हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३२ ☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सहनशक्ति बनाम दण्ड। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३२ ☆

☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘युगों -युगों से पुरुष स्त्री को उसकी सहनशीलता के लिए ही दण्डित करता आ रहा है,’ महादेवी जी का यह कथन कोटिश: सत्य है,जिसका प्रमाण हमें गीता के इस संदेश से भी मिलता है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है’,क्योंकि उसकी सहनशीलता उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एक सीमा तक तो सहनशक्ति की महत्ता स्वीकार्य है,परंतु उसे आदत बना लेना कारग़र नहीं है। इसलिए मानव में विरोध व प्रतिकार करने का सामर्थ्य होना आवश्यक है। वास्तव में वह व्यक्ति मृत के समान है,जो ग़लत बात को ग़लत ठहरा कर विरोध नहीं जताता। इसके प्रमुखत: दो कारण हो सकते हैं– आत्मविश्वास की कमी और असीम सहनशीलता। यह दोनों स्थितियां ही भयावह और मानव के लिए घातक हैं। आत्मविश्वास से विहीन मानव का जीवन पशु-तुल्य है,क्योंकि जो आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता; वह परिवार,समाज व देश के लिए क्या करेगा? वह तो धरती पर बोझ है; न उसकी घर-परिवार में इज़्ज़त होती है,न ही समाज में उसे अहमियत प्राप्त होती है। अत्यधिक सहनशीलता के कारण वह शत्रु अर्थात् प्रतिपक्ष के हौसले बुलंद करता है। परिणामत: समाज में आलसी व कायर लोगों की संख्या में इज़ाफा होने लगता है। प्राय: ऐसे लोग संवेदनहीन होते हैं और उनमें साहस व पुरुषत्व का अभाव होता है।

नारी को सदैव दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है, क्योंकि उसमें अपना पक्ष रखने का साहस नहीं होता और वह शांत भाव से समझौता करने में विश्वास रखती है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहे हों; पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक या उसका समर्पण भाव– सभी नारी को उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देते हैं,जहां वह निरंतर ज़ुल्मों की शिकार होती रहती है। पुरुष दंभ के सम्मुख वह प्रतिकार व विरोध में अपनी आवाज़ नहीं उठा सकती। इस प्रकार पुरुष उस पर हावी होता जाता है और समझ बैठता है कि वह पराश्रिता है; उसमें साहस व आत्म-विश्वास की कमी है। सो! वह उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। इस प्रकार यह सिलसिला चल निकलता है। अवमानना,तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार अर्थात् विवशता बन जाते हैं और उसके जीने का मक़सद व उपादान बन जाते हैं,जिसे वह नियति स्वीकार अपना जीवन बसर करती रहती है।

यदि हम उक्त तथ्य पर दृष्टिपात करें, तो नियति व स्वीकार्यता-बोध मात्र हमारी कल्पना है,जिसे हम सहजता व स्वेच्छा से अपना लेते हैं। यदि व्यक्ति प्रारंभ से ही ग़लत बात का प्रतिरोध करता है और अपने कर्म को अंजाम देने से पहले सोच-विचार करता है,उसके हर पहलू पर दृष्टिपात करता है– शत्रु के बुलंद हौसलों पर ब्रेक लग जाती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, 2007 में प्रकाशित स्वरचित काव्य-संग्रह की अंतिम कविता की पंक्तियां– ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके/ अनगिनत बंधनों में बाँध चुके/ मुझ में साहस ‘औ’ आत्म- विश्वास है इतना/ छू सकती हूं मैं/ आकाश की बुलंदियां।’ जी हाँ! यह संदेश है नारी जाति के लिए कि वह सशक्त,सक्षम व समर्थ है। वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकती है। परंतु वह पिता,पुत्र व पति के बंधनों में जकड़ी,ज़ुल्मों को मौन रहकर सहन करती रही,क्योंकि उसने अंतर्मन में संचित शक्तियों को पहचाना नहीं था। परंतु अब वह स्वयं को पहचान चुकी है और आकाश की बुलंदियों को छूने में समर्थ है। आज की नारी ‘अगर देखना है मेरी उड़ान को/ थोड़ा और ऊंचा कर दो/ आसमान को’ में झलकता है उसका अदम्य साहस व अटूट विश्वास,जिसके सहारे वह हर कठिन कार्य को कर गुज़रती है और ऐलान करती है कि ‘असंभव शब्द का उसके शब्दकोश में स्थान है ही नहीं; यह शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।’

परंतु 21वीं सदी में भी महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय व दयनीय है। वे आज भी पिता,पति व पुत्र द्वारा प्रताड़ित होती है,क्योंकि तीनों का प्रारंभ ‘प’ से होता है। सो! वे उनके अंकुश से आजीवन मुक्त नहीं हो पाती। घरेलू हिंसा,अपनों द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार, फ़िरौती, दुष्कर्म, तेज़ाब कांड व हत्या के सुरसा की भांति बढ़ते हादसे उनकी सहनशक्ति के ही दुष्परिणाम हैं। यदि बुराई को प्रारंभ में ही दबाकर समूल नष्ट कर दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। महिलाएं पहले भी दलित थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। उनके अतीत,वर्तमान व भविष्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता; जब तक वे साहस जुटाकर ज़ुल्म करने वालों का सामना नहीं करेंगी।

