्रसंग ☆
गीत को नवगीत का नाम देते हुए राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने इसके लिए पाँच मूलभूत तत्वों की बात कही (जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय)। अनेकांश नवगीतकारों ने इस पंच- सूत्री सूक्त को प्रतिमान की मान्यता दे कर, नवगीतों की सर्जना की। किन्तु, शीर्ष नवगीतकार नचिकेता ने यह कह कर इन्हें नकार दिया कि ये ” वस्तुतः पारंपरिक गीतों के कला-प्रतिमानों और विचार-दृष्टि का नया नामकरण भर थे”(देखें पूर्वाभास अगस्त २०१६ )। अपनी अवधारणा की पुष्टि में वे कहते हैं:” नवगीत ने अपने अंतर्जगत में व्यक्तिनिष्ठता की जगह वस्तुनिष्ठता और नितांत निजी आत्मानुभूति की जगह सामाजिक- चेतना के विविध् रूपों को अभिव्यक्त करने का जोखिम उठाया है। नवगीत की इस सार्थक पहल कदमी ने पारंपरिक गीत की विषयवस्तु को ही नहीं बदला, उसकी अनुभूति की संरचना (भाषा, शिल्प, विचारधारा और अनुभूति का सम्मिलित रूप), अभिव्यक्ति-भंगिमा और रूपाकार को भी बदल दिया”। फिर भी “आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद और क्षणवाद नवगीत की वैचारिक अंतर्वस्तु रहा है और ये सारे प्रत्यय केवल जनविरोधी ही नहीं, मनुष्य विरोधी भी हैं”। नचिकेता की ये अवधारणाएं इस बात का संकेत हैं कि नवगीत को जन पक्षधर होना चाहिए अर्थात इनका मूल स्वर प्रगतिकामी किवां साम्यवादी होना चाहिए। इस सन्दर्भ में वे कार्ल मार्क्स को उद्धृत करते हैं कि मनुष्य की चेतना को सामाजिकता, सृजनशीलता और सौंदर्यबोध् की क्षमता का विकास सामाजिक विकास का परिणाम है। कला और साहित्य का विकास भी इसी का परिणाम है। सामाजिक परिवर्तन के साथ मनुष्य का सौंदर्यबोध बदलता है, सुन्दरता की कसौटी बदलती है। मनुष्य के सौंदर्यबोध का उसकी विश्वदृष्टि से घनिष्ठ संबंध होता है’।
सौंदर्यबोध की भारतीय अवधारणा आनंद और लोक- मंगल से जुडी है। लोक- मंगल वर्ग विशेष का नहीं, समस्त मानव समाज का। अपने ‘तुमि जखन गान गायिते बोलो’ में रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं : तूने जब मुझे गीत गाने को कहा \तो गर्व से मेरी छाती फटने को हुई। मेरी आँखें आँसुओं से डबडबा उठीं \और मैं एकटक तेरे चेहरे की ओर देखता रह गया। मेरा जीवन \जितना कटु, विषम और अस्तव्यस्त है, वह सब पिघल कर \तेरी गीत- सुधा में बदल गया। मेरी सब साधना, आराधना, पक्षी की
तरह पंख फैलाकर आनंद से \उड़ने की कामना करने लगी। मेरे गीतों की रागिनी\मुझे श्रुति -मधुर लगती है, कर्ण-प्रिय लगती है। मैं जानता हूँ, \उन गीतों में के बल पर मैं तेरे सामने आने का साहस \कर सकता हूँ। टैगोर का यह गीत कवि की करुणानुभूति और श्रुति- मधुर, कर्ण -प्रिय रागात्मकता से जटिल- विषम जीवन को आनंद से आप्यायित करने की बात करता है। आज कविता में वह करुणानुभूति नहीं रही जो मनुष्य को करुणार्द्र कर, उसे पाशविक वृत्तिओं से मुक्ति दिला सके। सच पूछा जाए तो कविता वह है जो मनुष्य में अंतर्भूत मनुष्यता को उद्भूत कर सके। ऋचा कहती है हम मनुष्य की भांति रहना और जीना चाहते हैं। मनुष्यता से सम्पन्न हम आलोक का अन्वेषण करें (मनुष्वत्वा नि धीमहि मनुष्वत् समिधीमहि। अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान् देवयते यज (ऋक. 5.21.1)। जरूरत है परुष को संवेदन शील बनाने की। मनीषियों ने मनुष्यत्व के लिए कुछ मूल्य निश्चित किए हैं। कुछ यम-नियम अर्थात व्यक्ति की सामाजिक और वैयक्तिक नैतिकता (यम= संयम अर्थात सामाजिक नैतिकता) नियम अर्थात व्यक्तिगत नैतिकता। आधुनिक और वस्तुनिष्ठ बुद्धिवादियों ने इन्हें मनुवादी सोच कह कर नकार दिया। भोगवादी संस्कृति हावी है, जिसमें पदार्थ से परे कुछ नहीं है। एक ओर तीव्र गति से मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। तो दूसरी तरफ बढ़ रहा है संहारक शक्तियों का प्रभुत्व। इससे सृष्टि की सृजनात्मकता दिन पर दिन क्षीण हो रही है। आदमी प्रकृति से कट कर कृत्रिम जीवन जीने को विवश है। विश्व का तापमान बढ़ रहा है। पर्यावरण के विघटन ने ऐसा भयावह वातावरण पैदा कर दिया है, जिसमें मनष्य क्या, समस्त चराचर जगत संकट में है। ऐसे संकटापन्न वातावरण में अभिनव गीतकारों से अपेक्षा है कि वे :
–मानवीय मूल्यों का उन्नयन करें
–भोगवादी अपसंस्कृति से जन्में मनुष्यता के विस्थापन को अवरुद्ध करें
–मनुष्य को निसर्ग के संसर्ग में लाने के लिए कृत -संकल्प हों
–संहारक, विस्तारवादी और नव-साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करें
— वर्गभेद और वर्ग संघर्ष की छद्म नारेवाजी से बच कर वर्ग- सहयोग को समृद्ध करें
— कविता को खंड -खंड होने से बचा कर, उसे समग्र रूप में रूपांकित करें जिससे वैचारिक खेमेबंदी यथा नारी, दलित, आदि वासी, किसान -मजदूर विमर्श जैसी विभाजक रेखाओं से बचा जा सके। अभिनव गीत हर मजबूर आदमी की आवाज हो। आयातित जीवन दर्शन और, वैचारिकी के स्थान पर कविता का मूल उत्स देशज हो। आंचलिक।
मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अभिनव गीत एक ऐसे अभिनव साहित्यिक समाज की निर्मिति में अग्रगामी भूमिका अदा करेगा जहाँ समता और समरसता की अखंड आनंदमयी संस्कृति का अभ्युदय हो (समरस थे जड़ या चेतन सुन्दर साकार बना था \ चेतनता एक विलसती आनंद अखंड घना था–कामायनी)।