वैसे यह नियम बच्चों,युवाओं व वृद्धों सब पर लागू होता है। उन्हें आगामी आपदाओं,विषम व असामान्य परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए,क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी टिक नहीं सकता। ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ सोहनलाल द्विवेदी जी इस कविता के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि यदि आप तूफ़ान से डर कर व लहरों के उफ़ान को देख कर अपनी नौका को बीच मंझधार नहीं ले जाओगे तो नौका कैसे पार उतर पाएगी? संघर्ष रूपी अग्नि में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। इसलिए कठिन परिस्थितियों के सम्मुख कभी भी घुटने नहीं टेकने चाहिएं तथा मैदान-ए-जंग में मन में इस भाव को प्रबल रखने की दरक़ार है कि ‘तुम कर सकते हो।’ यदि निश्चय दृढ़ हो, हौसले बुलंद हों,दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। नैपोलियन बोनापार्ट भी यही कहते थे कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। इस नकारात्मक भाव को अपने ज़हन में प्रविष्ट न होने दें –’जैसी दृष्टि,वैसी सृष्टि तथा नज़रें बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं और नज़रिया बदलते ज़िंदगी।’ यदि नारी यह संकल्प कर ले कि वह अकारण प्रताड़ना सहन नहीं करेगी और उसका साहसपूर्वक विरोध करेगी, ‘तो क्या’ और अब मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि ‘मैं क्या कर सकती हूं।’ उस स्थिति में पुरुष भयभीत हो जायेगा और अपने मिथ्या सम्मान की रक्षा हेतु मर्दांनगी नहीं दिखायेगा। धीरे-धीरे दु:ख भरे दिन बीत जायेंगे व खुशियों की भोर होगी,जहाँ समन्वय,सामंजस्य ही नहीं; समरसता भी होगी और ज़िंदगी रूपी गाड़ी के दोनों पहिए समान गति से दौड़ेंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५९ ⇒ गुरु बिन कौन करे भव पारा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुरु बिन कौन करे भव पारा…“।)

?अभी अभी # १०५९ ⇒ आलेख – गुरु बिन कौन करे भव पारा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम शिक्षक-दिवस मनाते हैं, मातृ-दिवस और पितृ-दिवस भी मनाते हैं। शिक्षक और माता-पिता को गुरु भी माना गया है, और ईश्वर-तुल्य भी ! त्वमेव माता…

वहीं दूसरी ओर गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही नहीं, साक्षात ब्रह्म भी माना गया है। ऐसे सद्गुरु के दिवस को गुरु-पूर्णिमा के पर्व के रूप में श्रद्धा-पूर्वक मनाया जाता है।

माता-पिता और शिक्षा-गुरु के सत्संस्कार-स्वरूप व्यक्ति में बचपन से ही श्रद्धा, आदर और आस्था के बीज पल्लवित होने लगते हैं, जो उम्र के साथ विकसित हो, स्वभाव में विनम्रता और निष्ठा का रूप ले लेते हैं।

यह सब एक सत-शिष्य की पृष्ठभूमि ही है।।

जो चित्त में व्याप्त अंधकार को मिटाए, और ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वह सतगुरु। गुरु कोई शरीर नहीं, एक अवस्था है, जहाँ सिर्फ़ जगत के कल्याण के भाव का संकल्प ही निहित होता है।

जब शिष्य पर गुरु की अहैतुकी कृपा होती है, तब वह दीक्षा कहलाती है।

जहाँ स्वार्थ का अभाव है, सांसारिकता और भौतिक उपलब्धि की आकांक्षा नहीं, केवल आत्म-कल्याण का भाव जीव में उत्पन्न होता है, तब सतगुरु का संकल्प कृपा के रूप में प्रकट होता है। एक नरेंद्र और एक रामकृष्ण-परमहंस का गुरु-शिष्य के रूप में मिलन होता है।।

गुरु अथवा ईश्वर में तब तक ही अंतर नहीं है, जब तक उन्हें व्यापक अर्थ में न लिया जाए।

ईश्वर कोई शरीर नहीं, गुरु कोई शरीर नहीं ! गुरु-तत्व और ईश्वर-तत्व एक है। गुरु के शरीर को ईश्वर मानने वाले, अध्यात्म मार्ग पर नहीं, आसक्ति-मार्ग पर अग्रसर होने लगते हैं। सतगुरु का मार्ग निष्काम कर्म, श्रद्धा, समर्पण और मोक्ष का मार्ग है। जो गुरु आपको संसार से भगाए, वह सतगुरु नहीं ! जो आपके मन के सांसारिक प्रपंच से मुक्ति दिलाए, वही सद्गुरु।

सबके चित्त में आसीन उस गुरु-तत्व को प्रणाम। गुरु-पूर्णिमा की बधाई।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९६ ☆ सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९६ ☆

☆ सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

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हरी हरी सी चूड़ियाँ, कजरी वाले  राग ।

बहन बेटियाँ आ गयीं, प्रकृति सजाए बाग ।।

इनके बिन लगता सदा, ये जीवन बेकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।

सावन मास आते ही धरती मानो नई दुल्हन-सी सज जाती है। चारों ओर बिछी हरियाली की चादर, बादलों की गड़गड़ाहट और बूँदों की रिमझिम—यह ऋतु केवल प्रकृति का ही नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का भी पर्व है। हिंदू पंचांग में श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय  माना गया है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान कर शिवजी नीलकंठ बने थे, और उसी विष की तपन शांत करने के लिए भक्त सावन में जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।

सोमवार का व्रत, कांवड़ियों की टोली, शिवालयों में गूँजता “ॐ नमः शिवाय” का जयघोष—यह सब मिलकर सावन को एक अलग ही रंग देते हैं। महिलाएँ हरे वस्त्र और चूड़ियाँ पहनकर, झूला झूलकर, लोकगीत गाकर इस मास का स्वागत करती हैं। हरियाली तीज इसी उल्लास की पराकाष्ठा है, जब माता पार्वती और शिवजी के पुनर्मिलन को याद कर सुहागिनें अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

सावन केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं, यह प्रकृति और परमात्मा के बीच के अटूट संबंध का प्रतीक भी है। जिस तरह वर्षा धरती को हरा-भरा कर नवजीवन देती है, उसी तरह भक्ति मन को निर्मल कर आत्मा को नवीनता प्रदान करती है। पेड़-पौधे, नदी-तालाब सब मानो शिव की जटाओं से बहती गंगा का ही विस्तार लगते हैं।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में सावन हमें ठहरने, प्रकृति को निहारने और भीतर की शांति खोजने का अवसर देता है। यही कारण है कि यह मास सदियों से कवियों, भक्तों और आम जनमानस के हृदय में समान रूप से बसा हुआ है—हरियाली, आस्था और उल्लास का त्रिवेणी संगम बनकर।

हर किसान खुशहाल हो, ऐसा होवे देश ।

आओ मिलकर हम रचें, एक सुखद परिवेश।।

वर्षा बिन होता नहीं, धरती  का शृंगार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२४ ☆ पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२४  ☆

?  आलेख – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा , पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

समय केवल कैलेंडर नहीं बदलता, वह मनुष्य की सोच, जीवन शैली और सामाजिक व्यवहार भी बदल देता है। इसी परिवर्तन को समझने के लिए समाजशास्त्रियों और जनसांख्यिकीय अध्येताओं ने विभिन्न आयु वर्गों को अलग अलग पीढ़ियों में एकीकृत संबोधन के रूप में वर्गीकृत किया है। इन्हें संक्षिप्त रूप में जेन एक्स, मिलेनियल, जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा जैसे नामों से जाना जाता है। ये केवल आयु का नहीं, बल्कि उस सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवेश का संकेत हैं जिसमें कोई पीढ़ी विकसित हुई।

लगभग 1965 से 1980 के बीच जन्मे लोग जेन एक्स कहलाते हैं। यह पीढ़ी परंपरागत जीवन से आधुनिक तकनीकी युग तक के संक्रमण की साक्षी रही।

1981 से 1996 के बीच जन्मे मिलेनियल या जेन वाई ने इंटरनेट, मोबाइल संचार और वैश्वीकरण को अपनाकर नई कार्य संस्कृति को आकार दिया।

1997 से 2012 के बीच जन्मी जेन जी पहली वास्तविक डिजिटल पीढ़ी मानी जाती है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इनके दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। सूचना तक त्वरित पहुंच, वैश्विक दृष्टिकोण और तकनीक के सहज उपयोग ने इस पीढ़ी की पहचान निर्मित की है।

2013 के बाद जन्मे बच्चों को जेन अल्फ़ा कहा जाता है। यह पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्मार्ट उपकरणों, आभासी दुनिया और स्वचालित प्रणालियों के बीच बड़ी हो रही है।

इसके बाद 2025 से जन्म लेने वाले बच्चों के लिए जेन बीटा शब्द प्रचलन में आ रहा है, जिनके जीवन में एआई, रोबोटिक्स और स्मार्ट परिवेश और भी गहराई से समाहित होंगे।

 

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन पीढ़ियों की समय सीमाओं में विभिन्न शोध संस्थानों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए इन्हें कठोर मानक नहीं, बल्कि सामाजिक अध्ययन के उपयोगी संकेतक मात्र माना जाता है।

 

आज जेन जी या जेन अल्फ़ा जैसे शब्द केवल फैशनेबल संबोधन नहीं हैं। ये उस युग की पहचान हैं जिसमें कोई पीढ़ी पली बढ़ी, उसने तकनीक को किस रूप में अपनाया और समाज को किस दिशा में प्रभावित किया। वस्तुतः पीढ़ियों के ये संक्षिप्त नाम बदलते समय का सामाजिक इतिहास हैं, जो मनुष्य और तकनीक के विकसित होते संबंधों की कहानी भी कहते हैं।

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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)

☆ आलेख – संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

 संवेदना मानवीय गुण है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की भावनाओं,पीड़ा, खुशी व परिस्थितियों को समझकर उनके प्रति करुणा, सहानुभूति और सहयोग का भाव रखता है। संवेदनशील व्यक्ति केवल परिस्थिति को जानता ही नहीं, महसूस भी करता है। उसके अंदर दूसरे के नजरिए से सोच पाने की समझ होती है, दु:ख को देखकर उसके मन में करुणा का भाव उत्पन्न होता है, सहयोग के लिए आगे आता है और समाज व प्रकृति के प्रति सजग रहकर अपनी जिम्मेदारी समझता है। समाज का निर्माण भावनाओं, संवेदनाओं और परस्पर  विश्वास के आधार पर होता है। यदि संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान रह जाए और उसमें उसमें संवेदना, करुणा, सहानुभूति तथा सम्मान का अभाव हो जाए तो समाज में दूरियाँ, अविश्वास और संघर्ष बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब संवाद में मानवीय संवेदनाएँ जुड़ जातीं हैं तब वह बिखरे, विभाजित समाज को एकसूत्र में पिरोने का साधन बन जाता है। संवाद व्यक्ति को विरोधी नहीं बल्कि सहयात्री मानता है। इसमें मतभेद हो सकते हैं किन्तु मनभेद नहीं होना चाहिए। जब संवाद में सहानुभूति, धैर्य, सम्मान और करुणा का समावेश होता है तब वह संवेदनात्मक संवाद कहलाता है। सक्रिय एवं धैर्यपूर्ण श्रवण, भिन्न मतों का सम्मान, पूर्वाग्रहों से मुक्त दृष्टिकोण, भाषा में संयम व शिष्टता, समाधान केन्द्रित सोच, मानवीय गरिमा का संरक्षण, विश्वास निर्माण की प्रक्रिया आदि संवाद की प्रमुख विशेषताएँ होती हैं।

भारतीय संस्कृति में संवाद केवल सूचना का माध्यम नहीं, सत्य की खोज का साधन माना गया है। उपनिषदों में गुरू और शिष्य के बीच संवाद की परम्परा ज्ञान का आधार रही। गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के मध्य संवेदनात्मक संवाद अनुपम उदाहरण है। विषादग्रस्त अर्जुन को श्रीकृष्ण युद्धभूमि में आदेश नहीं देते अपितु उसके मनोभावों को समझकर संशयों का समाधान करते हैं। रामायण में श्रीराम निषादराज, शबरी, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान आदि से उनकी गरिमा के अनुरूप संवाद करते हैं। बौद्ध और जैन परम्परा में भी करुणा, अहिंसा और संवाद को परिवर्तन का आधार माना गया है। महात्मा गाँधी का सार्वजनिक जीवन संवाद की शक्ति पर ही आधारित था। उन्होंने विरोधियों से कभी संवाद बन्द नहीं किया। उनका कथन था कि– ‘ असहमति शत्रुता का कारण नहीं होनी चाहिए। ‘ प्रेमचंद की कहानियाँ सामाजिक विषमता को उजागर करते हुए करुणा और न्याय का संदेश देतीं हैं। कबीरदास की वाणी धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मानवीय एकता का आह्वान करती है– ‘ ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।। ‘ इसके अतिरिक्त ‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ तथा ‘ सर्वे भवन्तु सुखिन: ‘ जैसे भारतीय आदर्श संवेदनात्मक संवाद की वैश्विक भावना को अभिव्यक्त करते हैं।

समकालीन समाज आज अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है। आज लोग वैचारिक ध्रुवीकरण के आधार पर समूहों में बँटते जा रहे हैं। मतभेद को शत्रुता समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आर्थिक विषमता, शिक्षा में असंतुलन और अवसरों की असमान उपलब्धता सामाजिक दूरी का कारण बन रही है। छोटी-छोटी घटनाएँ भी बड़े सामाजिक तनाव का कारण बन जातीं हैं क्योंकि संवाद के स्थान पर अविश्वास बढ़ जाता है। सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रिया, अपमानजनक टिप्पणियाँ तनाव उत्पन्न करतीं हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन और व्यस्त जीवन-शैली ने आत्मीय संवाद के अवसर कम कर दिए हैं। इन मुश्किल हालातों में संवेदनात्मक संवाद अविश्वास को विश्वास में बदलता है, हिंसा के स्थान पर समझ विकसित करता है, समाज में सहिष्णुता बढ़ाता है, विविधता में एकता की भावना को मजबूत करता है, लोकतांत्रिक संस्कृति को सशक्त बनाता है, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव को कम करता है तथा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को गति देता है।

सारत: कह सकते हैं कि संवेदनात्मक संवाद सामाजिक स्थिरता, लोकतांत्रिक परिपक्वता, राष्ट्रीय एकता व विभाजित समाज को जोड़ने की एक सुन्दर सशक्त पहल है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है परन्तु मनभेद समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। अत: आवश्यक है कि हम अपने भीतर सहनशीलता, धैर्य और परस्पर समझ को बढ़ाएँ! किसी को सुधारने का प्रयास प्रेम और श्रद्धा से करें! केवल निंदा या उपेक्षा से कोई सुधार नहीं होता। जहाँ प्रेम और संवेदनात्मक संवाद जीवित रहता है, वहाँ विश्वास जन्म लेता है और जहाँ विश्वास होता है वहाँ समाज विभाजन से ऊपर उठकर समरसता और प्रगति की ओर अग्रसर होता है।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५८ ⇒ नाम की महिमा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नाम की महिमा…“।)

?अभी अभी # १०५८ ⇒ आलेख – नाम की महिमा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संज्ञा हो या सर्वनाम, हमारा नाम के बिना काम नहीं चलता। नाम में ही ईश्वर का वास है, नाम में ही भगवान भी हैं और नारायण भी, फिर भी हमें हमारे मनमंदिर के राम के दर्शन नहीं होते।

बचपन से ही मैं राम के करीब भी रहा हूं, और ईश्वर के करीब भी ! नारायण तो मेरा पक्का दोस्त था, कल के भगवान को हम आज भगवान भाई कहकर पुकारते हैं, बड़े अच्छे मिलनसार व्यक्ति हैं।।

अपने इष्ट और आराध्य को हम जिस भी नाम से स्मरण करते हैं, पुकारते हैं और भजते हैं, वे सभी तो शरीर रूप में हमारे आसपास मौजूद हैं, लेकिन इस नश्वर जीव पर माया का ऐसा पर्दा पड़ा है, कि वह सिर्फ नाम में ही नहीं, रूप और स्वरूप में भी उलझा है। मंदिर में विराजमान मर्यादा पुरुषोत्तम राम अलग है और मेरा मित्र राम अलग। दोनों की आपस में कोई तुलना नहीं हो सकती।

ईश्वर, परमेश्वर, भगवान अथवा अपने इष्ट को हम जानते, पहचानते और मानते हैं, उनकी जप, पूजा, आराधना, प्रार्थना और सेवा सुश्रुषा करने में जो भक्ति भाव और परमानंद की अनुभूति होती है, वह किसी परिचित गिरीश और जगदीश से मिलने अथवा स्मरण मात्र से संभव नहीं। कहां राजा भोज…?

आदर्श अलग होता है और वास्तविकता और हकीकत उससे बहुत अलग होती है। गरीबों, दीन हीन की सेवा ही ईश्वर की सेवा है, माता पिता के चरणों में स्वर्ग है और गौ माता की तो बस पूछिए ही मत। फिर भी मंदिर मंदिर है और गुरुद्वारा गुरुद्वारा। अयोध्या के राम ही वास्तविक राम हैं और मथुरा द्वारका के कृष्ण ही तो कृष्ण कन्हैया हैं।

क्या सिर्फ नाम लेने, स्मरण करने अथवा अपने इष्ट को भजने से ही जीव का कल्याण हो सकता है। कहने को तो कहा भी गया है, कलियुग नाम आधारा! और शायद इसीलिए किसी अपने मित्र नारायण को पुकारते पुकारते आपको भी साक्षात नारायण के दर्शन हो जाएं।।

हमारे आसपास कितने स्त्री पुरुष के ऐसे नाम मंडरा रहे हैं, जिनके नाम मात्र से ही किसी देवी देवता का स्मरण हो आता है। सीता, सरस्वती, मंगला, गायत्री और लक्ष्मी जैसे नाम पहले रखे ही जाते थे, आज भी रखे जाते हैं, बस उनकी दशा मत पूछिए, क्योंकि आज सरस्वती काम पर नहीं आने वाली, बेचारी बीमार है।

यह इंसान बहुत चतुर और चालाक है। वह एक तीर से दो शिकार करना चाहता है, रमेश, दिनेश, सुरेश, महेश, अविनाश, अरविंद और कई शैलेष उसके परिचित स्नेही, मित्र, रिश्तेदार और करीबी हैं, आम के आम और गुठलियों के दाम, यानी उनके नाम के बहाने अपने इष्ट का भी नाम लेने में आ जाएगा और पहचान के लिए उनके नाम के आगे वर्मा, सक्सेना, अवस्थी और श्रीवास्तव सुशोभित हो जाएगा।।

नाम से ही हमारी पहचान है, प्रसिद्धि है। एक राम नाम ही तो हमारे सभी बिगाड़े काम बनाता है।

कहीं खाटू श्याम तो कहीं सांवरिया सेठ, किसी के महाकाल तो किसी के ओंकार। पुणे में अगर दगड़ू सेठ के गणपति की महिमा है तो पूरे महाराष्ट्र में अष्ट विनायक विराजमान हैं। एक और मेरा परम मित्र गणेश मुझे नैनीताल बुला रहा है, तो दूसरी ओर अभिन्न हृदय नारायण जी का प्रयाग राज का आग्रहपूर्ण आमंत्रण लंबित है।

नाम में ही रस और रूप है। महाराष्ट्र के संत गोंदवलेकर महाराज ने नाम के माहात्म्य पर एक पुस्तक लिखी है, प्रवचन पारिजात, जिसमें नाम की महिमा पर उनके ३६५ प्रवचन संकलित हैं। १ जनवरी से ३१ जनवरी तक। रोज एक पृष्ठ पढ़िए, नाम में खो जाइए। राम तेरे कितने नाम।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५७ ⇒ तन – बदन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तन – बदन…“।)

?अभी अभी # १०५७ ⇒ आलेख – तन – बदन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस काया को सत्तर वसंत हो गए लेकिन मैं आज तक तन में बदन का स्थान तय नहीं कर पाया। वनस्पति जगत में जरूर एक पेड़ के तीन भाग होते हैं, जड़, तना और फलती फूलती टहनियां। लेकिन इंसान के पास तो एड़ी से चोटी तक तन ही तन है। तन में मन है, मन में वतन है और जेब में वेतन है।।

मैंने यह भी सुना है कि अपने पांव पर खड़े होते ही कुछ लोगों के बदन में पैसे की गर्मी चढ़ जाती है तो कुछ सिने तारिकाएं बदन पे सितारे लपेट लेती हैं। आप विश्वास नहीं करेंगे एक ज़माने में तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बदन में ज्वाला जागी थी, और आजकल पश्चिम बंगाल की ममता के बदन में तो साक्षात दुर्गा माता का वास है।।

लगता तो ऐसा है मानो तन – बदन का चोली दामन का साथ है लेकिन जब मेरे दामन में खुशियां आती हैं तो चोली कहीं नजर नहीं आती। हां पूरे बदन में खुशी की एक लहर ज़रूर दौड़ जाती है, और जब कोई वामी अथवा टुकड़े टुकड़े गैंग वाला नजर आ जाता है, तो सारे तन – बदन में आग लग जाती है। आखिर ये आग कब बुझेगी।

जगदीश जी की आरती मैं रोज गाता हूं ! तन, मन, धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन इसमें भी अपना बदन चुपके से छुपा ही लेता हूं। एक भारतीय पत्नी के त्याग और समर्पण की तो बात ही मत पूछिए। लेकिन वहां भी तन, मन से आगे नहीं बढ़ा जाता। किसी के तन पर आपका अधिकार हो सकता है, चलिए मन भी आपको दिया, अब बदन तो छोड़ दो।।

अगर तन पर कपड़े धारण किए जाते हैं तो बदन पर मालिश की जाती है। तेज़ बुखार में तन की सुध नहीं रहती, पूरा बदन पहले टूटता है, फिर गर्म हो जाता है।

एक क्रोसिन पेन रिलीफ से शरीर को आराम मिलता है।

इससे यह सिद्ध हुआ कि हमारे शरीर में ही तन – बदन का वास है। जब भी दफ्तर की कुर्सी पर बैठें, ज़रा तनकर बैठें। घर पर व्यायाम से तन को व मन को स्वस्थ रखें, तथा अधिक व्यायाम के पश्चात बदन को ढीला छोड़ दें। लंबी गहरी सांस लेते रहें। सारा तनाव निकल जाएगा।।

जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे 

हसरत जयपुरी ! यकीन नहीं होता, तो देख लीजिए, तन – बदन का अध्यात्मिक दर्शन ;

तन में अग्नि, मन में चुभन

कांप उठा मोरा गोरा बदन

ओ रब्बा खैर …खैर

रब्बा खैर ही करे, तो सबकी खैर ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ एक जुझारू व्यक्तित्व “भिखारी ठाकुर” ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

(जन्म – १८ दिसंबर १८८७ – मृत्यु १० जुलाई १९७१)

☆ आलेख ☆ एक जुझारू व्यक्तित्व “भिखारी ठाकुर” ☆

जुझारू होने का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता कि आप किसी संघर्षमय परिस्थिति में घिरे हैं और लगातार जूझ रहे हैं; बल्कि जुझारू होने का असली अर्थ यह है कि 👉आपके पास जो कुछ भी सीमित संसाधन हैं, उनमें ही संतुष्ट और पर्याप्त रहकर खुद को साबित करना है… 

हमारे छपरा शहर में एक चौराहा है,“भिखारी ठाकुर के नाम से चौराहा”। बचपन में जब हम छोटे थे, तो यह नाम सुनने में थोड़ा अजीब लगता था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नाम तो आसानी से समझ में आ जाते थे, लेकिन ‘भिखारी ठाकुर‘ नाम का अर्थ उस उम्र में पल्ले नहीं पड़ता था। हालांकि, जैसे-जैसे उम्र बढ़ी और समझदारी विकसित हुई, वैसे-वैसे भिखारी ठाकुर की महान उपलब्धियां भी समझ आने लगीं।

तब यह अहसास हुआ कि कोई व्यक्ति… शून्य से शुरू हुआ सफर तय करके भी सफलता के शिखर तक पहुँच सकता है। आज भिखारी ठाकुर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भोजपुरी संस्कृति और जुझारू व्यक्तित्व की एक वैश्विक पहचान बन चुके हैं।

लोक के महानायक और संघर्ष की जीवंत मिसाल – शून्य से शिखर का वास्तविक अर्थ… 

जिस अभावग्रस्त और पिछड़े परिवेश में भिखारी ठाकुर ने जन्म लिया था, वहाँ से उठकर कला और साहित्य की दुनिया में ऐसा इतिहास रचना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उनके जीवन ने यह साबित कर दिया कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए महलों की नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और हौसले की जरूरत होती है।

समाज का सटीक आईना:

‘विदेशिया‘, ‘बेटी-वियोग‘ और ‘भाई-विरोध‘ जैसी उनकी रचनाओं ने केवल समाज का मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज के भीतर मौजूद कुरूपताओं, पलायन के दर्द और पारिवारिक टूटन को बहुत ही बेबाकी से सबके सामने रखा। उन्होंने आम जनमानस की भाषा और उनकी पीड़ा को अपनी कला की धुरी बनाया।

छपरा की माटी का गौरव…

छपरा (सारण) की इस पावन माटी ने देश को कई रत्न दिए हैं, लेकिन भिखारी ठाकुर का स्थान सर्वोपरि है। छपरा का वह चौराहा सिर्फ एक भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि एक साधारण सा दिखने वाला इंसान भी अपनी मेहनत और जुझारूपन से इतिहास रच सकता है।

आज के दौर में प्रासंगिकता

आज के समय में जब युवा हर छोटी-बड़ी असफलता से निराश हो जाते हैं, तब भिखारी ठाकुर का जीवन और उनका संघर्ष एक मजबूत प्रकाशस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि जो संसाधन आपके पास हैं, उन्हीं का इस्तेमाल करके अपनी एक अलग लकीर खींची जाए।

भिखारी ठाकुर और उनका वह चौराहा हमें यह सिखाता है कि सफलता पद या पैसों से नहीं, बल्कि आपके द्वारा समाज को दिए गए योगदान और आपके अटूट संघर्ष से आंकी जाती है।

☆

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५६ ⇒ दर्द और हमदर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दर्द और हमदर्द…“।)

?अभी अभी # १०५६ ⇒ आलेख – दर्द और हमदर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जहां दर्द है, वहां कोई न कोई हमदर्द भी है ! दुख मन का हो, या दर्द तन का हो, एक आह या पुकार जब उठती है, किसी न किसी हमदर्द की याद अवश्य आती है। वह कोई अपना ही होता है, जिसका अस्तित्व या तो इस दुनिया में होता है या किसी और दुनिया में।

दो कदम चले, रास्ते के पत्थर से ठोकर जब लगी, क्यूं उसकी याद आई, जिसे हम कभी मां कहते, कभी अम्मा, कभी आई। जब दुख दर्द में कराहते, मुंह से अनायास अरे राम रे, अथवा क्यों निकलता, हे राम या या खुदा, अब तो तू ही बचा। किसी को संकट में हनुमान याद आते तो किसी को नानी। क्या नहीं ये सब उन हम दर्दों की फेहरिस्त, जो हमें याद मुंह जबानी।।

हमारे दर्द का हमदर्द कोई औरत भी हो सकती है, कोई मर्द भी हो सकता है। वह हमारे दुख दर्द को दूर तो नहीं करता, लेकिन दिल को राहत और तसल्ली अवश्य देता है, जिससे कभी यह शिकायत नहीं रह जाती, कि :

हंसने की चाह ने

कितना मुझे रुलाया है,

कोई हमदर्द नहीं,

दर्द मेरा साया है।

जी हां ! यह सच है कि आपका हम दर्द हमेशा साये की तरह आपके साथ साथ चलता है। कितना दर्द है राजा मेहंदी अली खान के इस गीत में ;

तू जहां जहां चलेगा

मेरा साया साथ होगा।

कभी मुझको याद करके,

जो बहेंगे तेरे आंसू

तो वहीं पे रोक लेंगे

उन्हें आ के मेरे आंसू

तू जिधर का रुख करेगा

मेरा साया साथ होगा।।

आखिर ये साया कौन है ! यही वो रहबर है, जो कभी दोस्त बनकर, कभी कोई रिश्ता बनकर, तो कभी कोई फरिश्ता बनकर हमारे दर्द के साथ चलता है। हम किसी का घाव ठीक नहीं कर सकते, लेकिन प्रेम के दो शब्द, मरहम का काम करते हैं, और तिरस्कार की एक नजर, जले पर नमक छिड़कने का काम करती है।

क्या हमने कभी कोई ऐसी फेहरिस्त बनाई है, जब हमने डूबते को तिनके का सहारा दिया हो। किसी दुखी इंसान के आंसू पोंछे हों। यही ज़बान तो छुरी भी है और कटार भी। मरहम भी यही और प्यार, दुलार भी।।

नेकी और बदी, ये ज़िन्दगी की किताब के शब्द हैं, महज किसी शब्दकोश के दो आखर नहीं। चलती ट्रेन में जब कोई अनजान व्यक्ति प्लेटफॉर्म पर दौड़ता हुआ, आपकी प्यास बुझाने के लिए, आपका खाली बर्तन भरता है, तो क्या आप सोच सकते हैं, यह कितनी बड़ी सेवा है। ताली, थाली पर बहुत राजनीति और व्यंग्य हुआ, लेकिन सच्चाई के धरातल पर भी बहुत कुछ हुआ। देर से ही सही, किसी ने तो पलायन करते मजदूरों की आवाज़ उठाई।

ये चलते फिरते हमदर्द फरिश्ते आपको सब जगह मिलेंगे। कहीं नजर नहीं आएंगे, कहीं रूबरू मिलेंगे। शैलेन्द्र से अच्छा इस फलसफे को हमें और कोई नहीं समझा सकता ;

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार

किसी के वास्ते हो, तेरे दिल में प्यार

जीना इसी का नाम है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४६ – सच्चा गुरु ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४६ ☆ सच्चा गुरु… ?

मनुष्य अशेष विद्यार्थी है। प्रति पल कुछ घट रहा है, प्रति पल मनुष्य बढ़ रहा है। घटने का मुग्ध करता विरोधाभास यह कि  प्रति पल, पल भी घट रहा है। 

हर पल के घटनाक्रम से मनुष्य कुछ ग्रहण कर रहा है। हर पल अनुभव में वृद्धि हो रही है, हर पल वृद्धत्व समृद्ध हो रहा है।

समृद्धि की इस यात्रा में प्रायः हर पथिक सन्मार्ग का संकेत कर सकने वाले मील के पत्थर को तलाशता है। इसे गुरु, शिक्षक, माँ, पिता, मार्गदर्शक,  सखा, सखी कोई भी नाम दिया जा सकता है।

विशेष बात यह कि जैसे हर पिता किसी का पुत्र भी होता है, उसी तरह अनुयायी या शिष्य,  मार्गदर्शक भी होता है। गुरु वह नहीं जो कहे कि बस मेरे दिखाये मार्ग पर चलो अपितु वह है जो तुम्हारे भीतर अपना मार्ग ढूँढ़ने की प्यास जगा सके। गुरु वह है जो तुम्हें ‘एक्सप्लोर’ कर सके, समृद्ध कर सके। गुरु वह है जो तुम्हारी क्षमताओं को सक्रिय और विकसित कर सके।

एक संत थे जिनके लिए कहा जाता था कि वे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानते हैं। स्वाभाविक था कि उनके शिष्यों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि होती गई। हरेक के मन में ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानने की सुप्त इच्छा थी। एक दिन दैनिक साधना के उपरांत उनके परम शिष्य ने इस बाबत पूछ ही लिया। गुरुजी बोले, मैं तुम्हें ईश्वर तक पहुँचने के मार्गदर्शक तत्व बता सकता हूँ पर अपना मार्ग तुम्हें स्वयं ढूँढ़ना होगा।

ज्ञानी जानता है कि पुल पार करने से नदी पार नहीं होती। नदी पार करने के लिए उसमें कूदना पड़ता है। लहरों के थपेड़ों के साथ अन्य सभी आशंकाओं को भी तैरकर परास्त करना होता है। तैराकी के गुर सिखाये जा सकते हैं पर तैरते समय हरेक को अपने हिस्से की चुनौतियों से स्वयं दो-दो हाथ करने पड़ते हैं।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहें तो जीपीएस लगाकर गंतव्य तक पहुँचा तो जा सकता है पर रास्ते का ज्ञान नहीं होता। रास्ता समझने के लिए स्वयं भटकना होता है। अपना रास्ता स्वयं ढूँढ़ना होता है। स्वयं की क्षमताओं को सक्रिय करना होता है।  स्वयं को स्वयं ही अपना शोध करना होता है, स्वयं को स्वयं ही अपना बोध  करना होता है।

ध्यान रहे कि पथ तो पहले से ही है। तुम उसका अनुसंधान भर करते हो, आविष्कार नहीं। यह भी भान रहे कि पथ का अनुसंधान करनेवाले तुम अकेले नहीं हो, असंख्य दूसरे भी अपने-अपने तरीके से अनुसंधान कर रहे हैं। सारे मार्गों का अंतिम लक्ष्य एक ही है। अत: यह एकाकार का मार्ग है।

सच्चा गुरु वह है जो  तुम्हें एकल नहीं एकाकार की यात्रा कराये। एकाकार ऐसा कि पता ही न चले कि तुम गुरु के साथ यात्रा पर हो या तुम्हारे साथ गुरु यात्रा पर है। दोनों साथ तो चलें पर कोई किसी की उंगली न पकड़े।

यदि ऐसा गुरु तुम्हारे जीवन में है तो तुम धन्य हो। तुम्हारा मार्ग प्रशस्त है।

जिनकी गुरुता ने जीवन का मार्ग सुकर किया, उनका वंदन। जिन्होंने मेरी लघुता में गुरुता देखी, उन्हें नमन।

गुरु पूर्णिमा की अग्रिम शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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